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Archive for नवम्बर, 2008

    किसानों के साथ – साथ मजदूरों , हम्मालों , छोटे धंधों वालों का भी शोषण जारी है । या तो उन्हें काम मिलता नहीं , या मिलता है तो मजदूरी बहुत कम मिलती है । मध्यप्रदेश सरकार बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रही है , लेकिन हम्मालों के लिए महाराष्ट्र के माथाड़ी कानून जैसा कानून बनाने की कोई पहल आज तक नहीं की है । सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी बहुत कम तय की जाती है , लेकिन ज्यादातर मजदूरों को वह भी नहीं मिल पाती है । रोजगार गारंटी कानून में सभी जगहों यही शिकायत है । “टास्क रेट” मजदूरों के शोषण का माध्यम बन गया है। तेंदु पत्ता तोड़ने वालों की मजदूरी कई साल बाद मात्र ५ रुपये बढ़ाकर ४५ रुपये प्रति सैंकड़ा गड्डी की है , जिससे जाहिर है कि स्वयं सरकार मजदूरों व आदिवासियों को लूट रही है । यह मजदूरी कम से कम १२० रुपये होनी चाहिए । शिक्षा में संविदा शिक्षक , शिक्षाकर्मी , अतिथि शिक्षक , गुरुजी जैसे कई कैडर बनाकर सरकार ने उनको कम वेतन देने के तरीके निकाले हैं । दूसरी ओर छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा करके सरकार ने अफसरों के वेतन भत्ते में काफी ज्यादा बढोतरी का रास्ता साफ कर दिया है । पांचवे वेतन आयोग की तरह छठे आयोग ने भी सबसे ज्यादा वेतन प्रथम व द्वितीय श्रेणी के अफसरों के ही बढ़ाये हैं । इससे देशी विदेशी कंपनियों के मंहगे सामानों की बिक्री एकाएक बढ़ गयी है और उपभोक्तावादी संस्कृति को काफी बढ़ावा मिला है ।

    गरीबों के मामले में प्रदेश सरकार की कंजूसी इससे दिखाई देती है कि वृद्धावस्था पेंशन और निराश्रित पेंशन में केन्द्र सरकार का हिस्सा बढ़ाने पर प्रदेश सरकार ने अपना हिस्सा नहीं बढ़ाया और ४०० की जगह मात्र २७५ रु. ही दे रही है । दूसरी ओर , बड़ी बेशर्मी से से विधायकों , सांसदों , मंत्रियों आदि ने अपने वेतन – भत्ते काफी बढ़ा लिए हैं । राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के वेतन तो एक झटके में तीन गुना कर दिए गए हैं ।

    समाजवादी जनपरिषद इस बंदरबांट की घोर निन्दा करती है । समय आ गया है कि आमदनी व मजदूरी की इस घोर गैर बराबरी को खतम किया जाये । शारीरिक मेहनत करने वाले को भी बराबर का हकदार माना जाए । अदिकतम और न्यूनतम वेतन की सीमा तय की जाए और उसमें १० गुने से ज्यादा फर्क न हो ।

विधान सभा चुनाव में भाग लेने हेतु समाजवादी जनपरिषद के छ: सूत्र

मध्यप्रदेश विस चुनाव , २००८ में भाग लेने हेतु समाजवादी जनपरिषद के छ: सूत्र
१. समाजवादी जनपरिषद देश को व दुनिया को बदलने के लिए , व्यवस्था-परिवर्तन के लिए ,समाजवाद को लाने के लिए समर्पित दल है ।
२ .इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए आम जनता के हक के लिए लड़ने वाली , जनता की ताकत बनाने वाली , नयी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए इस चुनाव में भाग लेगी ।
३. समाजवादी जनपरिषद चुनाव में दारू बांटने , पैसे-साड़ी-कंबल जैसे लालच देने , फिजूलखर्ची व रंगदारी का विरोध करेगी । सजप सादगी से चुनाव लड़ेगी।
४. समाजवादी जनपरिषद धर्म और जाति के आधार पर वोट नहीं मांगेगी । साम्प्रदायिकता और जातिवाद की रजनीति का विरोध करेगी ।
५. समाजवादी जनपरिषद आम जनता से ‘एक वोट-एक नोट’ मांगेगी , जनता के मुद्दों को चुनाव के केन्द्र में लाएगी और जनता की ताकत के आधार पर चुनाव लड़ेगी ।
६. समाजवादी जनपरिषद चुनाव के लिए प्राप्त चंदे और खर्च का पूरा हिसाब जनता के बीच रखेगी ।

        निवेदक : समाजवादी जनपरिषद , मध्य प्रदेश ।

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जल्दी में

प्रियजन

मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं

क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की

जिसे आप भी अगर

समझने की उतनी ही बड़ी जल्दी में नहीं हैं

तो जल्दी समझ नहीं पायेंगे

कि मैं क्यों जल्दी में हूं ।

 

जल्दी का जमाना है

सब जल्दी में हैं

कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में

तो कोई कहीं लौटने की …

 

हर बड़ी जल्दी को

और बड़ी जल्दी में बदलने की

लाखों जल्दबाज मशीनों का

हम रोज आविष्कार कर रहे हैं

ताकि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती हुई

हमारी जल्दियां हमें जल्दी से जल्दी

किसी ऐसी जगह पर पहुंचा दें

जहां हम हर घड़ी

जल्दी से जल्दी पहुंचने की जल्दी में हैं ।

 

मगर….कहां ?

यह सवाल हमें चौंकाता है

यह अचानक सवाल इस जल्दी के जमाने में

हमें पुराने जमाने की याद दिलाता है ।

 

किसी जल्दबाज आदमी की सोचिए

जब वह बहुत तेजी से चला जा रहा हो

-एक व्यापार की तरह-

उसे बीच में ही रोक कर पूछिए,

            ‘क्या होगा अगर तुम

           रोक दिये गये इसी तरह

            बीच ही में एक दिन

            अचानक….?’

 

वह रुकना नहीं चाहेगा

इस अचानक बाधा पर उसकी झुंझलाहट

आपको चकित कर देगी ।

उसे जब भी धैर्य से सोचने पर बाध्य किया जायेगा

वह अधैर्य से बड़बड़ायेगा ।

‘अचानक’ को ‘जल्दी’ का दुश्मान मान

रोके जाने से घबड़ायेगा । यद्यपि

आपको आश्चर्य होगा

कि इस तरह रोके जाने के खिलाफ

उसके पास कोई तैयारी नहीं….

क्या वह नहीं होगा

क्या फिर वही होगा
जिसका हमें डर है ?
क्या वह नहीं होगा
जिसकी हमें आशा थी?

क्या हम उसी तरह बिकते रहेंगे
बाजारों में
अपनी मूर्खताओं के गुलाम?

