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Archive for the ‘विस्थापन’ Category

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

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बहुत पुराने समय से जमीन झगड़ों और संघर्षों का केन्द्र रही है। महाभारत का युद्ध इसी को लेकर लड़ा गया था। औद्योगीकरण और आधुनिक विकास के साथ खेती व जमीन का महत्व कम होता जाएगा, ऐसा माना गया था। किन्तु इक्कीसवीं सदी के भारत में अचानक जमीन को लेकर नए तरह के संघर्ष खड़ें हो गए हैं। इस बार ये संघर्ष भाई-भाई या पड़ोसियों के बीच न होकर किसानों, कंपनियों और सरकारों के बीच छिड़ें है।
महज नौ महीनों के अंदर यमुना एक्सप्रेस-वे परियोजना दूसरी बार किसानों और पुलिस जवानों के खून से सरोबार हुर्द है। सरकार और मीडिया इसे ‘विकास परियोजना’ कह रहे हैं। लेकिन यह सवाल कम ही उठाया जाता है कि यह कैसा विकास है और किसका विकास है ?
एक्सप्रेस-वे की जरुरत किस लिए पड़ी ? इसलिए कि सड़कों पर अचानक गाडि़यों की तादाद बहुत बढ़ गई है। इन गाडि़यों में सबसे ज्यादा संख्या निजी कारों की है। निजी कारों के ये मालिक टैफिक जाम में नहीं फंसना चाहते हैं और हवा में बाते करते हुए जल्दी अपने गंतव्य पर पहुंचना चाहते हैं। इसके लिए टोल-शुल्क के रुप में अतिरिक्त पैसा देने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। तो इन्हीं अमीरजादों के ऐशो-आराम के लिए किसानों की जमीन छीनी जा रही है और गोलियां चलाई जा रही है।
किन्तु इस परियोजना को महज सड़क बनाने की योजना समझना गलत होगा। यह जितनी सड़क परियोजना है, उतनी ही जायदाद-कालोनी-टाउनशिप योजना भी है। इस परियोजना की ठेकेदार-मालिक जे पी कंपनी को इसके किनारे कई कालोनियां, मॉल, व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स आदि बनाने के लिए भी बड़ी मात्रा में जमीन दी जा रही है। इसीलिए जमीन अधिग्रहण की मात्रा काफी बढ़ गई है। जेपी समूह ने ‘जेपी ग्रीन्स केसिले’ ‘जेपी ग्रीन्स स्पोर्ट सिटी’ आदि के पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन निकालना शुरु कर दिया है। उसकी असली और विशाल कमाई इसी में है। जब कंपनियों के मुनाफे का मेल संवेदनशून्य प्रशासन तथा दिवालिया राजनीति से हो जाता है, जो जनता पर जुल्म बेइंतहा हो जाते हैं – इसकी एक मिसाल यहां देखने को मिल रही है।
भट्टा परसौल की खूनी वारदात के बाद ज्यादातर राजनैतिक दलों ने भूमि अधिग्रहण कानून की समीक्षा और इसके संशोधन की मांग की है। निश्चित ही यह कानून अंग्रेजी राज द्वारा साम्राज्य के हितों व जरुरतों के लिए बनाया गया था और कई अन्य कानूनों की तरह इसे भी आजाद भारत में जारी रखा गया है, क्यांेकि आजाद भारत का राज भी उसी तर्ज पर चल रहा है। किन्तु मसला महज एक कानूनी संशोधन से हल नहीं होने वाला है जब तक हम इस बात पर गौर नहीं करते कि इतने बड़े पैमाने पर भूमि के अधिग्रहण की जरुरत क्यों पड़ रही है ?
वैश्वीकरण के इस दौर में जैसे-जैसे भारत की राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर का ग्राफ बढ़ा है, वैसे-वैसे जमीन अधिग्रहण और जमीन संघर्षों की बाढ़ आ गई है। दोनों का सीधा संबंध है । औद्योगिक परियोजनाओं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों यानी सेज, बड़े बांधों, खदानों, राजमार्गों व एक्सप्रेस मार्गों, शहरी विस्तार तथा टाउनशिप परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में जमीन ली जाने लगी है। सरदार सरोवर, नन्दीग्राम, सिंगूर, कलिंगनगर, काशीपुर, पोस्को, नियमगिरी, दादरी, पेन, जैतापुर, टिहरी, श्रीककुलम जैसे लगातार सुर्खियों में रहने वाले विवादों और संघर्षों के केन्द्र में जमीन ही है। बस्तर और दंतेवाड़ा के माओवादी उभार के पीछे भी कुछ हद तक टाटा व एस्सार की खनन-औद्योगिक परियोजनाओं तथा इन्द्रावती बोधघाट बांध परियोजना में जाने वाली जमीन का सवाल है। हाल ही में झारखण्ड मंे सरकारी जमीन अतिक्रमण को हटाने को लेकर रांची, बोकारो और धनबाद में बड़े टकराव हुए हैं तथा लोगों की जान गई है। गरीबों को उजाड़ना तथा कंपनियों व अमीरों को जमीन आबंटन, नए जमाने का यह नियम बन गया है। देश में आजादी के बाद जमींदारी प्रथा खतम हुई तो अब जेपी, रिलायन्स, डीएलएफ, टाटा जैसे नए जमींदार बन गए हैं।
सीधे सरकार तंत्र के दम पर ली जा रही जमीन के अलावा बाजार के जरिये भी बड़े पैमाने पर जमीन का हस्तांतरण हो रहा है, आम तौर पर जिसकी चर्चा नहंी होती है। खेती के लगातार घाटे का धंधा बने रहने के कारण कई जगह स्वयं स्वेच्छा से या मजबूरी में किसान जमीन बेच रहे हैं। अमीरों के दो नंबरी धन को छिपाने और निवेश करने के लिए भी जमीन और फ्लेट अच्छा माध्यम है। खेती पर आयकर न लगने के कारण  जमीन खरीदकर दूसरी आय को खेती की बताकर आयकर बचाने का भी यह अच्छा जरिया है। जमीन की एक कृत्रिम मांग पैदा हो गई है। इसीलिए यह विरोधाभासी हालत पैदा हो गई है, कि खेती में घाटा होने तथा किसानों की बड़ी संख्या में खुदकुशी के बावजूद जमीन के दाम तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। उधर ‘रियल्टी सेक्टर’ बढ़ता जा रहा है और राष्ट्रीय आय की वृद्धि में योगदान दे रहा है।
दरअसल, हमारे नेता, योजनाकार व कर्णधार एक सीधा-सरल सत्य भूल गए हैं। वह यह कि जमीन की आपूर्ति सीमित है। जमीन को बढ़ाया नहीं जा सकता (जब तक कि हम किसी नए ग्रह को बसने लायक न पा लें), जमीन का उत्पादन किसी कारखानें में नहीं हो सकता। हम यह भी भूल गए कि यदि इतने बड़े पैमाने पर जमीन खेती से निकल जाएगी, तो हमारी बढ़ती हुई आबादी का पेट कैसे भरेगा ? विज्ञान व तकनालाजी की चमत्कारिक प्रगति के बावजूद अभी तक ऐसा कोई तरीका इजाद नहीं हुआ है, जिससे बिना खेती के खाद्यानों का उत्पादन कारखानों मंे होने लगे। भारत में 1990-91 और 2007-08 के बीच खेती के रकबे में 21.4 लाख हेक्टेयर की कमी हुई है।
हमारे विकासवादी कर्णधारों ने यह भी सोचने की जरुरत नहीं समझी कि खेती से बेदखल होकर यह विशाल आबादी कहां जाएगी, क्या करेगी ? क्या महानगरों की झुग्गियों-झोपड़पट्टियों की संख्या नहीं बढ़ाएगी ? जमीन के मुआवजे से बस या जीप खरीदकर या दुकान खोलकर कितने लोगों की जीविका चल पाएगी ? नौकरियां अब कहां मिलती हैं ? मशीनों व हाईटेक पर आधारित आधुनिक विकास तो वैसे भी ‘रोजगारहीन विकास’ है।
जमीन के इस संकट के पीछे आधुनिक सभ्यता की एक बुनियादी गलतफहमी है। वह यह कि आधुनिक विकास अंतहीन, असीम हो सकता है और इसके लिए महज पूंजी व तकनालाजी की जरुरत है। यदि देश के अंदर ये दोनों उपलब्ध नहीं होंगे तो विश्व बैंक की मदद से, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को न्यौता देकर, उन्हें हासिल कर लिया जाएगा। लेकिन इस विकास के लिए जल-जंगल-जमीन-खनिज की भी बड़े पैमाने पर जरुरत होगी, उनकी भी बलि चढ़ानी होगी और विकास के रास्ते में उनका स्पीडब्रेकर आ जाएगा या बड़ी दीवार आ जाएगी, यह अहसास धीरे-धीरे अब दर्दीले एवं खूनी तरीके से हो रहा है। जमीन की ही तरह पानी को लेकर भी कई जगह द्वन्द्व पैदा हो गए हैं। हर नदी और हर जलाशय का पानी किसानों को मिले, आबादी को पीने का पानी मिले या कंपनियों व कारखानों को मिले, यह झगड़ा हर जगह पैदा हो रहा है। यहीं टकराव जंगलों के बारे मंे भी है। जंगलों के विनाश के कारण आदिवासी या स्थानीय आबादी नहीं, आधुनिक विकास है, जो उन्हें लीलता जा रहा है।
ऐसा भी नहीं है कि आधुनिक पूंजीवादी औद्योगिक विकास में यह द्वन्द्व नया पैदा हुआा हो। सोलहवीं से अठारहवीं सदी तक औद्योगिक क्रांति की तैयारी में इंग्लैण्ड में भी बड़े पैमाने पर किसानों को बेदखल किया गया था। मार्क्स ने इसे ‘पूंजी का आदिम संचय’ नाम दिया था। किन्तु यह आदिम संचय अभी तक लगातार किसी न किसी रूपमें चल रहा है और पूंजीवादी विकास का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है। बीच में यह ओझल इसलिए हो गया, क्योंकि यूरोपीय लोगों को पूरी दुनिया को अपना उपनिवेश बनाकर लूटने का मौका मिल गया। वे पूरी दुनिया में फैल गए और उनकी रोजगार की समस्या का हल इसी तरह हुआ। उत्तरी व दक्षिणी अमरीका, आस्ट्रेलिया, एशिया व अफ्रीका में वहां के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने, नष्ट करने तथा वहां के लोगों को बेदखल करेन की लगातार प्रक्रिया के दम पर ही यूरोप-सं.रा.अमरीका-कनाडा-जापान का पूंजीवादी विकास संभव हो पाया। अब भारत व चीन जैसे देश उसी रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, तो देश के अंदर उसी साम्राज्यवादी-औपनिवेशिक प्रक्रिया को चला रहे हैं। किन्तु इसमें भी एक बड़ा ऐतिहासिक फर्क है। आज इन देशों में आबादी का घनत्व काफी है। इसलिए जमीन का थोड़ा भी फेरबदल यहां लोगों की जिंदगियों में बड़ा व्यवधान और संकट पैदा करता है।
आधुनिक पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता श्रम और प्राकृतिक संसाधनों दोनों के शोषण व विनाश पर आधारित है। प्रकृति से जुड़े समुदायों की बेदखली तथा बरबादी इसमें अंतर्नीहित है, अवश्यंभावी है। यही भट्टा परसौल जैसी घटनाओं का सच है। यदि इसे नहीं समझेंगे और आधुनिक विकास के विकल्प की तलाश करने के बजाय इसी की मृगतृष्णा में उलझे रहेंगे, तो ऐसी त्रासदियां बार-बार दुहराई जाती रहेंगी।

