कविता / इतिहास पुरुष अब आएं / राजेन्द्र राजन

काफी दिनों से रोज़ – रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं
हमारे भीतर सीने में भभक रही है भाप
आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर
पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग
चीज़ों को उलटने के लिए छटपटा रहे हैं हाथ

मगर नहीं जानते किधर जाएं क्या करें
किस पर यक़ीन करें किस पर सन्देह
क्या कहें [...]

कविता : इतिहास में जगह : राजेन्द्र राजन

वे हर वक्त पिले रहते हैं
इतिहास में अपनी जगह बनाने में
 
सिर्फ उन्हें मालूम है
कितनी जगह है इतिहास में
शायद इसीलिए वे एक दूसरे को
धकियाते रहते हैं हर वक्त
 
उनकी धक्कामुक्की
मुक्कामुक्की से बनता है
उनका इतिहास
 
इस तरह
इतिहास में अपनी जगह बना
लेने के बाद
वे तय करते हैं
इतिहास में दूसरों की जगह
 
जो इतिहास में उनकी बतायी
हुई जगह पर
रहने को राजी नहीं [...]