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Archive for अक्टूबर 25th, 2009

मुख्य अतिथिद्वय

मुख्य अतिथिद्वय

प्रियंकर साहित्य , काम – काज की भाषा और चिट्ठेकारी इन सभी मोर्चों पर हिन्दी-सेवा में लगे हैं । अपने तजुर्बे से उन्हों ने मुझे बताया था कि तदर्थवाद ने हिन्दी का नुकसान किया है । विभूति राय प्रशासनिक अधिकारी रहते हुए सिर्फ़ साहित्य से नहीं जुड़े रहे उनके स्पष्ट , प्रतिबद्ध सामाजिक सरोकार भी रहे हैं । इसलिए तदर्थवाद की कमजोरी को वे भी समझते ही होंगे । इस सेमिनार के तदर्थवाद की बाबत निमन्त्रणकर्ताओं से जल्दबाजी की शिकायत  के बारे में उन्होंने उद्घाटन सत्र की सदारत करते हुए खुद जिक्र किया तथा खेद प्रकट किया । निश्चित तौर पर किसी हद तक सेमिनार और चिट्ठेकारी ने इसका खामियाजा भुगता । स्कू्ली बच्चों को जैसे ’अधिकार के साथ कर्तव्य’ पर निबन्ध लिखवाया जाता है या ’विज्ञान : वरदान नहीं अभिशाप है’ पर वाद-विवाद करवाया जाता है उसी लहजे में नामवर सिंह ने जो विधा ही खुद अभी पल्लवित हो रही है उससे जुड़े़ लोगों को सन्देश दिया ।

लाजमी तौर पर स्मरण हो आया कि हमारे देश में अभिव्यक्ति के तमाम हक़ जिन १९ महीनों में मुल्तबी रखे गये थे तब नामवर सिंह का दल (भाकपा,इसके निशान पर वे चुनाव भी लड़े हैं) और उससे जुड़ा अध्यापक संगठन कैसे तानाशाह के छुटभैय्ये बने हुए थे । भाकपा का गद्दारी करने के बाद ’ऐतिहासिक भूल कबूलने’ का भी इतिहास है । ’७४ दिसम्बर में इलाहाबाद में तरुण शान्ति सेना द्वारा युवाओं के राष्ट्रीय सम्मेलन में ’जयप्रकाशजी आए हैं ,सन’  ’४२ लाए हैं’ के नारों से अगस्त क्रान्ति के नायक का युवजनों ने अभिवादन हमने भी किया था । अगस्त क्रान्ति ( ’४२ ) तथा दु:शासन पर्व (अपातकाल ) के गद्दारों को याद करना जरूरी नहीं है। लोहिया कहते थे ,’गद्दार या गद्दारी अपने आप में इतना खतरनाक नहीं होते । यदि जनता साथ न दे तो वे बेमानी होंगे । वे खतरनाक साबित होते हैं यदि वे जनता का समर्थन हासिल करने में कामयाब हो जाएं ’ । यह गौरतलब है कि हिन्दुत्ववादी धारा ने भी कम्युनिस्टों की तरह भारत छोड़ों आन्दोलन में हिस्सा न लेना उचित समझा था । इस उमर में अब नामवर दलों की दाएरों से ऊपर उठ गए हैं – राजस्थान की भाजपा सरकार के कोटे से हिन्दी के अंतर्रा्ष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत में उन्हें दिक्कत नहीं होती । काशी विश्वविद्यालय के मसले पर पूर्व छात्रों के एक प्रतिनिधिमण्डल का  रामबहादुर राय के अनुरोध पर नेतृत्व करते हुए वे जब तत्कालीन प्रधान मन्त्री से मिलने गए तब अटलजी ने स्वाभाविक तौर पर उन्हें सम्मान दिया था । रामबहादुर राय साहब के गुरु से भी परस्पर पीठ खजुआने का उनका नाता है । रामबहादुर राय साहब ने जब प्रभाष जोशी का भव्य जनमदिवस आयोजन किया तो प्रमुख मेहमान नामवर थे । क्या पता सती – प्रथा एवं जाति – प्रथा पर भी इसी लिहाज से न बोलें -’ कर्व्यनिष्ठ अभिव्यक्ति की आजादी’ के तहत !

