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Archive for the ‘ambedkar’ Category

[नवम्बर 1956 में,विश्व-बौद्ध-सम्मेलन काठमंडू (नेपाल) में दिया गया बाबासाहेब का व्याख्यान]

मित्रों!आज जिस युग में हम विचर रहे हैं,उसमें संसार के बुद्धिवादी विचारकों को मानव जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाने के लिए केवल दो ही मार्ग ही दिखाई पड़ते हैंः पहला मार्ग साम्यवाद का है और दूसरा बौद्ध-धर्म का।शिक्षित युवकों पर साम्यवाद (Communism) का प्रभाव अधिक दिखाई देता है,इसका प्रमुख कारण यह है कि साम्यवाद का प्रचार सुसंगठित रूप से हो रहा है,और इसके प्रचारक बुद्धिवादी दलीलें पेश करते हैं।बौद्ध-धर्म भी बुद्धिवादी है,समता-प्रधान है।और परिणाम की ओर ध्यान दिया जाए,तो साम्यवाद से अधिक कल्याणकारी है। इसी तत्त्व पर अपने विचार आपके आगे रखना चाहता हूं।क्योंकि मैं समझता हूं,यह बात शिक्षित युवकों के आगे रखना अति आवश्यक है।

मेरे विचार में साम्यवाद की इस चुनौती को स्वीकार करते हुए बौद्ध-भिक्षुओं को चाहिए कि वे युगानुरूप अपनी विचार-पद्धति एवं प्रचार-कार्य में परिवर्तन करें और भगवान बुद्ध के विचार विशुद्ध रूप में शिक्षित युवकों के सामने रखें।बौद्ध धर्म के उत्थान और उन्नति के लिए इसीकी अत्यन्त आवश्यकता है।यदि इस काम को बौद्ध भिक्षु उचित प्रकार से न कर सकेंगे,तो बौद्ध धर्म की बहुत हानि होगी।इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।सारे संसार में व्याप्त कम्युनिज्म को भगवान बुद्ध की विचार प्रणाली में केवल यही उत्तर है कि मानव-जीवन को सुखी बनाने का साम्यवाद एक समीपी किन्तु टेढ़ा मार्ग है। बौद्ध-धर्म यद्यपि अपेक्षाकृत एक लम्बा रास्ता है किन्तु इस समीपी और टेढ़े रास्ते पर चलने की अपेक्षा यह एक सुन्दर,हितकर,समुचित और सम्यक राज-मार्ग है।

मार्क्सवादी साम्यवाद के मार्ग में संकट है,विपत्तियां हैं,इसीलिए उस मार्ग से हमें जहां पहुंचना है,वहां पहुंच पायेंगे या नहीं,इसमें संदेह है।

मार्क्सवादी साम्यवादी की मुख्य बात यह है कि संसार में आर्थिक शोषण से उत्पन्न विषमता के कारण ही बहुसंख्यक लोग दीन और दास बनकर कष्ट उठा रहे हैं।इस आर्थिक विषमता के शोषण और लूट को रोकने का एक ही रास्ता है,जिसके द्वारा व्यक्तिगत सीमित अधिकार को नष्ट किया जाए और उसकी जगह संपत्ति का राष्ट्रीयकरण या सामाजीकरण करके राष्ट्रीय अधिकार को अधिष्ठित किया जाय,जिससे श्रमिकों के राज्य की स्थापना हो,शोषण बंद हो और श्रमजीवी-वर्ग सुखी हो।

बौद्ध-धर्म का मुख्य तत्त्व भी मार्क्सवाद के अनुसार ही है। इसके अनुसार संसार में दुख है और उस दुख को दूर करना आवश्यक है।भगवान बुद्ध ने भी जिस दुख का निरूपण किया है,वह सांसारिक दुख ही है।बुद्ध-वचनों में इसके अनेक प्रमाण पाए जाते हैं। बौद्ध-धर्म अन्य धर्मों की भांति आत्मा और परमात्मा के संबंध पर आधारित नहीं है,बौद्ध-धर्म जीवन की अनुभूति पर अधिष्ठित है।दुख का पारलौकि अर्थ लगाकर पुनर्जन्म से उसका संबंध जोड़ना बुद्ध-मत के विरुद्ध है।संसार में दरिद्रता में जन्म लेकर प्लनेवाले दुखों का नाश होना अनिवार्य आवश्यक है।यह मान लेने के बाद देखना होगा कि इस दुख को हटाने के भगवान ने कौन-कौन से मार्ग बताये हैं। भगवान बुद्ध ने आदर्श बौद्ध समाज के तत्त्व संघ के अन्तर्निहित किए हैं।संघ में व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है।भिक्षु को केवल आठ चीजें अपने पास रखने का आदेश है।इन आठों में सबसे पहला वस्त्र है।इसमें भी परिग्रह की भावना का निर्माण न होने पाये,इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है।

