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Archive for the ‘climate change’ Category

यूपीए सरकार के दौरान अमेरिका से परमाणु डील और परमाणु दायित्व क़ानून के प्रावधानों को देसी-विदेशी निवेशकों के हित में मोड़ने का भले ही भाजपा विपक्ष में रहने के दौरान दस सालों तक विरोध करती रही हो, मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी पारी ठीक वहीं से शुरू की जहां मनमोहन सिंह ने छोड़ी थी. सत्तासीन होने के कुछ ही हफ़्तों बाद मोदी सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया और फिर जल्दी ही देश के परमाणु-विरोधी समूहों और कार्यकर्ताओं को देशद्रोही बताने वाली आईबी रिपोर्ट जारी की गयी, जिसमें  अणुमुक्ति समूह से लेकर सीएनडीपी सहित तमाम समूह शामिल थे. इसके साथ ही प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ जिसमें लगभग हर देश के साथ परमाणु संधि किसी तमगे की तरह शामिल रहती है.
फुकुशिमा दुर्घटना के बाद जहां पूरी दुनिया में विभिन्न देशों ने परमाणु ऊर्जा से तौबा कर ली है, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय लॉबियों के दबाव में अँधेरे कुएं में छलांग लगाने की नीति अपनाई है. नए साल में, एक बार फिर 26 जनवरी को जो कि देश की संप्रभुता का उत्सव होता है, फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांदे मुख्य अतिथि होंगे और फ्रांस से परमाणु डील आगे बढ़ाई जाएगी. दिसम्बर में जब नरेंद्र मोदी रूस गए तो वहाँ भी उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन के साथ परमाणु डील की जिसके तहत कूडनकुलम में अणु बिजलीघरों की संख्या बढ़ाई जाएगी. 2015 में इस रास्ते में निर्णायक मोड़ आए. साल की शुरूआत में 26 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा के दौरान मोदी सरकार ने उनको यह आश्वासन दिया कि किसी दुर्घटना की स्थिति में अमेरिकी कंपनियों को जवाबदेह ठहराने और उनसे मुआवजा माँगने के बजाय भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के माध्यम से उनका मुआवजा भारतीय जनता के पैसों से चुकाएगी. और साल के अंत में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की यात्रा के दौरान भारत-जापान परमाणु समझौते के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया गया जिसका भारत भर में किसानों-मछुआरों और नागरिक समूहों ने विरोध किया, उनके समर्थन में जापान में लोग सडकों पर उतरे तथा दुनिया के कई दूसरे देशों में अणुविरोधी कार्यकर्ताओं ने जापानी दूतावास के दौरान प्रदर्शन किया.
भारत और जापान के बीच यह समझौता इसी वजह से काफी महत्वपूर्ण है कि यह दरअसल 2005 में हुए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का बचा हुआ टुकड़ा है. उस समझौते के दस साल बाद भी अमेरिकी कंपनियों – वेस्टिंगहाउस तथा जेनेरल इलेक्ट्रिक(जीई), और फ्रांसीसी कंपनी अरेवा के अणुबिजली प्रोजेक्ट भारत की ज़मीन पर अटके पड़े हैं तो इसका एक बड़ा कारण भारत और जापान के बीच अब तक परमाणु समझौता न होना है. दोनों बड़ी अमेरिकी परमाणु कंपनियों में इस बीच जापानी शेयर बढ़े हैं और वेस्टिंगहाउस का नाम अब वेस्टिंगहाउस-तोशिबा है और जीई अब जीई हिताची है. बाज़ार में हुए इस बड़े बदलाव ने भारत और अमेरिका की राजनीतिक संधि के सामने समस्या खडी कर दी है. फ्रेंच कंपनी अरेवा के डिज़ाइन में एक बिलकुल ही ज़रूरी पुर्जा – रिएक्टर का प्रेशर वेसल – सिर्फ जापानी कम्पनियां बनाती हैं और उसके लिए भी जापान से भारत का कानूनी करार ज़रूरी है.