रवि भाई ने चिट्ठों के राजनैतिक होने पर अपना भय उद्घाटन सत्र के अपने प्रस्तुतीकरण में प्रकट किया । हांलाकि उनका आशय प्रचलित, भ्रष्ट और डॉ. अरविन्द मिश्र के अल्फ़ाज़ में ’बेहयाई वाली राजनीति ’ से रहा होगा । रवि रतलामी और डॉ. अरविन्द मिश्र संसदीय लोकतंत्र को क्या नक्सलवादियों की तरह पूरी तरह खारिज करते होंगे ? शायद नहीं । जैसा भी लोकतंत्र है उसे गंवा कर न सिर्फ किसी भी जन आन्दोलन को कठिनाई होगी , अरविन्द भाई के अन्धविश्वास निर्मूलन अभियान को भी होगी । क्या संसदीय लोकतंत्र बिना दलीय राजनीति के भी चल सकता है ? इससे आगे बढ़कर विभूति राय ने ’राजनैतिक न होने की राजनीति’ का जिक्र किया । उन्होंने तानाशाही सत्ता और कठमुल्लों के विरुद्ध पाकिस्तान की ब्लॉगिंग तथा चीन में जम्हूरियत स्थापित करने की इच्छा रखने वालों द्वारा ब्लॉगिंग का भी जिक्र किया । उन्होंने बताया कि कट्टर पंथी मुल्लाओं के खिलाफ़ लिखे जा रहे ब्लॉगों को पढ़ते हुए उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।

रवि रतलामी

रवि रतलामी

मुझे बनारस के बुनकरों के मोहल्ले में सदभाव अभियान द्वारा आयोजित गोष्ठी में बोलते विभूति राय की याद आ गई । राजस्थान के उन मुसलिम किसानों की मिसाल उन्होंने दी थी जो पारम्परिक तौर पर धोती पहनते आए हैं तथा जिन पर उन कट्टरपंथियों का असर नहीं होता जो चाहते हैं कि धोती को हिन्दू-वस्त्र मानते हुए वे पहनना छोड़ दें ।

विशिष्ट श्रोता रामजी राय इरफ़ान के साथ

विशिष्ट श्रोता रामजी राय, इरफ़ान

सिद्धार्थ मिश्र के चिट्ठों की किताब का लोकार्पण हुआ । युनीकोड नेट पर विभिन्न भाषाओं को सर्वव्यापी बनाने के लिए है ,किताब छापने के लिए नहीं। बिना फिर से टंकण कराये भी वे कागजी मुद्रण के लिए फॉन्ट तब्दीली कर सकते थे । लेकिन शायद कितबिया तब दुबरा जाती । किताब पर चर्चा के लिए उन्होंने दो गैर चिट्ठेकारों को बुलवाया । चिट्ठे पढ़ने वालों ने किताब में संकलित चिट्ठे आदि पढ़े होंगे इस आधार पर वे चिट्ठेकारों को भी किताब पर चर्चा के लिए बुला सकते थे। मुझे लगा कि वे जानबूझकर ऐसा नहीं करना चाहते थे। संचालन से अलग सेमिनार के किसी भी विषय पर बोलने लायक उन्होंने खुद  को नहीं समझा । ब्लॉगिंग के ’ नारद विवाद’ के दौरान भी मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में कबड्ड़ी खेल में प्रचलित ’गूँगी कबड्डी’ का जिक्र किया था। (प्रथा समझने के लिए इस लिंक पर जांए ) । ’ प ’ बोलते वक्त होंठ बन्द हो जाते हैं । इसलिए ’चार सेना हड़प्प ’ बोल कर खिलाड़ी प्रतिद्वन्द्वी पाले में घुसता है । अपनी किताब का जिक्र जब सिद्धार्थ ने अपने ब्लॉग पर किया था तब किन्हीं ’बेनामी’ ने यह तथ्य अपनी टिप्पणी से प्रसारित कर दिया था कि किताब छापने वाली संस्था का कोषाध्यक्ष ही लेखक है । चिट्ठेकारी पर चर्चा के लायक तमाम जरूरी मुद्दों से ज्यादा तरजीह ’कुंठासुर’ – बेनामी वाले विषय को दी गयी थी । सिद्धार्थ को एक कविता छापने की नामंजूरी सार्वजनिक तौर पर मिली थी , घुघूती बासूती के ब्लॉग पर । एक दिन पहले किए गए सार्वजनिक आमन्त्रण से अलग निमन्त्रितों में घुघूती बासूती को नहीं शरीक किया गया था। हिन्दी चिट्ठेकारी करने वालों में दो मत न होगा कि घुघूती बासूती एक प्रमुख चिट्ठेकार है ।

