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Archive for अप्रैल, 2020

समाजवादी जन परिषद
816, रुद्र टॉवर, करमजीतपुर, सुंदरपुर, वाराणसी 221005
प्रेस विज्ञप्ति
पत्रांक 2/ 2020 दिनांक 15-04- 2020
राष्ट्रीय आपदा में राष्ट्रीय सरकार

सन 2020 मे भारत अन्य देशों की तरह एक विनाशकारी खतरे में COVID-19 विषाणु ( VIRUS) की वैश्विक महामारी के कारण आ गया है। बीसियों देशों के COVID-19 महामारी के आंकड़ों, विश्लेषणों और ज्ञात सुरक्षा उपायों से निष्कर्ष निकला है कि भारत में करोड़ों लोग संक्रमित होंगे और लाखों लोगों की मौत होगी। साथ ही देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक सदभाव, राजनीतिक स्थिरता, कानून- व्यवस्था और खाद्य, सीमा तथा स्वास्थ्य सुरक्षा करीब करीब ढेर हो जायेगी। देश का विशिष्ट वर्ग (Elite), प्रशासक, राज्यतंत्र औऱ वैज्ञानिक वर्ग अब तक इन खतरों को नहीं समझ रहे हैं, और वस्तुस्थिति को जनता से छिपा रहे हैं।

संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली की कई लोकतान्त्रिक सरकारें चरम हालातों लम्बा युद्ध, राष्ट्रव्यापी महामारी (Nationwide Epidemic), वैश्विक आर्थिक युद्ध (Global Economic War), जलवायु महाविपत्ति (Climatic Catastrophe) जैसी मुसीबतों में अकुशल, दुविधा ग्रस्त, और निर्भीक निर्णय मे अक्षम हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि इन सरकारों के पास सम्पूर्ण जनता का समर्थन और उसके प्रतिनिधियों की सहभागिता नहीं होती है।

ऐसे हालातों में “राष्ट्रीय सरकार (National Unity Government)” बनाने का विश्व के विभिन्न देशों में कई उदाहरण रहे हैं। इन सरकारोँ ने अपने देश और समाज को भीषण संकट औऱ खतरों से उबारने में सफलता पाई। इन राष्ट्रीय सरकारोँ में संसद की बहुमत वाली पार्टी विपक्षी पार्टियों को भी सरकार में शामिल करती है। सभी पार्टियों के लोग अपने अन्तरविरोधों को कुछ वर्षों के लिये छोड देते हैं। सभी दल मंत्रिमंडल में शामिल होते हैं और तात्कालिक भीषण हालातों से देश को उबारने की कोशिश में लग जाते हैं।

हम नीचे ऐसी “राष्ट्रीय एकता सरकारों (National Unity Government)” के कुछ उदाहरण देखेंगे।

  1. 1861 में शुरू हुए अमेरिका के गृह युद्ध के समय संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रीय एकता सरकार बनी जिसमें बहुमत वाली रिपब्लिकन पार्टी के अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति बने और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के ऐंडरू जॉनसन उपराष्ट्रपति बने। दोनों पार्टियों की सम्मिलित सरकार ने गृहयुद्ध में गोरे नस्लवादी राष्ट्रतोड़क विद्रोहियों को हराकर नस्लवाद को हराया और अमेरिकी राष्ट्र को टूटने से बचाया।
  2. 1930 की भीषण आर्थिक मंदी (The Great Depression) के समय 1931-35 में बिट्रेन में रैमसे मैकडोनाल्ड के प्रधानमंत्री काल में बहुमत वाली लेबर पार्टी ने विपक्षी लिबरल पार्टी के साथ राष्ट्रीय सरकार बनाई।

इसी “राष्ट्रीय एकता” के उम्मीदवारों ने 1935 का चुनाव मिलकर लड़ा और आंशिक राष्ट्रीय एकता सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत 1945 तक ब्रिटेन पर शासन किया।

