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Archive for the ‘नई राजनीति’ Category

2014 में पहली बार अपने बूते केन्द्र में सरकार बना लेने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ उत्तर प्रदेश जैसे बडे राज्य में बड़ी चुनावी सफलता हासिल की है वहीं दूसरी ओर राजनीति को पूंजीपतियों के हाथों में बांध देने में सत्ता के शीर्ष में बैठे इस दल के लोगों ने अहम भूमिका अदा की है।विडंबना यह है कि शोषक वर्ग के स्वार्थ की पूर्ति के लिए नाना प्रकार की नीतियां बनाने और कदम उठाने के बावजूद केन्द्र में बैठा यह सत्ताधारी दल राष्ट्रवादी होने का दावा करता है। समाजवादी जन परिषद के लिए दो स्वार्थ सर्वोपरि है-शोषित वर्ग का स्वार्थ तथा देश का स्वार्थ। दल की स्पष्ट मान्यता है कि पूंजीपति वर्ग के स्वार्थ को तवज्जो देने  से देश के स्वार्थ का नुकसान ही होता है।

याराना पूंजीवाद और खेती

केन्द्र सरकार की विदेश नीति तक शासक वर्ग से जुड़े पूंजीपतियों के हक में है। प्रधान मंत्री मंगोलिया,बांग्लादेश जैसे हमसे कमजोर देशों में जाते हैं और उन्हें करोड़ों डॉलर का कर्ज देने की घोषणा करते हैं।यह ऋण उन्हीं देशों को दिया जाता है जहां प्रधान मंत्री के करीबी पूंजीपतियों द्वारा बड़ी परियोजना चलाने के लिए समझौता होता है।

देश के बड़े पूंजीपतियों का सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 11 लाख करोड़ रुपये का बकाया है।इसे चुकता करवाने के लिए सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर द्वारा कड़े कदम उठाने की मांग की गयी तो उन्हें सेवा विस्तार नहीं दिया गया।

खाद्यान्न एवं खाद्य तेल के मामले में स्वावलंबन हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जानी चाहिए जिसका श्रेय इस देश के किसानों को जाता है।इस स्वावलंबन को पलटने की दिशा में भी सत्ता के करीबी पूंजीपतियों का प्रत्यक्ष हाथ दिखाई दे रहा है।भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयात करने वाला देश हो गया है।गौतम अडाणी की खाद्य तेल की ‘फॉर्चून’ मार्के वाली कम्पनी द्वारा अन्य तेल कम्पनियों को पाम ऑयल मिला हुआ खाद्य तेल बेचने का तरीका बताना आयात बढ़ने का मुख्य कारण रहा है। देश के तमाम बड़े उद्योगपतियों की कम्पनियों द्वारा अफ्रीकी देशों में हजारों एकड़ के फार्मों में खेती कराई जा रही है तथा भारत सरकार इनके उत्पादों के आयात के लिए उन देशों से समझौते कर रही है। अरहर की दाल की कीमत जिन दिनों आसमान छू रही थी तब गौतम अडाणी के गुजरात स्थित निजी बन्दरगाह में अफ्रीका से आयातित सस्ती दाल(40 से 50 रुपए/किलो) इकट्ठा करके रखा गया था तथा कीमत 100 रुपये प्रति किलो होने के बाद उसे निकाला गया था। विदेशों से गेहूं आयात करने पर लगने वाले 25 प्रतिशत आयात शुल्क को पहले 10 फीसदी किया गया और फिर उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। वित्त मंत्री द्वारा यह घोषित कर दिया गया है कि निजी कम्पनियां यदि ठेके पर खेती करना चाहेंगी तो उन्हें इजाजत दे दी जाएगी।

खेती में बढ़ रही लागत के कारण किसानों की आत्महत्या की दर 26 प्रतिशत बढ़ गयी है। उत्तर प्रदेश की नवनिर्वाचित सरकार ने लघु तथा सीमान्त किसानों के कर्जे माफ कर दिए हैं जो कुछ राहत देने वाला कदम है।इसके साथ ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के शीर्षस्थ अधिकारियों ने किसानों की कर्ज माफी के खिलाफ बयान देने शुरु कर दिए हैं। इन बयानों से स्पष्ट होता है कि सरकार देश भर के किसानों के कर्ज माफ करने की मांग पर सकारात्मक नजरिए से विचार नहीं करना चाहती है।

कृषि उपज के समर्थन मूल्य के सन्दर्भ मे स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग को सरकार नजरअन्दाज कर रही है।इस समिति द्वारा लागत खर्च में 50 फीसदी जोड़ कर समर्थन मूल्य निर्धारित करने की बात कही गयी थी। यह नहीं भूलना चाहिए 2014 के आम चुनाव के अभियान में नरेन्द्र मोदी ने भी इस समिति की सिफारिशों को लागू करने की बात चुनावी सभाओं में कही थी। सजप सहित देश के किसान आन्दोलन कृषि उपज के मूल्य निर्धारण की बाबत इस समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग करते हैं।

बेरोजगारीः

समाजवादी जन परिषद के नेता और अर्थशास्त्री साथी सुनील ने ग्रामीण इलाके के रोजगार के सन्दर्भ कहा था,’आज भारत के गाँव उद्योगविहीन हो गए हैं और वहाँ खेती-पशुपालन के अलावा कोई धंधा नहीं रह गया है । गाँव और खेती एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं । दूसरी ओर गांव और उद्योग परस्पर विरोधी हो गये हैं । जहाँ गाँव है , वहाँ उद्योग नहीं है और जहाँ उद्योग है , वहाँ गाँव नहीं है । यह स्थिति अच्छी नहीं है और यह भी औपनिवेशिक काल की एक विरासत है ।‘ खेती के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और जंगल पर आश्रित रोजगार के अवसरों को समाप्त करने का खुला खेल शुरू हो चुका है। विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल 2015 को पूरी तरह लाचार बना दिया गया। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। यह नीति विश्व व्यापार संगठन की कई शर्तों के आड़े आती थी इसलिए 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। विदेशी मुद्रा के फूलते गुब्बारे और भुगतान संतुलन के ‘सुधार’ के साथ यह शर्त जुड़ी थी कि उत्पादन में मात्रात्मक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकेंगे। विश्व व्यापार संगठन की इस शर्त के कारण 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं।

