अयोध्या , १९९२ : कुँवरनारायण

अयोध्या , १९९२
हे राम ,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकव्य !
                    तुम्हारे बस की नहीं
                     उस अविवेक पर विजय
                      जिसके दस बीस नहीं
                      अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं
                       और विवेक भी अब
                        न जाने किसके साथ है ।
 
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा [...]

कुंवर नारायण की तीन कविताएं (ज्ञानपीठ की घोषणा की खुशी में)

जल्दी में

प्रियजन
मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं
क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की
जिसे आप भी अगर
समझने की उतनी ही बड़ी जल्दी में नहीं हैं
तो जल्दी समझ नहीं पायेंगे
कि मैं क्यों जल्दी में हूं ।
 
जल्दी का जमाना है
सब जल्दी में हैं
कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में
तो कोई कहीं लौटने की …
 
हर बड़ी जल्दी [...]

जल्दी में : कुंवर नारायण

प्रियजन
मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं
क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की
जिसे आप भी अगर
समझने की उतनी ही बड़ी जल्दी में नहीं हैं
तो जल्दी समझ नहीं पायेंगे
कि मैं क्यों जल्दी में हूं ।
 
जल्दी का जमाना है
सब जल्दी में हैं
कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में
तो कोई कहीं लौटने की …
 
हर बड़ी जल्दी को
और [...]