संपत्ति पर व्यक्ति -विशेष का अधिकार सारे अनर्थों का कारण है यह बात भगवान बुद्ध ने कार्ल मार्क्स से चौबीस सौ वर्ष पहले जान ली थी।बुद्ध और मार्क्स में जो अन्तर है,वह केवल उस दुख के दूरीकरण के लिए बताए हुए उपायों में है।मार्क्स के मतानुसार संपत्ति पर से व्यक्ति का अधिकार हटाने का एक-मात्र साधन बलप्रयोग है,इसके विपरीत भगवान बुद्ध के विचारानुसार करुणा,मैत्री,समता,प्रेम,तृष्णा का त्याग,विराग आदि प्रमुख साधन हैं।बलपूर्वक सत्ता ग्रहण करके साम्यवादी अधिनानायकी स्थापित करके व्यक्तिगत अधिकार नष्ट करने में मार्क्सवादी प्रणाली थोड़े दिनों तक अच्छी मालूम होती है,इसके बाद कटु हो जाती है।क्योंकि बलपूर्वक अधिष्ठित अधिनायकी तथा उसके द्वारा आरंभ होने वाले हत्याकांड की परिसमाप्ति कब होगी,इसकी निश्चयता नहीं है।और यदि अधिनायकी कहीं असफल हो गयी ,तो फिर अपरिमित रक्तपात के सिवा और कोई मार्ग नहीं रह जाता। हिंसा के द्वारा स्थापित समता समाज में दृढता नहीं हो पाती,क्योंकि बल का स्थान धीरे-धीरे किस अन्य तत्त्व द्वारा ग्रहण किया जायेगा,इसका कोई उत्तर मार्क्स की मत-प्रणाली में नहीं है। हिंसा-प्रधान साम्यवादी शासन-प्रणाली में -शासन-चक्र अपने आप ही धीरे-धीरे नष्टप्राय होता जायेगा।यह बात भ्रममूलक नहीं है।

इसके विपरीत बुद्ध-प्रदर्शित अहिंसा,करुणा,मैत्री,समता द्वारा दुखों और क्लेशों की निवृत्ति का मार्ग श्रेयस्कर है,क्योंकि वह चित्त की विशुद्धि और हृदय-परिवर्तन के पुनीत तत्त्व पर आधारित है।मनुष्य के जीवन को सुखी बनाने के लिए नैतिक रूप से उसके मन को सुसंस्कृत करना अनिवार्य आवश्यक है,इस बात पर भगवान बुद्ध ने जितना अधिक ध्यान दिया उतना शायद संसार के किसी भी धर्म-प्रवर्तक या विचार-प्रणाली ने नहीं दिया।मनुष्य में विवेक हमेशा जागृत और सक्रिय बनाये रखने के लिए सदाचरण या शील को श्रद्धा का अधिष्ठान प्रदान करना भगवान बुद्ध का हेतु या लक्ष्य है। शील या सदाचरण को श्रद्धा का रूप प्राप्त होने के बाद दुख कम करने के लिए अर्थात शोषण और आर्थिक लूट रोकने के लिए बलप्रयोग की आवश्यकता नहीं रहती। ”State shall wither away.”(राज्य स्वयं सूख जाएगा) लेनिन का यह मधुर स्वप्न यदि साकार होगा,तो वह बलप्रयोग द्वारा स्थापित की हुई अधिनायकी द्वारा नहीं,वरन बुद्ध-प्रदर्शित शील-सदाचार और विशुद्धि-तत्त्व से ही होगा।

अदिनायकी का भगवान बुद्ध ने विरोध किया है।अजातशत्रु के एक मंत्री ने एक बार उनसे प्रश्न किया-“भगवन! बज्जियों पर हम किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकेंगे?”भगवान बुद्ध ने उत्तर में कहा-“बज्जी लोग जब तक गणतंत्र-शासन का संचालन बहुमत से करते रहेंगे,तब तक वे अजेय हैं।जिस दिन बज्जी गणतंत्र शासन-प्रणाली को त्याग देंगे, उसी दिन वे पराजित हो जायेंगे।”भगवान बुद्ध का यह नीतिप्रधान लोकतंत्र का मार्ग मार्क्सवादी अधिनायक-तंत्र की पएक्षा अधिक हितकर एवं चिरस्थायी है।मुझे आशा है साम्यवाद का यह कल्याणकारी प्राचीन मार्ग यदि आज भी हम युवक समाज के सामने समुचित रूप से रख सकें,तो यह उन्हें आकर्षित किये बिना न रहेगा।

भगवान ने पने भिक्षुओं को “बहुजन-हित और बहुजन-सुख” के लिए आदेश किया था कि “संसार की हर दिशा में जाकर मेरे इस आदि में कल्याण करनेवाले,मध्य में कल्याण करनेवाले और अंत में कल्याण करनेवाले धर्म का प्रचार करो और विशुद्ध ब्रह्मचर्य का प्रकाश करो।”किंतु आज हम देखते हैं,भिक्षुगण मनमुख हो अपने-अपने विहार में रहकर आत्मोन्नति का मार्ग ढूंढ़ रहे हैं।यह कदापित उचित और हितकर नहीं है। बौद्ध धर्म एकांत में आचरण किया जानेवाला कोई रहस्यमय आचार नहीं है,यह एक प्रबल सामाजिक संघ-शक्ति है।आज भी विनाश की भयानक चोटी पर खड़े संसार का मार्ग दिखाने का सामर्थ्य इस शक्ति में है। भगवान बुद्ध के आदेश को स्मरण रखते हुए उनके पवित्र कल्याणकारी धर्म का चारों ओर प्रचार करने की चेष्टा भिक्षुओं को करना चाहिए।

