Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for फ़रवरी, 2009


साभार : NDTV , Youtube.

शमीम की गिरफ्तारी पर मेरी रपट पढ़ें ।

Read Full Post »

श्रेय

पत्थर अगर तेरहवें प्रहार में टूटा

तो इसलिए टूटा

कि उस पर बारह प्रहार हो चुके थे

 

तेरहवां प्रहार करने वाले को मिला

पत्थर तोड़ने का सारा श्रेय

 

कौन जानता है

बाकी बारह प्रहार किसने किए थे ।

 

चिड़िया की आंख

शुरु से कहा जाता है

सिर्फ चिड़िया की आंख देखो

उसके अलावा कुछ भी नहीं

तभी तुम भेद सकोगे अपना लक्ष्य

 

सबके सब लक्ष्य भेदना चाहते हैं

इसलिए वे चिड़िया की आंख के सिवा

बाकी हर चीज के प्रति

अंधे होना सीख रहे हैं

 

इस लक्ष्यवादिता से मुझे डर लगता है

मैं चाहता हूं

लोगों को ज्यादा से ज्यादा चीजें दिखाई दें ।

– राजेन्द्र राजन

कवि राजेन्द्र राजन की कुछ अन्य ताजा प्रकाशित कवितायें :

पेड़   ,  जहां चुक जाते हैं शब्द  ,  शब्द बदल जाएं तो भी  , पश्चातापछूटा हुआ रास्ता बामियान में बुद्ध  ,

Read Full Post »

  मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराजसिंह चौहान ने केन्द्र सरकार द्वारा बिजली पैदा करने के लिए जरूरी कोयले की आपूर्ति न किए जाने के विरुद्ध अपने प्रतिकार-कार्यक्रम को ‘कोयला सत्याग्रह’ कहा है । गांधी द्वारा इस औजार के प्रयोग की शताब्दी पूरी होने के बाद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा ‘प्रात: स्मरणीयों’ में गांधी को शुमार किए जाने के करीब ३५ वर्षों बाद भाजपा के इस युवा मुख्यमन्त्री ने मालूम नहीं कितनी शिद्दत से गांधी को याद किया होगा ? यह गौरतलब है कि इस विचारधारा वाले इस प्रात: स्मरणीय की हत्या नहीं ‘वध’ का वर्णन करते हैं ।

     विधानसभा चुनाव में हाल ही में जनता ने शिवराजसिंह चौहान को साफ़ बहुमत दिया है । बहैसियत सूबे के मुख्यमन्त्री उन्होंने हम्मालों और मजदूरों की पंचायत भी आयोजित की । इनके ‘सत्याग्रहों’ और ‘पंचायतों’ से मुझे ‘७४ के दौर में बिहार के तत्कालीन मुख्यमन्त्री अब्दुल गफ़ूर के समर्थन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित भाड़े की रैलियों की याद आती है । एक तरफ़ सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के मद्दे नजर राज्य सरकार द्वारा बस , स्टीमर बन्द किए जाने के बावजूद पूरे बिहार से लाखों की तादाद में छात्र-युवा-मजदूर-किसान कई किलोमीटर चौड़ी हुई पटना की गंगाजी को केले के तनों से बने बेडों पर बैठ कर पार कर जयप्रकाश की रैलियों में पहुँचते थे वहीं राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित भाकपा अथवा इन्दिरा ब्रिगेड के जनविहीन प्रदर्शनों में गुलाब जल और शरबत की व्यवस्था रहती थी ।

    यह वही दौर था जब नागार्जुन बाबा ने लिखा , ‘ अख़्तर हुसैन बन्द है पटना की जेल में , अब्दुल गफ़ूर मस्त है सत्ता के खेल में ‘। अख़्तर हुसैन छात्र-युवा-संघर्ष-समिति तथा लोहिया विचार मंच से जुड़े हमारे साथी थे और पुलिस की बर्बर पिटाई के बाद उनकी गिरफ़्तारी हुई थी ।

