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Archive for the ‘नोटबन्दी’ Category

2014 में पहली बार अपने बूते केन्द्र में सरकार बना लेने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ उत्तर प्रदेश जैसे बडे राज्य में बड़ी चुनावी सफलता हासिल की है वहीं दूसरी ओर राजनीति को पूंजीपतियों के हाथों में बांध देने में सत्ता के शीर्ष में बैठे इस दल के लोगों ने अहम भूमिका अदा की है।विडंबना यह है कि शोषक वर्ग के स्वार्थ की पूर्ति के लिए नाना प्रकार की नीतियां बनाने और कदम उठाने के बावजूद केन्द्र में बैठा यह सत्ताधारी दल राष्ट्रवादी होने का दावा करता है। समाजवादी जन परिषद के लिए दो स्वार्थ सर्वोपरि है-शोषित वर्ग का स्वार्थ तथा देश का स्वार्थ। दल की स्पष्ट मान्यता है कि पूंजीपति वर्ग के स्वार्थ को तवज्जो देने  से देश के स्वार्थ का नुकसान ही होता है।

याराना पूंजीवाद और खेती

केन्द्र सरकार की विदेश नीति तक शासक वर्ग से जुड़े पूंजीपतियों के हक में है। प्रधान मंत्री मंगोलिया,बांग्लादेश जैसे हमसे कमजोर देशों में जाते हैं और उन्हें करोड़ों डॉलर का कर्ज देने की घोषणा करते हैं।यह ऋण उन्हीं देशों को दिया जाता है जहां प्रधान मंत्री के करीबी पूंजीपतियों द्वारा बड़ी परियोजना चलाने के लिए समझौता होता है।

देश के बड़े पूंजीपतियों का सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 11 लाख करोड़ रुपये का बकाया है।इसे चुकता करवाने के लिए सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर द्वारा कड़े कदम उठाने की मांग की गयी तो उन्हें सेवा विस्तार नहीं दिया गया।

खाद्यान्न एवं खाद्य तेल के मामले में स्वावलंबन हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जानी चाहिए जिसका श्रेय इस देश के किसानों को जाता है।इस स्वावलंबन को पलटने की दिशा में भी सत्ता के करीबी पूंजीपतियों का प्रत्यक्ष हाथ दिखाई दे रहा है।भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयात करने वाला देश हो गया है।गौतम अडाणी की खाद्य तेल की ‘फॉर्चून’ मार्के वाली कम्पनी द्वारा अन्य तेल कम्पनियों को पाम ऑयल मिला हुआ खाद्य तेल बेचने का तरीका बताना आयात बढ़ने का मुख्य कारण रहा है। देश के तमाम बड़े उद्योगपतियों की कम्पनियों द्वारा अफ्रीकी देशों में हजारों एकड़ के फार्मों में खेती कराई जा रही है तथा भारत सरकार इनके उत्पादों के आयात के लिए उन देशों से समझौते कर रही है। अरहर की दाल की कीमत जिन दिनों आसमान छू रही थी तब गौतम अडाणी के गुजरात स्थित निजी बन्दरगाह में अफ्रीका से आयातित सस्ती दाल(40 से 50 रुपए/किलो) इकट्ठा करके रखा गया था तथा कीमत 100 रुपये प्रति किलो होने के बाद उसे निकाला गया था। विदेशों से गेहूं आयात करने पर लगने वाले 25 प्रतिशत आयात शुल्क को पहले 10 फीसदी किया गया और फिर उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। वित्त मंत्री द्वारा यह घोषित कर दिया गया है कि निजी कम्पनियां यदि ठेके पर खेती करना चाहेंगी तो उन्हें इजाजत दे दी जाएगी।

खेती में बढ़ रही लागत के कारण किसानों की आत्महत्या की दर 26 प्रतिशत बढ़ गयी है। उत्तर प्रदेश की नवनिर्वाचित सरकार ने लघु तथा सीमान्त किसानों के कर्जे माफ कर दिए हैं जो कुछ राहत देने वाला कदम है।इसके साथ ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के शीर्षस्थ अधिकारियों ने किसानों की कर्ज माफी के खिलाफ बयान देने शुरु कर दिए हैं। इन बयानों से स्पष्ट होता है कि सरकार देश भर के किसानों के कर्ज माफ करने की मांग पर सकारात्मक नजरिए से विचार नहीं करना चाहती है।

कृषि उपज के समर्थन मूल्य के सन्दर्भ मे स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग को सरकार नजरअन्दाज कर रही है।इस समिति द्वारा लागत खर्च में 50 फीसदी जोड़ कर समर्थन मूल्य निर्धारित करने की बात कही गयी थी। यह नहीं भूलना चाहिए 2014 के आम चुनाव के अभियान में नरेन्द्र मोदी ने भी इस समिति की सिफारिशों को लागू करने की बात चुनावी सभाओं में कही थी। सजप सहित देश के किसान आन्दोलन कृषि उपज के मूल्य निर्धारण की बाबत इस समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग करते हैं।

बेरोजगारीः

समाजवादी जन परिषद के नेता और अर्थशास्त्री साथी सुनील ने ग्रामीण इलाके के रोजगार के सन्दर्भ कहा था,’आज भारत के गाँव उद्योगविहीन हो गए हैं और वहाँ खेती-पशुपालन के अलावा कोई धंधा नहीं रह गया है । गाँव और खेती एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं । दूसरी ओर गांव और उद्योग परस्पर विरोधी हो गये हैं । जहाँ गाँव है , वहाँ उद्योग नहीं है और जहाँ उद्योग है , वहाँ गाँव नहीं है । यह स्थिति अच्छी नहीं है और यह भी औपनिवेशिक काल की एक विरासत है ।‘ खेती के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और जंगल पर आश्रित रोजगार के अवसरों को समाप्त करने का खुला खेल शुरू हो चुका है। विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल 2015 को पूरी तरह लाचार बना दिया गया। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। यह नीति विश्व व्यापार संगठन की कई शर्तों के आड़े आती थी इसलिए 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। विदेशी मुद्रा के फूलते गुब्बारे और भुगतान संतुलन के ‘सुधार’ के साथ यह शर्त जुड़ी थी कि उत्पादन में मात्रात्मक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकेंगे। विश्व व्यापार संगठन की इस शर्त के कारण 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं।

