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Archive for the ‘कपड़ा नीति’ Category

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‘खादी का मतलब है देश के सभी लोगों की आर्थिक स्वतंत्रता और समानता का आरंभ। लेकिन कोई चीज कैसी है , यह तो उसको बरतने से जाना जा सकता है – पेड की पहचान उसके फल से होती है। इसलिए मैं जो कुछ कहता हूं उसमें कितनी सचाई है, यह हर एक स्त्री-पुरुष खुद अमल करके जान ले। साथ ही खादी में जो चीजें समाई हुई हैं,उन सबके साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी का एक मतलब यह है कि हम में से हर एक को संपूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी चाहिए और टिकानी चाहिए;यानी हमें इस बात का दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि हम अपने जीवन की सभी जरूरतों को हिन्दुस्तान की बनी चीजों से,और उनमें भी हमारे गांव में रहने वाली आम जनता की मेहनत और अक्ल से बनी चीजों के जरिए पूरा करेंगे।इस बारें में आज कल हमारा जो रवैया है,उसे बिल्कुल बदल डालने की यह बात है।मतलब यह कि आज हिन्दुस्तान के सात लाख गांवों को चूस कर और बरबाद कर के हिंदुस्तान और ग्रेट ब्रिटेन के जो दस-पांच शहर मालामाल हो रहे हैं,उनके बदले हमारे सात लाख गांव स्वावलंबी और स्वयंपूर्ण बने,और अपनी राजी खुशी से हिंदुस्तान के शहरों और बाहर की दुनिया के लिए इस तरह उपयोगी बनें कि दोनों पक्षों को फायदा पहुंचे।‘ महात्मा गांधी ने खादी के अपने बुनियादी दर्शन को इन शब्दों में अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका ‘रचनात्मक कार्यक्रमः उसका रहस्य और स्थान’ में प्रस्तुत किया है। अब हमें गांधीजी के ‘पेड के फल की पहचान’ करनी है। यह रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति के निर्माण हेतु बनाये गये थे।इन कार्यक्रमों का प्रतीक था-चरखा।लोहिया ने कई बरस बाद कहा कि हम रचनात्मक कार्यक्रम का प्रतीक ‘फावडा’ को भी चुन सकते हैं।

दावोस में शुरु हो रहे विश्व आर्थिक सम्मेलन के मौके पर इंग्लैण्ड की एक स्वयंसेवी संस्था ने एक रपट जारी की है जिसके मुताबिक भारत के सबसे दौलतमन्द एक फीसदी लोग देश की कुल दौलत के अट्ठावन फीसदी के मालिक हैं।यह आंकड़ा देश में भीषण आर्थिक विषमता का द्योतक है। यानी गांधीजी ने खादी के जिस कार्यक्रम को 1946 में ‘आर्थिक समानता का आरंभ’ माना था उसकी यात्रा उलटी दिशा में हुई है। इस देश में खेती के बाद सबसे बडा रोजगार हथकरघे से मिलता था ।उन हथकरघों तथा उन पर बैठने वाले बुनकरों की तथा खादी के उत्पादन के लिए आवश्यक ‘हाथ-कते सूत’ और उसे कांतने वाली कत्तिनों की हालत की पड़ताल जरूरी है। इसके साथ जुड़ा है ग्रामोद्योग तथा कुटीर व लघु उद्योग का संकट।

