दो कविताएं : श्रेय , चिड़िया की आंख , राजेन्द्र राजन

श्रेय
पत्थर अगर तेरहवें प्रहार में टूटा
तो इसलिए टूटा
कि उस पर बारह प्रहार हो चुके थे
 
तेरहवां प्रहार करने वाले को मिला
पत्थर तोड़ने का सारा श्रेय
 
कौन जानता है
बाकी बारह प्रहार किसने किए थे ।
 
चिड़िया की आंख
शुरु से कहा जाता है
सिर्फ चिड़िया की आंख देखो
उसके अलावा कुछ भी नहीं
तभी तुम भेद सकोगे अपना लक्ष्य
 
सबके सब लक्ष्य भेदना चाहते [...]

अयोध्या , १९९२ : कुँवरनारायण

अयोध्या , १९९२
हे राम ,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकव्य !
                    तुम्हारे बस की नहीं
                     उस अविवेक पर विजय
                      जिसके दस बीस नहीं
                      अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं
                       और विवेक भी अब
                        न जाने किसके साथ है ।
 
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा [...]

कुंवर नारायण की तीन कविताएं (ज्ञानपीठ की घोषणा की खुशी में)

जल्दी में

प्रियजन
मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं
क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की
जिसे आप भी अगर
समझने की उतनी ही बड़ी जल्दी में नहीं हैं
तो जल्दी समझ नहीं पायेंगे
कि मैं क्यों जल्दी में हूं ।
 
जल्दी का जमाना है
सब जल्दी में हैं
कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में
तो कोई कहीं लौटने की …
 
हर बड़ी जल्दी [...]

कविता / इतिहास पुरुष अब आएं / राजेन्द्र राजन

काफी दिनों से रोज़ – रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं
हमारे भीतर सीने में भभक रही है भाप
आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर
पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग
चीज़ों को उलटने के लिए छटपटा रहे हैं हाथ

मगर नहीं जानते किधर जाएं क्या करें
किस पर यक़ीन करें किस पर सन्देह
क्या कहें [...]

जल्दी में : कुंवर नारायण

प्रियजन
मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं
क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की
जिसे आप भी अगर
समझने की उतनी ही बड़ी जल्दी में नहीं हैं
तो जल्दी समझ नहीं पायेंगे
कि मैं क्यों जल्दी में हूं ।
 
जल्दी का जमाना है
सब जल्दी में हैं
कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में
तो कोई कहीं लौटने की …
 
हर बड़ी जल्दी को
और [...]

यह सिर्फ शब्दों से नहीं होगा : राजेन्द्र राजन

शब्दों में चाहे जितना सार हो
मगर बेकार है
शब्दों में चाहे जितना प्यार हो मगर बेकार है
शब्दों में चाहे जितनी करुण पुकार हो
मगर बेकार है
शब्दों में चाहे जितनी धार हो
मगर बेकार है
क्योंकि तुम्हारे सामने लोग नहीं हैं
लोगों की एक दीवार है
जिससे टकराकर
लहूलुहान हो रहे हैं तुम्हारे शब्द

पता नहीं
यह शब्दों की हार है
या बहरों का संसार
कि [...]

शब्द , शब्द को पुकारते हैं : राजेन्द्र राजन

जैसे बीज पुकारता है बीज को
जैसे खोज पुकारती है खोज को
जैसे राह पुकारती है राह को
 शब्द, शब्द को पुकारते हैं

मैं न शब्दों को ढूंढ़ता हूं
न उन्हें गढ़ता हूं
न उन्हें चुनता हूं
न उन्हें सजाता हूं

मैं सिर्फ सुनता हूं
जब शब्द , शब्द को पुकारते हैं
और देखता हूं
शब्द आते हैं
हाथ से हाथ मिलाते
खड़े हो जाते हैं जैसे कोई दीवार [...]

कविता : इतिहास में जगह : राजेन्द्र राजन

वे हर वक्त पिले रहते हैं
इतिहास में अपनी जगह बनाने में
 
सिर्फ उन्हें मालूम है
कितनी जगह है इतिहास में
शायद इसीलिए वे एक दूसरे को
धकियाते रहते हैं हर वक्त
 
उनकी धक्कामुक्की
मुक्कामुक्की से बनता है
उनका इतिहास
 
इस तरह
इतिहास में अपनी जगह बना
लेने के बाद
वे तय करते हैं
इतिहास में दूसरों की जगह
 
जो इतिहास में उनकी बतायी
हुई जगह पर
रहने को राजी नहीं [...]