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Archive for मार्च 19th, 2011

पिछले हिस्से : एक , दो , तीन

सार्वजनिक आचरण तथा निजी आचरण का एक राष्ट्रीय पैमाना होता है ( यहाँ राष्ट्र का अर्थ देश है – स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति और समुदाय का एक भौगोलिक-सांस्कृति-राजनीतिक अंचल होता है , वही देश है )। व्यक्ति आचरण का इस राष्ट्रीय चरित्र से दोतरफ़ा सम्बन्ध और संवाद होता है । आचरण की एक खास परिधि के भीतर व्यक्ति और राष्ट्र एक-दूसरे को प्रभावित तथा निर्मित करते रहते हैं । कुछ समाजों में यह राष्ट्रीय चरित्र बहुत ही कमजोर और पतनोन्मुख रहता है । प्रशासन , राजनीति तथा सामाजिक जीवन में बढ़ने वाला भ्रष्टाचार इसी का अंग है ।

सवाल उठता है कि राष्ट्रीय चरित्र को कैसे बदला जा सकता है ? क्या हम भारत के राष्ट्रीय चरित्र को बदलने की कोशिश कर सकते हैं , ताकि हमारा समाज स्वस्थ हो ?

शायद राष्ट्रीय चरित्र के पतन का कारण और उसके पुनरुत्थान का उपाय एक है । जिस समय समाज को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, खासकर बाहर से आई हुई चुनौतियों का । उस समय अगर समाज का नेतृत्व करनेवाला राजनीतिक-बौद्धिक समूह उनका सही मुकाबला नहीं कर पाता , तब राष्ट्रीय चरित्र में भारी गिरावट आती है । पुनुरुत्थान की कुंजी भी इसीमें है । लम्बे अरसे के पतन के बाद अगर किसी काल बिन्दु पर उस समाज ने चुनौतियों का , खासकर बाह्य चुनौतियों का , मुकाबला करना स्वीकार कर लिया , तब राष्ट्रीय चरित्र का पुनरुत्थान शुरु हो सकता है । बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत में ऐसी प्रक्रिया शुरु हुई थी ।

अगर आज पुन: हम उस प्रक्रिया को जीवित और पुष्ट करना चाहें , तो कर सकते हैं । इसके लिए देश में एक नए बौद्धिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समूह को पैदा होना होगा । राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षेत्र में हस्तक्षेप करना पड़ेगा । राजनीति , अर्थनीति और धर्म के क्षेत्र में प्रभावी हस्तक्षेप के साथ साथ ही एक नया सांस्कृतिक आन्दोलन विश्वसनीय होगा । लेकिन सांस्कृतिक आन्दोलन का अपना एक मौलिक क्षेत्र है। सम्भवत: सांस्कृतिक मूल्यों को स्पष्ट और गतिशील किए बिना राजनीति और अर्थनीति में भी सार्थक हस्तक्षेप करना सम्भव नहीं होगा,क्योंकि प्रचलित राजनीति, अर्थनीति और धर्म प्रचलित सभ्यता के अंग बन चुके हैं । इस सभ्यता को चुनौती देना नए सांस्कृतिक आन्दोलन के लिए अनिवार्य है । मनुष्य की संस्कृति मनुष्य के कुछ बुनियादी सम्बन्धों पर आधारित होती है – मनुष्य का प्रकृति से सम्बन्ध , मनुष्य का मनुष्य से सम्बन्ध और मनुष्य का समुदायों से सम्बन्ध । प्रचलित सभ्यता में ये सम्बन्ध विकृत या असन्तुलित हो चुके हैं । इस सभ्यता को आगे बढ़ाकर मनुष्य के सुख , शान्ति या स्वास्थ्य को बनाए रखना सम्भव नहीं रह गया है । इन सम्बन्धों को बदलने से ही नए मूल्यों की स्थापना होगी । नई संस्कृति इसी का परिणाम होगी।

इन सारे गहरे और व्यापक पहलुओं को छुए बगैर भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बेमानी हो जाता है। भ्रष्टाचार का मुद्दा इसलिए उठाना चाहिए कि लोग इस मुद्दे को समझते हैं और इसके प्रति संवेदनशील होते हैं । लेकिन इस मुद्दे को निर्णायक बनाने के लिए भ्रष्टाचार की बुनियाद में जाना पड़ेगा ।

( सामयिक वार्ता , अक्टूबर ,१९९४)

आगे : भ्रष्टाचार – असहाय सत्य , लेखक किशन पटनायक

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