Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for अक्टूबर, 2012

यह एक कठिन चुनौती है, जिसकी पर्याप्त तैयारी न होने से निराशा ही हाथ लगेगी, इसकी आशंका है। 1977 के बाद ऐसा ही हुआ था। खास तौर पर अन्ना टीम को निम्न सवालों का सामना करना होगा।
1.    राजनैतिक विकल्प तैयार करने के लिए अन्ना टीम को अपनी नीतियों और वैचारिक दृष्टि को स्पष्ट करना होगा। पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, नवउदारवाद, वैश्वीकरण-निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों, कंपनी राज और विकास के आधुनिक माॅडल के बारे में उनकी क्या सोच है ?
2.    सामाजिक न्याय, जाति प्रथा, स्त्री-पुरुष भेद, आरक्षण नीति, मनुवादी-ब्राम्हणवादी व्यवस्था आदि के बारे मंे उनकी क्या राय है ?
3.    अन्ना आंदोलन ने देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम की भावना को जगाने की कोशिश की है, जिसका स्वागत है। किन्तु उनको स्पष्ट करना होगा कि उनका राष्ट्रवाद उग्र व संकीर्ण होगा या उदात्त और सहिष्णु होगा ? यह विविधता, बहुलता और विकेन्द्रीकरण पर आधारित होगा या नहीं ? इसमें हाशिए पर रहने वाले छोटे और अल्पसंख्यक समुदायों की बराबरीपूर्ण व सम्मानपूर्ण जगह होगी या नहीं ? साम्प्रदायिकता के सवाल पर भी उन्हें अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी।
4.    आज के चुनाव दो नंबरी धन, गुण्डों, जातिवाद, साम्प्रदायिकता और कार्यकर्ताओं की फौज के बल पर जीते जाते हैं। अन्ना टीम इसका मुकाबला कैसे करेगी ? गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले मंे समर्पित व ईमानदार कार्यकर्ता कहां से लाएगी ? क्या एक वैकल्पिक राजनैतिक संस्कृति और कार्यशैली बनाने के बारे मंे उन्होंने सोचा है ? क्या इसका कोई अनुभव उनके पास है ? यदि नहीं, तो अनुभव की कमी को कैसे दूर करेंगे ?
5.    देश में पहले से अनेक संगठन और समूह जमीन पर जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग कर रहे हैं। क्या अन्ना टीम उनके साथ कोई संवाद कायम करेगी  ? लोहिया, जेपी, शंकर गुहा नियोगी, किशन पटनायक एवं सच्चिदानंद सिन्हा जैसे विचारकों और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, समता संगठन व समाजवादी जन परिषद जैसे संगठनों ने वैकल्पिक राजनीति पर काफी सोचा है और प्रयोग किए हैं। क्या अन्ना के साथी उनके अनुभवों से सीखने और उनके साथ बराबरी का रिश्ता कायम करने के लिए तैयार हैं ?
6.    अन्ना ने कहा है कि वे अच्छे और ईमानदार उम्मीदवारों का चुनाव करेंगे। इसकी क्या कसौटी होगी और क्या गारंटी होगी ? व्यक्तिगत रुप से तो मनमोहन सिंह, ममता बनर्जी और नरेन्द्र मोदी भी ईमानदार हैं। क्या देश चलाने के लिए व्यक्तिगत ईमानदारी पर्याप्त है ?
7.    अन्ना टीम की नजर 2014 के लोकसभा चुनावों पर मालूम होती है। किन्तु वैकल्पिक राजनीति खड़ी करके सफलता पाने के लिए इतना समय काफी अपर्याप्त है। अन्ना टीम की कितनी लंबी तैयारी है ? क्या वे इस बात के लिए तैयार हैं कि चुनाव में उनके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो जाए ? क्या इससे उन्हें झटका नहीं लगेगा और वे निराश होकर चुप नहीं बैठ जाएंगे ? या चुनावी सफलता पाने के लिए वे भी सिद्धांतों से समझौता नहीं कर लेगें ? क्या वे इसके लिए गलत तत्वों से हाथ नहीं मिलाते जाएंगे और क्या गलत प्रवृत्तियों को अनदेखा नहीं करते जाएंगे ? दोनों स्थितियों में क्या वे देश मंे परिवर्तन चाहने वाली जनता के बीच निराशा की लहर नहीं पैदा करेंगे ?
8.    एक वैकल्पिक राजनीति के लिए जन आंदोलन, रचनात्मक कार्य, वैचारिक स्पष्टता, नीचे से संगठन निर्माण तथा चुनावी अनुभव इन पांचों मोर्चों पर काम करने की जरुरत है। इसके बारे में क्या अन्ना टीम की कोई योजना है और यदि है तो क्या ? व्यवस्था परिवर्तन कैसे होगा, इसका कोई रोडमेप उनके पास है ?
ये सवाल आज कई लोगों के मन में है और इनके जवाब पर अन्ना आंदोलन का भविष्य निर्भर करता है।

