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Archive for मई 4th, 2017

2014 में पहली बार अपने बूते केन्द्र में सरकार बना लेने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ उत्तर प्रदेश जैसे बडे राज्य में बड़ी चुनावी सफलता हासिल की है वहीं दूसरी ओर राजनीति को पूंजीपतियों के हाथों में बांध देने में सत्ता के शीर्ष में बैठे इस दल के लोगों ने अहम भूमिका अदा की है।विडंबना यह है कि शोषक वर्ग के स्वार्थ की पूर्ति के लिए नाना प्रकार की नीतियां बनाने और कदम उठाने के बावजूद केन्द्र में बैठा यह सत्ताधारी दल राष्ट्रवादी होने का दावा करता है। समाजवादी जन परिषद के लिए दो स्वार्थ सर्वोपरि है-शोषित वर्ग का स्वार्थ तथा देश का स्वार्थ। दल की स्पष्ट मान्यता है कि पूंजीपति वर्ग के स्वार्थ को तवज्जो देने  से देश के स्वार्थ का नुकसान ही होता है।

याराना पूंजीवाद और खेती

केन्द्र सरकार की विदेश नीति तक शासक वर्ग से जुड़े पूंजीपतियों के हक में है। प्रधान मंत्री मंगोलिया,बांग्लादेश जैसे हमसे कमजोर देशों में जाते हैं और उन्हें करोड़ों डॉलर का कर्ज देने की घोषणा करते हैं।यह ऋण उन्हीं देशों को दिया जाता है जहां प्रधान मंत्री के करीबी पूंजीपतियों द्वारा बड़ी परियोजना चलाने के लिए समझौता होता है।

देश के बड़े पूंजीपतियों का सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 11 लाख करोड़ रुपये का बकाया है।इसे चुकता करवाने के लिए सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर द्वारा कड़े कदम उठाने की मांग की गयी तो उन्हें सेवा विस्तार नहीं दिया गया।

खाद्यान्न एवं खाद्य तेल के मामले में स्वावलंबन हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जानी चाहिए जिसका श्रेय इस देश के किसानों को जाता है।इस स्वावलंबन को पलटने की दिशा में भी सत्ता के करीबी पूंजीपतियों का प्रत्यक्ष हाथ दिखाई दे रहा है।भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयात करने वाला देश हो गया है।गौतम अडाणी की खाद्य तेल की ‘फॉर्चून’ मार्के वाली कम्पनी द्वारा अन्य तेल कम्पनियों को पाम ऑयल मिला हुआ खाद्य तेल बेचने का तरीका बताना आयात बढ़ने का मुख्य कारण रहा है। देश के तमाम बड़े उद्योगपतियों की कम्पनियों द्वारा अफ्रीकी देशों में हजारों एकड़ के फार्मों में खेती कराई जा रही है तथा भारत सरकार इनके उत्पादों के आयात के लिए उन देशों से समझौते कर रही है। अरहर की दाल की कीमत जिन दिनों आसमान छू रही थी तब गौतम अडाणी के गुजरात स्थित निजी बन्दरगाह में अफ्रीका से आयातित सस्ती दाल(40 से 50 रुपए/किलो) इकट्ठा करके रखा गया था तथा कीमत 100 रुपये प्रति किलो होने के बाद उसे निकाला गया था। विदेशों से गेहूं आयात करने पर लगने वाले 25 प्रतिशत आयात शुल्क को पहले 10 फीसदी किया गया और फिर उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। वित्त मंत्री द्वारा यह घोषित कर दिया गया है कि निजी कम्पनियां यदि ठेके पर खेती करना चाहेंगी तो उन्हें इजाजत दे दी जाएगी।

खेती में बढ़ रही लागत के कारण किसानों की आत्महत्या की दर 26 प्रतिशत बढ़ गयी है। उत्तर प्रदेश की नवनिर्वाचित सरकार ने लघु तथा सीमान्त किसानों के कर्जे माफ कर दिए हैं जो कुछ राहत देने वाला कदम है।इसके साथ ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के शीर्षस्थ अधिकारियों ने किसानों की कर्ज माफी के खिलाफ बयान देने शुरु कर दिए हैं। इन बयानों से स्पष्ट होता है कि सरकार देश भर के किसानों के कर्ज माफ करने की मांग पर सकारात्मक नजरिए से विचार नहीं करना चाहती है।