जिन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म किया गया था उन पर गौर कीजिए- अचार, पावरोटी, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, लकड़ी का फर्नीचर, नोटबुक या अभ्यास पुस्तिका और रजिस्टर, मोमबत्ती, अगरबत्ती, आतिशबाजी, स्टेनलेस स्टील के बरतन, अल्युमिनियम के घरेलू बरतन, कांच की चूड़ियां, लोहे की अलमारी, लोहे की कुर्सियां, लोहे के टेबल, लोहे के सभी तरह के फर्नीचर, रोलिंग शटर, ताले, कपड़े धोने का साबुन और दियासलाई। बड़ी पूंजी, आक्रामक विज्ञापन, मानव-श्रम की जगह मशीन को तरजीह देने वाली तकनीक से लैस देशी-विदेशी खिलाड़ी अधिक रोजगार देने वाले इन छोटे उद्योगों को लील जाएंगे।

इस प्रकार के छोटे और कुटीर उद्योगों के उत्पादों की खपत को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय एवं राज्य-स्तरीय सरकारी क्रय संस्थाओं द्वारा लघु और कुटीर उद्योगों से ही सामान खरीदने की नीति को भी निष्प्रभावी बनाने की दिशा में काम हो रहा है। इससे ठीक विपरीत स्थिति पर गौर करें। बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देने के लिए नियम-कानून बदल देने का भी इतिहास रहा है। सरकार द्वारा नियम कानून बदल कर अपने प्रिय औद्योगिक घराने को बहुत बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाने के प्रमुख उदाहरणों में अंबानियों के उदय को प्रायोजित करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सिर्फ उन्हें ही सिंथेटिक धागे के उत्पादन के लिए कच्चे माल के आयात की इजाजत देने के साथ-साथ हथकरघा द्वारा तैयार की जाने वाली कपड़ों की किस्मों की आरक्षित सूची को निष्प्रभावी बना देना है। गौरतलब है कि कपड़ा और उद्योग नीति के इन नीतिगत फैसलों के द्वारा अंबानी को देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बनाने के पहले तक सूती कपड़े कृत्रिम धागों से बने कपड़ों से सस्ते थे। कृत्रिम धागों से पावरलूम पर बने कपड़ों की इजाजत के साथ-साथ लाखों हथकरघा बुनकरों की आजीविका छिन गई है। पहले पावरलूम पर सिर्फ ‘कोरे कपड़े’ और हथकरघे पर बिनाई की विविध डिजाइनों के कपड़ों को बनाने की इजाजत थी।

यह कानून 1985 में बन गया था। तब बाईस किस्म के कपड़े इस कानून के तहत हथकरघे के लिए संरक्षित किए गए गए थे। पावलूम लॉबी ने कानून को 1993 तक मुकदमेबाजी में फंसाए रखा और 1993 में जब यह प्रभावी हुआ तब संरक्षित किस्मों की संख्या ग्यारह रह गई। एक प्रामाणिक अध्ययन के अनुसार हथकरघे पर बने होने के दावे वाले सत्तर फीसद कपड़े दरअसल मिलों या पावरलूम पर बने होते हैं।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीस लाख लोगों को काम मिला है जबकि हथकरघा से दो करोड़ लोग जुड़े हैं। अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी यात्री फ्रैन्कोए पिरार्ड डी लावाल ने अपने यात्रा विवरण में बताया है कि अफ्रीका के दक्षिणी छोर से चीन तक लोग भारतीय हथकरघे पर बने कपड़ों से अपना शरीर ढंकते थे। उनके अनुसार भारत के पूर्वी तट के सिर्फ एक बंदरगाह से सालाना पचास लाख गज कपड़े का निर्यात होता था।

पारंपरिक हुनर,कला और हस्तशिल्प से जुड़े इन तमाम रोजगारों को समाप्त करने की नीति को लागू करने के साथ-साथ जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए केन्द्र सरकार प्रचारित कर रही है कि वह हुनर प्रशिक्षण के लिए योजना चला रही है।

सरकारी नौकरियों की स्थिति के बारे में सरकार ने संसद में लिखित सूचना दी है। केंद्रीय कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में लिखित रूप से कहा है कि 2013 की तुलना में 2015 में केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 फीसदी की कमी आई है। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की भर्ती में 90 फीसदी की कमी आई है। 2013 में केंद्र सरकार में 1, 54,841 भर्तियां हुई थीं जो 2014 में कम होकर 1, 26, 261 हो गईं। मगर 2015 में भर्तियों की संख्या में अचानक बहुत कमी हो जाती है। सवा लाख से कम होकर करीब सोलह हज़ार हो गयी। बिना किसी नीतिगत फैसले के इतनी कमी नहीं आ सकती। 2015 में केंद्र सरकार में 15,877 लोग की सीधी नौकरियों पर रखे गए। 74 मंत्रालयों और विभागों ने सरकार को बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की 2013 में 92,928 भर्तियां हुई थीं। 2014 में 72,077 भर्तियां हुईं। मगर 2015 में घटकर 8,436 रह गईं। इस प्रकार नब्बे फीसदी गिरावट आई है।
2015-18 के बीच रेलवे में रोजगार नहीं बढ़ेगा। रेलवे के मैनपावर की संख्या 13, 31, 433  ही रहेगी। जबकि 1 जनवरी 2014 को यह संख्या पंद्रह लाख थी। करीब तीन लाख नौकरियां कम कर दी गई हैं। 2006 से 2014 के बीच 90,629 हज़ार भर्तियां हुईं। अमरीका में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। भारत में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 138 है और यह भी कम होती जा रही है।
आल इंडिया काउंसिल फार टेक्निकल एजुकेशन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार साठ प्रतिशत इंजीनियर नौकरी पर रखे जाने के काबिल नहीं हैं। भारत में हर साल आठ लाख इंजीनियर पैदा होते हैं। इनकी फीस में तो कोई कमी नहीं हुई। ये काबिल नहीं हैं तो इंजीनियरिंग कालेजों का दोष हैं। उन्होंने इतना खराब इंजीनियर लाखों रुपये लेकर कैसे बनाया । उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं है। अब बाज़ार में नौकरियां नहीं हैं तो पहले से ही इंजीनियरों को नाकाबिल कहना शुरू कर दो ताकि दोष बाज़ार पर न आए। अगर साठ प्रतिशत इंजीनियर नालायक पैदा हो रहे हैं तो ये जहां से पैदा हो रहे हैं उन संस्थानों को बंद कर देना चाहिए।