    पिछले एक पखवारे से दो साल पुराने निहायत फर्जी मुकदमों के तहत हरदा और होशंगाबाद जेलों में निरुद्ध समाजवादी जनपरिषद की प्रान्तीय उपाध्यक्ष साथी शमीम मोदी की गिरफ़्तारी के विरुद्ध दल द्वारा भोपाल में आयोजित प्रदर्शन में भाग लेने जब मैं भोपाल पहुँचा तब लगातार नागार्जुन बाबा की उक्त पंक्तियाँ दिमाग में कौंधती रहीं । अपनी नेता की रिहाई करने वाले जो आदिवासी , किसान , मजदूर और हम्माल वहाँ जुटे थे वे इस प्रान्त के सबसे कमजोर तबके के प्रतिनिधी थे । तम्बाकू से भरी अपनी चिलम को दगाने के लिए जो दियासलाई नहीं खरीदते हैं – चकमक पत्थर और सेमर की रूई का प्रयोग करते हैं । पूरा दिन पैदल चल कर अपने गाँव से रेलवे स्टेशन तक पहुँची महिलाएँ और न्यूनतम मजदूरी और काम के घण्टों को तय करने के लिए श्रम कानूनों को लागू करवाने की माँग कर रहे हम्माल और आरा मशीनों के मजदूर ।

जेल में जब तक चना रहेगा,आना-जाना बना रहेगा

जेल में जब तक चना रहेगा,आना-जाना बना रहेगा

 

 

 

 

 

 

 

 

गुलामी की कड़ी तोड़ो,तड़ातड़ हथकड़ी तोड़ो

गुलामी की कड़ी तोड़ो,तड़ातड़ हथकड़ी तोड़ो

फूलमती के अपहरण का फर्जी आरोप !

फूलमती के अपहरण का फर्जी आरोप !