  1. दक्षिण अफ्रीका में 1994 में हुए चुनाव के बाद उन सभी दलों के सांसदो को सरकार में शामिल किया गया जिन्हें 10% से ज्यादा वोट आये थे। यह सरकार 1999 तक चली।
  2. नेपाल में 2015 के भीषण भूकंप के बाद सभी बड़ी पार्टियों ने मिलकर सरकार और संसद चलाई। इसी दौरान बरसों से मतभेदों मे फँसे हुए नेपाल के नये संविधान को भी बनाया और अंगीकृत किया गया।
  3. इटली में 1946 से 2014 के बीच 7 (सात) बार विभिन्न पार्टियों ने मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार चलाई।
  4. इज़रायल में कई बार ऐसी राष्ट्रीय एकता सरकार बनी है। सबसे ताज़ा प्रयोग अभी 27 मार्च 2020 का है।
  5. ऐसी सरकारे अफगानिस्तान, कनाडा, क्रोएशिया, एस्टोनिया, ग्रीस, हंगरी, केन्या, लेबनान, फिलिस्तीन, श्रीलंका, सूडान, जिम्बाब्वे वगैरह में भी बनी है।

आज भारत में इतिहास का तकाजा है कि केंद्र में इस प्रकार की “राष्ट्रीय एकता” सरकार तुरंत बने

अभी की कोरोना महामारी के अभूतपूर्व संकट के समय बहुमत वाले केवल एक गठबंधन की सरकार अशक्त रहेगी और कठोर सही निर्णय लेकर उसका कार्यान्वयन नहीं कर पाएगी। उस दक्षता, निर्भीक निर्णयों और कार्यान्वयन के अभाव मे देश और जनता को बीमारी, भूख, मौतें, बेरोजगारी और आर्थिक संकटों की भयानक कठिनाइयों और पीड़ा से गुजरना होगा।

इसलिए अविलंब ऐसी एक “राष्ट्रीय एकता सरकार” बनाने लिए मैं एक फार्मूला प्रस्तावित कर रहा हूँ । मंत्रिमंडल में 100 (सौ) सदस्यों की जगह मान कर गणना करें। लोक सभा चुनाव (2019) में जिस किसी पार्टी को 1 (एक) प्रतिशत से ज्यादा मत मिले थे; उस हरेक पार्टी के प्राप्त वोट प्रतिशत के अनुपात में मंत्री रखे जाँय। 2019 के चुनाव नतीजे बताते हैं कि 13 (तेरह) दलों को एक प्रतिशत से ज्यादा मत आये थे। इन सभी दलों के सदस्यों को लेकर मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया जाय। एक सरसरी गणना बताती है कि केवल 80 सदस्यों का ही मंत्रिमंडल बन सकेगा। क्योंकि छोटे दलों (1% से कम वोट वाले) और स्वतंत्र उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त मतों के आधार पर क़ोई प्रतिनिधि मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगा।

भारत की 130 करोड़ जनता को मौत, बीमारी और आर्थिक बरबादी से बचाने के लिए और एक समावेशी सक्षम राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने के लिए यह संभव प्रकिया है। संसद मे बहुमत प्राप्त दल इस चुनौती को तुरंत स्वीकार करें और भारत तथा विश्व इतिहास मे एक ऊंची जगह पाएं।

अतुल कुमार
सचिव

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समाजवादी जन परिषद
816, रुद्र टॉवर, करमजीतपुर, सुंदरपुर, वाराणसी 221005

