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Archive for जुलाई, 2009

[ इस चिट्ठे के पाठक हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की प्रान्तीय उपाध्यक्ष साथी शमीम मोदी की हिम्मत और उनके संघर्ष से अच्छी तरह परिचित हैं । हिन्दी चिट्ठों के पाठकों ने शमीम की जेल यात्रा के दौरान उनके प्रति समर्थन भी जताया था ।

गत दिनों उन्होंने प्रतिष्ठित शोध संस्थान टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ ,मुम्बई में बतौर एसिस्टेन्ट प्रोफेसर काम करना शुरु किया है । वे अपने बेटे पलाश के साथ मुम्बई के निकट वसई में किराये के फ्लैट में रह रही थीं ।

मध्य प्रदेश की पिछली सरकार में मन्त्री रहे जंगल की अवैध कटाई और अवैध खनन से जुड़े माफिया कमल पटेल के कारनामों के खिलाफ़ सड़क से उच्च न्यायालय तक शमीम ने बुलन्द आवाज उठाई । फलस्वरूप हत्या के एक मामले में कमल पटेल के लड़के को लम्बे समय तक गिरफ़्तारी से बचा रहने के बाद हाल ही में जेल जाना पड़ा ।

गत दिनों जिस हाउसिंग सोसाईटी में वे रहती थीं उसीके चौकीदार द्वारा उन पर चाकू से प्राणघातक हमला किया गया । शमीम ने पूरी बहादुरी और मुस्तैदी के साथ हत्या की नियत से हुए इस हमले का मुकाबला किया । उनके पति और दल के नेता साथी अनुराग ने इसका विवरण भेजा है वह दहला देने वाला है । हम शमीम के साहस , जीवट और हिम्मत को सलाम करते हैं । आप सबसे अपील है कि महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री को पत्र या ईमेल भेजकर हमलावर की गिरफ़्तारी की मांग करें ताकि उसके पीछे के षड़यन्त्र का पर्दाफाश हो सके । कमल पटेल जैसे देश के शत्रुओं को हम सावधान भी कर देना चाहते हैं कि हम गांधी – लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले जुल्मी से टकराना और जुल्म खत्म करना जानते हैं । प्रस्तुत है अनुराग के पत्र के आधार पर घटना का विवरण । ]

मित्रों ,

यह शमीम ही थी जो पूरे शरीर पर हुए इन घातक प्रहारों को झेल कर बची रही ।  ज़ख्मों का अन्दाज उसे लगे ११८ टाँकों से लगाया जा सकता है । घटना का विवरण नीचे मुताबिक है –

२३ जुलाई को हाउसिंग सोसाइटी का चौकीदार दोपहर करीब सवा तीन बजे हमारे किराये के इस फ्लैट में पानी आपूर्ति देखने के बहाने आया । शमीम यह गौर नहीं कर पाई कि घुसते वक्त उसने दरवाजा अन्दर से लॉक कर दिया था । फ्लैट के अन्दर बनी ओवरहेड टंकी से पानी आ रहा है या नहीं यह देखते वक्त वह शमीम का गला दबाने लगा। उसकी पकड़ छुड़ाने में शमीम की दो उँगलियों की हड्डियाँ टूट गईं । फिर उसके बाल पकड़कर जमीन पर सिर पटका और एक बैटन(जो वह साथ में लाया था) से बुरी तरह वार

भोपाल में शमीम की रिहाई के लिए

भोपाल में शमीम की रिहाई के लिए

करने लगा । वह इतनी ताकत से मार रहा था कि कुछ समय बाद वह बैटन टूट गया । शमीम की चोटों से बहुत तेजी से खून बह रहा था । शमीम ने हमलावर से कई बार पूछा कि उसे पैसा चाहिए या वह बलात्कार करना चाहता है । इस पर वह साफ़ साफ़ इनकार करता रहा ।  शमीम ने सोचा कि वह मरा हुआ होने का बहाना कर लेटी रहेगी लेकिन इसके बावजूद उसने मारना न छोड़ा तथा एक लोहा-काट आरी (जो साथ में लाया था ) से गले में तथा कपड़े उठा कर पेट में चीरा लगाया । आलमारी में लगे आईने में शमीम अपनी श्वास नली देख पा रही थी ।  अब शमीम ने सोचा कि बिना लड़े कुछ न होगा । उसने हमालावर से के हाथ से आरी छीन ली और रक्षार्थ वार किया । इससे वह कुछ सहमा और उसने कहा कि रुपये दे दो । शमीम ने पर्स से तीन हजार रुपये निकाल कर उसे दे दिए । लेकिन उसने एक बार भी घर में लॉकर के बारे में नहीं पूछा । अपने बचाव में शमीम ने उससे कहा कि वह उसे कमरे में बाहर से बन्द करके चला जाए । वह रक्तस्राव से मर जाएगी । शमीम अपना होश संभाले हुए थी । वह पलाश के कमरे में बन्द हो गयी (जो कमरा हकीकत में अन्दर से ही बन्द होता है )। हमलावर बाहर से कुन्डी लगा कर चला गया । शमीम ने तय कर लिया था कि वह होशोहवास में रहेगी और हर बार जब वह चोट करता , वह उठ कर खड़ी हो जाती । हमलावर के जाने के बाद वह कमरे से बाहर आई और पहले पड़ोसियों , फिर मुझको और अपने माता-पिता को खबर दी। अस्पताल ले जाते तक वह पूरी तरह होश में रही ।

दाँए से बाँए:शमीम,पन्नालाल सुराणा,स्मिता

दाँए से बाँए:शमीम,पन्नालाल सुराणा,स्मिता

कुछ सवाल उठते हैं :   चौकीदार ने लॉकर खोलने की कोशिश नहीं की जो वहीं था जहाँ वह शमीम पर वार कर रहा था । उसने पैसे कहां रखे हैं इसके बारे में बिलकुल नहीं पूछा । वह गालियाँ नहीं दे रहा था और उसके शरीर को किसी और मंशा से स्पर्श नहीं कर रहा था । यदि वह मानसिक रोगी या वहशी होता तो शायद शमीम उससे नहीं निपट पाती । वह सिर्फ़ जान से मारने की बात कह रहा था । शमीम के एक भी सवाल का वह जवाब नहीं दे रहा था ।  सेल-फोन और लैपटॉप वहीं थे लेकिन उसने उन्हें नहीं छूआ । इन परिस्थितियों में हमें लगता है कि इसके पीछे कोई राजनैतिक षड़यन्त्र हो सकता है ।

शमीम को मध्य प्रदेश के पूर्व राजस्व मन्त्री कमल पटेल और उसके बेटे सन्दीप पटेल से जान से मारने की धमकियाँ मिलती रही हैं । इसकी शिकायत हमने स्थानीय पुलिस से लेकर पुलिस महानिदेशक से की हैं । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश पर २००५ की शुरुआत से २००७ के अन्त तक उसे सुरक्षा मुहैय्या कराई गई थी । इसलिए हमें उन पर शक है । हमले के पीछे उनका हाथ हो सकता है ।

पेशेवर तरीके से कराई गयी हत्या न लगे इस लिए इस गैर पेशेवर व्यक्ति को इस काम के लिए चुना गया होगा । जब तक राकेश नेपाली नामक यह हमलावर गिरफ़्तार नहीं होता वास्तविक मन्शा पर से परदा नहीं उठेगा ।

हम सबको महाराष्ट्र शासन और मुख्यमन्त्री पर उसकी गिरफ़्तारी के लिए दबाव बनाना होगा ।

अनुराग मोदी

शमीम मोदी के संघर्ष से जुड़ी खबरें और आलेख :

लोकतंत्र का जिला – बदर

’सत्याग्रही’ शिवराज के राज में

चिट्ठालोक की चेतना को प्रणाम

शमीम मोदी की रिहाई का आदेश


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भारत के संविधान में नीति निर्देशक तत्वों में सरकार को यह निर्देश दिया गया था कि वह 14 वर्ष तक के सारे बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा देने की व्यवस्था 26 जनवरी 1960 तक करेगी। यदि इस तारीख के लगभग 50 वर्ष बीतने के बाद भी यह काम नहीं हो पाया है, तो उसके कारणों को खोजना होगा। क्या प्रस्तावित विधेयक उन कारणों को दूर करता है ? यही इस विधेयक को जांचने की मुख्य कसौटी होनी चाहिए।