९ फरवरी २००९ को हरदा के चन्द उद्योगपतियों और व्यापारियों ने जिला प्रशासन को ४८ घण्टे का अल्टीमेटम दे कर अनुराग और शमीम मोदी के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की थी । हम्मालों के लिए श्रम कानून लागू करने के बजाए शान्तिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से इसकी माँग करने वालों को २४ घण्टे बाद    जेल में बन्द कर दिया गया  ।
    शिवराजसिंह को ‘सत्याग्रह’ पसंद आया है । गाँधी से काफ़ी पहले हेनरी डेविड थोरो ने कहा था कि जिस राज्य में चहुँ ओर अन्याय व्याप्त हो वहाँ हर न्यायप्रिय व्यक्ति के लिए सर्वाधिक न्यायपूर्ण स्थान जेल ही हो सकती है। मुख्यमन्त्री के ‘सरकारी सत्याग्रह’ में पूरी राजधानी उठ कर बैतूल जिले के पाथाखेड़ा पहुँच गयी थी । सरकारी अफ़सरों की फौज ‘सत्याग्रहियों’ की सेवा में जुटी हुई थी । अब्दुल गफ़ूर के समर्थन में भाकपा की रैलियों की भांति ।
    शमीम पर अपहरण , हत्या के इरादे से मारपीट , घातक हथियारों से हमला , जान से मारने की धमकी और डकैती जैसी गंभीर आपराधिक धाराएं लगायी गयी हैं। हमारा अ-सरकारी सत्याग्रह इसलिए असरकारी हो गया था कि तथाकथित आरोपों की शिकार फूलमती भी आन्दोलन में शामिल थी । सूबे के गृह मन्त्री के समक्ष भी उसने वस्तुस्थिति का बयान किया ।
  शमीम पर लगाये गये प्रकरणों की बाबत निम्न तथ्य गौरतलब हैं :
  1. म.प्र उच्च न्यायालय के मुख्य न्या्याधीश श्री ए.के पटनायक ने ३० जुलाई २००७ को अपने सामने शमीम द्वारा कथित तौर पर अपहृत महिलाओं के बयान लिए,जिसमें उन्होंने रेंजर के अत्याचारों की बाबत स्पष्ट बताया । उच्च न्यायालय के निर्देश पर उनका मेडिकल परीक्षण एवं इलाज कराया गया ।
  2. दो दिन पहले की घटना में जिन आदिवासियों को भड़काने का आरोप शमीम पर लगाया गया है , दो दिन बाद उन्हीं आदिवासियों का अपहरण वे कैसे कर सकती हैं ? अपहृत व्यक्तियों अथवा उनके स्वजनों द्वारा कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई गई है ।
  3. उच्च न्यायालय द्वारा उक्त गाँव में रेंजर द्वारा अपनी बन्दूक से गोली चलाने की पुष्टि सागर की फोरेन्सिक प्रयोगशाला में हुई है ।
     दरअसल २००३ में शमीम ने जबलपुर उच्च न्यायालय में बैतूल के वनक्षेत्रों में अवैध उत्खनन , आदिवासियों के घरों में आग लगाने के मामले दायर किए थे और खुद पैरवी की थी । माननीय उच्च न्यायालय ने इनमें जाँच , कार्रवाई ,मुआवजे और भर्त्सना के महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं ।
    समाजवादी जनपरिषद ‘वोट’ ( संसदीय लोकतंत्र ) , ‘फावड़ा’ ( रचनात्मक कार्यक्रम ) तथा ‘जेल’ (सिविल नाफरमानी द्वारा संघर्ष ) – डॉ. लोहिया के बताये इन त्रिविध उपायों में न सिर्फ यकीन रखती है अपितु उन्हें अपनी राजनीति द्वारा लागू करती है । शिवराज सिंह की चुनी हुई सरकार को महात्मा गांधी द्वारा लिखी गयी तथा गांधीजी की हिन्दी पत्रिका ‘हरिजनसेवक’ के सम्पादक मध्यप्रदेश के सपूत स्वर्गीय काशीनाथ त्रिवेदी द्वारा अनुदित पुस्तिका ‘रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थान’ से इस उद्धरण की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ । सत्याग्रह की मूल शक्ति कहाँ अवस्थित है इसका अन्दाज शायद उन्हें लग जाएगा : –
   हम एक अरसेसे इस बात को मानने के आदी बन गये हैं कि आम जनताको सत्ता या हुकूमत सिर्फ धारासभाओंके (विधायिका)    जरिए मिलती है । इस खयाल को मैं अपने लोगोंकी एक गंभीर भूल मानता रहा हूँ । इस भ्रम या भूल की वजह या तो हमारी जड़ता है या वह मोहिनी है , जो अंग्रेजोंके रीति-रिवाजोंने हम पर डाल रखी है । अंग्रेज जातिके इतिहासके छिछले या ऊपर-ऊपरके अध्ययनसे हमने यह समझ लिया है कि सत्ता शासन-तंत्रकी सबसे बड़ी संस्था पार्लमेण्टसे छनकर जनता तक पहुँचती है । सच बात यह है कि हुकूमत या सत्ता जनता के बीच रहती है ,जनता की होती है और जनता समय-समय पर अपने प्रतिनिधियोंकी हैसियतसे जिनको पसंद करती है , उनको उतने समय के लिए उसे सौंप देती है । यही क्यों , जनतासे भिन्न या स्वतंत्र पार्लमेण्टों की सत्ता तो ठीक , हस्ती तक नहीं होती । सत्ता का असली भण्डार या खजाना तो सत्याग्रहकी या सविनय कानून-भंग की शक्ति में है ।”(मो.क.गाँधी,रचनात्मक कार्यक्रम ,पृष्ट १० – ११ )

Read Full Post »