नोट(अनुवादक का)-कम्युनिस्ट और कम्युनिज्म के संबंध में बाबासाहेब ने अपने लाहौर वाले भाषण “जातिभेद का विनाश” में तथा नागपुर के भाषण” हम बौद्ध क्यों बनें?” में भी अच्छा प्रकाश डाला है।ये दोनों व्याख्यान अलग-अलग छपे हैं।

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एक अत्यन्त मेधावी, सुन्दर , और सं
वेदनशील युवा राजनैतिक तरुण की मौत ने भारतीय समाज को हिला दिया है। इस युवा में जोखिम उठाने का साहस था और अपने से ऊपर की पीढ़ी के उसूलों को आंख मूंद कर न मानने की फितरत थी। वह एक राजनैतिक कार्यकर्ता था,उसका संघर्ष राजनैतिक था । वह आतंक के आरोप में दी गई फांसी के विरुद्ध था तो साथ-साथ आतंक फैलाने के लिए सीमा पार से आये घुसपैठियों से मुकाबला करते हुए मारे गए जवानों की शहादत के प्रति श्रद्धावनत होकर उसने कहा था, ‘अम्बेडकरवादी होने के नाते मैं जिन्दगी का पक्षधर हूं । इसलिए उन जवानों की शहादत के प्रति नमन करता हूं।‘ उसकी मेधा से टक्कर लेने की औकात उसकी विरोधी विचारधारा से जुड़े उस शिक्षण संस्था के छात्रों में नहीं थी और न ही उस शैक्षणिक संस्था के बौने कर्णधारों में थी इसलिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे आकाओं की मदद से एक चक्रव्यूह रचा गया था । सत्ताधारी ताकतें रोहित द्वारा फांसी की सजा के विरोध की चर्चा करती हैं लेकिन रोहित के समूह (अम्बेडकर स्टुडेन्ट्स एसोशियेशन) द्वारा मनु-स्मृति दहन तथा गत नौ वर्षों में 9 दलित छात्रों द्वारा शैक्षणिक उत्पीडन के कारण की गई आत्महत्याओं के विरोध की चर्चा करने का साहस नहीं जुटा पातीं।
  लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में छात्रों के प्रत्यक्ष विरोध के बाद प्रधानमंत्री जिस भाषण में ‘मां भारती के लाल की मृत्यु’ के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं वहीं यह कहने से हिचकिचाते नहीं हैं कि बाबासाहब अपने जीवन में आने वाले कष्ट चुपचाप सहन कर जाते थे , किसी से शिकवा तक नहीं करते थे। बाबासाहब के बारे में प्रधानमंत्री का दावा निराधार है। बाबासाहब द्वारा महाड सत्याग्रह (अस्पृश्यों के वर्जित तालाब से घोषणा करके ,समर्थकों के साथ पानी पीना) तथा मनुस्मृति दहन चुपचाप सहन करते जाने का विलोम थे। पुणे करार के दौरान हुई बातचीत में गांधीजी ने उनकी वकालत के बारे में पूछा था। बाबासाहब ने उन्हें बताया था कि अपने राजनैतिक-सांगठनिक काम के कारण वे वकालत में कम समय दे पा रहे हैं। उसी मौके पर शैशव से तब तक उनके साथ हुए सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न की उनके द्वारा बताई गई कथा गांधी के विचार पत्रों -हरिजनबंधु (गुजराती), हरिजनसेवक (हिन्दी) तथा हरिजन (अंग्रेजी) में छपे थे।
भारतीय समाज और राजनीति में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। पिछड़े और दलित खुली स्पर्धा में अनारक्षित सीटों पर दाखिला पाते हैं,वजीफा हासिल करते हैं और लोक सेवा आयोग की अनारक्षित सीटों पर चुन जाते हैं । यह समाज की सकारात्मक दिशा में गतिशीलता का मानदण्ड बनता है। ऐसे युवाओं की तादाद उत्तरोत्तर बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। गैर आरक्षित खुली सीटों पर चुने जाने वाले ऐसे अभ्यर्थियों के कारण आरक्षित वर्गों के उतने अन्य अभ्यर्थियों को आरक्षण के अन्तर्गत अवसर मिल जाता है। यहां यह स्पष्ट रहे कि यदि अनारक्षित खुली स्पर्धा की सीटों पार आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को जाने से रोका जाए तब उसका मतलब गैर-आरक्षित तबकों के लिए पचास फीसदी आरक्षण देना हो जाएगा। सामाजिक यथास्थिति की ताकतें इस सकारात्मक परिवर्तन से खार खाती हैं। इस प्रकार पढ़ाई-लिखाई में कमजोर ही नहीं मेधावी छात्र-छात्राओं को भी विद्वेष का सामना करना पड़्ता है। यानी उत्पीडन का आधार छात्र का पढ़ाई में कमजोर या मजबूत होना नहीं अपितु उसकी जाति होती है।