काला धन और भ्रष्टाचार

देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों को नाजायज लाभ पहुंचाने वाली केन्द्र सरकार काले धन को समाप्त करने का दावा करती है तो उससे बढ़ कर हास्यास्पद और क्या हो सकता है? सच्चाई तो यह है कि HSBC बैंक की स्विट्जरलैन्ड स्थित जेनेवा शाखा में कई भारतीयों के गुप्त खाते होने की खबर को आये काफी समय बीत चुका है।दुनिया भर के कई हथियार तस्कर ,नशीली दवाओं के अवैध धन्धे करने वाले तथा भ्रष्ट नेताओं के नाम उजागर हुए हैं।इस सूची में भारत के बडे उद्योगपति,सिनेमा स्टार आदि के नाम थे। इस सूची के सार्वजनिक होने के बाद सरकार को इन खाताधारकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी,इसके बजाए सरकार ने इन खाताधारकों से नजदीकी संबंध होने के कारण ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कि बल्कि उस राशि को कबूल लेने की छूट की घोषणा की है।

पनामा नामक देश में दुनिया भर के कई भ्रष्ट नेताओं,अवैध व्यापार करने वाले तथा तस्करों के बैंक खातों की सूची सार्वजनिक हुई है।इस खबर के उजागर होने के बाद रूस,पाकिस्तान जैसे कई देशों में भारी हलचल मच गई।भारत में देश के सबसे उद्योगपति तथा सीने-सितारों आदि के नाम उजागर होने के बावजूद सरकार ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की है।

काले धन के समाप्ति के दावे के साथ सरकार ने सबसे बड़ा कदम ‘नोटबन्दी’ का उठाया। अर्थव्यवस्था में चलन से बाहर किए गए नोटों का मूल्य 86 फीसदी था। इस कदम से देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति पैदा हो गयी।नोटों को बदलने के लिए बैंकों की लाइन में खड़े 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई। इस सबके बावजूद जिन लोगों के पास इन बड़े नोटों में अघोषित पैसा था वे उसे बदलने या उसे खर्च करने में सफल हो गए।अघोषित धन के इन मालिकों ने अपने कर्मचारियों और मजदूरों को इन नोटों में कई महीनों का एडवान्स में वेतन और बोनस देकर,सोना तथा डॉलर में बदल कर तथा पेट्रोल पंपो के माध्यम से अघोषित पैसे से बिना नुकसान उठाए मुक्ति पा ली। विपक्षी दल इस मुद्दे की गहराई में नहीं गए तथा जनता के बीच इसके खिलाफ कारगर कदम उठाने से बचते रहे।इसके फलस्वरूप साधारण गरीब लोगों में यह भ्रम फैलाने सरकार सफल हो गयी कि इस कदम से आम जनता को खास कष्ट नहीं होगा और पैसे वालों लोगों का नुकसान होगा। वास्तविकता यह है कि सरकार ने आज तक कितने नोट वापस नहीं लौटे इसका अधिकृत आंकड़ा तक घोषित नहीं किया है। सजप यह मांग करती है कि सरकार इससे संबंधित तथ्य सार्वजनिक करे तथा छोटे मूल्य के नोट उपलब्ध कराए।

कांग्रेस सरकार के समय चले लोकपाल की मांग के आन्दोलन का विपक्षी दल के रूप में भाजपा को लाभ मिला था इसके बावजूद लोकपाल के लिए कोई कारगर कानून नहीं लाया गया है। भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों द्वारा बिना स्रोत बताये राजनैतिक दलों को चन्दे के रूप में दिया जाता है।इस वर्ष के वित्त विधेयक के साथ ऐसे चन्दे की कोई सीमा न रखने तथा स्रोत घोषित न करने को वैधानिकता प्रदान कर दी गई है। यह ध्यान देने लायक बात है कि वर्तमान में चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च की सीमा निर्धारित है किन्तु दलों द्वारा किए गए चुनाव खर्च की कोई सीमा नहीं है इसलिए इसका हिसाब भी गंभीरता से नहीं दिया जाता है। चुनाव के दौरान विपक्षी दलों के एक-एक नेता को खरीदने में मौजूदा शासक दल करोड़ों रुपए खर्च करता है इसलिए अघोषित आय के स्रोतों को बाधित करने में उसकी कोई रुचि नहीं है बल्कि इन बाधाओं को दूर करने के उसके द्वारा कानून बना लिए गए हैं।

चुनाव-सुधार

चुनाव में अघोषित पैसे हासिल करने और उसके बल पर चुनाव लड़ने के सन्दर्भ में ऊपर के अनुच्छेद जिक्र किया गया है। निर्वाचन प्रक्रिया के सन्दर्भ में समाजवादी जनपरिषद आनुपातिक प्रतिनिधित्व को अपनाने की पक्षधर है। इस सन्दर्भ में दल का कहना हैः

भारत के राज्य / शासन के हरेक स्तर (यथा केन्द्र, प्रदेश, जिला परिषद, प्रखंड समिति और पंचायत) पर चुनाव की पद्धति FPTP (“सबसे अधिक मत पाने वाला ही विजेता”) है। इसके विरुद्ध 80 देशों में चालू और भविष्य की लोकप्रिय पद्धति “आनुपातिक प्रतिनिधित्व है।