  हिन्दुस्तान लौटने के बाद खिलाफ़त आन्दोलन में साथ दे कर गांधीजी ने राष्ट्रीय स्तर पर कौमी एकता स्थापित करने का प्रथम प्रयास किया था । खुद को आदर्शोन्मुख व्यवहारवादी गिनवाने वाले गांधीजी ने राष्ट्रीय स्तर पर यथासंभव व्यावहारिक बनने का प्रयास किया था । ऐसा करने में उन्होंने स्तुति व निन्दा , लोकप्रियता व अप्रियता दोनों ग्रहण किए थे । इस आन्दोलन के कारण ही कुछ लोग उनके जीवनभर के दोस्त बने तथा अन्य कुछ लोगों ने उन्हें दुश्मन माना था।

    खिलाफ़त आन्दोलन गांधी ने शुरु नहीं किया था । इस आन्दोलन का प्रमुख कारण अन्तर्राष्ट्रीय था । प्रथम महायुद्ध शुरु हुआ तब हिन्द के मुसलमानों को न छेड़ने और युद्ध-प्रयासों में उनकी मदद की अपेक्षा से ब्रिटिश सरकार ने अपनी मुसलिम प्रजा को सम्बोधित एक गंभीर घोषणा की थी , जिसमें कहा गया था कि : युद्ध तो उसकी इच्छा न होने के बावजूद ऑटॉमन सरकार(तुर्की) ने उस पर लादा है। घोषणा में आगे कहा गया था कि अरबिस्तान तथा मेसोपोटामिया के मुस्लिम धार्मिक स्थलों और जेद्दाह के बंदरगाह पर हरगिज़ आक्रमण नहीं किया जाएगा । हज करने वाले यात्रियों को कोई दिक्कत आने न दी जाएगी । ब्रिटिश प्रधान मन्त्री लॉयड जॉर्ज ने कहा था कि साथी देश तुर्की को एशिया माइनर की उसकी भूमि से उसे वंचित नहीं करेगे । अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी इस घोषणा को समर्थन दिया था । इससे हिन्दुस्तान के मुसलमानों को भरोसा था कि तुर्की की आज़ादी बची रहेगी । युद्ध के बाद की संधि में विजेता राष्ट्रों ने तुर्की के इलाकों की बन्दर बाँट की तथा सुल्तान के अधिकारों को सीमित करते हुए साथी देशों द्वारा नामित हाई कमिशनरों के मार्गदर्शन के तहत रखा गया ।

    खुले वचन भंग की इस संधि से हिन्द के मुसलमानों को जबरदस्त निराशा हुई ,जो स्वाभाविक थी । इसके अलावा खिलाफ़त आन्दोलन शुरु करने के पीछे हिन्द के मुसलिम नेतृत्व के मन में एक और महत्वपूर्ण कारण था – वे चाहते थे कि हिन्द के मुसलमानों में राष्ट्रीय अस्मिता का भाव जागृत हो । हिन्द के तमाम मुसलिम किसी एक अखंडित विचार या संस्कार के नहीं थे । उनमें कई मतभेद तथा खास कर नेताओं की स्पर्धा के कारण पैदा किए गए भेद थे । उनकी ज्यादातर संस्थायें धार्मिक थी । पश्चिमी शिक्षा प्राप्त तथा उलेमाओं से मदरसों में तालीम प्राप्त लोगों में खूब फरक था । ज्यादातर धार्मिक संस्था सरकार के प्रति नरम थी लेकिन देवबन्द के दारुल उलूम सरकार विरोधी रुझान वाली थी।  पढे लिखों में अलीगढ़ मुसलिम युनिवर्सिटी के पढ़े तरुण , उनके प्राध्यापक और प्रशासक पश्चिमी रुझान वाले थे। पश्चिमी तालीमयाफ़्ता ज्यादातर शहरों में थे और सरकारी नौकरियों में भी। मुसलमानों का विशाल समुदाय तो किसान , कारीगर तथा छोटे व्यापारी थे ।