  शैक्षणिक संस्थाएं व्यापक समाज का हिस्सा भी हैं और वहीं इनकी अपनी एक दुनिया भी है। हर जमाने के सत्ता संतुलन को बनाये रखने के लिए जिन लोगों की आवश्यकता होती है उनका निर्माण इन संस्थाओं में किया जाता है। रोहित को यथास्थितिवाद का पुर्जा बनाना शिक्षा व्यवस्था के बस की बात न थी। व्यापक समाज और विश्वविद्यालय परिसर को देखने की उसकी दृष्टि सृजनात्मक थी,दकियानुसी नहीं थी। हैदराबाद शहर के बाहर बसाये गये इस परिसर के पेड़-पौधे ,जीव-जंतुओं से लगायत अंतरिक्ष तक उसकी नजर थी। अपनी राजनीतिक पढ़ाई के अलावा कुदरत से मानव समाज की बढ़ रही दूरी को वह शिद्दत से महसूस करता था। उसके फेसबुक चित्रों का एक अल्बम हैदराबाद विश्वविद्यालय की वानस्पतिक और जैविक संपदा के सूक्ष्म निरीक्षण से खींचे गए फोटोग्राफ्स को समर्पित है।
  रोहित जैसा होनहार तरुण की प्रतिभा उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों में पुष्पित-पल्लवित हो सके यह अत्यन्त दुरूह है। इस दुर्गम पथ पर चलते वक्त उसे कदम-कदम पर लड़ना पड़ा होगा। राजनीति और शिक्षा के संचालकों को उसने चुनौती दी होगी। किसी देश का लोकतंत्र उसकी संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण से कमजोर होता है। उन संस्थाओं में लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक तंत्र के हर स्तर पर छात्र-अध्यापक-कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व हो। उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता की पोल खुलनी अब शेष नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री की शैक्षणिक ‘उपलब्धियों’ की सूचनाओं को देने के जिम्मेदार बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई के वक्त ही विश्वविद्यालयी आजादी के बाद केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की बाबत पहली समिति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी थी स्वायत्तता की हकीकत सामने आ गई थी। राष्ट्रीय महत्व की संस्थायें आई.आई.टी. से लगायत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट जैसे तमाम शिक्षण संस्थानों में दिल्ली में बैठे शैक्षणिक तंत्र के नौकरशाहों द्वारा बेहयाई से दखलंदाजियां की गई हैं।
     उच्च शिक्षा केन्द्रों में यौन उत्पीडन की रोकथाम के लिए सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा फैसले की सिफारिशों की मूल भावना के अनुरूप समितियां बनी हैं। जातिगत विद्वेष की रोकथाम के लिए भी इस प्रकार की समितियां गठित होनी चाहिए। फिलहाल विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ बने हुए हैं परन्तु वे नख-दन्त विहीन हैं। लाजमी तौर पर इन समितियों में  पिछड़े और दलित समूहों की नुमाइन्दगी भी होनी चाहिए। यह गौरतलब है कि गैर-शिक्षक कर्मचारी चयन,शिक्षक व गैर-शिक्षक आवास आवण्टन समिति में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर पदेन राष्ट्रपति होते हैं तथा इन्हें विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक-शैक्षणिक जांच के अधिकार का प्रावधान हर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कानून में होता है। इस प्रावधान के तहत सिर्फ काशी विश्वविद्यालय में दो बार विजिटोरियल जांच हुई है न्यायमूर्ति मुदालियर की अध्यक्षता में तथा न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अध्यक्ष रही माधुरी शाह की अध्यक्षता में सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जांच समिति गठित हुई थी। रोहित की मृत्यु के पश्चात एक व्यापक सन्दर्भ की जांच आवश्यक है। निर्भया कान्ड के बाद बने न्यायमूर्ति वर्मा की समयबद्ध कार्यवाही तथा बुनियादी सुधार के सुझावों से हमें सीख लेनी चाहिए तथा उच्च शिक्षा की बाबत उस प्रकार की जांच की जानी चाहिए। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा घोषित जांच इस व्यापक उद्देश्य की दृष्टि से नाकाफी प्रतीत होती है।
अफलातून

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जो पुणे में हुआ वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि डॉक्टर सुहास पलशिकर ने अपने पूरे अकादमिक करियर में लोगों को अंबेडकर के बारे में सिखाया है, खुद मेरे लिए वो अंबेडकर पढ़ाने वाले गुरु समान रहे हैं और ऐसे व्यक्ति पर कुछ अनपढ़ लोग अंबेडकर के नाम पर हमला करें, इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और विडंबना की बात और क्या हो सकती है.