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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं आर्थिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणीकार है।)
कृपया आलेख प्रकाशित होने पर कतरन एवं पारिश्रमिक निम्न पते पर भेजें –
– सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111
मोबाईल 09425040452

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पिछला हिस्सा

इन छोटे-छोटे जनांदोलनों की जो कमी या विफलता है, वह यह है कि वे मिलकर व्यवस्था-परिवर्तन की कोई बड़ी धारा नहीं बना पा रहे हैं। एक-एक मुद्दे वाले इन आंदोलनों में कई बार वैचारिक-राजनैतिक दृष्टि का अभाव रहता है। इसीलिए वे कोई बड़ी शक्ल नहीं ले पा रहे हैं और कोई निरंतरता भी उनमें नहीं दिखाई देती है। उनके नेतृत्व की व्यक्तिवादिता तथा एनजीओ की भारी घुसपैठ भी दो बड़ी बाधाएं हैं। वास्तव में यह एक बड़ी चुनौती है। इन छोटे-छोटे जनांदोलनों में भी एक समय के बाद ठहराव आ जाता है। उनकी ऊर्जा को समेटते हुए, एक वैचारिक प्रक्रिया चलाते हुए, राजनैतिक दिशा देते हुए, एक देशव्यापी परिवर्तनवादी आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है।

माओ

पिछले महीने , २७-२८ मार्च को इलाहाबाद में देश के जनांदोलनों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े करीब एक सौ लोगों की बैठक इसी मकसद से हुई थी । इसका कोई ठोस नतीजा निकलेगा या नहीं,इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है । लेकिन इतना तय है कि अब छोटे ,एक-लक्ष्यी आंदोलनों से काम नहीं चलेगा । देश को बचाने के लिए परिवर्तन की धारा बहे , यह वक्त की पुकार है । आज के हालात १९७३ -७४ से ज्यादा अलग नहीं हैं ।

माओवादियों की विकास नीति क्या है ?

माओवादियों के रास्ते के बारे में भी कई सवाल स्वयं अरुंधती राय के वृतांत को पढ़ते हुए खड़े होते हैं। एक तो किस तरह का बर्बरीकरण सरल आदिवासी समाजों का हो रहा है, जब 17 साल की लड़की कमला कहती है कि उसे कोई और फिल्म अच्छी नहीं लगती ? वह सिर्फ एम्बुश (घात लगाकर हमला) वीडियो देखती है, जिनमें मानव शरीरों के परखच्चे उड़ जाते हैं। या फिर वह मां, जिसके बेटे को पुलिस ने मार दिया और लाश भी नहीं दी। वह कहती है कि वह खून का बदला खून से लेगी। या माओवादियों द्वारा विरोधी खेमे के आदिवासियों की सामूहिक हत्या। या किसी पुलिस के सिपाही का सिर धड़ से अलग कर देना। जब हम अदालतों द्वारा दी गई फांसी और मृत्युदंड को भी गलत मानते हैं और उनके विरुद्ध अभियान चलाए जाते हैं तब क्या इस तरह की हत्याएं उचित ठहराई जा सकती हैं ? हरियाणा की खाप पंचायतें और तालिबानी जन अदालतें हमें भयानक लगती हैं तब क्या गारंटी है कि माओवादी जन-अदालतों एवं बंदूकों की ताकत का दुरुपयोग नहीं होगा ?

