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Archive for जुलाई 22nd, 2008

लेखक – डॉ. एम.वी रमणा तथा डॉ. संघमित्रा देसाई गाडेकर

‘यह गौरतलब है कि जो चीजें तथा उपकरण यूरोप के लोग इस्तेमाल करना छोड़ देते हैं वही चीजें हमारे यहाँ फैशन में आ जाती हैं । उनके प्रबुद्ध लोग लगातार परिवर्तन करते रहते हैं । हम अनजाने उनकी फेंकी हुई चीजों से चिपके रहते हैं ।’ – मो.क.गांधी , हिन्द स्वराज

पिछले कुछ वर्षों से सुस्त पड़ा हुआ परमाणु उर्जा उद्योग अब अपने नए रूप में खबरों में छाया हुआ है । आज कल इसे पर्यावरण उद्धारक के रूप में पेश किया जा रहा है । इस दुष्प्रचार के प्रभाव में कहीं हम यह न भूल जायें कि उसे आज से पचास वर्ष पहले भी इसे मनुष्य जाति के उद्धारक उद्योग के रूप में पेश किया गया था । कहा गया था कि परमाणु उर्जा में इतनी शक्ति होगी कि लोगों की गरीबी हट जाएगी , सभी के पास विपुल सम्पत्ति होगी , विश्व में शान्ति फैलेगी , खुशहाली आ जाएगी । लोगों में बिजली मुफ्त बँटेगी । अमेरिकी परमाणु उर्जा कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री स्ट्राउस ने १९५४ के अपने जग प्रसिद्ध भाषण में कहा था , ‘ यह कल्पना करना कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी कि हमारे बच्चों के घरों में इतनी सस्ती बिजली रहेगी कि मीटर लगाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी!’ भारत में अमरीकी कार्यक्रम ‘ऍटम्स फ़ॉर पीस’ के तहत परमाणुविदों ने खुशहाली का सपना दिखाया था । हाँलाकि भारत में १९४८ से ही डॉ. होमी भाभा के नेतृत्व में यह कार्यक्रम शुरु हो चुका था । आइए देखें कि इन साठ वर्षों में हमें परमाणु उर्जा से कितनी बिजली मिली और  उसकी कीमत क्या पड़ी ।

   सबसे पहली बात जो हमारे ध्यान में आती है वह यह है कि परमाणुविदों ने शुरु से ही सपना कुछ और दिखाया परन्तु मिला कुछ और ही है । वर्ष २००० तक ४३५०० MW बिजली पैदा करने का सपना हमें डॉ. होमी भाभा द्वारा दिखाया गया था जबकि आज सन २००७-०८ में हमारे देश में परमाणु उर्जा से मात्र ४०७० MW की क्षमता है । यह देश के कुल बिजली उत्पादन का ३ %  है। ऐसा नहीं कि सिर्फ एक वैज्ञानिक ने ऐसी भविष्यवाणी की हो । हर बार , चाहे वह १९५४ में हो , १९६२ में,१९६५ में , १९६९ में या फिर १९८५ में , पूर्वानुमान ऊंचे ही रहे । अब २०५२ के लिए कहा जा रहा है कि तब तक भारत की परमाणु बिजली क्षमता २७५००० MW हो जायेगी ।

    ३ % बिजली बनाने में सरकारों ने काफ़ी धन खर्च किया, मुक्त हस्त से । परमाणु उर्जा विभाग को मुक्त हस्त से पैसा दिया गया । १९९८ के परीक्षणों के बाद तो परमाणु उर्जा विभाग के पैसे और भी बढ़ गए । १९९७-९८ में परमाणु उर्जा विभाग को १८३६.५३ करोड़ रुपये मिले थे जो २००६-‘०७ में बढ़ाकर ३३५१.६९ करोड़ कर दिए गए हैं । तुलना की दृष्टि से वैकल्पिक उर्जा विभाग (MNES) का पैसा देखें तो उन्हें मात्र ४७३.५६ करोड़ रुपये ही मिले हैं । इतने कम पैसे होते हुए भी सूर्य उर्जा , पवन , उर्जा , छोटे जलविद्युत संयन्त्र सब मिला कर MNES की बिजली क्षमता इस साल ४८०० MW तक पहुँची है । जब कि २००६-‘०७ तक परमाणु उर्जा की क्षमता मात्र ३३१० MW थी ।वैकल्पिक उर्जा स्रोतों के उपकरणों को चलाने तथा सुरक्षा करने में कम खर्च लगता है । यह भी गौरतलब है कि वैकल्पिक उर्जा स्रोतों पर सरकार का ध्यान मात्र दस वर्षों से गया है । ५० वर्षों के परमाणु उर्जा कार्यक्रम के सामने तो वैकल्पिक उर्जा कार्यक्रम एक दम बच्चा है । यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि वैकल्पिक उर्जा स्रोत से लगातार उर्जा नहीं मिल सकती। मगर उर्जा संग्रह जैसे विषय पर शोध और खोज की काफ़ी गुंजाइश है ।

[ जारी ]

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