क्या वे खरीद ले जायेंगे
हमारे बच्चों को दूर देशों में
अपना भविष्य बनवाने के लिए ?

क्या वे फिर हमसे उसी तरह
लूट ले जायेंगे हमारा सोना
हमें दिखाकर कांच के चमकते टुकडे?

और हम क्या इसी तरह
पीढी-दर-पीढी
उन्हें गर्व से दिखाते रहेंगे
अपनी प्राचीनताओं के खण्डहर
अपने मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे?

अजीब वक्त है

अजीब वक्त है –

बिना लड़े ही एक देश-का देश

स्वीकार करता चला जाता

अपनी ही तुच्छताओं की अधीनता !

 

कुछ तो फर्क बचता

धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में –

कोई तो हार जीत के नियमों में

स्वाभिमान के अर्थ को

फिर से ईजाद करता ।

– कुंवर नारायण

[ वरिष्ट कवि कुंवर नारायण की राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘कोई दूसरा नहीं’ तथा ‘सामयिक वार्ता’ (अगस्त-सितंबर १९९३) से साभार ]

 

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    असंगठित मजदूर

    हमारे देश में मजदूरों की एक बड़ी संख्या असंगठित है । जिसमें खेतीहर मजदूर , हम्माल , निर्माण काम में काम करने वाले मजदूर , घरों -दुकानों में काम करने वाले नौकर , हाथ ठेले वाले एवं अन्य तरह के मजदूर शामिल हैं । इन मजदूरों न तो इतनी मजदूरी मिलती है कि यह ढंग से एक व्यक्ति की कमाई पर अपना घर चला सकें न इन्हें बुढापे में पेंशन का सहारा होता है । इन मजदूरों , नौकरों को कभी भी काम से निकाला जा सकता है । अगर हम हम्मालों के मामले में देखें तो न उनके काम के घंटे तय हैं , न उनके लिए कोई कानून हैं। उन्हें सौ किलो का बोरा उठाना होता है ।

    समाजवादी जनपरिषद न सिर्फ हम्मालों के लिए महाराष्ट्र की तरह एक अलग कानून की मांग करती है बल्कि बाकी असंगठित मजदूरों के लिए एक सामाजिक सुरक्षा कानून बनाने की लड़ाई लड़ रही है । जिससे उन्हें पेंशन , घर के लिए लोन आदि की सुविधा आदि मिले ।

    छठवां वेतन आयोग

    केन्द्र सरका्र ने चुनावी साल में सरकारी कर्मचारियों को खुश करने के नाम पर छठवें वेतन आयोग की सिफारिश लागू कर दी । इससे केन्द्र सरकार पर २२,१०० करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा और मध्यप्रदेश द्वारा इसे अपने कर्मचारियों को लागू करने से बोझ और बढ़ेगा । प्रदेश के हर एक व्यक्ति पर लगभग ४०० रुपये सालाना का बोझ पड़ेगा। इसके पहले पांचवे वेतन आयोग से इतना ही बोझ पड़ चुका है ।

    समाजवादी जनपरिषद यह मानती है कि सरकार के संसाधन और पूंजी पर देश की सारी जनता का बराबर का हक है इसलिए उसे सिर्फ कर्मचारियों पर न लुटाया जाय । साथ ही मंहगाई को इस तरह से नियंत्रण में रखा जाए और शिक्षा , स्वास्थ्य , बिजली जैसी सुविधा उचित दर पर उपलब्ध हो ।

भ्रष्टाचार के योगीराजों का सफाया

    मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार दिन दूना और रात चौगुना बढ़ता जा रहा है । मंत्री , विधायक , अफसर , दलाल सब मिलकर प्रदेश को लूटने में लगे हैं । पिछले दिनों स्वास्थ्य आयुक्त योगीराज शर्मा जैसे काण्ड सामने आए हैं । योगीराज शर्मा के कारनामे पहले से जगजाहिर थे , लेकिन किसी सरकार ने उस पर कार्यवाही नहीं की । यानी वे भी इस लूट में शामिल थे । वह तो आयकर विभाग का छापा पड़ा तब काकर सरकार कार्यवाही करने को मजबूर हुई ।

    दरअसल ऐसे योगीराज हर विभाग में और हर जिले में बैठे  हैं , जो सरकारों – मन्त्रियों के संरक्षण में पल रहे हैं । खुद मुख्यमन्त्री के डम्पर काण्ड में लिप्त होने की बात उजागर हुई है । जाति प्रमाण पत्र , आय प्रमाण पत्र एवं मूल निवासी प्रमाण पत्र जैसी छोटी सी चीज बनवाने के लिए कई चक्कर लगाने पड़ते हैं और चार पांच सौ की घूस व दलाली देनी पड़ती है ।

    समाजवादी जनपरिषद मानती है कि भ्रष्टाचार की इस विशाल गंगा को रोकने के लिए अंग्रेजों से विरासत में मिले प्रशासनिक ढाँचे को पूरा बदलना होगा और राजनैतिक इच्छा शक्ति की जरूरत है । सरकार का विकेन्द्रीकरण करना होगा और जनता के ज्यादा नजदीक ले जाना होगा । राजनीति व धनशक्ति का मेल तोड़ना होगा ।योगीराज हो या शिवराज , भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर कड़ी सजा दी जानी होगी ।

स्विस बैंक में बंद पैसा

    स्विस बैंक  विदेशी बैंक है जहाँ दुनिया भर के नेताओं , अमीरों का भ्रष्ताचार से कमाया पैसा जमा है । इसमें भारत के भी अनेक नेता हैं । स्विस बैंक के संगठन द्वारा २००६ में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार भारत के लोगों का १४५६ अरब डॉलर मतलब ७०,००० अरब रुपये। अगर इस राशि को देश में वापस लाया जाये तो हर गरीब आदमी को एक एक लाख रुपए मिल सकते हैं ।

     समाजवादी जनपरिषद स्विस बैंक में बंद देश के पैसे को वापस देश में लाने की माँग करती है ।

[ जारी ]

पिछले भाग : एक  , दोतीन , चार , पाँच

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    महिलाएँ

    आज महिलाओं की असुरक्षा बढ़ी है आजादी के इकसठ साल में भी महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिला पाया है । न सिर्फ महिलाओं को दहेज के लिए जलाना बल्कि भ्रूण हत्या के जरिए उन्हें मां के पेट में ही मार डालने का काम हमारे सभ्य समाज में हो रहा है । महिलाओं के साथ बलात्कार , छेड़छाड़ की घटना भी बढ़्ती जा रही हैं । कानून के बावजूद सरकार , आफिसों में अफसर बन बैठे व्यभिचारियों पर पर कार्रवाई नहीं करती । उदाहरण के लिए हरदा जिले में तो आखिरकार स्कूल की लड़कियों को अपने व्यभिचारी प्रिंसीपल को हटाने के लिए रास्ते पर उतरना पड़ा ।