जिन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म किया गया था उन पर गौर कीजिए- अचार, पावरोटी, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, लकड़ी का फर्नीचर, नोटबुक या अभ्यास पुस्तिका और रजिस्टर, मोमबत्ती, अगरबत्ती, आतिशबाजी, स्टेनलेस स्टील के बरतन, अल्युमिनियम के घरेलू बरतन, कांच की चूड़ियां, लोहे की अलमारी, लोहे की कुर्सियां, लोहे के टेबल, लोहे के सभी तरह के फर्नीचर, रोलिंग शटर, ताले, कपड़े धोने का साबुन और दियासलाई। बड़ी पूंजी, आक्रामक विज्ञापन, मानव-श्रम की जगह मशीन को तरजीह देने वाली तकनीक से लैस देशी-विदेशी खिलाड़ी अधिक रोजगार देने वाले इन छोटे उद्योगों को लील जाएंगे।

इस प्रकार के छोटे और कुटीर उद्योगों के उत्पादों की खपत को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय एवं राज्य-स्तरीय सरकारी क्रय संस्थाओं द्वारा लघु और कुटीर उद्योगों से ही सामान खरीदने की नीति को भी निष्प्रभावी बनाने की दिशा में काम हो रहा है। इससे ठीक विपरीत स्थिति पर गौर करें। बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देने के लिए नियम-कानून बदल देने का भी इतिहास रहा है। सरकार द्वारा नियम कानून बदल कर अपने प्रिय औद्योगिक घराने को बहुत बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाने के प्रमुख उदाहरणों में अंबानियों के उदय को प्रायोजित करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सिर्फ उन्हें ही सिंथेटिक धागे के उत्पादन के लिए कच्चे माल के आयात की इजाजत देने के साथ-साथ हथकरघा द्वारा तैयार की जाने वाली कपड़ों की किस्मों की आरक्षित सूची को निष्प्रभावी बना देना है। गौरतलब है कि कपड़ा और उद्योग नीति के इन नीतिगत फैसलों के द्वारा अंबानी को देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बनाने के पहले तक सूती कपड़े कृत्रिम धागों से बने कपड़ों से सस्ते थे। कृत्रिम धागों से पावरलूम पर बने कपड़ों की इजाजत के साथ-साथ लाखों हथकरघा बुनकरों की आजीविका छिन गई है। पहले पावरलूम पर सिर्फ ‘कोरे कपड़े’ और हथकरघे पर बिनाई की विविध डिजाइनों के कपड़ों को बनाने की इजाजत थी।

यह कानून 1985 में बन गया था। तब बाईस किस्म के कपड़े इस कानून के तहत हथकरघे के लिए संरक्षित किए गए गए थे। पावलूम लॉबी ने कानून को 1993 तक मुकदमेबाजी में फंसाए रखा और 1993 में जब यह प्रभावी हुआ तब संरक्षित किस्मों की संख्या ग्यारह रह गई। एक प्रामाणिक अध्ययन के अनुसार हथकरघे पर बने होने के दावे वाले सत्तर फीसद कपड़े दरअसल मिलों या पावरलूम पर बने होते हैं।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीस लाख लोगों को काम मिला है जबकि हथकरघा से दो करोड़ लोग जुड़े हैं। अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी यात्री फ्रैन्कोए पिरार्ड डी लावाल ने अपने यात्रा विवरण में बताया है कि अफ्रीका के दक्षिणी छोर से चीन तक लोग भारतीय हथकरघे पर बने कपड़ों से अपना शरीर ढंकते थे। उनके अनुसार भारत के पूर्वी तट के सिर्फ एक बंदरगाह से सालाना पचास लाख गज कपड़े का निर्यात होता था।

पारंपरिक हुनर,कला और हस्तशिल्प से जुड़े इन तमाम रोजगारों को समाप्त करने की नीति को लागू करने के साथ-साथ जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए केन्द्र सरकार प्रचारित कर रही है कि वह हुनर प्रशिक्षण के लिए योजना चला रही है।

