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अपनी आवाज अपना गला ( दुनिया मेरे आगे )

Monday, 26 December 2011 06:10

अफलातून जनसत्ता 26 दिसंबर, 2011: हरे राम, हरे कृष्ण’ संप्रदाय द्वारा रूसी में अनूदित गीता पर रूस में आक्षेप लगाए गए हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात की गई है। विदेश मंत्री ने संसद और देश को आश्वस्त किया है कि वे रूस सरकार से इस मामले पर बात करेंगे। मामला पर-राष्ट्र का है। क्या भारत में ही इस पुस्तक को लेकर परस्पर विपरीत समझदारी नहीं है? यह मतभेद और संघर्ष सहिष्णु बनाम कट्टरपंथी का है। लोहिया ने इसे ‘हिंदू बनाम हिंदू’ कहा। उन्होंने गांधी-हत्या (हत्यारों की शब्दावली में ‘गांधी-वध’) को भी हिंदू बनाम हिंदू संघर्ष के रूप में देखा। देश के विभाजन के बाद एक बार गांधीजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में निमंत्रित किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई थी। सरसंघचालक गोलवलकर ने गांधीजी का स्वागत करते हुए उन्हें ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी हैं। हिंदू धर्म की विशिष्टता, जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। अगर हिंदू यह मानते हों कि भारत में अ-हिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दर्जे से संतोष करना होगा तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा। मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।’
गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी-मंडली के एक सदस्य बोल उठे- ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।’ गांधीजी ने उत्तर दिया- ‘लेकिन यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।

(पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ- 17) इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया- ‘क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? अगर नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?’ गांधीजी ने कहा- ‘पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है? दूसरे शब्दों में- हमें ऐसा अधिकार मिल सकता है, जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की, तो यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली-भांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद, दोनों एक साथ बन जाएं तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे। उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए। कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।’ (संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड: 89)
आध्यात्मिक सत्य को समझाने के लिए कई बार भौतिक दृष्टांत की आवश्यकता पड़ती है। यह भाइयों के बीच लड़े गए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि हमारे स्वभाव में मौजूद ‘भले’ और ‘बुरे’ के बीच की लड़ाई का वर्णन है। मैं दुर्योधन और उसके दल को मनुष्य के भीतर की बुरी अंत:प्रेरणा और अर्जुन और उसके दल को उच्च अंत:प्रेरणा मानता हूं। हमारी अपनी काया ही युद्ध-भूमि है। इन दोनों खेमों के बीच आंतरिक लड़ाई चल रही है और ऋषि-कवि उसका वर्णन कर रहे हैं। अंतर्यामी कृष्ण, एक निर्मल हृदय में फुसफुसा रहे हैं। गांधीजी तब भले ही एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती हैं और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका ही गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी अपना!

गांधी जी और संघ

जनसत्ता 29 दिसंबर, 2011: अपनी आवाज अपना गला’ (दुनिया मेरे आगे, 26 दिसंबर) में अफलातून जी ने कुछ तथ्यों को सही संदर्भों के साथ प्रस्तुत नहीं किया है। इसमें संघ-द्वेष से आपूरित पूर्वग्रह की झलक मिलती है। देश विभाजन के बाद गांधीजी किसी संघ शिविर में नहीं गए थे। दिल्ली में भंगी बस्ती की शाखा में उन्हें 16 सितंबर, 1947 को आमंत्रित किया गया था। आमंत्रित करने वाले व्यक्ति सरसंघचालक गोलवलकर नहीं, बल्कि दिल्ली के तत्कालीन प्रांत प्रचारक वसंत राव ओक थे। गांधीजी सदैव खुद को गौरवशाली सनातनी हिंदू कहते थे। वसंत राव ओक ने शाखा पर गांधीजी का परिचय ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ कह कर करवाया। गांधीजी ने इस परिचय पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
गोलवलकर से गांधीजी की बातचीत का वर्णन अफलातून जी ने ‘पूर्णाहुति’ का संदर्भ देकर किया है। इस मुलाकात का गांधी संपूर्ण वांग्मय में दो बार जिक्र है। पहला, 21 सितंबर, 1947 को प्रार्थना-प्रवचन में- ‘अंत में गांधीजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु (गोलवलकर) से अपनी और डॉ दिनशा मेहता की बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि मैंने सुना था कि इस संस्था के हाथ भी खून से सने हुए हैं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिलाया कि यह बात झूठ है। उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है। उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहींं है। वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है। उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है। उन्होंने (गुरुजी ने) मुझसे कहा कि मैं उनके विचारों को प्रकाशित कर दूं।’
इसका जिक्र गांधीजी ने भंगी बस्ती की शाखा पर अपने भाषण में किया- ‘कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई थीं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिया कि हालांकि संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचा कर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास

नहीं रखता। अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्मरक्षा का कौशल सिखाता है। प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया।’
इस मुलाकात का जैसा वर्णन अफलातून जी ने किया है और अंत में लिखा है कि ‘उन्होंने (गांधीजी ने) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।’ ये विचार प्यारेलाल जी के हो सकते हैं, गांधीजी के नहीं। गांधीजी ने अपने भाषण में जो संघ के विषय में कहा, वह इस प्रकार है- ‘संघ एक सुसंगठित और अनुशासित संस्था है। उसकी शक्ति भारत के हित में या उसके खिलाफ प्रयोग की जा सकती है। संघ के खिलाफ जो आरोप लगाए जाते हैं, उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।’
अफलातून जी ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई।’ इसका भी वर्णन संपूर्ण वांग्मय में है। किसी संघ अधिकारी ने गीता के संदर्भ में वहां कुछ भी नहीं कहा था। एक स्वयंसेवक ने गांधीजी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के संदर्भ में गीता का हवाला देते हुए यह पूछा था- ‘गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कौरवों का नाश करने के लिए जो उपदेश देते हैं, उसकी आप किस तरह व्याख्या करेंगे?’ गांधीजी ने स्वयंसेवक की समझदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, संजीदगी से जवाब दिया- ‘… पापी को सजा देने के अधिकार की जो बात गीता में कही गई है, उसका प्रयोग तो केवल सही तरीके से गठित सरकार ही कर सकती है।’ बाद में गांधीजी ने आग्रह किया कि कानून को अपने हाथ में लेकर सरकारी प्रयत्नों में बाधा न डालें।
लेख के अंत में गीता के अर्थ का जो आध्यात्मिक आयाम अफलातून जी ने प्रस्तुत किया है, उस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। अनावश्यक रूप से संघ को बदनाम करने और घृणा फैलाने के प्रयासों को जब इन आयामों में मिश्रित किया जाता है, तब हम समाज की सेवा नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे होते हैं।
’महेश चंद्र शर्मा, (पूर्व सांसद), द्वारका, नई दिल्ली

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

खुले मन की जरूरत

जनसत्ता 30 दिसंबर, 2011: जिस तरह महेश चंद्र शर्मा जी ने ‘संघ’ के बचाव में गांधीजी के निकट के साथी, सचिव और जीवनीकार प्यारेलाल जी पर लांछन लगाया है, वह ‘संघ’ के गोयबल्सवादी तौर-तरीके से मेल खाता है। संपूर्ण गांधी वांग्मय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान छेड़छाड़ की गई थी, उस पर यूपीए-एक सरकार ने वरिष्ठ सर्वोदयकर्मी नारायण देसाई की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। जांच समिति ने शोधकर्मियों द्वारा लगाए गए छेड़छाड़ के सभी आरोप सही पाए थे और उक्त संस्करण की पुस्तकों और सीडी की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने और असंशोधित मूल रूप की ही बिक्री करने की संस्तुति की थी। बहरहाल, जितनी तफसील में इस विषय पर लिखा जा सकता है, उसका मोह न कर मैं इतिहास-क्रम में उलटा जाते हुए सिर्फ ठोस प्रसंगों को रखूंगा।
गांधी को ‘संघ’ के प्रात:-स्मरणीयों में शरीक करने की चर्चा हम महेश जी, प्रबाल जी, अशोक भगत जी, रामबहादुर जी जैसे स्वयंसेवकों से जेपी आंदोलन के दौर (1974-75) से सुनते आ रहे थे। सितंबर और अक्टूबर 2003 में प्रकाशित संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका मेरे हाथ लग गई। स्मरणीय दिवसों में गांधी जयंती के विवरण में ‘देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।’ संघ के साहित्य-बिक्री पटलों पर ‘गांधी-वध क्यों’ नामक पुस्तक में ‘वध’ के ये कारण ही बताए गए हैं।
संघ की शाखा में गांधीजी के जाने की तारीख के उल्लेख में अपनी चूक मैं स्वीकार करता हूं। प्यारेलाल जी द्वारा लिखी जीवनी ‘महात्मा गांधी दी लास्ट फेस’ पर महेश जी ने पूर्वाग्रह का आरोप लगाया है। इसलिए दिल्ली डायरी, प्रार्थना प्रवचन और गांधी द्वारा संपादित पत्रों से ही उद्धरण पेश हैं।
गीता की बाबत दिया गया उद्धरण संपूर्ण गांधी वांग्मय (खंड 89) में मौजूद है।
‘अगस्त क्रांति-दिवस’ (9 अगस्त, 1942) को प्रकाशित ‘हरिजन’

