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Archive for जुलाई 8th, 2008

हे राम ,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकाव्य !

             तुम्हारे बस की नहीं

             उस अविवेवक पर विजय

             जिसके दस बीस नहीं

              अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं

              और विवेक भी अब

             न जाने किसके साथ है ।

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाज्ञ

एक विवादित स्थल में सिमट कर

रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है ,

‘ मानस ‘ तुम्हारा ‘ चरित ‘ नहीं

चुनाव का डंका है !

हे राम , कहाँ यह समय

          कहाँ तुम्हारा त्रेता युग,

 कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

       और कहाँ यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुराण – किसी धर्मग्रन्थ में

        सकुशल सपत्नीक….

अब के जंगल वो जंगल नहीं

      जिनमें घूमा करते थे बाल्मीक !

– कुँवरनारायण .

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