सरकारी नौकरियों की स्थिति के बारे में सरकार ने संसद में लिखित सूचना दी है। केंद्रीय कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में लिखित रूप से कहा है कि 2013 की तुलना में 2015 में केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 फीसदी की कमी आई है। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की भर्ती में 90 फीसदी की कमी आई है। 2013 में केंद्र सरकार में 1, 54,841 भर्तियां हुई थीं जो 2014 में कम होकर 1, 26, 261 हो गईं। मगर 2015 में भर्तियों की संख्या में अचानक बहुत कमी हो जाती है। सवा लाख से कम होकर करीब सोलह हज़ार हो गयी। बिना किसी नीतिगत फैसले के इतनी कमी नहीं आ सकती। 2015 में केंद्र सरकार में 15,877 लोग की सीधी नौकरियों पर रखे गए। 74 मंत्रालयों और विभागों ने सरकार को बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की 2013 में 92,928 भर्तियां हुई थीं। 2014 में 72,077 भर्तियां हुईं। मगर 2015 में घटकर 8,436 रह गईं। इस प्रकार नब्बे फीसदी गिरावट आई है।
2015-18 के बीच रेलवे में रोजगार नहीं बढ़ेगा। रेलवे के मैनपावर की संख्या 13, 31, 433  ही रहेगी। जबकि 1 जनवरी 2014 को यह संख्या पंद्रह लाख थी। करीब तीन लाख नौकरियां कम कर दी गई हैं। 2006 से 2014 के बीच 90,629 हज़ार भर्तियां हुईं। अमरीका में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। भारत में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 138 है और यह भी कम होती जा रही है।
आल इंडिया काउंसिल फार टेक्निकल एजुकेशन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार साठ प्रतिशत इंजीनियर नौकरी पर रखे जाने के काबिल नहीं हैं। भारत में हर साल आठ लाख इंजीनियर पैदा होते हैं। इनकी फीस में तो कोई कमी नहीं हुई। ये काबिल नहीं हैं तो इंजीनियरिंग कालेजों का दोष हैं। उन्होंने इतना खराब इंजीनियर लाखों रुपये लेकर कैसे बनाया । उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं है। अब बाज़ार में नौकरियां नहीं हैं तो पहले से ही इंजीनियरों को नाकाबिल कहना शुरू कर दो ताकि दोष बाज़ार पर न आए। अगर साठ प्रतिशत इंजीनियर नालायक पैदा हो रहे हैं तो ये जहां से पैदा हो रहे हैं उन संस्थानों को बंद कर देना चाहिए।

काला धन और भ्रष्टाचार

देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों को नाजायज लाभ पहुंचाने वाली केन्द्र सरकार काले धन को समाप्त करने का दावा करती है तो उससे बढ़ कर हास्यास्पद और क्या हो सकता है? सच्चाई तो यह है कि HSBC बैंक की स्विट्जरलैन्ड स्थित जेनेवा शाखा में कई भारतीयों के गुप्त खाते होने की खबर को आये काफी समय बीत चुका है।दुनिया भर के कई हथियार तस्कर ,नशीली दवाओं के अवैध धन्धे करने वाले तथा भ्रष्ट नेताओं के नाम उजागर हुए हैं।इस सूची में भारत के बडे उद्योगपति,सिनेमा स्टार आदि के नाम थे। इस सूची के सार्वजनिक होने के बाद सरकार को इन खाताधारकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी,इसके बजाए सरकार ने इन खाताधारकों से नजदीकी संबंध होने के कारण ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कि बल्कि उस राशि को कबूल लेने की छूट की घोषणा की है।

पनामा नामक देश में दुनिया भर के कई भ्रष्ट नेताओं,अवैध व्यापार करने वाले तथा तस्करों के बैंक खातों की सूची सार्वजनिक हुई है।इस खबर के उजागर होने के बाद रूस,पाकिस्तान जैसे कई देशों में भारी हलचल मच गई।भारत में देश के सबसे उद्योगपति तथा सीने-सितारों आदि के नाम उजागर होने के बावजूद सरकार ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की है।

काले धन के समाप्ति के दावे के साथ सरकार ने सबसे बड़ा कदम ‘नोटबन्दी’ का उठाया। अर्थव्यवस्था में चलन से बाहर किए गए नोटों का मूल्य 86 फीसदी था। इस कदम से देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति पैदा हो गयी।नोटों को बदलने के लिए बैंकों की लाइन में खड़े 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई। इस सबके बावजूद जिन लोगों के पास इन बड़े नोटों में अघोषित पैसा था वे उसे बदलने या उसे खर्च करने में सफल हो गए।अघोषित धन के इन मालिकों ने अपने कर्मचारियों और मजदूरों को इन नोटों में कई महीनों का एडवान्स में वेतन और बोनस देकर,सोना तथा डॉलर में बदल कर तथा पेट्रोल पंपो के माध्यम से अघोषित पैसे से बिना नुकसान उठाए मुक्ति पा ली। विपक्षी दल इस मुद्दे की गहराई में नहीं गए तथा जनता के बीच इसके खिलाफ कारगर कदम उठाने से बचते रहे।इसके फलस्वरूप साधारण गरीब लोगों में यह भ्रम फैलाने सरकार सफल हो गयी कि इस कदम से आम जनता को खास कष्ट नहीं होगा और पैसे वालों लोगों का नुकसान होगा। वास्तविकता यह है कि सरकार ने आज तक कितने नोट वापस नहीं लौटे इसका अधिकृत आंकड़ा तक घोषित नहीं किया है। सजप यह मांग करती है कि सरकार इससे संबंधित तथ्य सार्वजनिक करे तथा छोटे मूल्य के नोट उपलब्ध कराए।

कांग्रेस सरकार के समय चले लोकपाल की मांग के आन्दोलन का विपक्षी दल के रूप में भाजपा को लाभ मिला था इसके बावजूद लोकपाल के लिए कोई कारगर कानून नहीं लाया गया है। भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों द्वारा बिना स्रोत बताये राजनैतिक दलों को चन्दे के रूप में दिया जाता है।इस वर्ष के वित्त विधेयक के साथ ऐसे चन्दे की कोई सीमा न रखने तथा स्रोत घोषित न करने को वैधानिकता प्रदान कर दी गई है। यह ध्यान देने लायक बात है कि वर्तमान में चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च की सीमा निर्धारित है किन्तु दलों द्वारा किए गए चुनाव खर्च की कोई सीमा नहीं है इसलिए इसका हिसाब भी गंभीरता से नहीं दिया जाता है। चुनाव के दौरान विपक्षी दलों के एक-एक नेता को खरीदने में मौजूदा शासक दल करोड़ों रुपए खर्च करता है इसलिए अघोषित आय के स्रोतों को बाधित करने में उसकी कोई रुचि नहीं है बल्कि इन बाधाओं को दूर करने के उसके द्वारा कानून बना लिए गए हैं।