FPTP पद्धति भारत के शासन और लोकतन्त्र में कई कमजोरियों और विकृतियों को चला बढ़ा रही है| वह नीतियों के बनने- बदलने में बहुत खतरनाक हालात पैदा कर रही है. इसकें कुछ तथ्य हैं-

  1. मोदी सरकार केवल 30% जनता की पसन्द से ही लोकसभा में बहुमत लेकर आई है. करीब 60% जनता, जो उसके विरुद्ध है; वह 5 साल के लिए संसद मे बहुत कम प्रतिनिधित्व वाली और अशक्त हो चुकी है. छोटी संख्या वाली विकसित हो रही विचारधाराओं और संगठनों का तो इस पद्धति के रहते संसद, विधानसभा वगैरह में पहुँच पाना और मात्र अपनी पहचान बना कर रख पाना असंभव है।
  2. देश की प्रत्येक राज्य सरकार में भी कोई एक पार्टी इसी तरह बहुमत से बहुत कम वोट लाकर भी शासक बन गई है। वे भी कई बार केन्द्र सरकार जैसे गलत और अलोकतान्त्रिक निर्णय और काम करती है। ये सारी अल्पमत वाली सरकारें दूरगामी आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों और बड़े सामाजिक-धार्मिक प्रभाव वाले कार्यक्रम बनाती चलाती है। वे अतिवादी व्यवहार को बढ़ावा देती है जो बहुधा देश-समाज को गहरा नुकसान पहुँचाने वाली होती है।

इस मुद्दे की बाबत दल द्वारा सेमिनार आयोजित किए जाएंगे तथा सहित्य प्रकाशन किया जाएगा।

भारतीय समाज में जो लोग संकीर्ण भावनाओं को फैलाते हैं,जाति-प्रथा के विचार को फैलाते हैं,मठाधीशों के वर्चस्व को मजबूत करते हैं,साम्प्रदायिकता को फैलाकर निहित वर्ग की राजनीति को मजबूत बनाते हैं,उनकी राजनीति आज ताकतवर है। समाजवादी जन परिषद जिन गरीब और कमजोर तबकों की राजनीति करती है वह मजबूत न होने पर उन तबकों का न घर चलेगा न आजीविका।यह बात हमें जनता में ले जानी होगी। शोषित वर्ग का स्वार्थ और देश का स्वार्थ परस्पर जुड़े हुए हैं। धनी वर्ग की राजनीति का मुकाबला हम इसी राजनीति के बल पर करेंगे। हमें इस उद्देश्य को स्पष्ट तौर पर दिमाग में बैठा लेना होगा। पूंजीवादी,मनुवादी सोच की ताकतें जिस प्रकार ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उद्देश्य अपने दिमाग बैठाये हुए हैं, उससे देश का विघटन अवश्यंभावी है। शोषित तबकों की राजनीति को मजबूत बना कर मौजूदा देश-विरोधी राजनीति को परास्त करने का यह सम्मेलन संकल्प लेता है।

प्रस्तावक- अफलातून. , समर्थक – कमलकृष्ण बनर्जी

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अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अरूण कुमार, काले धन पर लिखने वाले सबसे अधिक उद्घ्रित लेखकों में से एक हैं. उन्होंने ‘ द ब्लैक इकॉनॉमी इन इंडिया'(पेंग्विन, 1999)   तथा ‘इंडियन इकॉनॉमी सिन्स इंडिपेंडेंस:  परसिस्टिंग कोलोनियल डिसरप्शन ‘ (विज़न बुक्स,  2013) पुस्तकें लिखी हैं. India Legal’s के Editor-in-Chief, इन्द्रजीत बाधवार और Associate Editor मेहा माथुर को दिए गए साक्षात्कार में प्रो कुमार बताते हैं कि कैसे जल्दीबाज़ी में उठाया गया ये क़दम माँग, रोज़गार और  निवेश को बिपरीत ढंग से प्रभावित करेंगे.

साक्षात्कार के अंश –

प्रश्न – कब और किन परिस्थितियों में विमुद्रीकरण एक अर्थशास्त्रीय उपकरण की तरह उपयोग किया जाता है और वैश्विक स्तर पर इसका प्रयोग कितना सामान्य है ?

उतर — आर्थिक बदलाव के एक उपकरण के रूप में इसका प्रयोग कई जगहों पर हुआ है, पर उस तरह नहीं जैसे कि भारत में हुआ है. ऐसा उन जगहों पर बडे तादाद में किया गया जहां मुद्रा अपना मूल्य पूरी तरह खो चुकी थी, जैसे सोवियत संघ या वाइमर गणराज्य, जहां आपको रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बोराभर पैसे ले जाने पडते. वहां मुद्रा को समाप्त कर दिया और नयी मुद्रा सुजित की गयी. मगर भारत ऐसी परिस्थिति में नहीं है.

प्रश्न – क्या भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे संकट का सामना कर रही थी कि इस तरह के तीव्र और भारी भरकम ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की आवश्यकता पडी?

उत्तर — ऐसा नहीं है.  वास्तव में हमारे मैक्रो-इकॉनॉमिक सूचक काफी अच्छे थे.  पर असल मुद्दा है,  इससे हासिल क्या हुआ?  प्रधानमंत्री के अनुसार, यहां दो उद्देश्य हैं. पहला है आतंकियों के वित्तपोषण और नकली नोटों पर अंकुश लगाना और दूसरा यह कि काले धन की अर्थव्यवस्था, जो बहुत बडी हो चुकी है, गरीबी और सारी समस्याओं की जड है, उससे छुटकारा पाना. सवाल है – क्या विमुद्रीकरण इन दोनों समस्याओं से निजात दिलाता है?  जहां तक नकली नोटों की बात है,  वो दस लाख में केवल 400 हैं, जो नगण्य हैं. रिजर्व बैंक के अनुसार 400 करोड रूपये के नकली नोट  ही बाजार में हैं. बाजार में कूल मुद्रा है साढे सत्रह लाख करोड रूपये. य़े ऊंट के मूंह में जीरा के समान है, नगण्य है. आतंकियों को पैसे की जरूरत होती है जिसके लिए वो नकली नोट छापते हैं और इसे फैलाते हैं. पर एक बार उन्होंने पैसा किसी और को दे दिया तो ये अर्थव्यवस्था में घूमता रहता है. इस वजह से उन्हें ज्यादा से ज्यादा नकली नोट छापने होते हैं. इसे रोकने की जरूरत है. आप इसे कैसे रोकेंगे?  नोटबंदी से नहीं, क्योंकि नकली नोटों को बनाने में अन्य देशों की सरकारें भी संलिप्त हैं. वे नए किस्म के नोट की भी नकल कर सकते हैं.