अंतहीन हिंसा के इस दुष्चक्र में आखिरकार कौन मारे जा रहे हैं ? क्या गरीब आदिवासी या पुलिस व अर्ध फौजी बलों के सिपाही नहीं ? नारायणपुर में रहने वाले 4000 मुखबिर कौन होंगे ? क्या साधारण छोटे लोग नहीं ? सलवा जुडुम में भी तो शामिल आदिवासी लड़के ही हैं। अरुंधती को एक माओवादी आदिवासी युवक ने बताया कि उसका सगा भाई सलवा जुडुम का ’विशेष पुलिस अधिकारी’ है। वह चाहे भी  तो अब कभी लौट नहीं सकता। ऐसा कैसे हो गया कि आदिवासी एक दूसरे को मार रहे हैं ? हर समाज में कुछ गलत तत्व होते हैं, जो लालच एवं दुष्टता के शिकार हो जाते हैं। लेकिन क्या उनकी सजा मौत ही होगी ? क्या पश्चाताप सुधार या माफी की कोई गुंजाईश नहीं होगी ? यदि इस तरह की हिंसा को उचित माना जाएगा तो क्या तालिबानी आतंकवादियों को गलत कहा जा सकेगा ? अपनी समझ के मुताबिक वे भी तो एक महान और पवित्र उद्देश्य के लिए दूसरों को बम से उड़ा रहे हैं।

अरुंधती राय इन हालातों के लिए भारतीय राजसत्ता को दोषी ठहराती है। वे बहुत हद तक सही हैं। लेकिन क्या किशोरों और किशोरियों के हाथों में बंदूके थमाने वाले माओवादियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? सोच समझकर चुना गया चारु मजूमदार का ‘जन-संहार’ (एनिहिलेशन) का यह रास्ता कहां पहुंचाएगा ? क्या सचमुच इसकी राख से नया इंसानी समाज निकल पाएगा ?

माओवादी नेता किशनजी कहते हैं कि वे 2050 तक दिल्ली में अपना झंडा फहरा देंगें। इसे मान भी लिया जाए तो इसका मतलब है कि 40 साल तक हिंसा का यह भयानक दौर चलता रहेगा। इसका क्या नतीजा होगा ? क्या बाद के समाज पर भी इसकी छाया नहीं रहेगी ? अभी तक जितनी भी हिंसक क्रांतियां हुई हैं, उन्होंने तानाशाही को ही जन्म दिया है। कारण बहुत साफ है। जिनके पास बंदूक की ताकत होती है, उनको उसका नशा भी चढ़ जाता है। फिर लंबे समय तक हथियारबंद युद्ध लड़ने वाले क्रांतिकारी संगठनों का ढांचा लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। युद्ध में बहस या मतभेदों की जगह नहीं होती। वहां तो कमांडर को हुक्म मानना ही है। इसीलिए नक्सलवादियों में जरा भी मतभेद होने पर टूट हो जाती है और कल तक का साथी आज का दुश्मन नं० एक हो जाता है।

गांधी

ऐसे भूमिगत संघर्षों में असुरक्षा की भावना भी बहुत हावी रहती है। क्या मालूम कब कौन पुलिस का एजेन्ट निकल जाए ? इसलिए जिन औजारों और तरीकों से आप लड़ रहे हैं , लड़ाई का नतीजा और वैकल्पिक समाज का चरित्र भी कहीं न कहीं उनसे प्रभावित होगा । गांधी ने साधन और साध्य की सम्गति की बात अकारण या अमूर्त सिद्धान्त के तौर पर नहीं की थी । उसके पीछे मानव समाज के ठोस अनुभव थे ।

तर्क के लिए यह कहा जा सकता है कि पूंजीवादी व्यवस्था और राजसत्ता में भी बहुत हिंसा और तानाशाही छिपी है। और टूट तो गैर-हथियारबंद आंदोलनों में भी होती है। व्यक्तिवादिता, गुटबाजी और तानाशाही उनमें भी बहुत है। किन्तु दूसरों का दोष दिखानें से अपना दोष कम नहीं हो जाता। नया समाज गढ़ने की इच्छा रखने वालों को नये तरीके भी गढ़ने होंगें। खास तौर पर जब पिछली एक-डेढ़ सदी के अनुभव हमारे सामने हैं, जिनसे हम सीख सकते हैं।

हिंसा- अहिंसा की बहस अंतहीन है, क्योंकि अंत में यह मामला तर्क का नहीं, विश्वास का बन जाता है। लेकिन एक ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है विकास के मॉडल का, जो अरुंधती राय के मन में भी उठा है। जो माओवादी पार्टी आज बॉक्साईट या लौह अयस्क के खनन का विरोध कर रही है, कल उसका राज आएगा तो क्या होगा ? आधुनिक जीवन-शैली, भोगवाद, समृद्धि, आधुनिक उद्योगों, आधुनिक तकनालाजी, पर्यावरण आदि के बारे में उसके क्या विचार है ? आधुनिक विकास में तो इस तरह का खनन, विस्थापन और विनाश नीहित है।

कुछ समय पहले समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने खनन परियोजनाओं के संदर्भ में यह बात उठाई थी कि मामला सिर्फ विस्थापन और जंगलों के विनाश का नहीं है। इतना ज्यादा खनिज निकालने की जरुरत क्या है और यह किसके लिए है ? फेलिक्स और समरेन्द्र दास की ताजा किताब से और इसके पहले विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की खनन पर केन्द्रित नागरिक रपट से भी इसी तरह के सवाल निकलते हैं। इनके बारे में माओवादियों के विचार क्या है ? क्या वे आधुनिक विकास का मोह छोड़ने के लिए तैयार हैं ?

ये सवाल पूछना इसीलिए जरुरी है क्योंकि मार्क्सवादी समूहों में इन पर काफी संभ्रांति, उलझन और अस्पष्टता रही है। नेपाल के दोनों प्रमुख माओवादी नेताओं प्रचण्ड और बाबूराम भट्टराई के जो साक्षात्कार 2008 में प्रकाशित हुए, वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने कहा कि वे पनबिजली के लिए बड़े बांध बनाएंगे, पर्यटन को बढ़ावा देंगे, खेती का आधुनिकीकरण करेंगे, सरकारी-निजी भागीदारी को बढ़ावा देंगे और विदेशी पूंजी को भी आमंत्रित करेंगे। विश्व व्यापार संगठन से बाहर आने के बारे में उनका कोई फैसला नहीं है। भारत के माओवादियों के विचार भी क्या इसी तरह के हैं या इनसे अलग है? अलग हैं तो कितना ?

अरुंधती राय ने इस बात पर चुटकी ली कि कभी नक्सलवाद के प्रणेता चारु मजूमदार जो कहते थे, उस मंत्र का जाप आज नक्सलियों का दमन करने वाली भारत सरकार कर रही है – ‘चीन का रास्ता हमारा रास्ता है’। सवाल यह है कि चीन इस मुकाम पर कैसे पहुंचा ? तीसरी दुनिया के अनूठे एवं प्रेरणास्पद साम्यवादी मॉडल से वह घोर पूंजीवादी मुकाम पर कैसे पहुंच गया ? क्या इसके पीछे भी कहीं चीन के साम्यवादी शासकों के मन में आधुनिक विकास एवं समृद्धि की वही अवधारणा नहीं थी, जो पूंजीवादी औद्योगिक देशों की है ? भारतीय माओवादियों की मंजिल क्या है ? आज के चीन और उसके ‘बाजार समाजवाद’ के बारे में वे क्या सोचते हैं ? अच्छा होता यदि अरुंधती  राय इन सवालों को मन में न रखकर माओवादी नेताओं से पूछती, कुरेदती और उनके जबाब बाकी लोगों को बताती। उन पर एक बहस चल सकती थी। आखिर चीन की क्रांति भी बड़ी जबरदस्त थी, लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी थी। क्या फिर भारत में भी उतनी कुर्बानियां देकर उसी मुकाम पर पहुंचना है ?

जब दंतेवाडा का पुलिस अधीक्षक अरुंधति राय से कहता है कि अगर हर आदिवासी को एक टीवी दे दिया जाए तो उनका प्रतिरोध टूट सकता है,तो वह एक गहरी बात कह रहा है । अगर आदिवासी आज के वैश्विक बाजार , उपभोक्ता संस्कृति और उसकी ललक का हिस्सा बन गए तो उन्हें परास्त करना आसान हो जाएगा । मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम बताया था,पर समाजवादी चिंतक सच्चिदानन्द सिन्हा ने उपभोक्तावादी संस्कृति को गुलाम मानसिकता की अफ़ीम निरूपित किया है। इस तरह दंतेवाड़ा में दो अलग संस्कृतियों,सोच और जीवन मूल्यों की टकराहट भी है। आधुनिक विकास की टक्कर माओवादियों के अस्तित्व से हो रही है ।सवाल है कि माओवादियों की इस बारे में क्या दृष्टि है?