रही मेरी अपनी सुरक्षा की बात, मुझे नहीं लगता है कि मुझे इस बारे में खास चिंता है. जीवनभर सार्वजनिक जीवन में दलित साथियों के साथ काम किया है, दलित आंदोलन के साथ काम किया है और अगर नासमझी में किसी ने कुछ कर भी दिया तो भी दलित आंदोलन के साथ काम करने का एक छोटा हिस्सा होगा, और क्या कहें.

पिछले 24 घंटे की घटनाओं के आधार पर संसदीय लोकतंत्र के बारे में अपनी धारणा बदलना तो वाजिब नहीं होगा. मैं संसद का सम्मान करता हूं, एक संस्था के रूप में. हमारे जो सांसद हैं और देश के राजनेता हैं, मैं उनका भी सम्मान करता हूं क्योंकि मैं राजनीति में आस्था रखता हूं.

‘सांसदों की नासमझी’

राजनीति इस देश की प्राणवायु है. जो अच्छा है, बुरा है- दोनों राजनीति के जरिए होता है और राजनीति को सिर्फ इसलिए खारिज कर देना कि कुछ राजनेताओं ने हल्के किस्म की हरकत की ये बहुत बड़ी भूल होगी. इतना जरूर है कि कल और कल ही नहीं, इससे भी पहले संसद में एक-दो बार पाठ्य पुस्तकों पर बात हुई है, इससे पहले हिंदी में हुई थी और प्रेमचंद की कहानी पर चर्चा हुई थी.

उन सबमें सांसदों ने जिस नासमझी का परिचय दिया है, जिस पाठ्य पुस्तक ने अंबेडकर को स्थापित करने की कोशिश की, उस पाठ्य पुस्तक को अंबेडकर विरोधी करार दिया है.

बिना एक शब्द पढ़े किसी चीज के बारे में राय व्यक्त की ये सब सांसदों की और संसद की गरिमा के अनुरूप नहीं है और मुझे यकीन है कि इस भेड़चाल से मुक्त होकर हमारे देश की संसद कुछ बेहतर सोच सकेगी.

और अगर नहीं सोचती तो एक नागरिक के नाते मेरा फर्ज है कि मैं संसद को चेताऊं, संसद को बताऊं लेकिन उस संस्था का निरादर करना भूल होगी.

अगर हम ईमानदारी से बात करें तो हमें पूरे समाज को इस दायरे में लेना चाहिए. सवाल केवल संसद के भीतर हो रही असहिष्णुता का नहीं है, संसद के बाहर भी ये हो रहा है.

चाहे वो किसी धर्म के मामले में हो, चाहे कोई फिल्म बन जाती है अभी भी हमारे समाज को इन मूल्यों का आदर करना चाहिए कि कुछ चीजें होती हैं जिन्हें सरकार के अंकुश से बाहर रखना चाहिए, जिन्हें समाज के अंकुश से बाहर रखना चाहिए. एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में कुछ ऐसे कोने होने चाहिए जिन्हें बहुमत से मुक्त रखा जाना चाहिए.

‘हीरो-वर्शिप है खतरनाक’

ये समझना हमारे समाज के लिए बहुत कठिन रहा है. तमाम तरह की घटनाओं में हमने देखा है और मैं समझता हूं कि समाज ठोकर खाकर सीखता है. उस ठोकर में एक-दो छोटे लोग शहीद हो जाते हैं, वो छोटी बात है.

कहीं न कहीं ये प्रतीकों की राजनीति है और ये खौफ है कि यदि मैं एक सही चीज के पक्ष में खड़ा दिखाई न दिया तो न जाने मुझे क्या हो जाएगा. ये खौफ कल हमने काफी संजीदा सांसदों में भी देखा जो अन्यथा बड़े संजीदा लोग हैं सही तरीके से सोचते हैं. उसकी वजह मैं समझता हूं वो एक बुनियादी कमजोरी में है, जो केवल मानसिक कमजोरी नहीं है. जो लोग जमीन से दलित समाज के लिए राजनीति कर रहे हैं, जो दलित समाज के दुख-दर्द और उनके संघर्ष में शामिल हैं उन्हें इन संकेतों की राजनीति से खौफ नहीं होगा.

अमूमन जो लोग जमीन पर कुछ नहीं कर रहे होते हैं लेकिन फिर भी अपनी दुकान ठीकठाक रखना चाहते हैं, वो इन संकेतों की राजनीति में ज्यादा उलझते हैं. कांचा इलैया ने जो कहा वो मैं सुन नहीं पाया लेकिन जो रिपोर्टिंग मैंने सुनी वो सुनकर मुझे बहुत अफसोस हुआ क्योंकि खुद डॉक्टर अंबेडकर ये नहीं मानते थे. उन्होंने खुद कहा कि ‘हीरो-वर्शिप’ लोकतंत्र के लिए बड़ी खतरनाक बात है.