चुनाव-सुधार

चुनाव में अघोषित पैसे हासिल करने और उसके बल पर चुनाव लड़ने के सन्दर्भ में ऊपर के अनुच्छेद जिक्र किया गया है। निर्वाचन प्रक्रिया के सन्दर्भ में समाजवादी जनपरिषद आनुपातिक प्रतिनिधित्व को अपनाने की पक्षधर है। इस सन्दर्भ में दल का कहना हैः

भारत के राज्य / शासन के हरेक स्तर (यथा केन्द्र, प्रदेश, जिला परिषद, प्रखंड समिति और पंचायत) पर चुनाव की पद्धति FPTP (“सबसे अधिक मत पाने वाला ही विजेता”) है। इसके विरुद्ध 80 देशों में चालू और भविष्य की लोकप्रिय पद्धति “आनुपातिक प्रतिनिधित्व है।

FPTP पद्धति भारत के शासन और लोकतन्त्र में कई कमजोरियों और विकृतियों को चला बढ़ा रही है| वह नीतियों के बनने- बदलने में बहुत खतरनाक हालात पैदा कर रही है. इसकें कुछ तथ्य हैं-

  1. मोदी सरकार केवल 30% जनता की पसन्द से ही लोकसभा में बहुमत लेकर आई है. करीब 60% जनता, जो उसके विरुद्ध है; वह 5 साल के लिए संसद मे बहुत कम प्रतिनिधित्व वाली और अशक्त हो चुकी है. छोटी संख्या वाली विकसित हो रही विचारधाराओं और संगठनों का तो इस पद्धति के रहते संसद, विधानसभा वगैरह में पहुँच पाना और मात्र अपनी पहचान बना कर रख पाना असंभव है।
  2. देश की प्रत्येक राज्य सरकार में भी कोई एक पार्टी इसी तरह बहुमत से बहुत कम वोट लाकर भी शासक बन गई है। वे भी कई बार केन्द्र सरकार जैसे गलत और अलोकतान्त्रिक निर्णय और काम करती है। ये सारी अल्पमत वाली सरकारें दूरगामी आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों और बड़े सामाजिक-धार्मिक प्रभाव वाले कार्यक्रम बनाती चलाती है। वे अतिवादी व्यवहार को बढ़ावा देती है जो बहुधा देश-समाज को गहरा नुकसान पहुँचाने वाली होती है।

इस मुद्दे की बाबत दल द्वारा सेमिनार आयोजित किए जाएंगे तथा सहित्य प्रकाशन किया जाएगा।

भारतीय समाज में जो लोग संकीर्ण भावनाओं को फैलाते हैं,जाति-प्रथा के विचार को फैलाते हैं,मठाधीशों के वर्चस्व को मजबूत करते हैं,साम्प्रदायिकता को फैलाकर निहित वर्ग की राजनीति को मजबूत बनाते हैं,उनकी राजनीति आज ताकतवर है। समाजवादी जन परिषद जिन गरीब और कमजोर तबकों की राजनीति करती है वह मजबूत न होने पर उन तबकों का न घर चलेगा न आजीविका।यह बात हमें जनता में ले जानी होगी। शोषित वर्ग का स्वार्थ और देश का स्वार्थ परस्पर जुड़े हुए हैं। धनी वर्ग की राजनीति का मुकाबला हम इसी राजनीति के बल पर करेंगे। हमें इस उद्देश्य को स्पष्ट तौर पर दिमाग में बैठा लेना होगा। पूंजीवादी,मनुवादी सोच की ताकतें जिस प्रकार ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उद्देश्य अपने दिमाग बैठाये हुए हैं, उससे देश का विघटन अवश्यंभावी है। शोषित तबकों की राजनीति को मजबूत बना कर मौजूदा देश-विरोधी राजनीति को परास्त करने का यह सम्मेलन संकल्प लेता है।

प्रस्तावक- अफलातून. , समर्थक – कमलकृष्ण बनर्जी

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प्रिय सुनील,
आने की इच्छा थी लेकिन संभव नहीं हुआ। कारण देना व्यर्थ है।अबकी बार आप लोगों से ही नहीं जन-आंदोलन समन्वय समिति के सदस्यों से भी भेंट हो जाती।लिखने की जरूरत नहीं है कि किशनजी से मिलना एक बड़े संतोष का विषय है।समाजवादी आंदोलन से जुड़े जो जाने पहिचाने चेहरे हैं उनमें से शायद किशन पटनायक ही ऐसे हस्ताक्षर हैं जो नई पीढ़ी को प्रेरणा देने की योग्यता रखते हैं। लोहिया का नाम लेने वाले केवल मठ बना सकते हैं,यद्यपि वे इसे भी भी नहीं बना पाये हैं लेकिन जो लोग लोहिया को वर्त्तमान सन्दर्भों में परिभाषित कर रहे हैं या लोहिया के सोच के तरीके से वर्त्तमान को समझ रहे हैं वे ही समाजवादी विचारधारा को ज़िंदा रख रहे हैं।जाने पहिचाने लोगों में मेरी दृष्टि में ऐसे एक ही व्यक्ति हैं और वह हैं ,- किशन पटनायक।
आप लोग उनके सानिध्य में काम कर रहे हैं यह बड़ी अच्छी बात है।अलग अलग ग्रुपों को जोड़ने की आपकी कोशिश सफल हो ऐसी मेरी शुभ कामना है।
  आप यदि मेरी बात को उपदेश के रूप में न लें जोकि या तो बिना सोचे स्वीकार की जाती है या नजरअंदाज कर दी जाती है, तो मैं यह कहना चाहूंगा कि वर्तमान राजनैतिक दलों की निरर्थकता के कारण छोटे छोटे दायरों में काम करने वाले समूहों का महत्व और भी बढ़ गया है।केंद्रीकृत व्यवस्था का विकल्प देने के काम को ये समूह ही करेंगे।दलों का केंद्रीकृत ढांचा केंद्रीकृत व्यवस्था को कैसे तोड़ सकता है? हांलाकि लोकशक्ति तो खड़ी करनी होगी।विकेंद्रीकृत ढांचों में किस तरह लोकशक्ति प्रगट हो सके यह आज की बड़ी समस्या है।
  मेरे मन में उन लोगों के प्रति अपार श्रद्धा है जो सम्पूर्ण आदर्श लेकर काम कर रहे हैं चाहे उनका दायरा छोटा ही रह जाए लेकिन शक्ति के फैलाने की जरूरत है।देश बहुत बड़ा है। लोगों के अलग अलग अनुभव होते हैं और इस कारण लिखित या मौखिक शब्द अपर्याप्त हैं।शक्ति बनाना है तो सम्पूर्ण विचारधारा पर जोर कम और सामान कार्यक्रमों में अधिक से अधिक समूहों के साथ मिलकर काम करना श्रेयस्कर है- ऐसा मेरा विचार है।
   शुभ कामनाओं के साथ
ओमप्रकाश रावल
सितम्बर 15,’92
प्रति,श्री सुनील, c/o श्री किशन बल्दुआ, अध्यक्ष समता संगठन,अजंता टेलर्स,सीमेंट रोड,पिपरिया,
जि होशंगाबाद