कृषि उपज के समर्थन मूल्य के सन्दर्भ मे स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग को सरकार नजरअन्दाज कर रही है।इस समिति द्वारा लागत खर्च में 50 फीसदी जोड़ कर समर्थन मूल्य निर्धारित करने की बात कही गयी थी। यह नहीं भूलना चाहिए 2014 के आम चुनाव के अभियान में नरेन्द्र मोदी ने भी इस समिति की सिफारिशों को लागू करने की बात चुनावी सभाओं में कही थी। सजप सहित देश के किसान आन्दोलन कृषि उपज के मूल्य निर्धारण की बाबत इस समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग करते हैं।

बेरोजगारीः

समाजवादी जन परिषद के नेता और अर्थशास्त्री साथी सुनील ने ग्रामीण इलाके के रोजगार के सन्दर्भ कहा था,’आज भारत के गाँव उद्योगविहीन हो गए हैं और वहाँ खेती-पशुपालन के अलावा कोई धंधा नहीं रह गया है । गाँव और खेती एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं । दूसरी ओर गांव और उद्योग परस्पर विरोधी हो गये हैं । जहाँ गाँव है , वहाँ उद्योग नहीं है और जहाँ उद्योग है , वहाँ गाँव नहीं है । यह स्थिति अच्छी नहीं है और यह भी औपनिवेशिक काल की एक विरासत है ।‘ खेती के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और जंगल पर आश्रित रोजगार के अवसरों को समाप्त करने का खुला खेल शुरू हो चुका है। विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल 2015 को पूरी तरह लाचार बना दिया गया। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। यह नीति विश्व व्यापार संगठन की कई शर्तों के आड़े आती थी इसलिए 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। विदेशी मुद्रा के फूलते गुब्बारे और भुगतान संतुलन के ‘सुधार’ के साथ यह शर्त जुड़ी थी कि उत्पादन में मात्रात्मक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकेंगे। विश्व व्यापार संगठन की इस शर्त के कारण 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं।

जिन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म किया गया था उन पर गौर कीजिए- अचार, पावरोटी, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, लकड़ी का फर्नीचर, नोटबुक या अभ्यास पुस्तिका और रजिस्टर, मोमबत्ती, अगरबत्ती, आतिशबाजी, स्टेनलेस स्टील के बरतन, अल्युमिनियम के घरेलू बरतन, कांच की चूड़ियां, लोहे की अलमारी, लोहे की कुर्सियां, लोहे के टेबल, लोहे के सभी तरह के फर्नीचर, रोलिंग शटर, ताले, कपड़े धोने का साबुन और दियासलाई। बड़ी पूंजी, आक्रामक विज्ञापन, मानव-श्रम की जगह मशीन को तरजीह देने वाली तकनीक से लैस देशी-विदेशी खिलाड़ी अधिक रोजगार देने वाले इन छोटे उद्योगों को लील जाएंगे।

इस प्रकार के छोटे और कुटीर उद्योगों के उत्पादों की खपत को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय एवं राज्य-स्तरीय सरकारी क्रय संस्थाओं द्वारा लघु और कुटीर उद्योगों से ही सामान खरीदने की नीति को भी निष्प्रभावी बनाने की दिशा में काम हो रहा है। इससे ठीक विपरीत स्थिति पर गौर करें। बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देने के लिए नियम-कानून बदल देने का भी इतिहास रहा है। सरकार द्वारा नियम कानून बदल कर अपने प्रिय औद्योगिक घराने को बहुत बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाने के प्रमुख उदाहरणों में अंबानियों के उदय को प्रायोजित करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सिर्फ उन्हें ही सिंथेटिक धागे के उत्पादन के लिए कच्चे माल के आयात की इजाजत देने के साथ-साथ हथकरघा द्वारा तैयार की जाने वाली कपड़ों की किस्मों की आरक्षित सूची को निष्प्रभावी बना देना है। गौरतलब है कि कपड़ा और उद्योग नीति के इन नीतिगत फैसलों के द्वारा अंबानी को देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बनाने के पहले तक सूती कपड़े कृत्रिम धागों से बने कपड़ों से सस्ते थे। कृत्रिम धागों से पावरलूम पर बने कपड़ों की इजाजत के साथ-साथ लाखों हथकरघा बुनकरों की आजीविका छिन गई है। पहले पावरलूम पर सिर्फ ‘कोरे कपड़े’ और हथकरघे पर बिनाई की विविध डिजाइनों के कपड़ों को बनाने की इजाजत थी।

