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Archive for मार्च 22nd, 2011

” हमारे भीतर और सभी की जड़ में एक विराट सत्य है ; यह बात  जो लोग अपने भीतर से उपलब्ध (ग्रहण) नहीं कर सकेंगे , वे कैसे विश्वास करेंगे कि मनुष्य का चरम लक्ष्य है : अपने भीतर छुपे हुए उस (विराट) सत्य को सभी आवरणों को भेदकर प्रकाशित करना … ।”

रवीन्द्रनाथ ठाकुर (घर और बाहर )

महाराष्ट्र के खैरनार और ओडिशा के अनादि साहू के बयानों से लगता है कि देश में एक शेषन-लहर चल रही है । (ओडिशा के अनादि साहू एक पुलिस अफ़सर हैं , जिन्होंने बिजू पटनायक की सरकार के एक प्रमुख मन्त्री को जहरीली शराब बिक्री के  मुख्य अपराधी का सहयोगी होने का न्यायिक प्रमाण अदालती जाँच के सामने पेश किया है । ) शेषन ने समकालीन इतिहास में अपना स्थान बना लिया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि उसने चुनाव-राजनीति में ( यानी भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में )कानून का का राज स्थापित करने का प्रयास दम्भ के साथ किया है ।दम्भी होना एक अवगुण है ; लेकिन दम्भी होना न गैर कानूनी है और न भ्रष्ट आचरण है । बल्कि अगर वह दम्भी न होता तो सारे राजनीतिक दलों को झकझोरने की इच्छाशक्ति एक नौकरशाह में कैसे आती ?

चरित्र के मामले में विकासशील देशों का नौकरशाह सबसे घटिया होता है । पिछले एक-डेढ़ दशक से उन देशों की राजनीति का जो चरित्र उभर रहा है उसमें राजनेता नौकरशाह से भी ज्यादा घटिया और खतरनाक साबित हो रहा है । विकासशील देशों के नौकरशाह के बारे में यह शक रहता है कि वह देशी-विदेशी निहित स्वार्थों से निजी फायदा उठाने के लिए देशहित के विरुद्ध कार्य करता है और सर्वोच्च राजनेताओं को भी गलत सलाह देता है । लेकिन जब देश एक ऐसी कालावधि से गुजर रहा है जब देश का राजनीतिक नेतृत्व देश के स्वार्थ को बेचकर अपनी सत्ता को बरकरार रखने की कोशिश कर रहा है ।

दूसरी ओर राजनेता-अपराधी सम्बन्ध भी मामूली स्तर को पार कर चुका है , उस स्तर को पार कर चुका है , जहाँ राजनेता यदाकदा मजदूर आन्दोलन को दबाने के लिए या चुनाव जीतने के लिए अपराधियों का इस्तेमाल करता था । लेकिन अब ? राजनीतिक सत्ता को आधार बनाकर अपराधियों के गिरोह संगठित हो रहे हैं और राजनेता इन गिरोहों के सदस्य हैं (जलगाँव प्रकरण ) । बहुत सारे अपराध इस प्रकार घटित हो रहे हैं जो सत्ता के प्रत्यक्ष सहयोग के बगैर सम्भव नहीं हैं । अनेक हत्याएँ, अनेक बलात्कार और अपहरण के घटनाएं इसी कोटि की हैं । अपराधी गिरोहों का निर्माण अन्तरराष्ट्रीय पैमाने पर हो रहा है तो उनका सहयोगी होकर राजनेता किसी भी समय जाने-अनजाने विदेशी कूटनीतिक साजिशों का औजार बन सकता है । जब रजनीति इस अवस्था में पहुंच जाती है तब यह स्वाभाविक है कि कहीं – कहीं नौकरशाह इसके खिलाफ विद्रोह करे तथा राजनेताओं को सदाचार सिखाने का दम्भ भरे ।

ऐसा करनेवाले नौकरशाहों में से इक्के-दुक्के बहुत लोकप्रिय भी हो सकते हैं । इस लोकप्रियता में कोई सामाजिक उर्जा नहीं होती । यह किसी फिल्मी दृश्य की लोकप्रियता जैसी है । डाकू मानसिंह और फूलन देवी की लोकप्रियता जैसी है । इसका मतलब यह नहीं कि यह घटनायें सकारात्मक नहीं हैं। भ्रष्टाचार का भंडाफोड हमारी सामाजिक और बौद्धिक अधोगति की कुत्सित वास्तविकता का चित्रण करता है और समाज में बचे-खुचे नैतिक आक्रोश को अभिव्यक्त करता है ।

भंडाफोड कोई प्रतिकार नहीं रह गया है । शायद दो-तीन दशकों के पहले एक समय ऐसा था जब बुराई का उद्घाटन अपने में एक प्रतिकार था । यह तब होता है जब समाज की अपनी एक अन्दरूनी ताकत होती है,जिसको कुछ लोग नैतिक शक्ति कहना पसंद करेंगे , हम उसको न्यायशक्ति कहेंगे । जब समाज में यह न्यायशक्ति रहती है तब भ्रष्टाचार का उद्घाटन अपने आप प्रतिकार की तरफ बढ़ने लगता है। मानो न्याचक्र घूमने लगता है । दोषी को दंडित होना यहां अनिवार्य है, लेकिन मुख्य बात यह नहीं है। मुख्य बात यह है कि समाज सुरक्षित रहता है । न्यायशक्ति वह तत्त्व है जो समाज को धारण करती है । ’धर्म’ शब्द की कई भारतीय परिभाषाओं में यह एक है : समाज को धारण करनेवाला तत्त्व । इस तत्त्व के बनाए रखने के लिए कानून की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है । सामाजिक-राजनैतिक मान्यताओं, प्रथाओं,मर्यादाओं और बुद्धिजीवी वर्ग की नैतिक प्रतिक्रियाओं के द्वारा ही इस तत्त्व की पुष्टि होती है । इसके बगैर कानून भी अप्रभावी हो जाता है । न्यायचक्र के निश्चल होने  के पीछे मुख्य जिम्मेदार बुद्धिजीवी वर्ग है । जब तक बुद्धिजीवी वर्ग भ्रष्ट नहीं होगा तब तक किसी भी समाज की न्याय शक्ति, नैतिक शक्ति पंगु नहीं हो जाएगी । इसके बाद ही राजनेता निरंकुश होता है और न्याय का गला घोटता है। जब सेठों , अफसरों या छोते नेताओं का भ्रष्टाचार पकड़ा जाता था , तब लोगों को खुशी होती थी कि सर्वोच्च नेतृत्व प्रतिकार करेगा और समाज को सुरक्षित रखेगा । लेकिन जिस चरण में सर्वोच्च नेतृत्व खुद अपराधियों की जमात बन गया है तो दंड प्रक्रिया कौन चलाएगा ? उसके ऊपर कोई संवैधानिक शक्ति नहीं है;उसके नीचे कोई नैतिक शक्ति नहीं है। उसका मुखौटा उतर जाने के बाद भी वह बेशर्म रहेगा तो कहाँ से उसका प्रतिकार होगा ?

(जारी)

आगे : भ्रष्टाचार का असहाय सत्य क्या है ?

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