लेकिन इस डील को लेकर जापान पर अमेरिका और फ्रांस का दबाव बना हुआ है इसलिए इसको परवान चढाने की कोशिश तो जारी रहेगी. साथ ही, अपने व्यापक प्रभावों के कारण इस डील का बड़े पैमाने पर विरोध भी बना रहेगा. शिंजो आबे की भारत यात्रा के ठीक एक दिन पहले हिरोशिमा और नागासाकी के दोनों मेयर एक साथ आए और प्रेस कांफ्रेंस कर के इस डील का विरोध किया. जापानी राजनीतिक सिस्टम के लिए यह एक असाधारण घटना थी. इसके अलावा, परमाणु दुर्घटना की विभीषिका झेल रहे फुकुशिमा के मेयर कात्सुताका इदोगावा ने भी परमाणु समझौते का मुखर विरोध किया. जापान की कम्यूनिस्ट पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस समझौते का विरोध किया.

शिंजो आबे जिस हफ्ते भारत आए उसी सप्ताह में फुकुशिमा से यह खबर आई की दुर्घटना के चार साल 9 महीने बाद बीस किलोमीटर के दायरे में खतरनाक रेडियोधर्मी कचरे के कुल नब्बे लाख बड़े-बड़े थैले पसरे हुए हैं, जिसको निपटाने के लिए न कोई जगह है न तकनीक क्योंकि परमाणु विकिरण हज़ारों सालों तक रहता है. फुकुशिमा प्लांट अभी भी नियंत्रण से बाहर है और अत्यधिक तापमान को ठंडा रखने के लिए पिछले पांच सालों से प्रतिदिन सौ टन से अधिक पानी काफी दूर से डाला जा रहा है, जो अति-विषाक्त होकर वापस आता है और जापानी सरकार और टेप्को कंपनी के लिए सरदर्द बना हुआ है. इन पांच सालों में हज़ारों टन ऐसा पानी विशालकाय टैंकों में जमा हो रहा है क्योंकि इसे समुद्र में सीधा छोड़ना पूरे प्रशांत महासागर को विषैला बना देगा. फिर भी, बरसात के मौसम में चुपके से कंपनी द्वारा काफी विकिरण-युक्त जहरीला पानी समुद्र में छोड़ने का खुलासा हुआ है.

एक तरफ फुकुशिमा के दुर्घटनाग्रस्त संयंत्र पर काबू नहीं पाया जा सका है तो दूसरी तरफ कम से कम दो लाख लोग जापान जैसे सीमित भूभाग वाले इलाके में बेघर हैं, जिनको सहयोग और मुआवजा देने से सरकार और कंपनी दोनों मुंह मोड़ चुके हैं. इस हालत में, जापान का भारत को परमाणु तकनीक बेचना पूरी तरह अनैतिक है और दरअसल अपने उन परमाणु कारपोरेटों को ज़िंदा रखने की कोशिश का नतीजा है जिनके सारे संयंत्र फुकुशिमा के बाद से पूरे जापान में जन-दबाव में बंद हैं और वे अपना घाटा नहीं पूरा कर पा रहे हैं.

दूसरी तरफ, भारत में परमाणु बिजलीघरों के बेतहाशा निर्माण से लाखों किसानों और मछुआरों की ज़िंदगी तबाह हो रही है और यह परमाणु डील उनके लिए बेहद बुरी खबर है. किसानों की प्राथमिक चिंता तो ज़मीन छीने जाने को लेकर है लेकिन जिन गाँवों की ज़मीन नहीं भी जा रही उनको भी परमाणु बिजलीघरों से बिना दुर्घटना के भी सामान्यतः निकालने वाले विकिरण-युक्त गैस और अन्य अपशिष्टों से बीमारियों का खतरा है, जैसा दुनिया के सभी मौजूदा परमाणु कारखानों के मामले में दर्ज किया गया है. जैतापुर के नजदीक घनी आबादी वाले मछुआरों के गाँव हैं और परमाणु बिजली घर से निकालने वाला गरम पानी आस-पास के समुद्र का तापमान 5 से 7 डिग्री बढ़ा देगा जिससे उनको मिलने वाली मछलियाँ उस इलाके से लुप्त हो जाएँगी. इसके साथ ही भारत में परमाणु खतरे की आशंका भी निर्मूल नहीं है. परमाणु सेक्टर के पूरी तरह गोपनीय और गैर-जवाबदेह होने और आम तौर पर दुर्घटनाओं से निपटने में सरकारी तंत्र की नाकामी के कारण पहले से ही खतरनाक परमाणु संयंत्र भारत आने पर और ज़्यादा खतरनाक हो जाते हैं. परमाणु उत्तरदायित्व मामले पर सरकार और आपूर्तिकर्ता कारपोरेटों के रुख से तो यही पता चलता है कि उनको अपने ही बनाए उत्पादों की सुरक्षा का भरोसा नहीं है और पूरी मीडिया का इस्तेमाल कर के वे जिन संयंत्रों की सुरक्षा का दावा कर रहे हैं और साधारण लोगों को अपनी सुरक्षा दांव पर लगाने को कह रहे हैं, खुद अपना पैसा तक मुआवजे की राशि के बतौर दांव पर रखने को तैयार नहीं हैं.