प्रश्न – विगत वर्षों में भारत की विकास दर,  व्यापार,  सकल घरेलू उत्पाद और विदेशी मुद्रा भंडार अमूमन अच्छे रहे हैं. फिर इस फलदायी व्यवस्था में छेडछाड क्यों?

उत्तर — ये पूरी तरह एक गलत आकलन है कि आप इस उपाय से काले धन की अर्थव्यवस्था से निजात पा लेंगे. इसका मतलब समझिए.  आप कमाते हैं जिसमें से आप बचाते हैं और संपत्ति अर्जित करते हैं. आपकी आय जितनी भी हो आप उसका एक हिस्सा खर्च करते हैं और कुछ बचा लेते हैं और वो बचत आप कई तरह की संपत्तियों में निवेश करते हैं. इससे आपका धन बनता है. धन को कई तरह से रखा जाता है. आप इसे मकान, जमीन, सोना, शेयर बाजार या नकदी में रख सकते हैं. नकदी तो आपके धन का एक हिस्सा होता है – संभवत: आपके पूरे धन का मात्र एक प्रतिशत. काले धन की अर्थव्यवस्था मेरे हिसाब से जीडीपी का 62% है. फिलहाल 150 लाख करोड की जीडीपी में हम हर साल 93 लाख करोड की काली कमाई पैदा कर देते हैं. काला धन इसका तीन गुना,  लगभग 300 लाख करोड हो सकता है जिसमें से 3 लाख करोड रूपये नकदी के रूप में है जिसे हम काला पैसा कहते हैं.

प्रश्न – तो क्या काला धन और काली कमाई में फर्क है?

उत्तर – हां, काली कमाई, काली मुद्रा और काला धन, तीनों ही अलग हैं. अक्सर लोग भूल कर बैठते हैं. उन्हें लगता है तीनों एक ही हैं. काली मुद्रा देश में काले धन की मात्र एक प्रतिशत है. मान लेते हैं आप तीन लाख करोड रूपये अलग करने में पूरी तरह सफल हो जाते हैं तो भी आप केवल 1% ही अलग कर रहे हैं.

अगला मुद्दा है क्या आप तीन लाख करोड रूपये अलग कर पाएंगे?  लोगों ने इसे सफेद करने के तरीके खोज लिए हैं. जिस दिन ये घोषणा हुई, खबर आई कि तीन बजे रात तक ज्वेलरी की दूकानें खुली थीं. वे पुरानी तारीखों की रसीदें देकर सोने की बिक्री दिखा रहे थे. एक व्यापारी ने कहा,  उसके पास 20 करोड रूपये थे और उसने अपने कर्मचारियों के चार महिनों की पगार पहले ही दे दी. वे इसे बैंक में जमा करेंगे.  इस तरह उनकी काली मुद्रा का उपयोग हो गया. इसके बाद ग्रामीण इलाकों में जनधन योजना के बैंक खातों में बडे पैमाने पर काली मुद्रा जमा की जा रही है. एक जमींदार 100 लोगों को 20,000 लेकर बैंक में जमा करने को कह सकता है तो आप यहां तक कि तीन लाख करोड का भी विमुद्रीकरण नहीं कर पाएंगे. ज्यादा से ज्यादा 50,000 से 70,000 करोड रूपये ही चलन से निकाल सकते हैं. इस तरह दोनों ही उद्देश्य, जिनका प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया है,  पूरे नहीं होंगे.

और तो और, आप मूश्किल से एक साल के लिए तीन लाख करोड रूपये की मुद्रा पर चोट कर सकते हैं पर काली कमाई पहले की तरह ही जारी रहेगी जैसे नकली दवा बनाकर,  नशीली चीजें बेचकर, कैपिटेशन फीस वसूलकर, खरीद-बिक्री के गलत रसीद दिखाकर इत्यादि. इस तरह नकदी यहां फिर से पैदा हो जाएगी. और आप दो हजार के नोट ला रहे हैं जिससे काली मुद्रा को रखना और आसान होगा. ऐसे तो आप अपने ही तर्क को कमजोर कर रहे हैं कि बडे नोट काले धन को जमा करने में सुविधाजनक होते हैं इसलिए इन्हें हटाने की जरूरत है.

प्रश्न – हम सभी जानते हैं कि भारत में विशाल और निरंतर बढती एक समानांतर अर्थव्यवस्था है. बहुत चालाकी के साथ,  यह समानांतर अर्थव्यवस्था पूरी तरह नकदी पर चलती रहती है. यह रोजगार, उपभोक्ता मांग, ग्रामीण कर्ज़, अनौपचारिक बैंकिंग और मुद्रा प्रवाह को सफलता से चलाते रही है. विमुद्रीकरण इन क्रियाकलापों पर कैसे चोट करेगा?  इसे रॉबिनहुड की तरह के उपाय के रूप में पेश किया जा रहा है – अमीरों से लूटकर गरीबों को देना. इस तरह का राजनीतिक संदेश दिया जा रहा है. क्या यह एक गरीब-हितैषी-प्रयास है?

