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Archive for अक्टूबर 6th, 2010

पिछले महीने की २३ तारीख को भुट्टो ने कुछ अधिक राशन इकट्ठा कर रखा था । सद्भाग्य से शहर में कर्फ़्यू तो नहीं लगा । लेकिन भुट्टो के परिवार को तब से अब तक उस राशन को खा कर ही गुजारा करना पड़ा है । उसकी तथा उसके जैसे २५० लोगों की दुकानें तब से अब तक नहीं लगी हैं । इनमें से अधिकांश परिवारों में आज से फाकाकशी की शुरुआत होने जा रही है। भुट्टो रजाई-गद्दा बना कर बेचता है। २३ तारीख को ही बनारस के जिलाधिकारी एक मीडिया-समूह के मालिक के साथ पधारे थे और स्थानीय थानाध्यक्ष को कह गये कि पटरी व्यवसाई आपके सौजन्य से ’विराजमान’ हैं । थानाध्यक्ष ने इस कथन को चुनौती के रूप में लिया और रात दो बजे अवैध बालू खनन करने वालों के ट्रक्टर-ट्राली पर खोमचे और गुमटियों को थाने लदवा ले गये। मीडिया-समूह बनारस का सबसे पुराना दैनिक ’आज’ है । इस समूह ने अखबार-प्रकाशन के बजाए रियल-एस्टेट के धन्धे को प्राथमिकता बना लिया है।
’आज’ की पत्रकारिता का आखिरी नमूना ’९२ के ठीक पहले वाले दौर में काबिले गौर था। प्रेस परिषद ने उस पत्रकारिता की जांच के लिए प्रसिद्ध कवि-पत्रकार रघुवीर सहाय की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। उसी दौर में एक दिन ’आज’ के सभी संस्करणों में मुखपृष्ट पर आठ कॉलम का बैनर था – ’ रामलला की मूर्ति गायब’ ! युवा जिलाधिकारी द्वारा शहरी सभ्यता के हाशिए पर मौजूद पटरी व्यवसाइयों को उजाड़ने के लिए अति उत्साह में ’आज’ परिवार के नुमाइन्दे को साथ रखना उचित समझा । काशी विश्वविद्यालय परिसर से लगे लंका क्षेत्र में दो तिहाई हिस्सा इस मीडिया समूह के बनवाई और बेची जा रही अट्टालिकायें हैं । पूरे बनारस शहर में सड़क की दोनों तरफ़ २०-२० फुट की पटरी सिर्फ़ लंका पर है,जिस पर फल-सब्जी,अखबार,रजाई गद्दा,खाद्य-सामग्री,हजामत जैसे व्यवसाय कर हर शाम पटरी व्यवसाई अपना सामान समेट कर चले जाते हैं। नगरीय भूमि हदबन्दी(सीलिंग) कानून को ठेंगा दिखाने के लिए मौजूदा जिलाधिकारी के मेल के अन्य अधिकारी भी होंगे। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा इस मीडिया समूह को परिसर के बाहर स्थित ’महेन्द्रवी छात्रावास’ बेच देने पर आज-समूह एक जाँच के दाएरे में है। जिलाधिकारी का ध्यान ’शहरी फेरीवालों की बाबत बनी राष्ट्रीय नीति,२००९” की ओर दिलाने पर उन्होंने अनभिज्ञता जताई और कहा देखता हूँ कैसे ’नगर निगम’ पटरी का कैसे नियोजन करता है ? ’ गौरतलब है कि ’आज समूह’ की अट्टालिकाओं से परे जाते ही यह रोक समाप्त हो जाती है-पूरे शहर में ।
यह उल्लेखनीय उत्तर प्रदेश में पटरी व्यवसाइयों से तहबाजारी न वसूलने की घोषणा के साथ-साथ यह भी कहा गया था कि इस नीति को प्रदेश में लागू किया जाएगा। जिलाधिकारी ने मुझसे कहा कि आपको उस नीति की प्रति लानी चाहिए थी ! बहरहाल,उसी शाम मैंने नीति की सॉफ़्ट-कॉपी भेज दी। देश के सबसे पैसे वाले उद्योगपति को प्रदेश में फुटकर-स्तर पर फल-सब्जी बेचने के पटल खोलने की इजाजत न देने का निर्णय मुख्यमन्त्री सुश्री मायावती ने लिया था। कोई जरूरी नहीं कि निर्णय के पीछे के तर्क को उस सूबे का जिलाधिकारी समझे !
कुछ वर्ष पूर्व काशी के पटरी व्यवसाइयों के साथ मैं वाराणसी के तत्कालीन कमीश्नर मनोज कुमार से मिला था। उन्होंने कहा ,’ विश्व-भर के शहरों में पटरी व्यवसाई हैं और उनकी एक व्यवस्था है। आप लोगों को इस संगठन को टिकाए रखने के लिए लगन और मेहनत से काम लेना होगा ।’ बाजार की ताकतों का स्थानीय प्रशासन पर प्रभाव यूँ ही नहीं बढ़ गया है । जिलाधिकारी ने बहुत जिम्मेदारी के साथ मुझसे कहा कि इन पटरी वालों को मैंने अथवा मेरे किसी पूर्ववर्ती जिलाधिकारी ने निमन्त्रण नहीं दिया है !मानो बाकी शहर जिलाधिकारियों के निमत्रण पर गंगा तट पर आ बसा हो !
समाजवादी जनपरिषद ने राज्य के मुख्य सचिव तथा मुख्य निर्वाचन अधिकारी का ध्यान जिला प्रशासन के जनविरोधी रुझान की ओर खींचा है ।

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