हाथ से कते सूत को हथकरघे पर बुनने से गांधी-विनोबा की खादी बनती है। दुनिया के प्रारंभिक बड़े अर्थशास्त्री मार्शल के छात्र और गांधीजी के सहकर्मी अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा के अनुसार ,’दूध का वास्तविक मूल्य उससे मिलने वाला पोषक तत्व है।‘ इस लिहाज से खादी का वास्तविक मूल्य वह है जो कत्तिनों ,बुनकरों और पहनने वालों को मिलता है।खादी के अर्थशास्त्र में गांधीजी के समय नियम था कि उसकी कीमत में से व्यवस्था पर 6.15 फीसदी से अधिक खर्च नहीं किया जाना चाहिए ताकि कत्तिनों और बुनकरों की आमदनी में कटौती न हो।कीमत निर्धारण की तिकड़मों के अलावा अब ‘व्यवस्था खर्च’ पर 25 फीसदी तक की इजाजत है। मुंबई के हुतात्मा चौक के निकट स्थित खादी भण्डार में ‘जया भादुड़ी कलेक्शन’ और दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित खादी भंडार में विख्यात डिजाइनरों के डिजाइन किए गए वस्त्र जिस कीमत पर बिकते हैं उसका कितना हिस्सा कत्तिनों और बुनकरों के पास पहुंचता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा खादी उत्पादन करने वाली संस्थाओं को फैशन-शो जैसे आयोजनों के लिए खादी कमीशन से अधिक आर्थिक मदद मिलती है किन्तु कताई केन्द्रों में अम्बर चरखों के रख-रखाव के लिए आर्थिक मदद नहीं मिलती। सूती-मिलों के बने सूत को हथकरघे पर बुने कपडे तथा पावरलूम पर बने कपड़ों के अलावा मोटर से चलने वाले अम्बर-चरखों पर काते गये सूत के कपडों को खादी भण्डारों से बेचने के लिए अनिवार्य प्रमाणपत्र खादी कमीशन द्वारा दिया जा रहा है। इन्हें ‘लोक वस्त्र’ कह कर खादी भंडार में बेचा जा रहा है।पूर्वोत्तर भारत के हथकरघों पर मिलों के धागे से बुने गये कपडों को भी खादी में सम्मिलित करने की नीति वर्तमान सरकार ने बनाई है। ताने में मिल का सूत और बाने में हाथ-कता सूत भी खादी भंडारों से अधिकृत रूप से बेचा जा रहा है।

केन्द्र सरकार की वर्तमान खादी-नीति की समीक्षा करते वक्त हमें यह तथ्य भी नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए कि आठ घन्टे खादी का कपड़ा बुनने वाले को 100 रुपये तथा आठ घन्टे सूत कांतने वाली कत्तिन को मात्र 25 रुपए मजदूरी मिलती है।यह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है। आजादी के पहले खादी और ग्रामोद्योग की गतिविधियां चलाने वाली संस्था अखिल भारत चरखा संघ की सालाना रपट से कुछ आंकड़ों पर ध्यान दीजिए,इन्हें गांधीजी ने उद्धृत किया है- ‘सन 1940 में 13,451 से भी अधिक गांवों में फैले हुए 2,75,146 देहातियों को कताई ,पिंजाई,बुनाई वगैरा मिला कर कुल 34,85,609 रुपये बतौर मजदूरी के मिले थे। इनमें 19,645 हरिजन और 57,378 मुसलमान थे ,और कातनेवालों में ज्यादा तादाद औरतों की थी।’ जब आंकडे खादी की बाबत हों तब उसके मापदन्ड ऐसे होते हैं। चरखा संघ किस्म के रोजगार और आमदनी वाले आंकडे खादी कमीशन ने देने बन्द कर दिए हैं। खादी का मौलिक विचार त्याग देने के कारण अब ऐसे आंकड़ों की आवश्यकता नहीं रह गयी है।

विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल को पूरी तरह लाचार बना दिया गया है। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं। 10 दस अप्रैल 2015 को उन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। विकेन्द्रीकृत छोटे तथा कुटीर उद्योगों के उत्पादों के बजाए देश के कुछ खादी भण्डारों में एक ऐसी उभरती हुई दानवाकार कम्पनी के उत्पाद बेचे जा रहे हैं।इस कम्पनी के 97 फीसदी पूंजी के मालिक की मिल्कीयत फोर्ब्स पत्रिका ने ढाई अरब डॉलर आंकी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वास्तविक स्वदेशी विकल्प लघु एवं कुटीर उद्योग होने चाहिए कोई दानवाकार कम्पनी नहीं।

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खादी ग्रामोद्योग आयोग के इस वर्ष के कैलेण्डर और डायरी पर गांधीजी के स्थान पर प्रधान मंत्री का चरखा जैसी आकृति के यंत्र के साथ चित्र प्रकाशित होने के बाद देश में जो बहस चली है उसे मौजूदा सरकार की खादी,हथकरघा और कुटीर उद्योग संबंधी नीति के आलोक में देखने का प्रयास इस लेख में किया गया है।प्रधान मंत्री ने स्वयं उस नीति की बाबत एक नारा दिया है-‘आजादी से पहले थी खादी ‘नेशन’ के लिए,आजादी के बाद हो खादी ‘फैशन’ के लिए’।खादी संस्थाएं विनोबा के सुझाव के अनुरूप खादी कमीशन की जगह ‘खादी मिशन’ बनाएंगी तब वह ‘अ-सरकारी खादी’ ही असरकारी खादी होगी।