(पृष्ठ 261) में गांधीजी ने लिखा- ‘शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके 3,000 सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- ‘पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो, उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे। अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।’ बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसी ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है।
नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा, और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।
धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।’
महेश जी खुले दिमाग से तथ्यों को आत्मसात करें और ‘प्रात: स्मरणीय’ के पक्ष से परेशान न हों।
’अफलातून, काहिवि, वाराणसी

अप्रासंगिक विषय

चौपाल’ (30 दिसंबर) में अफलातून का जवाब पढ़ा।  उन्होंने अप्रासंगिक विषयों को अपने पत्र में उठाया है, जैसे गांधी संपूर्ण वांग्मय से राजग सरकार ने छेड़छाड़ की और संघ ने महात्मा गांधी का नाम कैसे ‘प्रात: स्मरण’ में जोड़ा। इन मुद्दों का न तो मेरे पत्र में उल्लेख था, न ही अफलातून के मूल लेख में। इस संदर्भ में केवल इतना  कहना है कि मैं संपूर्ण वांग्मय के जिन खंडों को उद्धृत कर रहा हूं, वे राजग सरकार के समय छपे हुए नहीं, बल्कि मई 1983 में नवजीवन ट्रस्ट, अमदाबाद द्वारा प्रकाशित हैं। जो उद्धरण मैंने दिए हैं वे किसी छेड़छाड़ के नहीं, उसी अधिकृत संपूर्ण वांग्मय के हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शिविरों में भारत के महान पुरुषों के नामों का स्मरण ‘प्रात: स्मरण’ में करता है। अफलातून इससे क्यों नाराज हैं! मैंने प्यारेलाल जी पर कोई लांछन अपने पत्र में नहीं लगाया, कृपया पत्र को पुन: ध्यान से पढ़ें। मैंने अफलातून को ‘पूर्वाग्रह-ग्रस्त’ अवश्य कहा है। यदि अफलातून को संघ विषयक कोई ‘पूर्वाग्रह’ नहीं है, तो निश्चय ही यह खुशी की बात है।
अफलातून ने पुन: गांधीजी को सही प्रकार से उद्धृत नहीं किया। जिस तथाकथित नारे और भाषण की शिकायत दिल्ली प्रांत कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने गांधीजी से की थी, उसके संदर्भ में गांधीजी ने जो कुछ ‘हरिजन’ में लिखा उसके वे अंश जो अफलातून ने उद्धृत नहीं किए उन्हें उद्धृत करने से पूरी वास्तविकता ही बदल जाती है।
गांधीजी ने कहा है ‘‘मैं तो यही उम्मीद कर सकता हूं यह नारा अनधिकृत है, और जिस वक्ता के बारे में यह कहा गया है कि उसने ऊपर के विचार व्यक्त किए हैं, वह कोई जिम्मेदार आदमी नहीं है।’’ एक अनधिकृत, गैर-जिम्मेदार नारे और वक्तव्य को लेकर अफलातून क्या सिद्ध करना चाहते हैं, जिसके लेखक के बारे में किसी को कुछ पता नहीं। ऐसे वाहियात नारों और वक्तव्यों के आधार पर आप संघ का आकलन करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई आपको पूर्वाग्रही भी न कहे! संघ को थोड़ा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि शाखाओं में कभी नारेबाजी नहीं होती।
उस वाहियात भाषण का भी गांधीजी जवाब देते हैं, यह उनकी संजीदगी है।
अफलातून से केवल इतना निवेदन है कि उन्हें संघ से जो शिकायत हो, वे स्वयं अपने तर्कों से उसे प्रस्तुत करें, किसी महापुरुष की आड़ लेकर उन्हें प्रहार करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। पता नहीं काशी प्रांत की कौन-सी शाखा पुस्तिका उनके हाथ लग गई। देश विभाजन को न रोक पाने के कारण महात्मा जी बहुत दुखी थे, वे 15 अगस्त 1947 के उत्सव में भी शामिल नहीं हुए और द्वि-राष्ट्रवादी पृथकतावादियों के आक्रमण से परेशान हिंदुओं ने गांधीजी के सामने अपनी पीड़ाओं और आक्रोश को व्यक्त किया था। इसका उल्लेख करने में अफलातून को उस पुस्तिका से क्या शिकायत है?
’महेश चंद्र शर्मा, नई दिल्ली

हिन्दू द्विराष्ट्रवादी

महात्मा गांधी का संपूर्ण वांग्मय हिंदी और अंग्रेजी (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) में प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने छापा है, नवजीवन ट्रस्ट ने नहीं। उसका स्वत्वाधिकार जरूर 1983 से 2008 तक नवजीवन ट्रस्ट के पास रहा। ‘गांधीजीनो अक्षरदेह’ (गुजराती वांग्मय) जरूर नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिस उद्धरण का हवाला महेश जी ने दिया है, उसे मैंने ‘हरिजन’ (गांधीजी का अंग्रेजी मुखपत्र) के पृष्ठ 261 से लिया है। द्वि-राष्ट्रवादी केवल मुसलिम लीग के लोग नहीं थे, हिंदुओं के लिए हिंदू राष्ट्र को मानने वाले भी द्वि-राष्ट्रवादी हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलिम लीग से पहले सावरकर ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे

की बात शुरू कर दी थी। हिंदू-राष्ट्रवादी गांधी के समक्ष अपनी शिकायत कभी प्रार्थना सभा में बम फेंक कर कर रहे थे। अंतत: उन्हीं गांधी जी को गोली मार दी। महेश जी के शब्दों में यह उनकी पीड़ा और आक्रोश मात्र था, जिन्हें शाखा-पुस्तिका में असली हिंदू माना गया है। महेश जी ने शाखा-पुस्तिका के उद्धरण का खंडन नहीं किया है, भले ही उन्हें यह पता न हो कि मेरे हाथ कौन-सी पुस्तिका लग गई। शाखा में नारे नहीं उद्घोष होते हैं, पथ-संचलन भी मौन नहीं हुआ करते।
गांधी-हत्या को ‘गांधी-वध’ कहने वालों की किताबें भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय 11, अशोक मार्ग पर भी बिक रही थीं-


http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2011/09/post-195.html

’अफलातून, वाराणसी

 

