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Archive for दिसम्बर, 2008

 भारतीय बुद्धिजीवियों का विदेश-प्रेम [   पिछले भाग से आगे ] : इसके अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं ।साठ के दशक में डॉ. रिछारिया जैसे प्रखर कृषि वैज्ञानिक की चेतावनी को नजरंदाज करके हमने रासायनिक खेती वाली हरित क्रांति को अपनाया , जिसके दुष्परिणाम आज हम भोग रहे हैं और वापस जैविक खेती की बात करने लगे हैं।

    इस दोषपूर्ण तकनालाजी को अपनाने में भारत के कृषि वैज्ञानिकों व नीति निर्माताओं पर विश्व बैंक , अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान , फोर्ड फाउन्डेशन , रॉकफेलर फाउन्डेशन जैसी संस्थाओं के प्रभाव एवं शिकंजे का बड़ा योगदान था । हमारे वैज्ञानिक और हमारी सरकार देश की उर्जा जरूरतों के लिए कोयला , पेट्रोल , पनबिजली , व परमाणु बिजली पर ही पूरी तरह निर्भरता बढ़ाते रहे  हैं । उर्जा के पारंपरिक एवं नवीनीकरण योग्य स्रोतों के संरक्षण एवं विकास पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया , इसके पीछे भी पश्चिमी अमीर देशों की नकल की प्रवृत्ति ही रही है । अमरीका – यूरोप ठण्डे मुल्क हैं , जहाँ वर्ष के ज्यादातर दिनों में सूरज की गरमी कम ही पहुंचती है । लेकिन सूरज की भरपूर रोशनी व गरमी पाने वाले भारत ने सौर- उर्जा की उपेक्षा क्यों की , इस सवाल का जवाब भी इस प्रवृत्ति में मिलेगा ।

    नब्बे के दशक में वैश्वीकरण , उदारीकरण , निजीकरण , विनियंत्रण व मुक्त व्यापार की आत्मघाती नीतियों को भी जब भारत ने अपनाया , तो उनके समर्थन में अर्थशास्त्रियों व अफसरों की एक फौज को पहले ही इसी तरीके से तैयार किया जा चुका था । विश्व बैंक , अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ,एशियाई विकास बैंक , पश्चिमी विश्वविद्यालय और अंतरराष्ट्रीय दानदाता संस्थाओं ने भारत के अनेक अर्थशास्त्रियों , प्रोफेसरों , अफसरों आदि को लगातार अपने यहाँ ऊँचे वेतन पर नौकरी देकर , प्रोजेक्ट देकर , गोष्ठियों – सम्मेलनों में बुलाकर अपने वश में कर लिया था और उनके दिल – दिमाग को अपने अधीन कर लिया था । अब स्वयं अमरीका – यूरोप में भीषण मंदी के बाद इन नीतियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं , तो ये लोग बगले झाँक रहे हैं । ashourie    -Manmohansingh04052007

    इस वैचारिक गुलामी और नकल की प्रवृत्ति में बड़ी भूमिका अंग्रेजी भाषा की भी है । अंग्रेजी का वर्चस्व महज भाषा का मामला नहीं है। यह उच्च वर्ग के वर्चस्व और विशेषकाधिकारों को बनाए रखने का माध्यम तो है ही । लेकिन सबसे बड़ा नुकसान तो यह हुआ है कि हमारा शास्त्र , शिक्षण , अनुसंधान , बौद्धिक विमर्श सबमें विदेशी विचार ही हावी होते रहे हैं और मौलिक चिंतन – अनुसंधान नहीं के बराबर हो रहा है । भारत के अनेक पढ़े – लिखे लोग अंधविश्वास की हद तक अंग्रेजी के भक्त हैं । बहुत लोग यह मानते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति , अनुसंधान ,अंतरराष्ट्रीय संवाद , अंतरराष्ट्रीय व्यापार आदि अंग्रेजी और सिर्फ अंग्रेजी में ही हो सकता है । जापान के इस वैज्ञानिक के बारे में कोई उन्हें बताएगा क्या ? क्या कोई उन्हें यह भी बताएगा कि जो देश अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं या जहाँ अंग्रेज बड़ी संख्या में बसे हैं , उन्हें छोड़कर कहीं भी अंग्रेजी में शिक्षण , प्रशासन , अनुसंधान एवं विमर्श नहीं होता है? दुनिया का कोई भी देश विदेशी भाषा को पनाकर – लादकर प्रगति नहीं कर पाया है ।Montekahuwalia