   भारतीय मुसलमानों के सबसे महान समाज सुधारक सर सैय्यद ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना की । अलीगढ विश्वविद्यालय ही नहीं ‘ अलीगढ़ तहरीक ‘ मानी जाती थी । खिलाफ़त आन्दोलन शुरु होने के पूर्व तीन साप्ताहिकों ने हिन्द के मुसलमानों पर जबरदस्त असर  डालअना शुरु किया था । मोहम्मद अली कलकत्ते से कॉमरेड ,कलकत्ते से ही मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अलहिलाल  तथा लाहौर से जफ़र अली खां जमींदार निकालते थे ।

    खिलाफ़त आन्दोलन के प्रमुख नेता अली बन्धु , डॉ. अंसारी ,मौलाना हसरत मोहानी  और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद प्रमुख थे । गांधी की तरह ये सभी धार्मिक रुझान वाले थे , नेहरू और जिन्ना की तरह अधार्मिक सेक्युलर नहीं थे । मुस्लिम लीग उस समय मात्र अमीर और पढ़े लिखों की संस्था थी।हांलाकि खिलाफ़त आन्दोलन के समर्थन में उन्होंने भी प्रस्ताव पास किया था लेकिन उसकी शाखायें और समितियां इसमें सक्रिय नहीं थीं। खिलाफ़त की शुरुआत में माना गया था कि तीन मार्ग मुसलमानों के लिए खुले हैं (१) खून खराबा (२) पूरी कौम की हिजरत (३) असहयोग । पहले दो विकल्प न ग्रहण करने के पीछे गांधी का प्रमुख योगदान था । इस दौर में अली बन्धुओं की माता आबेद बानु बेगम ने स्त्री जागृति का महत्वपूर्ण काम किया ।वे खुद पर्दा नशीं थी लेकिन खिलाफ़त की मीटिंगों में पहुंच कर पर्दा निकाल देतीं और कहती,’तुम सब मेरे बेटों की तरह हो तुम्हारे सामने कैसा परदा?’ बाद में अली बन्धुओं की गिरफ़्तारी के बाद शौकत अली की पत्नी भी सक्रिय हुईं । ६ अप्रैल १९१९ के दिन रॉलेट कानून के खिलाफ़ जब देशव्यापी हड़ताल हुई तब मुम्बई की दो मस्जिदों में श्रीमती सरोजिनी नायडू को बुलाया गया ।

   खिलाफ़त के माध्यम से गांधी गरीब मुसलमानों तक पहुंचे और उन्हें सक्रिय बनाया ।

  

   कॉग्रेस और खिलाफ़त कमिटी की संयुक्त बैठक में एक तरफ़ श्रीमती एनी बेसेण्ट तथा महामना मालवीय तथा दूसरी तरफ़ शौकत अली थे । उन लोगों ने कहा कि अभी विचार करने के लिए वक्त दीजिए , इन लोगों ने कहा कि कब तक इन्तेज़ार किया जाएगा । हसरत मोहानी ने यह कह कर धमाका कर दिया कि अफ़गानिस्तान के अमीर यदि ब्रिटिश सरकार पर हमला करते हैम तो मैं उनका साथ दूंगा । गांधी ने मुसलिम नेताओं से अहिंसक असहयोग की शपथ ली थी और कहा था कि इसका उल्लंघन हुआ तो मैं अलग हट जाऊंगा । इस आधार पर उन्होंने खिलाफ़त आन्दोलन के मुसलमानों का समर्थन किया । यह सच्चाई कहीं दबाई नहीं गई है ,उस दौर की बाबत लिखी तमाम इतिहास की किताबों में मिलती हैं । (मिनोल्ट गेईल की The Khilafat Movement , पृष्ट ९९,उक्त पुस्तक में गृह विभाग के दस्तावेज से लिया गया,राष्ट्रीय अभिलेखागार,नई दिल्ली से) । खिलाफ़त के मुसलिम नेताओं पर आरोप तब भी लगते थे जिनकी बाबत गांधी ने कहा था , ‘ वे द्वेष मुक्त हैं यह मैं नहीं कहता ,परन्तु उनके द्वेषभाव के साथ मेरा प्रेम भाव मिलाने पर द्वेष भाव का वेग मैं कम कर दे रहा हूं यह मुझे यकीन है।’ ( गांधी शिक्षण -भाग १०,पृ ८)