(अफलातून)

राष्ट्रीय संगठन सचिव ,समाजवादी जनपरिषद।

816 रुद्र टावर्स,सुन्दरपुर,वाराणसी-221005.

aflatoon@gmail.com

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भारत वर्ष में आर्थिक नियोजन के पिछले पचास वर्षों पर गौर करते हुए लक्ष्मी चन्द जैन बताते हैं कि हमारी प्रमुख समस्या नौकरशाही पर निर्भरता है । गांधी यह भली भांति समझते थे कि जनता की भागीदारी के बिना कोई काम नहीं किया जाना चाहिए तथा जनता की भागीदारी के बिना कोई काम सफल भी नहीं हो सकता – हम यह बुनियादी बात भूल गये ।

लक्ष्मी चन्द जैन , छाया : अफ़लातून

देश के विकास के लिए होने वाले प्रयासों से गत पचास वर्षों से योजनाकार , विश्लेषक तथा बाद में शिक्षक तथा निर्माता के रूप में जुड़े लक्ष्मी चन्द जैन यह शिद्दत से महसूस करते हैं कि गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना वे अपने जीवन-काल में थे । लक्ष्मी चन्द जी के मन में गांधी की प्रासंगिकता की बाबत यह निष्ठा किसी ’गुरु-भक्ति’ के कारण न थी।अदिकतर गांधीजनों की भांति वे गांधी के प्रत्यक्ष सम्पर्क में नहीं रहे ।

उन्होंने गांधी को बहुत ज्यादा पढ़ा था । बंगलुरु स्थित उनका निजी पुस्तकालय विशाल है , जिसमें अम्बेडकर और नेहरू का समग्र -संग्रह भी मौजूद है। सूर्योदय से घण्टों पूर्व वे इन संग्रहों के पठन में समय देते ।

कॉलेज के दिनों में वे एक गांधी-अनुभव से  गुजरे थे। बरसों के अध्ययन के बावजूद उस तजुर्बे की छाप अमिट है । जैन साहब ने भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लिया था और और विभाजन के पहले से ही हजारों की तादाद में चले आ रहे शरणार्थियों के दिल्ली स्थित एक शिविर (किंग्सवे कैम्प) के वे प्रभारी थे । आदतन खुराफ़ातियों का एक गिरोह उनसे नाराज था क्योंकि उनमें से एक को हटा कर लक्ष्मी चन्द जी प्रभारी बनाये गये थे। एक रात उनके बैरक पर पत्थर फेंके गये । उनके साथियों ने सलाह दी कि इसकी पुलिस को इत्तला की जाए ।

राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े एक पत्रकार के बेटे लक्ष्मी चन्द तब तक गांधीवादी नहीं बने थे लेकिन गांधी माहौल में छा चुके थे । लक्ष्मी चन्द याद करते हैं , ’ मुझ पर मानो गांधी सवार हो जाते । मैं शरणार्थियों पर पुलिस वालों को पिलवा दूंगा तो गांधीजी क्या सोचेंगे? ’

जैन जी ने पुलिस बुलाने से इन्कार कर दिया और सोचा कि इस परिस्थिति में गांधी क्या करते ? वे लोगों के बीच गये , उनसे बातचीत करके समाधान निकालने की कोशिश की । उन्होंने शरणार्थियों से यह भी कहा कि यदि वे उनसे असुन्तुष्ट हैं तो वे यह काम छोड़ने के लिए भी तैयार हैं ।

शाम तक स्वयंसेवकों की एक प्रबन्ध समिती गठित हो गई । उस समिती ने खुराफ़ातियों को कैम्प से विदा करने का फैसला भी लिया । ’मैंने समिती के नेताओं से कहा कि यह लोग गुमराह हैं हैं लेकिन हैं अपने ही बीच के । उन्हें निष्कासित न किया जाए।’

