Posted on August 31, 2008 by अफ़लातून
काफी दिनों से रोज़ – रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं
हमारे भीतर सीने में भभक रही है भाप
आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर
पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग
चीज़ों को उलटने के लिए छटपटा रहे हैं हाथ
मगर नहीं जानते किधर जाएं क्या करें
किस पर यक़ीन करें किस पर सन्देह
क्या कहें [...]
Filed under: poem, rajendra rajan | Tagged: hindi poem, rajendr rajan | 3 Comments »
Posted on January 22, 2008 by अफ़लातून
वे हर वक्त पिले रहते हैं
इतिहास में अपनी जगह बनाने में
सिर्फ उन्हें मालूम है
कितनी जगह है इतिहास में
शायद इसीलिए वे एक दूसरे को
धकियाते रहते हैं हर वक्त
उनकी धक्कामुक्की
मुक्कामुक्की से बनता है
उनका इतिहास
इस तरह
इतिहास में अपनी जगह बना
लेने के बाद
वे तय करते हैं
इतिहास में दूसरों की जगह
जो इतिहास में उनकी बतायी
हुई जगह पर
रहने को राजी नहीं [...]
Filed under: poem | Tagged: राजेन्द्र राजन, हिन्दी कविता, hindi poem, rajendr rajan | 7 Comments »