उत्तर — नहीं.  मूल रूप से ये समानांतर अर्थव्यवस्था नहीं है. भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था और सफेद धन की अर्थव्यवस्था,  दोनों ही बडे पैमाने पर एक दूसरे के साथ गुंथे हुए हैं. इसलिए जब आप अपनी जमीन या मकान बेचते हैं तो आप एक ही साथ काली और सफेद कमाई करते हैं. जब आप चीनी का उत्पादन करते हैं, तब आप उत्पादन का 90% ही दिखाते हैं और 10% नहीं दिखाते. इस वजह से जब अवैध धन की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है तब वैध धन की अर्थव्यवस्था भी साथ ही प्रभावित होती है. यह प्रयास जो अवैध की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए लाया गया है, वह सफेद धन की अर्थव्यवस्था को भयंकर रूप से प्रभावित कर रहा है. मांग घटती चली जा रही है.  जैसा कि किसी ने अच्छा दृष्टांत दिया है, अगर आप किसी के शरीर में से 85% खून ले लें फिर 5% डाल दें,  तो उस व्यक्ति के शरीर का क्या होगा?  वो मर जाएगा. इसी तरह से, जब आप 85% मुद्रा अर्थव्यवस्था से निकाल लेते हैं और इसके बदले धीरे धीरे 5% डालते हैं तब मुद्रा  प्रवाह कम हो जाता है. दूकानों में ग्राहक घट गए हैं. मोबाइलों की रिजार्जिंग घट गई हैं. गुब्बारे वाला के गुब्बारे नहीं बिक रहे. छोटे व्यापारी अपने माल नहीं बेच पा रहे. यहां तक कि बडे व्यापारी भी अपने माल नहीं बेच पा रहे क्योंकि मनमाफिक खर्च कम हो गया है. उदाहरण के लिए, एक कमीज़ खरीदने को मैं अगले महिने तक टाल देता हूं तो आय की कमी मांग को घटा रही है. जब मांग कम पड जाती है, उत्पादन घट जाता है. रोजगार कम हो जाते हैं और निवेश गिर जाता है. तो इसके दीर्घगामी दुष्प्रभाव होते हैं. अगर ऐसा एक या दो महिने जारी रहता है तो निवेश गिर जाएगा और साल भर से ज्यादा का वक्त तक इसका असर बना रहेगा. नकद की किल्लत को तुरंत दूर नहीं किया जा सकता. इससे मांग 50 दिनों से ज्यादा वक्त तक प्रभावित होगी.

आपको 14.5 लाख करोड रूपये के 500 और 1000 के नोट बदलने हैं जिसे आपने 15 सालों या उससे भी ज्यादा वक्त में छापा था. पर आपको बदलना है तुरंत. ये संभव नहीं है क्योंकि आपको कागज और स्याही की जरूरत है जो ज्यादातर आयात किये जाते हैं. और स्याही की आपूर्ति का अभाव है, जिसके चलते उन्होंने कुछ दिनों पहले निविदा जारी की.  बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार,  कागज और स्याही की कमी ना भी होने पर नोट छापने में 108 दिन लगेंगे और अगर आप 100 का नोट छाप रहे हैं तो 1000 के नोट की अपेक्षा 10 गुना ज्यादा वक्त की आपको जरूरत है और इसे होने में बहुत लंबा वक्त लगेगा.

दूसरी बात है,  लोग नोटों को जमा कर रहे हैं क्योंकि वे आश्वस्त नहीं है कि कब आपूर्ति सामान्य होगी. इसकी वजह से, नोटों की मांग ड्योढी हो जाएगी. जो लोग सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना करेंगे, वे असंगठित क्षेत्र के हैं, जिनके पास ना तो क्रेडिट कार्ड, ना डेबिट कार्ड और ना कार्ड रीडर है. ये वही लोग हैं जिन्हें नोटो की सबसे ज्यादा जरूरत है. पूरी कृषि असंगठित क्षेत्र है. ये क्षेत्र कारखाना उत्पादन और सेवा का भी महत्वपूर्ण सप्लायर और ग्राहक है.

प्रश्न – क्या ऐसा कोई खतरा है कि लोगों का एक बडा हिस्सा आर्थिक रूप से अशक्त हो जाएगा?

उत्तर – यही तो हो रहा है. जिससे गुब्बारे वाले की आय तेजी से गिर गयी है.  एक भिखारन ने बताया कि लोग अब भीख नहीं दे रहे और उसके चार छोटे छोटे बच्चे थे, जिनमे से एक खाने की कमी से मर गया. जिन लोगों का 500-1000 के नोटों से कोई वास्ता नहीं था, वे भी प्रभावित हो रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में किसान बीज और खाद खरीदने में सक्षम नहीं हैं. अढतिया के पास कर्ज देने को पैसे नहीं हैं. इसके चलते अगले साल की बुआई भी प्रभावित हो सकती है. आप पैसा तो नहीं खाते. पैसे से आप खाना, कपडा और सेवा खरीद सकते हैं. इसलिए पैसा प्रवाह में हो. ये शरीर में रक्त के प्रवाह की तरह है, जिसके वजह से सब कुछ चलता है. अगर इसकी कमी होती है, तो समस्या होगी.

प्रश्न – इस समय हमें असुविधा हो रही है. वास्तविक दिक्कतें कब शुरू होंगी?  आप क्या सोचते हैं?

उत्तर – वास्तविक तकलीफ तो गरीबों के लिए जारी है ही. मध्य वर्ग के लिए वास्तविक तकलीफ कम है क्योंकि हम क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते हैं. ये शुरू तब होगी जब हमारी आय प्रभावित होगी. जब उत्पादन कम होगा तब मध्य वर्ग छंटनी का सामना करेगा. ट्रकवाले हडताल पर चले जाएंगे, जो कि एक संभावना है. अगर सरकार ने ठीक से तैयारियां की होती और नोटों के प्रवाह के प्रबंध किए होते तो संभवत: ये तकलीफ कम हो गयी होती.

प्रश्न – क्या नकद की पुरानी व्यवस्था को चलने देना एक विकल्प था?