    समाजवादी जनपरिषद महिला और पुरुष के लिए समाज में बराबरी के दर्जे में विश्वास करती है । जब तक स्त्री पुरुष में बराबरी नहीं होगी तब तक अत्याचार नहीं रुकेंगे । साथ ही महिलाओं से संबंधित कानूनों का कड़ाई से पालन करना होगा ।

युवा

      युवा किसी भी देश का भविष्य होते हैं लेकिन आज हमारे देश में पार्टियां न तो युवाओं के सामने कोई आदर्श पेश कर पा रही है ना कोई देश के प्रति भावना । आज युवाओं के सामने देश के सर्वांगीण विकास का कोई सपना नहीं है । युवा बेरोजगारी का शिकार है । सत्ताधारी पार्टियां युवा का उपयोग अपनी गंदी राजनीति में कर रही हैं या फिर उन्हें धर्म और जाति के नाम पर भड़काने का ।

    समाजवादी जनपरिषद मानती है कि युवाओं की क्रांतिकारी राजनीति में एक विशेष भूमिका है । युवाओं को भगत सिंह , गांधी , लोहिया , के असली आदर्शों को समझाने उसे उनके सामने लाने के लिए समाज में एक अभियान चलाया जाना चाहिए । युवाओं की उर्जा का उपयोग देश के विकास में होना चाहिए । हमारे संसाधन कंपनियों पर लुटाने की बजाए उन्हें देश के युवाओं के हवाले करना चाहिए ।

सामाजिक सेवाएँ

    सरकार का मुख्य काम है जनता की राशन , पानी , बिजली , शिक्षा , इलाज जैसी सबसे जरूरी चीजों का इंतजाम करे । यह सब आम जनता को आसानी से मिलना चाहिए । लेकिन सरकार विश्व बैंक के इशारे पर इसे खत्म करने में लगी है ।

  गरीबी रेखा और राशन सरकार ने राशन व्यवस्था से बचने के लिए गरीबों के नाम ही गरीबी रेखा से काट दिए । जिन लोगों के नाम गरीबी रेखा में बने हैं उन्हें ये नियमानुसार ३५ किलो गेहूँ देने की बजाए १८ किलो गेहूँ दे रहे हैं । सभी गरीबों को गरीबी रेखा कार्ड मिले तथा न सिर्फ़ ३५ किलो गेहूँ हर परिवार को मिले  तथा इन परिवारों की सदस्य संख्या से मिले ।

राशन – गरीब इतना भी नहीं कमा पाते कि वो अपने पेट भर सकें । उन्हें वृद्धावस्था पेंशन , निराश्रित पेंशन जैसी अनेक योजनाओं पर निर्भर रहना पड़ता है । इन योजनाओं का लाभ तो सही लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता है । इन सारी योजनाओं पर गरीबों को निर्भर न रहना पड़े ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए लेकिन तब तक इन योजनाओं का पूरा पूरा लाभ सही लोगों को मिलना चाहिए ।

शिक्षा  आजादी के इकसठ साल बाद भी हमारी तीन चौथाई आबादी को नाम के वास्ते ही शिक्षा मिलती है । शिक्षा में भेदभाव बढ़ता जा रहा है । आज जरूरत है कि निजी स्कूलों की बजाए समान स्कूल प्रणाली को बढ़ावा दिया जाए । जहां गरीब और अमीर , दलित और सवर्ण , सब बच्चे साथ – साथ पढ़ सकें । सरकार शिक्षा के बजट को प्राथमिकता दे और इतना बजट रखे कि स्कूलों में पर्याप्त संख्या में गुणवत्ता वाले शिक्षक हों । हमारी शिक्षा व्यवस्था जो अंग्रेजों के ढांचे पर चली आ रही है उसमें आमूल परिवर्तन हो ।

स्वास्थ्य   – आज आम लोगों को साधारण इलाज भी उपलब्ध नहीं है । सरकारी अस्पतालों की हालत बद से बदतर होती जा रही है । डाक्टरों की निजी अस्पतालों में अनाप शनाप कमाई है । सरकार को  अस्पतालों में डाक्टरों और मुफ़्त दवाई की पर्याप्त व्यवस्था करना चाहिए । इलाज के अभाव में न तो कोई मौत हो न कोई कर्ज में डूबे ।

अगला हिस्सा : असंगठित मजदूर ,छठवां वेतन आयोग,भ्रष्टाचार के ‘योगीराज’

पिछले हिस्से : एक , दो , तीन , चार

[जारी]

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अल्पसंख्यक

    देश का अल्पसंख्यक समुदाय कांग्रेस और भाजपा की राजनीति का शिकार है । इन पार्टियों के रवैये से न सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय दहशत में है बल्कि पूरे देश में एक भय का महौल है । अल्पसंख्यकों की सारी राजनैतिक उर्जा अपने आपको बचाने में लग जाती है। आज तक अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे लेकिन उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन का कभी अध्ययन नहीं किया गया ।

     समाजवादी जनपरिषद मानती है कि हर तरह के भेदभाव खत्म होने से ही इस समस्या का हल निकलेगा । इसके साथ ही अल्पसंख्यकों को देश में एक क्रांतिकारी राजनीति की धारा को अपनाना होगा । जाति धर्म के नाम पर बांटने वाली राजनीति को नकारना होगा । अल्पसंख्यक समुदाय में शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े जिससे वो आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे आ पाएं ऐसे इंतजामात करने होंगे ।

साम्प्रदायिकता

    हमा्रा देश  इस समय साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रीयता के जहर से ग्रसित है । कहीं हिन्दू – मुस्लिम के नाम पर , तो कहीं हिन्दू – ईसाई के नाम पर , कहीं आदिवासी और बांग्लादेशी के नाम पर तो कहीं मराठी और हिन्दी भाषी के नाम पर दंगे हो रहे हैं । प्रदेश में चुनाव के ऐन पहले बुरहानपुर शहर में अचानक दंगे होने से दोनों बड़ी पार्टियों को फायदा होगा । दोनों पार्टियों की तरफ वोटों का ध्रुवीकरण होगा ।

    असल में अंग्रेज साम्प्रदायिकता का जो जहर घोल कर गये थे उसे हमारे शासक वर्ग ने न सिर्फ आज तक पोषित किया बल्कि उसमें और इजाफा किया । लोगों को धर्म में बांटकर यह अपन उल्लू सीधा करते रहे । इसमें एक नया इजाफा हिंदू – ईसाई दंगे और मुंबई से उत्तर भारतीयों को भगाने के रूप में हुआ । न तो साठ साल में कांग्रेस मुसलमानों का ही भला कर पाई और न भाजपा हिन्दुओं का । न तो हिन्दुओं में छुआछूत मिटी न आम हिन्दू के दुख दर्द दूर हुए और ना मुसलमान सही शिक्षा और रोजगार का हकदार बन पाए । मुसलमानों की स्थिति का आकलन करने के लिए सच्चर समिति बनाने में कांग्रेस को साठ साल लग गए । समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों ने तो वोट की राजनीति के चलते कट्टरता को बढ़ावा भर दिया ।