असहमति की रक्षा

रही बात इन पाठ्य पुस्तकों की. इनमें सिर्फ अंबेडकर पर कार्टून नहीं हैं, इसमें नेहरू पर कई कार्टून हैं, इसमें इंदिरा गांधी पर अनेक कार्टून हैं. गांधी जी के बारे में कार्टून हैं और जाहिर है कार्टून किसी का महिमामंडन नहीं करते, ये विधा है जो चोट करती है और जो लोग इस विधा का क, ख, ग नहीं समझते हैं, उन्हें कुछ समझने की जरूरत है और हां, हमें इस किस्म की प्रवृत्ति का बाकायदा निषेध करना चाहिए. लेकिन ये लड़ाई है जो सिर्फ एक कानून से, सिर्फ एक सरकार से, सिर्फ संसद के दो सदनों से न लड़ी जाएगी न हारी जाएगी न जीती जाएगी.

इसके लिए हमें, आपको, सबको सड़क पर आकर खड़ा होना होगा. जो व्यक्ति अपने आप को जनतांत्रिक मानता है, वो अपने आप से एक बात पूछे, क्या मैंने कभी ऐसे व्यक्ति के अधिकार की रक्षा की जिससे मैं असहमत था. ये मैं समझता हूं एक कसौटी होनी चाहिए. जिससे मैं असहमत हूं, क्या मैं उसके न्यूनतम अधिकार की रक्षा करने के लिए खड़ा होने को तैयार हूं. जिस दिन हम सब ये करने को तैयार होंगे, लोकतंत्र सुदृढ़ होगा.

अरुण शौरी की किताब वास्तव में डॉक्टर अंबेडकर के विरुद्ध आलोचना करते हुए, काफी तीखी और कई बार एक मर्यादा के पार आलोचना करती किताब थी, मैं उसकी भी रक्षा करुंगा. जो उन्हें तथ्य लगते थे, उन्होंने उसके आधार पर लिखा था, एक लोकतंत्र में वो कहने का भी सम्मान होना चाहिए. जिससे असहमत हैं, उसके अधिकारों की रक्षा करना एक लोकतांत्रिक मूल्य है.

असहिष्णुता और निरक्षरता

इस लिहाज से मैं अरुण शौरी के किताब लिखने और छापने के अधिकार की रक्षा करना चाहूंगा. लेकिन एनसीईआरटी वाली किताब बुनियादी तौर पर एकदम भिन्न है क्योंकि डॉक्टर अंबेडकर के दर्शन को हमारे संविधान में स्थापित करने और उनके महत्व को स्थापित करने का एक भाव इसमें अंतर्निहित है.

ये न सिर्फ हमारे समाज की असहिष्णुता का परिचय है बल्कि हमारी राजनीतिक निरक्षरता का भी परिचय है. कल तक जो आरएसएस, बीजेपी वाले करते थे, वही आज अंबेडकर के नाम पर हो रहा है, परसों किसी और नाम से हो जाएगा. लेकिन असहिष्णुता के साथ ही ये निरक्षरता का भी लक्षण है कि अब हम पढ़ना भी नहीं चाहते कि हम किस चीज का विरोध कर रहे हैं.

हर लोकतंत्र का अपना एक मिजाज होता है. उसकी अपनी एक गति होती है. उसके अपने गुण होते हैं, उसकी अपनी सीमाएं होती हैं. यूरोप के लोकतंत्र की कहानी दरअसल इतनी गौरवमय है नहीं क्योंकि वो समाज एक सीमित अर्थ में लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कर सका लेकिन जहां-जहां विविधता का सवाल आया, उन समाजों को बहुत दिक्कत हुई. वैचारिक सहिष्णुता और संस्थाओं की स्वायत्तता हमारे लोकतंत्र की बहुत बुनियादी खामियां हैं जिसमें हम मर्यादाएं बना नहीं पाए.

आधुनिक रोग

मर्यादा का उल्लंघन हुआ या नहीं, उससे पहले ये देखना होगा कि मर्यादा है क्या और इसके बारे में हमारा समाज, हमारा लोकतंत्र कुछ स्वस्थ परम्पराएं अभी विकसित नहीं कर पाया है. जहां हम किसी चीज से असहमत होते हैं, वहीं हम उस चीज पर पाबंदी लगाना चाहते हैं, चाहे कोई किताब हो नया विचार हो. इस सहिष्णुता को विकसित कर सकना हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत गहरी चुनौती है.

आज ये असहिष्णुता सिर्फ दाएं बाजू से या बाएं बाजू से नहीं आ रही है बल्कि ये चारों तरफ से आ रही है. इस स्वायत्तता और सहिष्णुता को दीर्घकालीन परिपाटी के तौर पर विकसित करना होगा.

हर समाज अपने ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ को अलग-अलग विधा में अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग तरीके से व्यक्त करता है. अपने ही समाज के बारे में हिंदुस्तानी जिस तरह से चुटकुले सुनाते हैं, मैं समझता हूं दुनिया में उसका कम मुकाबला होगा, परम्परागत समाज में राम के बारे में क्या नहीं बोला गया, क्या नहीं लिखा गया.

