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Archive for अक्टूबर 22nd, 2009

[मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में वन्य प्राणियों के लिए तीन सुरक्षित उद्यान/अभयारण्य बनाए गए है– सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभयारण्य और पचमढ़ी अभयारण्य। तीनों को मिलाकर फिर सतपुड़ा टाईगर रिजर्व बनाया गया है। तीनों के अंदर कुल मिलाकर  आदिवासियों के लगभग 75 गांव है और इतने ही गांव बाहर सीमा से लगे हुए है। इन गांवों के लोगों की जिंदगी और रोजी–रोटी का मुख्य आधार जंगल है। पर अब इन गांवों को हटाया जा रहा है। बोरी अभयारण्य का धांई पहला गांव है जिसे हटाया जा चुका है। बाबा मायाराम विस्थापन झेल रहे आदिवासियों पर मेरे चिट्ठों पर लिखते रहे हैं । प्रस्तुत है इस क्रम की दूसरी कड़ी। बाबा मायाराम की अति शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक में इस प्रकार के लेख होंगे । उन्होंने यह लेख इन्टरनेट पाठकों के लिए सहर्ष दिए हैं । कोई पत्रिका/अखबार/फीचर एजंसी/वेब साइट यदि इसे प्रकाशित करना चाहती है तो यह उम्मीद की जाती है कि पारिश्रमिक और कतरन बाबा मायाराम को भेजे। – अफ़लातून]
दोपहर भोजन की छुट्टी में बच्चे खेल रहे हैं। उछल–कूद रहे हैं। शिक्षक अपने कक्ष में बैठे कुछ लोगों से गप–शप कर रहे हैं। इसी समय मैं अपने एक सहयोगी के साथ नई धांई स्कूल पहुंचा। यह गांव नया है, जो वर्ष 2005 के आसपास ही अस्तित्व में आया है। पहले यह गांव बोरी अभयारण्य के अंदर बसा था। सतपुड़ा टाईगर रिजर्व के अंतर्गत आने वाले बोरी अभयारण्य के इस गांव को विस्थापित कर बाबई तहसील में सेमरी हरचंद के पास बसाया गया है।

एक साथ पांच कक्षाएं

एक साथ पांच कक्षाएं

नई धांई की बसाहट पूरी हो गई है। बड़े आकार के कबेलू (खपरैल) वाले मकान बन गए हैं। घरों के पीछे बाड़ी है, जिसमें मक्का बोया गया है। आधी–अधूरी पक्की सड़कें बन गई है। गांव में घुसते ही एक बोर्ड लगा है जिसमें नई धांई का मोटा–मोटी ब्यौरा दिया गया है। सतही तौर पर देखने में यहां सुंदर बसाहट और पुनर्वास का आभास मिलता है पर यहां के  बच्चों और ग्रामीणों से बात करने पर उजड़ने का दर्द छलकने लगता है।

यहां की आबादी 336 के करीब है। यहां के बाशिन्दे सभी कोरकू आदिवासी हैं। पुराना गांव धांई जंगल के अंदर था। जहां आदिवासियों का जीवन जंगल और आंशिक तौर पर  खेती पर आधारित था। नई बसाहट में यहां हर परिवार को 5–5 एकड़ जमीन मिली है। पर ज्यादातर खेतों में पेड़ के ठूंठ होने के कारण खेती में अड़चन आ रही है।

छुट्टी के बाद स्कूल फिर शुरू हुआ। यहां पांच कक्षाएं और शिक्षक एक है। नियुक्ति तो एक और शिक्षिका की है पर वह 3 माह के लिए प्रसूति अवकाश पर है। स्कूल में बच्चों की कुल दर्ज संख्या 78 है। जब शिक्षक से यह पूछा कि आप अकेले 5 कक्षाएं कैसे संभालते हैं ? शिक्षक ने इसके जवाब में आसमान की ओर देखा जैसे कह रहे हो– भगवान भरोसे। फिर संभलते हुए कहा कि गांव का एक और पढ़ा–लिखा लड़का स्वैच्छिक रूप से बच्चों की पढ़ाई में मदद करता है।