जैसे ही आधुनिक विकास पर सवाल उठते हैं, गांधी प्रासंगिक हो जाते हैं। अरुंधती राय ने माओवादियों को बंदूकधारी गांधीवादी कहा है। किन्तु गांधी के इस पक्ष हिंसा-अहिंसा पर माओवादी क्या सोचते हैं ? कोई अरुंधती को भी बता दे कि गांधी का मतलब सिर्फ भूख हड़ताल या जंगल में मजबूरी में सादगी से रहना नहीं है। न ही गांधीगिरी का मतलब महज किसी को फूल भेंट करना है। गांधी के पास एक वैकल्पिक विकास और वैकल्पिक सभ्यता की सोच है, जो समय के साथ ज्यादा जरुरी और ज्यादा प्रासंगिक होती जा रही है।

बीसवीं सदी में तीसरी दुनिया में दो बड़े क्रांतिकारी हुए है – गांधी और माओ। दोनों में कुछ समानताएं होते हुए भी दोनों की नयी दुनिया की कल्पनाएं अलग-अलग थी। माओ का रास्ता आजमाया जा चुका है। गांधी के सत्याग्रह के तरीके का उपयोग आजादी के आंदोलन में हुआ, किन्तु आजाद भारत के शासकों के विश्वासघात के कारण उनके विचारों का ‘स्वराज’ नहीं आ सका। अब दोनों विचारकों, उनकी विचारधाराओं और उनके प्रयोगों की सफलताओं – असफलताओं से सीखकर ही इक्कीसवीं सदी की क्रांति का पथ प्रशस्त हो सकेगा।

संदर्भ:

1.              अरुंधती राय, ‘वाकिंग विद द कॉमरेड्स’, आउटलुक, 29 मार्च 2010

2.              किशन पटनायक, ‘विजन्स ऑफ डेवलपमेंट: द इनएविटेबल नीड फॉर आल्टरनेटिव्ज’

फ्यूचर्स, नं. 36, 2004

3.              सुनील, ‘नेपाली माओवादियों की सीमाएं‘, जनसत्ता, 23जून, 2008

4.              सुनील, ‘लोकतंत्र और सत्याग्रह’, जनसत्ता, 2 दिसंबर, 2009

5.              फेलिक्स पैडल एवं समरेन्द्र दास, ‘आउट ऑफ दिस अर्थ: ईस्ट इंडिया                       आदिवासीज़ एंड द एल्युमिनियम कार्टेल’, 2010

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

– सुनील

ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)

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[ स्कूल के दौरान ही सुनील को गाँधीजी की आत्मकथा मिली थी और वे उससे प्रभावित हुए थे। मध्य प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में मेरिट सूची में स्थान पाने के बाद एक छोटे कस्बे से ही उन्होंने स्नातक की उपाधि ली। देश के अभिजात विश्वविद्यालय माने जाने वाले – जनेवि में दाखिला पाया । विद्यार्थी जीवन में ही लोकतांत्रिक समाजवाद में निष्ठा रखने वाले युवजनों की जमात से जुड़ गये । जलते असम और पंजाब के प्रति देश में चेतना जागृत करने के लिए साइकिल यात्रा और पदयात्रा आयोजित कीं । समता एरा और सामयिक वार्ता के सम्पादन से जुड़े रहे तथा दर्जनों पुस्तकें लिखीं और सम्पादित की। जनेवि में हरित क्रांति के प्रभावों पर पीएच.डी का काम छोड़ मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के केसला प्रखण्ड के किसान-आदिवासियों को संगठित करने में जुट गये ।गत पचीस वर्षों से उस क्षेत्र को वैकल्पिक राजनीति का सघन क्षेत्र बनाया है। दर्जनों बार जेल यात्राएं हुईं -सरकार द्वारा थोपे गये फर्जी मुकदमों के तहत । प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी के हक को लेकर सफल नये प्रयोग किए । देश में नई राजनैतिक ताकत की स्थापना के लिए समाजवादी जनपरिषद नामक दल की स्थापना करने वालों में प्रमुख रहे। माओवादी राजनीति की बाबत गंभीर अंतर्दृष्टि के साथ लिखा गया यह लम्बा लेख एक नई दिशा देगा। आज के ’जनसत्ता’ से साभार ।- अफ़लातून ]

सुनील

दंतेवाड़ा ने देश को दहला दिया है। यह साफ है कि दंतेवाड़ा,लालगढ़, मलकानगिरि जैसे कुछ आदिवासी इलाकों में माओवादियों ने अपने आजाद क्षेत्र बना लिये हैं, आदिवासियों का ठोस समर्थन और आदिवासी युवा उनके साथ हैं तथा वे पूरी तैयारी और सुविचारित रणनीति के साथ अपना युद्ध लड़ रहे हैं।

6 अप्रैल को दंतेवाड़ा में अभी तक की पुलिस व अर्धफौजी बलों की सबसे बड़ी क्षति हुई है। इस घटना की प्रतिक्रिया में रस्मी तौर पर बयान आ रहे हैं और तलाशी अभियान चल रहे हैं। कई बेगुनाहों को इस चक्कर में पकड़ा, मारा या सताया जाएगा। हिंसा और अत्याचारों का दौर दोनों तरफ चलता रहेगा। लेकिन इससे कुछ नहीं निकलेगा। हालात और बिगडे़गी। वक्त आ गया है कि जब देश गंभीरता से विचार करे कि ये हालातें क्यों पैदा हुई, माओवादियों का इतना जनाधार कैसे बढ़ा, सरल और शांतिप्रिय आदिवासी मरने व मारने पर क्यों उतारु हुए ? इस हिंसा की जड़ में क्या है ?

माओवाद या नक्सलवाद के बारे में देश आम तौर पर तभी सोचता है, जब ऐसी कोई बड़ी घटना होती है। मीडिया के जरिये कभी-कभी जो अन्य कहानियां या खबरें मिलती हैं, वे सतही और पूर्वाग्रहग्रस्त रहती हैं। ऐसी हालत में देश की एक बड़ी अंग्रेजी लेखिका अरुंधती राय ने करीब एक सप्ताह दंतेवाड़ा के जंगलों में सशस्त्र माओवादियों के साथ बिता कर उसका वृत्तांत ‘आउटलुक’ (29 मार्च, 2010) पत्रिका में देकर हमारा एक उपकार किया है। ऐसा नहीं है कि वे पूरी तरह निष्पक्ष है। माओवादियों के प्रति उनकी सराहना, सहानुभूति और उनका रोमांच साफ है। किन्तु इससे दूसरी तरफ की, अंदर की, बहुत सारी बातें जानने एवं समझने को मिलती है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछले काफी समय से सरकार ने इन इलाकों को सील कर रखा है और बाहर से किसी को जाने नहीं दे रही है। मेधा पाटेकर, संदीप पांडे या महिला दल की जनसुनवाई या पदयात्रा को भी सरकार और सरकारी गुर्गों ने होने नहीं दिया। उनकी घेरेबंदी को भेदकर, भारी जोखिम लेकर, काफी कष्ट सहकर, अरुंधती ने बड़ा काम किया है। भारत के बुद्धिजीवी जिस तरह से वातानुकूलित घेरों के अंदर बुद्धि-विलास तक सीमित होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए भी यह काबिले तारीफ है।

तीन संकट:

इस वृतांत से एक बात तो यह पता चलती है कि वहां के आदिवासियों का एक प्रमुख मुद्दा जमीन और जंगल (तेदूंपत्ता या बांस कटाई) की मजदूरी का रहा है। बड़े स्तर पर वनभूमि पर आदिवासियों का कब्जा करवाकर और वन विभाग के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाकर माओवादियों ने अपना ठोस जनाधार बनाया है। वास्तव में, देश के सारे जंगल वाले आदिवासी इलाकों में  तनाव, टकराव और जन-असंतोष का यह एक बड़ा कारण है। अब तो देश को यह अहसास होना चाहिए कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रुप से अन्याय हुआ है, भारत के वन कानून जन-विरोधी और आदिवासी – विरोधी हैं, आजादी के बाद हालातें नहीं बदली हैं, बल्कि राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारण्यों एवं टाईगर रिजर्वों के रुप में उनकी जिंदगियों पर नए हमले हुए हैं। संसद में पारित आधे-अधूरे वन अधिकार कानून से यह समस्या हल नहीं हुई है। जैसे नरेगा से रोजगार की समस्या हल नहीं हो सकती, सूचना के अधिकार से प्रशासनिक सुधार का काम पूरा नहीं हो जाता, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून से देश में भूख एवं कुपोषण खतम नहीं होने वाला हैं, उसी तरह वन-अधिकार कानून भी ज्यादातर एक दिखावा ही साबित हुआ है। भारत के जंगलों पर पहला अधिकार वहां रहने वाले लोगों का है, उनकी बुनियादी जरुरतें सुनिश्चित होनी चाहिए, तथा अंग्रेजों द्वारा कायम वन विभाग की नौकरशाही को तुरंत भंग करके स्थानीय भागीदारी से वनों की देखरेख का एक वैकल्पिक तंत्र बनाना चाहिए। भारत के जंगल क्षेत्रों में खदबदा रहे असंतोष का दूसरा कोई इलाज नहीं हैं। और यही जंगलों एवं वन्य प्राणियों के भी हित में होगा।

वैश्वीकरण के दौर में, निर्यातोन्मुखी विकास और राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर के चक्कर में, देशी विदेशी कंपनियों और सरकार के सहयोग से इन इलाकों के जल-जंगल-जमीन पर हमले का एक नया दौर शुरु हुआ है। खदानों व कारखानों के बेतहाशा करारनामे और समझौते हो रहे हैं। यदि सबका क्रियान्वयन हो गया, तो भारत के बड़े इलाकों से जंगल और आदिवासी दोनों साफ हो जाएंगे। सलवा जुडुम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के पीछे सरकार के जोर लगाने का एक बड़ा कारण यही है कि इन इलाकों में खनिज के भंडार भरे हुए हैं। सलवा जुडुम के लिए टाटा और एस्सार कंपनी ने भी पैसा दिया है, इस तरह के तथ्य सामने लाने का भी काम अरुंधती राय ने किया है। भारत के मौजूदा गृहमंत्री चिदंबरम साहब भी वेदांत एवं अन्य कंपनियों से जुडे़ रहे हैं। यह हमला व यह सांठगांठ देश में लगभग हर जगह चल रहा है। कई जगह लोग गैर-हथियारबंद तरीकों से लड़ रहे हैं। यदि देश को बचाना है, तो इस कंपनी साम्राज्यवाद को तत्काल रोकना होगा। यह दूसरा निष्कर्ष सिर्फ अरुंधती राय के लेख से नहीं, देश के कोने-कोने से आने वाली सैकड़ों रपटों व खबरों से निकलता है।

माओवाद के नाम पर इन तमाम गैर-हथियारबंद आंदोलनों को भी कुचला जा रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि भारतीय राजसत्ता और माओवादी दोनों के लिए यह स्थिति सुविधाजनक है और दोनों इसे बनाए रखना चाहते हैं। माओवाद प्रभावित इलाकों के आसपास के जिलों में भी अब कोई भी भ्रष्टाचार या पुलिस ज्यादतियों का मामला भी नहीं उठा सकता। उसे माओवादी कहकर जेल में सड़ा दिया जाएगा या फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाईश और जगह खतम होने से लोग मजबूर होकर माओवाद की शरण में जाएंगे, इसलिए यह माओवादियों के  हित में भी है। लालगढ़ में ‘‘पुलिस संत्रास बिरोधी जनसाधारणेर कमिटी’’, कलिंग नगर में टाटा कारखाने के विरोध में आंदोलन, नारायणपटना में अपनी जमीन वापसी की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी — ये सब गैर-हथियारबंद लोकतांत्रिक आंदोलन थे। इनके नेताओं को जेल में डालकर, इन पर लाठी – गोली चलाकर सरकार इनको माओवादियों की झोली में डाल रही है।

अतएव हमें तीसरा अहसास भारतीय लोकतंत्र पर छाए गंभीर संकट का होना चाहिए। भारतीय राजसत्ता जहां चाहे, जब चाहे, लोकतांत्रिक नियमों और मान-मर्यादाओं को ताक में रख देती है। विशेषकर जो इलाके और समुदाय भारत की मुख्य धारा के हिस्से नहीं है, जैसे पूर्वोत्तर और कश्मीर, दलित, आदिवासी और मुसलमान, उनके साथ वह बर्बरता और क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ जाती है। उसका बरताव वैसा ही होता है, जैसा एक तानाशाह का होता है। सशस्त्र संघर्ष तो अलग बात है, लोकतांत्रिक एवं अहिंसक तरीकों से होने वाले जनप्रतिरोध को भी उपेक्षित करने व कुचलने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आखिर दस वर्षों से चल रहा इरोम शर्मिला का अनशन तो एक गांधीवादी प्रतिरोध ही है, जो इस राजसत्ता की संवेदनशून्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अपने दमन और अत्याचारों से यह राजसत्ता लोगों को उल्टे हिंसा की और धकेलती एवं मजबूर करती है।

भारत में बढ़ता हुआ उग्रवाद, आतंकवाद और माओवाद कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र की गहरी विफलता की ओर इशारा करता है, जिसमें लोगों को अपनी समस्याओं और अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने तथा उनके निराकरण के जरिये नहीं मिल पा रहे हैं। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की इस विफलता को देश के मुख्य इलाकों के आम लोग भी महसूस कर रहे हैं। उनकी हताशा कम मतदान, आम बातचीत में नेताओं को गाली देने, तुरंत कानून अपने हाथ में लेने या हिंसा व आगजनी की घटनाओं में प्रकट होती है। देश की आजादी के बाद लोकतंत्र का जो ढांचा हमारे संविधान निर्माताओं ने अपनाया, वह शायद बहुत ज्यादा उपयुक्त नहीं था। अब पिछले छः दशकों के अनुभव के आधार पर इसकी समीक्षा करने का समय आ गया है। माओवादियों की तो इसमें कोई रुचि नहीं होगी कि इस ‘बुर्जुआ’ लोकतंत्र को बचाया जाए। लेकिन बाकी देशप्रेमी लोगों को इस लोकतंत्र की अच्छी बातों जैसे वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, कमजोर तबकों के लिए आरक्षण, आदि को संजोते हुए इसके ज्यादा विक्रेन्द्रित, जनता के ज्यादा नजदीक, नए वैकल्पिक ढांचे के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