इच्छाशक्ति की कमी –

सरकारों की ओर से अपने दायित्व-निर्वाह में इस चूक के लिए प्रमुख दलील दी जाती रही है कि भारत एक गरीब देश है और सरकार के पास संसाधनों की कमी रही है। किन्तु इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता। वे ही सरकारें फौज, हथियारों, हवाई अड्डों एवं हवाई जहाजों, फ्लाई-ओवरों, एशियाड और अब राष्ट्रमंडल खेलों पर विशाल खर्च कर रही है। दरअसल सवाल प्राथमिकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। देश के सारे बच्चों को शिक्षित करना कभी भी सरकार की प्राथमिकता में नही रहा है। यह भी माना जा सकता है कि भारत का शासक वर्ग नहीं चाहता था कि देश के सारे बच्चे भलीभांति शि्क्षित हों, क्योंकि वे शि्क्षित होकर बड़े लोगों के बच्चों से प्रतिस्पर्धा करने लगेगें और उनके एकाधिकार एवं विशेषाधिकारों को चुनौती मिलने लगेगी। अंग्रेजों के चले जाने के बाद अंग्रेजी का वर्चस्व भी इसीलिए बरकरार रखा गया।
देश के सारे बच्चों को शि्क्षित करने का काम कभी भी निजी स्कूलों के दम पर नहीं हो सकता। कारण साफ है। देश की जनता के एक हिस्से में निजी स्कूलों की फीस अदा करने की हैसियत नहीं है। भारत की सरकारों को ही इसकी जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को ही व्यापक, सुदृढ़ व सक्षम बनाना होगा। लेकिन पिछले दो दशकों में सरकारें ठीक उल्टी दिशा में चलती दिखाई देती है। यानि अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना, सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर बिगाड़ना एवं वंचित करना तथा शिक्षा के निजीकरण एवं व्यवसायीकरण को बढ़ावा देना। इससे भी मालूम होता है कि सरकार की इच्छा इस दिशा में नहीं है।
यों पिछले कुछ वर्षों में देश में स्कूलों की संख्या काफी बढ़ी है। छोटे-छोटे गांवों एवं ढानों में भी स्कूल खुल गए हैं। स्कूल जाने लायक उम्र के बच्चों में 90 से 95 प्रतिशत के नाम स्कूलों में दर्ज  हो गए हैं, यह दावा भी किया जा रहा है। किन्तु इस द्र्ज संख्या में एक हिस्सा तो फर्जी या दिखावटी है। फिर जिन बच्चों के नाम पहली कक्षा में लिख जाते हैं, उनमें कई बीच में स्कूल छोड़ देते हैं और आधे भी कक्षा 8 में नहीं पहुंच पाते हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस वर्ष मध्यप्रदेश में कक्षा 10वीं में केवल 35 प्रतिशत बच्चों का पास होना इस शिक्षा-व्यवस्था की दुर्गति का एक सूचक है।

सरकारी शिक्षा की बदहाली –

पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने स्वयं कई कदम उठाए हैं, जिनसे सरकारी शिक्षा की हालत बिगड़ी है :-
(1)    स्थायी, प्रशिक्षित शिक्षकों का कैडर समाप्त करके उनके स्थान पर पैरा-शिक्षकों (शिक्षाकर्मी, संविदा शिक्षक, अतिथि शिक्षक, शिक्षा सेवक, शिक्षा मित्र आदि) की नियुक्ति। पैरा-शिक्षक अप्रशिक्षित व अस्थायी होते हैं और उन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है।
(2)    कई प्राथमिक शालाओं में दो या तीन शिक्षक ही नियुक्त करना तथा यह मान लेना कि एक शिक्षक एक समय में दो या तीन कक्षाओं को एक साथ पढ़ा सकता है।
(3)    माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शालाओं में प्रत्येक विषय के शिक्षक न प्रदान करना। शिक्षकों के पद खाली रखना। प्रतिवर्ष पैरा-शिक्षकों की नियुक्ति के चक्कर में भी कई पद खाली रहते हैं।
(4)    शिक्षकों को गैर-शिक्षणीय कामों में लगाना तथा ये काम बढ़ाते जाना।
(5)    शालाओं के निरीक्षण की व्यवस्था को कमजोर या समाप्त करना।
(6)    शालाओं में पर्याप्त भवन, एवं अन्य जरुरी सुविधाएं न प्रदान करना।
शिक्षा का बंटवारा और दुष्चक्र –
सरकारी स्कूलों की हालत बिगड़ने का एक और कारण यह रहा है कि जैसे-जैसे कई तरह के निजी स्कूल खुलते गए, बड़े लोगों, पैसे वालों और प्रभावशाली परिवारों के बच्चे उनमें जाने लगे। सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीब बच्चे रह गए। इससे उनकी तरफ समाज व सरकार का ध्यान भी कम हो गया। यह एक तरह का दुष्चक्र है, जिसमें सरकारी शिक्षा व्यवस्था गहरे फंसती जा रही है। देश में समान स्कूल प्रणाली लाए बगैर इस दुष्चक्र को नहीं तोड़ा जा सकता। शिक्षा में समानता और शिक्षा के सर्वव्यापीकरण का गहरा संबंध है।
अफसोस की बात है कि संसद में पेश ‘बच्चों के मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार
विधेयक’ में इस दुष्चक्र को तोड़ने, सरकारी शिक्षा की दुर्गति को रोकने तथा शिक्षा के निजीकरण एवं बाजारीकरण को रोकने के पर्याप्त उपाय मौजूद नहीं है। वैसे सरसरी तौर पर यह विधेयक प्रगतिशील और भले उद्देश्य वाला दिखाई देता है। इसमें कुछ अच्छी बातें भी है। किन्तु यदि लक्ष्य देश के सारे बच्चों को शिक्षित करने का है, तो यह विधेयक अपर्याप्त व भ्रामक है। यही नहीं, यह भारत में शिक्षा में बढ़ते हुए भेदभाव, गैरबराबरी और शिक्षा के बाजारीकरण व मुनाफाखोरी पर वैधानिकता का ठप्पा लगाने का काम करता है, जबकि जरुरत उन पर तत्काल रोक लगाने की है।
शिक्षा का बढ़ता हुआ बाजार वास्तव में बहुसंख्यक बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित करने का काम करता है, क्योंकि वे इस बाजार की कीमतों को चुकाने में समर्थ नहीं होते। उनके लिए जो ‘मुफ्त’ सरकारी शिक्षा रह जाती है, वह लगातार घटिया, उपेक्षित, अभावग्रस्त होती जाती है। बाजार में सबसे खराब, सड़ा और फेंके जाने वाला माल ही मुफ्त मिल सकता है। दरअसल बाजार और अधिकार दोनों एक साथ नहीं चल सकते। यह अचरज की बात है कि शिक्षा के बाजारीकरण एवं व्यवसायीकरण पर रोक नहीं लगाने वाले इस विधेयक को कैसे ‘शिक्षा अधिकार विधेयक’ का नाम दिया गया है ?

विधेयक की प्रमुख कमियां –

इस विधेयक के बारे में निम्न बातें विशेष रुप से गौर करने लायक है –

स्कूलों में भेद

विधेयक के प्रारंभ में ही परिभाषाओं की धारा 2 (एन) में (स्कूल की परिभाषा में) मान लिया गया है कि चार तरह के स्कूल होगें – (1)    सरकारी स्कूल    (2)    अनुदान प्राप्त निजी स्कूल (3)    विशेष श्रेणी के स्कूल (केन्द्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय आदि) और (4)    अनुदान न पाने वाले निजी स्कूल। विधेयक के कई प्रावधान श्रेणी (2), (3) या (4) पर लागू नहीं होती है। शिक्षा के भेदभाव को इस तरह से मान्य एवं पुष्ट किया गया है।

25 प्रतिशत सीटें गरीबों को : बाकी का क्या ?