    कहने का मतलब यह नहीं है कि भारत को अपने दरवाजे बंद कर लेना चाहिए या वैचारिक – वैज्ञानिक विनिमय नहीं करना चाहिए । लेकिन यह लेनदेन एकतरफ़ा , गैरबराबर और असंतुलित नहीं होना चाहिए । इससे हम क्या हासिल कर रहे हैं , यह भी देखना होगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि कहीं हम वैचारिक – सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के शिकार तो नहीं बन रहे हैं ? हमारे बुद्धिजीवियों के ये पासपोर्ट कहीं बौद्धिक गुलामी और वैचारिक दिवालियापन के माध्यम तो नहीं बने हुए हैं ?

सुनील ( लेखक समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनका ई-पता sjpsunil@gmail.com है )

    डाक का पता : समाजवादी जनपरिषद ,ग्राम + पोस्ट-केसला,वाया-इटारसी ,जिला-होशंगाबाद (म.प्र.) ४६११११

फोन ०९४२५०४०४५२ .

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[ लेखक सुनील समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उनका ई-ठिकाना sjpsunil@gmail.com है । ]

    एक छोटी-सी खबर पर मेरी नजर अटक गई । खबर का शीर्षक था – ‘ पासपोर्ट तक नहीं है नोबेल विजेता के पास ‘ । इसमें बताया गया था कि भौतिकी में शोध के लिए वर्ष २००८ का साझा नोबेल पुरस्कार जीतने वाले जापान के वैज्ञानिक तोशिहिदे मस्कावा बेहद सादगीपसंद और अपने काम में ही व्यस्त रहने वाले इंसान हैं । उन्हें विदेश यात्रा पसंद नहीं है और उनके पास पासपोर्ट तक नहीं है । नोबेल पुरस्कार ग्रहण करने के लिए स्टाकहोम के समारोह में जाने के पहले उन्हें पासपोर्ट हासिल करने के लिए आवेदन करना होगा । वे अंग्रेजी भी ठीक से नहीं बोल पाते हैं तथा अंग्रेजी बोलते हुए खुद को असहज महसूस करते हैं ।

maskawa [ चित्र : क्योटो विश्वविद्यालय]  तोशिहिदे मस्कावा

    मेरा मन तत्काल इसकी तुलना भारत के वैज्ञानिकों , विशेषज्ञों , प्रोफेसरों आदि से करने लगा । भारत के लगभग हर विषय के बड़े विद्वान तो विदेश जाते ही रहते हैं । अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों , सम्मेलनों व कार्यशालाओं में उनका आना-जाना लगा रहता है । कह सकते हैं कि उनका एक पैर विदेश में ही रहता है । उनके कई शोध-प्रोजेक्ट विदेशी – अनुदान से ही चलते हैं  , उसके सिलसिले में भी उन्हें जाना पड़ता है । इस प्रक्रिया में कई लोग वहीं बस जाते हैं । यदि लौटकर आते हैं , तो ‘फ़ोरेन रिटर्न्ड’ के रूप में प्रतिष्ठा पाते हैं । विदेशी संस्थानों के फेलो , ‘एफ़ आर सी एस ‘ जैसी उपाधियाँ भी वे बड़े गर्व से लगाते हैं ।

    कुल मिलाकर , भारत के बड़े विद्वानों , वैज्ञानिकों , समाज – विज्ञानियों आदि के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि उनमें से किसी के पास विदेश जाने का पासपोर्ट तक न हो । छोटे शहरों व कस्बों के प्राध्यापक , शोधकर्ता , अफसर भी विदेश जाने को लालायित रहते हैं । उनमें से किसी को अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का निमंत्रण मिले , तो इस समाचार को फोटो सहित अखबारों में छापा जाता है ।

    भारतीय बुद्धिजीवियों का यह विदेश – प्रेम इतना आम , इतना स्वीकार्य और सर्वमान्य हो गया है कि इसकी उपयोगिता , प्रासंगिकता , जरूरत और इसके औचित्य पर बहुत कम सवाल उठाये जाते हैं । लेकिन इन विदेश – यात्राओं के बारे में कुछ बातें गौरतलब हैं ।

    पहली सच्चाई तो यह है कि इनमें से ९० फीसदी यात्राएं सम्युक्त राज्य अमेरिका , कनाडा , यूरोप , आस्ट्रेलिया , जापान जैसे अमीर पूंजीवादी मुल्कों के लिए ही होती है । यह ठीक है कि हमें कूपमंडूक नहीं बनना है और दुनिया के साथ हमारा वैचारिक , वैज्ञानिक , शैक्षणिक आदान-प्रदान चलते रहना चाहिए । लेकिन हमारी यह ‘दुनिया’ सिर्फ गोरी चमड़ी वाले इन थोड़े-से देशों तक क्यों सीमित हो जाती है ?  एशिया , अफ़्रीका व लातीनी अमेरिका के विशाल भूभागों में जहाँ दुनिया की ८० फीसदी आबादी रहती है और जहाँ की दशाएं हमसे ज्यादा मिलती हैं , वहाँ हमारे बुद्धिजीवी और विद्वान क्यों नहीं जाते ?

    इसका जवाब भी बहुत सीधा है । दरअसल इन विदेश यात्राओं और सेमिनारों – सम्मेलनों के लिए धन इन्हीं गोरे अमीर देशों से आता है । यही नहीं , शोध व अनुसंधान की ज्यादातर योजनाओं की धनराशि का स्रोत भी ये ही देश होते हैं । उनका एक डॉलर भारत के पचास रुपये का होता है । गरीब देशों के बुद्धिजीवी एवं वैज्ञानिक इन्हीं डॉलरों , पाउन्डों ,मार्कों , येनों की ताकत से आकर्षित कर लिये जाते हैं । गरीब देशों से प्रतिभा पलायन भी इनकी ही ताकत से होता है । प्रतिभाओं का जन्म तो गरीब देशों में होता है , लालन – पालन वहीं होता है , शिक्षा – दीक्षा भी वहीं होती है , लेकिन जब देश या समाज के लिए कुछ करने की उम्र होती है , तो वे अमीर देशों में चली जाती हैं । उनकी सेवाएं अमीर देशों को मिलती हैं । उन्हीं की प्रगति में उनका योगदान होता है । इस प्रतिभा पलायन के दुष्चक्र के चलते गरीब देश गरीब और पिछड़े बने रहते हैं ।

   लेकिन जो प्रोफेसर , वैज्ञानिक व शोधकर्ता अपने देशों में रहते हैं , इन विदेश – यात्राओं की बदौलत , और शोध – अनुसंधा-अध्ययन की विदेशी फन्डिंग के चलते , वे भी बहुधा विदेशों से ही नियंत्रित – निर्देशित तथा परिचालित – प्रेरित रहते हैं । उनकी दिशा और उनका एजेण्डा बहुत हद तक विदेशों से ही तय होता है । इसके चलते हमारे शिक्षण , शोध , अनुसंधान , प्रशान और नीतियों में एक पश्चिमी प्रभाव एवं पूर्वाग्रह आ जाता है । अपने देश की परिस्थितियों , प्राथमिकताओं एवं जरूरत के मुताबिक मौलिक बौद्धिक कार्य हमारे देश में नहीं हो पा रहा है , इसका संभत: यह एक प्रमुख कारण है ।

[ जारी ]

विषय से सम्बन्धित अन्य लेख :

बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख़्त – ले. अफ़लातून , भाग -२

 

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अयोध्या , १९९२

हे राम ,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकव्य !

                    तुम्हारे बस की नहीं

                     उस अविवेक पर विजय

                      जिसके दस बीस नहीं

                      अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं

                       और विवेक भी अब

                        न जाने किसके साथ है ।

 

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाग्य

एक विवादित स्थल में सिमट कर

रह गया तुम्हारा साम्राज्य

 

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है ,

‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

चुनाव का डंका है !

 

हे राम , कहाँ यह समय

       कहाँ तुम्हारा त्रेता युग ,

         कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

                   और कहाँ यह नेता – युग !

 

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुराण – किसी धर्मग्रंथ में

             सकुशल सपत्नीक….

अब के जंगल वो जंगल नहीं

          जिनमें घूमा करते थे बाल्मीक !

– कुँवरनारायण

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