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बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

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6 फरवरी,11 बजे चलो दि‍ल्‍ली सचि‍वालय!

 

साथियो!

पिछले लगभग एक माह से पूरी दिल्‍ली की मज़दूर बस्तियों और औद्योगिक क्षेत्रों में दिल्‍ली मज़दूर यूनियन, उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली मज़दूर यूनियन और स्‍त्री मज़दूर संगठन की ओर से माँगपत्रक आन्‍दोलन चलाया जा रहा है। मज़दूरों की माँगें एकदम स्‍पष्‍ट हैं। उनका महज इतना कहना है कि दिल्‍ली के मज़दूरों से किये गये अपने वायदों को पूरा करें।

 

आखिर इतनी बौखलाहट क्‍यों?

 

फिर आखिर इस आन्‍दोलन से आम आदमी पार्टी को इतनी बौखलाहट क्‍यों है कि आन्‍दोलन की अभियान टोलियों के साथ जगह-जगह उनके कार्यकर्ता उलझ रहे हैं, गाली-गलौज कर रहे हैं और पर्चे जला रहे हैं। पिछले एक हफ्ते से उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली क्षेत्र में लगभग हर रोज़ ‘आप’ के कार्यकर्ताओं ने अभियान टोली के साथ बदसलूकी की, प्रचार सभाओं में बाधा पैदा करके मज़दूरों को तितर-बितर करने की कोशिश की। एक दिन एक प्रचार टोली से पर्चे छीन कर जलाये। यहाँ तक कि शाहाबाद डेयरी स्थित जिस शहीद भगतसिंह पुस्‍तकालय में स्‍त्री और पुरुष मज़दूरों की मीटिंगें और विविध सांस्‍कृतिक कार्यक्रम हुआ करते हैं, रात में उसका बोर्ड कुछ लोग उतार ले गये। फिर वहाँ पत्‍थरबाजी भी की गयी। कल शाम को गाड़ी में सवार पीकर धुत्‍त ‘आप’ पार्टी के कुछ लोगों ने बादली में प्रचार टोली की स्‍त्री सदस्‍यों के साथ गाली-गलौज की और धमकियाँ दीं, फिर मज़दूरों के इकट्ठा होने पर वे वहाँ से चले गये!पहली बात, यही वह लोकतांत्रिक संस्‍कृति है, जिसकी केजरीवाल, सिसोदिया और योगेन्‍द्र यादव दुहाई देते नहीं थकते? मज़दूरों के नितान्‍त शान्तिपूर्ण आन्‍दोलन से इतनी बौखलाहट क्‍यों? आखिर मज़दूर माँग ही क्‍या रहे हैं? उनका मात्र इतना कहना है कि केजरीवाल ने मज़दूरों से जो वायदे किये थे, उन्‍हें पूरा करने के बारे में कुछ तो बोलें! वे तो सत्‍तासीन होने के बाद साँस-डकार ही नहीं ले रहे हैं।

 

मज़दूरों से किये गये एक भी वायदे की चर्चा भी नहीं की!

 

केजरीवाल ने पूरी दिल्‍ली से ठेका प्रथा को खत्‍म करने का वायदा किया था। अब उन्‍होंने इसकी तकनीकि जाँच के लिए एक समिति बना दी है, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। उन्‍हें करना सिर्फ इतना था कि सिर्फ एक दिन का विधान सभा सत्र बुलाकर इस आशय का विधेयक पारित करवा लेना था कि दिल्‍ली में कोई भी निजी या सरकारी नियोक्‍ता नियमित प्रकृति के काम के लिए ठेका मज़दूर नहीं रह सकता। इसके बजाये एक समिति बनाकर केजरीवाल ने मामले को टाल दिया है। समिति रिपोर्ट देगी और उसपर सरकार विचार करेगी, तबतक लोकसभा चुनावों की आचार संहिता लागू हो जायेगी।केजरीवाल ने कहा था कि निजी झुग्‍गीवासियों को पक्‍के मकान दिये जायेंगे और तबतक कोई झुग्‍गी उजाड़ी नहीं जायेगी। अब इस काम के लिए समय-सीमा बताना तो दूर, केजरीवाल कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। यही नहीं, कांग्रेस सरकार के समय जिन झुग्‍गी बस्तियों का नियमतिकरण हुआ था, अब उनमें भ्रष्‍टाचार बताकर उस फैसले को पलटने की बात की जा रही है। यानी लाखों मज़दूरों को पुनर्वास की व्‍यवस्‍था के बिना उजाड़ने की भूमिका तैयार की जा रही है।केजरीवाल ने दिल्‍ली के सभी पटरी दुकानदारों और रेहड़ीवालों को लाइसेंस और स्‍थाई स्‍थान देने का वायदा किया था, उसके बारे में भी वे अब साँस-डकार नहीं ले रहे हैं।चुनाव प्रचार के दौरान मज़दूर बस्तियों में उनके उम्‍मीदवार सौ अतिरिक्‍त सरकारी स्‍कूल खोलने और वर्तमान स्‍कूलों के स्‍तर को ठीक करने का वायदा कर रहे थे। इस वायदें को भी ठण्‍डे बस्‍ते में डाल दिया गया।