धारा 8(ए) और धारा 12 से स्पष्ट है कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सिर्फ सरकारी स्कूलों में ही मिल सकेगी। श्रेणी (2),(3) एवं (4) के स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें कमजोर तबके के बच्चों को मिलेगीं, जिसके लिए सरकार श्रेणी (4) के स्कूलों को खर्च का भुगतान करेगी। सवाल है कि ऐसा क्यों ? कुछ बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने का मौका मिले, कुछ को विशेष श्रेणी के स्कूलों में और कुछ को उपेक्षित घटिया सरकारी स्कूलों में ? क्या इससे सारे बच्चों को सही व उम्दा शिक्षा मिल सकेगी ?वर्तमान में देश में स्कूल जाने वाली उम्र के 19 करोड़ बच्चे हैं। उनमें से 4 करोड़ बच्चे मान्यताप्राप्त निजी स्कूलों में जाते हैं। यदि उनमें 25 प्रतिशत या 1 करोड़ अतिरिक्त गरीब बच्चों की भरती भी हो गई तो बाकी 14 करोड़ बच्चों की शिक्षा का क्या होगा ?

फीस पर कोई नियंत्रण नहीं

विधेयक की धारा 13 में केपिटेशन फीस और बच्चों की छंटाई का निषेध किया गया है। धारा 2(बी) की परिभाषा के मुताबिक केपिटेशन फीस वह भुगतान है, जो स्कूल द्वारा अधिसूचित फीस के अतिरिक्त हो। इसका मतलब है कि अधिसूचित करके चाहे जितनी फीस लेने का अधिकार निजी स्कूलों को होगा तथा उस पर कोई रोक या नियंत्रण इस विधेयक में नहीं है। निजी स्कूलों की मनमानी एवं लूट बढ़ती जाएगी। बिना रसीद के या अन्य छुपे तरीकों से केपिटेशन फीस लेना भी जारी रहेगा, जिसको साबित करना मुश्किल होगा। इसके लिए सजा भी बहुत कम (केपिटेशन फीस का 10गुना जुर्माना) रखी गई है।

पैरा शिक्षक की व्यवस्था जारी रहेगी

इस विधेयक में शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता और वेतन-भत्ते तय करने की बात तो है
(धारा 23), किन्तु वह कितना होगा, यह सरकार पर छोड़ दिया है। इस बात की आशंका है कि पैरा-शिक्षकों के मौजूदा कम वेतन को ही निर्धारित किया जा सकता है। शिक्षकों का स्थायी कैडर बनाने को भी अनिवार्य नहीं किया गया है। ठेके पर या दैनिक मजदूरी पर भी शिक्षक लगाए जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में, इस विधेयक में पैरा-शिक्षक वाली बीमारी का इलाज नहीं किया गया है और उसे जारी रखने की गुंजाइश छोड़ी गई है।

अपर्याप्त मानदण्ड : एक शिक्षक, कई कक्षाएं

विधेयक की धारा 8 एवं 9 में अनिवार्य शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि सरकार गांव-मुहल्ले में स्कूल खोलेगी जिसमें अनुसूची में दिए गए मानदण्डों के मुताबिक संरचना व सुविधाएं प्रदान करेगी। धारा 19 एवं 25 में भी सारे स्कूलों के लिए अनुसूची के मुताबिक शिक्षक-छात्र अनुपात तथा अन्य सुविधाएं प्रदान करना जरुरी बनाया गया है। तभी स्कूलों को मान्यता मिलेगी।किन्तु इस अनुसूची में शिक्षकों और भवन के जो मानदण्ड दिए गए हैं, वे काफी कम एवं अपर्याप्त है। प्राथमिक शालाओं में बच्चों तक 30 बच्चों पर एक शिक्षक तथा 200 से ऊपर होने पर 40 बच्चों पर एक शिक्षक का अनुपात रखा गया है। प्रधान अध्यापक तभी जरुरी होगा, जब 150 से ऊपर बच्चे हों। इसका मतलब है कि बहुत सारी छोटी प्राथमिक शालाओं में दो या तीन शिक्षक ही होंगे। वे पांच कक्षाओं को कैसे पढांएगे ? शाला भवन के मामले में भी प्रति शिक्षक एक कमरे का मानदण्ड रखा गया है।
देश के सारे बच्चों को शिक्षा देने के लिए जरुरी है कि छोटे-छोटे गांवो और ढ़ानों में भी स्कूल खोले जाएं और वहां कम से कम एक कक्षा के लिए एक शिक्षक हो। इन मानदण्डों से देश में 37 फीसदी प्राथमिक शालाएं दो शिक्षक-दो कमरे वाली, 17 फीसदी तीन शिक्षक-तीन कमरे वाली और 12 फीसदी शालाएं चार शिक्षक-चार कमरे वाली रह जाएगी। एक शिक्षक एक साथ दो या तीन कक्षाएं पढ़ाता रहेगा। यह शिक्षा के नाम पर देश के गरीब बच्चों के साथ मजाक होगा।
चाहे अधिक शिक्षक देने पड़े, चाहे बहुत छोटे गांवों में कक्षा 3 तक ही स्कूल रखा जाए, यह जरुरी है कि कम से कम 1 कक्षा पर 1 शिक्षक हो। क्या देश के गरीब बच्चों को इतना भी हक नहीं है कि उनकी एक कक्षा पर एक शिक्षक और एक कमरा उनको मिले ? यह कैसा शिक्षा अधिकार विधेयक है ? यह अधिकार देता है या छीनता है ?

शिक्षकों के गैर-शिक्षण काम

धारा 27 में शिक्षकों को गैर-शिक्षण कामों में न लगाने की बात करते हुए भी जनगणना, आपदा राहत और सभी प्रकार के चुनावों में उनको लगाने की छूट दे दी गई है। चूंकि सिर्फ सरकारी शिक्षकों को ही इन कामों में लगाया जाता है, इससे सरकारी बच्चों की शिक्षा ही प्रभावित होती है। यह गरीब बच्चों के साथ एक और भेदभाव व अन्याय होता है।

कक्षा 8 के बाद क्या ?

विधेयक की धारा 2(सी), 2(एफ) और 3(1) के मुताबिक 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को कक्षा 1 से 8 तक की मुफ्त एवं अनि्वार्य शिक्षा देने की बात कही गई है। सवाल यह है कि कक्षा 8 के बाद क्या होगा ? कक्षा 12 तक का अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा है ? आज कक्षा 12 की शिक्षा पूरी किए बगैर किसी भी प्रकार का रोजगार या उच्च शिक्षा हासिल नहीं की जा सकती है। इसी तरह पूर्व प्राथमिक शिक्षा को भी अधिकार के दायरे से बाहर कर दिया है। धारा 11 में इसे सरकारों की इच्छा व क्षमता पर छोड़ दिया गया है।

फेल नहीं, किन्तु पढ़ाई का क्या ?

विधेयक की धारा 16 में प्रावधान है कि किसी बच्चे को किसी कक्षा में फेल नहीं किया जाएगा और स्कूल से निकाला नहीं जाएगा। धारा 30(1) में कहा गया है कि कक्षा 8 से पहले कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी। इसके पीछे सिद्धांत तो अच्छा है कि कमजोर बच्चों को नालायक घोषित करके तिरस्कृत करने के बजाय स्कूल उन पर विशेष ध्यान दे तथा उनकी प्रगति की जिम्मेदारी ले। यह भी कि बच्चों को अपनी-अपनी गति से पढ़ाई करने का मौका दिया जाए। किन्तु इस सिद्धांत को लागू करने के लिए यह जरुरी है कि सरकारी स्कूलों की बदहाली को दूर किया जाए, वहां बच्चों पर ध्यान देने के लिए पूरे व पर्याप्त शिक्षक हों तथा पढ़ाई ठीक से हो। नहीं तो विधेयक के इस प्रावधान के चलते सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की हालत और बिगड़ती चली जाएगी। इस सिद्धांत को लागू करने के लिए यह भी जरुरी है कि उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा का माहौल बदला जाए। विधेयक इस दिशा में भी कुछ नहीं करता है।

अंग्रेजी माध्यम की गुंजाईश

धारा 29(2)-(एफ) में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा बनाने के प्रावधान में ‘जहां तक व्यावहारिक हो’ वाक्यांश जोड़ दिया गया है। इससे देश में महंगे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की गुंजाईश छोड़ दी गई है। यह देश में भेदभाव का बड़ा जरिया बना रहेगा।

ट्यूशन पर रोक कैसे ?