सजप विज्ञप्ति

पत्रांक 3/ 2020 दिनांक 27-04- 2020

व्यवस्थाओं का पोल खोलती कोरोना का कहर और सजप की पहल

विश्वव्यापी कोरोना महामारी के उत्पन्न हुए पांच महीने हो गए। भारत में इसका पहला मामला 30 जनवरी को प्रकट हुआ। इसके बाद से तमाम कोशिशों के बावजूद यह निर्बाध बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया में इससे अब तक मरनेवालों की संख्या दो लाख से ऊपर हो गई है। इसके सबसे ज्यादा शिकार विकसित देशों में हो रहे हैं। अमेरिका जैसी महाशक्ति कोरोना के आगे लाचार है और सबसे पीछे चलने के बाद भी वहां अभी सर्वाधित मौत के आंकड़े 55,000 से अधिक हो रहे हैं। विवादास्पद रूप से अपने उत्पत्ति स्थान में चीन में कितने लोग मारे गए हैं, इसका आंकड़ा हमेशा की तरह संदेहास्पद है। चीन जैसे कठोर नियंत्रित और एकदल आधिपत्य वाले देश में इसी नियंत्रण का नतीजा है कि बाहरी दुनिया इसके बताए आंकड़ों पर विश्वास नहीं कर रही और कई लोगों तो आशंका है कि वहां मौत के आंकड़े करोड़ तक में जा सकते हैं। इस आशंका को बल तब और मिल जाता है जब चीन एक बार कोरोना मुक्त घोषित हो जाने के बाद फिर इस संक्रमण का शिकार हो रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने परंपरागत अनुशासन और दुरुस्त सरकारी व्यवस्था की बदौलत इसके संक्रमण को एक हद तक रोकने में सफल रहा है।

भारत और लगभग दक्षिण एशिया में कोरोना का कहर सबसे अंत में शुरू हुआ है। इस बीच दुनिया भर की सूचनाएं हमारे यहां आती रही हैं और इससे बचाव का हमारे पास पर्याप्त समय भी मिला है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में उद्घाटित हुआ। इसके बाद सरकारी और व्यवस्थागत हीला हवाली के साथ 24 मार्च तक चला। आरोप यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 20 फरवरी के कार्यक्रम के लिए और बाद में मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिराकर भाजपा सरकार बनाने की कवायद के लिए तब तक हीला हवाली बनाए रखा। इस दौरान कोराना भी अपना पांव पसारता रहा। अंत में 24 मार्च को बिना सर्वानुमति बनाए या इसकी पूर्व चर्चा किए सरकार की ओर से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। उस समय देश में 657 संक्रमित थे। लॉकडाउन के एक महीना से अधिक बीत जाने के बाद आज संक्रमितों की संख्या 30,000 के पास पहुंच गई है तो मृतक संख्या 1000 के आसपास हैं।

इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ हो गई है कि हमारी सरकारी व्यवस्था बुरी तरह से लचर है और किसी संकट के समय इसके हाथ पावं फूल जाते हैं। हम यहां सरकार को किसी प्रकार की मोहलत देने के पक्ष में इसलिए नहीं हैं कि सरकारों को हमेशा निर्णय लेने और व्यवस्था करने की छूट होती है। सरकारों के पास हर तरह की जानकारी और विशेषज्ञता सर्वोच्च स्तर पर होती है जिसके लिए वह देश की जनता से पूरा खर्च वसूल करती है। सतर्क सरकारों ने इसका उपयोग किया है और मामले को नियंत्रण में भी रखा है। इस मामले में कई सरकारी त्रुटियां उजागर हुई हैं, जिसकी ओर हम लोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहेंगे।

30 जनवरी के बाद से देश में करीब 15 लाख लोग विदेशों से आए। इन सबके साथ जांच और व्यवहार में लापरवाही हुई। सभी को केवल मुहर लगाकर छोड़ दिया गया। इनमें से कई तो संक्रमित होने के बावजूद पारासिटमोल से बुखार कम कर हवाई अड्डों से निकल आए। इससे बड़ी संख्या में कोराना अपने स्वभाव के अनुसार संक्रमण करने में सफल रहा है।

जब सबसे पहला मामला देश में आया और इसके पहले से कोरोना दुनिया में तहलका मचा रहा था तो इसका अनुभव लेकर विदेश से आनेवाले करीब 15 लाख लोगों को क्वारंटाइन किया जा सकता था। देश की सीमाओं को उसी समय सील कर बाहर से आनेवाले को रोक कर संक्रमण को रोका जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम में 1000 के करीब अमेरिकी और विदेशी लोग अहमदाबाद में एकत्र हुए, जिनकी कोई जांच नहीं की गई। इनमें से कई संक्रमित रहे होंगे। यह इस बात से भी साबित होता है कि गुजरात में आज की तारीख तक जो 3000 लोग संक्रमित हैं, उनमें 2000 से अधिक लोग केवल अहमदाबाद में हैं। इसी तरह दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित तबलीगी जमात के कार्यक्रम में दो हजार से अधिक विदेशियों को निर्बाध न केवल आने दिया गया बल्कि जमात द्वारा सूचित किए जाने के बाद भी उनहें वहां से जाने से नहीं रोका गया और न ही वहां बचे लोगों की जांच की व्यवस्था की गई। उल्टे इस घटना का दुरुपयोग कर मामले को सांप्रदायिक रंग देकर देश में उन्माद का वातावरण सत्ताधारी गठबंधन और आरएसएस ने पैदा किया।