इस लेख में अरुंधती राय ने विरोध के गांधीवादी, अहिंसक एवं लोकतांत्रिक तरीकों का कुछ हद तक मजाक उड़ाया है और बताया है कि वे सब असफल हो गए है। यह भी पूछा है कि आखिर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कौन-कौन सा दरवाजा नहीं खटखटाया ? वे बताना चाहती हैं कि हथियार उठाने, युद्ध लड़ने, सत्ता के मुखबिरों को मारने-काटने का जो रास्ता माओवादियों ने चुना है, उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। किन्तु क्या सचमुच ऐसा है ? पता नहीं, अरुंधती राय को मालूम है या नहीं, देश के कई हिस्सों में इस वक्त सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे आंदोलन चल रहे हैं जो सब लोकतांत्रिक और गैर-हथियारबंद है। वास्तव में माओवादियों के मुकाबले उनका दायरा काफी बड़ा है। सफलता-असफलता की उनकी स्थिति भी मिश्रित है, एकतरफा नहीं। बल्कि सूची बनाएं, तो ऐसे कई छोटे-छोटे जनांदोलन पिछले दो-ढाई दशक में हुए हैं जो विनाशकारी परियोजनाओं को रोकने के अपने सीमिति मकसद में सफल रहे हैं। झारखंड में कोयलकारो, उड़ीसा में गंधमार्दन, चिलिका, गोपालपुर, बलियापाल एवं कलिंगनगर, गोआ में डूपों और सेज विरोधी आंदोलन, महाराष्ट्र में नवी मुंबई और गोराई के सेज -विरोधी आंदोलन  आदि। बंगाल में सिंगुर और नन्दीग्राम में भी हिंसा जरुर हुई, लेकिन वे मूलतः लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर के आंदोलन थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन भले ही नर्मदा के बड़े बांधों को रोक नहीं पाया, लेकिन उसने बड़े बांधों और उससे जुड़े विकास के मॉडल पर एक बहस देश में खड़े करने में जरुर सफलता पाई। विस्थापितों की दुर्दशा के सवाल को भी वह एक बड़ा सवाल बना सका, नहीं तो पहले इसकी कोई चर्चा ही नहीं होती थी। लेकिन यह भी सही है कि नवउदारवादी दौर में राजसत्ता का जो दमनकारी चरित्र बनता जा रहा है, उसमें आंदोलन एवं प्रतिरोध करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। गांधी के देश में गांधी के रास्ते पर चलना कठिनतर होता जा रहा है। (जारी)

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पिछले साल नौ सितम्बर को ’ब्लैक रोज़’ नामक मंगोलियाई पानी का एक बड़ा जहाज ओड़िशा के पारादीप बन्दरगाह के निकट डूब गया । जहाज में हजार २३८४७ टन लौह अयस्क लदा था । जिनका माल लदा था उन्होंने यह कबूल कर लिया कि एक अन्य जहाज ’टोरोस पर्ल’ के दस्तावेजों को जमाकर उन्होंने पारादीप बन्दरगाह में शरण पाई थी । जहाज का मालिक ब्लैक रोज़ नाम से दो जहाज चलाता था । बन्दरगाह से अन्य जहाज बाहर निकल सकें इसके लिए डूबे जहाज को हटाना जरूरी था । यह काम मजबूरन बन्दरगाह प्रशासन करवाना पपड़ रहा है । देश की अमूल्य खनिज सम्पदा की लूट की अवैध कारगुजारी का एक नमूना इस घटना से प्रकट हुआ । आदिवासी , दलित और पिछड़े गरीब किसानों का यह प्रान्त खनिज सम्पदा से समृद्ध है और उदारीकरण के दौर में देशी-विदेशी कम्पनियों में इसे लूटने की होड़ मची है । अनिल अग्रवाल ,मित्तल और टाटा सरीखों द्वारा लूट-खसोट में राज्य की पुलिस और कम्पनियों की ’निजी वाहिनी’ (भाड़े के गुण्डे) ग्रामीणों पर दमन का दौर चला रहे हैं ।

पारादीप बन्दरगाह के निर्माण के दौरान ट्रकों से कुचल कर २५० बच्चे मारे गये थे तब बीजू पटनायक ने कहा था ,’इन बच्चों की मौत विकास के लिए हुई शहादत है ” । ओडिशा मैंगनीज़ , लौह अयस्क तथा बॉक्साईट से समृद्ध है । ओडिशा के तट पर १२ नये बन्दरगाहों के निर्माण की योजना है । इनके द्वारा खनिज अयस्क तथा कोयले का निर्यात होगा । उदारीकरण के दौर में खनिज तथा वन कानूनों को ठेंगा दिखा कर दो सौ से दो सौ चालीस रुपये प्रति टन की लागत से प्राप्त लौह अयस्क चीन जैसे देशों को वैध/अवैध तरीकों से तीन हजार रुपये प्रति टन बेचा जा रहा है ।

रवि दास (खड़े) और पूर्व सांसद बालगोपाल मिश्र

इन तथ्यों के आधार पर ओडिशा के वरिष्ट पत्रकार एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता रवि दास ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है । ओडिशा-दिवस (पहली अप्रैल) पर वाराणसेय उत्कल समाज के आयोजन में वे बतौर मुख्य अतिथि बनारस आये हुए थे । ओड़िया के प्रसिद्ध अखबार ’प्रगतिवादी’ से बरसों से जुड़े रहने के बाद अब वे ’ आमो राजधानी’ नामक एक मध्याह्न दैनिक निकाल रहे हैं तथा वकीलों,पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों और पत्रकारों द्वारा बनाये गये ’ओडिशा जन सम्मेलनी’ नामक संगठन के अध्यक्ष हैं । रवि दास ३० मार्च को जाजपुर जिले के कलिंगनगर इलाके में हुए बर्बर दमन की तफ़तीश करने गई टीम में शामिल थे । टीम का नेतृत्व उच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त जज चौधरी प्रताप मिश्र ने किया । टीम में एक चिकित्सक तथा चित्त महान्ती (लेखक तथा राजनैतिक कार्यकर्ता),सुधीर पटनायक (पत्रकार) तथा महेन्द्र परीडा (ट्रेड यूनियन कर्मी) शामिल थे ।  मुख्यधारा की मीडिया द्वारा पुलिस दमन की घटना की खबर गायब किए जाने के कारण इस समिति की रपट के मुख्य अंश यहां दिए जा रहे हैं :

जाँच दल ने गोली चालन के शिकार ग्रामीणों से बालिगूथा ,चाँदिया तथा बरगड़िया में मुलाकात की तथा उनकी झोपड़ियों , पशु धन , खाद्यान्न ,साइकिल आदि के नुकसान का जायजा लिया।
बालिगूथा के सरपंच ने टीम को बताया कि उसके घर से नगद तथा आभूषण भी लिए गये हैं। आन्दोलनकारी आदिवासियों के नेता रवि जरिका पुलिस की गोली से घायल हुए हैं । उन्होंने घटना का पूरा ब्यौरा दिया। समिति गोली से घायल पचीस लोगों से मिली जिनमें नौ महिलाएं थी । जाँच दल के साथ गये चिकित्सक ने घायलों का उपचार किया ।

मुख्य तथ्य :

  1. करीब ३० से ४० आदिवासी गोली से घायल हैं । गंभीर रूप से घायल ४ लोग अस्पताल में भर्ती किए गये हैं । घायलों के जख़्म देख कर लगता है कि यह रबर की गोलियों के अलावा भी चलाई गई गोलियों से हुए हैं ।
  2. प्रशासन द्वारा घायलों के उपचार के लिए कुछ भी नहीं किया गया हैं । उत्पीड़न और गिरफ़्तारी के भय से घायल ग्रामीण बाहर नहीं निकलना चाहते ।
  3. बालिगूथा के करीब स्थित विवादास्पद ’कॉमन गलियारा’ के निर्माण स्थल पर किया पुलिस का गोली चालन बेजा था , किसी भड़कावे के बिना था तथा इसलिए पूर्वनियोजित था ।
  4. हथिया्रबन्द पुलिस की २९ प्लाटून , एन एस जी के दो प्लाटून , ७० पुलिस अधिकारी तथा ७ मजिस्ट्रेटों की मौजूदगी इलाके में व्याप्त आतंक के माहौल का अन्दाज देने के लिए काफ़ी हैं।
  5. सत्ताधारी दल से जुड़े जाने-पहचाने चेहरे पुलिस की वर्दी में बालीगूथा में घरों पर हमला करने वालों में थे । उनके पास बन्दूकें नहीं थी लेकिन वे तलवारों तथा वैसे ही घातक शस्त्रों से लैस थे।
  6. धारा १४४ लागू होने के बावजूद कम्पनी के गुण्डे भारी तादाद में छुट्टा घूम रहे थे ।
  7. विस्थापन विरोधी मंच के नेताओं के घरों को पहचान कर नुकसान पहुंचाया गया है तथा उन घरों के मूल्यवान सामान और खाद्यान्न नष्ट किए गए।
  8. आंदोलनकार पीडित आदिवासी बिना सोए रात गुजार रहे हैं क्योंकि उन्हें भय है कि स्थानीय प्रशासन के सहयोग से पुलिस , कम्पनी के गुण्डे,तथा सत्ताधारी दल से जुड़े अपराधी फिर से हमला कर सकते हैं ।
  9. इतनी भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती अपने आप में इलाके की शान्ति के लिए खतरा है।
  10. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन आन्दोलनकारी आदिवासियों की समस्या के प्रति असंवेदनशील है तथा उसे सिर्फ़ कलिंगनगर स्थित कम्पनियों की परवाह है ।