Read Full Post »

ईसा मसीह स्वयं  पैदाइशी तौर पर यहूदी थे । वैसे ही नया दल बनाने की घोषणा करने वाले  केजरीवाल का कार्यक्रम लाजमी तौर पर  ‘इन्डिया अगेंस्ट करप्शन’ द्वारा बुलाया गया था – नए दल द्वारा नहीं  । नए दल का नाम ,संविधान और शायद पदाधिकारियों की सूची नवम्बर 26 को घोषित  किए जाएंगे – यह उस मंच से  परसों घोषित किया गया । कल के ‘दी हिन्दू ‘ मे  यह पहले पेज की मुख्य खबर में था  । खबर के अनुसार दल के नाम ,संविधान और पदाधिकारियों केके नाम आदि की घोषणा ”नवम्बर 26 ,अम्बेडकर जयन्ती ” के दिन होंगी । क्या यह सामान्य सी चूक थी ? दल का नाम आदि कब घोषित होगा यह भली प्रकार सोचा गया होगा । उसकी तिथि भी अच्छी तरह सोच-विचार कर तय की गई होगी । राजनीति में कदम रख रहे रहे हैं तो ‘राजनैतिक रूप से सही’ कदम के तौर पर बाबासाहब से जोड़ना भी लगा होगा। तब ? क्या पता ‘दी हिन्दू’ वालों ने यह गलती की हो?

केजरीवाल की अब तक की एक-सूत्री मांग लोकपाल  के  42 साल पहले जब जयप्रकाश लोकपाल की मांग करते थे तब भी वे योरप में कुछ स्थानों पर लागू ओमबड्समन की चर्चा करते थे। प्रशासन के अलावा संस्थाएं भी ओमबड्समन रखती हैं। भारतीय मीडिया जगत में ‘दी हिन्दू’ एक मात्र संस्था है-जहां लोकपाल,लोकायुक्त,ओमबड्समन से मिलता जुलता एक निष्पक्ष अधिकारी बतौर ‘रीडर्स एडिटर ‘ नियुक्त है । अभी तीन दिन पहले ही श्री पनीरसेल्वन इस पद पर नियुक्त हुए हैं । तो हमने उनसे तत्काल पूछा की कल अक्टूबर 3 ,2012 के अखबार में पहले पन्ने के मुख्य समाचार में यह जो कहा गया है – कि ”अम्बेडकर जयन्ती नवम्बर 26” को है यह यह उस जलसे वालों की गलती है या अखबार की ? हमने यह भी गुजारिश की मेहरबानी कर इस मसले  की हकीकत का  सार्वजनिक तौर पर ऐलान करें चूंकि की यह देश के एक बड़े  नेता के प्रति कथित ‘नई  राजनीति’ के दावेदारों की अक्षम्य उपेक्षा को दरसाता है । हमने यह इ-पत्र  लिखा :

To,
Readers’ Editor,
The Hindu.
Dear Sir ,
I want to draw your attention to the main news on page 1, Delhi edition,dated October 3,2012 with the heading ‘Kejriwal launches party,vo
ws to defeat ‘VIP system’. The news declares November 26 as ‘Ambedkar Jayanti’ which is factually wrong and shows ignorance about one of our national leaders . It should be made clear by you to the readers in general and the public in general whether this mistake is committed by the proposed new party or by The Hindu.
With regards,
Sincerely yours,
Aflatoon,
Member,National Executive,
Samajwadi Janaparishad.