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    जब राहुल गांधी ने पिछले हफ्ते उत्तरप्रदेश के नौजवानों को फटकारते हुए कहा कि यूपी वालों  , कब तक महाराष्ट्र में भीख मांगोगे और पंजाब में मजदूरी करोगे, तो कई लोगों को यह नागवार गुजरा। इसकी भाषा शायद ठीक नहीं थी। आखिर भारत के अंदर रोजी-रोटी के लिए लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने को भीख मांगना तो नहीं कहा जा सकता। वे अपनी मेहनत की रोटी खाते हैं, भीख या मुफ्तखोरी की नहीं।
किन्तु राहुल आधुनिक भारत की एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा कर रहे हैं। हमारा विकास कुछ इस तरह हुआ है कि रोजगार और समृद्धि देश के कुछ हिस्सों तथा महानगरों तक सीमित हो गई है। बाकी हिस्से पिछड़े, रोजगारहीन और श्रीहीन बने हुए हैं। देहातों में तो हालत और खराब है। वहां बेकारी और मुर्दानगी छायी हुई है और भारी पलायन हो रहा है। जो देहात में रहते हैं वे भी ज्यादातर मजबूरी में रह रहे हैं। दूसरी ओर नगरों व महानगरों में भीड़ बढ़ती जा रही है तथा वहां झोपड़पट्टियों की तादाद विस्फोटक तरीके से बढ़ रही है।
सिर्फ यूपी-बिहार ही नहीं, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा, उत्तराखंड, तेलगांना और विदर्भ से भी बड़ी संख्या में रोजगार की तलाष में नौजवान बाहर जाते हैं। मुंबई, सूरत, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जहां भी काम मिले, वे निकल पड़ते हैं। कई बार उनके साथ धोखा होता है। पूरी मजदूरी नहीं मिलती, खुले आसमान के नीचे पड़े रहते हैं या गंदगी के बीच नरकतुल्य झुग्गियों में रहते हैं, पुलिस उन्हें तंग करती हैं, दुर्घटना में घायल होने पर ठेकेदार ठीक से इलाज नहीं कराता है। कई बार बेमौत मारे जाते हैं और घर वालों को खबर भी नहीं होती। पिछले दिनों आगरा के पास यमुना एक्सप्रेसवे के निर्माण में लगे इलाहाबाद के मजदूरों पर रात में सोते समय जेसीबी मशीन चढ़ जाने की मार्मिक खबर आई थी।
पिछले दो सौ सालों से चल रही भारतीय गांवों के कुटीर उद्योगों व धंधों के नष्ट होने की प्रक्रिया का नतीजा हुआ है कि खेती छोड़कर वहां कोई धंधा नहीं बचा है। खेती में भी गहरा संकट है और वह घाटे का धंधा बनी हुई है। यह आधुनिक पूंजीवादी विकास से उपजा बुनियादी संकट है जो मनरेगा जैसी योजनाओं से न हल हो सकता था और न हुआ।
गांव से पलायन इसलिए भी बढ़ रहा है कि वहां शिक्षा और इलाज की व्यवस्था या तो है नहीं, या है तो बुरी तरह चरमरा गई है। सरकारी स्कूलों की व्यवस्था तो सुधरने की बजाय बाजारीकरण और निजीकरण के हमले की भेंट चढ़ रही है। गांवों के बहुत लोग अब अपने बच्चों को अच्छी षिक्षा दिलाने के लिए कष्ट उठाकर भी शहरों में रहने लगे हैं।
कभी-कभी लोग भोलेपन से सोचते हैं कि हमारे इलाके में कोई कारखाना लग जाएगा तो हमारा विकास हो जाएगा और हमें यहीं पर रोजगार मिलने लगेगा। कारखाने को ही विकास का पर्याय मान लिया जाता है किन्तु हर जगह कुछ ठेकेदारों, व्यापारियों और दलालों को छोड़कर बाकी लोगों को इसमें निराशा ही हाथ लगती है।
मध्यप्रदेश में रीवा के पास जेपी सीमेन्ट कारखाने का अनुभव इस मामले में बड़ा मौजूं है। करीब 25 साल पहले इस कारखाने के लिए जमीन लेते समय गांववासियों को इसी तरह रोजगार, विकास और खुषहाली के सपने दिखाये गये थे। किन्तु दैनिक मजदूरी पर कुछ चैकीदारों को लगाने के अलावा उन्हें रोजगार नहीं मिला। कारखाना चलाने के लिए तकनीकी कौशल वाले कर्मचारी बाहर से आये। उल्टे कारखाने के प्रदूषण और चूना पत्थर खदानों के विस्फोटों से लोगों का जीना हराम हो गया। स्वास्थ्य, खेती, मकान सब प्रभावित होने लगे। ज्ञापन देते-देते थक गए तो सितंबर 2008 में रोजगार और प्रदूषण रोकथाम की मांग को लेकर उन्होंने आंदोलन किया। उन पर गोली चली। उसमें एक नौजवान मारा गया, 70-75 घायल हुए। जो नौजवान मारा गया, वह सूरत में काम करता था और छुट्टी में घर आया था। सवाल यह है कि जिस गांव की जमीन पर यह विशाल कारखाना बना, वहां के नौजवानों को काम की तलाष में एक हजार किलोमीटर दूर क्यों जाना पड़ रहा है ?
दरअसल आधुनिक कारखानों से रोजगार की समस्या कहीं भी हल नहीं होती। यह एक भ्रम है। उनसे रोजगार का सृजन कम होता है, पारंपरिक आजीविका स्त्रोतों का नाश ज्यादा होता है। यहां तक की औद्योगिक क्रांति के दौर में भी ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप की रोजगार समस्या गोरे लोगों के अमरीका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका और एशिया में फैल जाने तथा बस जाने से हल हुई, कारखानों से नहीं। अब जो नए कारखाने लग रहे हैं उनमें मशीनीकरण, स्वचालन तथा कम्प्यूटरीकरण के चलते तो रोजगार और भी कम मिलता है। मशीनीकरण के कारण खेती में भी रोजगार कम हो रहा है। हारवेस्टरों और ट्रैक्टरों की क्रांति ने भूमिहीन गरीबों और प्रवासी आदिवासी मजदूरों का रोजगार भी छीन लिया है। अब रोजगार की विकराल समस्या खड़ी होती जा रही है। इस समय रोजगार का संकट पूरी दुनिया पर छाया है। लंदन के दंगे हो, वाल स्ट्रीट कब्जे का आंदोलन या अरब देशों की जनक्रांतियाँ – सबके पीछे बेरोजगारी-गरीबी से उपजी कुंठा, अनिश्चितता  व असंतोष है।
क्या कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता है, जिससे लोगों को अपने जिले में, अपने घर के पास या अपने गांव में ही अच्छा रोजगार मिलने लगे ? जरुर हो सकता है, किन्तु इसके लिए हमें राहुल गांधी नहीं, एक दूसरे गांधी की ओर देखना पड़ेगा जिसे हम 2 अक्टूबर तथा 30 जनवरी को रस्म अदायगी के अलावा भूल चुके हैं। हमें आधुनिक विकास की चकाचैंध से अपने को मुक्त करना होगा। शहर के बजाय गांव को, मशीन की जगह इंसान को और कंपनियों की जगह जनता को विकास के केन्द्र में रखना होगा। गांवों को पुनर्जीवित करना होगा। बड़े कारखानों की जगह छोटे उद्योगों व ग्रामोद्योगों को प्राथमिकता देनी होगी। भोग-विलास की जगह सादगीपूर्ण जीवन को आदर्श बनाना होगा। विकास और प्रगति की आधुनिक धारणाओं और मान्यताओं को भी समय तथा जमीनी अनुभवों की कसौटी पर कसना होगा।
यदि हम चाहते हैं कि यह दुनिया ऐसी बने, जिसमें सबको सम्मानजनक रोजगार घर के पास मिले, सबकी बुनियादी जरुरतें पूरी हों, कोई भूखा या कुपोषित न रहे, कोई अनपढ़ न रहे, इलाज के अभाव में कोई तिल-तिल कर न मरे, अमीर-गरीब की खाई चौड़ी होने के बजाय खतम हो, सब चैन से रहे तो हमें विकास की पूरी दिशा बदलना होगा। आधुनिक सभ्यता इस मामले में बुरी तरह असफल हुई है। इसका विकल्प ढूंढना होगा। अफसोस की बात है कि राहुल हो या नीतीश, मायावती हो या मुलायम, किसी के पास इसकी समझ या तैयारी नहीं दिखाई देती।
(ईमेल – sjpsunilATgmailDOTcom)
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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं आर्थिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणीकार है।)

- सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111 मोबाईल 09425040452 

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“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी : अन्नपूर्णा महाराणा

हिन्दुस्तानकी स्त्रियाँ जिस अँधेरेमें डूबी हुई थीं , उसमें से सत्याग्रहके तरीकेने उन्हें अपने-आप बाहर निकाल लिया है ; और यह भी सच है कि दूसरे किसी तरीकेसे वे इतने कम समयमें , जिस पर विश्वास नहीं हो सकता , आगे न आ पातीं । फिर भी स्त्री-जातिकी सेवाके कामको मैंने रचनात्मक कार्यक्रममें जगह दी है , क्योंकि स्त्रियोंको पुरुषोंके साथ बराबरीके दरजेसे और अधिकारसे स्वराज्यकी लड़ाईमें शामिल करनेके लिए जो कुछ करना चाहिए , वह सब करनेकी बात अभी कांग्रेसवालोंके दिलमें बसी नहीं है । कांग्रेसवाले अभी तक यह नहीं समझ पाये हैं कि सेवाके धार्मिक काममें स्त्री ही पुरुषकी सच्ची सहायक और साथिन है । जिस रूढ़ि और कानूनके बनानेमें स्त्रीका कोई हाथ नहीं था और जिसके लिए सिर्फ़ पुरुष ही जिम्मेदार है , उस कानून और रूढ़िके जुल्मोंने स्त्रीको लगातार कुचला है । अहिंसाकी नींव पर रचे गये जीवनकी योजनामें जितना और जैसा अधिकार पुरुषको अपने भविष्यकी रचनाका है उतना और वैसा ही अधिकार स्त्रीको भी अपना भविष्य तय करनेका है । लेकिन अहिंसक समाजकी व्यवस्थामें जो अधिकार मिलते हैं ,  वे किसी न किसी कर्तव्य या धर्म के पालनसे प्राप्त होते हैं । इसलिए यह भी मानना चाहिएकि सामाजिक आचार-व्यवहारके नियम स्त्री और पुरुष दोनों आपसमें मिलकर और राजी-खुशी से तय करें । इन नियमों का पालन करनेके लिए बाहरकी किसी सत्ता या हुकूमतकी जबरदस्ती काम न देगी । स्त्रियोंके साथ अपने व्यवहार और बरतावमें पुरुषोंने इस सत्यको  पूरी तरह पहचाना नहीं है । स्त्रीको अपना मित्र या साथी मानने के बदले पुरुषने अपनेको उसका स्वामी माना है । कांग्रेसवालोंका यह खास हक है कि वे हिन्दुस्तानकी स्त्रियोंको उनकी इस गिरी हुई हालतसे हाथ पकड़कर ऊपर उठावें । पुराने जमानेका गुलाम यह नहीं जानता था कि उसे आजाद होना है , या कि वह आजाद हो सकता है । औरतों की हालत भी आज कुछ ऐसी ही है । जब उस गुलामको आजादी मिली , तो कुछ समय तक उसे ऐसा मालूम हुआ , मानो उसका सहारा ही जाता रहा । औरतोंको यह सिखाया गया है कि वे अपनेको पुरुषोंकी दासी समझें । इसलिए कांग्रेसवालोंका यह फर्ज है कि वे स्त्रियोंको उनकी मौलिक स्थितिका पूरा बोध करावें और उन्हें इस तरहकी तालीम दें,जिससे वे जीवनमें पुरुषके साथ बराबरीके दरजेके हाथ बँटाने लायक बनेण ।

एक बार मनका निश्चय हो जानेके बाद इस क्रान्तिका काम आसान है । इसलिए कांग्रेसवाले इसकी शुरुआत अपने घरसे करें । वे अपनी पत्नियोंको मन बहलानेकी गुड़िया या भोग-विलासका साधन माननेके बदले उनको सेवाके समान कार्यमें अपना सम्मान्य साथी समझें । इसके लिए जिन स्त्रियोंको स्कूल या कॉलेजकी शिक्षा नहीं मिली है , वे अपने पतियोंसे , जितना बन पड़े ,सीखें । जो बात पत्नियोंके लिए कही है, वही जरूरी हेरफेरके साथ माताओं और बेटियोंके लिए भी समझनी चाहिए।