संस्तुतियाँ :

  1. मुख्य मन्त्री तत्काल हस्तक्षेप कर विवादित गलियारा प्रोजेक्ट के काम को रोकें ।
  2. प्रशासन ने कलिंगनगर में पहले हुए गोली कांड के बाद लोगों से जो वाएदे किए थे उनके प्रति धोखा किया है इसलिए आदिवासियों की माँगों की बाबत सर्वोच्च स्तर पर वार्ता होनी चाहिए। जमीन के बद्ले जमीन देने की बात को नजरअंदाज किया गया है तथा गलियारे की भूमि के मलिकों से भी राय नहीं ली गई है ।
  3. कम्पनियों के खर्च पर छोटे से इलाके में एक बाद एक थाने खोलते जाने के बजाय मुख्यमन्त्री को सुनिश्चित करना चाहिए कि हर गाँव को शिक्षा ,स्वास्थ्य,पानी,सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिले। विधवा पेंशन जैसी योजनाओं को बेतुके रूप से इलाके में स्थगित कर दिया गया है ।
  4. पुलिस या नागरिक कानून को अपने हाथों में न ले । ३० मार्च को हुए गोली चालन तथा उसके पहले आदिवासियों में भय फैलाने वाली  अपराधिक कारगुजारियों में लिप्त समस्त अधिकारियों को तत्काल निलम्बित किया जाए तथा उन पर मुकदमे चलाये जाँए ।
  5. गोली चालन से घायल पीडित हर व्यक्ति को एक लाख रुपये का जुर्माना दिया जाए ।

ओडिशा में नागरिक अधिकार आन्दोलन तथा किसान आन्दोलन पर रवि दास तथा किसान नेता बालगोपाल मिश्र से बातचीत आगे दी जाएगी ।

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बाबा मायाराम द्वारा लिखी गयीं सशक्त रिपोर्टों से चिट्ठा जगत परिचित है । ’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नामक उनकी किताब का लोकार्पण कल इटारसी में हुआ ।
इस अवसर पर प्रबुद्ध नागरिकों के अलावा उन क्षेत्रों के ग्रामीण भी शामिल थे, जिनके बारे में इस पुस्तक में विवरण है।

इटारसी स्थित पत्रकार भवन में पर्यावरण बचाओ, धरती बचाओ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में इस पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार और प्राचार्य श्री कश्मीर उप्पल और समाजवादी जन परिषद के उपाध्यक्ष श्री सुनील ने किया। इस संगोष्ठी में पर्यावरण के कई पहलुओं पर चर्चा की गई। वनों का विनाश, नदियों का सूखना, रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव आदि ऐसे मानव जीवन से जुड़े कई मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।

बाबा मायाराम ने पिछले एक शवर्ष में उन्हें प्रदत्त दो फैलोशिप के तहत हो्शंगाबाद जिले के वनांचलों में घूम-घूमकर यह पुस्तक तैयार की है जिसमें यहां रहने वाले आदिवासियों की जिंदगी में चल रही उथल-पुथल, आकांक्षाओं और विस्थापन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण किया गया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना देश के जाने-माने प्रसिद्ध पत्रकार भारत डोगरा ने लिखी है और संपादन डॉ. सुशील जोशीने किया है। उल्लेखनीय है कि बाबा मायाराम पिछले दो दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। पूर्व में वे कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं से संबद्ध रह चुके हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनके लेख, रिपोर्टस व टिप्पणियां देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में छपती रही हैं।

सतपुड़ा के बाशिन्दे

पुस्तक से कुछ विचारणीय मुद्दे :

  • आजादी के बाद अब तक जितनी विकास परियोजनायें बनी हैं उनमें सबसे ज्यादा विस्थापन का शिकार आदिवासियों को होना पड़ा है । आंकड़ों में सिर्फ प्रत्यक्ष विस्थापन ही शामिल है । काफ़ी विस्थापन अप्रत्यक्ष होता है ।
  • एक बार विस्थापित होने के बाद लोगों की जिन्दगी फिर व्यवस्थित नहीं हो पाती । उलटे लोगों की हालत बदतर हो जाती है । विस्थापन का समाधान पुनर्वास से नहीं होता ।
  • वन्य प्राणी संरक्षण के सन्दर्भ में ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है कि मानवविहीन करके ही वन तथा वन्य जीवों को बचाया जा सकता है । बल्कि बोरी अभ्यारण्य के अनुभव से तो लगता है कि वन , वन्य जीव तथा वनवासियों  का सहअस्तित्व संभव है ।
  • वन्य जीवों के संरक्षण से जुड़ा है वन संरक्षण । जंगली जानवर जंगल में ही रहते हैं । यह विडंबना ही है कि वन्य प्राणी संरक्षण योजना की शुरुआत वनों को काट कर की जाए ।
  • वन्य संरक्षण की योजनायें व नीतियां विरोधाभासी हैं । एक तरफ़ तो शेरों को बसाने के लिए लोगों को उजाड़ा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ पर्यटकों के लिए सैर सपाटे के इंजाम किए जा रहे हैं ।
  • एक दलील यह दी जाती है कि जंगलों में बसे आदिवासियों का विकास नहीं हो रहा है । तथ्य यह है कि जो गाँव विस्थापित किए गए हैं उनमें हर दृष्टि से लोगों की जिन्दगी पहले से बदतर हुई है ।

प्रकाशक व उपलब्धि केन्द्र –  किसान आदिवासी संगठन , ग्रा/पो केसला , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश,४६११११

मूल्य – पच्चीस रुपये ।

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नर्मदा बचाओ आन्दोलन का २८ अक्टूबर का ज्ञापन