     ” मैं मुसलमान पहले हूं फिर हिन्दुस्तानी हूँ(मोहम्मद अली) इसका मैं बचाव करता हूँ।क्योंकि मैं भी तो यह कहने वाला हूँ कि पहले हिन्दू हूं इसीलिए सच्चा हिन्दुस्तानी हूं ।”(महादेव भाईनी डायरी ,भाग ६,पृ- ४३६-४३७)

    [ इस विषय पर यदि पाठक रुचि लेंगे तो नारायण देसाई की ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार प्राप्त किताब ‘मारूं जीवन एज मारी वाणी’ के सम्बन्धित अध्याय का पूरा अनुवाद कर पेश किया जाएगा। खिलाफ़त आन्दोलन के नेताओं के बारे में विस्तार से चर्चा की जा सकती है ]

[ बिना दोहराये पोस्ट कर रहा हूं ]

Read Full Post »

‘ यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह नहीं होगी । ‘ इस सुस्पष्ट हकीकत को बयान करने की जरूरत क्यों पड़ी थी । अफवाह और अफवाह फैलाने वालों की विशिष्टता को समझाने के लिए कवि-मित्र राजेन्द्र राजन द्वारा २४ साल पहले हमारे चुनावी परचे में लिखा गया यह वाक्य कितना प्रभावी था ! एक निश्चित अवधि के बाद हर अफवाह अपने आप गलत साबित हो जाती है । परन्तु उस छोटी अवधि में टिके रहने के लिए भी हर अफवाह को किसी अर्धसत्य अथवा सत्यांश की आवश्यकता होती है । अर्धसत्य अफवाहों को भरोसेमन्द बनाते हैं ।

हमारे देश में फैल जाने वाली कुछ प्रसिद्ध अफवाहों और उन से जुड़े अर्धसत्य पर गौर करें । आपातकाल की गिरफ्तारी के दौरान लोकनायक जयप्रकाश के गुर्दे खराब हो गये थे इसलिए उन्हें डाइलिसिस पर रहना पड़ता था । उनकी मृत्यु की अफवाह ऐसी फैली कि तत्कालीन प्रधान मन्त्री मोरारजी देसाई ने लोकसभा में इसकी घोषणा भी कर दी थी ।

संजय गांधी की मौत हवाई जहाज उड़ाते वक्त दुर्घटना में हुई थी । तब टेलिविजन और एस.टी.डी की सुविधा आज जितनी व्यापक नहीं थी । अफवाह यह उड़ी कि दुर्घटना स्थल पर श्रीमती इन्दिरा गांधी पहुंची और उन्होंने संजय की जेब से एक चाभी निकाल ली । कांग्रेस पारटी में एक खानदान के प्रभुत्व की बात हकीकत है । इसलिए खानदान के एक सदस्य की मौत पर दूसरी सदस्य द्वारा चाभी हासिल करने की अफवाह चल पाई ।

कश्मीर घाटी में थोक में मन्दिरों को तोड़े जाने की अफवाह याद कीजिए । काश्मीरियत का सवाल ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम का सवाल’ बने इसके लिए अलगाववादी आतंकी और शेष भारत में फैले फिरकापरस्त संगठन दोनों ही उन दिनों तत्पर थे । वरिष्ट पत्रकार बी.जी. वर्गीज को एक जाँच कर ठोस खण्डन वाली रपट जारी करनी पड़ी थी ।

