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Archive for मार्च 12th, 2011

पिछला भाग – (प्रथम)

यह बात सभी को मालूम है ( जिसे मालूम नहीं है , वह सचेत नागरिक नहीं ) कि सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को महीनों तक  , सालों तक , कभी – कभी मरने तक पेंशन नहीं मिलती । ऐसी कोई प्रक्रिया या नियम अभी नहीं बना है कि सेवानिवृत्त होने एक महीने बाद से ही मासिक पेंशन मिलने लगे। साल-दो साल के अन्दर पेंशन मिल सके इसके लिए हजारों कर्मचारी प्रतिवर्ष घूस देते हैं । सेवानिवृत्त होने के एक महीने बाद अगर पेंशन मिलने लगेगी , तो बहुतों को लगेगा कि रामराज्य आ गया है । हमारे सामान्य नागरिक इस तरह की स्थितियों में जीते हैं कि कुछ मामूली परिवर्तनों से ही रामराज्य का एहसास दिलाया जा सकता है । कुछ प्रक्रियाओं में परिवर्तन कर न सिर्फ प्रति दिन होने वाली करोड़ों की घूसखोरी को रोका जा सकता है , बल्कि देश के किसानों को रामराज्य के दर्शन कराये जा सकते हैं । जमीन के हस्तांतरण तथा खरीद – बिक्री के नियमों का सरलीकरण इसके लिए जरूरी है । दूसरी जरूरत यह है कि सरकारी प्रशासन से किसानों का कृषि सम्बन्धी जितना काम पड़ता है , उसके लिए ’एक खिड़की’ की व्यवस्था कर दी जाए और यह खिड़की किसी भी गाँव से दस कि.मी. से ज्यादा दूर न हो । क्या ऐसा नियम नहीं हो सकता कि  किसी जायज काम के लिए एक किसान को दो बार से ज्यादा सम्बन्धित दफ़्तर में न जाना पड़े ?

किताबों के अनुसार कचहरी (अदालत) लोकतंत्र में नागरिकों की आजादी का प्रतीक है ।  लेकिन गाँववालों के लिए कचहरी और पुलिस में कोई फर्क नहीं होता ।कचहरी वह है ,जिसके द्वारा पुलिस या पटवारी किसानों को सताता है । क्या यह समाजशास्त्रियों और राजनीतिशास्त्रियों के खोज का विषय नहीं है कि भारत के आम नागरिकों के लिए न्याय विभाग सुरक्षा का एक प्रतीक है या नहीं ? झूठे मामले में फँसना उतनी बड़ी यातना नहीं है जितनी सैंकड़ों बार कचहरी और वकील के यहाँ जाना और बार-बार कचहरी में घूस और वकील की फीस अदा करना ।किसानों से करोदओं रुपयों की लूट प्रति दिन इसी तरीके से होती है । अगर अधिकांश मामलों के निपटारे के लिए समय की सीमा बँध जाए और झूठे मामलों की छानबीन की कोई प्रक्रिया तय हो जाए , तो यह घूसखोरी और जलालत पचास फीसदी घट जाएगी ।

ये सब हैं जनता के स्तर पर होनेवाली घूसखोरी और भ्रष्टाचार । इस तरफ़ पालकीवाला या तारकुंडे जैसे महानुभावों का ध्यान नहीं जाता ।भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनों में ज्यादातर शहरी लोग दिलचस्पी लेते हैं । इसीलिए उनमें भ्रष्टाचार की इस बुनियाद की समझ दिखाई नहीं पड़ती ।

यह सवाल उठ सकता है कि अगर इन प्रशासनिक व्यवस्थाओं तथा प्रक्रियाओं को बदलना इतना आसान है तो यह क्यों नहीं कर लिया जाता ? इसका उत्तर यह है कि इससे करोड़ों लोगों की आजादी बढ़ जाएगी । किसानों को अगर पुलिस और पटवारी के सामने झुकना नहीं पदएगा , शहर के वकीलों के मुकाबले अगर उनमें हीनभावना नहीं रहेगी , तो यह औपनिवेशिक व्यवस्था चलेगी कैसे ? अगर लोगों का जायज काम समय पर सही ढंग से होने लगेगा , तो उन्हें आजादी का जो बोध होगा , वह क्या उन बहुत सारे अन्यायों अत्याचारों के लिए बाधक नहीं हो जाएगा  , जिन अन्यायों-अत्याचारों के सहारे भारत का शिक्षित समाज इतना आत्मसन्तुष्ट रहता है ?

प्रशासन के सुधार को हम इसलिए आसान मानते हैं कि इसके लिए संविधान या देश की आर्थिक व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन जरूरी नहीं होगा । सिर्फ औपनिवेशिक नियमों को बदलकर लोकतांत्रिक नियम प्रचलित करने होंगे । लेकिन अनुभव बतलाता है कि देश के उदारवादी नेता और बुद्धिजीवी इस सम्बन्ध में बिलकुल संवेदनशील नहीं हैं । इसीलिए यह मामूली परिवर्तन अब कठिन लगता है । इस कठिनाई को समझना चाहिए । ब्रिटिश राज में जो औपनिवेशिक प्रशासन था , नेहरू जी ने अगरुसी को बरकरार रखा , तो लोग मौके – मौके पर क्यों कहते हैं कि इससे तो अंग्रेजी राज बेहतर था ? एक अन्तर यह आ गया है ब्रिटिश राज में जवाबदेही तथा नियंत्रण का एक मजबूत केन्द्र था । कोई भी भारतीय कर्मचारी , अफसर या मजिस्ट्रेट अंग्रेज साहब से डरता था । इस डर के स्थान पर जवाबदेही का एक लोकतांत्रिक ढांचा बनाना जरूरी था , जो कभी नहीं बना । किसी भी प्रशासन के लिए जवाबदेही केन्द्रीय महत्व की चीज है , जो भारतीय प्रशासन में नदारद है । किसी गांव में पुल बना और चार महीने बाद टूट गया, तो इंजीनियर को दंडित किया जाएगा या नहीं ? कोई सेना बिना लड़े भागती जाएगी तोतो सेनापति को दंड मिलना चाहिए या नहीं ? कोई कंपनी लगातार घाटे में चलती है,तो मैनेजर से जवाबतलबी होनी चाहिए या नहीं ? अगर दिल्ली के बैंक में पतना का चेक जमा होता है और छह महीने बाद भी भुगतान नहीं होता है,तो किसी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं ? आजादी के बाद से  इस जवाबदेही की तरफ राजनेता , प्रशासक , समाजशास्त्री किसी ने गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया है । फलस्वरूप लापरवाही और अराजकता की ऐसी आदतें बन गई हैं कि कोई भी इसे बदलना चाहेगा तो उसे बहुत सारे कठोर कदम काम करने होंगे । अगर कोई सरकार ये कठोर काम करने लगेगी,तो आई.ए.एस अफसर और वामपंथी ट्रेड यूनियन सबसे ज्यादा बाधा डालेंगे । फिर भी संकल्प के बल पर सुधार का काम शुरु हो सकता है, हमने देखा है कि कभी – कभी एक बदआ और ईमानदार अधिकारी अपने विभाग में व्यक्तिगत संकल्प के बल पर भ्रष्टाचार को रोकने में सफल भी होता है । लेकिन यह कोई कारगर उपाय नहीं ।

(जारी)

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