पिछला भाग – एक
हिंदु विवाह अधिनियम (1955 ) सतही तौर पर ’समता’ पर आधारित है । वह अदालत से तलाक मांगने का अधिकार स्त्री-पुरुष दोनों को देता है । 1976 के अधिनियम में तलाक के साधारण स्थापित कारकों के अलावा , क्रूरता (मानसिक/शारीरिक ), परित्याग करना व परस्पर रजामंदी भी तलाक के लिए पर्याप्त कारण माने गए हैं । भरण – पोषण का भत्ता माँगने का हक पति अथवा पत्नी दोनों को है । परंतु अदालती कार्रवाई के बाद ही यह गुजारा भत्ता मिलता है व उसे पति की आय का (1/5 से लेकर 1/3 ) हिस्सा निर्धारित किया जाता है । इतनी कम राशि ( वह भी न्यायालय व वकील के खर्च के बाद ) से परित्यक्ता या तलाकशुदा पत्नी व बच्चों का गुजारा चलता नहीं है व उसे अपने मायके वालों की शरण में जाना पड़ता है । बहुपत्नी प्रथा कहने को तो हिंदुओं में , जैन धर्मावलंबियों में समाप्त है , परंतु वास्तविकता विपरीत साक्ष्य प्रस्तुत करती है । कई संस्थाओं व स्वतंत्र अन्वेषण के दौरान पाया गया कि दो विवाह करने का रिवाज मुसलमानों से ज्यादा हिंदुओं में है और हिंदुओं से ज्यादा जैनों में। इनमें से कुछ तो पहली पत्नी का परित्याग करते हैं तो कुछ दोहरी गृहस्थियाँ चलाते हैं । अगर कोई स्त्री अदालत में वाद स्थापित करती है कि उसके पति ने दूसरी शादी की है व उसको न्याय व उसका अधिकार दिलाया जाये तो वादी को सिद्ध करना होता है कि उसके प्रतिवादी ने दूसरी शादी की है । ये पेचीदगी और भी बढ़ जाती है जब हिन्दू विवाह अधिनियम (1955 ) द्वारा विवाह को हिन्दू उच्च वर्ण की रीतियों ( मसलन पाणिग्रहण , सप्तपदी ) द्वारा संपादित किए जाने पर ही विवाह को मान्यता मिलती है । अन्य किसी इतर सामाजिक प्रथा को कानून मान्यता नहीं मिली है । तिरुपति मन्दिर में अपने समाज के सामने गांधर्व पद्धति से माला बदलने से विवाह मान्य नहीं होगा , इस प्रक्रिया से दूसरा विवाह करने वाला पुरुष ने “विवाह” नहीं किया इसलिए दंडित नहीं होगा । उल्टे अगर माननीय न्यायाधीशों ने पहली पत्नी से उसके विवाह के सबूत माँगे और वह सप्तपदी इत्यादि सिद्ध नहीं कर पायी तो उसका विवाह न्यायालय समाप्त कर सकता है । ( देखें वनजाक्षम्मा बनाम गोपालकृष्णन,ए.आई.आर १९७०,मैसूर 305) कई बार ऐसा हुआ है कि निचली अदालतें (सत्र व उच्च न्यायालय) में पति को सजा हुई है मगर उच्चतम न्यायालय ने अपने (कु)प्रसिद्ध भाऊराव लोखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1956) मामले का हवाला देते हुए सभी ऐसे मामलों में पति को बरी कर दिया है । एक तरह से उच्चतम न्यायालय ने पुरुषों को दूसरे/ तीसरे विवाह की अघोषित छूट दी हुई है । ’सरला मुदगल आदि बनाम भारत’ नाम के चर्चित मामले में पुरुष ने इस्लाम धर्म कबूल किया था सिर्फ़ वैधानिक रूप से शादी करने के लिए । 1995 में उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों (श्री कुलदीप सिंह व श्री सहाय ) ने भारत सरकार को इस बिंदु पर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से चुकने के लिए आड़े हाथों लिया कि वह “समान नागरिक संहिता” क्यों नहीं ला रही जिससे मुस्लिम पर्सनल लॉ में दी गई बहुपत्नी प्रथा की छूट समाप्त हो । इसके लिए मुस्लिम धर्मान्धता को भी कोसा गया। जो व्यक्ति सिर्फ इसलिए इस्लाम धर्म कबूलते हैं ताकि दूसरी शादी की छूट हो ,वो तो गलत हैं हीं,मगर जो अन्य धर्मावलम्बी ऐसा ही कार्य करते हैं उनके बारे में न्याय की दृष्टि इतनी धुंधली क्यों है ?