आज अक्टूबर 4 ,2012 के अखबार (छपे संस्करण में) मेरे ख़त का जवाब आ गया है। ‘नवम्बर 26 को को अम्बेडकर जयन्ती बताने का का सन्दर्भ गलत है।विशेष संवाददाता का की सफाई  : यह (नवम्बर 26 को अम्बेडकर जयन्ती बताना ‘इंडिया  अगेंस्ट करप्शन ‘ के जलसे  के मंच से हुआ था।

>> In “Kejriwal launches party , vows to defeat ‘VIP system’ (page1,Oct 3,2012), the reference to November 26 as Ambedkar Jayanti is incorrect. The Special Correspondent’s clarification : It (November 26 as Ambedkar Jayanti remark ) was made from the dais during the India Against Corruption function.

 

तो भाई ‘द हिन्दू ‘ के लोकपाल जिन्हें  रीडर्स एडिटर कहा जाता है, ने यह साफ़ कर दिया कि अम्बेडकर जयन्ती की बाबत गलत सूचना इस नए दल वालों की थी।  अरविंद केजरीवाल एक समूह का प्रमुख विचारक माना जाता रहा है, उसके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में उस समूह के मकसद के अनुरूप भाषण करता रहा है । यह समूह है – आरक्षण का विरोध करने के लिए बना समूह – यूथ फॉर इक्वालिटी  – मकसद है गैर-बराबरी कायम रखना और और नाम धरा है ‘बराबरी’ ! अन्ना के साथ जब पहली बार जंतर-मंतर पर जब केजरीवाल पहली बार धरना दे रहे थे तब इसी समूह से जुडे लड़के ‘ आरक्षण संवैधानिक भ्रष्टाचार है’ के नारे पहने हुए थे । नए दल के नजरिए में आरक्षण के समर्थन में वचन हैं । दूसरे के नजरिए को पचाने में वक्त लग सकता है? उस बीच के वक्त में ऐसी चूक हो सकती है? अगर महात्मा फुले की पुण्य तिथि  नवम्बर 28 से कन्फ्यूजिया रहे हों ? वह भी 26 नहीं 28 है।

परसों शाम मुझे योगेन्द्र यादव का इमेल मिला।केजरीवाल की प्रस्तावित पार्टी का दस्तावेज उसके साथ संलग्न था। सुनते  हैं  कि यह ड्राफ्ट भी योगेन्द्र का लिखा  । ऐसा होने पर  वे इस नई  प्रक्रिया के मात्र  प्रेक्षक नहीं रह जायेंगे ।   योगेन्द्र यादव ने केजरीवाल के मंच से बताया की वे समाजवादी जनपरिषद के सदस्य हैं । समाजवादी जनपरिषद के सक्रीय सदस्यों की भी एक आचार संहिता है। कथित नए दल की प्रस्तावित हल्की-फुल्की और त्रुटि -पूर्ण आचार संहिता की भांति  नहीं है समाजवादी जनपरिषद की आचार-संहिता। बिहार आन्दोलन के वरिष्ट साथी बिपेंद्र कुमार ने बताया की’वी आई पी संस्कृति’ के निषेध के लिए इस नए समूह की घोषणा कितनी हास्यास्पद है।दरअसल जड़ से कटा होने के कारण ऐसा होता है- ”हमारे विधायक और सांसद लाल बत्ती नहीं लगायेंगे” जोश में कह दिया । कहीं भी विधायक-सांसद यदि उन पर मंत्री जैसी जिम्मेदारी न हो तो बत्ती नहीं लगाते। शेषन , खैरनार,अनादी  साहू जैसे नौकराशाहों से इस पूर्व नौकरशाह और एन जी ओ संचालक की स्थिति मिलती जुलती हो यह बहुत मुमकिन है। स्वयंसेवी सन्स्थाओं  की पृष्टभूमि वाले राजनैतिक कर्मियों और उनसे अलग सच्चे अर्थों में राजनैतिक कर्मियों के बारे में किशन पटनायक ने हमें साफ़ समझ दी है :