कृत्रिम तरीके से ओढी गई संवेदनशीलता हमारे समाज में विकसित की जा रही है. मैंगलूर में पब वाली हरकत हो, शिवाजी के नाम पर हरकत हो, चाहे वो अरविंदो वाली किताब के बारे में हो, सलमान रुश्दी के बारे में, इन तमाम मामलों में विरोध करने वाला, असहिष्णुता दिखाने वाला, दूसरे विचार का गला घोंटने वाला वर्ग दरअसल आधुनिक शिक्षा लिए हुए, किसी न किसी आधुनिकता का सपना लिए होता है, मैं समझता हूं ये हमारे समाज का आधुनिक रोग है और हमें इसकी आधुनिक काट बनानी होगी.

योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

साभार http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/05/120512_ambedkar_cartoon_yogendra_yadav_sdp.html

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“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

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सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता , औरंगाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ट वकील , समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्य साथी प्रवीण वाघ हमारे बीच नहीं रहे । युवक क्रांति दल (युक्रांद) से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी जनपरिषद के संस्थापकों में प्रमुख थे। मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहब अम्बेडकर के नाम पर करने के आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी।  आपके पिता चन्द्रमोहन वाघ औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी में सक्रिय थे तथा डॉ. अम्बेडकर के निकट सहयोगी थे तथा अम्बेडकर साहब द्वारा शुरु पत्रिका का प्रकाशन करते थे।

प्रवीण वाघ

सामाजिक न्याय के प्रबल प्रवक्ता प्रवीण वाघ

असंगठित मजदूरों के सवाल को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाते थे । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के बहुजन समाज पर पड़ने दुष्प्रभाव को वे बखूबी प्रस्तुत करते थे।  कुटुम्बीजन इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति पायें ।

साथी तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचायेंगे।

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वाराणसी ,२६ जनवरी ,२०११ । समाजवादी जनपरिषद और पटरी व्यवसायी संगठन ने गणतंत्र-दिवस के मौके पर रश्मि नगर से जुलूस निकाला । जुलूस के पूर्व स्थानीय थानाध्यक्ष ने जुलूस में शामिल लोगों को भयाक्रांत करने की निष्फल करने की कोशिश । पिछले कई महीनों से नगर में बेवजह लागू धारा १४४ को बहाना बना कर जनता की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को दबाने के प्रयास को गणतंत्र-दिवस के मौके पर नगरवासियों ने निष्फल किया । जुलूस में शामिल लोगों ने ’देश का संविधान किसने बनाया ?- बाबासाहब; बाबासाहब ’, ’संविधान का क्या पैगाम ?- मानव-मानव एक समान’, ’कमाने वाला खायेगा; लूटने वाला जायेगा;नया जमाना आयेगा’,नया जमाना कौन लायेगा-हम लायेंगे तथा ’वोट हमारा ,राज तुम्हारा – नहीं चलेगा’,’पटरी-नीति लागू करो’ जैसे नारे लगाये ।

जुलूस विश्वविद्यालय सिंहद्वार,रविदास गेट ,अस्सी चौराहा ,दुर्गाकुंड,संकटमोचन होते हुए लंका पर समाप्त हुआ जहां एक नुक्कड सभा की गई । जुलूस और सभा में मुख्य तौर पर काशीनाथ रावत,काली प्रसाद सोनकर ,मोहम्मद भुट्टो,चन्द्रमा प्रसाद,जिलाध्यक्ष तेजबली,छांगुर राम ,नन्दलाल यादव,मंगल सोनकर, पन्नालाल ,दल के राष्ट्रीय सचिव चंचल मुखर्जी,पटरी व्यवसायी संगठन के अध्यक्ष काशीनाथ एवं अफलातून शामिल थे ।

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[ मद्रास के प्रसिद्ध पत्र संडे आबजर्वर के सम्पादक श्री पी. बालासुब्रम्ण्या ने बाबा साहब के सम्मान में , २३ दिसम्बर १९४४ को वहाँ के कन्नेमारा होटल में एक लंच दिया था । ]

अम्बेडकर,पेरियार,जिन्ना

मित्रों ,जहाँ तक मैंने अध्ययन किया है , मैं कह सकता हूँ कि मद्रास की अब्राह्मण-पार्टी का संगठन भारत के इतिहास की एक विशिष्ट घटना है । इस बात को बहुत कम लोग समझ सकते हैं कि यद्यपि इस पार्टी का जन्म साम्प्रदायिकता के आधार पर हुआ था , जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट झलकता है , फिर भी इस पार्टी का मौलिक आधार और वास्तविक ध्येय साम्प्रदायिक नहीं था । यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है कि अब्राह्मण पार्टी का संचालन किसने किया ? भले ही इसका संचालन किसी ’मध्य वर्ग’ ने किया हो , जिसके एक सिरे पर ब्राह्मण रह रहे हैं और दूसरे सिरे पर अछूत , तो भी यदि यह पार्टी लोकतंत्र पर आश्रित न होती , तो इसका कुछ मूल्य न होता । इसीलिए हर लोकतंत्रवादी को इस पार्टी की उन्नति और विकास में दिलचस्पी रही है ।