इसी महीने पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन पर ग्लोबल बैठक (COP21) में भी भारत समेत अन्य सरकारों ने परमाणु ऊर्जा को कार्बन-विहीन और हरित बताकर समस्या की बजाय समाधान का हिस्सा बताने की कोशिश की है और दुनिया भर में परमाणु लौबी की कोशिश है कि इस बहाने विस्तार किया जाए. लेकिन यह तर्क कई स्तरों पर विरोधाभास से भरा हुआ है. एक तो जैतापुर में परामाणु प्लांट लगाने के लिए भारत की सबसे ख़ूबसूरत और पर्यावरणीय दृष्टी से नाज़ुक कोंकण इलाके के पूरे पारिस्थितिक और वनस्पति तंत्र को खुद परमाणु कारखाना बरबाद कर रहा है, और इसके लिए सरकार ने बिलकुल फर्जी तरीके से पर्यावरणीय मंजूरी हासिल की है. दूसरे, वैसे भी परमाणु कारखानों के निर्माण से लेकर युरेनियम ईंधन के खनन, परिवहन और सैंकड़ों साल तक परमाणु कचरे के निस्तारण में कार्बन-उत्सर्जी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल होता है जिनको परमाणु लौबी अपने कार्बन छाप (footprint) में नहीं गिनती.

दिसंबर में जापानी परधानमंत्री जैसे नरेंद्र मोदी के लिए सांता क्लॉज़ बन के आए थे. बुलेट ट्रेन, लड़ाकू नौसेनिक विमान, औद्योगिक गलियारे के लिए निवेश और भारत-जापान परमाणु समझौता. भारतीय मीडिया को ज़्यादा तरजीह देने लायक मामले बुलेट ट्रेन और बनारस में शिंजो आबे की गंगा आरती ही लगे, लेकिन इसी बीच परमाणु समझौते को भी मुकम्मल घोषित कर दिया गया. हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञान व अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रभारी पत्रकार परमीत पाल चौधरी ने अपने सरकारी स्रोतों के हवाले से इस परमाणु डील को फाइनल करार दे दिया और यह भी खबर दी कि अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस अब रास्ता साफ़ होने के बाद 1000 मेगावाट क्षमता के 6 परमाणु बिजली कारखाने बेचने का मसौदा लेकर तैयार है.

लेकिन भारत में मीडिया और सरकार के दावों के विपरीत, परमाणु समझौता अभी संपन्न नहीं हुआ है. भारत और जापान की साझा घोषणा में परमाणु मसले पर सैद्धांतिक सहमति का उल्लेख है और इसके लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर होने की सूचना है. यह एमओयू भारतीय सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन जापान में इसे साझा किया गया है. यह एमओयू दो लम्बे वाक्यों की घोषणा भर है जिसमें समझौता शब्द तीन बार आता है – हमने द्वीपक्षीय समझते के लिए समझौता कर लिया है ताकि निकट भविष्य में समझौता हो पाए. यह एमओयू परमाणु डील को दोनों तरफ के अधिकारियों के हवाले कर देता है, जिससे भारतीय मीडिया ने अपने हिसाब से यह अर्थ निकाला कि शीर्ष स्तर समझौता हो गया और बाकी ब्योरों पर काम होना भर बचा है. जबकि जापानी मीडिया और राजनीतिक गलियारों में स्थिति बिलकुल उलटी है. भारत के साथ परमाणु डील जापान की पारंपरिक अंतर्राष्ट्रीय नीति से मेल नहीं खाता क्योंकि जापान हिरोशिमा के बाद परमाणु निरस्त्रीकरण का पैरोकार रहा है और परमाणु अप्रसार संधि(एनपीटी) से बाहर के देशों से परमाणु तकनीक का लेन-देन नहीं करता. जापान के विदेश-मंत्रालय और नीति अधिष्ठान में पिछले दस सालों से इस बात को लेकर एक मजबूत अंदरूनी अस्वीकार्यता रही है और कयास यही लगाए जा रहे थे कि अगर डील हो पाती है तो विदेश मंत्रालय और इसके अधिकारियों को किनारे रखकर जापान के दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के व्यक्तिगत दबाव में ही होगी. इस डील की जद्दोजहद को वापस मंत्रालय तक पहुँचने को जापान में एक कदम पीछे जाना समझा जा रहा है. लेकिन मोदी जी के भारत में अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों का ढोल पीटने से कौन रोक सकता है.

परमाणु ऊर्जा का सच

जैतापुर या कूडनकुलम का आंदोलन हो या भारत-जापान परमाणु समझौते के खिलाफ इस हफ्ते होने वाला देशव्यापी आंदोलन, इन सभी मौकों पर देश के शहरी मध्यवर्ग और उसके साथ-साथ मीडिया से लेकर अदालतों तक सबका रुख यही रहता है कि विस्थापन, पर्यावरण और सुरक्षा के सवाल तो अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन भारत को बिजली तो चाहिए।विकास तो चाहिए। देश के लिए विकास, विकास के लिए बेतहाशा बिजली और बिजली के लिए अणु-बिजलीघर, इन तीनों कनेक्शनों को बिना किसी बहस के सिद्ध मान लिया गया है और आप इस तर्क की किसी भी गाँठ को दूसरी सूचनाओं-परिप्रेक्ष्यों से खोलने की कोशिश करते हैं तो राष्ट्रद्रोही करार दे दिए जाते हैं.

2011 के मार्च में फुकुशिमा दुर्घटना हुई और जब बीबीसी ने साल के अंत में एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वे कराया तो यह पाया कि पूरी दुनिया में दुर्घटना के बाद अणुऊर्जा को लेकर आम धारणा बदली है और परमाणु ऊर्जा को लेकर जनसमर्थन न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया है. फुकुशिमा में जो हुआ, और अब भी हो रहा है, वह पूरी दुनिया की आँखें खोलने वाला साबित हुआ है और पिछले पांच सालों में कई देशों ने अपनी ऊर्जा नीति में आमूलचूल बदलाव किए हैं. जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्वीडन और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों ने पूरी तरह परमाणु-मुक्त ऊर्जानीति बनाई है तो फ्रांस ने जिसकी 75% बिजली अणुऊर्जा से आती है, इसको तत्काल 50% तक लाने की घोषणा कर दी है और वहाँ क्रमशः इसे और कम किया जाएगा।लेकिन इसी दौरान भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर कूडनकुलम में स्थानीय लोगों का आंदोलन चल रहा था, और भारत की सरकार ने ग्रामीणों के सवालों को वाजिब मानकर उनसे बात करने की बजाय मनोवैज्ञानिक चिकित्सकों का एक दल देश के सबसे प्रसिद्ध मनोचिक्त्सा संस्थान से भेजा!

जब इन काउंसिलरों से बात नहीं बनी तो हज़ारों पुलिस और अर्द्धहसैनिक बल भेजे गए और जल्दी ही पूरे गाँव को घेर कर उसका खाना-पानी-यातायात सब हफ्ते भर काट दिया गया, लोगों को पुलिस ने घर में घुसकर पीटा और उनकी नावें तोड़ दीं, और मनमोहन सिंह सरकार ने उस उलाके के आठ हज़ार से अधिक लोगों के ऊपर देशद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया। बर्बर सरकारी दमन में चार लोग मारे गए और औरतों समेत सैंकड़ों स्थानीय लोग महीनों तक जेल में ठूंस दिए गए. मछुआरों की शांतिपूर्ण रैली को पुलिस ने खदेड़कर समुद्र में धकेल दिया जहां उनके ऊपर नौसेना के विमान मंडरा रहे थे. किसी सरकार ने अपने ही लोगों के खिलाफ ऐसा खुला युद्ध लड़ा हो, इसकी मिसालें कम ही मिलती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी कूडनकुलम केस में उठाए गए आठ छोटे और ठोस सवालों – जिनका सम्बन्ध इस परियोजना में पर्यावरण और सुरक्षा नियमों की घातक अवहेलना से था – पर कुछ नहीं कहा और जजों ने 250 पन्नों के फैसले में बार-बार सिर्फ यही दुहराया कि देश को विकास और ऊर्जा की ज़रुरत है. और इस आधार पर अणुऊर्जा विभाग को सादा चेक दे दिया, जैसे परमाणु ऊर्जा अगर ज़रूरी हो तब खुद सरकारी सुरक्षा मानकों की खुली अवहेलना भी वाजिब हो जाए. कूडनकुलम केस में तो कोर्ट से याचिका में यह पूछा तक नहीं गया था कि वह बताए कि देश को परमाणु ऊर्जा चाहिए कि नहीं, और यह फैसला करना वैसे भी कोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं है.

आखिर फुकुशिमा के बाद भी भारत में परमाणु ऊर्जा को लेकर इतना तगड़ा सरकारी समर्थन क्यों है? फुकुशिमा के बाद की दुनिया में अणुऊर्जा के इतने बड़े विस्तार की योजना बना रहा देश भारत अकेला क्यों बचा है? अपने निर्णायक संकट के दौर से गुज़र रही अंतर्राष्ट्रीय परमाणु लॉबी की आशा भारत क्यों है जहां सरकार पर्यावरणीय कानूनों, सुरक्षा व उत्तरदायित्व के सवालों और स्थानीय जन-प्रतिरोधों सबको किनारे करते हुए उसका स्वागत करने को तैयार है?

क्यों है भारत में परमाणु ऊर्जा की लिए अंधी दौड़?

क्या सचमुच भारत को परमाणु की ज़रुरत है? यह पूछने से पहले सरकार और उसके कारिंदों से यह पूछना चाहिए कि आप इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे कि भारत को परमाणु ऊर्जा की, और वह भी इतनी बड़ी मात्रा में, सचमुच ज़रुरत है? 2004 तक खुद अणु ऊर्जा विभाग के कागज़ों में कहीं इतने बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा के विस्तार का ज़िक्र नहीं था. लेकिन 2006 में घोषित समेकित ऊर्जा नीति में अचानक हमें बताया गया कि सन 2052 तक 250 गीगावाट यानी कुल बिजली का पचीस प्रतिशत परमाणु से आना चाहिए। मौजूदा उत्पादन ढाई प्रतिशत से भी कम है. 2004 और 2006 के बीच ऐसा क्या हुआ? क्या बिजली को लेकर कोई राष्ट्रीय बहस हुई? इसमें गैर-सरकारी विशेषज्ञ और ऊर्जा तथा विकास को ज़मीनी व वैकल्पिक नजरिए से देखने वाले नागरिक शामिल थे? नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ. बल्कि विदेशों से परमाणु बिजलीघरों के आयात और इतने बड़े पैमाने विस्तार की बात खुद अणुऊर्जा विभाग के लिए औचक खबर की तरह आई.

ऐसा इसलिए हुआ कि 2004 और 2006 बीच 2005का साल आया. इस साल भारत और अमेरिका बीच एक व्यापक परमाणु डील हुई. मनमोहन सिंह अमेरिका के दौरे पर थे और परमाणु डील की पेशकश अमेरिकी तरफ से आई थी.

क्या थी यह डील? यह डील भारत सारतः को अमेरिकी विदेश-नीति की आगोश में लेने की कवायद थी जिसके लिए भारत के परमाणु हथियारों को अंतर्राष्ट्रीय वैधता दिलाना इस डील का मकसद था.

भारत ने 1950 और 1960 के दशक में ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका आदि देशों से शांतिपूर्ण उपयोग के नाम पर जो परमाणु तकनीक और सामग्री हासिल की थी, उसी का इस्तेमाल कर के 1974 में पहला बम-विस्फोट किया था, जिसके बाद भारत पर पूरी दुनिया ने परमाणु के क्षेत्र में प्रतिबन्ध लगा दिया था. ये प्रतिबन्ध 1998 के परमाणु टेस्ट के बाद और कड़े किए गए थे. लेकिन 1974 और 1998 के बीच अंतर यह था कि भारत 1991 में अपना बाज़ार खोल चुका था और इतने बड़े उपभोक्ता समूह वाले देश पर आर्थिक प्रतिबन्ध से खुद अमेरिका और पश्चिमी देशों को ही नुकसान हो रहा था. साथ ही, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय चौपालों पर भारत को अपने साथ बिठाना था और ईरान से लेकर चीन तक को लेकर बिछी शतरंज में भारत को अपने साथ रखना था. उस स्तर के एक पार्टनर की हैसियत के साथ भारत पर 35 सालों से चले आ रहे ये प्रतिबन्ध मेल नहीं खाते थे. इसलिए परमाणु डील दरअसल भारत के हथियारों को वैधता देकर उसे बदलती दुनिया में अपने साथ बिठाने की कवायद ज़रूरी थी.

लेकिन भारत पर दशकों से प्रतिबन्ध सिर्फ अमेरिका ने नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी(International Atomic Energy Agency- IAEA) और 46 देशों के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(Nuclear Suppliers Group-NSG) ने लगाए थे और इन मंचों से भारत को मान्यता दिलवाने में और भी समय व उपाय लगे. भारत ने NSG देशों को अपनी एंट्री के बदले में भारी मात्रा में परमाणु बिजलीघर व यूरेनियम खरीदने का वादा किया। इस सौदे में भी अमेरिका को बड़ा शेयर मिला क्योंकि उसी के समर्थन से इतना बड़ा बदलाव संभव हुआ. तो भारत का मानचित्र उठाकर अमेरिका को परमाणु ऊर्जा प्रकल्पों के लिए दो साइट और फ्रांस को एक बड़ी साइट, रूस को दो नई जगहें और अन्य देशों को इन नई अणु-भट्ठियों के लिए भारी मात्रा में ईंधन-खरीद का वादा किया गया.

ऐसा करते समय न तो इन जगहों पर रह रहे लोगों से पूछा गया, न इन इलाकों के पर्यावरण की बात सोची गयी, न ऊर्जा मंत्रालय से पूछा गया कि क्या सचमुच परमाणु ऊर्जा की इतनी बड़ी ज़रुरत है और न ही अब तक बम बनाने की संवेदनशीलता के कारण नियंत्रित स्तर पर काम कर रहे परमाणु ऊर्जा विभाग से यह पूछा गया कि उसके पास इन 35 नई परियोजनाओं के लिए इंजीनियर और अनुभव भी है.

भारत में परमाणु ऊर्जा वैसे ज़रूरी है या नहीं या उसके खतरों के मद्देनज़र क्या विकल्प हैं, यह मेरे लिए एक दूसरी बहस का सवाल है जो जनपथ के पाठकों से करने के लिए मैं तैयार हूँ, लेकिन सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि परमाणु ऊर्जा के महा-विस्तार की मौजूदा योजना का उन सवालों से कोई सीधा लेना-देना है ही नहीं। भारत में लग रहे परमाणु संयंत्र असल में वह कीमत है जो हम परमाणु बमों के लिए – असल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु बम-संपन्न देशों के क्लब में शामिल होने के लिए – चुका रहे हैं.

और यही वजह है कि इन नए बिजलीघरों से देश के पर्यावरण को हो रहे घातक नुकसान के सवाल, इनसे जितने लोगों को बिजली, विकास व रोजगार मिलेगा उससे कहीं बड़ी संख्या में लोग बेघर और आजीविका-विहीन होंगे यह सवाल, देश में परमाणु सुरक्षा के लिए स्वतंत्र व विश्वसनीय ढांचा न होने का सवाल, स्थानीय समुदाओं के लोकतांत्रिक हितों का सवाल, ऊर्जा तथा परमाणु मामलों के उन विशेषज्ञों के सवाल जिनमें से कई सरकार का हिस्सा रहे हैं और देश-विदेश में प्रतिष्ठित हैं – इन सारे का सरकार के लिए कोई मतलब नहीं क्योंकि उसके लिए परमाणु संयंत्रों का आयात विदेशनीति के लेन-देन से जुड़ा है. 2005 में अमेरिका और उसके बाद फ्रांस, रूस, कनाडा, ब्रिटेन, कज़ाख़िस्तान, मंगोलिया, आस्ट्रेलिया जैसे सभी देशों से हुई इन परमाणु डीलों से बंधे होने की वजह से दरअसल भारत ने वह संप्रभुता खो दी है, जिसका इस्तेमाल कर के दूसरे देश फुकुशिमा से सबक लेकर स्वतंत्र और वैकल्पिक ऊर्जा नीति बना रहे हैं.