उत्तर – ऐसा कदम काले धन की अर्थव्यवस्था को खत्म नहीं करता बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या खडी कर देता है. बात ये है कि काले धन की अर्थव्यवस्था कल से नहीं शुरू हुई,  ये जारी है 70 सालों से. तो इस समस्या को रातोंरात ठीक भी नहीं किया जा सकता. कोई जादु की छडी नहीं है. आप जो कर सकते थे वो ये कि व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति करते, काले धन से निपटने के उपायों में, व्यापारियों,  नेताओं, नौकरशाहों, पुलिस और न्यायपालिका जो जवाबदेह नहीं है, तो जवाबदेही लाएंगे कैसे?  ये एक कुञ्जी है. अगर आप इन सबके बीच जवाबदेही ला सकते हैं तो आप काले धन की समस्या को हल कर सकते हैं. इसलिए राजनीतिक दलों का सूचना का अधिकार के तहत आना जरूरी है. पर वे इसके लिए तैयार नहीं हैं. भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोग (व्हिसलब्लोअर) बहुत महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि यही वे लोग हैं जो व्यापमं या आदर्श जैसे घोटाले सामने लाते हैं. पर व्हिसलब्लोअर बिल को सशक्त करने के बदले इसे कमजोर किया जा रहा है. दूसरी बात,  हम प्रत्यक्ष कर के सरलीकरण के लिए बहुत कुछ नहीं कर रहे. माल एवं सेवा कर (जीएसटी) है, पर ज्यादा महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष कर नियमावली विधेयक है. आप को प्रत्यक्ष कर को सरलीकृत करना बाक़ी है. खुफिया एजेंसियां हवाला पहचानती हैं पर आप उसके ऊपर कुछ नहीं करते. तो ऐसी कई चीजें हैं जो आप तुरंत कर सकते हैं क्योंकि आपके पास नियम मौजूद हैं. इससे पता चलता है कि नीयत ठीक नहीं है. अगर  आपने इन कानूनों का सहारा लिया होता, तो काली कमाई ना करने वाले उन 97% लोगों पर बिना प्रतिकूल प्रभाव डाले आप काले धन में लगे 3% लोगों पर निशाना साध सकते थे. वास्तव में, 97% लोग काले धन की अर्थव्यवस्था के कारण पहले से ही पीडित हैं और अब उन पर दूसरे बोझ भी लाद दिए गए हैं – बिना काले धन की समस्या का हल निकाले.

प्रश्न – उनके लिए आपने सुगम तरीका नहीं दिया है जो अनजाने में काले धन की अर्थव्यवस्था के अंग हो गए हैं?

उत्तर – नहीं. आय घोषणा योजना 30 सितंबर तक की थी जिसमें आप 15% जुर्माने के साथ काले धन की घोषणा कर सकते थे. वित्त मंत्री ने कहा,” कृपया साफ होकर आयें तभी आप चैन से सो पायेंगे” (प्लीज़ कम क्लीन देन यू कैन स्लीप इन पीस).  पर जब आप कहते हैं कि हम भ्रष्ट व्यापारी के खिलाफ कदम नहीं उठायेंगे तब तक वे खुश हैं. तो जहां माफी दी गयी वहां फायदा नहीं हुआ. स्वैच्छिक घोषणा योजना (वी डी एस ) भारत में छ: बार लागू की गयी है.  सरकार ने 1997 में उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दिया कि हम कभी इस तरह की योजना नहीं लाएंगे. कारण रहा कि ये ईमानदार लोगों के साथ अन्याय था. ईमानदार व्यापार की पूंजी धीरे धीरे बढ रही है क्योंकि वो पूरा कर दे रहा है. बेइमान व्यापारी की पूंजी तेजी से बढ रही है.  इसलिए ईमानदार कहता है मुझे भी बेइमान होने दो. स्वैच्छिक घोषणा योजना पर 1997 में कैग ने दो चीजें बतायीं. लोग अभ्यस्त कर अपराधी हो गये हैं. जिन लोगों ने पिछली पांच योजनाओं में घोषित की, उन्होंने ही छठी योजना में भी घोषित की. उन्होंने सोचा कि दूसरी योजना आ जाएगी, थोडा और पैसा कमा लें. इस तरह 1997 के बाद उन्होंने स्वैच्छिक घोषणा की ही नहीं, जबकि 2016 की आय  घोषणा योजना भी स्वैच्छिक घोषणा योजना की ही तरह थी. मॉरीशस का रास्ता भी स्वैच्छिक घोषणा योजना की तरह है. आप पैसा बाहर भेजते हैं, वापस घूमा कर ले आते हैं और इस तरह आप कर नहीं देते. हमारे पास अद्भूत कानून हैं पर हम उन्हें लागू नहीं करते.  इन कानूनों को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए.

दूसरी बात,  नकद का अर्थ अनिवार्यत: काला पैसा नहीं होता. तो, 17.5 लाख करोड रूपये में से 14.5 लाख करोड रूपये 500-1000 के नोटों में है. इसमें से 50% व्यापार में लगा होगा. अगर आप पेट्रोल पम्प जाते हैं, तो दिन के अंत में कैशियर के पास नोटों का बंडल देखते हैं. रेलवे, एयरपोर्ट – हर जगह जरूरत है. कंपनियों के पास थोडा ही काला-नकद है. ज्यादातर नकद सफेद है. जिसे अर्थव्यवस्था को प्रवाह में बनाए रखने में उपयोग किया जाता है. घरेलू तौर पर, एक साधारण चपरासी की 10,000-20,000 की काली कमाई काले धन की अर्थव्यवस्था के सामने कुछ भी नहीं है. एक मधु कोडा की काली कमाई पूरे तृतीय और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों की काली कमाई से ज्यादा है. ये भ्रांति है कि काला धन मतलब नकदी है. इसी जगह मोदी की समझ में कमी है. उन्होने सोचा कि अगर वो नकदी पर चोट करेंगे तो काले धन की अर्थव्यवस्था भरभरा जाएगी.

प्रश्न – ये तो स्वार्थ-निहित राजनीतिक आदर्श की तरह लगता है.

