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Archive for अक्टूबर, 2011

श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के नाम खुला पत्र

आदरणीय आडवाणी जी,

सादर नमस्कार,

भ्र्रष्टाचार के विरोध मे आपकी जनचेतना यात्रा मध्यप्रदेश से गुजर रही है। इसे सफल बनाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी रात दिन एक कर रही है। खराब सड़कें दुरूस्त की जा रही हैं। स्वागत के लिए बंधनद्वार सजाए जा रहे हैं। सुरक्षा की माकूल व्यवस्था की जा रही है। यात्रा में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। यह करोडों रूपये कहां से आ रहा है, यह जिज्ञासा हर नागरिक के मन में है।

संघ मुख्यालय पर दण्डवत, प्रणाम और हाजिरी देकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने का भरोसा देने के बाद इस यात्रा की मंजूरी मिल पाई। पार्टी में जारी अन्र्तकलह को दरकिनार करते हुए अन्ततः यात्रा प्रारंभ हो गई। यह प्रसन्नता का विषय है।

भाजपा शासित राज्यों में भी नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है।

मध्यप्रदेश में ऐसा कोई विभाग नहीं है, जहां बिना पैसे दिए काम होता हो। पटवारी से लेकर अधिकारियो, कर्मचारियों के पास करोड़ों की संपत्ति जब्त होने की खबरों से जाहिर होता है कि यहां नौकरशाही को जनता को लूटने और भ्रष्टाचार की खुली लूट मिली हुई है। मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप पार्टी की अंदरूनी उठापटक में बाहर आते रहते हैं।

मध्यप्रदेश में किसी भी बड़े छोटे पद पर बैठा आपकी पार्टी का व्यक्ति पैसा खाने और कमाने में लगा हुआ है। नेताओं व मंत्रियों के संरक्षण में जंगल माफिया, रेत माफिया, भूमाफिया, शिक्षा माफिया, सहकारी माफिया सक्रिय होकर करोड़ों के वारे-न्यारे कर रहे है। राशन की दुकान हथियाने व राशन की कालाबाजारी करने में आपकी पार्टी पीछे नहीं हैं।

मध्यप्रदेश के किसानों की बड़ी दुर्दशा हो रही है। सरकार के तमाम दावों के बावजूद उन्हें घटिया बीज, नकली खाद, महंगे डीजल और बिजली कटौती की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। खेती में बढ़ती लागत और खुले बाजार की नीति के कारण किसानी घाटे में जा रही है। प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं का दौर जारी है। आपके सहयोगी सगठन भारतीय किसान संघ खुद किसानों के मुद्दे पर आंदोलन चला रहा है।

मध्यप्रदेश में कुपोषित बच्चों की लगातार मौतों की खबर विकास के सारे दावों की पोल खोल देती है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं अब पैसा कमाने का सबसे बड़ा जरिया बन गई हैं। मध्यप्रदेश के किसानों-मजदूरों को राहत और रियायत देने पर सरकार पैसे का रोना रोती रही है। जबकि देशी-विदेशी उद्योगपतियों को उनकी शर्त पर उ़घोग लगाने के लिए तमाम छूट दी जा रही है।

उत्तराखंड में अभी हाल ही में हुआ नेतृत्व परिवर्तन भ्रष्टाचार का ही परिणाम था। कर्नाटक में रेडडी बंधुओं एवं येदुरप्पा के कारनामों पर पूरी भाजपा उनके बचाव में खड़ी हो गई थी। लोकायुक्त की रिपोर्ट से भाजपा को कर्नाटक में नेतृत्व बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा थां।

भ्रष्टाचार के बारे में भाजपा का इतिहास अच्छा नहीं रहा। भ्रष्टाचार पर दोहरे मापदण्ड अपनाना पार्टी की नीति रही है। कांग्रेस शासन के केन्द्रीय मंत्री सुखराम के मुद्दे पर संसद की कार्यवाही ठप्प करने वाली पार्टी सुखराम के कांग्रेस से निकलने के बाद ही अपना दोस्त बनाने में देर नहीं करती। जब दिल्ली में भाजपा की सरकार थी तब केन्द्रीय मंत्री, वरिष्ठ भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव टी.वी. कैमरे के सामने सरेआम घूस लेते दिखाए गए और तो और भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते टी.वी. के माध्यम से पूरे देश ने देखा।

नोट के बदले वोट का मामला हो, पैसे लेकर संसद में सवाल उठाने का मामला हो, कबूतरबाजी का आरोप हो या हवाला का, सभी में आपकी पार्टी के सांसदों ने नाम कमाया है।

नोट के बदले वोट के मामले में तो कुछ सांसद व भाजपा नेता जेल की सलाखों के पीछे हैं।

केन्द्र में लगभग 6 वर्ष तक षासन कर आप महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभा चुके हैं, इस अवधि मे आपने विदेशों में जमा काले धन का भारत वापिस लाने के लिए क्या प्रयास किये? भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई प्रभावी कानून बनाया क्या? हम इन सवालों के उत्तर जनचेतना यात्रा के माध्यम से जानना चाहते हैं।