अगर यह लापरवाही नहीं होती तो शायद इतने लंबे लॉकडाउन की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। केरल में मामले इसलिए नियंत्रण में आ गए, क्योंकि वहां लॉकडाउन को गंभीरता से लिया गया था। तक़रीबन 1,25,000 मामलों को पर्याप्त वॉलेंटियर की मदद से कड़ाई से निगरानी की गई। केरल में चार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं और अन्य राज्यों से ज़्यादा जोखिम हो सकता था पर प्रभावी क्वारंटाइन से हालात पर नियंत्रण कर लिया गया। देश के बाक़ी हिस्सों में भी ऐसा किया जा सकता था। भारत में तक़रीबन 9 लाख आशा कार्यकर्ता है इन के अलावा आंगनवाड़ी वर्कर, एएनएम बड़ी संख्या में इस काम में लगाए जा सकते थे।

लेकिन असलियत है कि देश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जर्जर हो चुकी है। पीएचसी नाममात्र के हैं। वहां कार्यकर्ता हैं तो दवाएं व जांच की मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं। यह पिछले तीस सालों में नवउदारवादी नीतियों के कारण स्थापित निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने का नतीजा है।

जब 657 मामले थे तब सरकार ने बिना किसी जिम्मेदारी के देशभर में पूर्ण लॉकडाउन घोषित कर दिया और लाखों प्रवासी मजदूरों को रोजगार विहीन कर सड़कों पर भूखे-प्यासे मरने को छोड़ दिया। लेकिन जब प्रतिदिन 1400 से 1700 तक नए मामले आ रहे हैं, ऐसे में लॉकडाउन सरकार ने कुछ सामान को छोड़ कर सभी दुकानों को खोलने की छूट दे दी। कारखानों और व्यावसायिक प्रतिस्थानौं के लिए सशर्त छूट पहले ही दी जा चुकी है। सरकार के इन निर्णयों का क्या अर्थ लगाया जाय? ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं। मसलन,

  • कोरोना वायरस का प्रसार अब शिथिल पर गया है? तो फ़िर रोज 1400 से 1700 तक केस कैसे रिपोर्ट हो रहे हैं?
  • कोरोना को रोकने के लिए सम्पूर्ण लॉकडाउन की आवश्यकता नहीं है? तो फ़िर पिछले एक महीने का लॉकडाउन अज्ञान के कारण लगाया गया?
  • क्या हमने इस एक महीने में कोरोना से लड़ने की तैयारी कर ली? फ़िर अभी तक मात्र प्रति मिलियन (दस लाख में) 420 (झारखण्ड राज्य का यह आँकड़ा सबसे कम मात्र 60 का है) जांच ही क्योँ हुए, जबकी बाकी सभी प्रभावित देशों ने अपनी जनसंख्या के प्रति मिलियन 7000 से 27000 तक जांच किए हैं।
  • यदि हमने पीपीई (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) की व्ववस्था कर ली है तो सरकारी अस्पतालों के ओपीडी (ब्राह्य मरीज विभाग) क्योँ बन्द हैं? मरीजों को अन्य बीमारियों का इलाज क्योँ नहीं मिल पा रहा?