एक आख़िरी बात यहां जोड़ना ज़रूरी है कि आम समझ या अपेक्षा के ठीक विपरीत, भारत के संसदीय वामपंथ ने अमेरिका के साथ हुए परमाणु डील की इसलिए आलोचना नहीं की थी कि इससे भारत की ज़मीन पर खतरनाक परमाणु संयंत्र आएँगे। सीपीएम की आलोचना का मुख्य स्वर यह था कि इस डील के बदले भारत का भविष्य में परमाणु टेस्ट करने का विकल्प चला जाएगा, इस डील में बाकी तकनीकें मिल रही हैं लेकिन परमाणु ईंधन के पुनर्संस्करण(reprocessing) की तकनीक नहीं मिल रही है, आयातित रिएक्टरों(अणु बिजलीघरों) पर अंतर्राष्ट्रीय निगरानी होगी, इत्यादि इत्यादि।

जैतापुर, मीठीविर्दी और कोवाडा जैसे जगहों के किसान और मछुआरे मध्यवर्ग के उस सपने की मार झेल रहे हैं जिसमें भारत को सुपर पावर बनना है. इतना सबकुछ कर के भी वह हैसियत मिलती दिख नहीं रही क्योंकि जार्ज बुश के दौर से दुनिया आगे बढ़ चुकी है. जिन परमाणु बमों से भारत की ताकत बढ़नी थी, उनके एवज में देश ने ये खतरनाक और महंगे बिजलीघर खरीदना मंजूर किया है और अब उनमें दुर्घटना की स्थिति में विदेशी कंपनियों को मुआवजा न देना पड़े इसकी जुगत में लगी है सरकार। हैसियत और ताकत बम बनाने से नहीं आती. एक तीसरी दुनिया का देश जब शार्टकट इस्तेमाल कर के पहली दुनिया में घुसना चाहता है जबकि आधी से अधिक आबादी दो सदी पीछे जी रही हो, तो यही गत होती है जो भारत की अब हो रही है. प्रधानमंत्री मेगा शो करने वाले फूहड़ नौटंकीबाज़ में तब्दील हो गया है.

परमाणु बम बनाने के बाद कोई शांति नसीब नहीं हुई बल्कि असुरक्षा का एक दुष्चक्र शुरू हुआ है और एटम बम बनाने के डेढ़ दशक बाद भारत दुनिया में सबसे अधिक हथियार खरीदने वाला देश बन बैठा है. परमाणु बमों को लेकर झूठे गर्व और भ्रम पर चर्चा किसी और लेख में.

फिलहाल यह कि जापान के साथ समझौता 2005 से बन रही उस तस्वीर का आख़िरी और निर्णायक टुकड़ा है क्योंकि जापानी पुर्ज़ों की आपूर्ति के बगैर भारत में अमेरिकी और फ्रांसीसी परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं. देश के किसानों-मछुआरों जीविका और ज़िंदगी बचाने का यह आख़िरी मौक़ा है और बात सिर्फ उन्हीं की नहीं है क्योंकि परमाणु दुर्घटना में सिर्फ वे ही नहीं मरेंगे।

यह अटकी हुई डील जैतापुर, मीठी विरदी और कोवाडा के किसानों के लिए आख़िरी उम्मीद है क्योंकि उनकी अपनी सरकार उनको दगा दे चुकी है और बिजली और विकास के पीछे पागल देश का मध्यवर्ग उन्हें भूल चुका है. जैतापुर में 2006 से किसानों और मछुवारों का संघर्ष जारी है, जिसमें 2010 में एक शांतिपूर्ण जुलूस के दौरान पुलिस फायरिंग में एक युवक की जान तक जा चुकी है. पूरे इलाके की नाकेबंदी, स्थानीय आंदोलन के लीडरों को पकड़कर हफ़्तों जेल में डालना, धमकाना-फुसलाना, और आस-पास के जिलों से पहुंचने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को जिलाबदर घोषित करना कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में भी हुआ और अब महाराष्ट्र की भाजपा सरकार में भी जारी है. परियोजना का विरोध करने वाले सभी लोग बाहरी और विदेशी-हित से संचालित घोषित कर दिए गए हैं और फ्रांसीसी कंपनी एकमात्र इनसाइडर और देशभक्त बची है. 2010 में देश के दूसरे इलाकों से समर्थन में पहुंचकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने एक यात्रा निकाली जिसमें पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सावंत भी शामिल थे, लेकिन सबको हिरासत में ले लिया गया. जैतापुर में किसान ज़्यादातर हिन्दू हैं और मछुआरे मुस्लिम. जिन किसानों के नाम ज़मीन थी कम-से-कम उनको मुआवजा मिला लेकिन उन मछुआरों को कुछ नहीं मिला क्योंकि उनके पास समंदर का कोई कागज़ नहीं है. परमाणु प्लांट से जो गर्म अपशिष्ट पानी निकलेगा वह आस-पास के समुद्री तापमान को 5 से 7 डिग्री बढ़ा देगा जिससे मछलियों की खेप समाप्त हो जाएगी. इस संवेदनशील प्लांट के आस-पास समुद्र में जो 5 किमी तक जो सेक्यूरिटी तैनात होगी वह भी साखरी नाटे और कई दूसरे मछुआरे गाँवों की जीविका छीन लेगी क्योंकि उस दायरे में मछली पकड़ना बंद हो जाएगा. शिवसेना और भाजपा का उस इलाके में राजनीतिक प्रभुत्व है और इस मामले को हिन्दू-मुस्लिम बना देने की कोशिश भी वे कर ही रहे हैं.