उभरता सितारा : विनीत कुमार

उभरता सितारा : विनीत कुमार

इस सेमिनार के कारण कई ब्लॉगरों और मित्रों से पहलेपहल मिलने का मौका मिला । साहित्यिक ब्लॉगर और प्रिय मित्र प्रियंकर , प्रिय सांस्कृतिक – राजनैतिक कर्मी इरफ़ान , तेज तर्रार युवा खबरनवीस विनीत कुमार , जनतंत्र वाले समरेन्द्र ,विस्फोट वाले संजय तिवारी , हिन्दुत्ववादी- वरिष्ट -युवा ब्लॉगर प्रमेन्द्र तथा प्रगतिशील ब्लॉगर रेयाज-उल-हक़ , विज्ञान ब्लॉगिंग करने वाले बाल साहित्यकार जाकिर अली रजनीश ,विज्ञान और विज्ञान गल्प ब्लॉगिंग से जुड़े डॉ. अरविन्द मिश्रा,संगीत -व्यंग्य-नाटक और एनीमेशन से जुड़े युवा वकील ब्लॉगर कृष्ण मोहन मिश्र तथा मेरे पड़ौसी जिले चन्दौली के उभरते चिट्ठा – चर्चाकार हिमान्शु पाण्डे । हिन्दी विश्वविद्यालय के सन्तोष भदौरिया चिट्ठेकार तो शायद अभी नहीं हैं लेकिन उन से मिलने में गर्म जोशी का अहसास हुआ ।

मेरे मित्र विप्लव राही का लम्बे समय से आग्रह था कि मेरी समरेन्द्र से मुलाकात हो । समरेन्द्र को अलग टिकाया गया था । हांलाकि वह जगह हमारे अतिथि भवन से दूर न थी फिर भी सतसंगति का अवसर हम चूक गये ।

प्रियंकर / अध्यक्ष/भाषा -सत्र

प्रियंकर / अध्यक्ष/भाषा -सत्र

अभय की फिल्म सरपत दूसरी बार देखने का अवसर मिला । स्टेशन पर अनूप से पता चला कि के.के पाण्डे से फिल्म का डीवीडी मिला था । पहले पता चलता तो मैं निश्चित ही उनसे सम्पर्क करता,मिलना चाहता । केके काशी विश्वविद्यालय में एक युवा संगठन के प्रभारी होकर आये थे । उन्होंने अपने साथी कवि महेश्वर को अपना गुर्दा प्रदान किया था ।

मसिजीवी से दिल्ली में ब्लॉगवाणी के दफ़्तर में मुलाकात हुई थी । पहली बार मंच से बोलते सुना । उनकी शैली और लहजा सुन कर मुझे लगा कि इनका निर्धारण भौगोलिक इलाकों के अलावा भी होता है। मसिजीवी दिल्ली की एक संस्था में काम कर चुके हैं । उस संस्था से मुझसे परिचित एक व्यक्ति भी जुड़ा रहा है । मुझे भारी अचरज हुआ कि इन दोनों का लहजा और शैली असाधारण तौर पर समान हैं । वैसे , साथ काम करने वालों के बोलने ढंग का असर परस्पर तो होता ही है ।

मसिजीवी , प्रियंकर , अनूप,रविजी (बाँ. से दाँ.)

मसिजीवी , प्रियंकर , अनूप,रविजी (बाँ. से दाँ.)

विनीत कुमार की लेखन शैली से मैं हाल ही में परिचित हुआ था और प्रभावित भी । उसने दो सत्रों में अपने विचार बहुत ही स्पष्ट और नियोजित ढंग से रखे । सेमिनार के दौरान वह सीधे लोटपोट पर नोट्स ले रहा था ।

लोटपोट का प्रयोग यहाँ जानबूझकर किया गया है । जैसे नामवर द्वारा ’चिट्ठेकारी’ के अपहरण से अनूप आहत है और शब्द के जन्मदाता को सचेत कर रहा है वैसे ही ’लोटपोट’ का इस्तेमाल बिना श्रेय दिए चिट्ठा चर्चा की हेडिंग में कर दिया है । लाजमीतौर पर जनक पीडित होंगे/होंगी । ’ताकि सनद रहे वक्त पर काम दे’ , यह बात दर्ज की गई ।

अभय के फिल्म की ग्रामीण नायिका के परदे पर आते ही मेरे बगल में बैठे युवा में तेज हरकत हुई । यह युवा अधिवक्ता कृष्ण मोहन मिश्र था । अवसर पाते ही उसने बताया कि ८-९ वर्ष पहले उसने ’मैला आंचल’ में उस अभिनेत्री (गरिमा श्रीवास्तव?)के साथ अभिनय किया था। कृष्ण मोहन अपनी गाड़ी में हमें स्टेशन / बस स्टैण्ड छोड़ने जा रहा था । गाड़ी पत्थर गिरजा से स्टेशन वाली सड़क पर घूमी तो अनूप ने कहा कि निर्माता अभय बता रहे थे कि फिल्म में कहाँ से ट्विस्ट आता है । याद करने का प्रयास करने के बावजूद कृष्ण मोहन नायिका के पति (वास्तविक जीवन में ) का नाम याद न कर सके ।