 

केजरीवाल का भ्रष्‍टाचार-विरोध मज़दूरों के लिए नहीं है!

 

केजरीवाल की राजनीति की पूरी बुनियाद भ्रष्‍टाचार-विरोध पर टिकी है। फिलहाल हम इस बुनियादी प्रश्‍न पर नहीं जाते कि पूँजीवाद को पूरी तरह भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त किया ही नहीं जा सकता, कि पूँजीवाद स्‍वयं में ही भ्रष्‍टाचार है और यह कि जनता को भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त पूँजीवाद नहीं, बल्कि पूँजीवाद-मुक्‍त राज और समाज चाहिए। भष्‍टाचार कितनी अधिक धनराशि का है, इससे अधिक अहम बात यह है कि किस भ्रष्‍टाचार से व्‍यापक आम आबादी का जीना मुहाल है! दिल्‍ली की साठ लाख मज़दूर आबादी का जीना मुहाल करने वाला भ्रष्‍टाचार है — श्रम विभाग का भ्रष्‍टाचार। किसी भी फैक्‍ट्री या व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठान में मज़दूरों को न्‍यूनतम मज़दूरी नहीं मिलती, काम के तय घण्‍टों से अधिक काम करना पड़ता है, ओवरटाइम तय से आधी दर पर मिलता है, कैजुअल मज़दूरों का मस्‍टर रोल नहीं मिंटेन होना, सैलरी स्लिप नहीं मिलती, पी.एफ. इ.एस.आई. की सुविधा नहीं मिलती, फैक्‍ट्री इंस्‍पेक्‍टर, लेबर इंस्‍पेक्‍टर आदि दौरा नहीं करते, कारखाने स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा और पर्यावरण के निर्धारित मानकों का पालन नहीं करते! तात्‍पर्य यह कि किसी भी श्रम कानूनों का पालन नहीं होता। यदि केजरीवाल वास्‍तव में भ्रष्‍टाचार से आम लोगों को होने वाली परेशानी से परेशान हैं, तो सबसे पहले उन्‍हें श्रम विभाग के भ्रष्‍टाचार को दूर करना चाहिए। मज़दूरों की यही माँग है।लेकिन मज़दूरों के प्रति केजरीवाल की सरकार का रवैया क्‍या है? डी.टी.सी. के 20हजार ठेका कर्मचारियों और 10हजार अस्‍थाई शिक्षकों के धरने और अनशन को हवाई आश्‍वासन की आड़ में नौकरी छीन लेने और दमन की धमकी से समाप्‍त कर दिया गया। वजीरपुर कारखाना यूनियन के मज़दूर जब अपनी माँगों को लेकर सचिवालय पहुँचे तो बैरिकेडिंग करके पुलिस खड़ी करके उन्‍हें मंत्री से मिलने से रोक दिया गया और दफ्तर में केवल उनका माँगपत्रक रिसीव कर लिया गया। केजरीवाल का जनता दरबार तो हवा हो ही गया, अब उनके मंत्री जनता से मिलते तक नहीं।

 