यह कानून 1985 में बन गया था। तब बाईस किस्म के कपड़े इस कानून के तहत हथकरघे के लिए संरक्षित किए गए गए थे। पावलूम लॉबी ने कानून को 1993 तक मुकदमेबाजी में फंसाए रखा और 1993 में जब यह प्रभावी हुआ तब संरक्षित किस्मों की संख्या ग्यारह रह गई। एक प्रामाणिक अध्ययन के अनुसार हथकरघे पर बने होने के दावे वाले सत्तर फीसद कपड़े दरअसल मिलों या पावरलूम पर बने होते हैं।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीस लाख लोगों को काम मिला है जबकि हथकरघा से दो करोड़ लोग जुड़े हैं। अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी यात्री फ्रैन्कोए पिरार्ड डी लावाल ने अपने यात्रा विवरण में बताया है कि अफ्रीका के दक्षिणी छोर से चीन तक लोग भारतीय हथकरघे पर बने कपड़ों से अपना शरीर ढंकते थे। उनके अनुसार भारत के पूर्वी तट के सिर्फ एक बंदरगाह से सालाना पचास लाख गज कपड़े का निर्यात होता था।

पारंपरिक हुनर,कला और हस्तशिल्प से जुड़े इन तमाम रोजगारों को समाप्त करने की नीति को लागू करने के साथ-साथ जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए केन्द्र सरकार प्रचारित कर रही है कि वह हुनर प्रशिक्षण के लिए योजना चला रही है।

सरकारी नौकरियों की स्थिति के बारे में सरकार ने संसद में लिखित सूचना दी है। केंद्रीय कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में लिखित रूप से कहा है कि 2013 की तुलना में 2015 में केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 फीसदी की कमी आई है। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की भर्ती में 90 फीसदी की कमी आई है। 2013 में केंद्र सरकार में 1, 54,841 भर्तियां हुई थीं जो 2014 में कम होकर 1, 26, 261 हो गईं। मगर 2015 में भर्तियों की संख्या में अचानक बहुत कमी हो जाती है। सवा लाख से कम होकर करीब सोलह हज़ार हो गयी। बिना किसी नीतिगत फैसले के इतनी कमी नहीं आ सकती। 2015 में केंद्र सरकार में 15,877 लोग की सीधी नौकरियों पर रखे गए। 74 मंत्रालयों और विभागों ने सरकार को बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की 2013 में 92,928 भर्तियां हुई थीं। 2014 में 72,077 भर्तियां हुईं। मगर 2015 में घटकर 8,436 रह गईं। इस प्रकार नब्बे फीसदी गिरावट आई है।
2015-18 के बीच रेलवे में रोजगार नहीं बढ़ेगा। रेलवे के मैनपावर की संख्या 13, 31, 433  ही रहेगी। जबकि 1 जनवरी 2014 को यह संख्या पंद्रह लाख थी। करीब तीन लाख नौकरियां कम कर दी गई हैं। 2006 से 2014 के बीच 90,629 हज़ार भर्तियां हुईं। अमरीका में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। भारत में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 138 है और यह भी कम होती जा रही है।
आल इंडिया काउंसिल फार टेक्निकल एजुकेशन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार साठ प्रतिशत इंजीनियर नौकरी पर रखे जाने के काबिल नहीं हैं। भारत में हर साल आठ लाख इंजीनियर पैदा होते हैं। इनकी फीस में तो कोई कमी नहीं हुई। ये काबिल नहीं हैं तो इंजीनियरिंग कालेजों का दोष हैं। उन्होंने इतना खराब इंजीनियर लाखों रुपये लेकर कैसे बनाया । उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं है। अब बाज़ार में नौकरियां नहीं हैं तो पहले से ही इंजीनियरों को नाकाबिल कहना शुरू कर दो ताकि दोष बाज़ार पर न आए। अगर साठ प्रतिशत इंजीनियर नालायक पैदा हो रहे हैं तो ये जहां से पैदा हो रहे हैं उन संस्थानों को बंद कर देना चाहिए।