स्रोतः सामयिक वार्ता

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रात भर चली वार्ताओं में विश्व के राष्ट्राध्यक्ष कोपेनहेगन एक लचर सहमती पर पहुँचे जिसमें पृथ्वी के गरम होने की प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए उद्योगों के उत्सर्जन पर नकेल कसने के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं किए गये हैं । यह समझौता फन्डिंग के मामले में मजबूत था परन्तु मौसम परिवर्तन की बाबत बाध्यकारी नहीं है तथा किसी वास्तविक मौसम सम्बन्धी समझौते पर पर पहुंचने के लिए इसमें किसी निश्चित तिथि की घोषणा भी नहीं की गई है । अमेरिका तथा चीन जैसे सबसे बड़े प्रदूषक मुल्क कमजओर समझौता ही चाहते थे तथा यूरोप , ब्राजील तथा दक्षिण अफ़्रीका जैसे भविष्य के प्रदू्षण चैम्पियन इन दोनों की मंशा को विफल करने के लिए कुछ खास नहीं किया ।

दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष इतिहास न बना सके लेकिन विश्व भर की जनता ने इतिहास बनाया । मुख्यधारा की मीडिया ने जानबूझकर इनकी ढंग से चर्चा नहीं की । ऐसे मौके कई बार आते हैं । बांग्लादेश को दुनिया के किसी देश ने मान्यता जब नहीं दी थी तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विश्व यात्रा में बांग्लादेश को मान्यता दिए जाने की मांग को हर जगह जनता का समर्थन मिला था । विश्व व्यापार संगठन की बैठकों का भी जगह जनता द्वारा विरोध हुआ था और वैश्वीकरण का यह प्रमुख औजार आज ठप-सा पड़ गया है । कोपेनहेगन के सम्मेलन के विरोध में जनता का पक्ष रखने के लिए दुनिया भर में हजारों रैलियाँ और प्रदर्शन हुए । समझौते पर टिप्पणी करते हुए एक अफ़्रीकी आन्दोलनकारी ने कहा , “किसी हाथी को चलवाने में बहुत बड़े प्रयास की जरूरत होती है लेकिन एक बार यदि आप सफल हो गये तो उसे रोकना आसान भी नहीं होता । हाथी डोलने लगा है । “

प्रदर्शनकारियों के समक्ष इंग्लैण्ड के प्रधान मन्त्री को कहना पड़ा , ’ आप लोगों ने दुनिया के लिए आदर्श स्थिति को प्रस्तुत किया है …..राष्ट्राध्यक्षों पर इसका जो असर हुआ है उसे कम कर न आँकिएगा । “

नोबेल पुरस्कार विजेता डेस्मन्ड टुटु ने आन्दोलनकारियों को कहा ,” इस बड़े  मकसद की मशाल आप लोग जलाए रखिएगा । “

पृथ्वी को बचाने की मुहिम एक सम्मेलन से पूरी नहं होने वाली । जनता को मौजूदा औद्योगिक व्यवस्था के विकल्प तैयार करने होंगे ।

कोपेनहेगन सम्मेलन की विफलता के जश्न मिटाने वाले भी मौजूद थी- प्रदूषणकारी उद्योगों की लॉबी की पार्टियों में जश्न मना और शैम्पेन की बोतलें खुलीं । जिन लॉबियों ने दुनिया की जम्हूरी निजाम पर कब्जा जमा रखा है तथा हमारे नेताओं को खरीद रखा है उन्होंने अपनी जीत का जश्न मनाया । जश्न का जाम हाथों में लिए उन्हें भी थोड़ी चिन्ता जनता की ताकत के आधार पर खड़े हो रहे आन्दोलन की हुई होगी । जनता की इस आवाज को खामोश करने की कोशिश भी इस लॉबी के द्वारा शुरु हो चुकी है ।



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