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Archive for नवम्बर 17th, 2008

अल्पसंख्यक

    देश का अल्पसंख्यक समुदाय कांग्रेस और भाजपा की राजनीति का शिकार है । इन पार्टियों के रवैये से न सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय दहशत में है बल्कि पूरे देश में एक भय का महौल है । अल्पसंख्यकों की सारी राजनैतिक उर्जा अपने आपको बचाने में लग जाती है। आज तक अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे लेकिन उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन का कभी अध्ययन नहीं किया गया ।

     समाजवादी जनपरिषद मानती है कि हर तरह के भेदभाव खत्म होने से ही इस समस्या का हल निकलेगा । इसके साथ ही अल्पसंख्यकों को देश में एक क्रांतिकारी राजनीति की धारा को अपनाना होगा । जाति धर्म के नाम पर बांटने वाली राजनीति को नकारना होगा । अल्पसंख्यक समुदाय में शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े जिससे वो आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे आ पाएं ऐसे इंतजामात करने होंगे ।

साम्प्रदायिकता

    हमा्रा देश  इस समय साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रीयता के जहर से ग्रसित है । कहीं हिन्दू – मुस्लिम के नाम पर , तो कहीं हिन्दू – ईसाई के नाम पर , कहीं आदिवासी और बांग्लादेशी के नाम पर तो कहीं मराठी और हिन्दी भाषी के नाम पर दंगे हो रहे हैं । प्रदेश में चुनाव के ऐन पहले बुरहानपुर शहर में अचानक दंगे होने से दोनों बड़ी पार्टियों को फायदा होगा । दोनों पार्टियों की तरफ वोटों का ध्रुवीकरण होगा ।

    असल में अंग्रेज साम्प्रदायिकता का जो जहर घोल कर गये थे उसे हमारे शासक वर्ग ने न सिर्फ आज तक पोषित किया बल्कि उसमें और इजाफा किया । लोगों को धर्म में बांटकर यह अपन उल्लू सीधा करते रहे । इसमें एक नया इजाफा हिंदू – ईसाई दंगे और मुंबई से उत्तर भारतीयों को भगाने के रूप में हुआ । न तो साठ साल में कांग्रेस मुसलमानों का ही भला कर पाई और न भाजपा हिन्दुओं का । न तो हिन्दुओं में छुआछूत मिटी न आम हिन्दू के दुख दर्द दूर हुए और ना मुसलमान सही शिक्षा और रोजगार का हकदार बन पाए । मुसलमानों की स्थिति का आकलन करने के लिए सच्चर समिति बनाने में कांग्रेस को साठ साल लग गए । समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों ने तो वोट की राजनीति के चलते कट्टरता को बढ़ावा भर दिया ।

    समाजवादी जनपरिषद यह मानती है कि देश का विकास एक जाति को , धर्म विशेष को अलग रखकर नहीं हो सकता । यह सब जाति और धर्म हमारे शरीर के अलग – अलग अंग हैं  आप शरीर के किसी एक अंग को आगे बढ़ाकर संपूर्ण शरीर का विकास नहीं कर सकते । अगर हम व्यवहार में देखें तो हमारी जरूरतें , हमारे धंधे आपस में जुड़े हुए सिर्फ इतना ही नहीं हमारी दोस्ती हमारी गंगा जमुनी संस्कृति से जुड़ी है । हमें साम्प्रदायिकता को खत्म करने के लिए उसे पैदा करने वाली राजनीति के चरित्र को बदलना होगा । हमें ईमानदार क्रांतिकारी राजनीति की शुरुआत करनी होगी । साम्प्रदायिकता फैलाने वाली पार्टियों को नकारना होगा क्योंकि इसके बिना हमारे साम्प्रदायिक सौहार्द के सारे प्रयास धीरे धीरे बेमानी हो जाएंगे । देश की अधिकांश जनता अमन और शांति चाहती है । लेकिन दंगे फैलाने वाले मुट्ठी भर लोग खुले आम सड़कों पर तबाही मचाते घूमते हैं और उसे नकारने वाले अमन पसंद घर में बैठे रहते हैं । इसे बदलना होगा , दंगे-पसन्दों को उनकी जगह दिखानी होगी ।

    इसके साथ ही प्रशासनिक और कानूनी सुधार करना होगा । दंगे के समय तमाशबीन बनने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो । हमारा प्रशासन और पुलिस सांप्रदायिकता से मुक्त हो । सबसे बड़ी बात उनके राजनैतिक उपभोग पर रोकथाम लगे । हमारी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव आयें । हम शिक्षा के जरिए धर्म के उदार पक्ष और सूफी संतों की वाणियों को बढ़ावा दें ।

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