यह कहनेकी जरूरत नहीं कि हिन्दुस्तानकी स्त्रियोंकी लाचारीका यह एकतरफ़ा चित्र ही मैंने यहाँ दिया है । मैं भली-भाँति जानता हूँ कि गाँवोंमें औरतें अपने मर्दोंके साथ बराबरीसे टक्कर लेती हैं ; कुछ मामलों में वे उनसे बढ़ी-चढ़ी हैं और उन पर हुकूमत भी चलाती हैं । लेकिन हमें बाहरसे देखनेवाला कोई भी तटस्थ आदमी यह कहेगा कि हमारे समूचे समाजमें कानून और रूढ़िकी रूसे औरतोंको जो दरजा मिला है ,उसमें कई खामियाँ हैं और उन्हें जड़मूलसे सुधारनेकी जरूरत है ।

- गांधीजी

[ रचनात्मक कार्यक्रम: उसका रहस्य और स्थान ,ले. गांधीजी,अनुवादक- काशिनाथ त्रिवेदी,पहली आवृत्ति १९४६ ]

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पूंजीवाद एक बार फिर संकट में है। पिछले दिनों आई जबरदस्त मंदी ने इसकी चूलें हिला दी है और दुनिया अभी इससे पूरी तरह उबरी नहीं है। पूंजीवाद का संकट सिर्फ बैंकों, कंपनियों व शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। दुनिया में भूखे, कुपोषित, बेघर और बेरोजगार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आज दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं, यानी हर छठा आदमी भरपेट नहीं खा पाता है। इंसान की सबसे बुनियादी जरुरत भोजन को भी पूरा नहीं कर पाना पूंजीवादी सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता है। पर्यावरण का संकट भी गहराता जा रहा है, जिसे कोपनहेगन सम्मेलन की विफलता ने और उजागर कर दिया है।

इन संकटो ने पूंजीवादी सभ्यता के चमत्कारिक दावों पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इसके विकल्पों की तलाश तेज हो गई है। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि पहले इसकी बुनियादी गड़बड़ियों को समझा जाए और उनका सम्यक रुप से विश्लेषण किया जा सके।

कार्ल मार्क्स पूंजीजीवाद के सबसे बड़े और सशक्त व्याख्याकार व टीकाकार रहे हैं। किन्तु डेढ़ सौ सालों बाद उनके विश्लेषण और सिद्धांतों में कई कमियां दिखाई देती है। पूंजीवाद के विकास ,विनाश और क्रांति के बारे में उनकी भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुई हैं। पूरी दुनिया पूंजीपतियों और मजदूरों में नहीं बंटी। कारखानों का संगठित मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ अब नहीं रहा। रुस, पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम आदि में जो कम्युनिस्ट क्रांतियां हुई, वे धराशायी हो गई हैं, और ये देश वापस पूंजीवाद के आगोश में चले गए हैं। इधर लातीनी अमरीका में जो समाजवाद की बयार चली है, वह शास्त्रीय मार्क्सवादी धारा से काफी अलग है।

दुनिया में आंदोलन और संघर्ष तो बहुत हो रहे हैं। किन्तु मजदूर-मालिक संघर्ष अब खबरों में नहीं है। किसानों, आदिवासियों और असंगठित मजदूरों के आंदोलन, जल-जंगल-जमीन के आंदोलन, धार्मिक-सामुदायिक-राष्ट्रीय पहचान आधारित आंदोलन तो हैं , किन्तु वे मार्क्स के विचारों से काफी अलग हैं। तब हम इन्हें कैसे समझे ?

इस मामले में डॉ० राममनोहर लोहिया से हमें मदद मिल सकती है। उन्होंनें 1943 में ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ नामक निबंध लिखा। उन्होंने बताया कि पूंजीवादी शोषण का मुख्य आधार एक कारखाने या एक देश के अंदर मालिक द्वारा मजदूर का शोषण नहीं, बल्कि उपनिवेशों का शोषण है। उपनिवेशों के किसान, कारीगर व मजदूर ही असली सर्वहारा है। लेनिन का यह कथन गलत है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था है। बल्कि, यह पूंजीवाद की पहली और अनिवार्य अवस्था है। यदि पश्चिम यूरोप के देशों ने अमरीका, अफ्रीका, एशिया और आस्ट्रेलिया के विशाल भूभागों पर कब्जा करने और लूटने का काम न किया होता, तो वहां औद्योगिक क्रांति नहीं हो सकती थी।

उपनिवेशों के आजाद होने के बाद भी नव-औपनिवेशिक और नव-साम्राज्यवादी तरीकों से यह लूट व शोषण चालू है और इसीलिए पूंजीवाद फल-फूल रहा है। यह शोषण सिर्फ औपनिवेशिक श्रम का ही नहीं है। इसमें पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन, लूट और विनाश भी अनिवार्य रुप से छिपा है। इसीलिए आज दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़े प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हो रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण के संकट भी पैदा हो रहे हैं।

औपनिवेशिक शोषण की जरुरत पूंजीवादी विकास के लिए इतनी जरुरी है, कि तीसरी दुनिया के जिन देशों ने इस तरह का विकास करने की कोशिश की, बाहरी उपनिवेश न होने पर उन्होंनें आंतरिक उपनिवेश विकसित किए। आंतरिक उपनिवेश सिर्फ क्षेत्रीय व भौगोलिक ही नहीं होते हैं। अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से भी (जैसे गांव या खेती) आंतरिक उपनिवेश बन जाते हैं। भारतीय खेती के अभूतपूर्व संकट और किसानों की आत्महत्याओं के पीछे आंतरिक उपनिवेश की व्यवस्था ही है।

सोवियत संघ का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही था कि उसने उसी तरह का औद्योगीकरण और विकास करने की कोशिश की, जैसा पूंजीवादी यूरोप-अमरीका में हुआ था। किन्तु बाहरी और आंतरिक उपनिवेशों की वैसी सुविधा उसके पास नहीं थी।

इसलिए, पूंजीवाद का एक बुनियादी नियम हम इस तरह बयान कर सकते हैं :

पूंजीवादी विकास के लिए औपनिवेशिक, नव-औपनिवेशिक या आंतरिक – औपनिवेशिक

शोषण जरुरी है। यह शोषण दोनों का होता है – श्रम का भी और प्राकृतिक संसाधनों का भी।

दुनिया के स्तर पर इस नियम का अभी तक कोई महत्वपूर्ण अपवाद नहीं है।

लोहिया के पहले गांधी ने आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता के इस शोषणकारी-विनाशकारी चरित्र के बारे में चेतावनी दी थी। मार्क्स के अनुयायियों में रोजा लक्ज़मबर्ग ने इस विषय में मार्क्स की खामियों को उजागर किया था और उसे सुधारने की कोशिश की। लोहिया के बाद लातीनी अमरीका के आन्द्रे गुन्दर फ्रेंक और मिस्त्र के समीर अमीन नामक मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने लोहिया से मिलती-जुलती बातें कही है।

यदि ऊपर कही गई बातें सही हैं, तो इनसे कई निष्कर्ष निकलते हैं :

’ तीसरी दुनिया के गरीब देशों में यूरोप-अमरीका जैसा औद्योगीकरण एवं विकास संभव नहीं है, चाहे वह पूंजीवादी तरीके से किया जाए या साम्यवादी (राज्य पूंजीवादी) तरीके से किया जाए।

’ चूंकि अमरीका-यूरोप की समृद्धि व जीवन-शैली पूरी दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिकी है, वह दुनिया के सारे लोगों के लिए हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए समाजवादियों को उसका सपना छोड़ देना होगा। सबकी न्यूनतम बुनियादी जरुरतें तो पूरी हो सकती हैं, किन्तु विलासितापूर्ण जीवन सबका नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में ‘स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व’ के साथ ‘सादगी’ और ‘स्वावलंबन’ भी समाजवादी समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण एवं जरुरी सूत्र होंगे।

’ इस अर्थ में दुनिया का आर्थिक-राजनैतिक संकट और पर्यावरणीय संकट आपस में जुड़े हैं। एक वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था में ही दोनों संकटों से मुक्ति मिल सकेगी। दूसरे शब्दों में, समाजवाद निर्माण के किसी भी प्रयास में दोनों तरह के आंदोलनों – आर्थिक-सामाजिक बराबरी के आंदोलन एवं पर्यावरण के आंदोलन – को मिलकर ताकत लगाना होगा।

’ विकल्प सिर्फ पूंजीवाद (उत्पादन संबंधों के संकुचित अर्थ में) का नहीं हो सकता। निजी संपत्ति को खतम करना काफी नहीं है। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के साथ पूंजीवादी तकनालॉजी, जीवन-शैली और जीवन-मूल्यों का भी विकल्प खोजना होगा। दूसरे शब्दों में हमें ‘पूंजीवादी सभ्यता’ का विकल्प खोजना होगा। एक नयी सभ्यता का निर्माण करना होगा।

इक्कीसवीं सदी में समाजवाद की किसी भी संकल्पना, तलाश और कोशिश में ये महत्वपूर्ण सूत्र होंगे। इनके लिए हम लोहिया के आभारी हैं।

————–’’’…………………………

(साहित्य अकादमी द्वारा डॉ० राममनोहर लोहिया पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी (18-20फरवरी 2010) में पेश आलेख – हिन्दी सारांश)