आपकी यात्राओं में बड़ी रूचि है। इसके पूर्व राम जन्मभूमि मंदिर के मुद्दे को लेकर आपके नेतृत्व में निकाली गई रथयात्रा का स्मरण आना स्वाभाविक है। सौगंध राम की खाते है-मंदिर वहीं बनायेंगे के उद्घोष के साथ रथयात्रा ने भारत भ्रमण किया था। यात्रा देश में जहां-जहां गई, वहां-वहां नफरत, उन्माद ओर साम्प्रदायिकता फैली। दंगे हुए। यात्रा के उन्माद में भीड़ ने अन्ततः बाबरी मस्जिद ढहा दी। इस यात्रा के बाद भाजपा का राजनैतिक ग्राफ तेजी से बढ़ा। अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। आप उपप्रधानमंत्री, गृहमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। परंतु आपने अपने शासनकाल में राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद सुलझाने व राममंदिर बनवाने के लिए कोई कानून नहीं बनाया, और न ही कोई पहल की। हद तो जब हो गई जब शासन में पहुंचकर आपने मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम को अपने एजेंडा से ही बाहर कर दिया। इस संबंध मं आपकी पार्टी का ही एक नारा समर्पित हैः- जो नहीं राम का, वो नहीं किसी के काम का।

मान्यवर, भाजपा की स्थापना 1980 से लेकर आज तक पार्टी के किसी सम्मेलन, समारोह, मीटिंग में लोकनायक जयप्रकाश नारायण न कोई चित्र रखा गया, न उनका नाम लिया गया। न उनकी पुण्यतिथि मनाई गई और न उनकी जयंती मनाई गई। आपके शासनकाल में जे पी का जन्म जताब्दी वर्ष 1902-2002 था। जिस पर आप लोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया। आज उन्हीं जे पी का नाम लेकर उनकी जन्मस्थली से यात्रा निकालना एक तरह का राजनैतिक अवसरवाद नही तो क्या है?

केन्द्र सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध में आपकी पार्टी ने आज तक प्रभावी और कारगर आंदोलन नहीं किया। संसद में आपका विरोध रस्म-अदायगी जैसा लगता था। क्योंकि आपकी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण आपके अंदर नैतिक शक्ति नहीं बची थी। हमें लगता है कि गांधीवादी अण्णा हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए राष्टव्यापी आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा को समेटकर वोटो में बदलने के लिए, दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाने व प्रधानमंत्री बनने के राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित होकर यह यात्रा निकाली जा रही है। इसका भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने से कोई लेना-देना नहीं है। जिसमें आप सफल हो सकते हैं पर देश नहीं।

हम आपका ध्यान वर्ष 1991 में लागू की गई उदारीकरण, वैष्वीकरण की उन नीतियों की ओर दिलाना चाहते हैं जिनके चलते घोटालों की बाढ़ आ गई है। अफसोस यही है कि कांग्रेस-भाजपा दोनों प्रमुख पार्टियां इन नीतियों पर पुनर्विचार किए बगैर जोर-शोर से आगे बढ़ा रही हैं। देशी-विदेशी पूंजीपतियों, कंपनियों को लुभाने और उनका समर्थन पाने की दोनों पार्टियों में होड़ लगी है। विदेशी निवेशी के लिए लालायित नेता, मुख्यमंत्री विदेश जाकर उन्हें हर प्रकार की सुविधा देने का वादा कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों को बेदखल कर प्राकृतिक संसाधनों जल,जंगल, जमीन, खदान, खेत-खलिहानों का सौदा किया जा रहा है। विश्व बैंक, अन्तरा्ष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई विकास बैंक जैसे साम्राज्यवादी अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं हमारे देश और प्रदेश के विकास की प्राथमिकताएं तय कर रही हैं। नीतियों में निहित भ्रष्टाचार कानूनसम्मत भले ही हो, पर यह ज्यादा खतरनाक है।

मौजूदा व्यवस्था गैर बराबरी, शोषण, लूट और मुनाफे पर टिकी हुई है।, जो हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इसे बदले बगैर भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना असंभव है। इसका एक आयाम भोगवादी संस्कृति है। जिसने हमारा पूरा जीवन दर्शन बदल दिया है। विडंबना यह है कि हमारे मौजूदा राजनैतिक दलों के एजेंडा में यह सब नहीं है।

आदरणीय, जन चेतना यात्रा के बजाय आप इस उम्र में तीर्थयात्रा करते तो ज्यादा पुण्य मिलता। मन निर्मल होता और चित्त को शांति मिलती।

आपके स्वस्थ और दीर्घजीवन की कामना के साथ

गोपाल राठी

समाजवादी जन परिषद

मध्यप्रदेश

फोन संपर्कः 9425408801

पिपरिया, दिनांक-14 अक्टूबर, 2011

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“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

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