‘आप’ के आम आदमी

ये ‘आप’ के आम आदमी हैं कौन? यूँ तो ऊपर भी विचित्र खिचड़ी है! केजरीवाल का एन.जी.ओ. गिरोह, किशन पटनायक धारा के समाजवादी योगेन्‍द्र यादव, राज नारायण धारा के समाजवादी आनंद कुमार, मंचीय नुक्‍कड़ कवि, घोर दखिणपंथी विचारों वाला कुमार विश्‍वास, ए.बी.वी.पी. से एन.एस.यू.आई. से भा.क.पा.(मा-ले) होते हुए यहाँ तक आये गोपाल राय तथा कमल मित्र शेनॉय, परिमल माया सुधाकर, बली सिंह चीमा, आतिशी मारलेना आदि-आदि भाँति-भाँति के, रंग-बिरंगे ”वामपंथियों” के साथ कैप्‍टन गोपी नाथ, नारायण मूर्ति और वी. बालाकृष्‍णन जैसे कारपोरेट शहंशाह…। ऐसी लोकरंजक राजनीतिक खिंचड़ी का असली रंग और स्‍वाद तो ग्रासरूट स्‍तर पर पता चलता है। केजरीवाल को मध्‍यवर्गीय इलाकों में आर.डब्‍ल्‍यू.ए. खुशहाल मध्‍य वर्गीय जमातों, कारोबारियों और आई.टी. – व्‍यापार प्रबंधन आदि पेशों में लगे उन युवाओं का समर्थन प्राप्‍त है, जो पारम्‍परिक तौर पर दक्षिणपंथी विचारों के और प्राय: भाजपा के वोट बैंक होते रहे हैं। लेकिन सबसे दिलचस्‍प दिल्‍ली की मज़दूर बस्तियों में देखने को मिलता है। वहाँ सारे छोटे कारखानेदारों, दुकानदारों, लेबर-कांट्रेक्‍टर के अतिरिक्‍त मज़दूरों को सूद पर पर पैसे देने वाले, कमेटी डालने वाले, मज़दूरों के रिहाइश वाले लॉजों-खोलियों और घरों के मालिक तथा प्रापर्टी डीलर और उनके चम्‍पुओं के गिरोह — यही आम आदमी की टोपी पहनकर मज़दूर बस्‍तियों में घूम रहे हैं। पिछले एक माह के अभियान के दौरान हमलोगों ने इस नंगी-कुरूप सच्‍चाई को बहुत गहराई से महसूस किया और झेला। सिर्फ एक उदाहरण ही काफी होगा। ‘बवाना चैम्‍बर ऑफ इण्‍डस्‍ट्रीज’ के चेयरमैन प्रकाशचंद जैन उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी के एक अग्रणी नेता हैं। इनके साथ और भी कई फैक्‍ट्री मालिक, प्रॉपर्टी डीलर और ठेकदार हैं। कोई प्रकाश चन्‍द जैन से ही पूछे क्‍या उनके कारखानों में मज़दूरों को न्‍यूनतम वेतन, पी.एफ., ई.एस.आई. आदि दिया जाता है, क्‍या वहाँ श्रम कानूनों का पालन होता है? कमोबेश यही स्थिति दिल्‍ली के सभी औद्योगिक इलाकों और मज़दूर बस्तियों की है। इसके बावजूद, एन.जी.ओ.-सुधारवादियों और भाँति-भाँति के सामाजिक जनवादियों को तो छोड़ ही दें, आम आदमी पार्टी की झोली में यूँ ही जा टपकने वाले भावुकतावादी कम्‍युनिस्‍टों को अभी भी केजरीवाल की राजनीति का असली रंग नहीं दिख रहा है, तो निश्‍चय ही राजनीतिक काला मोतिया के चपेट में वे अंधे हो चुके हैं। या हो सकता है, वे पहले से ही अंधे रहे हों।आम जनता स्‍वराज और सड़क से सत्‍ता चलाने की रट लगाने वाले लोकरंजकातावादी मदारी अब सरकारी धोखाधड़ी और धमकी, पुलिसिया धौंसपट्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं की दादागीरी का खुलकर सहारा ले रहे हैं। मज़दूरों की वर्ग दृष्टि एकदम साफ है। वह केजरीवाल के लोकरंजकतावाद की असलियत को अभी से समझने लगा है। वह कुछ कुलीनतावादी दिवालिये किताबी वामपंथियों की तरह मतिभ्रम-संभ्रम-दिग्‍भ्रम का शिकार नहीं है।कल 6 फरवरी को सचिवालय पहुँचकर दिल्‍ली के मज़दूर केजरीवाल की दहलीज पर याददिहानी की पहली दस्‍तक देंगे। यह अंत नहीं, महज एक नयी शुरुआत है।जो भी साथी दिल्‍ली के मेहनतकशों की इस आवाज के साथ है, वे भी कल उनके समर्थन में ज़रूर पहुँचें। कल ग्‍यारह बजे हम सभी राजघाट पर एकत्र होंगे और वहाँ से सचिवालय की ओर मार्च करेंगे।

 

इस अभियान के बारे में विस्‍तार से जानने के लिए देखें हमारी वेबसाइट 

 

http://www.workerscharter.in/

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मैं आप में क्यों नहीं?