- सुनील

ग्रा/पो केसला,

जि. होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

461111

ईमेल – sjpsunil@gmail.com

कार्य :- समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार। आदिवासियों, किसानों,

मछुआरों एवं विस्थापितों के संघर्ष एवं संगठन में पिछले 25 वर्ष से सक्रिय। अखबारों, पत्रिकाओं में लेखन। कई पुस्तिकाएं भी प्रकाशित।

पद :- राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, समाजवादी जन परिषद।

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कन्नूर में : साभार ’मातृभूमि’

गाँधी : क्या आप मुझे यह साबित कर सकते हैं कि आपको उन्हें सड़क का इस्तेमाल करने से रोकने का हक है ? मुझे यह बात पक्की तौर पर लगती है कि इन दलित वर्गों के लोगों को सड़क के इस्तेमाल का आप जितना ही हक है ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि : महात्माजी , आप इन तबकों के लिए ’ दलित’ शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं ? क्या आप जानते हैं कि वे क्यों दलित हैं ?
गाँधी : हाँ , बिल्कुल । जिस वजह से जलियाँवाला बाग में डायर ने बेकसूरों का नरसंहार किया था उसी वजह से वे दलित हैं ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि :इसका मतलब इस रिवाज को शुरु करने वाले डायर थे ? क्या आप शंकराचार्य को एक डायर कहेंगे ?
गाँधी : मैं किसी आचार्य को डायर नहीं कह रहा । परन्तु आपके इस क्रियाकलाप को मैं डायरपने की संज्ञा अवश्य देता हूँ तथा सचमुच यदि कोई आचार्य इस रिवाज की शुरुआत के लिए जिम्मेदार हो तब उसकी इस सदोष अज्ञानता को जनरल डायर की राक्षसी अज्ञानता जैसा मानना होगा ।
गाँधीजी ने जाति-विभेद की तुलना किसी ब्रिटिश अफ़सर द्वारा किए गए क्रूरतम हत्या-काण्ड से की यह दलित-शोषण के प्रति उनकी संवेदना को दरशाता है । यह केरल के वाइकोम स्थित महादेव मन्दिर से सट कर गुजरने वाली सड़क से अवर्णों के गुजरने पर लगी रोक को हटाने की बाबत चले सत्याग्रह के दौरान मन्दिर संचालकों के साथ हुई बातचीत का हिस्सा है । यह गौरतलब है कि मन्दिर-प्रवेश का मसला इसके बाद उठा और सलटा । १९२४ से १९३६ तक चले इस सत्याग्रह अभियान के बाद त्रावणकोर राज्य के ४-५ हजार मन्दिर अवर्णों के लिए खुले ।  १२ साल चले इस आन्दोलन तथा इस दौरान कई बार हुई गांधीजी की केरल यात्राओं का विस्तृत विवरण महादेव देसाई की किताब द एपिक ऑफ़ ट्रैवन्कोर में है। श्रीमती सरोजिनी नायडू ने इसे महागाथा अथवा एपिक की उपमा दी ।
विदेशी आधिपत्य और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष साथ-साथ चला । सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति का निर्माण रचनात्मक कार्यों से होता है। प्रत्येक सत्याग्रही दिन में हजार गज सूत कातते थे ।
आन्दोलन का एक अहम उसूल था- ’जिसकी लड़ाई , उसका नेतृत्व’ । गांधीजी द्वारा ’यंग इंडिया’ का सम्पादन शुरु करने के पहले उसका सम्पादन ज्यॉर्ज जोसेफ़ करते थे । ज्यॉर्ज जोसेफ़ साहब मोतीलाल नेहरू के इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार इंडीपेन्डेन्ट के भी सम्पादक थे । इनके बाद महादेव देसाई इंडीपेन्डेन्ट के सम्पादक बने तथा अंग्रेजों द्वारा छापे खाने पर रोक लगाने के बाद उन्होंने हस्तलिखित प्रतियाँ निकालनी शुरु की । दोनों को साल भर की सजा हुई । आगरा जेल में यह दोनों छ: महीने साथ थे।
बहरहाल, ज्यॉर्ज जोसेफ़ वाईकोम सत्याग्रह के शुरुआती नेताओं में एक थे । मन्दिर के निकट से गुजरने वाले मुद्दे पर श्री टी.के. माधवन एवं श्री के.पी. केशव मेनन के जेल जाने के बाद उन्होंने गांधीजी से उपवास करने की इजाजत मांगी । इसी प्रकार सिखों ने सत्याग्रह स्थल पर लंगर चलाने की इच्छा प्रकट की । गांधी यह मानते थे कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म की व्याधि है इसलिए इसके समाधान का नेतृत्व वे ही करेंगे- लिहाजा दोनों इजाजत नहीं मिलीं । ठीक इसी प्रकार प्लाचीमाड़ा में चले दानवाकार बहुदेशीय कम्पनी कोका-कोला विरोधी संघर्ष को दुनिया-भर से समर्थन मिला- फ़्रान्स के गांधी-प्रभावित वैश्वीकरण विरोधी किसान नेता जोशे बोव्हे , कैनेडा के ’ब्लू गोल्ड’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक द्वय मॉड बार्लो तथा टोनी क्लार्क , नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मेधा पाटकर एवं समाजवादी नेता वीरेन्द्रकुमार ने इस आन्दोलन को समर्थन दिया लेकि उसकी रहनुमा उस गाँव की आदिवासी महिला मायलम्मा ही रहीं । इसी कम्पनी ने जब बनारस के मेंहदीगंज आन्दोलन के दौरान कथित राष्ट्रीय समाचार-समूह को करोड़ों रुपये के विज्ञापन दिए तब मातृभूमि के वीरेन्द्रकुमार जैसे सम्पादक ने प्रथम-पेज सम्पादकीय लिख कर कोक-पेप्सी के विज्ञापन न लेने की घोषणा की तथा उसका पालन किया ।
प्लाचीमाड़ा के आन्दोलन को इस बात का गर्व भी होना चाहिए कि जब साहित्य के क्षेत्र में उपभोक्तावाद का प्रवेश बदनाम बहुराष्ट्रीय कम्पनी के पैसे से साहित्य अकादमी के पुरस्कार प्रायोजित कर हो रहा हो तब देश के वरिष्टतम साहित्यकारों में से एम.टी वासुदेवन नायर , एम.एन विजयन और सारा जोसेफ़ जैसे मलयाली साहित्यकारों ने कोका-कोला विरोधी समर समिति को खुला समर्थन दिया ।
यह तथ्य अत्यन्त रोचक व उल्लेखनीय है कि १२ साल चले केरल के सामाजिक सत्याग्रह के ठीक बीचोबीच बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा गांधीजी की यरवडा जेल में ऐतिहासिक बात-चीत हुई । इतिहासकार बाबासाहब को दलितों में स्वाभिमान का जनक तथा गांधीजी को सवर्णों में आत्म-शुद्धि का प्रेरक मानते हैं । इनकी ऐतिहासिक बातचीत की शुरुआत में बाबासाहब दलित वर्गों के शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान पर जोर दे रहे थे तथा गांधी इस समस्या के मूल में धार्मिक वजह मान रहे थे । बातचीत के बाद गांधी ने शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान के लिए ’हरिजन सेवक संघ’ बनाया तथा बाबासाहब ’धर्म-चिकित्सा’ एवं धर्मान्तरण तक गये । केरल के सत्याग्रह में हम आत्म-शुद्धि और आत्मसम्मान दोनों का संयोग देख सकते हैं ।
कन्नूर भी मेरे शहर बनारस की तरह हथकरघे के लिए मशहूर है । खेती के बाद हथकरघा ही सबसे बड़ा रोजगार मुहैया कराता था । अगूँठा-काट वस्त्र नीति ने यह परिदृश्य पूरी तरह बदल दिया है । इस नीति का तिहरा प्रभाव पड़ा है : गरीब तबके पोलियस्टर पहनने के लिए मजबूर हो गये हैम चूँकि यह सरकारी नीति और सब्सिडी के कारण अब सते हो गये हैं  , सरकार की इस नीति के कारण एक अज्ञात परिवार देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बन गया है तथा हथकरघा बुनकर अस्तित्व रक्षा के लिए सम्घर्ष कर रहे हैं ।
’मातृभूमि’ पत्र की साल भर चलने वाली यह मुहिम बुनकरों की रक्षा के लिए उपायों पर भी विचार करेगी , यह मैं आशा करता हूँ ।
स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों को मेरे हाथों सम्मानित कराने से एक नैतिक बोझ मेरे सिर पर आ पड़ा है। आजादी की लड़ाई के मूल्य : रचना-संघर्ष साथ-साथ ,जिसकी लड़ाई उसका नेतृत्व जैसे मूल्यों के साथ लड़ाई जारी रखने के लिए उनका आशीर्वाद मेरे जैसों को मिले यह प्रार्थना है ।
- अफ़लातून , सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी , समाजवादी जनपरिषद .
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पिछले भाग से आगे :