खुराफ़ातियों ने जब यह सब सुना तो इसका उन पर असर हुआ । वे लक्ष्मी चन्द जी से मिलने आए और इस बात का अहसान जताया कि उन्होंने निष्कासन रोकाऔर सुधार का मौका दिया । युवा लक्ष्मी चन्द को समझ में आया कि गांधी कारगर हैं ।

घटना के बाद पचास साल गुजर चुके हैं , लक्ष्मी चन्द जी पर उम्र का असर हो चुका लेकिन गांधी के प्रति उनकी निष्ठा अक्षुण्ण है । विडंबना यह है कि आजादी के बाद के इन सालों में लक्ष्मी चन्द जी ने गांधी विचारों को गर्त में जाते भी देखा है ।

उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त से आये ५०,००० पठान शरणार्थियों के पुनर्वास के एक असाधारण कार्यक्रम से स्वयंसेवक-संगठनकर्ता के रूप में वे जुड़े । फ़रीदाबाद में सहकारिता के आधार पर एक कस्बा बसाया गया । किरासन तेल के कनस्तरों के बैलट बक्स बना कर मतदान द्वारा नियोजन और प्रबन्धन समितियों का चुनाव हुआ । खुद प्रधानमन्त्री नेहरू इस परियोजना पर नजर रखे हुए थे। काफ़ी समय तक सहभागी विकास का यह सार्थक नमूना बना रहा । लक्ष्मी चन्द जी इन्डियन कॉपरेटिव यूनियन से जुड़ गये। इस परियोजना के तहत मजदूरों की सहकारी समिति ही औद्योगिक प्रतिष्ठान की मालिक बनी । इस आदर्श कस्बे में गैर-औपनिवेशिक उसूलों के आधार पर तालीम की व्यवस्था हुई तथा जन स्वास्थ्य का ढांचा खड़ा किया गया ।

नौकरशाही द्वारा परियोजना पर काबिज होने के बाद पूरी परियोजना निकम्मी हो गई । इस पतन को एक व्यक्ति रोक सकते थे , स्वयं प्रधानमन्त्री नेहरू । उन्होंने ऐसा नहीं किया । लक्ष्मी चन्द जैन ऐसा होने के पीछे एक सिद्धान्त देखते हैं । विभाजन के वक्त हुए नरसंहार से नेहरू मर्माहत थे उनकी बुद्धि ढह-सी गई थी । इस शक्स को गांधी ने चुनते वक्त सोचा था कि देश को एक बनाये रखने के लिए यह उपयुक्त होगा । परन्तु वे औपनिवेशिक नौकरशाही के ढांचे पर अतिनिर्भर हो गये । संविधान के औपचारिक रूप से लागू होने के पहले ही नौकरशाही तन्त्र पर हावी हो गई । अपने समुदाय के कटु अनुभवों के कारण अम्बेडकर ने यह माना कि गांव ’अज्ञानता के गढ़ ’ हैं । संविधान निर्माताओं ने ग्राम-स्वायत्तता के विचार को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया । भारत के गणराज्य बनने के पहले ही पंचायतीराज का विचार खारिज कर दिया गया ।

बाद में जवाहरलाल नेहरू और इन्दिरा गांधी ने व्यवस्थित तरीके से जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को राजनैतिक दल से अलग-थलग कर दिया । इस प्रकार राजनैतिक कार्यकर्ता जो आजादी के पहले सामाजिक परिवर्तन में एक अहम भूमिका अदा करता था , इस भूमिका से परे हो गया । नया सामाजिक – आर्थिक ढांचा खड़ा करने की जिम्मेदारी सिर्फ बीडीओ जैसे अदना सरकारी नौकर की हो गई । राजनीति ’गद्दी , संरक्षण , कीमत और पक्षपात’ का खेल बन कर रह गई ।

