पिछला भाग (नेपाली माओवादियों के समाजवाद की सीमा)।
कृषि के क्षेत्र में माओवादी भूमि – सुधारों और आधुनिकीकरण पर जोर देते हैं । भट्टराई कहते हैं कि हम अनुपस्थित जमींदारों को खतम करेंगे और जोतनेवाले को जमीन का मालिक बनाएंगे । गरीब किसानों की सहकारी समितियाँ बनाएंगे । विश्व बैंक और खाद्य एवं कृषि संगठन की निर्यातोन्मुखी खेती की नीति पर चलने के बजाय देश की जरूरतों के लिए अनाज उत्पादन एवं खाद्य सुरक्षा पर जोर देंगे । इसी के साथ हम खेती का आधुनिकीकरण करेंगे , जिसका मतलब मशीनीकरण , आधुनिक सिंचाई आदि होगा । जब प्रश्नकर्ता ने भट्टराई से पूछा कि आपके शोधप्रबन्ध में नेपाल की खेती के विकास को नापने के लिए प्रचलित मानदण्डों जैसे रासायनिक खाद का उपयोग , मशीनों का उपयोग , भूमि का संकेन्द्रण आदि का इस्तेमाल किया गया तो भट्टराई सफाई में कहते हैं कि आंकड़ों की कमी की वजह से उन्होंने ऐसा किया । किंतु कृषि विकास की इस प्रचलित अवधारणा में कोई दिक्कत है , यह फिर भट्टराई की बातों में दिखाई नहीं देता ।
नेपाली माओवादियों के यह विचार काफ़ी निराशाजनक हैं । राजशाही और सामंतवाद के खिलाफ बहादुरीपूर्ण संघर्ष के बाद नये नेपाल का निर्माण कैसे किया जाये , इसके बारे में उनके विचार वही पुराने हैं , जिनमें पिछली एक सदी के अनुभवों की कोई झलक नहीं मिलती । ऐसा प्रतीत होता है कि उनके दिमाग में इतिहास की वही यूरोपीय समझ बैठी हुई है कि सामंतवाद के बाद औद्योगिक पूंजीवाद का विकास अनिवार्य है , समाजवाद को लाने का कोई गैर- पूंजीवादी , गैर- यूरोपीय रास्ता नहीं हो सकता । इतिहास की इसी गलत समझ के कारण सोवियत संघ , चीन और पूर्वी यूरोप के साम्यवादी शासकों ने भारी औद्योगीकरण का गलत रास्ता अपनाया और इस चक्कर में किसानों , गांवों और पिछड़े इलाकों का दोहन शोषण किया व आंतरिक उपनिवेश बनाए । आधुनिक किस्म के औद्योगीकरण में में बाहरी या आंतरिक उपनिवेशों का निर्माण , श्रम का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शोषण एवं प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन एवं विनाश अनिवार्य रूप से निहित है । इसी राह के अंतर्विरोध अंतत: सोवियत , चीनी , पूर्वी यूरोपीय साम्यवाद को ले डूबे । लेकिन लगता है कि नेपाली माओवादी अभी तक इस सच्चाई को समझ नहीं पाए हैं ।
उनके मन में शायद नेपाल की विशाल बेरोजगारी की समस्या छाई है , जिसे दूर करने के लिए वे औद्योगिक पूंजीवाद की वकालत कर रहे हैं और विदेशी पूंजी एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भी आमंत्रित करना चाहते हैं । लेकिन इस मामले में भी वे एक और बड़ा भ्रम पाले हुए हैं । सच तो यह है कि आधुनिक औद्योगीकरण से दुनिया में कहीं भी , इतिहास के किसी भी दौर में बेरोजगारी दूर नहीं हुई है बल्कि पैदा हुई है व बढ़ी है । ब्रिटेन व पश्चिमी यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के दौर में खेती व ग्रामोद्योगों के विनाश – विस्थापन एवं मशीनीकरण से भारी बेरोजगारी पैदा हुई , जिसे स्वयं मार्क्स ने ‘श्रम की सुरक्षित फौज’ कहा तथा उद्योगों के लिये सस्ते मजदूर उपलब्ध कराने के रूप में पूंजीवाद के विकास में उसकी अहम भूमिका को मंजूर की । यूरोप की यह बेरोजगारी औद्योगीकरण से नहीं , बड़े पैमाने पर अमरीका , अफ्रीका , एशिया और ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीयों के प्रवास से दूर हुई । दूसरे शब्दों में , साम्राज्य निर्माण , औपनिवेशिक लूट और शोषण का इस औद्योगिक पूंजीवाद से गहरा रिश्ता था और आज भी है । नेपाल के माओवादी इस रिश्ते को कैसे भूल सकते हैं ? वे कहाँ से उपनिवेश लाएंगे ? या देश के अंदर गांवों को व पिछड़े इलाकों को उपनिवेश बनाएंगे ?
भारत के अंदर आजकल औद्योगीकरण और विकास के सवालों पर काफी बहस , विरोध व विवाद चल रहा है । नर्मदा , नन्दीग्राम , सिंगूर , कलिंगनगर , काशीपुर जैसे संघर्षों ने इन विवादों को हवा दी है । अचरज की बात है कि नेपाल के माओवादी नेताओं ने बिल्कुल बगल के पड़ोसी देश के इन द्वन्द्वों और विसंगतियों पर भी गौर करने की जरूरत नहीं समझी । स्वयं नेपाल में पनबिजली की बड़ी परियोजनाओं से जो बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा या पयतन से जो सामाजिक – सांस्कृतिक दुष्प्रभाव होंगे , उनके बारे में भी माओवादी मौन हैं ।
जल – जंगल – जमीन के सवाल आज पूरी दुनिया में उठ रहे हैं । प्राकृतिक संसाधन दुनिया के संघर्षों के केन्द्र में आ गए हैं । विस्थापन का विरोध अंतर्राष्ट्रीय रूप लेता जा रहा है । आधुनिक विकास , औद्योगीकरण और आधुनिक जीवनशैली की विडम्बनाएं तथा उनके कारण पैदा संकट जग जाहिर हो चुके हैं । पर्यावरण के संकट व जलवायु परिवर्तन के खतरे पूरी दुनिया की चिंता का विषय है । इन सारे सवालों के बारे में लेशमात्र की जागरूकता भी प्रचण्ड एवं भट्टराई के विचारों में नहीं झलकती । ऐसा लगता है कि वे एक सदी पहली की मार्क्सवादी दुनिया में जी रहें हैं ।
[ जारी , अगली किश्त में समाप्य ]