धारा 28 में शिक्षकों द्वारा प्राईवेट ट्यूशन करने पर पाबंदी लगाकर अच्छा काम किया गया है। लेकिन इसे कैसे रोका जाएगा, कौन कार्यवाही करेगा और क्या सजा होगी, इसका कोई जिक्र नहीं है। ट्यूशन की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए शिक्षकों को पर्याप्त वेतन दिया जाना तथा उनका शोषण रोकना जरुरी है, किन्तु विधेयक ने यह सुनिश्चित करने की जरुरत नहीं समझी है। देश में तेजी से बढ़ते कोचिंग उद्योग को रोकने के कोई उपाय भी विधेयक में नहीं है।

निजी स्कूलों की निरंकुशता

अनुदान न लेने वाले निजी स्कूलों को ‘स्कूल प्रबंध समिति’ के प्रावधान (धारा 21 एवं 22) से बाहर रखा गया है। उनके प्रबंधन में अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों, स्थानीय शासन संस्थाओं, कमजोर तबकों आदि का कोई दखल या प्रतिनिधित्व नहीं होगा। वे पूरी मनमानी करेगें और निरंकुश रहेंगे।

बुनियादी बदलाव की जगह कानून का झुनझुना

इस विधेयक से यह दिखाई देता है कि देश के साधारण बच्चों को अच्छी एवं साधनयुक्त शिक्षा उपलब्ध कराने का कार्यक्रम युद्धस्तर पर चलाने और वैसी नीति बनाने के बजाय सरकार एक अधूरा कानून बनाकर अपनी जिम्मेदारी टालना चाहती है। पिछले कुछ समय में सरकार ने कई ऐसे कानून (रोजगार गारंटी कानून, वन अधिकार कानून, असंगठित क्षेत्र कानून, घरेलू हिंसा कानून, सूचना का अधिकार कानून, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून) बनाए हैं या बना रही है, जिनमें मौजूदा व्यवस्था  में बुनियादी बदलाव करने के बजाय कानूनों का झुनझुना आम जनता, एनजीओ आदि को पकड़ा दिया जाता है। क्या एक साधारण गरीब आदमी (जिसे शिक्षा के अधिकार की सबसे ज्यादा जरुरत है) अपने अधिकार को हासिल करने के लिए कचहरी-अदालत के चक्कर लगा सकता है ? इस कानून में तो उसे प्रांतीय स्तर पर राजधानियों में स्थित ‘बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ के पास जाना पडेगा। क्या यह उसके बूते की बात होगी ?

शिक्षा का मुक्त बाजार : महमोहन सिंह के नक्शे कदम पर

यह साफ है कि इस विधेयक से देश के साधारण बच्चों को उम्दा, साधनसंपन्न, संपूर्ण शिक्षा मिलने की कोई उम्मीद नहीं बनती है। सरकारी शिक्षा व्यवस्था का सुधार इससे नहीं होगा। देश में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, व्यवसायीकरण और बाजारीकरण पर रोक इससे नहीं लगेगी। नतीजतन शिक्षा में भेदभाव की जड़ें और मजबूत होगी। यदि हम पिछले दो दशकों में शिक्षा के बढ़ते बाजार को देखें तथा नए केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल की घोषणाओं को देखें (शिक्षा में निजी भागीदारी एवं पूंजी निवेश को बढ़ावा देना, निजी-सरकारी सहयोग, विदेशी शिक्षण संस्थाओं को प्रवेश देना, कॉलेज में प्रवेश के लिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा लेना आदि) तो मामला साफ हो जाता है। सरकार शिक्षा अधिकार कानून बनाने की रस्म-अदायगी करके देश में शिक्षा का मुक्त बाजार बनाना चाहती है। स्वयं श्री सिब्बल ने एक साक्षात्कार में कहा –
‘‘ डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में अर्थव्यवस्था के लिए जो किया, मैं वह शिक्षा व्यवस्था के लिए करना चाहता हूं।’’ (द सण्डे इंडियन, 6-12 जुलाइZ 2009)
यह एक खतरनाक सोच व खतरनाक दिशा है। भारत के जनजीवन पर एक और हमला है। शिक्षा व स्वास्थ्य का बाजार एक विकृति है, मानव सभ्यता के नाम पर एक कलंक है। हमें समय रहते इसके प्रति सचेत होना पड़ेगा और इसका पूरी ताकत से विरोध करना होगा।

विकल्प क्या हो ?

यदि वास्तव में देश के सारे बच्चों को अच्छी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, तो सरकार को ऐसे कानून और ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जिसमें निम्न बातें सुनिश्चित हों –
(1)    देश में समान स्कूल प्रणाली लागू हो, जिसमें एक जगह के सारे बच्चे अनिवार्य रुप से एक ही स्कूल में पढ़ेंगे।
(2)    शिक्षा के व्यवसायीकरण और शिक्षा में मुनाफाखोरी पर प्रतिबंध हो। जो निजी स्कूल फीस नहीं लेते हैं, परोपकार (न कि मुनाफे) के उद्देश्य से संचालित होते हैं, और समान स्कूल प्रणाली का हिस्सा बनने को तैयार हैं, उन्हें इजाजत दी जा सकती है।
(3)    देश में विदेशी शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश पर रोक लगे। हम विदेशों से ज्ञान, शोध, शिक्षण पद्धतियों और शिक्षकों-विद्यार्थियों का आदान-प्रदान एवं परस्पर सहयोग कर सकते हैं,किन्तु अपनी जमीन पर खड़े होकर।
(4)    शिक्षा में समस्त प्रकार के भेदभाव और गैरबराबरी समाप्त की जाए।
(5)    पूर्व प्राथमिक से लेकर कक्षा 12 तक की शिक्षा का पूरा ख्रर्च सरकार उठाए। स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, भवन, शौचालय, पेयजल, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शिक्षण सामग्री, खेल सामग्री, उपकरण, छात्रावास, छात्रवृत्तियों आदि की पूरी व्यवस्था के लिए सरकार जरुरी संसाधन उपलब्ध कराए।
(6)    शिक्षकों को स्थायी नौकरी, पर्याप्त वेतन और प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए। शिक्षकों से गैर-शिक्षणीय काम लेना बंद किया जाए। मध्यान्ह भोजन की जिम्मेदारी शिक्षकों को न देकर दूसरों को दी जाए। कर्तव्य-निर्वाह न करने वाले शिक्षकों पर कार्यवाही की जाए।¦
(7)    शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी का वर्चस्व खतम किया जाए।
(8)    स्कूलों का प्रबंध स्थानीय स्वशासन संस्थाओं द्वारा और जनभागीदारी से किया जाए।
(9)    प्रतिस्पर्धा का गलाकाट एवं दमघोटूं माहौल समाप्त किया जाए। निजी कोचिंग संस्थाओं पर पाबंदी हो। प्रतिस्पर्धाओं के द्वारा विद्यार्थियों को छांटने के बजाय विभिन्न प्रकार की उच्च शिक्षा, प्रशिक्षण एवं रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराये जाएं।
(10)    शिक्षा को मानवीय, आनंददायक, संपूर्ण, सर्वांगीण, बहुमुखी, समानतापूर्ण, एवं संवेदनशील बनाने के लिए शिक्षण पद्धति और पाठ्यचर्या में आवश्यक बदलाव किए जाएं। बस्ते का बोझ कम किया जाए। किताबी एवं तोतारटन्त शिक्षा को बदलकर उसे ज्यादा व्यवहारिक, श्रम एवं कौशल प्रधान, जीवन से जुड़ा बनाया जाए। बच्चों के भीतर जिज्ञासा, तर्कशक्ति, विश्लेषणशक्ति और ज्ञानपिपासा जगाने का काम शिक्षा करे। बच्चों के अंदर छुपी विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं व क्षमताओं को पहचानकर उनके विकास का काम शिक्षा का हो। शिक्षा की जड़ें स्थानीय समाज, संस्कृति, देशज परंपराओं और स्थानीय परिस्थितियों में हो। शिक्षा को हानिकारक विदेशी प्रभावों एवं सांप्रदायिक आग्रहों से मुक्त किया जाए। संविधान के लक्ष्यों के मुताबिक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रकि भारत के प्रबुद्ध एवं जागरुक नागरिक तथा एक अच्छे इंसान का निर्माण का काम शिक्षा से हो।

(लेखक सुनील राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी जन परिषद् हैं)
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एक आह्वान