वैसे तो यह औद्योगिक व्यवस्था पूंजीवाद द्वारा पैदा की गयी है जिसमें निजी स्वामित्व की प्रधानता है , लेकिन धीरे धीरे उद्योगों का यह ढांचा , जो वृहद कॉर्पोरेशनों के रूप में विकसित हुआ है , पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियन्त्रण से मुक्त हो एक स्वतंत्र स्वरूप धारण करने लगा है और इसका मूल रुझान पूर्ववत श्रम और संसाधनों के शोषण से प्रतिष्ठानों के लिए ज्यादा मुनाफा कमाना होता है । विख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री गालब्रेथ ने विकसित हो रहे स्वायत्त पूंजी के व्यवस्थापकों के इस समूह को ’टेक्नोस्ट्रक्चर’ का नाम दिया था । निजी या सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में इनकी व्यवस्था को चलाने के लिए व्यवस्थापकों और नौकरशाहों का ऐसा ही संवेदनहीन ढांचा तैयार हुआ है जिसका एक मात्र लक्ष्य अपना विस्तार करना और कॉर्पोरेशन के मुनाफे को बढ़ाना भर है । सार्वजनिक क्षेत्र के कॉर्पोरेशन एक अर्थ में जरूर भिन्न होते हैं।  इनके मुनाफे पर एक हद तक – जहाँ लोकतंत्र है, जन प्रतिनिधियों का नियन्त्रण होता है । लेकिन इनकी मूल प्रवृत्तियाँ निजी पूंजीवादी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होतीं । और इसी कारण यह भी पूंजीवादी व्यवस्था के फैलाव और संकोच के व्यापार चक्र से बिल्कुल मुक्त नहीं होते । चूँकि बुनियादी तौर से यह निजी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होते सरकारें जब चाहें तो विनिवेश द्वारा इनकी पूँजी को निजी क्षेत्र में स्थानान्तरित कर सकती है – जैसा हाल में मनमोहन सिंह सरकार ने एन.टी.पी.सी में किया है ।

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

समग्र रूप से यह पूंजीवादी कॉर्पोरेटी दुनिया आम आदमियों , विशेष कर आदिवासियों और किसानों के जीवन पर कहर बरसाती है | जिस औपनिवेशिक शोषण के बल पूंजीवाद का विकास हुआ है वह शोषण और भी भयावह होता जा रहा है क्योंकि इस व्यवस्था की संसाधनों की भूख असीम है । इसका सरल सूत्र है – अधिक मुनाफे के लिए अधिक उत्पादन चाहिए और अधिक उत्पादन के लिए अधिक संसाधान यानी अधिक जंगल की कटाई , अधिक खनिजों का खनन , अधिक अन्न और दूसरे कृषिजन्य कच्चे माल । इनके संयन्त्रों के लिए भूमि और सबसे ऊपर व्यापार के लिए परिवहन का तानाबाना चाहिए , ताकि सभी दूरदराज स्थानों को यह ऑक्टोपस (अष्टपाद) की तरह अपनी गिरफ़्त में ले सकें । पिछले दिनों ’स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन ’के नाम पर और सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर एक्सप्रेस वे एवं हाईवे के लिए देश भर में भूमि अधिग्रहण का सिलसिला चलाया जा रहा है । इन्हीं के खिलाफ़ प्रतिरोध से सिंगूर और नन्दीग्राम की त्रासदीपूर्ण घटनाएं हुई हैं । इसके पहले उड़ीसा , छत्तीसगढ़  और स्वयं झारखण्ड में देशी , विदेशी बड़ी कंपनियों द्वारा आदिवासियों और किसानों की जमीन पर सरकारी बल के सहारे अधिग्रहण के ऐसे प्रयास लगातार होते रहे हैं और जगह जगह इनके खिलाफ़ आन्दोलन होते रहे हैं जिन्हें दबाने की कोशिश भी होती रही है । जहाँ तहाँ माओवादी गतिविधियों में उभार में भी यह जन प्रतिरोध प्रतिबिंबित होता है । जब भारत के प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह “नक्सली हिंसा” को देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बताते हैं तो उनकी चिंता व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए संसाधनों की उपलब्धि की ही है । विश्व बैंक की आर्थिक नीति को देश में लागू करने में अग्रिम भूमिका निभाने वाले हमारे प्रधान मन्त्री का यह रुख स्वाभाविक है ।

लेकिन हमारे माओवादी मित्र भी लगभग वैसे ही दृष्टिकोण के शिकार हैं । अगर उन्होंने माओ के देश चीन पर ध्यान दिया होता तो वे माओवाद की जगह समाज परिवर्तन की किसी वैकल्पिक नीति की तलाश करते । माओ के चीन में आज क्या हो रहा है ?  माओ के नेतृत्व में चालीस वर्ष से अधिक तक चलने वाले आन्दोलन – जिसमें अनगिनत लोगों ने अपनी आहुति – का अन्तिम परिणाम क्या हुआ? आज चीन पूंजीवादी विकास और कॉर्पोरेटी व्यवस्था का सबसे सशक्त और निर्मम नमूना है । वहाँ की सालाना विकास दर भारत से भी कहीं ज्यादा है , जो कभी १२ प्रतिशत पार कर गयी थी । लेकिन इसका फायदा वहाँ के नवोदित पूंजीपति वर्ग और व्यवस्थापक वर्ग को मिल रहा है , जिनकी सुविधायें पश्चिमी दुनिया के संपन्नों की बराबरी कर रही हैं । लेकिन आम किसानों और मजदूरों की स्थिति दर्दनाक बनी हुई है । सरकार को उनकी सुरक्षा की चिंता इतनी कम है कि हजारों लोग कोयला खदानों की दुर्घतनाओं में मरते रहते हैं । माओवादी मित्रों को इस पर विचार करना चाहिए कि वे माओ की तर्ज पर खूनी क्रांति में स्वयं अपनी और हजारों दूसरे प्रतिबद्ध लोगों की शहादत से फिर चीन जैसा ही पूंजीवादी ढांचा तैयार करना चाहते हैं क्या ? वैसे ढाचे में तो आदिवासी और किसान वैसे ही विस्थापित होंगे और कुचले जायेंगे जैसे भारत और दुनिया के दूसरे देशों में पूंजीवादी विकास के क्रम में हो रहा है । देंग या कुछ दूसरे व्यक्तियों पर इस “भटकाव” की जवाबदेही डाल हम गंभीर सामाजिक विश्लेषण से बच नहीं सकते ।

सजप सम्मेलन धनबाद

सजप सम्मेलन धनबाद

समाजवादी जन परिषद बुनियादी तौर से ऐसे विकास को ( भले ही वह समाजवाद के नाम पर हो रहा हो ) नकारती रही है और आगे भी नकारती रहेगी । हमें एक ऐसे वैकल्पिक ढांचे की तलाश जारी रखनी होगी जिसमें मेहनतकशों की स्वायत्तता और व्यवस्था की मानवीयता बनी रहे । हमें स्पष्ट रूप से यह घोषित करना है कि किसानों और आदिवासियों के जीवन पर आघात करने वाली किसी विकास की व्यवस्था को हम स्वीकार नहीं करेंगे । हमें ऐसी छोटी राजकीय और आर्थिक इकाइयाँ विकसित करने की दिशा में पहल करना होगा जिसमें आदमी पूरे अर्थ में स्वतंत्र हो और अपनी व्यवस्था बनाने के लिए उसे पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त हो । खनिजों की खुदाई के लिए किसानों और आदिवासियों के विस्थापन का हम शुरु से विरोध करते रहे हैं। बाल्को के गंधमार्दन में बॉक्साईट खनन का अहिंसक विरोध समता संगठन ( जिसके प्रयासों से बाद में समाजवादी जनपरिषद का निर्माण हुआ ) ने कुछ दूसरे सहयोगी संगठनों के साथ किया था और उसमें एक हद की सफलता भी मिली थी। हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि आगे भी हम सदा ऐसा अहिंसक प्रतिरोध जारी रखेंगे ।

ऐसे अहिंसक संघर्षों की श्रृंखला से ही भविष्य में वह वातावरण तैयार होगा जिसमें एक वैकल्पिक समाज व्यवस्था – जो केन्द्रीकृत राज्य व्यवस्था और विशाल पूंजीवादी और नौकरशाही शोषण से समाज को मुक्त कर सके – अस्तित्व में आये । समाजवादी जनपरिषद को अपने इस प्रयास में देश के तमाम शोषित लोगों , आदिवासियों , किसानों ,  मजदूरों एवं बुद्धिजीवियों को शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए । हमें लोगों को सचेत करना चाहिए कि प्राकृतिक संपदा के अन्धाधुंध दोहन की मुहिम को वर्तमान औद्योगिक विकास और उपभोक्तावादी संस्कृति से अलग कर नहीं देखें ।  जो लोग आज की विकास प्रक्रिया को तो कबूल करते हैं पर जल , जंगल , और जमीन के कॉर्पोरेटी अधिग्रहण का विरोध करते हैं , वे स्वयं अपने को और तमाम जनता को भ्रम में डालते हैं । दोनों का अनिवार्य संबंध है इस सत्य को हमें उजागर करते रहना है ।

हमारा पिछला राष्ट्रीय सम्मेलन सत्याग्रह आन्दोलन के शताब्दी वर्ष में हुआ था । आज का सम्मेलन “हिन्द स्वराज” के शताब्दी वर्ष में हो रहा है । आज की व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष के क्रम में विकेन्द्रित ग्राम गणतंत्र की दिशा में समाज को ले जाने के प्रयास में “हिन्द स्वराज” की मूल कल्पना से प्रेरणा मिलेगी यह आशा है ।

- सच्चिदानन्द सिन्हा , धनबाद ,२८ अक्टूबर , २००९ .