काला धन और भ्रष्टाचार

देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों को नाजायज लाभ पहुंचाने वाली केन्द्र सरकार काले धन को समाप्त करने का दावा करती है तो उससे बढ़ कर हास्यास्पद और क्या हो सकता है? सच्चाई तो यह है कि HSBC बैंक की स्विट्जरलैन्ड स्थित जेनेवा शाखा में कई भारतीयों के गुप्त खाते होने की खबर को आये काफी समय बीत चुका है।दुनिया भर के कई हथियार तस्कर ,नशीली दवाओं के अवैध धन्धे करने वाले तथा भ्रष्ट नेताओं के नाम उजागर हुए हैं।इस सूची में भारत के बडे उद्योगपति,सिनेमा स्टार आदि के नाम थे। इस सूची के सार्वजनिक होने के बाद सरकार को इन खाताधारकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी,इसके बजाए सरकार ने इन खाताधारकों से नजदीकी संबंध होने के कारण ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कि बल्कि उस राशि को कबूल लेने की छूट की घोषणा की है।

पनामा नामक देश में दुनिया भर के कई भ्रष्ट नेताओं,अवैध व्यापार करने वाले तथा तस्करों के बैंक खातों की सूची सार्वजनिक हुई है।इस खबर के उजागर होने के बाद रूस,पाकिस्तान जैसे कई देशों में भारी हलचल मच गई।भारत में देश के सबसे उद्योगपति तथा सीने-सितारों आदि के नाम उजागर होने के बावजूद सरकार ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की है।

काले धन के समाप्ति के दावे के साथ सरकार ने सबसे बड़ा कदम ‘नोटबन्दी’ का उठाया। अर्थव्यवस्था में चलन से बाहर किए गए नोटों का मूल्य 86 फीसदी था। इस कदम से देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति पैदा हो गयी।नोटों को बदलने के लिए बैंकों की लाइन में खड़े 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई। इस सबके बावजूद जिन लोगों के पास इन बड़े नोटों में अघोषित पैसा था वे उसे बदलने या उसे खर्च करने में सफल हो गए।अघोषित धन के इन मालिकों ने अपने कर्मचारियों और मजदूरों को इन नोटों में कई महीनों का एडवान्स में वेतन और बोनस देकर,सोना तथा डॉलर में बदल कर तथा पेट्रोल पंपो के माध्यम से अघोषित पैसे से बिना नुकसान उठाए मुक्ति पा ली। विपक्षी दल इस मुद्दे की गहराई में नहीं गए तथा जनता के बीच इसके खिलाफ कारगर कदम उठाने से बचते रहे।इसके फलस्वरूप साधारण गरीब लोगों में यह भ्रम फैलाने सरकार सफल हो गयी कि इस कदम से आम जनता को खास कष्ट नहीं होगा और पैसे वालों लोगों का नुकसान होगा। वास्तविकता यह है कि सरकार ने आज तक कितने नोट वापस नहीं लौटे इसका अधिकृत आंकड़ा तक घोषित नहीं किया है। सजप यह मांग करती है कि सरकार इससे संबंधित तथ्य सार्वजनिक करे तथा छोटे मूल्य के नोट उपलब्ध कराए।

कांग्रेस सरकार के समय चले लोकपाल की मांग के आन्दोलन का विपक्षी दल के रूप में भाजपा को लाभ मिला था इसके बावजूद लोकपाल के लिए कोई कारगर कानून नहीं लाया गया है। भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों द्वारा बिना स्रोत बताये राजनैतिक दलों को चन्दे के रूप में दिया जाता है।इस वर्ष के वित्त विधेयक के साथ ऐसे चन्दे की कोई सीमा न रखने तथा स्रोत घोषित न करने को वैधानिकता प्रदान कर दी गई है। यह ध्यान देने लायक बात है कि वर्तमान में चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च की सीमा निर्धारित है किन्तु दलों द्वारा किए गए चुनाव खर्च की कोई सीमा नहीं है इसलिए इसका हिसाब भी गंभीरता से नहीं दिया जाता है। चुनाव के दौरान विपक्षी दलों के एक-एक नेता को खरीदने में मौजूदा शासक दल करोड़ों रुपए खर्च करता है इसलिए अघोषित आय के स्रोतों को बाधित करने में उसकी कोई रुचि नहीं है बल्कि इन बाधाओं को दूर करने के उसके द्वारा कानून बना लिए गए हैं।

चुनाव-सुधार

चुनाव में अघोषित पैसे हासिल करने और उसके बल पर चुनाव लड़ने के सन्दर्भ में ऊपर के अनुच्छेद जिक्र किया गया है। निर्वाचन प्रक्रिया के सन्दर्भ में समाजवादी जनपरिषद आनुपातिक प्रतिनिधित्व को अपनाने की पक्षधर है। इस सन्दर्भ में दल का कहना हैः

भारत के राज्य / शासन के हरेक स्तर (यथा केन्द्र, प्रदेश, जिला परिषद, प्रखंड समिति और पंचायत) पर चुनाव की पद्धति FPTP (“सबसे अधिक मत पाने वाला ही विजेता”) है। इसके विरुद्ध 80 देशों में चालू और भविष्य की लोकप्रिय पद्धति “आनुपातिक प्रतिनिधित्व है।

FPTP पद्धति भारत के शासन और लोकतन्त्र में कई कमजोरियों और विकृतियों को चला बढ़ा रही है| वह नीतियों के बनने- बदलने में बहुत खतरनाक हालात पैदा कर रही है. इसकें कुछ तथ्य हैं-

  1. मोदी सरकार केवल 30% जनता की पसन्द से ही लोकसभा में बहुमत लेकर आई है. करीब 60% जनता, जो उसके विरुद्ध है; वह 5 साल के लिए संसद मे बहुत कम प्रतिनिधित्व वाली और अशक्त हो चुकी है. छोटी संख्या वाली विकसित हो रही विचारधाराओं और संगठनों का तो इस पद्धति के रहते संसद, विधानसभा वगैरह में पहुँच पाना और मात्र अपनी पहचान बना कर रख पाना असंभव है।
  2. देश की प्रत्येक राज्य सरकार में भी कोई एक पार्टी इसी तरह बहुमत से बहुत कम वोट लाकर भी शासक बन गई है। वे भी कई बार केन्द्र सरकार जैसे गलत और अलोकतान्त्रिक निर्णय और काम करती है। ये सारी अल्पमत वाली सरकारें दूरगामी आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों और बड़े सामाजिक-धार्मिक प्रभाव वाले कार्यक्रम बनाती चलाती है। वे अतिवादी व्यवहार को बढ़ावा देती है जो बहुधा देश-समाज को गहरा नुकसान पहुँचाने वाली होती है।

इस मुद्दे की बाबत दल द्वारा सेमिनार आयोजित किए जाएंगे तथा सहित्य प्रकाशन किया जाएगा।

भारतीय समाज में जो लोग संकीर्ण भावनाओं को फैलाते हैं,जाति-प्रथा के विचार को फैलाते हैं,मठाधीशों के वर्चस्व को मजबूत करते हैं,साम्प्रदायिकता को फैलाकर निहित वर्ग की राजनीति को मजबूत बनाते हैं,उनकी राजनीति आज ताकतवर है। समाजवादी जन परिषद जिन गरीब और कमजोर तबकों की राजनीति करती है वह मजबूत न होने पर उन तबकों का न घर चलेगा न आजीविका।यह बात हमें जनता में ले जानी होगी। शोषित वर्ग का स्वार्थ और देश का स्वार्थ परस्पर जुड़े हुए हैं। धनी वर्ग की राजनीति का मुकाबला हम इसी राजनीति के बल पर करेंगे। हमें इस उद्देश्य को स्पष्ट तौर पर दिमाग में बैठा लेना होगा। पूंजीवादी,मनुवादी सोच की ताकतें जिस प्रकार ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उद्देश्य अपने दिमाग बैठाये हुए हैं, उससे देश का विघटन अवश्यंभावी है। शोषित तबकों की राजनीति को मजबूत बना कर मौजूदा देश-विरोधी राजनीति को परास्त करने का यह सम्मेलन संकल्प लेता है।

प्रस्तावक- अफलातून. , समर्थक – कमलकृष्ण बनर्जी

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