    समाजवादी जनपरिषद यह मानती है कि देश का विकास एक जाति को , धर्म विशेष को अलग रखकर नहीं हो सकता । यह सब जाति और धर्म हमारे शरीर के अलग – अलग अंग हैं  आप शरीर के किसी एक अंग को आगे बढ़ाकर संपूर्ण शरीर का विकास नहीं कर सकते । अगर हम व्यवहार में देखें तो हमारी जरूरतें , हमारे धंधे आपस में जुड़े हुए सिर्फ इतना ही नहीं हमारी दोस्ती हमारी गंगा जमुनी संस्कृति से जुड़ी है । हमें साम्प्रदायिकता को खत्म करने के लिए उसे पैदा करने वाली राजनीति के चरित्र को बदलना होगा । हमें ईमानदार क्रांतिकारी राजनीति की शुरुआत करनी होगी । साम्प्रदायिकता फैलाने वाली पार्टियों को नकारना होगा क्योंकि इसके बिना हमारे साम्प्रदायिक सौहार्द के सारे प्रयास धीरे धीरे बेमानी हो जाएंगे । देश की अधिकांश जनता अमन और शांति चाहती है । लेकिन दंगे फैलाने वाले मुट्ठी भर लोग खुले आम सड़कों पर तबाही मचाते घूमते हैं और उसे नकारने वाले अमन पसंद घर में बैठे रहते हैं । इसे बदलना होगा , दंगे-पसन्दों को उनकी जगह दिखानी होगी ।

    इसके साथ ही प्रशासनिक और कानूनी सुधार करना होगा । दंगे के समय तमाशबीन बनने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो । हमारा प्रशासन और पुलिस सांप्रदायिकता से मुक्त हो । सबसे बड़ी बात उनके राजनैतिक उपभोग पर रोकथाम लगे । हमारी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव आयें । हम शिक्षा के जरिए धर्म के उदार पक्ष और सूफी संतों की वाणियों को बढ़ावा दें ।

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आदिवासी

    आजादी के बाद पिछले साठ साल में आदिवासी को क्या मिला ? न तो जंगल पर हक मिला न जमीन का पट्टा । आज कहने को आदिवासियों के इतने नेता , विधायक , मंत्री हैं लेकिन आदिवासी की कोई इज्जत नहीं है । सब आदिवासी को छोटा आदमी समझते हैं । आजादी की लड़ाई में आदिवासियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन उनका कहीं कोई नाम नहीं है । जो मध्य प्रदेश कभी आदिवासियों का प्रदेश कहलाता था वहां आज भी आदिवासी को रोजी – रोटी के लिए दर – दर भटकना पड़ता है । जो कानून आदिवासी के हित के खिलाफ़ थे उनमें कोई सुधार नहीं किया । आज भी आदिवासी अधिकारियों अधिकारियों के डंडे का शिकार होता रहता है ।

    पिछले साठ सालों में बड़े पैमाने पर बांध , फैक्ट्री , शेर पालने आदि के नाम पर आदिवासियों को उनके घर , जंगल और जमीन से भगाया गया । न तो आदिवासियों के खेतों को पानी मिला न खाद – बीज । जितनी योजना आदिवासी के विकास के नाम पर आईं उसका कोई फायदा आदिवासियों को नहीं मिला । इन योजनाओं से अधिकारियों और दलालों ने अपने घर भर लिये । कुपोषण और भूख से आदिवासियों की मौत होती रही ।

  1. जंगल पर अधिकार इतिहास गवाह है कि किस गलत तरीके से अंग्रेजों ने आदिवासियों से उनका जंगल छीन लिया । आजादी के बाद आज तक आदिवासी को अपना खोया हुआ अधिकार नहीं मिला । आदिवासियों को उसका जंगल पर अधिकार वापस मिलना चाहिए । जंगल में उसे अपने निस्तार की लकड़ी , फाटा , चराई आदि की छूट होनी चाहिए । जंगल में नाकेदार की दादागिरी बंद होना चाहिए । सरकार को कटाई की अनुमति आसपास के गांवों से लेनी चाहिए एवं उसका आधा पैसा उस ग्राम के विकास पर खर्च होना चाहिए ।
  2. जमीन का पट्टा    जंगल जमीन जोतने एवं उस पर फलदार पौधे लगाने का अधिकार आदिवासियों को मिलना चाहिए यह मांग समाजवादी जनपरिषद सालों से कर रही है। यह एकमात्र पार्टी है जो इस मुद्दे को लेकर वर्षों से आंदोलन कर रही है । जंगल जमीन के पट्टे देने के लिए एक नया कानून भी बन गया है । लेकिन उस कानून का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा है । नाम करने के लिए जैसे तैसे लोगों के फार्म भर दिए । उस कानून का सही सही पालन होना चाहिए और उस कानून के अनुसार आदिवासियों से गलत तरीके से छुड़ाई गई सारी जंगल जमीन के पट्टे मिलने चाहिए। इसमें वनग्राम में लाइन सरकाकर छुड़ाई गई जमीन शामिल है ।
  3. तेन्दु पत्ता    हर बार चुनाव के समय आदिवासियों को तेंदुपत्ता के नाम पर करोड़ों रुपये दिये जाते हैं । इसका मतलब यह है कि चार साल तक तेन्दुपत्ते की कमाई का करोड़ों रुपये सरकार में बैठे अधिकारी और मंत्री खा जाते हैं । आज मंहगाई तीन गुना बढ़ गई और बीड़ी की कीमत भी लेकिन पिछले १५ सालों से तेन्दुपत्ता कड़ाई दर मात्र दस रुपये सैंकड़ा बढ़ी । इसके साथ ही समितियों में इस समय लाखों रुपये हैं उसका हिसाब किताब दिया जाना चाहिए और वो पैसा ग्राम विकास में खर्च किया जाना चाहिए ।
  4. आदिवासी विरोधी कानूनों में बदलाव  संविधान के अनुच्छेद ६ के अनुसार अगर कोई कानून आदिवासी के हितों के खिलाफ है तो प्रदेश का राज्यपाल अकेले ही उसमें जरूरी सुधार कर सकता है या उस पर रोक लगा सकता है । यह अधिकार सिर्फ आदिवासी क्षेत्र के लिए है । उदाहरण के लिए वन्य कानून १९२७ का वन्य प्राणी कानून १९७२ से आदिवासियों के जंगल पर हक खत्म होते हैं तो राज्यपाल एक आदेश से उस पर रोक लगा सकता है । लेकिन आज तक इस अधिकार का किसी राज्यपाल ने न तो उपयोग किया न किसी पार्टी ने इसकी मांग की ।   समाजवादी जनपरिषद इस बात के लिए लगातार अपना संघर्ष जारी रखेगी कि आदिवासी विरोधी सारे कानूनों में बदलाव किया जाये । इसके लिए राज्यपाल संविधान में दी गई शक्तियों का उपयोग कर यह काम करें और स्थाई हल के लिए संसद और विधानसभाओं के जरिए इन कानूनों में बदलाव किया जाये ।
  5. राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  देश का पर्यावरण भोग विलास भरी जिस जीवन शैली से नष्ट हो रहा है उसे बदलने की बजाए सरकार पर्यावरण बचाने के नाम पर शेर पालने की योजना लाती रहती है । शेर पालने के नाम पर आदिवासियों के गांव के गांव उजाड़े जा रहे हैं । समाजवादी जनपरिषद मानती है कि शेर और आदिवासी जमाने से साथ रहते आ रहे हैं इसके गांव उजा्ड़ने की जरूरत नहीं है और इन योजनाओं से पर्यावरण नहीं बचेगा उसके लिए हमारी विकास नीति बदलना होगा ।

दलितों के सवाल

        दलितों के लिए सबसे बड़ा सवाल छुआछूत मुक्त समाज में बराबरी का स्थान पाना है। आज भी समाज में बड़े पैमाने पर छुआछूत फैली हुई है जो न सिर्फ़ गैर कानूनी है बल्कि मानवता के खिलाफ है । इसके साथ ही दलितों को अपने खोये हुए संसाधन , जमीन आदि पर हक पाना और बदलते समय में रोजगार के सही अवसर पाना है । दलितों के यह सवाल वर्तमान विकास की अंधी दौड़ और उदारीकरण की नीति से हल नहीं होंगे । आज कांग्रेस हो या भाजपा , सभी पर्टियों ने जो आर्थिक नीति अपनाई है उसमें अमीर और अमीर हो रहा है।हमारे जमीन आदि सारे संसाधन कंपनियों के हाथों सौंपे जा रहे हैं । बसपा की मायावती भी उत्तरप्रदेश में यही नीति अपनाये हुए हैं । अब आप दलितों की मुखिया होकर बड़ी पार्टियों जैसी नीतियाँ अपनायेंगी तो दलित सही अर्थों में मुक्त कैसे होगा ।

    समाजवादी जनपरिषद का मानना है कि बाबा साहेब अम्बे्डकर का अधूरा सपना असल रूप में पूरा करना है । इंसान में जात-पांत , धर्म , अमीर,गरीब का भेद समाप्त होना चाहिए। छुआछूत इंसानियत के नाम पर सबसे बड़ा कलंक है । इसे जड़ से मिटाने के लिए तथा कानूनी स्तर पर भी ठोस काम होना चाहिए । व्यापक दलित समाज की आर्थिक स्थिति सुधरे इस दिशा में ठोस नीतिगत बदलाव करने होंगे । वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीति छो्ड़कर  गरीबों के हितों को साधने वाली नीति अपनाना होगी क्योंकि ज्यादातर दलित गरीब है । चूँकि दलितों के परम्परागत रोजगार नहीं रहे उन्हें जमीन दी जाना चाहिए । छोटे-छोटे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाये जिससे दलित भी उद्यमी बन सकें । दलितों से छुड़ाई गई जमीन वापस की जाए । प्रशासनिक सुधार के जरिये दलितों पर अत्याचार के मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही हो ।

[ जारी ]  अगले हिस्से – अल्पसंख्यक , साम्प्रदायिकता

पिछले भाग : एक , दो

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    म.प्र की विकास नीति

    मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार और इसके पूर्व कांग्रेस के शासन में विकास के नाम पर पानी , जंगल , जमीन , जैसे प्राकृतिक सार्वजनिक संसाधनों को कम्पनियों के हवाले करने का काम हुआ । सरकारों ने यह मान लिया कि यह संसाधन आम जनता की सार्वजनिक मालिकी में रहने से विकास नहीं होगा बल्कि विकास तब होगा जब कम्पनियाँ इनका दोहन करेंगी । प्रदेश के किसान , युवा और गरीब जनता काम- व्यवसाय आदि के लिए पूँजी और जमीन मांगती रही लेकिन प्रदेश सरकार इन्वेस्टर्स और एग्री बिजनेस मीट के नाम पर इन संसाधनों को कम्पनियों पर लुटाती रही । रोजगार की तमाम योजनाओं और दावे के बावजूद आदिवासी और दलित भूख और कुपोषण से मर रहे हैं ।

    समाजवादी जनपरिषद यह मानती है कि हमारी विकास नीति जनमुखी होनी चाहिए ना कि धनवान मुखी । मतलब विकास नीति जनता को लाभ पहुँचाने वाली होनी चाहिए ना कि पूँजीपति और कम्पनियों को । श्रम का पूरा पूरा उपयोग होना चाहिए । यह बड़े शर्म की बात है कि प्रदेश की आधी जनता काम की तलाश में यहाँ – वहाँ भटकती रहे , भूख और कुपोषण से पीडित रहे और हम अपने संसाधन कम्पनियों पर लुटायें । ” हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम ” यह हमारी प्राथमिकता है । हर गाँव में अपने छोटे – छोटे बाँध और तालाब बनाये जाँए उस गाँव के बारिश का सारा पानी जमा हो सके । इस पानी से सिंचाई भी हो , तथा मछली पालन आदि हो तथा उसमें गाँव की जरूरत लायक बिजली भी बनाई जाए । सूर्य और पवन उर्जा का उपयोग हो । इस तरह नदी भी बचेगी और किसान की जमीन भी ।

    श्रम का पूरा उपयोग करने के लिए सार्वजनिक जमीन को गाँव की सार्वजनिक मालिकी के आधार पर गाँव को दी जाए । वहाँ पर बड़े पैमाने पर फलदार पौधे लगाए जाँए । जमीन के साथ-साथ पशु पालन पर भी जोर देना होगा । इसलिए हमें गाँवों के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा । गाँव के विकास पर ही शहर का विकास टिका है । हमारे देश की दो तिहाई जनता गाँव में रहती है । हमारे देश में एक तरफ़ गाँवों के लोग तकनीकी लोगों की मदद के लिए तरसते हैं और दूसरी तरफ शहरों में हमारे युवा बेरोजगार भटकते रहते हैं। हमारे शिक्षा संसाधनों को रोजगार और ग्रामोन्मुखी बनाना होगा । हम अन्धे पूँजीवाद का हश्र देख चुके हैं । अगर आजादी के बाद हमने इस विकास नीति को अपनाया होता तो इससे हमारे गाँव और शहर दोनों का सही-सही विकास होता ।