केंद्र एवं राज्य सरकारें (केरल और गोवा को छोडकर) अपनी नाकामी को छुपाने के लिए लॉकडाउन को ढाल बना रही है। लेकिन इस तरह के लंबे लॉकडाउन से कोरोना तो नहीं ही रुकेगा, अर्थव्यवस्था जरूर तबाह हो जाएगी। दिहाड़ी मजदूर और उनका परिवार भूख से बीमार होंगे/ मरेंगे, कोरोना के अलावा दूसरी बीमारियों से पीड़ित इलाज के अभाव में मरणासन्न होंगे/ मरेंगे और बहुत सारी समस्याएं पैदा होंगी। इसके साथ ही लॉकडाउन की पूरी कीमत असंगठित क्षेत्र के 60 फ़ीसदी आबादी से वसूली जा रही है, जिनकी दिहाड़ी चली गई और आगे भी आजीविका कोई साधन नजर नहीं आता। लॉकडाउन के कारण आनेवाली मंदी का खामियाजा भी उन्हें ही सबसे ज्यादा भुगतना पड़ेगा। इनके पास न संसाधन है और ना हीं भविष्य के लिए बचाया गया धन। सरकारी पैकेजों में इन की बुनियादी ज़रूरतों को भी अनदेखा किया गया है।

सांप्रदायिक उन्माद को बढ़ावा देने वाली ख़बरें भी लगातार तेज हो रही हैं। इसके साथ ही विपक्षी दलों के शासन वाले राज्य सरकारों के साथ भेदभाव और विभिन्न नियमों को लागू कर सत्ता और व्यवस्था का केंद्रीकरण किया जा रहा है। इसी मौके का नाजायज फायदा उठाकर पीएम केयर्स फंड गठित कर दिया गया है, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। क्योंकि प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष पहले से ही देश में मौजूद है, जिसमें सरकारी लोगों के अलावा विपक्ष के नेता और कई अन्य प्राधिकारी होते हैं। पीएम केयर्स के द्वारा सरकार ने इसे अपने कब्जे में कर लिया है। इसका न तो कोई ऑडिट होनेवाला है और न ही इसकी जानकारी स्वच्छ व साफ रहेगी। आगे वित्तीय इमरजेंसी की भी आशंका जताई जा रही है।

अब जबकि मामला यहां तक बढ़ गया है और आशंका है कि आगे देश में इस का संक्रमण तेजी से फैलेगा, एक बार फ़िर सरकारों से और प्रबुद्ध जनों से आग्रह है कि दूसरे देशों के अनुभव के आधार पर कोरोना से लडाई में हम निम्न प्राथमिकताओं के आधार पर आगे बढ़ने का माहौल बनाएं-

  1. हॉट स्पॉट इलाकों में हर व्यक्ति की जांच की व्यवस्था की जाए।

2 पीपीई किट की समुचित व्यवस्था कर स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमित होने से बचाया जाय। अस्पतालों और वहां के ओपीडी को चालू किया जाए।

  1. सरकार निजी अस्पतालों को सुविधाएं देना बंद करे तथा सरकारी स्वास्थ्य सेवा ढांचे को मजबूत करे, उस पर ज्यादा खर्च करे। डॉक्टरों की फ़ीस पर अंकुश लगाना चाहिए, उनके दाम सीजीएचएस फीस से ज़्यादा हरगिज़ नहीं होना चाहिए।
  2. जीडीपी का कम से कम 12 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी तौर पर खर्च की योजना बनें। यह योजना विकेंद्रित रूप में यानी केंद्र, राज्य, ज़िला परिषद और ग्राम पंचायत सरकारों के स्तर पर होना चाहिए। इस राशि में हरेक स्तर को 3% का स्वत: आवंटन मासिक किश्तों में हो और ज़िम्मेदारियों का भी साफ़ बँटवारा हो। महामारी पर किए गए खर्च इसके बाहर आपदा नियंत्रण कोष से हो।
    यह 12% अच्छे गरीब देशों के दशकों क़ा अनुभव जन्य आंकड़ा है। उन देशों ने स्वास्थ्य सुधार कर तुरत फ़ायदा लिया और GDP बढ़ाई।)

5.आपात अवस्था में निजी अस्पतालों में सभी का निःशुल्क इलाज होना चाहिए। आयुष शाखाओं को मजबूत किया जाए और उनहें पर्याप्त मदद दी जाए।

  1. वैश्विक महामारी का सामना करने के लिए “राष्ट्रीय / राज्य एकता सरकार” भी अनिवार्य ज़रूरत है. अन्यथा इस आपदा का सामना करने की राजनीतिक ताक़त, सही “राष्ट्रीय मानसिक वातावरण” और निकम्मी – असम्वेदनशील अफ़सर शाही की सक्षमता नहीं बन सकते हैं. सजप इसकी माँग पहले ही कर चुकी है. सभी सरकारें विपक्ष के नेताओं को औपचारिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल कर इसका पहला और छोटा क़दम लेकर केन्द्र और राज्य सरकारें इस ढाँचे को तुरत लागू करें.