शिक्षा अधिकार विधेयक एक छलावा है,

शिक्षा का बाजारीकरण एक विकृति है,

देश के सारे बच्चों को मुफ्त, समतापूर्ण, गुणवत्तापू्र्ण शिक्षा के संघर्ष

के लिए आगे आएं

लोकसभा चुनाव में दुबारा जीतकर आने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के नए मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कई घोषणाएं की हैं। अपने मंत्रालय का 100 दिन का कार्यक्रम जारी करते हुए उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में अनेक प्रकार के सुधारों व बदलावों की मंशा जाहिर की है। उनकी घोषणाओं में प्रमुख हैं :-
शिक्षा में निजी-सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देना, देश में विदेशी विश्वविद्यालयों को इजाजत देना, कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा समाप्त करना, अंकों के स्थान पर ग्रेड देना, देश भर के कॉलेजों में दाखिला के लिए एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा लेना, व्यावसायिक शिक्षा के लिए बैंक ऋण में गरीब छात्रों को ब्याज अनुदान देना आदि। यशपाल समिति की सिफारिश को भी स्वीकार किया जा सकता है, जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि को समाप्त कर चुनाव आयोग की तर्ज पर ‘राष्ट्रीय उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने का सुझाव दिया गया है। अचरज की बात है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है, किन्तु श्री सिब्बल ने इन घोषणाओं के पहले राज्य सरकारों से परामर्श की जरुरत भी नहीं समझी।
इनमें से कुछ प्रावधान अच्छे हो सकते हैं, किन्तु कई कदम खतरनाक हैं और उन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की जरुरत है। इन घोषणाओं से प्रतीत होता है कि भारत सरकार और श्री कपिल सिब्बल भारत की शिक्षा की दुरावस्था से चिंतित हैं और उसको सुधारना चाहते हैं। लेकिन वास्तव में वे शिक्षा का निजीकरण एवं व्यवसायीकरण, शिक्षा में मुनाफाखोरी के नए अवसर खोलने, विदेशी शिक्षण संस्थाओं की घुसपैठ कराने, सरकारी शिक्षा व्यवस्था को और ज्यादा बिगाड़ने, साधारण बच्चों को शिक्षा से वंचित करने और देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने की सरकार की जिम्मेदारी से भागने की तैयारी कर रहे हैं। इन कदमों का पूरी ताकत से विरोध होना चाहिए। साथ ही अब समय आ गया है कि देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी संसाधनों से समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य व समता्पूर्ण शिक्षा के लिएश संघर्षको तेज किया जाए।

शिक्षा अधिकार विधेयक का पाखंड

‘बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार विधेयक’ संसद में काफी समय से लंबित है और इसका काफी विरोध हुआ है। वर्तमान स्वरुप में यह देश के बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने के बजाय छीनने का काम करता है। इस विधेयक में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, व्यवसायीकरण और बाजारीकरण पर रोक लगाने की कोई बात नहीं है। आज देश में शिक्षा की कई परतें बन गई हैं। जिसकी जैसी आर्थिक हैसियत है, उसके हिसाब से वह अपने बच्चों को उस स्तर के स्कूलों मे पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूलों की हालत जानबूझकर इतनी खराब बना दी गई है कि उनमें सबसे गरीब साधनहीन परिवारों के बच्चे ही जा रहे हैं। ऐसी हालत में उनकी उपेक्षा और बदहाली और ज्यादा बढ़ गई है। इस दुष्चक्र और भेदभाव को तोड़ने के बजाय यह विधेयक और मजबूत करता है।
विश्वबैंक के निर्देशों के तहत, शिक्षा के बाजार को बढ़ावा देने के मकसद से, पिछले कुछ वर्षों से केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों ने जानबूझकर सरकारी शिक्षा व्यवस्था बिगाड़ने का काम किया है। पहले तो देश के सारे बच्चों को स्कूली शिक्षा प्रदान करने के संवैधानिक निर्देश को पूरा करने के बजाय साक्षरता अभियान, औपचारिकेतर शिक्षा व शिक्षा गारंटी शालाओं के नाम पर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी टालने की कोशिश की। फिर स्कूलों व कॉलेजों में स्थायी-प्रशिक्षित शिक्षकों के  स्थान पर पैरा-शिक्षकों की नियुक्तियां शुरु कर दी,जो अस्थायी व अप्रशिक्षित होते हैं और जिन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है। इसी के साथ प्राथमिक शालाओं में दो या तीन शिक्षकों की कामचलाऊ नियुक्ति को भी वैधानिक स्वीकृति दे दी गई, जिसका मतलब है कि एक शिक्षक दो, तीन, चार या पांच कक्षाएं एक साथ पढ़ाएगा। देश के साधारण गरीब बच्चों को इस लायक भी सरकार ने नहीं समझा कि एक कक्षा के लिए कम से कम एक शिक्षक मुहैया कराया जाए। सरकारी शिक्षकों को तमाम तरह के गैर-शैक्षणिक कामों में लगाने पर भी रोक इस विधेयक में नहीं लगाई गई है, जिसका मतलब है सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का और ज्यादा अभाव एवं ज्यादा गैरहाजिरी। चूंकि निजी स्कूलों के शिक्षकों को इस तरह की कोई ड्यूटी नहीं करनी पड़ती है, सरकारी स्कूलों में जाने वाले साधारण गरीब बच्चों के प्रति भेदभाव इससे और मजबूत होता है। निजी स्कूलों के साधन-संपन्न बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा में इससे वे और कमजोर पड़ते जाते हैं।
निजी स्कूल कभी भी देश के सारे बच्चों को शिक्षा देने का काम नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनकी फीस चुकाने की क्षमता सारे लोगों में नहीं होती है। शिक्षा का निजीकरण देश में पहले से मौजूद अमीर-गरीब की खाई को और ज्यादा मजबूत करेगा तथा करोड़ों बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का काम करेगा। देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने के लिए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा व जिम्मेदारी लेनी होगी। लेकिन सरकार ने अपनी शिक्षा व्यवस्था को इस चुनौती के अनुरुप फैलाने, मजबूत करने और बेहतर बनाने के बजाय लगातार उल्टे बिगाड़ा है व उपेक्षति-वंचित किया है। सरकारी स्कूलों की संख्या में जरुर वृद्धि हुई है, स्कूलों में नाम दर्ज बच्चों की संख्या भी 90-95 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है, किन्तु इस कुव्यवस्था, घटिया शिक्षा, अनुपयुक्त व अरुचिपू्र्ण शिक्षा पद्धति, खराब व्यवहार एवं गरीबी की परिस्थितियों के कारण आधे से भी कम बच्चे 8 वीं कक्षा तक पहुंच पाते हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार की कोई भी बात करने के पहले देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सार्थक, संपूर्ण, सुव्यवस्थित व सर्वसुविधायुक्त बनाना जरुरी है। जो सरकार उल्टी दिशा में काम कर रही है, और जानबूझकर सरकारी स्कूल व्यवस्था को नष्ट करने का काम कर रही हैं, उसके द्वारा शिक्षा अधिकार विधेयक संसद में पास कराने की बात करना एक पाखंड है और आंखों में धूल झोंकने के समान है।