इस देश के इतिहास में जहाँ ब्राह्मणवाद का बोलबाला है , अब्राह्मण पार्टी का संगठन एक विशेष घटना है और इसका पतन भी उतने ही खेद के साथ याद रखी जाने वाली एक घटना है । १९३७ के चुनाव में पार्टी क्यों एकदम धराशायी हो गयी , यह एक प्रश्न है , जिसे पार्टी के नेताओं को अपने से पूछना चाहिए। चुनाव से पहले लगभग २४ वर्ष तक मद्रास में अब्राह्मण-पार्टी ही शासनारूढ़ रही । इतने लम्बे समय तक गद्दी पर बैठे रहने के बावजूद अपनी किसी गलती के कारण पार्टी चुनाव के समय ताश के पत्तों की तरह उलट गई ? क्या बात थी जो अब्राह्मण-पार्टी अधिकांश अब्राह्मणों में ही अप्रिय हो उठी ? मेरे मत में इस पतन के दो कारण थे । पहला कारण यह है कि इस पार्टी के लोग इस बात को साफ नहीं समझ सके कि ब्राह्मण-वर्ग के साथ उनका क्या वैमनस्य है ? यद्यपि उन्होंने ब्राह्मणों की खुल कर आलोचना की,तो भी क्या उनमें से कोई कभी यह कह सका था कि उनका मतभेद सैद्धान्तिक है । उनके भीतर स्वयं कितना ब्राह्मणवाद भरा था । वे ’ नमम’ पहनते थे और अपने आपको दूसरी श्रेणी के ब्राह्मण समझते थे। ब्राह्मणवाद को तिलांजलि देने के स्थान पर वे स्वयं ’ब्राह्मणवाद’  की भावना से चिपटे हुए थे और समझते थे कि इसी आदर्श को उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ करना है । ब्राह्मणों से उन्हें इतनी ही शिकायत थी कि वे उन्हें निम्न श्रेणी का ब्राह्मण समझते हैं ।

ऐसी कोई पार्टी किस तरह जड़ पकड़ सकती थी जिसके अनुयायी यह तक न जानते कि जिस पार्टी का वे समर्थन कर रहे हैं तथा जिस पार्टी का विरोध करने के लिए उनसे कहा जा रहा है ,उन दोनों में क्या-क्या सैद्धान्तिक मतभेद हैं । उसे स्पष्ट कर सकने की असमर्थता , मेरी समझ में , पार्टी के पन का कारण हुई है । पार्टी के पतन का दूसरा कारण इसका अत्यन्त संकुचित राजनैतिक कार्यक्रम था । इस पार्टी को इसके विरोधियों ने ’नौकरी खोजने वालों की पार्टी ’ कहा है ।मद्रास के ’हिन्दू’ पत्र ने बहुधा इसी शब्दावली का प्रयोग किया है। मैं उसक आलोचना का अधिक महत्व नहीं देता क्योंकि यदि हम ’ नौकरी खोजने वाले ’ हैं, तो दूसरे भी हम से कम ’नौकरी खोजने वाले’ नहीं हैं ।

अब्राह्मण-पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रम में यह भी एक कमी अवश्य रही कि उसने अपनी पार्टी के कुछ युवकों के लिए नौकरी खोजना अपना प्रधान उद्देश्य बना लिया था। यह अपनी जगह ठीक अवश्य था। लेकिन जिन अब्राह्मण तरुणों को सरकारी नौकरियां दिलाने के लिए पार्टी बीस वर्ष तक संघर्ष करती रही, क्या उन अब्राह्मण तरुणों ने  नौकरियाँ मिल जाने के बाद पार्टी को स्मरण रखा ? जिन २० वर्षों में पार्टी सत्तारूढ़ रही ; इस सारे समय में पार्टी गांवों में रहने वाले उन ९०  प्रतिशत अब्राह्मणों को भुलाये रही, जो आर्थिक संकट में पड़े थे और सूदखोर महाजनों के जाल में फँसते चले जा रहे थे ।

मैंने इन बीस वर्षों में पास किये गए कानूनों का बारीकी से अध्ययन किया है । भूमि-सुधार सम्बन्धी सिर्फ़ एक कानून को पास करने के अतिरिक्त इस पार्टी ने श्रमिकों और किसानों के हित में कुछ भी नहीं किया । यही कारण था कि ’ कांग्रेस वाले चुपके से ’ चीर हरण,कर ले गये।

ये घनायें जिस रूप में घटी हैं , उन्हें देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। एक बात जो मैं आपके मन में बिठाना चाहता हूं, वह यह है कि आपकी पार्टी ही आपको बचा सकती है । पार्टी को अच्छा नेता चाहिए , पार्टी को मजबूत संगठन चाहिए , पार्टी को अच्छा प्लैट-फ़ार्म चाहिए ।

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