समापन सत्र के अध्यक्ष ने एक परिभाषा उद्धृत करते हुए कहा कि समस्त संचित ज्ञान – निधि साहित्य का हिस्सा है  । इस प्रकार विज्ञान , कला ,खेल आदि सभी क्षेत्रों के चिट्ठों को साहित्य की परिधि में गिना जा सकता है । कृ्ष्ण मोहन ने फिर मुझे खुश होकर बताया कि इन्हें चिट्ठों के बारे में मैंने ही पहले पहल   बताया था ।

मैंने उम्मीद की थी जनमत के सम्पादक रामजी राय जो उद्घाटन सत्र में मौजूद थे आगे के सत्रों में भी रहेंगे तथा हमें उनके विचार सुनने को मिलेंगे । लगता है अन्य व्यस्तताओं के कारण ऐसा न हो सका।

जो भी विषय निर्धारित किए गए थे उन पर गंभीर चर्चाएं हुई । विनीत ने बताया कि ब्लॉगों पर महिला – लेखन और स्त्री विमर्श मजबूती से हुआ है । प्रियंकर ने अनाम चिट्ठेकारों की प्रभावशाली लेखन शैली से उनके अनाम होने से बाधा कत्तई नहीं आई है ,यह कहा । संजय तिवारी ने आगाह किया कि तकनीकी के परिवर्तनों में आ रहे त्वरण का चिट्ठेकारी पर भी प्रभाव पड़ सकता है तथा इसके प्रति हमे सचेत रहना पड़ेगा । डॉ. अरविन्द मिश्रा ने सन्तुलित ढंग से हिन्दी चिट्ठेकारी में विज्ञान लेखन की स्थिति का ब्यौरा दिया । चूंकि वे विज्ञान पर लिखने वालों में प्रमुख हैं इसलिए उनके द्वारा अपने और साइंस ब्लॉगर एसोशियेशन का कार्य विवरण न देना विषय के साथ अन्याय होता । वरिष्ट चिट्ठेकार उन्मुक्त के लेखन का भी उन्होंने हवाला दिया । वे आत्म प्रचार करते नहीं दिखे। मैंने इन्टरनेट के कथित खुलेपन पर बन्दिशें लगानी की साजिशों के बारे में लिखे एक लेख का जिक्र किया ।

’ अपना ’ प्रमेन्द्र दोनों दिन घर में चल रहे मरम्मत- काम से समय निकाल कर आया था । पहले दिन साथ में अदिति भी थी । विनीत के चिट्ठे पर आने के पहले जो लिस्ट छापी गयी थी उसमें भी उसका नाम था । प्रमेन्द्र का हवाला अलग अनुच्छेद में क्योंकि कहीं सरसरी तौर पर लिखा देखा कि हिन्दुत्ववादियों को नहीं बुलाया गया ।

चिट्ठेकार खुश थे की मुख्यधारा की एक संस्था ( गांधी हिन्दी वि. वि. ,वर्धा ) ने यह सेमिनार करवा दिया । हमें विश्वास है कि इस विश्वविद्यालय से जुड़े सन्तोष भदौरिया अपनी  टीम के सहयोग से सेमिनार में हुई चर्चा का दस्तावेजीकरण भी करेंगे । ऐसे आयोजनों में पहले से विभिन्न पहलुओं पर चिट्ठेकारों से परचे आमन्त्रित किए जाने चाहिए थे । प्रशिक्षण के लिए हिन्दी विश्वविद्यालय को रवि रतलामी जैसे विशेषज्ञों के सहयोग से कार्यशालायें चलाने की योजना चलानी चाहिए । ब्लॉगिंग से पहले तो इन्टरनेट की बाबत B.B.C Webwise जैसा कार्यक्रम हिन्दी में प्रस्तुत करना चाहिए ।

( ताजा कलम : अनूप ने इस रपट के बाद अपनी रपट में पुनश्च लगा कर सुधार कर लिया है।इस बहाने मुझे ता.क. चलाने का मौका मिला। गांधी के पत्रों में पुनश्च की जगह ता.क रहता था।ताजा कलम।मुझे पुनश्च से सुन्दर लगा था।हांलाकि अब कलम ही नहीं रही। )

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