दीदी के साथ पढ़ते हैं

दीदी के साथ पढ़ते हैं

एक ही कमरे में सभी पांचों कक्षाओं  के बच्चे ठुंसे हुए थे। मैले–कुचैले और फटे–पुराने कपड़े पहने आपस में बतिया रहे थे। स्वैच्छिक मदद करनेवाला युवक कुर्सी पर बैठकर उन्हें पढ़ा रहा था। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि वह कौन सी कक्षा के छात्रों को पढ़ा रहे हैं क्योंकि उनके हाथ में कोई किताब तो थी नहीं। जाहिर है जब उनकी नियुक्ति नहीं हुई है तो उन्हें पढ़ाने–लिखाने का कोई प्रशिक्षण भी नहीं मिला होगा।

जब मैंने कक्षा में जाकर बच्चों से बात करने की इच्छा जाहिर की। वह युवक अपने आप कुर्सी छोड़कर बाहर चला गया। जैसे वह इससे मुक्त होना चाह रहा था। तत्काल कक्षा हमारे हवाले कर दी। उस कमरे में शायद ज्यादा लोगों के बैठने की जगह भी नहीं थी। मैं बच्चों के साथ टाटपट्टी पर बैठ गया। शिक्षक ने हमें बच्चों से बात करने का मौका दिया। मैंने उनसे पूछा आपकी अपने पुराने गांव की सबसे अच्छी क्या याद है? सबने कोरस में जवाब दिया–नदी की।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक नदियों के नाम गिनाएं–बोरी नदी, काकड़ी नदी और सोनभद्रा। सोनभद्रा यहां की बड़ी नदी है। कई और छोटे नदी–नाले हैं। छोटे–छोटे नदी घाटों के नाम बताएं। वे आगे कहते है कि हम इनमें कूद–कूदकर नहाते थे, डंगनियां से मछली और केकड़ा पकड़ते थे। अब यहां पानी ही नहीं है। वे सब तैरना जानते हैं। इनमें से कुछ नदियां सदानीरा है। इनमें साल भर पानी रहता है। वहां तो एक नदी में मगर भी रहता था।

क्या आपको जंगल से भी कुछ चीजें खाने की मिलती थी? इसके जवाब में दिलीप, सोनू, आशा और विजय आदि ने बहुत सारे फल, फूल और पत्तों के नाम गिनाए। जैसे तेंदू , अचार (जिसे फोड़कर चिरौंजी प्राप्त होती है) , कबीट , सीताफल , गुल्ली (महुए के बीज वाला फल)  , पीपल का बीज, जामुन, इमली, आम, बेर, मकोई, आंवला इत्यादि। उन्होंने कई जंगली जानवरों को भी देखा है– जैसे शेर, भालू, हाथी, सुअर, चीतल, नीलगाय, जंगली भैंसा, सोनकुत्ता, सियार, बंदर आदि।

इस बातचीत के दौरान धीरे–धीरे उनकी झिझक खत्म हो गई। उनका उत्साह बढ़ने लगा। वे वहां की कई बातें खुलकर बताने लगे। कक्षा में बहुत शोर होने लगा। हर बच्चा कुछ न कुछ बताना चाह रहा था। लड़के–लड़कियां सब कोई। उन्हें याद है वहां के पहाड़, पत्थर, पेड़, नदी और वहां का अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य। सोनू, दिलीप, आशा, सीमा, विनेश, विजय, रवि आदि कई बच्चों ने अपनी यादें साझा कीं। वे ऐसे बता रहे थे जैसे यह सब बातें कल की हो।
यहां का चौथी कक्षा में पढ़नेवाला अनिकेश कहता है मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता। जब वे अपने गांव से उजड़ रहे थे तब उसे पता भी नहीं था कि कहां जा रहे है। वह कहता है हम अपनी बात अपने मां–बाप से भी नहीं कह पाते। वे सुबह से काम पर चले जाते हैं। फिर उनसे क्या कहें ? जब कभी ज्यादा मन भर आता है तब दोस्तों के साथ पास ही सिद्ध बाबा चले जाते हैं। जब उससे यह पूछा कि अगर उसे कहीं और ले जाया जाए तो उसे क्या–क्या चीजें चाहिए जिनसे उसे अच्छा लगेगा। उसने जवाब दिया– नदी, जंगल, पहाड़ और गाय–बैल। मैं सोच रहा था कि इन जंगल क्षेत्र के बच्चों को अपने परिवेश, जंगल–पहाड़ कितने प्रिय हैं ? काश, उनके आसपास ये चीजें होती और उनके पाठ्यक्रम में होती।