उत्तर – राजनीतिक स्वार्थ यह है की मैं गरीबों का नायक हो जाऊं. कि मैंने काले धन की अर्थव्यवस्था तोड दी, जो गरीबों को प्रभावित कर रही थी. अगर दो लाख करोड वापस  आये तो वे
ये कहेंगे कि मैं दस करोड परिवारों को 20,000-20,000 रू दे रहा हूं. इन अमीर लोगों ने ये पैसा चुरा लिया था इसलिए मैंने उनसे वापस ले लिया है और गरीबों में बांट दिया है. पर इन कारणों से ये बेअसर रहेगा कि जब एकबार में गरीब 20,000 रू ले रहे होंगे,  तो अगर इनकी नौकरी ही चली जाएगी तो ये आगे के सालों में काफी ज्यादा खो देंगे.

प्रश्न – तो आप कह रहे हैं कि ये बहुत ही आधारभूत संरचनात्मक सुधार है, जिसका मतलब क्रमिक सुधारवाद है? जैसे चंद्रशेखर को सोना गिरवी रखना पडा था, क्योंकि उस वक्त संकट की स्थिति थी? कुछ हद तक 1972 के  संकट जैसा, जब इंदिरा गांधी ने गेंहूं पर नियंत्रण के आदेश जारी किए थे?

प्रश्न – पर बात ये है कि ये उपाय संकट के दौड़ में किए गए थे. इससे तो हरेक चीज पर असर हो रहा है.

प्रश्न – तो ये लाख टके की राजनीतिक भूल है ?

उत्तर — व्यापारी वर्ग उनका समर्थन छोड देगा क्योंकि व्यापारी बहुत परेशान है, किसान परेशान है, कर्मचारी परेशान है. वो ये करेंगे कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में नकद की आपूर्ति कर देंगे और राष्ट्रीय मीडिया कहेगी कि लाइनें कम हो रही हैं. पर गांवों में नकद कम रह जाएंगे.  उन्हें बैंक में पैसे लेने के लिए लंबी दूरियां तय करनी होती है और कई बार खाली हाथ लौटना पडता है.  टियर -2 और टियर-3 के शहरों में बहुत कम पैसे हैं.

प्रश्न – अब ये लॉकरों तक भी जा सकते हैं?

उत्तर –  नहीं, इससे केवल मध्यम वर्ग ही प्रभावित होता है. गरीब लॉकरों का उपयोग नहीं करते.

प्रश्न – मगर राजनीतिक दलों को उन 3% से ही पैसा मिलता है.

उत्तर — पर अगर आपमें वो करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति है तो ये करने की भी राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए. जैसे यूपी के एक नेता को चंदा देने वालों से कहते पाया गया कि पुराना नोट दे जाएं और नया नोट ले जाएं. तो राजनीतिक दल के चंदे नहीं रूकेंगे. अब 2000 के नोटों से और आसानी हो जाएगी. उन्हें कुछ नहीं होगा.  आज मैं एक कमिश्नर से बात कर रहा था, जिन्होंने बताया कि हम उन मामलों को हाथ नहीं लगाते जिनके पीछे राजनैतिक ताकतें हों. वैसे आय कर विभाग के पास इतनी तहकीकात करने की शक्ति भी नहीं है.

प्रश्न – ये केवल एक आदमी के दिमाग की उपज है?

उत्तर –उन्होंने किसी से भी विमर्श नहीं किया.  अपनी बातों में उन्होंने कहा कि सरकार के विभाग और बैंक इस बारे में पहली बार सुन रहे हैं.

प्रश्न – हमें संविधान की धारा 21 देखना चाहिए.  संविधान संपत्ति का अधिकार देता है. आपकी जीविका एक मौलिक अधिकार है.

उत्तर — वे यह नहीं कर रहे. वे पुराने नोटों को नये नोटों से बदल रहे हैं. वो आपको आपकी संपत्ति से बेदखल नहीं कर रहे.

प्रश्न -पर वे जीने के साधन लूट रहे हैं.

उत्तर — ये इस कदम का परिणाम है. जहां तक संपत्ति की बात है, वो आपकी संपत्ति नहीं लूट रहे. “मैं भुगतान का वादा करता हूं” ( आई प्रॉमिस टू पे), ये कहना एक कानूनी निविदा है. सरकार समान मूल्यों के नये नोट छाप रही है. पर इससे मंदी आती है. यह एक मूर्खतापूर्ण कदम है. किसी भी नीति के गलत दिशा में जाने की संभावना होती है.

प्रश्न – क्या इस प्रक्रिया के लिए उच्चतम न्यायालय दोषवार भी ठहरा सकता है?

उत्तर — उच्चतम न्यायालय एक जिम्मेवार संस्था है. ये कोई भी बात मौखिक रूप से कह सकता है,  डांट सकता है, पर जब फैसला आता है तो ये सतर्क हो जाते हैं. जनहित याचिकायें  दायर भी की गई हैं, और सरकार इन्हें उच्चतम न्यायालय में इकट्ठा चाहती है. और न्यायालय ने अभी तक इससे इंकार  किया है. पर अंतत: ये हो सकता है कि न्यायालय ये कहे कि ये तो नीतिगत मामला है. हम इसमें कुछ नहीं कर सकते.

प्रश्न – एक आदमी वो करने की कोशिश कर रहा है जो किया नहीं जा सकता, बिना किसी सलाह के?

उत्तर – इस तरह भारत जैसे जटिल देश को नहीं चलाया जाता.  अगर मैं उस जगह पर होता तो मैं 100 लोगों से पूछता. वे अपनी कैबिनेट में किसी पर भरोसा नहीं करते और उनके मोबाइल रखवा लेते हैं. रात 8 बजे तक उन्हें एक हॉल में रखा जाता है. उर्जित पटेल ने सभी बैंकोंवालों को बुलाया और उन्हें एक महत्त्वपूर्ण घोषणा पर नज़र रखने को कह दिया. ये, भारत जैसे जटिल देश में इस तरह की जटिल नीति लाने का तरीका बिल्कूल नहीं है

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