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गांधीजी की नजर में जेपी

    जयप्रकाश जमजात योद्धा है , उसने अपने देश की मुक्ति के लिए सबकुछ का त्याग किया है । परिश्रम और प्रयत्न करने से वह कभी चूकता नहीं । कष्त और यातना सहने की उसकी क्षमता का कोई जवाब नहीं ।
    - महात्मा गांधी

    यह सम्पूर्ण क्रान्ति है

    यह संघर्ष केवल सीमित उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा । इसके उद्देश्य तो बहुत दूरगामी है: भारतीय लोकतंत्र को ’ रीयल ’ याने वास्तविक तथा सुदृढ़ बनाना है ,जनता का सच्चा राज कायम करना है , समाज से अन्याय , शोषण आदि का अन्त करना , एक नैतिक , सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक क्रान्ति करना , नया बिहार बनाना और अन्ततोगत्वा नया भारत बनाना है । यह सम्प्पूर्ण क्रान्ति है – total revolution है । और इसके आप अगुआ हैं । यह बड़ा कठिन है , परन्तु आपकी सफलता निश्चित है , क्योंकि यह युगधर्म की पुकार है ।
    - ( ५ जून ’७४ को पटना के गांधी मैदान में आयोजित विराट जन-सभा में दिए गए ऐतिहासिक भाषण की टेप – ट्रान्स्क्रिप्ट से )

    ( दोनों चित्र राजनारायण लाल )

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फाउन्टेन पेन बनाने वाली जर्मन कम्पनी मों ब्लां द्वारा ’डांडी यात्रा से प्रेरित हो कर’ कुल २४१ की संख्या में गांधी-छाप फाउन्टेन पेन बनाने की खबर आप सब जानते हैं । इस कलम की कीमत भारत में ११.३९ लाख है ,यह भी जानते हैं। गांधी के प्रति समझदारी और आदर से प्रेरित हो कर भारत वर्ष के कई नागरिकों ने इस व्यावसायिक कदम पर अपनी राय और गुस्सा प्रकट किया ।
इस मौके पर ताज महल होटल में हुई प्रेस कॉन्फ़रेंस में पहली बार भारत पधारे कलम कम्पनी के सी ई ओ लुट्ज़ बेथगे और १९९४ से भारत में मों ब्लां कलम बेचने का अधिकार प्राप्त कम्पनी एन्ट्रैक के अध्यक्ष दिलीप दोशी के अलावा एक विशिष्ट व्यक्ति मौजूद था । यह था, अरुण मणिलाल गांधी का पुत्र तुषार गांधी ! गांधीजी का वह प्रपौत्र जो पहले सपा में फिर कांग्रेस में रहा !
उस कमरे के एक छोर पर लकड़ी की एक संग्रहालयों में पाया जाने वाली किस्म की मेज थी। इस पर ’महात्मा गांधी लिमिटेड एडिशन २४१’ कलम तथा गांधी जैसा एक चश्मा दैदिप्यमान थे और गांधी-छाप लेबल लगी लाल स्याही की एक दवात भी रखी हुई थी । Gandhi-pen-1-162x300
कमरे के दूसरे छोर पर चाय – कॉफ़ी नाश्ता था । सुनने वाले सिर्फ़ पत्रकार ही नहीं थे- कुछ फैशनजादे और अफ़सर भी थे । बेथगे ने बताया कि चूँकि डाँडी यात्रा में गाँधी २४१ मील चले थे इसलिए कुल इस कलम के २४१ ही सेट बनाये गये हैं ।
जर्मन सी ई ओ ने हर्मन के उपन्यास ’सिद्धार्थ’ का उदाहरण दिया – यह जताने के लिए कि जर्मन लोग भारत को कितना प्यार करते हैं । दोशी ने यह बताया कि मों ब्लां को सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की कितनी परवाह है और यह कलम हासिल करना संग्रहकर्ताओं के लिए कितनी जरूरी होगी !
तुषार ने कहा कि बैरक ओबामा को यह कलम हासिल करनी चाहिए और उसीसे शान्ति करारों पर दस्तख़त करने चाहिए । तुषार को कम्पनी की तरफ़ से कलम का पहला सेट तथा उसकी निजी दुकान ’ महात्मा गांधी फाउन्डेशन’ के लिए ७२ लाख रुपये दिए गए । उसने बताया कि कुछ साल पहले उसने डांडी यात्रा के मार्ग पर यात्रा की थी ।
मित्रों , इस समूचे प्रकरण के सन्दर्भ में कदाचित गांधी क्या करते ? सौ खण्डों में छपे सम्पूर्ण गांधी वांग्मय के मूल रचयिता का कलम – दवात से क्या मजबूत नाता रहा होगा ? खुद से व्यावसायिकता को जोड़ने की बाबत कितना सौम्य प्रतिवाद जताते,बापू ? एक खूबसूरत चित्र और स्केच सहित गोपालकृष्ण गांधी ने अपने करुणा-प्रेरित अन्वेषण को दो अक्टूबर के ’द हिन्दू’ में अभिव्यक्ति दी है । वह लेख करोड़ों लोगों के आघात की न्यायपूर्ण अभिव्यक्ति है ।
( विवरण संयुक्ता शर्मा के ब्लॉग के आधार पर है ।

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ब्लॉगिंग का एक मूल स्वरूप रोजनामचा लिखने का रहा है । वेब + लॉग में ’लॉग’ के लिए हिन्दी शब्द फादर कामिल बुल्के के अनुसार – रोजनामचा , यात्रा – दैनिकी , कार्य- पंजी भी है । इस हिन्दी सेवी ऋषि की जन्म-शताब्दी वर्ष पर उनके कोश का उपयोग करते हुए ,पुण्य स्मरण के साथ यह पोस्ट ।
तो, पिछले सत्तर से ज्यादा वर्षों से रोजनामचा या दैनिन्दनी लिखने वाले ब्लॉगिंग विरोधी एक सज्जन यह मानते रहे हैं कि इन्टरनेट पर लेखन और प्रकाशन फौरी-तुष्टीकरण ( instant gratification) मात्र का जरिया है । – ’फौरी तुष्टीकरण’ को ’तात्कालिक सन्तुष्टि’ कह देने पर मैं उनके आरोप को कबूलने के लिए तैयार था । उनका आगे कहना था कि ’कागज पर छपे का भविष्य के लिए महत्व है ’ (इन्टरनेट पर छपा हुआ मानो लम्बी अवधि तक नहीं देखा जाएगा) ।
सामाजिक जीवन-यात्रा में गुजराती , हिन्दी और अंग्रेजी में चार दर्जन से अधिक छोटी – बड़ी पुस्तकें लिख चुके इन महाशय को खादी पर लिखी मेरी पोस्ट का प्रिन्ट आउट मेरी भान्जी चारुस्मिता (दुआ) ने दिया । उन्होंने उसी दिन एक पोस्ट कार्ड उसकी बाबत मुझे लिख भेजा ।
यह कहने में मुझे लेशमात्र दुविधा नहीं है कि दिसम्बर , २००३ से अब तक हुई मेरी चिट्ठेकारी (शुरुआत अंग्रेजी से हुई थी । तब ब्लॉगर को गूगल ने नहीं खरीदा था।) पर की गई यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण टिप्पणियों में एक है ।
टिप्पणी प्रस्तुत करने के पहले टिप्पणीकार की बाबत कुछ जरूरी बातें । वे सेवाग्राम में गांधीजी द्वारा स्थापित ’खादी विद्यालय’ के शुरुआती विद्यार्थियों में थे । (चिट्ठेकार संजीत त्रिपाठी के पिता भी उस वक्त उनके सहपाठी थे ।)
४ – ५ साल की उम्र से चरखा चलाना सीखा तथा ११-१२ वर्ष की उम्र में इन्होंने टाइपिंग सीखी । महात्मा गांधी द्वारा हिटलर को भेजा गया एक ऐतिहासिक पत्र उन्होंने टाइप किया था, यह उन्हें स्मरण है । चरखा चलाने के पराक्रम में दो कातने वालों द्वारा दिन-रात लगातार चरखा चलाना उल्लेखनीय है। अपनी पुस्तक ’बापू की गोद में’ (ब्लॉग-किताब के रूप में उपलब्ध) में टिप्पणीकार अपने शैशव में चरखे और कातने के महत्व पर गौर कराने वाली यह बातें लिखते हैं :

…लेकिन इस तरह के धार्मिक और सामाजिक त्योहारों को भी पीछे छोड़ने वाली याद चरखा – जयन्ती ( रेटियो बारस ) की है । बापू के आश्रम में बापू का ही जन्मदिन? यह कैसा शिष्टाचार ? लेकिन इस जन्मदिन को बापू ने अपना जन्मदिन माना ही नहीं था ।यह तो चरखे का जन्मदिन था । इसलिए स्वयं बापू भी हमारे साथ उसी उत्साह से उसमें शरीक हो जाते थे । लोगों से बचने के लिए उस रोज उनको कहीं भाग जाना नहीं पड़ता था और न उस दिन के नाटक का उनको प्रमुख पात्र बनना पड़ता । उस दिन बापूजी एक सामान्य आश्रमवासी की तरह ही रहते थे । कभी हमारी दौड़ की स्पर्धा में समय नोट करने का काम करते , तो कभी – कभी हमसे बड़े लड़कों के कबड्डी के खेल में हिस्सा लेते । कभी – कभी हम लोगों के साथ साबरमती नदी में ( बाढ़ न हो तब ) तैरते भी थे । शाम को हमें भोजन परोसते और रात को अन्य आश्रमवासियों की तरह नाटक देखने के लिए प्रेक्षक के रूप में बैठ जाते । उस दिन का प्रमुख पात्र होता था चरखा । चरखा – द्वादशी का दिन गांधी – जयन्ती का भी दिन है , यह तो दो – चार चरखा – द्वादशियों को मनाने के बाद मालूम हुआ .