यह साफ है कि अब इन बच्चों को वह स्वच्छ , ठंडा और खुला वातावरण नहीं मिलेगा। उन्हें जंगल, पेड़ , पहाड़ , पत्थर , नदियां नहीं मिलेगी , जिनसे वे रोज साक्षात्कार करते थे, वहां खेलते थे।  जंगली जानवर नहीं मिलेंगे, जिनके संग खेलकर वे बड़े हुए थे। वे फल–फूल, पत्तियां और शहद नहीं मिलेगी , जिसे वे यूं ही तोड़कर खा लिया करते थे। अब उनकी दिनचर्या और जिंदगी बदल गई है। अब नदी की जगह उनके पास हैंडपंप हैं जिनमें ज्यादा मेहनत करने पर पानी कम टपकता है। जंगल और पहाड़ उनकी स्मृतियों में हैं। इन बच्चों को ठीक से पता भी नहीं है ​कि वे जंगल के गांव से यहां क्यों आ गए ?

बच्चों से संबंधित तमाम कानूनों की मोटी किताबों में बच्चों के लिए बहुत से प्रावधान हैं। संयुक्त राष्ट्र का समझौता है। संविधान में शिक्षा व पोषण का अधिकार है। बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट का समझौता है। उस पर भारत सरकार ने 12 नवंबर 1992 को दस्तख्वत कर अपनी मुहर लगाई है। उसमें बच्चों के जीने का अधिकार , विकास का , सुरक्षा और सहभागिता का अधिकार दिए गए है।  लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में बच्चों की हालत अच्छी नहीं है। मध्यप्रदेश में तो इस साल कई स्थानों से कुपोषण से मौतों की खबरें आई है। आदिवासियों में कुपोषण और भी अधिक है। विस्थापन जैसे जीवन में बड़े जीवन में बड़े बदलाव लानेवाले निर्णयों में बच्चों के बारे में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जीवन में उथल–पुथल लाने वाले ऐसे निर्णयों में उनकी सहभागिता होनी चाहिए। लेकिन उनसे कभी उनकी रूचियों व राय के बारे में नहीं पूछा जाता है। उनकी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

पाठशाला : नई धाईं

पाठशाला : नई धाईं

अक्सर विस्थापन के समय यह दलील दी जाती है कि बच्चों का भविष्य बेहतर होगा। और ग्रामीण भी अपने बच्चों का भविष्य जंगल के बाहर ही देखते हैं। यह स्वाभाविक है। लेकिन नई धांई के स्कूल को देखकर ऐसी कोई उम्मीद बंधती नजर नहीं आती। जहां पांच कक्षा और एक शिक्षक है। स्कूल के ही एक हिस्से में राशन का वितरण होता है। जबकि राशन का भंडारण बाजू में स्थित आंगनबाड़ी भवन में है। ऐसे में बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं की जा सकती।

– बाबा मायाराम

लेखक का सम्पर्क पता : अग्रवाल भवन , निकट पचमढ़ी नाका , रामनगर कॉलॉनी, पिपरिया , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश , 461775 .

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