इन अन्तर्विरोधों के बावजूद लक्ष्मी चन्द जैन ने अपने तजुर्बे का लाभ विभिन्न सरकारों को हैण्डलूम,सहकारिता ,योजना आयोग , राजदूत आदि बन कर दिया। उनका कहना था कि,’अपनी नियति हम खुद हासिल करेंगे’- इस मूल भाव के कारण आजादी के बाद अन्तर्विरोध गौण हो गये थे। पटेल-नेहरू,कांग्रेस-अम्बेडकर इनके बीच स्पष्ट अन्तर्विरोध थे फिर भी वे एक साथ काम कर सके । यह मूल-भाव हम भुला चुके हैं । आदर्श एक गाली बन गई है ,राजनैतिक दलों में सैद्धान्तिक आधार पर काम का एजेण्डा नहीं रहा । ’पूरा सत्ताधारी वर्ग अपने घोषणापत्रों से विरत रहने में कोई संकोच नहीं करता और आम जनता में भी इस बात पर कोई घृणा नहीं पैदा होती । ’

जनता की इस उदासी और विरक्ति की कीमत अपार है । ’ यदि हमारा राजनैतिक तबका किसी को प्रेरणा और साहस नहीं दे पा रहा है तो हमारी सभ्यता कैसे बचेगी ?’ ’ इस प्रकार हम कुछ बेशकीमती खो रहे हैं , मानवता के सर्वाधिक हक में कुछ हम खो देंगे । ’

इन परिस्थितियों में आम जनता क्या करे ? गांधी का मार्ग क्या होगा ? लक्ष्मी चन्द जी के पास कोई बना बनाया नुस्खा नहीं है । परन्तु वे जरूर कहते हैं कि जनता कम-से-कम यह भाव तो लाये कि आदर्शवाद गुमा देना हमें मंजूर नहीं है – बिना उसूलों की रजनीति हमें कत्तई कबूल नहीं है । ’

राजनीति और राजनेताओं के बदलने के इंतजार में बैठे नहीं रहना होगा । ’ यदि आपके घर में आग लगी है तो आप गोष्ठी नहीं करेंगे,पहले एक बाल्टी पानी डालेंगे । ’ हम अपने यकीन के अनुसार चलें ,शुरुआत इसीसे करनी होगी ।

जैन बताते हैं कि दूसरों को रौंद कर यह सभ्यता नहीं बनी है । मतभेद दूर करने में इतिहास के इस्तेमाल में हमें सावधानी बरतनी होगी । ’मसलन छुआछूत को लेकर गांधी और अम्बेडकर के बीच के मतभेद को लें । ” हमें देखना होगा कि उस बहस से हमारी आज की समस्या कैसे हल होती है ?’

इन चुनौतियों का हल सावधानीपूर्वक किए गए विश्लेषण से होगा। विश्लेषण जो जमीनी हकीकत और तजुर्बों से पैदा होगा ।

’बुनियादी बातें गांधी का नाम लिए बिना समझी जा सकती हैं । गांधी को बहुत आसानी से गलत समझ लिया जाता है , और मजाक का विषय बना लिया जाता है । जो उन्हें समझने का दावा करते हैं वे भी अपनी महिमा बखानने के लिए उनका नाम रटते हैं ।’

लक्ष्मी चन्दजी जी की सलाह है , ’गांधी को मरा रहने दो , यही सब से अच्छा होगा ।’

( श्री अशोक गोपाल द्वारा लिए गए साक्षात्कार पर आधारित,स्रोत-संस्थाकुल,प्रस्तुतकर्ता एवं अनुवाद- अफ़लातून )

यह भी देखें :  https://samatavadi.wordpress.com/2010/11/16/lc_jain_textile_policy/

 

 

 

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कन्नूर में : साभार ’मातृभूमि’

गाँधी : क्या आप मुझे यह साबित कर सकते हैं कि आपको उन्हें सड़क का इस्तेमाल करने से रोकने का हक है ? मुझे यह बात पक्की तौर पर लगती है कि इन दलित वर्गों के लोगों को सड़क के इस्तेमाल का आप जितना ही हक है ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि : महात्माजी , आप इन तबकों के लिए ’ दलित’ शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं ? क्या आप जानते हैं कि वे क्यों दलित हैं ?
गाँधी : हाँ , बिल्कुल । जिस वजह से जलियाँवाला बाग में डायर ने बेकसूरों का नरसंहार किया था उसी वजह से वे दलित हैं ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि :इसका मतलब इस रिवाज को शुरु करने वाले डायर थे ? क्या आप शंकराचार्य को एक डायर कहेंगे ?
गाँधी : मैं किसी आचार्य को डायर नहीं कह रहा । परन्तु आपके इस क्रियाकलाप को मैं डायरपने की संज्ञा अवश्य देता हूँ तथा सचमुच यदि कोई आचार्य इस रिवाज की शुरुआत के लिए जिम्मेदार हो तब उसकी इस सदोष अज्ञानता को जनरल डायर की राक्षसी अज्ञानता जैसा मानना होगा ।
गाँधीजी ने जाति-विभेद की तुलना किसी ब्रिटिश अफ़सर द्वारा किए गए क्रूरतम हत्या-काण्ड से की यह दलित-शोषण के प्रति उनकी संवेदना को दरशाता है । यह केरल के वाइकोम स्थित महादेव मन्दिर से सट कर गुजरने वाली सड़क से अवर्णों के गुजरने पर लगी रोक को हटाने की बाबत चले सत्याग्रह के दौरान मन्दिर संचालकों के साथ हुई बातचीत का हिस्सा है । यह गौरतलब है कि मन्दिर-प्रवेश का मसला इसके बाद उठा और सलटा । १९२४ से १९३६ तक चले इस सत्याग्रह अभियान के बाद त्रावणकोर राज्य के ४-५ हजार मन्दिर अवर्णों के लिए खुले ।  १२ साल चले इस आन्दोलन तथा इस दौरान कई बार हुई गांधीजी की केरल यात्राओं का विस्तृत विवरण महादेव देसाई की किताब द एपिक ऑफ़ ट्रैवन्कोर में है। श्रीमती सरोजिनी नायडू ने इसे महागाथा अथवा एपिक की उपमा दी ।
विदेशी आधिपत्य और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष साथ-साथ चला । सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति का निर्माण रचनात्मक कार्यों से होता है। प्रत्येक सत्याग्रही दिन में हजार गज सूत कातते थे ।
आन्दोलन का एक अहम उसूल था- ’जिसकी लड़ाई , उसका नेतृत्व’ । गांधीजी द्वारा ’यंग इंडिया’ का सम्पादन शुरु करने के पहले उसका सम्पादन ज्यॉर्ज जोसेफ़ करते थे । ज्यॉर्ज जोसेफ़ साहब मोतीलाल नेहरू के इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार इंडीपेन्डेन्ट के भी सम्पादक थे । इनके बाद महादेव देसाई इंडीपेन्डेन्ट के सम्पादक बने तथा अंग्रेजों द्वारा छापे खाने पर रोक लगाने के बाद उन्होंने हस्तलिखित प्रतियाँ निकालनी शुरु की । दोनों को साल भर की सजा हुई । आगरा जेल में यह दोनों छ: महीने साथ थे।
बहरहाल, ज्यॉर्ज जोसेफ़ वाईकोम सत्याग्रह के शुरुआती नेताओं में एक थे । मन्दिर के निकट से गुजरने वाले मुद्दे पर श्री टी.के. माधवन एवं श्री के.पी. केशव मेनन के जेल जाने के बाद उन्होंने गांधीजी से उपवास करने की इजाजत मांगी । इसी प्रकार सिखों ने सत्याग्रह स्थल पर लंगर चलाने की इच्छा प्रकट की । गांधी यह मानते थे कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म की व्याधि है इसलिए इसके समाधान का नेतृत्व वे ही करेंगे- लिहाजा दोनों इजाजत नहीं मिलीं । ठीक इसी प्रकार प्लाचीमाड़ा में चले दानवाकार बहुदेशीय कम्पनी कोका-कोला विरोधी संघर्ष को दुनिया-भर से समर्थन मिला- फ़्रान्स के गांधी-प्रभावित वैश्वीकरण विरोधी किसान नेता जोशे बोव्हे , कैनेडा के ’ब्लू गोल्ड’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक द्वय मॉड बार्लो तथा टोनी क्लार्क , नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मेधा पाटकर एवं समाजवादी नेता वीरेन्द्रकुमार ने इस आन्दोलन को समर्थन दिया लेकि उसकी रहनुमा उस गाँव की आदिवासी महिला मायलम्मा ही रहीं । इसी कम्पनी ने जब बनारस के मेंहदीगंज आन्दोलन के दौरान कथित राष्ट्रीय समाचार-समूह को करोड़ों रुपये के विज्ञापन दिए तब मातृभूमि के वीरेन्द्रकुमार जैसे सम्पादक ने प्रथम-पेज सम्पादकीय लिख कर कोक-पेप्सी के विज्ञापन न लेने की घोषणा की तथा उसका पालन किया ।
प्लाचीमाड़ा के आन्दोलन को इस बात का गर्व भी होना चाहिए कि जब साहित्य के क्षेत्र में उपभोक्तावाद का प्रवेश बदनाम बहुराष्ट्रीय कम्पनी के पैसे से साहित्य अकादमी के पुरस्कार प्रायोजित कर हो रहा हो तब देश के वरिष्टतम साहित्यकारों में से एम.टी वासुदेवन नायर , एम.एन विजयन और सारा जोसेफ़ जैसे मलयाली साहित्यकारों ने कोका-कोला विरोधी समर समिति को खुला समर्थन दिया ।
यह तथ्य अत्यन्त रोचक व उल्लेखनीय है कि १२ साल चले केरल के सामाजिक सत्याग्रह के ठीक बीचोबीच बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा गांधीजी की यरवडा जेल में ऐतिहासिक बात-चीत हुई । इतिहासकार बाबासाहब को दलितों में स्वाभिमान का जनक तथा गांधीजी को सवर्णों में आत्म-शुद्धि का प्रेरक मानते हैं । इनकी ऐतिहासिक बातचीत की शुरुआत में बाबासाहब दलित वर्गों के शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान पर जोर दे रहे थे तथा गांधी इस समस्या के मूल में धार्मिक वजह मान रहे थे । बातचीत के बाद गांधी ने शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान के लिए ’हरिजन सेवक संघ’ बनाया तथा बाबासाहब ’धर्म-चिकित्सा’ एवं धर्मान्तरण तक गये । केरल के सत्याग्रह में हम आत्म-शुद्धि और आत्मसम्मान दोनों का संयोग देख सकते हैं ।
कन्नूर भी मेरे शहर बनारस की तरह हथकरघे के लिए मशहूर है । खेती के बाद हथकरघा ही सबसे बड़ा रोजगार मुहैया कराता था । अगूँठा-काट वस्त्र नीति ने यह परिदृश्य पूरी तरह बदल दिया है । इस नीति का तिहरा प्रभाव पड़ा है : गरीब तबके पोलियस्टर पहनने के लिए मजबूर हो गये हैम चूँकि यह सरकारी नीति और सब्सिडी के कारण अब सते हो गये हैं  , सरकार की इस नीति के कारण एक अज्ञात परिवार देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बन गया है तथा हथकरघा बुनकर अस्तित्व रक्षा के लिए सम्घर्ष कर रहे हैं ।
’मातृभूमि’ पत्र की साल भर चलने वाली यह मुहिम बुनकरों की रक्षा के लिए उपायों पर भी विचार करेगी , यह मैं आशा करता हूँ ।
स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों को मेरे हाथों सम्मानित कराने से एक नैतिक बोझ मेरे सिर पर आ पड़ा है। आजादी की लड़ाई के मूल्य : रचना-संघर्ष साथ-साथ ,जिसकी लड़ाई उसका नेतृत्व जैसे मूल्यों के साथ लड़ाई जारी रखने के लिए उनका आशीर्वाद मेरे जैसों को मिले यह प्रार्थना है ।
अफ़लातून , सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी , समाजवादी जनपरिषद .
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[ ‘ खादी की राखी ’ पर मेरी एक पोस्ट पर नीला हार्डीकर ने एक गंभीर टिप्पणी डाक से भेजी थी । इसे मैंने अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित किया था । इसके साथ ही नीलाजी ने ’सिंथेटिक वस्त्रों’ पर एक सुन्दर नोट भी भेजा था। इसे आज प्रकाशित किया जा रहा है । कपड़ा नीति के बारे में इन तीन पोस्टों से जो चर्चा शुरु हुई है उनकी बाबत यदि कोई पाठक अपने विचार भेजना चाहे तो उनका स्वागत है ।

नीला हार्डीकर अवकाश प्राप्त शिक्षिका हैं और मध्य प्रदेश के मुरेना में महिलाओं और दलितों के साथ काम करती हैं । नर्मदा बचाओ आन्दोलन और मध्य प्रदेश में चलने वाले आदिवासियों , स्त्रियों , विस्थापितों के जन आन्दोलनों के साथ वे सक्रीयता से जुड़ी हैं । उनके प्रति आभार के साथ यह नोट प्रकाशित करते हुए मुझे खुशी हो रही है । ]

सिंथेटिक वस्त्र

गर्मी के के दिनों में मध्यप्रदेश में ४० डिग्री से ५० डिग्री तापमान आम बात है । ऐसे में , बस अड्डों पर, हाट – बाजारों में धूलधक्कड़-भरी दोपहरी में गरीब और मध्यम वर्गीय महिलायें सिंथेटिक साड़ियों में बैठी हमेशा ही मिलती हैं । इनमें वृद्धाएं , गर्भवती और बीमार महिलाएं भी होती हैं । पहले कभी ऐसे ताप में सूती वस्त्र शरीर को कुछ आराम पहुंचाते थे । अब , उस आराम की गरीब जन कल्पना भी नहीं करतीं , शायद कभी अनुभव भी नहीं किया है , क्योंकि , दो दशक से गांव , कस्बों की दुकानों से और गरीब घरों से सूती साड़ियां और अन्य वस्त्र गायब ही हो गये हैं । नवजात शिशुओं को भी सिंथेटिक वस्त्र पहनाए जाते हैं ।

रसोई घरों में मसालों की कपड़छान या भीगी दालों को बांधने के लिए सूती कपड़ा अब मुश्किल से मिलता है । चूल्हे से बर्तन उतारने के लिए सूती कपड़ा अब खरीदना पड़ता है ; घरों में चादरें भी सिंथेटिक होती हैं ।

कोक - पेप्सी विरोधी सभा , मुर्दहा

कोक - पेप्सी विरोधी सभा , मुर्दहा

सिंथेटिक का खतरा : सिंथेटिक वस्त्रों के उपयोग में सावधानियां लोगों को न उद्योग ने सिखाई , न स्कूलों ने । एक लड़की (जबलपुर जिले की घटना है ) स्टोव जला रही थी कि उसके दुपट्टे ने आग पकड़ ली । कुर्ता भी सिंथेटिक , सो आग जल्दी भड़की । इतना ही नहीं , जैसे ही लड़की की मां को पता चला , उसने आग बुझाने की नीयत से गुदड़ी निकाली और उसे लड़की के ऊपर डाला । किंतु हाय! वह गुदड़ी सिंथेटिक साड़ियों की बनी थी !! किस्सा ख़तम ।

महाराष्ट्र की महिलायें नौ गज की धोती पहनती हैं , जो शरीर से खूब चिपकी रहती है । २५ डिग्री से अधिक ताप में इस धोती का स्पर्श सतत अनचाहा होता है ।

ब्लाउज , कुर्ते , सलवार , शर्ट , पुरुषो और बच्चों के अन्य कपड़े – गरीबों के लिए सिर्फ सिंथेटिक ही उपलब्ध हैं ।

ये कपड़े सस्ते होने का लाभ किसको मिलता है ? क्या निम्न आय वर्ग इन्हें खरीदकर खुश है ? पता करना चाहिए । ज्ञात तथ्य यह है कि गांव , कस्बों , छोटे शहरों के बाजार में सूती वस्त्र मिलता ही नहीं । १९८० के दशक के मध्य तक कॉपरेटिव सोसायटियों में सूती धोतियां रियायती दर पर मिलती थीं । इनका वितरण बन्द कर दिया गया । यानी गरीबों और ग्रामीणों को मजबूर किया गया सिंथेटिक वस्त्र खरीदने और पहनने के लिए ।

सिंथेटिक वस्त्रों का उत्पादन सस्ता रखने में सरकारी हस्तक्षेप की कितनी भूमिका है ? इसके अलावा उसकी पर्यावरणीय कीमत क्या है ? इन वस्त्रों के उपयोग के अन्त में कचरा किस चीज को कितना प्रदूषित करता है ? इस सब का आंकलन लगाना चाहिए ।

सिंथेटिक धोती के लाभ एक महिला ने गिनाए : ” धोती चमकदार होती है और टिकती ज्यादा है । “

– नीला हार्डीकर

(सम्पर्क – hneelaATyahooDOTcom)

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