(गौरतलब है कि अमेरिका और जापान दोनों देशों में निजी अस्पताल है पर जापान में फ़ीस आदि पर सरकार ने एक सीमा निर्धारित की है और सभी को आय का एक निश्चित हिस्सा स्वास्थ्य निधि में काटा जाता है और जो असमर्थ है उनका बीमा सरकार करवाती है। इस तरह सभी के इलाज की बराबर व्यवस्था की गई है। दूसरी तरफ अमेरिका में बीमा राशि के अनुसार निजी बीमा कंपनियां इलाज का ग़ैर बराबर इंतज़ाम करती है। बीमा राशि कर्मचारी या व्यक्ति देते है। बुज़ुर्गों के लिए पूरा ख़र्च सरकार करती है. विधवाओं, महिला मुखिया वाले परिवार का भी ख़र्च सरकार करती है। इसके बाद भी 12 फ़ीसदी आबादी का इलाज के लिए बीमा नहीं होता है। दुनियां में अमेरिका राष्ट्रीय आय का सबसे ज़्यादा का 18 फ़ीसदी स्वास्थ्य पर ख़र्च करता है फिर भी यह लचर है। अरबों डॉलर कदाचार के मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं। यहां ध्यातव्य है कि पिछले तीस सालों में हम इसी लचर व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं। निजी अस्पतालों पर आधारित आयुष्मान भारत योजना इन ख़ामियों से भरा है।)

  • लॉकडाउन कड़ाई से उन्हीं जगहों पर लागू किया जाय जहाँ कोरोना के संक्रमित पाए गए हों। अनावश्यक जगहों पर लॉकडाउन करने से बीमार अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाएंगे और कोरोना संक्रमितों की पहचान टलती जाएगी। ध्यान रहे 80% कोरोना संक्रमितों में किसी भी प्रकार के लक्षण नहीं होते। सभी जगहों से ज्यादा से ज्यादा लोगों के सैम्पल जांच होने आवश्यक हैं।
  • बुलेट ट्रेन, सेंट्रल विस्टा, एनपीआर जैसे फिजूल्खर्ची वाले प्रोजेक्ट निरस्त कर उन पैसों को स्वास्थ्य सुविधाओं सुधारने के लिए आवंटित किया जाए।
  • वैश्विक महामारी कोरोना, इतिहास का पहला और अपने आप में अनूठा महासंकट है जिसे जनता के हर तबके के साथ मिल कर ही हराया जा सकता है। इसमें लगातार और सही जानकारियां साझा करना, समाज के सभी वर्गों/ समूहों को विश्वास में लेना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना, अन्धविश्वास और अफवाहों को फैलने से रोकना और सम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखना जरूरी है।
  • असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए रेाजगार सृजन के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं में पर्याप्त राशि आवंटित की जाए और इनका पिछला भुगतान भी दिया जाए। निचले स्तर पर येाजनाएं बनने से पलायन रुकेगा। इन मजदूरों के खातों में प्रति व्यक्ति 10,000 रुपये तत्काल दिए जाएं।
  • बेरोजगारी के दिनों तक गरीब तबकों और किसानों को राशन, बिजली, मुफ्त दी जाए और कृषि ऋ्रणों को माफ किया जाए। पीडीएस और पीएचएस सेवाओं का विकेंद्रीकरण हो। नवउदारवादी व्यवस्था को खत्म किया जाए।
  • वैश्विक महामारी का सामना करने के लिए “राष्ट्रीय / राज्य एकता सरकार” अनिवार्य ज़रूरत है। अन्यथा इस आपदा का सामना करने की राजनीतिक ताक़त, राष्ट्रीय मानसिक वातावरण नहीं बन सकते हैं न ही निकम्मी- असंवेदनशील अफ़सरशाही इसे संभाल सकती है। विपक्ष को औपचारिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल कर केंद्र और राज्य सरकारें इस ढांचे को तुरत लागू करे।
  • अतुल
  • राष्ट्रीय सचिव