‘वही एन जी ओ कार्यकर्ताओं को पाल पोस सकते हैं जो विदेशी दाता सम्स्थाओँ से पैसा प्राप्त करते हैं ।धनी देशों के एनजीओ के बारे हम कम जानते हैं। अधिकाँश दाताओं का उद्देश्य रहता है की उनके पैसे से जो सार्वजनिक कार्य होता है वह नवउदारवाद  और पूंजीवाद का समर्थक हो ।जो सचमुच लोकतंत्र  का कार्यकर्ता है उसके राजनैतिक खर्च के लिए या न्यूनतम पारिवारिक खर्च के लिए इन देशों में पैसे का कोई स्थायी या सुरक्षित बंदोबस्त नहीं होता है। देश में हजारों ऐसे कार्यकर्ता हैं जो पूंजीवाद विरोधी राजनीति में जहां एक ओर  पूंजीवाद और राज्य-शक्ति के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपने मामूली खर्च के लिए इमानदारी से स्खलित न होने का संघर्ष  जीवन भर कर रहे हैं ।उनमें से एक-एक का जीवन एक संवेदनापूर्ण किस्सा है , गाथा है , जो अभी तक न विद्वानों के शास्त्र का विषय बना है , न साहित्यिकों की कहानियों का विषय।हमारे लिए हैं वे हैं लोकतंत्र के आलोक-स्तम्भ ।”

इस बुनियादी समझ के साथ समाजवादी जनपरिषद ने सक्रीय सदस्यों  के लिए बनी अपनी आचार-संहिता में :

दल के संविधान की 3.1.(2) के अनुसार सक्रिय सदस्य दल द्वारा स्वीकृत आचरण संहिता का पालन करेगा। दल की आचरण संहिता पर हमे फक्र है तथा नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इसे हम अनिवार्य मानते हैं। इसे यहाँ पूरा दे रहा हूँ :

समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सक्रिय सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह-

1.1 जनेऊ जैसे जातिश्रेष्ठता के चिह्न धारण नहीं करेगा।

1.2 छुआछूत का किसी भी रूप में पालन नहीं करेगा।

1.3 जाति आधारित गालियों का प्रयोग नहीं करेगा ।

1.4 दबी हुई जातियों को छोड़कर किसी भी अन्य जाति विशेष संगठन की सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।

2.1 दहेज नहीं लेगा ।

2.2 औरत की पिटाई नहीं करेगा और औरत(नारी) विरोधी गालियों का व्यवहार नहीं करेगा।

2.3 एक पत्नी या पति के रहते दूसरी शादी नहीम करेगा और न ही उस स्थिति में बिना शादी के किसी अन्य महिला/पुरुष के साथ घर बसाएगा ।

3 धार्मिक या सांप्रदायिक द्वेष फैलाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होगा ।

4 समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह ऐसे किसी गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्था (  NGO ), जो मुख्यत: विदेशी धन पर निर्भर हो,

(क) का संचालन नहीं करेगा ।

(ख) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली समिति का सदस्य नहीं होगा।

(ग) से आजीविका नहीं कमाएगा ।

5.1 सदस्यता-ग्रहण/नवीनीकरण के समय अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति व आय की घोषणा करेगा ।

5.2 अपनी व्यक्तिगत आय का कम से कम एक प्रतिशत नियमित रूप से समाजवादी जनपरिषद को देगा।

5.3 विधायक या सांसद  चुने जाने पर अपनी सुविधाओं का उतना अंश दल को देगा जो राष्ट्रीय  कार्यकारिणी द्वारा तय किया जायेगा।

बहरहाल योगेन्द्र यादव पर समाजवादी जनपरिषद के सक्रीय सदस्यों के लिए बनी ऊपर दी गयी आचार संहिता लागू नहीं है । इसकी धारा 4 से भी मुक्त हैं ,वे। सिर्फ सक्रीय सदस्य ही दल की जिम्मेदारियां लेता है ।किसी प्रस्तावित दल  के दस्तावेज का ड्राफ्ट बना कर  प्रेक्षक की सीमा का उल्लंघन किया अथवा नहीं यह दिल्ली की इकाई तय करेगी । दल का सदस्य जिस स्तर  का होता है उस स्तर  की समिति उससे जुड़े अनुशासन को देखती है ।

 

Read Full Post »

%d bloggers like this: