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Archive for the ‘तानाशाही dictatorship’ Category

[नवम्बर 1956 में,विश्व-बौद्ध-सम्मेलन काठमंडू (नेपाल) में दिया गया बाबासाहेब का व्याख्यान]

मित्रों!आज जिस युग में हम विचर रहे हैं,उसमें संसार के बुद्धिवादी विचारकों को मानव जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाने के लिए केवल दो ही मार्ग ही दिखाई पड़ते हैंः पहला मार्ग साम्यवाद का है और दूसरा बौद्ध-धर्म का।शिक्षित युवकों पर साम्यवाद (Communism) का प्रभाव अधिक दिखाई देता है,इसका प्रमुख कारण यह है कि साम्यवाद का प्रचार सुसंगठित रूप से हो रहा है,और इसके प्रचारक बुद्धिवादी दलीलें पेश करते हैं।बौद्ध-धर्म भी बुद्धिवादी है,समता-प्रधान है।और परिणाम की ओर ध्यान दिया जाए,तो साम्यवाद से अधिक कल्याणकारी है। इसी तत्त्व पर अपने विचार आपके आगे रखना चाहता हूं।क्योंकि मैं समझता हूं,यह बात शिक्षित युवकों के आगे रखना अति आवश्यक है।

मेरे विचार में साम्यवाद की इस चुनौती को स्वीकार करते हुए बौद्ध-भिक्षुओं को चाहिए कि वे युगानुरूप अपनी विचार-पद्धति एवं प्रचार-कार्य में परिवर्तन करें और भगवान बुद्ध के विचार विशुद्ध रूप में शिक्षित युवकों के सामने रखें।बौद्ध धर्म के उत्थान और उन्नति के लिए इसीकी अत्यन्त आवश्यकता है।यदि इस काम को बौद्ध भिक्षु उचित प्रकार से न कर सकेंगे,तो बौद्ध धर्म की बहुत हानि होगी।इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।सारे संसार में व्याप्त कम्युनिज्म को भगवान बुद्ध की विचार प्रणाली में केवल यही उत्तर है कि मानव-जीवन को सुखी बनाने का साम्यवाद एक समीपी किन्तु टेढ़ा मार्ग है। बौद्ध-धर्म यद्यपि अपेक्षाकृत एक लम्बा रास्ता है किन्तु इस समीपी और टेढ़े रास्ते पर चलने की अपेक्षा यह एक सुन्दर,हितकर,समुचित और सम्यक राज-मार्ग है।

मार्क्सवादी साम्यवाद के मार्ग में संकट है,विपत्तियां हैं,इसीलिए उस मार्ग से हमें जहां पहुंचना है,वहां पहुंच पायेंगे या नहीं,इसमें संदेह है।

मार्क्सवादी साम्यवादी की मुख्य बात यह है कि संसार में आर्थिक शोषण से उत्पन्न विषमता के कारण ही बहुसंख्यक लोग दीन और दास बनकर कष्ट उठा रहे हैं।इस आर्थिक विषमता के शोषण और लूट को रोकने का एक ही रास्ता है,जिसके द्वारा व्यक्तिगत सीमित अधिकार को नष्ट किया जाए और उसकी जगह संपत्ति का राष्ट्रीयकरण या सामाजीकरण करके राष्ट्रीय अधिकार को अधिष्ठित किया जाय,जिससे श्रमिकों के राज्य की स्थापना हो,शोषण बंद हो और श्रमजीवी-वर्ग सुखी हो।

बौद्ध-धर्म का मुख्य तत्त्व भी मार्क्सवाद के अनुसार ही है। इसके अनुसार संसार में दुख है और उस दुख को दूर करना आवश्यक है।भगवान बुद्ध ने भी जिस दुख का निरूपण किया है,वह सांसारिक दुख ही है।बुद्ध-वचनों में इसके अनेक प्रमाण पाए जाते हैं। बौद्ध-धर्म अन्य धर्मों की भांति आत्मा और परमात्मा के संबंध पर आधारित नहीं है,बौद्ध-धर्म जीवन की अनुभूति पर अधिष्ठित है।दुख का पारलौकि अर्थ लगाकर पुनर्जन्म से उसका संबंध जोड़ना बुद्ध-मत के विरुद्ध है।संसार में दरिद्रता में जन्म लेकर प्लनेवाले दुखों का नाश होना अनिवार्य आवश्यक है।यह मान लेने के बाद देखना होगा कि इस दुख को हटाने के भगवान ने कौन-कौन से मार्ग बताये हैं। भगवान बुद्ध ने आदर्श बौद्ध समाज के तत्त्व संघ के अन्तर्निहित किए हैं।संघ में व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है।भिक्षु को केवल आठ चीजें अपने पास रखने का आदेश है।इन आठों में सबसे पहला वस्त्र है।इसमें भी परिग्रह की भावना का निर्माण न होने पाये,इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है।

संपत्ति पर व्यक्ति -विशेष का अधिकार सारे अनर्थों का कारण है यह बात भगवान बुद्ध ने कार्ल मार्क्स से चौबीस सौ वर्ष पहले जान ली थी।बुद्ध और मार्क्स में जो अन्तर है,वह केवल उस दुख के दूरीकरण के लिए बताए हुए उपायों में है।मार्क्स के मतानुसार संपत्ति पर से व्यक्ति का अधिकार हटाने का एक-मात्र साधन बलप्रयोग है,इसके विपरीत भगवान बुद्ध के विचारानुसार करुणा,मैत्री,समता,प्रेम,तृष्णा का त्याग,विराग आदि प्रमुख साधन हैं।बलपूर्वक सत्ता ग्रहण करके साम्यवादी अधिनानायकी स्थापित करके व्यक्तिगत अधिकार नष्ट करने में मार्क्सवादी प्रणाली थोड़े दिनों तक अच्छी मालूम होती है,इसके बाद कटु हो जाती है।क्योंकि बलपूर्वक अधिष्ठित अधिनायकी तथा उसके द्वारा आरंभ होने वाले हत्याकांड की परिसमाप्ति कब होगी,इसकी निश्चयता नहीं है।और यदि अधिनायकी कहीं असफल हो गयी ,तो फिर अपरिमित रक्तपात के सिवा और कोई मार्ग नहीं रह जाता। हिंसा के द्वारा स्थापित समता समाज में दृढता नहीं हो पाती,क्योंकि बल का स्थान धीरे-धीरे किस अन्य तत्त्व द्वारा ग्रहण किया जायेगा,इसका कोई उत्तर मार्क्स की मत-प्रणाली में नहीं है। हिंसा-प्रधान साम्यवादी शासन-प्रणाली में -शासन-चक्र अपने आप ही धीरे-धीरे नष्टप्राय होता जायेगा।यह बात भ्रममूलक नहीं है।

इसके विपरीत बुद्ध-प्रदर्शित अहिंसा,करुणा,मैत्री,समता द्वारा दुखों और क्लेशों की निवृत्ति का मार्ग श्रेयस्कर है,क्योंकि वह चित्त की विशुद्धि और हृदय-परिवर्तन के पुनीत तत्त्व पर आधारित है।मनुष्य के जीवन को सुखी बनाने के लिए नैतिक रूप से उसके मन को सुसंस्कृत करना अनिवार्य आवश्यक है,इस बात पर भगवान बुद्ध ने जितना अधिक ध्यान दिया उतना शायद संसार के किसी भी धर्म-प्रवर्तक या विचार-प्रणाली ने नहीं दिया।मनुष्य में विवेक हमेशा जागृत और सक्रिय बनाये रखने के लिए सदाचरण या शील को श्रद्धा का अधिष्ठान प्रदान करना भगवान बुद्ध का हेतु या लक्ष्य है। शील या सदाचरण को श्रद्धा का रूप प्राप्त होने के बाद दुख कम करने के लिए अर्थात शोषण और आर्थिक लूट रोकने के लिए बलप्रयोग की आवश्यकता नहीं रहती। ”State shall wither away.”(राज्य स्वयं सूख जाएगा) लेनिन का यह मधुर स्वप्न यदि साकार होगा,तो वह बलप्रयोग द्वारा स्थापित की हुई अधिनायकी द्वारा नहीं,वरन बुद्ध-प्रदर्शित शील-सदाचार और विशुद्धि-तत्त्व से ही होगा।

अदिनायकी का भगवान बुद्ध ने विरोध किया है।अजातशत्रु के एक मंत्री ने एक बार उनसे प्रश्न किया-“भगवन! बज्जियों पर हम किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकेंगे?”भगवान बुद्ध ने उत्तर में कहा-“बज्जी लोग जब तक गणतंत्र-शासन का संचालन बहुमत से करते रहेंगे,तब तक वे अजेय हैं।जिस दिन बज्जी गणतंत्र शासन-प्रणाली को त्याग देंगे, उसी दिन वे पराजित हो जायेंगे।”भगवान बुद्ध का यह नीतिप्रधान लोकतंत्र का मार्ग मार्क्सवादी अधिनायक-तंत्र की पएक्षा अधिक हितकर एवं चिरस्थायी है।मुझे आशा है साम्यवाद का यह कल्याणकारी प्राचीन मार्ग यदि आज भी हम युवक समाज के सामने समुचित रूप से रख सकें,तो यह उन्हें आकर्षित किये बिना न रहेगा।

भगवान ने पने भिक्षुओं को “बहुजन-हित और बहुजन-सुख” के लिए आदेश किया था कि “संसार की हर दिशा में जाकर मेरे इस आदि में कल्याण करनेवाले,मध्य में कल्याण करनेवाले और अंत में कल्याण करनेवाले धर्म का प्रचार करो और विशुद्ध ब्रह्मचर्य का प्रकाश करो।”किंतु आज हम देखते हैं,भिक्षुगण मनमुख हो अपने-अपने विहार में रहकर आत्मोन्नति का मार्ग ढूंढ़ रहे हैं।यह कदापित उचित और हितकर नहीं है। बौद्ध धर्म एकांत में आचरण किया जानेवाला कोई रहस्यमय आचार नहीं है,यह एक प्रबल सामाजिक संघ-शक्ति है।आज भी विनाश की भयानक चोटी पर खड़े संसार का मार्ग दिखाने का सामर्थ्य इस शक्ति में है। भगवान बुद्ध के आदेश को स्मरण रखते हुए उनके पवित्र कल्याणकारी धर्म का चारों ओर प्रचार करने की चेष्टा भिक्षुओं को करना चाहिए।

नोट(अनुवादक का)-कम्युनिस्ट और कम्युनिज्म के संबंध में बाबासाहेब ने अपने लाहौर वाले भाषण “जातिभेद का विनाश” में तथा नागपुर के भाषण” हम बौद्ध क्यों बनें?” में भी अच्छा प्रकाश डाला है।ये दोनों व्याख्यान अलग-अलग छपे हैं।

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ज्यादातर पेट्रोल पंप केन्द्र सरकार के मन्त्रालय की PSUs द्वारा संचालित हैं।
आज कल इन पंपो पर ‘कर-चोरी के खिलाफ लडाई में मेरा पैसा सुरक्षित है’ अभियान चलाया जा रहा है।इस दोगले प्रचार अभियान से आपको गुस्सा नहीं आया?
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित है कि इसे मैं भी मनमाफिक नहीं निकाल सकता।
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि मुझे स्थायी तौर पर असुरक्षित कर दिया।
-मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि उसकी इज्जत हमारी ही नजरों में गिरा दी गई और उसका मूल्य अन्य मुद्राओं की तुलना में गिरता जा रहा है।
– अब तक कर-चोरी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? CAG ने जहां अम्बानी-अडाणी की अरबों रुपयों का कर न वसूलने पर आपत्ति की है,वह भी नहीं नहीं वसूलेंगे।
– देश का पैसा चुरा कर बाहर जमा करने वालों में से जिनके नाम पनामा वाली सूची में आए उन्हें कोई सजा क्यों नहीं दी गई ? HSBC द्वारा उजागर विदेश में देश का धन जमा करने वालों को क्या सजा दी?इसमें भी इनके यार थे।
– सितंबर में खत्म हुई आय की ‘स्व-घोषणा’ में भी टैक्स चोरों को इज्जत बक्शी गयी है अथवा नहीं?
– सुप्रीम कोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खस्ताहाल की मुख्य वजह अम्बानी,अडाणी और वेदान्त वाले अनिल अग्रवाल जैसों की बकायेदारी को बताया गया। इस पर नोटबंदी के पहले अरुण जेटली कह चुके हैं कि सरकारी बैंकों में पैसा पंप किया जाएगा। अब जनता का पैसा हचाहच पंप हो ही रहा है। Non performing assets बढेंगे तो इन धन पशुओं को रियायत मिल जाएगी। यह आपके यारों द्वारा कर-डकैती नहीं है?
– जिन गांवों में बैंक नहीं हैं वहां पहुंच कर पैसे क्यों नहीं बदले जा रहे? क्या आपको पता है कि समाज के सबसे कमजोर तबकों के साथ उनकी गाढी कमाई की ठगी से 500 के बदले 250 तक दिए गए हैं?

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आपातकाल के दौरान खबर के प्रकाशन के पहले और बाद दोनों सेन्सरशिप लागू थी। रामनाथ गोयन्का के एक्सप्रेस समूह,गुजराती के सर्वोदय आन्दोलन से जुड़े ‘भूमिपुत्र’,राजमोहन गांधी के ‘हिम्मत’ ,नारायण देसाई द्वारा संपादित ‘बुनियादी यकीन’आदि द्वारा दिखाई गई हिम्मत के अलावा जगह-जगह से ‘रणभेरी’,’चिंगारी’ जैसी स्टेन्सिल पर हस्तलिखित और साइक्लोस्टाईल्ड बुलेटिन ने इसका प्रतिवाद किया था। विलायत से स्वराज नामक बुलेटिन आती थी और बीबीसी हिन्दी भी खबरों के लिए ज्यादा सुनी जाती थी। उस दौर में संवैधानिक प्रावधान द्वारा समस्त मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए थे। ‘रणभेरी’ का संपादन-प्रकाशन इंकलाबी किस्म के समाजवादी युवा करते थे । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा इसके वितरण से इस टोली को आपत्ति नहीं थी। 1977 में आई जनता पार्टी की सरकार ने आंतरिक संकट की वजह से मौलिक अधिकार को निलंबित रखने के संवैधानिक प्रावधान को संवैधानिक संशोधन द्वारा दुरूह बना दिया। संसद के अलावा दो तिहाई राज्यों में दो-तिहाई बहुमत होने पर ही आन्तरिक संकट की वजह से आपातकाल लागू किया जा सकता है। जनता पार्टी लोकतंत्र बनाम तानाशाही के मुद्दे पर चुनी गई थी।आन्तरिक आपातकाल को दुरूह बनाने का संवैधानिक संशोधन इस सरकार का सर्वाधिक जरूरी काम था।उस सरकार को सिर्फ इस कदम के लिए भी इतिहास में याद किया जाएगा।

बहरहाल,1977 की जनता सरकार में सूचना प्रसारण मंत्रालय संघ से जुडे लालकृष्ण अडवाणी के जिम्मे था। उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन में जम कर ‘अपने’ लोगों को नौकरी दी। समय-समय पर वे अपनी जिम्मेदारी खूब निभाते हैं। कहा जाता है मंडल सिफारिशों को लगू करने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस राष्ट्र के नाम प्रसारण में अपना इस्तीफा दे रहे थे उसे एक विशिष्ट शत्रु-कोण से खींच कर प्रसारित किया जा रहा था। निजी उपग्रह चैनल तब नहीं थे।

नियमगिरी आन्दोलन की महिला आन्दोलनकारी

नियमगिरी आन्दोलन की महिला आन्दोलनकारी

मौजूदा दौर 1992 में शुरु हुई वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बाद का दौर है। जीवन के हर क्षेत्र को नकारात्मक दिशा में ले जाने वाली प्रतिक्रांति के रूप में वैश्वीकरण को समझा जा सकता है। लाजमी तौर पर सूचना-प्रसारण का क्षेत्र भी इस प्रतिक्रांति से अछूता नहीं रहा। निजी उपग्रह चैनल भी नन्हे-मुन्ने ही सही सत्ता-केन्द्र बन गए हैं। इनसे भी सवाल पूछना होगा।नरेन्द्र मोदी की सरकार ने NDTV-इंडिया को छांट कर ,सजा देने की नियत से एक असंवैधानिक आदेश दे दिया है। सभी लोकतांत्रिक नागरिकों, समूहों और दलों को इसका तीव्रतम प्रतिवाद करना चाहिए । नागरिकों के हाथ में अब एक नया औजार इंटरनेट भी है जिस पर रोक लगाना कठिन है। आपातकाल के बाद के दौर में भी बिहार प्रेस विधेयक जैसे प्रावधानों से जब अभिव्यक्ति को बाधित करने की चेष्टा हुई थी तब उसके राष्ट्रव्यापी प्रतिकार ने उसे विफल कर दिया था।

अभिव्यक्ति के बाधित होने में नागरिक का निष्पक्ष सूचना पाने का अधिकार भी बाधित हो जाता है। मौजूदा दौर में NDTV इंडिया के लिए जारी फरमान के जरिए हर नागरिक का निष्पक्ष सूचना पाने का अधिकार बाधित हुआ है। निष्पक्ष सूचनाएं अन्य वजहों से भी बाधित होती आई हैं। उन वजहों के खिलाफ इस दौर में प्रतिकार बहुत कमजोर है। इन आन्तरिक वजहों पर भी इस मौके पर गौर करना हमें जरूरी लगता है।

हमारे देश में अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है जिनकी वजह से भारतीय अर्थशास्त्र के पहले पाठ में पढाया जाता था-‘भारत एक समृद्ध देश है जिसमें गरीब बसते हैं’।संसाधनों पर हक उस दौर की राजनीति तय करती है। यह दौर उन संसाधनों को अडाणी-अम्बानी जैसे देशी और अनिल अग्रवाल और मित्तल जैसे विदेशी पूंजीपतियों को सौंपने का दौर है। मुख्यमंत्री और केंद्र में बैठे मंत्री वंदनवार सजा कर इनका स्वागत करते हैं। संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिए कंपनियां घिनौनी करतूतें अपनाती हैं। स्थानीय समूहों द्वारा इस प्रकार के दोहन का प्रतिकार किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर स्थानीय आबादी के बीच जनमत संग्रह कराया गया कि वेदांत कंपनी द्वारा नियामगिरी पर्वत से बॉक्साइट खोदा जाए अथवा नहीं। एक भी वोट इंग्लैण्ड स्टॉक एक्सचेंज में पंजीकृत वेदांत कंपनी के पक्ष में नहीं पड़ा। इसी प्रकार कोका कोला-पेप्सी कोला जैसी कंपनियों द्वारा भूगर्भ जल के दोहन से इन संयंत्रों के आस पास जल स्तर बहुत नीचे चला गया है। इंसान और पर्यावरण के विनाश द्वारा मुनाफ़ा कमाने वाली वेदान्त,कोक-पेप्सी जैसी कंपनियां  निजी मीडिया प्रतिष्ठानों को भारी पैसा दे कर कार्यक्रम प्रायोजित करती हैं। इस परिस्थिति में मीडिया समूह सत्य से परे होने के लिए बाध्य हो जाते हैं।
NDTV और उसके नव उदारवादी संस्थापक प्रणोय रॉय ने अपने चैनल के साथ वेदांत और कोका कोला कंपनी से गठबंधन किए हैं।लाजमी तौर पर इन कंपनियों की करतूतों पर पर्दा डालने में NDTV के यह कार्यक्रम सहायक बन जाते हैं। वेदान्त के साथ NDTV महिलाओं पर केन्द्रित कार्यक्रम चला रहा था तथा कोका कोला के साथ स्कूलों के बारे में कार्यक्रम चला रहा था। इस प्रकार के गठबंधनों से दर्शक देश बचाने के महत्वपूर्ण आन्दोलनों की खबरों से वंचित हो जाते हैं तथा ये घिनौनी कम्पनियां अपनी करतूतों पर परदा डालने में सफल हो जाती हैं।

वेदान्त का अनिल अग्रवाल मोदी और प्रणोय रॉय के बीच पंचायत कराने की स्थिति में है अथवा नहीं,पता नहीं।

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पार्क में बतियाने वाले युवक-युवतियों के जोड़ों को परेशान करने वाले समूह की मानसिकता भूल गये। उस समूह के गुरु-तुल्य जब इसी मानसिकता से सक्रिय होंगे तो उन्हें उन्हीं भोंडे तरीके से जाकर उन तरुणों को मारने-पीटने-गरियाने के जरूरत नहीं होगी। उनका तरीका बजरंगी चेलों से कुछ परिष्कृत तो होगा ही ।

हम उस समूह के हैं जिनके गुरु ने कहा था कि बलात्कार और वादाखिलाफी के अलावा औरत-मर्द के सब रिश्ते जायज होते हैं। इन दोनों (बलात्कार और वादाखिलाफी) के अलावा लोहिया ने एक बात और जोड़ दी थी जिसकी चर्चा अक्सर लोग छोड़ देते हैं , वह था झूठ !

६७ में गैर-कांग्रेसवाद का प्रतिपादन करते वक्त लोहिया को लोगों ने कम्युनिस्टों की गद्दारी और जनसंघ की साम्प्रदायिकता की याद दिलाई थी। लोहिया ने उत्तर दिया था,’कम्युनिस्टों की एक पहाड़ गद्दारी कांग्रेस की एक बूंद गद्दारी से और जनसंघियों की एक पहाड़ साम्प्रदायिकता कांग्रेस की एक बूंद साम्प्रदायिकता से कम खतरनाक है क्योंकि कांग्रेस सत्ता में है। यह उदाहरण दे रहा हूं क्योंकि गुजरात में मोदी सत्ता में है और पूरे देश की सत्ता का दावेदार बताया जा रहा है।

गुजरात में सत्ता में रहते हुए मोदी की झांकू प्रवृत्ति और लगभग निश्चित असुरक्षा के भाव की गंभीरता पर देश को पूरी सामाजिक जिम्मेदारी से विचार करना होगा। गुजरात के दंगों के सिलसिलें में ‘काली दाढ़ी’ औए ‘सफेद दाढ़ी’की शिनाख्त को नकारने की थोड़ी-बहुत गुंजाइश रहती थी। परंतु मौजूदा घटना के सन्दर्भ में भाजपा कार्यालय में एक व्यक्ति की प्रेस वार्ता के बाद से ‘साहेब’ की शिनाख्त में गुंजाइश की बात नहीं रह गई। प्राइवेसी या निजता से जुड़ा कोई मौलिक अधिकार हमारे देश में नहीं है। न्यायमूर्ति तारकुण्डे से मैंने इस बाबत एक बार सवाल किया था। उन्होंने बताया था कि अनाधिकार प्रवेश या ट्रेसपासिंग के खिलाफ जो कानून है उसे खींच-तान तक वहां तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। तारकुण्डे साहब से यह बात हुई थी जब जैल सिंह द्वारा टेलिग्राफ एक्ट में संशोधन के प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की बात जनता के बीच चर्चा में थी। बहरहाल , कानून तो बनता ही है सार्वजनिक इच्छा के अनुरूप। समाज नहीं चाहता कि बिना कपड़े घूमा जाए इसलिए उसे रोकने के लिए कानून बनाता है। इसलिए एक सत्ताधीश द्वारा निजता हनन के मामले को सुरक्षा प्रदानकरने का मामला यदि कबूल लिया जाए तो उसका एक तात्कालिक परिणाम सर्वप्रथम उस सत्ताधीश को ही भुगतने के लिए तैयार होना चाहिए। मोदी या उनके लोग उन्हें प्रधान मंत्री के बराबर सुरक्षा न देने की आलोचना करते रहे हैं। उन्हें फिलहाल जो ज़ेड प्लस सुरक्षा मिल हुई है उसके अतिरिक्त सुरक्षा जिसकी उन्होंने मांग की है ,उन्हें अमित शाह की खूफिया शैली में प्रदान कर देनी चाहिए। महिला की सुरक्षा की पिता की मांग के बदले राज्य सरकार उसके साथ सिपाही,गनर,दरोगा लगा सकती थी।अस्पताल से होटल तक की निगरानी की बात भी हास्यास्पद है क्योंकि उक्त महिला के होटल में कौन आया,मॉल में कौन साथ था आदि अमित शाह द्वारा दरियाफ्त किए गये तमाम सवाल बताते हैं कि गुजरात सरकार खुफियागिरी करा रही थी ,सुरक्षा नहीं दे रही थी।

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”पहले वे आए यहूदियों के लिए और मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं यहू‍दी

नहीं था/ फिर वे आए कम्यूनिस्टों के लिए और मैं कुछ नहीं बोला,

क्योंकि मैं कम्यूनिस्‍ट नही था/ फिर वे आए मजदूरों के लिए और मैं कुछ

नहीं बोला क्योंकि मैं मजदूर नही था/ फिर वे आए मेरे लिए, और कोई नहीं

बचा था, जो मेरे लिए बोलता..।” पास्टएर निमोलर, हिटलर काल का एक जर्मन पादरी )

बिहार में पिछले कुछ वर्षों से जो कुछ हो रहा है, वह भयावह है।  विरोध

में जाने वाली हर आवाज को राजग सरकार क्रूरता से कुचलती जा रही है। आपसी

राग-द्वेष में डूबे और जाति -बिरादरी में बंटे बिहार के बुद्धिजीवियों के

सामने तानाशाही के इस नंगे नाच को देखते हुए चुप रहने के अलावा शायद कोई

चारा भी नहीं बचा है।

आज (16 सितंबर, 2011) को बिहार विधान परिषद ने अपने दो कर्मचारियों को

फेसबुक पर सरकार के खिलाफ लिखने के कारण निलंबित कर दिया। ये दो कर्मचारी

हैं कवि मुसाफिर बैठा और युवा आलोचक अरूण नारायण।

मुसाफिर बैठा को दिया गया निलंबन पत्र इस प्रकार है – ” श्री मुसाफिर

बैठा, सहायक, बिहार विधान परिषद सचिवालय को परिषद के अधिकारियों के

विरूद्ध असंवैधानिक भाषा का प्रयोग करने तथा  – ‘दीपक तले अंधेरा, यह

लोकोक्ति जो बहुत से व्यक्तियों, संस्थाओं और सत्ता प्रतिष्ठानों पर

लागू होती है।  बिहार विधान परिषद, जिसकी मैं नौकरी करता हूं, वहां

विधानों की धज्जियां उडायी जाती हैं’- इस तरह की टिप्पणी करने के कारण

तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।”

अरूण नारायण को दिये गये निलंबल पत्र के पहले पैराग्राफ में उनके द्वारा

कथित रूप से परिषद के पूर्व सभापति अरूण कुमार के नाम आए चेक की हेराफेरी करने का

आरोप लगाया गया है, जबकि इसी पत्र के दूसरे पैराग्राफ में कहा गया है कि

परिषद में सहायक पद पर कार्यरत अरूण कुमार   (अरूण नारायण) को

”प्रेमकुमार मणि की सदस्यरता समाप्त  करने के संबंध में सरकार एवं

सभापति के विरूद्ध असंवैधानिक टिप्पाणी देने के कारण तत्कासल प्रभाव से

निलंबित किया जाता है’‘। इन दोनों पत्रों को बिहार विधान परिषद के सभापति

व भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठि नेता ताराकांत झा ”के आदेश से” जारी

किया गया है।

हिंदी फेसबुक की दुनिया में भी  कवि मुसाफिर बैठा अपनी बेबाक टिप्पिणियों

के लिए जाने जाते हैं। अरूण नारायण ने अभी लगभग एक महीने पहले ही फेसबुक

पर एकांउट बनाया था। उपरोक्तण जिन टिप्पीणियों का जिक्र इन दोनों को

निलंबित करते हुए किया गया है, वे फेसबुक पर ही की गयीं थीं।

फेस बुक पर टिप्‍पणी करने के कारण सरकारी  कर्मचारी को निलंबित करने का

संभवत: यह कम से कम किसी हिंदी प्रदेश का पहला उदाहरण है और इसके पीछे के

उद्देश्य गहरे हैं।

हिंदी साहित्य की दुनिया के लिए मुसाफिर और

अरूण के नाम अपरिचित नहीं हैं। मुसाफिर बैठा का एक कविता संग्रह ‘बीमार

मानस का गेह’ पिछले दिनों ही प्रकाशित हुआ है। मुसाफिर ने ‘हिंदी की

दलित कहानी’ पर पीएचडी की है। अरूण नारायण  लगातार पत्र पत्रिकाओं में

लिखते रहते हैं, इसके अलावा बिहार की पत्रकारिता पर उनका एक महत्वरपूर्ण

शोध कार्य भी है।

मुसाफिर और अरूण को निलंबित करने के तीन-चार महीने पहले  बिहार विधान परिषद ने

उर्दू के कहानीकार सैयद जावेद हसन को नौकरी से निकाल दिया था। विधान

परिषद में उर्दू रिपोर्टर के पद पर कार्यरत रहे जावेद का एक कहानी संग्रह

(दोआतशा) तथा एक उपन्या्स प्रकाशित है। वे ‘ये पल’ नाम से एक छोटी से

पत्रिका भी निकालते रहे हैं।

आखिर बिहार सरकार की इन कार्रवाइयों का उद्देश्य क्या है ?

बिहार का मुख्यधारा का मीडिया अनेक निहित कारणों से राजग सरकार के चारण की भूमिका

निभा रहा है। बिहार सरकार के विरोध में प्रिंट मीडिया में कोई खबर

प्रकाशित नहीं होती, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विरले कोई खबर चल जाती

है, तो उनका मुंह विज्ञापन की थैली देकर या फिर विज्ञापन बंद करने की

धमकी देकर बंद कर दिया जाता है। लेकिन समाचार के वैकल्पिक माध्य्मों ने

नीतीश सरकार की नाक में दम कर रखा है। कुछ छोटी पत्रिकाएं, पुस्तिकाएं

आदि के माध्यम से  सरकार की सच्चाटईयां सामने आ जा रही हैं। पिछले कुछ

समय से फेस बुक की भी इसमें बडी भूमिका हो गयी है। वे समाचार, जो

मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में से बडी मेहनत और काफी खर्च करके सुनियोजित तरीके से गायब कर दिये जा रहे हैं, उनका

जिक्र, उनका विश्लेषण फेसबुक पर मौजूद लोग कर रहे हैं। नीतीश सरकार के

खिलाफ लिखने वाले अधिकांश लोग फेसबुक पर हिंदी में काम कर रहे हैं,

जिनमें हिंदी के युवा लेखक प्रमुख हैं।

वस्तुत: इन दो लेखक कर्मचारियों का निलंबन, पत्रकारों को खरीद लेने के बाद राज्य सरकार द्वारा अब लेखकों पर काबू करने के लिए की गयी कार्रवाई है। बडी पूंजी के सहारे चलने वाले अखबारों और चैनलों पर लगाम लगाना तो सरकार के

लिए बहुत मुश्किल नहीं था लेकिन अपनी मर्जी के मालिक, बिंदास लेखकों पर नकेल कसना संभव

नहीं हो रहा था। वह भी तब, जब मुसाफिर और अरूण जैसे लेखक सामाजिक परिवर्तन की

लडाई में अपने योगादान के प्रति प्रतिबद्ध हों।

ऐसे ही एक और लेखक प्रेमकुमार मणि भी काफी समय से राजग सरकार के लिए

परेशानी का सबब बने हुए थे। मणि नीतीश कुमार के मित्र हैं और जदयू के

संस्थापक सदस्यों  में से हैं। उन्हें पार्टी ने साहित्य के (राज्‍यपाल के)  कोटे से

बिहार विधान परिषद का सदस्य  बनाया था। लेकिन उन्होंने समान स्कूल

शिक्षा प्रणाली आयोग, भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों को माने जाने की मांग

की तथा इस वर्ष फरवरी में नीतीश सरकार द्वारा गठित सवर्ण आयोग का विरोध

किया। वे राज्य में बढ रहे जातीय उत्पीडन, महिलाओं पर बढ रही हिंसा तथा

बढती असमानता के विरोध में लगातार बोल रहे थे। नीतीश कुमार ने मणि को पहले पार्टी से 6 साल के लिए निलंबित करवाया।  उसके कुछ दिन बाद उनकेघर रात में कुछ अज्ञात लोगों ने घुस कर उनकी जान लेने की कोशिश की। उस

समय भी बिहार के अखबारों ने इस खबर को बुरी तरह दबाया।  (देखें, फारवर्ड

प्रेस, जून, 2011 में प्रकाशित समाचार ‘ प्रेमकुमार मणि, एमएलसी पर हमला

: बस एक कॉलम की खबर’ ) गत 14 सितंबर को नीतीश कुमार के ईशारे पर इन्हीं

ताराकांत झा ने एक अधिसूचना जारी कर प्रेमकुमार मणि की बिहार विधान परिषद

की सदस्यता समाप्त  कर दी है। मणि पर अपने दल की नीतियों (सवर्ण आयोग के

गठन) का विरोध करने का आरोप है।

राजनीतिक रूप से देखें तो नीतीश के ने‍तृत्व वाली राजग सरकार एक डरी हुई

सरकार है। नीतीश कुमार की न कोई अपनी विचारधारा है,  न कोई अपना बडा वोट

बैंक ही है। भारत में चुनाव जातियों के आधार पर लडे जाते हैं। बिहार में

नीतीश कुमार की स्वेजातीय आबादी 2 फीसदी से भी कम है। कैडर आधारित भाजपा

के बूते उन्हें पिछले दो विधान सभा चुनावों में बडी लगने वाली जीत हासलि

हुई है। इस जीत का एक पहलू यह भी है कि वर्ष 2010 के विधान सभा चुनाव में

लालू प्रसाद के राष्ट्रीलय जनता को  20 फीसदी वोट मिले जबकि नीतीश कुमार

के जदयू को 22 फीसदी। यानी दोनों के वोटो के प्रतिशत में महज 2 फीसदी का

अंतर था।

नीतीश कुमार पिछले छह सालों से अतिपिछडों और अगडों का एक अजीब सा पंचमेल

बनाते हुए सवर्ण तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं। इसके बावजूद

मीडिया द्वारा गढी गयी कद्दावर राजनेता की उनकी छवि हवाई ही है। वे एक

ऐसे राजनेता हैं, जिनका कोई वास्तविक जनाधार नहीं है। यही जमीनी स्थिति,

एक सनकी तानाशाह के रूप में उन्हें  काम करने के लिए मजबूर करती है। इसके

अलावा, कुछ मामलों में वे ‘अपनी आदत से भी लाचार’ हैं। दिनकर ने कहा है –

‘क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो/ उसे क्या जो विषहीन, दंतहीन,

विनित सरल हो’।

कमजोर और भयभीत ही अक्‍सर आक्रमक होता है। इसी के दूसरे पक्ष के

रूप में हम प्रचंड जनाधार वाले लालू प्रसाद के कार्यकाल को देख सकते हैं।

लालू प्रसाद के दल में कई बार विरोध के स्वर फूटे लेकिन उन्होंने कभी

भी किसी को अपनी ओर से पार्टी से बाहर नहीं किया। मुख्यमंत्री की

कुर्सी पर नजर गडाने वाले  रंजन यादव तक को उन्होंने सिर्फ पार्टी के पद

से ही हटाया था। दरअसल, लालू प्रसाद अपने जनाधार (12 फीसदी यादव और 13

फीसदी मुसलमान) के प्रति आश्वपस्त‍ रहते थे।

इसके विपरीत भयभीत नीतीश कुमार बिहार में लोकतंत्र की भावना के लिए

खतरनाक साबित हो रहे हैं। वे अपना विरोध करने वाले का ही नहीं, विरोधी का

साथ देने वाले के खिलाफ जाने में भी सरकारी मशीनरी का हरसंभव दुरूपयोग कर

रहे हैं। लोकतंत्र को उन्होंने नौकरशाही में बदल दिया है, जिसमें अब

राजशाही और तानाशाही के भी स्‍पष्ट‍ लक्षण  दिखने लगे हैं।

बिहार को देखते हुए  क्या यह प्रश्न अप्रासंगिक होगा कि

भारतीय जनता पार्टी के ब्राह्मण (वादी) नेता, वकील और परिषद के वर्तमान

सभापति ताराकांत झा ने जिन तीन लोगों को परिषद से बाहर किया है वे किन

सामाजिक समुदायों से आते हैं ? सैयद जावेद हसन (अशराफ मुसलमान), मुसाफिर

बैठा (धोबी, अनुसूचित जाति ) और अरूण नारायण (यादव, अन्य  पिछडा वर्ग )। मुसलमान, दलित और पिछडा।

क्या  यह संयोग मात्र है ? क्या यह भी संयोग  है कि बिहार विधान

परिषद में 1995 में प्रो. जाबिर हुसेन के सभापति बनने से पहले तक पिछडे

वर्गों के लिए नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था तथा अनुसचित जातियों के

लिए प्रोन्निति में आरक्षण की व्यवस्था लागू नहीं थी ? जाबिर हुसेन के

सभापतित्व् काल में पहली बार अल्प‍संख्यक, पिछडे और दलित समुदाय के

युवाओं की परिषद सचिवालय में नियुक्तियां हुईं। इससे पहले यह सचिवालय

नियुक्तियों के मामले में उंची जाति के रसूख वाले लोगों के बेटे-बेटियों,

रिश्तेतदारों की चारागाह रहा था। क्या आप इसे भी संयोग मान लेंगे कि

जाबिर हुसेन के सभापति पद से हटने के बाद जब नीतीश कुमार के इशारे पर

कांग्रेस के अरूण कुमार 2006 में कार्यकारी सभापति बनाए गये तो उन्होंने

जाबिर हुसेन द्वारा नियुक्ते किये गये 78 लोगों को बर्खास्त कर दिया और

इनमें से 60 से अधिक लोग वंचित तबकों से आते थे ? (देखें, फारवर्ड प्रेस,

अगस्त , 2011 में प्रकाशित रिपोर्ट -‘बिहार विधान परिषद सचिवालय में

नौकरयिों की सवर्ण लूट’)  क्या हम इसे भी संयोग ही मान लें कि सैयद

जावेद हसन, मुसाफिर बैठा और अरूण नारायण की भी नियुक्तियां इन्हीं जाबिर

हुसेन के द्वारा की गयीं थीं ?

जाहिर है, बिहार में जो कुछ हो रहा है, उसके संकेत बहुत बुरे हैं। मैं

बिहार के पत्रकारों,  लेखक मित्रों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आह्वान

करना चाहूंगा कि जाति और समुदाय के दायरे तोड कर एक बार विचार करें कि हम

कहां जा रहे हैं ? और इस नियति से बचने का रास्ता क्या  है ?

– प्रमोद रंजन

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