प्रति,
श्री शिवराजसिंह चौहान,
मुख्यमंत्री,
मध्य प्रदेश शासन,
भोपाल म.प्र.
विषय : इंदिरा सागर परियोजना व औंकारेश्वर बाँध प्रभावितों के पुनर्वास बाबत्
द्वारा : जिला कलेक्टर, खण्डवा, म.प्र.
माननीय,
नर्मदा घाटी में बन रहे इंदिरा सागर और औंकारेश्वर बाँध के हजारों प्रभावित आज
खण्डवा जिला मुख्यालय पर एकत्र होकर नर्मदा घाटी में लाखों प्रभावितों की दुर्दशा की ओर
आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते है। नर्मदा घाटी के विस्थापितों के लिये बनी पुनर्वास
नीति के अनुसार विस्थापितों का जमीन के बदले जमीन, वयस्क पुत्रों को जमीन एवं सभी को
पुनर्वास की अन्य सुविधाऐं देकर बसाना था। परंतु इस नीति का खुला उल्लंघन करते हुए,
विस्थापितों को धोखे एवं दमन के आधार पर ही उजाडा गया है।
इतना ही नहीं विस्थापितों के हक में दिये गये सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय
के फैसलों पर भी अमल नही किया जा रहा है। प्रदेश व देश के विकास के नाम पर त्याग
करने वाले लाखों विस्थापित आज दर दर की ठोकरे खाने पर मजबूर है जबकि दूसरी ओर
इंदिरा सागर और औंकारेश्वर बाँध बनाने वाली कम्पनी एन.एच.डी.सी. ने गत् ४ वर्षों में १२००
करोड़ रु. से अधिक का शुध्द लाभ कमाया है।
आज खण्डवा में एकत्र हम हजारों प्रभावित राज्य सरकार से मांग करते है कि : –
इंदिरा सागर परियोजना
१. माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा दायर याचिका में
पहले ८ सितम्बर २००६ ओर फिर २ सितम्बर २००९ को यह आदेश दिया है कि किसानों
के समस्त वयस्क पुत्र और अविवाहित पुत्रियों को ५.५ एकड़ कृषि जमीन दी जाए,
इसका पालन करते हुए वयस्क पुत्रों को तुरंत जमीन दी जाय।
२. विस्थापित मजदूर परिवारों को डूब से खुलने वाली हजारों एकड़ तलक की जमीन
बाँटी जाए तथा सिंचाई की सुविधा मुहैया कराई जाय ताकि पानी खुलने पर, हर साल
गेहूँ व गर्मी की फसल कमाकर विस्थापित मजदूर परिवार भी इज्जतदार रोजगार कर
सके।
३. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र में विस्थापित मछुआरों के साथ गुंडागर्दी एवं मारपीट की जा रही
हैं। इसे तत्काल रोका जाय और इंदिरा सागर में मछली मारने का अधिकार ठेकेदार
को नहीं, विस्थापित को दिया जाय।
४. कृषि जमीनों को एन.एच.डी.सी. ने मृट्ठी भर मुआवजा देकर कब्जा कर लिया, जिससे
किसान दोबारा जमीन नहीं खरीद पाया। इसलिए जमीन के लिए दी जाने वाले विशेष
पुनर्वास अनुदान ¼बढ़त राशि½ को हरदा कमाण्ड के अच्छे रेट १.५ से २ लाख रूपए
एकड़ दिया जाय।
५. अभी भी डूब क्षेत्र में छूटे हुए हजारों घर, जो मुआवजे से छूटे है, उनका भू-अर्जन
करके मुआवजा दिया जाय।
६. जहाँ जमीन डूब चुकी है और अब जीने का कोई जरिया बचा ही नही है, उन गाँवों के
सभी घरों का भू-अर्जन करके विस्थापितों को मुआवजा तथा पुनर्वास दिया जाय।
७. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र विशेषत: हरदा जिले में भयावह भ्रष्टाचार फैला है। प्रभावितों के
अनुदान दलालों द्वारा अधिकारियों की मिलीभगत से निकाले जा रहे है। इस पर रोक
लगाई जाय और स्वतंत्र जाँच कर दोषियो को दण्डित किया जाय।
८. सभी पुनर्वास स्थलों पर विस्थापितों के लिए पूर्ण रोजगार मुहैया किया जाय सभी
विस्थापितों के बी.पी.एल. राशन कार्ड बनाया जाय और पुनर्वास स्थल पर स्कूल,
अस्पताल, पेयजल आदि सभी सुविधाऐं प्रदान की जाय।
९. बहुत से गाँवों में अभी तक परिवार सूची ही नही बनी है और वे पुनर्वास के समस्त
लाभों से वंचित है, उन गाँव की परिवा सूचियाँ बनाकर, सभी विस्थापितों को पुनर्वास
के लाभ दिये जाय।
१०. हंडिया नेमावर तक के पीछे के इंदिरा सागर के डूब में आने वाले छूटे हुए गाँव का
सर्वे करके परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाय।
११. २५ प्रतिशत् से कम बची जमीन के भू-अर्जन के साथ परिसम्पत्तियों का भी अर्जन
किया जाय।
१२. जहाँ घर डूब है और जमीने बची है वहाँ १ किलो मीटर के अंदर पुनर्वास स्थल का
निमार्ण किया जाय।
१३. इंदिरा सागर बाँध स्थल पर जल स्तर सूचित करने वाला स्केल मिटा दिया गया है,
जो कि अत्यंत गंभीर है। बाँध का जल स्तर बताने वाला सार्वजनिक स्केल पुन: लिखा
जाय।

औंकारेश्वर परियोजना

१. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार विस्थापितों को सिंचित
एवं उपजाऊ जमीन देकर बसाया जाय।
२. विस्थापितों को जमीन आवंटन के लिये अतिक्रमित जमीनों को न दिया जाय, ताकि
अन्य गरीब परिवारों की रोटी न छिने और विस्थापित की सुरक्षति बसाहट हो सके।
३. उच्च न्यायालय के दिनांक २३ सितम्बर २००९ एवं अन्य सभी आदेशों का तत्काल पालन
किया जाय।
४. न्यायालयीन आदेश तथा पुनर्वास नीति के अनुसार कमाण्ड एरिया में विस्थापितों की
इच्छा अनुसार घर प्लॉट दिये जाय।
५. छूटे हुए मकानों का भू-अर्जन किया जाय।
६. किसानों को अपर्याप्त मुट्ठी भर मुआवजा दिया गया है। कृषि जमीन का विशेष
पुनर्वास अनुदान ¼बढ़त राशि½ कम से कम १.५ से २ लाख रूपए एकड़ दिया जाय।
७. तालाब में मछली ठेकेदार को नहीं दी जाय। मछली मारने का सम्पूर्ण अधिकार
विस्थापित को दिया जाय।
८. पुनर्वास के लाभों से मनमानी पू्र्वक वंचित सभी परिवारों को घर प्लॉट, अनुदान व
समस्त लाभ दिया जाय।
९. सन् २००४ में धाराजी प्रकरण में सैकड़ो लोगों को एन.एच.डी.सी. द्वारा पानी छोड़ने से
बह जाना तथा पिछले महिने गांव कामनखेड़ा में नन्ही हरिजन बालिका का
एन.एच.डी.सी. द्वारा पानी बढ़ाने से मौत के लिए जिम्मेदार एन.एच.डी.सी. को दण्डित
किया जाय।
आशा है आप उपरोक्त पर तत्काल एवं गंभीरता से कारवाई करेंगे।
दिनांक : २८ अक्टूबर २००९
भवदीय,
इंदिरा सागर एवं औंकारेश्वर बाँध
प्रभावित हजारों विस्थापित

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उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायलय द्वारा पुनर्वास के लिए दिए गए निर्देशों और फैसलों को लागू किए जाने के लिए उपर्युक्त मांगें की गई हैं । इन मांगों के समर्थन में पूर्वघोषित कार्यक्रम के अनुसार हजारों विस्थापित जिला मुख्यालय पर लोकतांत्रिक तरीके से धरना दे रहे थे । जिला प्रशासन के समस्त अधिकारी लगता है इस पूर्व सूचना के कारण ही एक साथ ’बीमार’ पड़ गये थे । इन परिस्थितियों में धरनारत कुछ आन्दोलनकारी जिला कलेक्टर के दफ़्तर में दरियाफ़्त करने जा रही थीं । यही पुलिस द्वारा आन्दोलन की प्रमुख नेता चित्तरूप पालित , रामकुँवर रावत तथा कमला यादव को पुलिस द्वारा बर्बर तरीके से पीटा गया एवं फर्जी धाराएं लगा कर गिरफ़्तार कर दिया गया । इसके पश्चात खंडवा स्थित नर्मदा बचाओ आन्दोलन के दफ़्तर में बिना किसी वारंट छापा मार कर कम्प्यूटर आदि की छानबीन की गई तथा आन्दोलन के एक अन्य नेता आलोक अग्रवाल को भी पीट कर गिरफ़्तार कर लिया गया ।

रामकुँवर तथा चित्तरूपा

रामकुँवर तथा चित्तरूपा

समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील ने खण्डवा का दौरा करने के बाद कहा है कि म.प्र. की भाजपा सरकार ने शान्तिपूर्ण आन्दोलनकारियों पर बर्बर दमन चक्र चला कर अपने जन विरोधी स्वरूप को उजागर कर दिया है । सुनील ने विस्थापित आन्दोलनकारियों की समस्त मांगे तत्काल मानने तथा गिरफ़्तार लोगों को रिहा करने की मांग की है ।

 

नर्मदा बचाओ आन्दोलन दफ़्तर पर अवैध छापा

न.ब.आ. दफ़्तर पर अवैध छापा

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