समान स्कूल प्रणाली एकमात्र विकल्प

देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके, इसके लिए यह भी जरुरी है कि देश में कानून बनाकर पड़ोसी स्कूल पर आधारित समान स्कूल प्रणाली लागू की जाए। इसका मतलब यह है कि एक गांव या एक मोहल्ले के सारे बच्चे (अमीर या गरीब, लड़के या लड़की, किसी भी जाति या धर्म के) एक ही स्कूल में पढ़ेंगे। इस स्कूल में कोई फीस नहीं ली जाएगी और सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाएगी। यह जिम्मेदारी सरकार की होगी और शिक्षा के सारे खर्च सरकार द्वारा वहन किए जाएंगे। सामान्यत: स्कूल सरकारी होगें, किन्तु फीस न लेने वाले परोपकारी उद्देश्य से (न कि मुनाफा कमाने के उद्देश्य से) चलने वाले कुछ निजी स्कूल भी इसका हिस्सा हो सकते हैं। जब बिना भेदभाव के बड़े-छोटे, अमीर-गरीब परिवारों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ेगें तो अपने आप उन स्कूलों की उपेक्षा दूर होगी, उन पर सबका ध्यान होगा और उनका स्तर ऊपर उठेगा। भारत के सारे बच्चों को शिक्षित करने का कोई दूसरा उपाय नहीं है। दुनिया के मौजूदा विकसित देशों में कमोबेश इसी तरह की स्कूल व्यवस्था रही है और इसी तरह से वे सबको शिक्षति बनाने का लक्ष्य हासिल कर पाए हैं। समान स्कूल प्रणाली का प्रावधान किए बगैर शिक्षा अधिकार विधेयक महज एक छलावा है।
इस विधेयक में और कई कमियां हैं। यह सिर्फ 6 से 14 वर्ष की उम्र तक (कक्षा 1 से 8 तक) की शिक्षा का अधिकार देने की बात करता है। इसका मतलब है कि बहुसंख्यक बच्चे कक्षा 8 के बाद शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। कक्षा 1 से पहले पू्र्व प्राथमिक शिक्षा भी महत्वपू्र्ण है। उसे अधिकार के दायरे से बाहर रखने का मतलब है सिर्फ साधन संपन्न बच्चों को ही केजी-1, केजी-2  आदि की शिक्षा पाने का अधिकार रहेगा। शुरुआत से ही भेदभाव की नींव इस विधेयक द्वारा डाली जा रही है।
शिक्षा अधिकार विधेयक में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों का आरक्षण गरीब बच्चों के लिए करने का प्रावधान किया गया है और उनकी ट्यूशन फीस का भुगतान सरकार करेगी। किन्तु महंगे निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा कई तरह के अन्य शुल्क लिए जाते हैं, क्या उनका भुगतान गरीब परिवार कर सकेगें ? क्या ड्रेस, कापी-किताबों  आदि का भारी खर्च वे उठा पाएंगे ? क्या यह एक ढकोसला नहीं होगा ? फिर क्या इस प्रावधान से गरीब बच्चों की शिक्षा का सवाल हल हो जाएगा ? वर्तमान में देश में स्कूल आयु वर्ग के 19 करोड़ बच्चे हैं। इनमें से लगभग 4 करोड़ निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। मान लिया जाए कि इस विधेयक के पास होने के बाद निजी स्कूलों में और 25 प्रतिशत यानि 1 करोड़ गरीब बच्चों का दाखिला हो जाएगा, तो भी बाकी 14 करोड़ बच्चों का क्या होगा ? इसी प्रकार जब सरकार गरीब प्रतिभाशाली बच्चों के लिए नवोदय विद्यालय, कस्तूरबा कन्या विद्यालय, उत्कृष्ट विद्यालय और अब प्रस्तावित मॉडल स्कूल खोलती है, तो बाकी विशाल संख्या में बच्चे और ज्यादा उपेक्षति हो जाते है। ऐसी हालत में, देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार देने की बात महज एक लफ्फाजी बनकर रह जाती है।

शिक्षा का मुक्त बाजार ?

वास्तव में नवउदारवादी रास्ते पर चल रही भारत सरकार देश में शिक्षा का मुक्त बाजार बनाने को प्रतिबद्ध है और उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। शिक्षा में सरकारी-निजी भागीदारी का मतलब व्यवहार में यह होगा कि या तो नगरों व महानगरों की पुरानी सरकारी शिक्षण संस्थाओं के पास उपलब्ध कीमती जमीन निजी हाथों के कब्जे में चली जाएगी या फिर प्रस्तावित मॉडल स्कूलों में पैसा सरकार का होगा, मुनाफा निजी हाथों में जाएगा। निजीकरण के इस माहौल में छात्रों और अभिभावकों का शोषण बढ़ता जा रहा है। बहुत सारी घटिया, गैरमान्यताप्राप्त और फर्जी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ आ गई है। दो-तीन कमरों में चलने वाले कई निजी विश्वविद्यालय आ गए हैं और कई निजी संस्थानों को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। कोचिंग और ट्यूशन का भी बहुत बड़ा बाजार बन गया है। बड़े कोचिंग संस्थान तो करोड़ों की कमाई कर रहे है। अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को पढ़ाना व प्रतिस्पर्धामें उतारना दिन-प्रतिदिन महंगा व मुश्किल होता जा रहा है। गरीब और साधारण हैसियत के बच्चों के लिए दरवाजे बंद हो रहे है।
यदि कपिल सिब्बल की चलेगी तो अब कॉलेज में दाखिले के लिए भी अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा होगी। इससे कोचिंग का बाजार और बढ़ेगा तथा साधारण हैसियत के युवाओं के लिए कॉलेज शिक्षा के दरवाजे भी बंद होने लगेगें। आत्महत्याओं व कुंठा में और बढ़ोत्तरी होगी। विडंबना यह है कि बच्चों का परीक्षा का तनाव कम करने की बात करने वाले सिब्बल साहब को गलाकाट प्रतिस्पर्धाओं और कोचिंग कारोबार के दोष नहीं दिखाई देते। महंगी निजी शिक्षा के लिए उनका फार्मूला है शिक्षा ऋण तथा गरीब विद्यार्थियों के लिए इस ऋणमें ब्याज अनुदान। लेकिन बहुसंख्यक युवाओं की कुंठा, वंचना और हताशा बढ़ती जाएगी।
यदि देश के दरवाजे विदेशी शिक्षण संस्थाओं और विदेशी विश्वविद्यालय के लिए खोल दिए गए, तो बाजार की यह लूट व धोखाधड़ी और बढ़ जाएगी। यह उम्मीद करना बहुत गलत एवं भ्रामक है कि दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भारत में आने को तत्पर है और इससे देश में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा। वास्तव में घटिया, चालू और मुनाफे व कमाई की खोज में बैचेन विश्वविद्यालय व शिक्षण संस्थान ही आएंगे। देश के जनजीवन के लगभग हर क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के मुनाफे के लिए खोलने के बाद अब शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया आदि के बाकी क्षेत्रों को भी विदेशी कंपनियों के लूट व मुनाफाखोरी के हवाले करने की यह साजिश है। यह सिर्फ आर्थिक लूट ही नहीं होगी। इससे देश के ज्ञान-विज्ञान, शोध, चिन्तन, मूल्यों और संस्कृति पर भी गहरा विपरीत असर पड़ेगा। इसका पूरी ताकत से प्रतिरोध करना जरुरी है।

स्वतंत्र आयोग या निजीकरण का वैधानीकरण ?

यशपाल समिति की पूरी रिपोर्ट का ब्यौरा सामने नहीं आया है। उच्च शिक्षा की बिगड़ती दशा के बारे में उसकी चिंता जायज है। डीम्ड विश्वविद्यालयों की बाढ़ के बारे में भी उसने सही चेतावनी दी है। किन्तु यू.जी.सी., अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि समाप्त करके उनके स्थान पर चुनाव आयोग जैसा स्वतंत्र एवं स्वायत्त ‘उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने के सुझाव पर सावधानी की जरुरत है। पिछले कुछ समय में, विश्व बैंक के सुझाव पर अनेक प्रांतो में विद्युत नियामक आयोग एवं जल नियामक आयोग बनाए गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दूरसंचार व बीमा के लिए भी इस तरह के आयोग बने हैं। दरअसल ये सारे आयोग निजीकरण के साथ आए हैं। जब तक सब कुछ सरकार के हाथ में था, आयोग की जरुरत नहीं थी। यह कहा जाता है कि ये आयोग सरकार से स्वतंत्र एवं स्वायत्त होते हैं और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होते हैं। लेकिन विश्वबैंक और देशी-विदेशी कंपनियों का प्रभाव उन पर काम करता रहता है। कम से कम बिजली और पानी के बारे में इन आयोगों की भूमिका निजीकरण की राह प्रशस्त करना, उसे वैधता देने और बिजली-पानी की दरों को बढ़ाने की रही है। उन्हें राजनीति से अलग रखने के पीछे मंशा यह भी है कि जन असंतोष और जनमत का दबाब उन पर न पड़ जाए। उच्च शिक्षा और स्कूली शिक्षा के बारे में इस तरह के आयोगों की भूमिका भी निजीकरण को वैधता प्रदान करने की हो सकती है, जबकि जरुरत शिक्षा के निजीकरण को रोकने व समाप्त करने की है। अफसोस की बात है कि यशपाल समिति ने उच्च शिक्षा के निजीकरण और विदेशी संस्थानों के घुसपैठ का स्पष्ट विरोध नहीं किया है।

