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Archive for नवम्बर 15th, 2008

    म.प्र की विकास नीति

    मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार और इसके पूर्व कांग्रेस के शासन में विकास के नाम पर पानी , जंगल , जमीन , जैसे प्राकृतिक सार्वजनिक संसाधनों को कम्पनियों के हवाले करने का काम हुआ । सरकारों ने यह मान लिया कि यह संसाधन आम जनता की सार्वजनिक मालिकी में रहने से विकास नहीं होगा बल्कि विकास तब होगा जब कम्पनियाँ इनका दोहन करेंगी । प्रदेश के किसान , युवा और गरीब जनता काम- व्यवसाय आदि के लिए पूँजी और जमीन मांगती रही लेकिन प्रदेश सरकार इन्वेस्टर्स और एग्री बिजनेस मीट के नाम पर इन संसाधनों को कम्पनियों पर लुटाती रही । रोजगार की तमाम योजनाओं और दावे के बावजूद आदिवासी और दलित भूख और कुपोषण से मर रहे हैं ।

    समाजवादी जनपरिषद यह मानती है कि हमारी विकास नीति जनमुखी होनी चाहिए ना कि धनवान मुखी । मतलब विकास नीति जनता को लाभ पहुँचाने वाली होनी चाहिए ना कि पूँजीपति और कम्पनियों को । श्रम का पूरा पूरा उपयोग होना चाहिए । यह बड़े शर्म की बात है कि प्रदेश की आधी जनता काम की तलाश में यहाँ – वहाँ भटकती रहे , भूख और कुपोषण से पीडित रहे और हम अपने संसाधन कम्पनियों पर लुटायें । ” हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम ” यह हमारी प्राथमिकता है । हर गाँव में अपने छोटे – छोटे बाँध और तालाब बनाये जाँए उस गाँव के बारिश का सारा पानी जमा हो सके । इस पानी से सिंचाई भी हो , तथा मछली पालन आदि हो तथा उसमें गाँव की जरूरत लायक बिजली भी बनाई जाए । सूर्य और पवन उर्जा का उपयोग हो । इस तरह नदी भी बचेगी और किसान की जमीन भी ।

    श्रम का पूरा उपयोग करने के लिए सार्वजनिक जमीन को गाँव की सार्वजनिक मालिकी के आधार पर गाँव को दी जाए । वहाँ पर बड़े पैमाने पर फलदार पौधे लगाए जाँए । जमीन के साथ-साथ पशु पालन पर भी जोर देना होगा । इसलिए हमें गाँवों के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा । गाँव के विकास पर ही शहर का विकास टिका है । हमारे देश की दो तिहाई जनता गाँव में रहती है । हमारे देश में एक तरफ़ गाँवों के लोग तकनीकी लोगों की मदद के लिए तरसते हैं और दूसरी तरफ शहरों में हमारे युवा बेरोजगार भटकते रहते हैं। हमारे शिक्षा संसाधनों को रोजगार और ग्रामोन्मुखी बनाना होगा । हम अन्धे पूँजीवाद का हश्र देख चुके हैं । अगर आजादी के बाद हमने इस विकास नीति को अपनाया होता तो इससे हमारे गाँव और शहर दोनों का सही-सही विकास होता ।

खेती – किसानी को बचाएं 

    पूरे देश की तरह मध्यप्रदेश का किसान भी काफ़ी मुसीबत में है । आधुनिक विकास व औद्योगीकरण में पहले ही गाँव तथा खेती का शोषण तथा दोयम दर्जा नीहित है । फिर वैश्वीकरण की नीतियों ने किसानों का घाटा और बढ़ाया है । प्रदेश के परेशान किसान मुसीबत से उबरने के लिए नई नई फसलें आजमा रहे हैं , किन्तु हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगती है । सोयाबीन में लगातार घाटा हो रहा है , कभी इल्ली से और कभी विदेशों से तेल आयात के कारण कीमतें गिर जाने से इस साल भी सोयाबीन के भाव गिर गये । दो साल पहले किसानों ने बड़े पैमाने पर गन्ने को अपनाया । उसमें भी भारी नुकसान हुआ और समय पर उन्हें उचित दाम दिलवाने में सरकार असफल रही । कपास में भी नीची कीमतों के कारण किसानों को काफ़ी नुकसान हुआ है । पूरी दुनिया में दाम बढ़ने पर भले ही अब केन्द्र ने गेहूँ का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है , और इस चुनावी वर्ष में प्रदेश सरकार ने भी १०० रुपये का बोनस दे दिया है , लेकिन कई सालों तक गेहूँ – धान का समर्थन मूल्य जानबूझकर बहुत कम रखने में केन्द्र की दोनों सरकारें शामिल रहीं हैं । खाद- बीज और बिजली के लिए किसान लगातार परेशान है । फसल नष्ट होने की हालत में फसल बीमा और मुआवजे से कभी उन्हें सही व समय पर राहत नहीं मिल पायी है । प्रशासनिक भ्रष्टाचार का शिकार भी वे ही सबसे ज्यादा बनते हैं । चुनावी वर्ष मे प्रदेश सरकार ने सारे किसानों को मूल बही व खसरे की नकल देने का ऐलान किया था , वह भी आज तक सबको नहीं मिल पाई ।

    प्रदेश के सारे किसान कर्ज में गहरे डूबे हैं । ऐसी हालत में केन्द्र सरकार द्वारा चुनावी वर्ष में कर्ज माफी की आधी – अधूरी घोषणा से उनकी हालत नहीं बदलने वाली है , यदि खेती का घाटा और किसान विरोधी नीतियाँ नहीं बदलती हैं । मध्यप्रदेश की खेती में भी मोनसेन्टो (माहीको ) , बायर , आईटीसी कारगिल जैसी कई विदेशी कम्पनियाँ घुस गयी हैं , जिन्हें सरकार पूरी मदद कर रही है । लेकिन इससे किसानों का भला नहीं होगा । वे कम्पनियों के बँधुआ बनेंगे । जीन मिश्रित बीजों का प्रचलन भी खतरनाक है ।

    समाजवादी जनपरिषद का मानना है कि प्रदेश के किसानों की मुसीबत तभी खतम होगी , जब सरकार की किसान-विरोधी नीतियाँ खतम हो , खेती व किसानी को विकास के केन्द्र में रखा जाए और किसानों को पूरे दाम मिलें । कम्पनियों का प्रवेश बन्द करके किसानों , खेती को बढ़ावा दिया जाए । किसानों को सरकारी दफ़्तरों व कचहरियों के चक्कर लगाने से भी मुक्ति मिलने के उपाय करना होगा । किसानों व गाँव के शोषण पर आज का पूरा ढाँचा टिका है । इसलिए पूरी व्यवस्था एवं विकास नीति को बदलना होगा । यह काम एक क्रांतिकारी राजनीति से ही हो सकता है ।

[ जारी ]

  

   

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