गणेशजी की प्रतिमाओं के दूध पीने की घटना याद कीजिए । व्यापक अंधविश्वास और भौतिकीय तथ्य के आधार पर यह अफवाह फैलने में कितनी सफल हुई थी ।

गद्दारों के इतिहास और राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद की विचारधारा वाले समूह का प्रमुख औजार झू्ठ और अफवाहें फैलाना है । तानाशाही , संकीर्ण राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता की उनकी मुहिम के साथ – साथ उनके संकीर्ण ‘हिन्दू राष्ट्र’ की अवधारणा में वर्णाधारित – पुरुषसत्तात्मक समाज का अक्स दिखाई देता है । इस विचारधारा के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता , जातिविहीन समाज और स्त्री-पुरुष समता के मूल्य सबसे बड़ा खतरा होते हैं । भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में न सिर्फ भाग न लेने अपितु उसका विरोध करने और अंग्रेजों का साथ देने के धब्बे से त्रस्त हो कर राष्ट्र की मुख्यधारा के आन्दोलन पर कीचड़ उछालने के प्रयास के सिवा उनके पास दंगे कराना रह जाता है ।

अनूप शुक्ल , तरुण ,विष्णु बैरागी , विवेक सिंह , रौशन जैसे कुछ प्रिय चिट्ठेकारों को एक पोस्ट पर उद्वेलित होता देख कर इतिहास को तोड़ने – मरोड़ने अथवा ‘लुंज-पुंज सोच की वजह से अन्तिम मन बिना बने ही’ प्रकाशित की गयी घटनाओं पर कुछ कहने जा रहा हूँ ।

घटनाओं पर आने के पहले कुछ सामान्य बातों पर गौर करें । जब हम पिछली शताब्दी की घटनाओं का हवाला देते हैं तब हमें तिथि , स्थान , समाचारपत्र अथवा राष्ट्रीय अभिलेखागार जैसे स्रोतों तथा तथ्यों का उल्लेख जरूर करना चाहिए । १९९२ में एक सज्जन ने दावा किया कि गांधी बाबरी मस्जिद के स्थान पर रामजनमभूमि के हक में थे । गांधी के कॉपीराइट के अधिकारी नवजीवन प्रकाशन ,अहमदाबाद के अधिकारियों ने प्रेस को बुला कर उस झूठे दावे का खण्डन कर दिया । तब मैंने हिन्दू धर्म की इन दो धाराओं के उस संघर्ष की कुछ घटनाओं का हवाला देते हुए एक लेख लिखा । ‘धर्मयुग’ के तत्कालीन सम्पादक ने लेख प्रकाशित करने की स्वीकृति वाले पत्र में लिखा कि गांधीजी के उद्धरणों से सन्दर्भों की अच्छी तरह पुष्टि कर ली जाए । मैंने सन्दर्भ ढंग से दिए थे लेकिन सम्पादक के कहने की वजह से इसका महत्व समझ में आया ।

यह उल्लेखनीय है कि यह समूह अपने पूज्य ‘गुरुजी’ गोलवलकर की लिखी पुस्तक को भी किसी अन्य पुस्तक का अनुवाद होने तथा मौलिक न होने की बात कहने लगे हैं ।