खेती – किसानी को बचाएं 

    पूरे देश की तरह मध्यप्रदेश का किसान भी काफ़ी मुसीबत में है । आधुनिक विकास व औद्योगीकरण में पहले ही गाँव तथा खेती का शोषण तथा दोयम दर्जा नीहित है । फिर वैश्वीकरण की नीतियों ने किसानों का घाटा और बढ़ाया है । प्रदेश के परेशान किसान मुसीबत से उबरने के लिए नई नई फसलें आजमा रहे हैं , किन्तु हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगती है । सोयाबीन में लगातार घाटा हो रहा है , कभी इल्ली से और कभी विदेशों से तेल आयात के कारण कीमतें गिर जाने से इस साल भी सोयाबीन के भाव गिर गये । दो साल पहले किसानों ने बड़े पैमाने पर गन्ने को अपनाया । उसमें भी भारी नुकसान हुआ और समय पर उन्हें उचित दाम दिलवाने में सरकार असफल रही । कपास में भी नीची कीमतों के कारण किसानों को काफ़ी नुकसान हुआ है । पूरी दुनिया में दाम बढ़ने पर भले ही अब केन्द्र ने गेहूँ का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है , और इस चुनावी वर्ष में प्रदेश सरकार ने भी १०० रुपये का बोनस दे दिया है , लेकिन कई सालों तक गेहूँ – धान का समर्थन मूल्य जानबूझकर बहुत कम रखने में केन्द्र की दोनों सरकारें शामिल रहीं हैं । खाद- बीज और बिजली के लिए किसान लगातार परेशान है । फसल नष्ट होने की हालत में फसल बीमा और मुआवजे से कभी उन्हें सही व समय पर राहत नहीं मिल पायी है । प्रशासनिक भ्रष्टाचार का शिकार भी वे ही सबसे ज्यादा बनते हैं । चुनावी वर्ष मे प्रदेश सरकार ने सारे किसानों को मूल बही व खसरे की नकल देने का ऐलान किया था , वह भी आज तक सबको नहीं मिल पाई ।

    प्रदेश के सारे किसान कर्ज में गहरे डूबे हैं । ऐसी हालत में केन्द्र सरकार द्वारा चुनावी वर्ष में कर्ज माफी की आधी – अधूरी घोषणा से उनकी हालत नहीं बदलने वाली है , यदि खेती का घाटा और किसान विरोधी नीतियाँ नहीं बदलती हैं । मध्यप्रदेश की खेती में भी मोनसेन्टो (माहीको ) , बायर , आईटीसी कारगिल जैसी कई विदेशी कम्पनियाँ घुस गयी हैं , जिन्हें सरकार पूरी मदद कर रही है । लेकिन इससे किसानों का भला नहीं होगा । वे कम्पनियों के बँधुआ बनेंगे । जीन मिश्रित बीजों का प्रचलन भी खतरनाक है ।

    समाजवादी जनपरिषद का मानना है कि प्रदेश के किसानों की मुसीबत तभी खतम होगी , जब सरकार की किसान-विरोधी नीतियाँ खतम हो , खेती व किसानी को विकास के केन्द्र में रखा जाए और किसानों को पूरे दाम मिलें । कम्पनियों का प्रवेश बन्द करके किसानों , खेती को बढ़ावा दिया जाए । किसानों को सरकारी दफ़्तरों व कचहरियों के चक्कर लगाने से भी मुक्ति मिलने के उपाय करना होगा । किसानों व गाँव के शोषण पर आज का पूरा ढाँचा टिका है । इसलिए पूरी व्यवस्था एवं विकास नीति को बदलना होगा । यह काम एक क्रांतिकारी राजनीति से ही हो सकता है ।

[ जारी ]

  

   

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घोषणा पत्र क्यों ?

    आमतौर पर पार्टियों के लिए चुनाव घोषणापत्र एक रस्म अदायगी होता है । चुनाव के बाद वे इसे भूल जाती हैं । जो पार्टी सरकार बनाती है , वे अपनी घोषणाओं को लागू करने की कोई जरूरत नहीं समझती है । कई दफ़े वे अपने घोषणा पत्र के खिलाफ़ काम करती हैं । जो पार्टी हार जाती है , वह भी अपने घोषणापत्र के मुद्दों को लेकर आवाज उठाने और संघर्ष करने के बजाय चुपचाप बैठकर पांच साल तक तमाशा देखती है ।

    समाजवादी जनपरिषद यह घोषणापत्र पूरी गंभीरता से मध्य प्रदेश की जनता के सामने पेश कर रही है । इसमें न केवल प्रदेश की मौजूदा खराब हालत के बारे में विश्लेषण है , और मौजूदा सरकारों और पार्टियों की नीतियों पर टिप्पणी है , बल्कि मध्यप्रदेश की जनता की मुक्ति कैसे होगी , मध्यप्रदेश का विकास कैसे होगा , नया मध्यप्रदेश कैसे बनेगा , इस बारे में समाजवादी जनपरिषद की समझ तथा कार्य योजना का यह एक दस्तावेज है । बड़ी पार्टियों द्वारा उछाले गए नकली मुद्दों और नारों को एक तरफ करके जनता के असली मुद्दों को सामने लाने की एक ईमानदार कोशिश है ।

    समाजवादी जनपरिषद जीते या हारे , इस घोषणापत्र में घोषित मुद्दों , नीतियों व घोषणाओं को लेकर वह लगातार विधानसभा के अंदर व बाहर संघर्ष करेगी । यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा , जब तक जनता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने वाले भ्रष्टाचारियों , बेईमानों , लुटेरों का राज खतम नहीं हो जाता और मेहनतकश लोगों की बराबरी एवं हक वाली एक नयी क्रांतिकारी व्यवस्था कायम नहीं हो जाती ।

मध्यप्रदेश के राजनैतिक हालात

    जो हालत भारत की राजनीति की है , वही कमोबेश मध्यप्रदेश की है , बल्कि यहाँ पर पिछले काफी समय दो पार्टियों का एकाधिकार होने से हालत और खराब है । कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों अदल-बदल कर इस प्रदेश पर राज कर रही हैं । दोनों की नीतियों , चरित्र व आचरण में कोई खास फर्क नहीं है । दोनों ने मिलकर प्रदेश की जनता को फुटबॉल बना दिया है । जनता एक से त्रस्त होकर दूसरी पार्टी को सत्ता में लाती है , फिर उनसे परेशान होकर वापस पहली को गद्दी पर बैठाती है । जो पार्टी सरकार में नहीं होती है , वह जनता के मुद्दों और कष्टों को लेकर कोई जोरदार आन्दोलन करने की जरूरत नहीं समझती , बल्कि वह चाहती है कि जनता की परेशानी बढ़े , जिससे उन्हें वापस सत्ता में आने का मौका मिले ।

    कांग्रेस ने सड़क , बिजली , पानी , शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण शुरु किया जिसे भाजपा ने आगे बढ़ाया । मतलब जनता की इन जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने की जवाबदारी सरकार की बजाए निजी कम्पनियों ( सेठों ) की हो गयी ।  यह कम्पनियां यह सुविधायें उन्हीं लोगों को देंगी जो उसका , उनकी तय की गई दरों पर भुगतान कर सकेगा।

    सरकारी स्कूलों में मास्टर और किताबें नहीं हैं । चारों तरफ़ निजी स्कूलों का बोलबाला है । अस्पतालों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, लोग प्रायवेट डॉक्टरों से भरोसे इलाज करा रहे हैं । बात यहीं रुक जाती है ऐसा नहीं है । प्रदेश की लाखों एकड़ जमीन भूमिहीनों को देने के बजाए बड़ी बड़ी कम्पनियों को लम्बी लीज पर दी जा रही है ।

    प्रदेश सरकार की सारी योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं । चाहे वो रोजगार गारंटी योजना हो , या शक्तिमान या जननी सुरक्षा । न तो रोजगार गारंटी में पूरा काम मिल रहा है न मजदूरी । सरकार ने रही सही कसर गरीबी रेखा से लोगों के नाम काटकर पूरी कर दी है ।  प्रदेश में भूख और कुपोषण से बच्चों की मौत का ताण्डव चल रहा है । ” गरीब की थाली नहीं रहेगी खाली” का जो नारा भाजपा ने दिया था वो उलटा हो गया । प्रदेश का किसान खाद , बिजली पानी के साथ-साथ समर्थन मूल्य और समय पर अपनी फसल का भुगतान पाने के लिए भटकता रहा । राजनैतिक विकल्पहीनता और जड़ता की इस हालत को बदलना जरूरी है । समाजवादी जनपरिषद इसके लिए पूरी कोशिश करेगी ।

[ जारी ]

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गत भाग का शेष :

    पाकिस्तान :

    अफ़गानिस्तान में चल रहा युद्ध तब तक जीता नहीं जा सकता जब तक पाकिस्तानी फौज तालिबान से दीर्घ कालीन न्यस्त स्वार्थ बरकरार रखे हुए है । मसला पश्चिमोत्तर सरहदी क्षेत्र (FATA) पर हवाई हमले से उतना हल नही होने वाला जितना इस हक़ीकत में है कि पाकिस्तानी फौज की राजनैतिक आकांक्षाओं को अमेरिका की मौन स्वीकृति हासिल है । मि. ओबामा ने वादा किया है कि वे इस दिशा में कदम उठाएंगे लेकिन उसके पहले उन्हें पेन्टागॉन (अमेरिकी रक्षा मन्त्रालय ) के सांगठनिक स्वार्थों से ऊपर उठना होगा । पेन्टागॉन पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान में निहित स्वार्थ स्थापित किए हुए है ।

    आतंकवाद के खिलाफ़ जंग :

    यातना देने और लम्बे समय तक बन्दी रखने की बुश की नीति को मि. ओबामा द्वारा समाप्त करना, कम-से-कम कागजी तौर पर, सब से आसान है । अगले कदम के तौर पर ओबामा को उन लोगों की आपराधिक जिम्मेदारी तय करना चाहिए जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी कानूनों के उल्लंघन को मंजूरी दी थी ।

    रूस :

    बुश प्रशासन मॉस्को के साथ बरबाद हुए सम्बन्धों की सर्वाधिक क्षयकारी विरासत छोड़ कर जा रहा है । ज्यॉर्जिया – संकट एक गहन बीमारी का ऊपरी लक्षण मात्र है । इस बीमारी की जड़ में अमेरिका द्वारा मजबूत हो रहे रूस को एक फंदे में फँसाने के लिए सोच-समझकर और लगातार डाला गया दबाव है । उसकी यह रणनीति निष्फल हो गयी है। शीत युद्ध को पुनर्जीवित करने के बजाए परस्पर विश्वास पैदा करना नए प्रशासन के लिए प्रमुख चुनौती होगी ।

    हथियारों की होड़ :

    हाँलाकि यह प्रतीत होता है कि अमेरिका मिसाइल रक्षा की गति को पलटने में काफ़ी आगे बढ़ चुका है, परंतु एक ऐसा राष्ट्रपति जो अस्त्र नियंत्रण , अप्रसार और नि:शस्त्रीकरण के प्रति कटिबद्ध होगा वह अस्त्रों और मिसाइलों की फिर शुरु हो चुकी होड़ को रोकने के उपाय निकालेगा । सीटीबीटी के अनुमोदन पर जोर देने के अलावा  मि. ओबामाको किसिंजर आदि द्वारा परमाणु हथियारों के खात्मे के प्रस्ताव पर चलना होगा ।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था और विश्व-लोकहित :

    वित्तीय संकट ने अमेरिका और विश्व को आर्थिक गैरबराबरी और आर्थिक स्थिरता के बीच प्रतिलोमी सम्बन्ध को बेहतर तरीके से समझने का एक अवसर दिया है । मि. ओबामा ने अमेरिकी जनता से एक संतुलित और न्यायपूर्ण पुनर्वितरण का वादा किया है – इसे ही विश्व के स्तर पर लागू करने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता की दिशा में बढ़ा जा सकता है । निर्वाचित राष्ट्रपति ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करने के प्रति भी एक जिम्मेदार रवैय्या अपनाने की प्रतिबद्धता जतायी है । इस आश्वासन को पूरा करने के लिए यदि वे समझदार उर्जा नीति अपनायेंगे तो वह मौसम परिवर्तन का सामना करने के लिए चल रहे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को बल प्रदान करेगा।

   लैटिन अमेरिका :

    बोलिविया , वेनेज़ुएला , इक्वाडोर तथा अम्य लैटिन अमेरिकी मुल्कों की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का विरोध करना बुश प्रशासन का प्रतीक-चिह्न था । मि. ओबामा के लिए ऐतिहासिक मौका है कि वे इस धारा को पलटें । क्यूबा पर लगाए गैर कानूनी प्रतिबन्धों को भी उन्हें समाप्त करना चाहिए तथा अपनी आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था पर फक्र करने वाले इस नन्हें से टापू – राष्ट्र को मान्यता प्रदान करनी चाहिए ।

     इन दस मसलों पर कार्रवाई हेतु अमेरिकी नीति में किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन की जरूरत नहीं है । सिर्फ़ थोड़ी-सी समझदारी , सामान्य बुद्धि तथा बदलाव की इच्छा से यह मुमकिन है । क्या ओबामा यह कर सकेंगे ? अपनी जनता से किए गए वादों को पूरा करने के लिए यह सब करना जरूरी होगा । जैसे ‘ मेन स्ट्रीट की बदहाली के साथ वॉल स्ट्रीट फल-फूल नहीं सकती ‘ । जिस शेष विश्व पर अमेरिका दीप स्तंभ जैसे रौशन होना चाहता है जब तक हिंसाग्रस्त और अन्यायग्रस्त रहेगा तब तक अमेरिका भी आर्थिक संकट से त्रस्त और भयग्रस्त रहेगा ।

लेखक – सिद्धार्थ वरदराजन , एसोशिएट एडिटर , द हिन्दू

तर्जुमा – अफ़लातून.