आइए, आठ सूत्री देशव्यापी मुहिम छेड़ें

शिक्षा का बाजार एक विकृति है। बच्चों में शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण में भेदभाव करना
आधुनिक सभ्य समाज पर कलंक के समान है। देश के सारे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना हमारा संवैधानिक दायित्व है। भारतीय संविधान में इस काम को 10 वषZ में पूरा करने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन छ: दशक में भी इसे पूरा न करके भारत की सरकारों ने भारत की जनता, देश और संविधान के प्रति अक्षम्य अपराध किया है। अब सरकार जो कदम उठा रही हैं,उससे यह लक्ष्य और दूर हो जाएगा। समय आ गया है कि इस मामले में देश भर में मुहिम चलाकर भारत सरकार पर दबाब बनाया जाए कि –
1.    शिक्षा के निजीकरण, व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी को तत्काल रोका जाए और इस दिशा में उठाए गए सारे कदम वापस लिए जाएं।
2.    शिक्षा में विदेशी शिक्षण संस्थानों के प्रवेश पर रोक लगे।
3.    शिक्षा में सभी तरह के भेदभाव और गैरबराबरी खतम की जाए। समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य एवं समतामूलक शिक्षा की व्यवस्था देश के सारे बच्चों के लिए अविलंब की जाए।
4.    सरकारी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में स्थायी व प्रशिक्षति शिक्षक नियुक्त किए जाएं और उन्हें सम्मानजनक वेतन दिए जाएं। स्कूलों में भवन, पाठ्य-पुस्तकों, पाठ्य सामग्री, खेल सामग्री, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शिल्प-शिक्षण, छात्रवृत्तियों, छात्रावास आदि की पर्याप्त एवं समुचित व्यवस्था हो। सुविधाओं व स्तर की दृष्टि से प्रत्येक स्कूल को केन्द्रीय विद्यालय या नवोदय विद्यालय के समकक्ष लाया जाए।
5.    ‘शिक्षा का अधिकार विधेयक’ के मौजूदा प्रारुप को तत्काल वापस लेकर उक्त शर्तोंको पूरा करने वाला नया विधेयक लाया जाए। विधेयक के मसौदे पर पूरे देश में जनसुनवाई की जाए एवं चर्चा-बहस चलाई जाए।
6.    शिक्षा की जिम्मेदारी से भागना बंद करके सरकार शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। कोठारी आयोग एवं तपस सेनगुप्ता समिति की सिफारिश के मुताबिक कम से कम राष्ट्रीय आय के छ: प्रतिशत के बराबर व्यय सरकार द्वारा शिक्षा पर किया जाए।
7.    शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। शिक्षा, प्रशासन एवं सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी का वर्चस्व गुलामी की विरासत है। इसे तत्काल समाप्त किया जाए।
8.    मैकाले द्वारा बनाया शिक्षा का मौजूदा किताबी, तोतारटन्त, श्रम के तिरस्कार वाला, जीवन से कटा, विदेशी प्रभाव एवं अंग्रेजी के वर्चस्व वाला स्वरुप बदला जाए। इसे आम लोगों की जरुरतों के अनुसार ढाला जाए एवं संविधान के लक्ष्यों के मुताबिक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रकि एवं प्रगतिशील भारत के निर्माण के हिसाब से बनाया जाए। हर बच्चे के अंदर छुपी क्षमताओं व प्रतिभाओं के विकास का मौका इससे मिले।
लगभग इसी तरह के मुद्दों व मांगो को लेकर 21-22 जून को एक राष्ट्रीय सेमिनार में अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच का गठन हुआ है, जिसकी ओर से जुलाई में संसद पर प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। अखिल भारतीय समाजवादी अध्यापक सभा द्वारा भी काफी समय से इन मुद्दों पर मुहिम चलाई जा रही है जिसका समापन  25 अक्टूबर 2009 को दिल्ली मे राजघाट पर होगा।
कृपया आप भी अपने क्षेत्र में व अपनी इकाइयों में इन मुद्दों व मांगो पर तत्काल कार्यक्रम लें। आप गोष्ठी, धरने, प्रदर्शन, ज्ञापन, परचे वितरण, पोस्टर प्रदर्शनी आदि का आयोजन कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर शिक्षकों, अभिभावकों, विद्या्र्थियों, जागरुक नागरिकों व अन्य जनसंगठनों के साथ मिलकर ‘शिक्षा अधिकार मंच’ का गठन भी कर सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि यह वर्ष प्रखर समाजवादी नेता डॉ० राममनोहर लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष है। उनके नेतृत्व में पचास साल पहले ही समाजवादी आंदोलन ने मुफ्त और समान शिक्षा का आंदोलन छेड़ा था तथा अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध किया था। ‘चपरासी हो या अफसर की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’ तथा ‘चले देश में देशी भाषा, गांधी-लोहिया की यह अभिलाषा’ के नारे देते हुए शिक्षा में भेदभाव समाप्त करने का आह्वान किया था। डॉ. लोहिया की जन्मशताब्दी पर उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि इस आवाज को हम फिर से पूरी ताकत से बुलंद करें।

सुनील
राष्ट्रीय अध्यक्ष
समाजवादी जन परिषद्
ग्राम/पोस्ट – केसला
जिला होशंगाबाद
फोन 09425040452