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इस बुरे वक्त में
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राजेन्द्र राजन की कविता
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दुनिया-भर की दूरबीनों
खुफिया-कैमरों और रडारों
पाताल तक खंगाल डालनेवाली पनडुब्बियों
आसमान को कंपा देनेवाले लड़ाकू विमानों
अंतरिक्ष तक मार कर सकने वाली मिसाइलों
सुरक्षा के और भी तमाम इंतजामों
को मुंह चिढ़ाता हुआ
समंदरों और पहाड़ों को लांघता हुआ
सरहदों और संप्रभुताओं पर हंसता हुआ
आ गया है
सबका नया शत्रु
क्या यह अहसास कराने के लिए
कि हमारी सारी तैयारी किसी और मोर्चे पर है
जबकि सबसे ज्यादा खतरा कहीं और है?
नया शत्रु कितना ताकतवर है
कि देखते-देखते दुख के पहाड़ खड़े कर देता है
तरक्कियों को तबाह कर देता है
पल-भर में जगमग शहरों को वीरान कर देता है
वह इतना ताकतवर है फिर भी कितना छोटा
कि नजर नहीं आता
जैसे कोई अदृश्य बर्बरता हो जो सब जगह टूट पड़ी है
एक विषाणु विचार की तरह सूक्ष्म
फैल जाता है दुनिया के इस कोने से उस कोने तक
क्या कुछ विचार भी विषाणुओं की तरह नहीं होते
जो संक्रमण की तरह फैल जाते हैं
जो अपने शिकार को बीमार बना देते हैं
और उसे खौफ के वाहक में बदल देते हैं
क्या तुम ऐसे विचारों की शिनाख्त कर सकते हो?
यह नई लड़ाई बाकी लड़ाइयों से कितनी अलग है
सारी लड़ाइयां हम भीड़ के बूते लड़ने के आदी हैं
पर इस लड़ाई में भीड़ का कोई काम नहीं
उलटे भीड़ खतरा है
इसलिए भीड़ हरगिज न बनें
बिना भीड़ के भी एकजुटता हो सकती है
थोड़ी दूरी के साथ भी निकटता हो सकती है।
इस बुरे वक्त में
जब हम घरों में बंद हैं
तो यह लाचारी एक अवसर भी है
भीड़ से अलग रहकर कुछ गुनने-बुनने का
यह महसूस करने का कि हम भीड़ नहीं हैं
अपने-आप से यह पूछने का
कि क्यों हमारा जानना-सोचना-समझना
सब भीड़ पर आश्रित है
क्यों हमारे धर्म दर्शन अध्यात्म
संस्कृति सभ्यता आचार विचार
राजनीति जनतंत्र नियम कानून
सब भीड़ से बुरी तरह संक्रमित हैं?
हम भीड़ को खुश देखकर खुश होते हैं
भीड़ को क्रोधित देखकर क्रुद्ध
भीड़ ताली बजाती है तो ताली बजाते हैं
गाली देती है तो गाली देते हैं
भीड़ जिधर चलती है उधर चल देते हैं
जिधर मुड़ती है उधर मुड़ जाते हैं
भीड़ भाग खड़ी होती है तो भाग खड़े होते हैं
जैसे भीड़ से अलग हम कुछ न हों
ऐसे भीड़मय समय में
कुछ दिन थोड़ा निस्संग रहना एक अवसर है
स्वयं को खोजने का स्वयं को जांचने का
और यह सोचने का
कि क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं
जहां मिलना-जुलना हो और मानवीय एकजुटता हो
मगर जो भीड़तंत्र न हो?
यह बुरा वक्त इस बात का भी मौका है
कि हम प्रतिरोध-क्षमता के महत्त्व को पहचानें
बुरे दौर आएंगे
उनसे हम पार भी पाएंगे
बशर्ते प्रतिरोध की ताकत हो
शरीर में भी
मन में भी
समाज में भी।
______________________
@ राजेन्द्र राजन की कविता
Aflatoon Afloo
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