मूल लेखयहाँ

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क्या ओबामा की जीत अमेरिका में इतना बदलाव ला सकेगी जिसका असर दुनिया पर पड़े ?

    barack-obama-poll-_1106900c यह जॉर्ज बुश के राष्ट्रपतित्व के आठ सालों के दरमियान अमेरिका की छवि और औकात के व्यापक नुकसान का एक पैमाना माना जाएगा जो निर्वाचित राष्ट्रपति ओबामा ने मंगलवार की रात अपने विजय-भाषण का एक छोटा-सा हिस्सा शेष विश्व को अपना पैगाम देने के लिए मुकर्रर किया था । सरहद- साहिल के पार से उस रात देखने वालों से मुख़ातिब हो उन्होंने कहा कि अमेरिकी रहनुमाई की एक नई सुबह हो रही है ।

    अमेरिका के खुद के नागरिकों से करार को नए सिरे स्थापित करने के ओबामा के वादे ने  इस चुनाव में पूरी बाजी उनके हाथ कर दी । पूरी दुनिया के लोगों ने उत्साहपूर्वक उनका साथ दिया , इस उम्मीद के साथ कि वे सैन्यवाद की राह का अन्त करेंगे तथा अमेरिकी विदेश नीति को घेरे राजनय-विरोधी प्रभा-मण्डल को भी समाप्त करेंगे । इलिनॉय के सेनेटर न सिर्फ़ राष्ट्रपति बुश द्वारा इराक पर हमले के शुरुआती आलोचकों में थे बल्कि बुश शासन की अन्य ज्यादतियों , जैसे संदिग्ध आतंकियों को ग्वान्टानामा की काल कोठरियों में लम्बे समय बिना मुकदमा चलाये बन्द रखने एवं यातना देने का भी उन्होंने कड़ा विरोध किया था। इरान के मसले पर बुलन्द और प्रतिकूल स्वर में उन्होंने इस्लामी गणराज्य से बातचीत की वकालत की थी । तेहरान के खिलाफ़ फौजी कार्रवाई के विकल्प को भी ढके तौर पर रखते थे परन्तु इसराइली अपराधों पर उनका हमलावर रुख रहता था । उनकी इन चूकों को दुनिया की जनता नजरअन्दाज करती थी । यह रुख न होता तो अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान उन्हें ‘ न चुने जाने लायक’ करार दे कर खारिज कर कर देता।

    उग्र अंतर्राष्ट्रीय तब्दीलियों के वाहक के रूप में ओबामा की छाप की कल्पना हमेशा कुछ मुशकिल रही है क्योंकि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के साथ ख़याली आकांक्षाएं और उम्मीदें जुट जातीं थीं , बजाए इसके कि अमेरिकी शासन व्यवस्था द्वारा दुनिया के प्रति नया रवैय्या अपनाने का यह कोई गंभीर आकलन होता । अमेरिकी नेतृत्व के प्रकाश-स्तम्भ को यदि जगमगाते रहना है ( ओबामा के अल्फ़ाज़ ) तो निर्वाचित राष्ट्रपति को दस महत्वपूर्ण मसलों पर अमेरिकी नीति को बदल देने में अपनी काबीलियत दिखानी होगी । चूँकि इन्हें लागू करने के लिए अर्थव्यवस्था में किसी मौलिक परिवर्तन की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी इसलिए यह कदम मुमकिन हैं।

    ईरान

    ईरान का परमाणु मसला मिस्टर ओबामा के लिए सबसे गंभीर चुनौती होगा । यह सबसे गम्भीर चुनौती इसलिए नहीं है कि ईरान ने परमाणु अस्त्र बना लिए हों – अब तक इसके कोई प्रमाण नहीं हैं । बल्कि बुश प्रशासन द्वारा इस मसले पर दुनिया को मुठभेड़ की दिशा में आहिस्ता आहिस्ता धकेलने की प्रक्रिया को उलटने का कोई तरीका निकालना होगा। राष्ट्रपति ओबामा को ईरान के साथ द्विपक्षीय बातचीत शुरु करनी होगी , परमाणु मुद्दे और अन्य सभी मुद्दों पर पुराने चले आ रहे क्षेत्रीय विवादों के समाधान की दिशा में एक ‘बेहतर सौदा’ तय करना होगा ।

    इसराईल

    यहूदी राष्ट्रवाद के हक में जोरदार समर्थन प्रकट करने के बावजू्द रा्ष्ट्रपति ओबामा को टेल अविव के प्रति वाशिंगटन की घातक आसक्ति से विरत रहना होगा जब फिलीस्तीनियों पर अन्यायपूर्ण अन्तिम समाधान थोपने के लिए इसराईल फिलीस्तीनी वसाहतों को उजाड़ने में लगा है ।

    इराक

    अमेरिका द्वारा इराक पर ढाए गए नुकसान को दुरुस्त करने के लिए कम-से-कम अमेरिकी फौज की समयबद्ध वापिसी तथा इस बात का पक्का आश्वासन देना होगा कि एक निश्चित तारीख के बाद इराक में अमेरिका की फौजी मौजूदगी किसी भी रूप में नहीं रहेगी । इसके अलावा राष्ट्रपति ओबामा को इराक के पड़ोसी देशों का एक सम्मेलन बुलाना चाहिए जिसमें ईरान और सीरिया जैसे मुल्क शरीक हों जो जंग से तहस-नहस इराक को फिर अपने पाँवों पर खड़ा होने में सहयोग दें तथा बुनियादी ढाँचे को कायम करने के लिए आर्थिक मदद मुहैय्या की जाए ।

   अफ़गानिस्तान

    फौजी कार्रवाई की जो कल्पना मि. ओबामा के मन में उमड़ रही है उससे करजई की हुकूमत को सिर्फ़ वक़्ती राहत मिल सकती है । यदि बेतहाशा ताकत का इस्तेमाल जारी रहा तो मुमकिन है हालात और भी बिगड़ जांए ।यदि तालिबानी बगावत का हल खोजना है तब हमें अफगानी अगुवाई में प्रत्यातंकी ( counter insurgency ) कार्रवाई पर नए सिरे से जोर देने तथा ईरान , रूस , भारत और चीन की शिरकत से एक क्षेत्रीय हल अपनाना होगा ।

[ जारी , अगली किश्त समाप्य ]

लेखक की इजाजत से, तर्जुमा – अफ़लातून , मूल लेख 

   

   

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