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म.प्र. का बैतूल जिला पुलिस द्वारा महिलाओं पर अत्याचार के लिए प्रसिद्ध होता जा रहा है। बीते दिनों बैतूल जिले में एक सप्ताह के अंदर दो घटनाएं घटी। पहले 27 मई को सारणी में निजी सुरक्षा गार्डों द्वारा महिलाओं के साथ छेड़खानी का विरोध होने पर गोली चलाकर एक आदिवासी युवक की जान ले ली गई तथा छ: युवकों को घायल कर दिया गया।
पुलिस ने महिलाओं एवं गरीब बस्ती के पक्ष में खड़े होने के बजाय मामूली धाराओं का प्रकरण बनाकर हत्यारों को बचा लिया। दूसरी घटना में पुलिस ने 2 जून की रात्रि को आमला थाने में एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया।
आमला की घटना इस प्रकार है। पास के गांव जंबाड़ा की 48 वर्षीय दलित महिला जानकीबाई को उनके पति व बेटे के साथ आमला पुलिस ने दहेज प्रताड़ना के केस में 2 जून को गिरफ्तार किया। मुलताई न्यायालय द्वारा जानकीबाई को इस केस में जमानत नहीं दी गई व उन्हें बैतूल जेल ले जाने का आदेश दिया गया। आमला पुलिस उन्हें बैतूल जेल न ले जाकर आमला थाने ले कर गई। जहां रात में शराब के नशे में थाना प्रभारी सहित चार पुलिस वालों ने उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया। अगले दिन दोपहर में जानकीबाई को बैतूल जेल ले जाया गया। जहां शाम को जानकीबाई ने कम्पाउंडर व महिला प्रहरी के माध्यम से जेलर को बलात्कार की घटना के बारे में बताया। जेलर ने तुरंत बैतूल पुलिस अधीक्षक को फोन किया व अगले दिन 4 जून को लिखित आवेदन महिला के बयान के साथ एस.पी., कलेक्टर आदि को भेजा। इसी दिन पीड़ित महिला का मेडिकल परीक्षण व अजाक (अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिला कल्याण) थाना में प्रथम सूचना रपट दर्ज की गयी। अगले दिन 5 जून को महिला को जमानत मिली और 6 जून को वो जेल से बाहर आई ।
सारणी की घटना इस प्रकार है। यहां पर म०प्र० के बड़ा ताप विद्युतगृह है। मध्यप्रदेश बिजली बोर्ड के प्राइवेट सुरक्षा गा्र्ड यहां कि शक्तिपुरा बस्ती की आदिवासी व दलित महिलाओं के साथ छेड़खानी करते रहते थे। 27 मई को जब सावित्री बाई व कुछ अन्य महिलाएं बस्ती के पास नाले में कपड़े धोने गई और वहां से गुजरते हुए म.प्र. बिजली बोर्ड के निजी सुरक्षा गा्र्ड छेड़खानी करने लगे। तो कुछ महिलाएं बस्ती से कुछ लड़कों को बुला लाई । जब इन लड़को ने इन सुरक्षा गार्डों का प्रतिरोध किया तो निजी सुरक्षा गार्डों ने इन लड़कों पर गोलियां चला दी।
पुलिस ने इन घायल व मरने वाले लड़को पर कोयला चोरी व पत्थर मारने का झूठा आरोप दर्ज किया है। साथ ही निजी सुरक्षा गार्डों पर आत्मरक्षा में गोली चलाने का केस बनाकर मामले को हल्का बना दिया। सभी गार्डों की जमानत हो चुकी है व वे खुल्ले घूम रहे हैं ।
समाजवादी जन परिषद् ने इन दोनों घटनाओं में पुलिस की मनमानी व अत्याचार के खिलाफ 11 जून को बैतूल में धरना प्रदर्शन व आमसभा का आयोजन किया। बाद में भोपाल से म०प्र० महिला मंच का एक जांच दल, जिसमें स.ज.प. से भी दो महिला साथी शामिल थी, इन दोनों जगह पर गया। जो जांच पड़ताल उन्होनें की, उसके आधार पर एक रिपोर्ट उन्होनें तैयार की हैं। इस रिपो्र्ट में निम्न तथ्य सामने आए।
आमला की घटना में :-
(1)    पुलिस ने जानबूझकर पीड़ित महिला का बयान दर्ज करने व मेडिकल परीक्षण करवाने में देरी की।
(2)    सामान्यत: बलात्कार के मामले में महिला के बयान व मेडिकल परीक्षण के बाद आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाता है। किन्तु इस घटना के 25 दिन बाद तक आरोपी पुलिसक्र्मियों को गिरफ्तार नहीं किया गया है। ये कहकर बात टाली जा रही है कि इस मामले की जांच चल रही है। हालांकि आम लोगों पर जब बलात्कार का आरोप लगता है, उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है।
(3)    पीड़ित महिला के साड़ी ब्लाउज तो साक्ष्य के रुप में जब्त कर लिए गए हैं। किन्तु सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य वो गमछा था जिससे बलात्कारियों ने महिला के हाथ बलात्कार के समय बांधा था। इसी गमछे से जानकी्बाई ने बलात्कार के बाद अपने शरीर को पोंछा था। पीड़ित महिला के हर बयान में उस गमछे का जिक्र है फिर भी इस गमछे को जब्त क्यों नहीं किया गया?
(4)    अभी तक कोई पहचान परेड नहीं कराई गई। इस घटना की जांच शुरु होने से पहले आरोपियों के पास 2 से 3 दिन का समय था जिसमें वो आराम से घटनास्थल से सारे साक्ष्य गायब कर सकते थे।
(5)    दो पुलिसकर्मियों का स्थानांतरण दूसरे जिलों में किया गया है जबकि बाकी दो अभी भी उसी थाने में कार्यरत हैं। इतना गंभीर अपराध पुलिस द्वारा पुलिस हिरासत में जानकीबाई के साथ हुआ है, लेकिन न तो पुलिस वालों की गिरफ्तारी हुई, न ही उनका निलंबन हुआ।
(6)    जिला कलेक्टर ने इस मामले की न्यायिक जांच जिला जज को सौंपी है, जिन्होनें इस मामले को आमला के अतिरिक्त जज को सौंप दिया है। वे स्थानीय व्यक्ति हैं व आसानी से प्रभावित किए जा सकते हैं।
(7)    म०प्र० महिला आयोग की टीम 05 जून को पीड़ित महिला से मिली थी। उस टीम मे एक महिला डॉक्टर भी थीं और उन्होनें महिला का परीक्षण करने पर स्पष्ट कहा कि बलात्कार होने के संकेत हैं। दूसरी ओर महिला चिकित्सक डॉ. वंदना घोघरे जिन्होंने प्रशासन की ओर से जानकीबाई का मेडिकल परीक्षण किया है उन्होंने अपनी रिपोर्ट में – हाल में संभोग के बारे में कोई स्पष्ट राय नहीं- कहकर मामले को कमजोर बनाने की कोशिश की हैं।

सारणी की घटना में :-
(1)    सावित्री बाई (जिनके साथ छेड़खानी हुई) छेड़खानी की घटना की रिपोर्ट कराने 27 मई से दो-तीन बार पहले भी सारणी थाने गई थी। पर थानेदार ने उनकी रिपोर्ट दर्ज करें बगैर ही उन्हें वापस लौटा दिया।
(2)    निजी सुरक्षा गार्डों की तरफ से जो एफ.आई.आर. बस्ती के युवकों पर दर्ज किए गए हैं वे काफी मनमाने हैं। उसमें कोयला चोरी की बात कही गई है पर इस बाबत पुलिस के पास कोई साक्ष्य नहीं हैं। पुलिस ने कोयला चोरी का कोई अलग प्रकरण भी नहीं बनाया है।
(3)    सावित्री बाई के साथ छेड़खानी का रिपोर्ट में कहीं कोई उल्लेख भी नहीं है और न ही उसका कोई प्रकरण पुलिस ने बनाया है।
(4)    गार्डों ने जो गोलियां चलाईं, यदि वे आत्मरक्षा में चलाई हैं तो गोली के सारे छर्रे युवकों को कमर के ऊपर क्यों लगे हैं ? घायल लोगों में से किसी किसी को 27-30 छर्रे लगे हैं क्या इतनी गोलियां चलाना आत्मरक्षा में वाजिब माना जा सकता है ?
(5)    घटना का स्थल भी विवादास्पद हैं। पुलिस ने जिस स्थान को अपराध स्थल बतायाहै वो म०प्र० बिजली बोर्ड के परिसर के पास और बस्ती से दूर हैं। बस्ती के लोग जिस स्थान को अपराध स्थल बता रहे हैं वो बस्ती के पास और म०प्र० बिजली बो्र्ड के परिसर से 2-3 किमी दूर है।
(6)    पीड़ित महिला व बस्ती के अन्य लोग जब अ.जा.क. थाने, बैतूल में रिपोर्ट दर्ज कराने गए तो इनकी रिपो्र्ट ही नहीं दर्ज की गई।
इन दोनों घटनाओं से यह स्पष्ट हैं कि पुलिस का जो ढांचा हमारे देश में हैं वो बहुत ही भ्रष्ट है। पुलिस को अपने अधिकारों का मनमाना उपयोग करने की बहुत ज्यादा आजादी है। पुलिस चाहे तो कोई रिपोर्ट दर्ज करे, चाहे तो रिपो्र्ट ही न दर्ज करे, जो मन मे आए वो प्रकरण बनाए, चाहे तो किसी पर भी झूठा केस बना दे और चाहे तो पैसा लेकर केस रफा-दफा कर दे।
आमला वाले मामले में यह विडंबना भी दिखाई देती है कि महिलाओं के हित में दहेज के खिलाफ जो कानून बना है उसे पुलिस ने एक महिला को ही प्रताड़ित करने के लिए इस्तेमाल किया। अत: जब तक  इस भ्रष्ट पुलिस और प्रशासन का ढांचा नहीं बदला जाता तब तक सिर्फ़ महिलाओं की रक्षा के कानून बना देने से कुछ नहीं होने वाला।
म०प्र० में जहां एक ओर मुख्यमंत्री प्रदेश में सुशासन, महिलाओं का सम्मान व भारतीय संस्कृति के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं पर खुलेआम अत्याचार हो रहे हैं और अत्याचारियों को बचाया जा रहा है।
पिछले दिनों म०प्र० में और भी कई महिलाओं पर पुलिस द्वारा अत्याचार की घटनाएं हुई हैं। उनमें से कुछ का विवरण इस प्रकार है –
(1)    पन्ना जिले के सिमरिया पुलिस थाना में एक नाबालिग लड़की बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करने आई थी। ये 2 मार्च 2009 की घटना है। उसकी रि्पोर्ट दर्ज करने के बजाय सब इंस्पेक्टर नरेन्द्र सिंह ठाकुर व अन्य दो पुलिसवालों ने उस लड़की के साथ थाने में ही सामूहिक बलात्कार किया।
(2)    30 अप्रैल को रायसेन जिले में गूगलवाड़ा ग्राम की नौ साल की बालिका के साथ बलात्कार हुआ। मगर पुलिस ने मामूली छेड़छाड़ का मामला दजZ किया और केस को हल्का बना दिया।

लेखिका :शिउली वनजा
केसला, जिला – होशंगाबाद
(म०प्र०)

[ शिउली वनजा नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्र की छात्रा है तथा विद्यार्थी युवजन सभा की सदस्य है । उपर्युक्त जांच दल में वह शामिल थी । ]

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