आजकल चरखा – द्वादशी के दिन बापू की झोपड़ी या बापू के मन्दिर खड़े किये जाते हैं । उनके फोटो की तरह – तरह से पूजाएँ की जाती हैं और सूत की की अपेक्षा टूटन का ही अधिक प्रदर्शन दिखाई देता है । लेकिन उन दिनों का जो दृश्य मेरी आँखों के सामने आता है , उसमें बापू का फोटो कहीं भी नहीं देखता हूँ । अखण्ड सूत्रयज्ञ उस समय भी चलते थे । विविध प्रकार के विक्रम ( रेकार्ड ) तोड़ने में हम बच्चों को अपूर्व आनन्द और उत्साह रहता था। कोई सतत आठ घण्टे कात रहा है तो दो साथी एक के बाद एक करके २४ घण्टे अखण्ड चरखा चालू रखते हैं । दिनभर काते हुए सूत के तारों की संख्या नोट कराने में एक – दूसरे की स्पर्धा चलती ।

(सन्दर्भ)

नारायण देसाई उर्फ़ बाबूभाई

नारायण देसाई उर्फ़ बाबूभाई

अपने पिता महादेव देसाई की जीवनी ’अग्नि कुंडमा खिलेलू गुलाब’ के लिए उन्हें केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तथा महात्मा गांधी की वृहत जीवनी ’मारू जीवन ए ज मारी वाणी’ के लिए ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार । लाजमी तौर पर ’गांधी और खादी’ जीने के प्रयास के अलावा उनके ग्रन्थों के लिए किए गए शोध के भी विषय रहे हैं ।
पोस्ट कार्ड नादे

पोस्ट कार्ड नादे

(चित्र : संजय पटेल,इंदौर के सौजन्य से। सभी चित्रों को बड़े आकार में देखने के लिए उन पर खटका मारें)
हांलाकि इनकी लिखावट पाठकों के लिए ’हिंसक’ नहीं है फिर भी पत्र का मजमून टाइप कर दे रहा हूँ :
१५.१०.२००९(त्रृटि) (१८.९. की मुहर)
संपूर्ण क्रांति विद्यालय
प्यारे आफ़लू ,
आज खादी संबंधी तुम्हारे लेख (?) का प्रिन्ट आउट दुआने दिया। सुना कि तुमने सूत की गुण्डी के नाप संबंधी हिसाबमें तो तुमने दुरुस्ती कर ली है : (एक) गुण्डी = १००० मीटर ।
need – greed वाला उद्धरण गांधी का नहीं है । हालाँकि प्यारेलालजी ने लास्टफेजमें पार्ट II पृ. ५५२ पर इसका उपयोग गांधीजी के नाम से किया है । जान पड़ता है यह चमात्कारिक उद्धरण गांधीजी ने भी किया होगा । Oxford Dictionary of Quotations (ने) इसके लेखक का नाम Frank Buchman बताया जो उनकी Legacy of Frank Buchman में Legacy Chapter 15 में छपा है ।
यह जानकारी तुम कहाँ से लाये कि “जब आचार्यजी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव थे तब जवाहरलाल नेहरू चवन्निया सदस्य भी नहीं थे?” आचार्य कई वर्षों तक कांग्रेस महासचिव जरूर थे । उसमें से कुछ वर्ष जवाहरलालजी अध्यक्ष थे ।
खादी का बुनियादी नियम यह था कि खादी के दाम पर व्यवस्था खर्च अमुक प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए । इसलिए खादी कमीशन की वर्तमान नीति पर तुम्हारी आलोचना सटीक है ।
प्यार,
बाबूभाई.

सूत की गुण्डी सम्बन्धी सूचना में किसी अन्य पाठक द्वारा मेरी भूल को सुधार दिया जाएगा , मैं इस खुशफ़हमी में था । अतएव, साल भर के लिए जरूरी कपड़े के लिए एक व्यक्ति द्वारा १००० किलोमीटर सूत कातने की आवश्यकता होती है ।
आचार्यजी का कथन मैंने गांधी विद्या संस्थान,वाराणसी के अतिथि भवन में जेपी आन्दोलन के दौर में उनके मुख से सुना था तथा स्मृति के आधार पर उद्धृत किया था । अब लगता है कि मुमकिन है यह बात उन्होंने श्रीमती इन्दिरा गांधी के बारे में कही हो। इस बाबत और जानकारी जुटाने की जरूरत है ।
टिप्पणी के अंतिम वाक्य द्वारा इन्टरनेट सम्बन्धी टिप्पणीकर्ता की धारणा (’हृदय’ नहीं कह रहा) में कोई तब्दीली आई होगी , क्या यह माना जा सकता है ?
—x—x—x—
जनसत्ता के समांतर स्तंभ में मेरे ब्लॉग से ली गई इसी प्रविष्टी को पढ़कर सुश्री नीला हार्डीकर ने मुझे एक पत्र लिखा है। मेरे साथियों से फोन नम्बर मालूम कर उन्होंने यह बताया कि वे नेट पर हिन्दी टाइपिंग नहीं जानती इसलिए हाथ से लिखा ख़त भेज रही हैं । नीला हार्डीकर अवकाशप्राप्त शिक्षिका हैं तथा मध्य प्रदेश के जन आन्दोलनों से कई दशकों से जुड़ी रही हैं । उन्होंने ’सिंथेटिक वस्त्र’ पर अपनी स्वतंत्र टिप्पणी भी भेजी है जिसे अलग से प्रकाशित किया जाएगा । फिलहाल , ’खादी की राखी’ पर उनकी मूल्यवान टिप्पणी का चित्र तथा टाइप किया हुआ पाठ :

नीला हार्डीकर का पत्र

नीला हार्डीकर का पत्र


मुरेना (म.प्र.)
२८ सितम्बर,२००९
प्रिय अफलातून ,
२४.९.०९ के जनसत्ता में ’खादी की राखी’ पढ़ा । मुद्दे महत्वपूर्ण उठाए हैं आपने , जैसे वस्त्र का बाजार धीरूभाई को उपलब्ध कराना । मैं इतने साल से सोच रही हूँ – राजीव गांधी को क्या रिश्वत मिली होगी इसके लिए । अब अगली स्टेप है ए डी बी की मदद से खादी बेचना ।
मुझे लगता (है) सरकार के उस छोटे फैसले के जो बड़े नतीजे निकले उनका अच्छी तरह अध्ययन होना चाहिए । एक ग्रूप हो जो यह काम करे । कई आयामों पर एक साथ तथ्य संकलन , विश्लेषण करना होगा । उदाहरण के लिए
१. सिन्थेटिक कपड़ों के लाभ नुकसान.
२. गांव , कस्बों के बाजार से और गरीब घरों से सूती वस्त्र गायब होना.
३. बुनकरों की दुर्गति .
४. रंगों की फैक्टरियां खत्म , रंगरेजों का भट्टा बैठना .
५. डिटर्जण्ट्स आदि का जमीन तथा जलस्रोतों पर प्रभाव .
६. सिन्थेटिक धागा non bio-degradable होना.
७. ——-
छानबीन इस सवाल की भी होनी चाहिए कि ADB के लिए महौल बना कैसे ? शायद इस तरह :
अ) कि , खादी अब गरीब का वस्त्र बचा नहीं .
ब) कि , खादी = सादगी से शुरु करके खादी = सत्ता के रास्ते हम खादी = पाखण्ड तक पहुंच चुके हैं .
स) कि, गांधी के चरखे से अब बी.टी. कॉटन का सूत कतता है ।
जब स्वालंबन का बीज ’ मोन्सेण्टो’ के हाथों गिरवी है , तब स्वाव्लंबन के सूत्र संभालना काफी है ? संभव है ?
ये सारे ( और भी कई ) पहलुओं का एकसाथ अध्ययन करके , स्थिति का qualitative के साथ quantitative आकलन करके क्या हम विकल्प का रास्ता ढूंढ़ सकते हैं ?
मैं उपरोक्त बिन्दुओं में से कुछेक पर अपने निरीक्षण लिख रही हूँ । इनमें बहुतों को बहुत कुछ जोड़ना होगा । किसी सामूहिक अध्ययन की कोशिश संभव हो तो बताएं ।
मेरा परिचय स्वाति थोड़ा बहुत देंगी । रिटायर्ड शिक्षिका हूँ । सुनील , स्मिता से मिलती रहती हूँ ।
शुभेच्छाओं सहित,
नीला
९४२५१ २८८३६ , hneelaATyahooDOTcom
नीलाजी ने विषय को जरूरी एवं गंभीर विस्तार दिया है । मुझे उम्मीद है कि उनका ख़त और ’सिंथेटिक वस्त्र ’ विषयक टिप्पणी ( अगली पोस्ट में प्रकाश्य ) एक पहल की शुरुआत होंगे। दोनों टिप्पणीकर्ताओं का अत्यंत आभारी हूँ । नीलाजी को नेट पर हिन्दी टाइप करने , मेल करने आदि की बाबत लिख रहा हूँ ।

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