इन समस्याओं को कम करने का एक तरीका विवाहों को कानूनी रूप से पंजीकृत करना अनिवार्य कर दिया जाये ताकि दूसरे विवाह के साक्ष्य जुटाना पहले पक्ष(पति या पत्नी) के लिए दुष्कर न हो व दूसरे विवाह पर कुछ रोक लग सके । अगर साक्ष्य अधिनियमों (एविडेन्स एक्ट )में परिवर्तन कर, दूसरी बार विवाहित न होने का सबूत प्रतिवादी (पति या पत्नी जो भी हो) को देना हो तो भी एक रोक लग सकती है । इस पर गहन विचार करना होगा ।
अभिभावकत्व का अधिकार भी पिता को मिला है। पांच साल से कम का बच्चा ही माँ को मिलता है । स्त्री के संपत्ति के अधिकार अनुपालन तो समाज ने करने से इंकार कर दिया ठीक जैसे दहेज या बाल विवाह संबंधी कानूनों की भांति। सामाजिक स्वाभाविक अभिभावक माँ है इसे भी नकारा गया है ।
अंतिम तथ्य गैर बराबरी का
विशेष विवाह अधिनियम के तहत कोई स्त्री किसी भी जाति के पुरुष से शादी कर सकती है मगर हमारा जातिवादी पुरुषसत्तात्मक समाज अक्सर ऐसे युवक-युवतियों को सजाए मौत देता है(कानून अपने हाथ में ले कर ) । जाहिर है कि हिन्दू निजी अधिनियमों में कई खामियाँ हैं व इन्हें दूर करने के लिए पूरे समाज में , विधिवेत्ताओं में, न्यायाधीशों में व कानून बनाने वालों में समतामूलक दृष्टि की जरूरत है ।
इस्लाम ने बेटियों को संपत्ति का अधिकार तब दिया , जब अरब में बच्चियाँ पैदा होते ही रेत में दबा दी जाती थीं। भले बेटियों का हिस्सा बेटों से (1/3) का हो- जन्म से है । पैगम्बर रसूल की नजर औरतों के हकूक पर निश्चित थी क्योंकि उन्हें औरतों के साथ किए गए व्यवहार के बारे में चिंता थी । उन दिनों अरब में लगातार कबिलाई युद्ध होते थे । बंदी की गयी दुश्मन कबीलों की औरतों , बच्चियों के साथ विजेता अक्सर बदसलूकी करते थे। अनिश्चित संख्या में विवाह करने की सामाजिक छूट थी क्योंकि औरतों की संख्या ज्यादा थी । औरतों के साथ बदसलूकी न हो व सामाजिक प्रतिष्ठा मिले इसलिए एक ही पुरुष को चार विवाह करने की छूट इस्लाम में दी गई । कुरान की आयतों में स्पष्ट निर्देश है कि अगर सभी पत्नियों से समान रूप ( आर्थिक ,सामाजिक,भावनात्मक) से व्यवहार करने में समर्थ पुरुष ही ,दूसरी/तीसरी/चौथी शादी कर सकता है। इसी तरह जबानी तलाक के बारे में स्पष्ट निर्देश है कि अगर पति काजी या समाज के जिम्मेदार व्यक्तियों के सामने पहली बार तलाक कहेगा ।उसके बाद पति-पत्नी एक महीने की अवधि के लिए साथ-साथ रहेंगे-समझौते की संभावना तलाशने के लिए। नहीं कर पाए तो तो महीने अंत में पुन: काजी या जिम्मेदार व्यक्तियों के सामने “तलाक” कहेगा पति। फिर एक महीना साथ रहना व जब संबंध निभाने में किन्हीं कारणों से अक्षम हो तो सार्वजनिक रूप से तीसरी बार “तलाक” कहने से विवाह विच्छेद माना जाएगा ।हिदायत है कि पूर्व पत्नी को विदा करते समय पूरे सम्मान व उसकी मेहर की रकम , निजी सामान इत्यादि देना होगा तथा इद्दत की मुद्दत का उसका व बच्चों का खर्च भी पति को देना होगा । ( तलाक ए रजई) इस प्रथा को एक ही बार में “तीन तलाक” जबानी से बदल देना,कुरान के नियमों का गलत अर्थ लगाना है । इस कुप्रथा को निश्चित ही खत्म करना चाहिए । हजरत मुहम्मद साहब ने सिर्फ अंतिम विकल्प के रूप में तलाक को समझाया है ।समाज जैसे-जैसे बदलता है,उसके नियम भी बदलते हैं ।लड़कियों को पढ़ाना , रोजगार करना मान्य हुआ है , हो रहा है । १५ वीं सदी के अरब समाज से आज के मुस्लिम देशों के समाज में जो परिवर्तन आया है उससे कई देशों ने मसलन मिश्र, तुर्की , इरान ,ईराक ,मलेशिया आदि देशों ने बहुपत्नी प्रथा कानून खत्म की है अथवा उसमें सुधार किया है । पाकिस्तान में काजी के समक्ष पहली पत्नी सहमति देती है तब ही दूसरी शादी पति कर सकता है अन्यथा शादी गैर कानूनी होगी । इस्लाम में जो मानव -मात्र के प्रति विचार है(हजरत मुहम्मद साहब ने नस्ल का फर्क करने से मना किया “सभी खुदा के बन्दे हैं”) उसे अगर नर-नारी समता के लिए फैलाने का आग्रह मुस्लिम समाज अगर खुद करे तो बहुत बड़ा कदम होगा । उसे खोना तो विशेष नहीं होगा , उसी समाज के आधे हिस्से को न्याय मिलेगा साथ ही धर्मान्धता का आरोप भी खत्म हो जाएगा । यह पूरे भारतीय समाज व देश के लिए शुभ संकेत होगा और तब एक समतामूलक न्यायसंगत पारिवारिक कानून बन सकेगा ।
जारी