दिल्ली में आप की अभूतपूर्व सफलता के बाद सामाजिक कार्यों से जुड़े कुछ मित्र तो मुझे सलाह दे रहे हैं कि मैं भी आप में शामिल हो जाऊं तो कई ये पूछ रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए? कुछ तो यह मान कर चल रहे हैं कि आप से मेरा निकट का सम्बंध हैं और चाह रहे हैं कि मैं उनके इलाके से लोकसभा चुनाव हेतु आप के उम्मीदवार के रूप में उनके नामों की संस्तुति कर दूं तो कुछ विषेषज्ञ अपना ज्ञान आप की सेवा में प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रख रहे हैं। एक महिला पुलिसकर्मी ने तो फोन करके कहा कि अपनी जिन्दगी में राजनेताओं को करीब से देखने के बाद वह इस निर्णय पर पहुंची है कि इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता और अरविंद केजरीवाल को सुरक्षा स्वीकार कर लेनी चाहिए।
मेरे आप में न होने की एक वजह यह है कि न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर ने 2011 में सोषलिस्ट पार्टी को पुनर्जीवित किया तो उनके कहने पर मै उसमें शामिल हो गया। यह पार्टी डाॅ. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव, अच्युत पटवर्द्धन, आदि, द्वारा बनाई गई पार्टी है जिसका 1977 में जनता पार्टी में विलय हो गया था। इसके पूर्व पिछले लोक सभा चुनाव से पहले जब कुलदीप नैयर ने लोक राजनीति मंच बनाया था तो मैं उसमें भी शामिल हुआ था। फिलहाल मैं सोषलिस्ट पार्टी और लोक राजनीति मंच, जिसमें कई अन्य छोटे-छोटे दल भी शामिल हैं, को मजबूत करने में लगा हुआ हूं। मुझे नहीं लगता कि सिर्फ इसलिए कि आज आप को सफलता मिल रही है तो हमें अपने दल छोड़ कर उसमें शामिल हो जाना चाहिए। याद रहे कि इस देष को जिन राजनीतिक बुराइयों से मुक्त कराना है उसमें से एक दल बदलने वाली अवसरवादिता भी है। दल बदलने के खिलाफ इसीलिए एक कानून भी बना है। हां, यदि विचार और कार्यशैली मिलते हों तो, गठबंधन के बारे में जरूर सोचा जा सकता है।
किंतु आप में न जाने का प्रमुख कारण यह है कि आप के लिए केन्द्रीय मुद्दा है भ्रष्टाचार। जबकि मुझे लगता है कि हमारे देष ही नहीं मनुष्य समाज का केन्द्रीय मुद्दा है गैर-बराबरी। जब तक हम एक ऐसा समाज नहीं बना लेते जिसमें हरेक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का इतना सम्मान करने लगे जितना कि वह दूसरों से अपने लिए चाहता है तब तक हम एक मानवीय व्यवस्था कायम नहीं कर सकते। यह सिर्फ भ्रष्टाचार खत्म होने से या स्वाराज्य आ जाने से नहीं होगा।
मान लीजिए कि कल अरविंद केजरीवाल के शासन में भ्रष्टाचार एकदम समाप्त हो जाए। कहीं भी एक पैसा न तो कोई घूस लेने वाला हो न ही कोई देने वाला। यह भी मान लीजिए कि सारे निर्णय जनता की सीधी भागीदारी से होने लगे, यानी स्वराज्य आ गया। तो क्या हम संतुष्ट हो जाएंगे?
क्या जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना खत्म हो जाएगी? क्या हरेक अमीर गरीब को अपने साथ बैठाने लगेगा? क्या महिलाओं के प्रति हिंसा या पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था समाप्त हो जाएगी और महिला अपने को सुरक्षित महसूस करने लगेगी? क्या आधे बच्चे, जो कुपोषण का शिकार हैं और इस वजह से विद्यालय स्तर की भी शिक्षा पूरी नहीं कर पाते, को पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिलने लगेगा और वे भी उतने ही गुणवत्तापूर्ण विद्यालयों में जाने लगेंगे जिनमें अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं? क्या हरेक गरीब को मुफ्त उतना गुणवत्तापूर्ण इलाज मिलेगा जितना अमीर लोग निजी अस्पतालों में खरीदने की क्षमता रखते हैं?
आप ने बिजली के दामों को आधा करने कर वायदा किया है किंतु उन लोगों का क्या जिनके पास अभी बिजली पहंुची ही नहीं है और न कभी पहुंचेगी? जितने लोग इस देष में हैं उन सबको बिजली उपलब्ध करा पाने लायक उत्पादन ही हम नहीं करते क्योंकि उतने संसाधन ही हमारे पास नहीं हैं। इसलिए प्रभावशाली या पैसे वाले तो बिजली का सपना देख सकते हैं लेकिन हरेक गरीब नहीं। खत्म होते कोयले के संसाधन से बिजली पैदा करने का यदि हमने कोई विकल्प नहीं ढूंढा तो निकट भविष्य में यह स्थिति बदलने वाली नहीं।
पानी तो प्राकृतिक संपदा है और सभी मनुष्यों को उपलब्ध है। उसपर सरकार या किसी निजी कम्पनी को पैसा कमाने की छूट नहीं होनी चाहिए। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि जिस मनुष्य को जरूरी आवष्यकताओं जैसे पीने, सिंचाई, स्नान, कपड़ा धोने, आदि के लिए जितना चाहिए उतना उसे मिलना चाहिए। किंतु मनोरंजन, जैसे स्वीमिंग पूल, वाॅटर पार्क, गोल्फ के मैदान और बड़े-बड़े लाॅन हेतु उसका दुरुपयोग बंद होना चाहिए। सिंचाई को छोड़कर जमीन के नीचे से निजी पम्प द्वारा पानी निकालने पर प्रतिबंध होना चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पानी के उपभोग पर कोई सीमा नहीं तय करनी पड़ेगी। बिना रासायनिक खाद व कीटनाषक के खेती होने लगी तो पानी की आवष्यकता भी कम हो जाएगी।
चूंकि हमारा लक्ष्य एक मानवीय व्यवस्था को कायम करना है जिसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होगी इसलिए हम एक हथियार मुक्त दुनिया की कल्पना करते हैं – व्यक्तिगत स्तर पर भी और राष्ट्रों के स्तर पर भी। इसलिए सोषलिस्ट पार्टी ने तय किया है कि हमारे सदस्य मनुष्यों में कोई भेदभाव न मानने वाले व भ्रष्टचार के खिलाफ तो होने ही चाहिए वे हथियारों के आधार पर सुरक्षा की अवधारणा को न मानने वाले भी होने चाहिए। असल में देखा जाए तो बहादुर व्यक्तियों, जैसे अरविंद केजरीवाल, को अपनी सुरक्षा के लिए हथियारों की जरूरत ही नहीं महसूस होती।
आप पार्टी के निर्माण में राष्ट्रवाद की भावना उसकी नींव में है। उसके प्रमुख नारे हैं भारतामाता की जय और वंदे मात्राम जबकि हमारा मानना है कि राष्ट्रवाद की अवधारणा तो मनुष्यों को वैसे की बांटती है जैसे कि जाति और धर्म की। राष्ट्र की सुरक्षा पड़ोसियों के साथ विष्वास पर आधारित सम्बंधों से होती है न कि परमाणु बम बनाने से।
उपर्युक्त कुछ वैचारिक मतभेदों और आप की काॅरपोरेट कार्यषैली, जिसमें व्यक्तियों को उनकी उपयोगिता के हिसाब से जोड़ा जा रहा है न कि मानवीय सम्बंधों के आधार पर, के कारण हमारे जैसे लोग आप में सहज महसूस नहीं कर सकते। हां, चूंकि आप का प्रयोग इस देष में सड़ी-गली राजनीतिक व्यवस्था की बदलने के लिए एक ताजी बयार लेकर आया है हम इसका स्वागत करते हैं और हम इसके सफलता की कामना करते हैं ताकि यह देष की राजनीति को भ्रष्टाचार और अपराधीकरण से मुक्त कराए।

लेखकः संदीप
पताः ए-893, इंदिरा नगर, लखनऊ-226016
फोनः 0522 2347365, मोबाइलः 9415022772

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