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Archive for मार्च 29th, 2009

‘ जब कटत रहे कामदेव , तब कहाँ रहे रामदेव ?
अब वोट माँगे रामदेव तब पेड़ में ‘उनका’ बाँध देव’

१९७७ के आम चुनाव में रायबरेली या अमेठी के किसी विधान सभा क्षेत्र से कांग्रेसी विधायक रहे ‘रामदेव’ (बाबा नहीं ) के खिलाफ़ जनता ने यह नारा बनाया और लगाया था । सब को पता है कि अमेठी से संजय गाँधी को रवीन्द्र प्रताप सिंह ने और रायबरेली से इन्दिरा गांधी को लोकबन्धु राजनारायण ने शिकस्त दी थी ।
अविभाजित उत्तर प्रदेश – सिफ़र , अविभाजित बिहार – सिफ़र , मध्य प्रदेश – एक ( समर्थित निर्दल – माधवराव सिंधिया) यह था मौलिक अधिकारों को १९ महीने निलम्बित रखने , प्रेस सेंसरशिप लगाने , जबरिया नसबन्दी अभियान चलाने वाली , आजादी के बाद से तब तक दिल्ली की कुर्सी पर काबिज रही कांग्रेस का १९७७ का चुनाव परिणाम ।
कल जब पीलीभीत से भारतीय जनता पार्टी के युवा उम्मीदवार वरुण ने बिना पार्टी के झण्डों के ( अलबत्ता विहिप के झण्डे रखने का ‘निर्देश’ था ) , वरिष्ट भाजपा नेता कालराज मिश्र की देखरेख में गिरफ़्तारी दी तब नारा लगा- ‘वरुण नहीं यह आंधी है,दूसरा संजय गांधी’ है’ । जबरिया नसबन्दी अभियान के पीछे की तानाशाही संविधानेतर सत्ता (मनमोहन सिंह या राजनाथ सिंह की तरह राज्य सभा सदस्य भी न था ) का नमूना था – संजय गांधी । उस अवधि को इन्दिराजी के प्रति नरम हुए विनोबा ने यदि ‘अनुशासन पर्व’ कहा तो सर्वोदयी मनीषी दादा धर्माधिकारी ने ‘दु:शासन पर्व’ कहा था । संजय गांधी जिसके बारे में किस्सा मशहूर हुआ था-‘गन्ना क्यों बोते हो,गुड़ बोओ’, मंच पर जिनकी चप्पलें नारायण दत्त तिवारी जैसा वरिष्ट नेता उठाता था और जिसे विलायत में पोलिटेकनिक की पढ़ाई के दौरान पुर्जों की चोरी में पकड़े जाने के कारण निकाल दिया गया था ।
उस दु:शासन पर्व के खिलाफ़ संघ के कार्यकर्ता भी सत्याग्रह कर जेल जाते थे जब तक जेल से बालासाहब देवरस ने ‘इन्दिराजी के बीस सूत्री कार्यक्रम’ (बेटे की पांच अलग) के समर्थन में चिट्ठी नहीं लिखी । क्या उसी समय से संजय गांधी को ‘अपने जी’ मान लिया गया था ? राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘रंग में भंग’ की पंक्ति –‘योग्य से ही योग्य का सम्बन्ध होना योग्य था’ अब चरितार्थ हो रही है ।
उस परिवार से ‘गांधी’ जुड़ने का कारण जो व्यक्ति रहा , उसकी चर्चा न राहुल के लोग करते हैं और न ही संजय वाले । एक ‘फरहर’ सांसद के रूप में इस व्यक्ति के प्रति सम्मान का भाव उठता है । फिरोज गांधी सत्ताधारी दल के लोक सभा सदस्य होने के बावजूद ‘प्रेस की आजादी’ जैसे सवालों पर संसद को गरम रखते थे ।
वरुण की योग्य माता मानेका ने जरूर कांग्रेस की सिख विरोधी साम्प्रदायिकता की गंभीर चर्चा शुरु की थी लेकिन वह भी इसलिए थम गयी कि ‘संघ’ ने भी उस चुनाव में ‘हिन्दू-हित’ की पार्टी कांग्रेस को माना था और भाजपा लोक सभा के आम चुनाव में देश भर में सिर्फ़ दो सीटें जीत पाई थी । वरुण बाबा की उमर के लिहाज से भवानीप्रसाद मिश्र की यह ‘बाल-कविता’ शायद उन दिनों के बारे में उसे और राहुल को कुछ समझ दे :

चार कौए उर्फ़ चार हौए ,भवानी प्रसाद मिश्र

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले ,
उन्होंने यह तय किया कि सारे उडने वाले
उनके ढंग से उडे,रुकें , खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं

कभी कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बडे सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड और बाज हो गये.

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बांध कर खडे हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ – पिऊ को छोडें कौए – कौए गायें

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना – पीना मौज उडाना छुट्भैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बडे – बडे मनसूबे आए उनके जी में

उडने  तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उडने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं , चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोडे में किस तरह सुनाना ?
भवानीप्रसाद मिश्र .

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