अब आइए उक्त पोस्ट तथा उस पर आई एक टिप्पणी पर

राष्ट्रीय नारे

खिलाफत ( यह नाम ‘मुखालफ़त शब्द से नही खलीफ़ा से आया है ) और असहयोग आन्दोलन के दौरान प्रयुक्त नारों की बाबत अपने अखबार यंग इण्डिया के ८ सितम्बर , १९२० , पृष्ट ६ पर गांधी ने एक लेख लिखा । उन्होंने उस लेख में सुझाव दिया कि नारे आदर्शों पर केन्द्रित हों व्यक्तियों पर नहीं । उन्होंने श्रोताओं से कहा कि , ‘महात्मा गांधी की जय’ तथा ‘ मोहम्मद अली-शौकत अली की जय’ नारे के स्थान पर ‘हिन्दू-मुस्लिम की जय’ लगे ।उसी लेख में गांधी बताते हैं कि उसी दौरे ( मद्रास दौरे में बेजवाड़ा में ) भाई शौकत अली ने नारों की बाबत सकारात्मक तरीके से एक नियम पेश किया । ‘ उन्होंने गौर किया यदि हिन्दू ‘ वन्दे मातरम’ का नारा लगाते हैं और मुस्लिम ‘अल्लाह-ओ-अक़बर’ तो यह कानों में चुभता है और लगता है कि एक मन से नारा नहीं लगाया गया ।इसलिए तीन नारों को मान्यता दी जानी चाहिए जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम मिलकर सहर्ष लगायें । (१) ‘अल्लाह-ओ-अक़बर’ अर्थात ईश्वर ही श्रेष्ट है , (२) वन्दे मातरम ( मातृभूमि की जय ) अथवा भारतमाता की जय तथा (३) हिन्दू-मुसलमान की जय जिसके बिना भारत की जय संभव नहीं है तथा ईश्वर की श्रेष्टता का सच्चा प्रदर्शन नहीं हो सकता। यह सभी नारे अर्थपूर्ण हैं । पहला अपनी क्षुद्रता कबूल करने तथा इस प्रकार विनय प्रकट करने की प्रार्थना है । हिन्दू इन अरबी अल्फ़ाज़ से संकोच नहीं करेंगे जिनके माएने न सिर्फ पूर्णरूपेण अनाक्रामक हैं अपितु विनम्र बनाने वाला है । ईश्वर किसी ज़बान विशेष की तरफ़दारी नहीं नहीं करता । ‘वन्दे मातरम’ अपने उत्कृष्ट इतिहास के अलावा एकमेव राष्ट्रीय आकांक्षा का प्रतीक है – भारत को सर्वोच्च उत्थान मिले – इसका । मैं (गांधी) ‘भारतमाता की जय’ की तुलना में ‘वन्दे मातरम’ पसंद करता हूं चूँकि यह बंगाल की बौद्धिक और भावनात्मक श्रेष्टता का प्रतीक है । हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना भारत कुछ नहीं बन सकता इसलिए हम इसे कभी न भूलें ।

‘ इन नारों को लगाने में असंगति नहीं प्रकट होनी चाहिए । इनमें से कोई नारा किसीनी लगाया तो अन्य लोगों को उसे पूरा करना चाहिए न कि अपने प्संदीदा को चीख कर लगाने के बाद अन्य को दबाने की कोशिश । जिन्हें इच्छा नहीं है वे न लगायें लेकिन नारा लग जाने के बाद मनमानापन तहज़ीब का उल्लंघन माना जाना चाहिए ।

विभाजन के बाद के कौमी हुल्लड़ों के दौर में गांधी प्रार्थना सभाओं से वन्दे मातरम के शुरु होते ही बहिष्कार से ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से कुरान की आयतों के पाठ पूर्व होने वाला बहिष्कार था । इस वजह से गांधी जी ने प्रार्थना पूर्व भाग लेने वालों से कुरान-पाक के पाठ पर आपत्ति के बारे में पूछना शुरु किया ।

वन्दे मातरम के प्रथम दो छन्द राष्ट्रगान के रूप में मान्य किया गया है । आगे के अनुच्छेद में ‘ माँ’  ‘तुमी दुर्गा’ हो जाती हैं जिन पर आपत्ति की जाती है ।

[ अगली किश्तों में अफ़गान अमीर का साथ , जिन्ना बनाम अली बन्धु ]

Read Full Post »

%d bloggers like this: