Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘colas’ Category

कन्नूर में : साभार ’मातृभूमि’

गाँधी : क्या आप मुझे यह साबित कर सकते हैं कि आपको उन्हें सड़क का इस्तेमाल करने से रोकने का हक है ? मुझे यह बात पक्की तौर पर लगती है कि इन दलित वर्गों के लोगों को सड़क के इस्तेमाल का आप जितना ही हक है ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि : महात्माजी , आप इन तबकों के लिए ’ दलित’ शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं ? क्या आप जानते हैं कि वे क्यों दलित हैं ?
गाँधी : हाँ , बिल्कुल । जिस वजह से जलियाँवाला बाग में डायर ने बेकसूरों का नरसंहार किया था उसी वजह से वे दलित हैं ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि :इसका मतलब इस रिवाज को शुरु करने वाले डायर थे ? क्या आप शंकराचार्य को एक डायर कहेंगे ?
गाँधी : मैं किसी आचार्य को डायर नहीं कह रहा । परन्तु आपके इस क्रियाकलाप को मैं डायरपने की संज्ञा अवश्य देता हूँ तथा सचमुच यदि कोई आचार्य इस रिवाज की शुरुआत के लिए जिम्मेदार हो तब उसकी इस सदोष अज्ञानता को जनरल डायर की राक्षसी अज्ञानता जैसा मानना होगा ।
गाँधीजी ने जाति-विभेद की तुलना किसी ब्रिटिश अफ़सर द्वारा किए गए क्रूरतम हत्या-काण्ड से की यह दलित-शोषण के प्रति उनकी संवेदना को दरशाता है । यह केरल के वाइकोम स्थित महादेव मन्दिर से सट कर गुजरने वाली सड़क से अवर्णों के गुजरने पर लगी रोक को हटाने की बाबत चले सत्याग्रह के दौरान मन्दिर संचालकों के साथ हुई बातचीत का हिस्सा है । यह गौरतलब है कि मन्दिर-प्रवेश का मसला इसके बाद उठा और सलटा । १९२४ से १९३६ तक चले इस सत्याग्रह अभियान के बाद त्रावणकोर राज्य के ४-५ हजार मन्दिर अवर्णों के लिए खुले ।  १२ साल चले इस आन्दोलन तथा इस दौरान कई बार हुई गांधीजी की केरल यात्राओं का विस्तृत विवरण महादेव देसाई की किताब द एपिक ऑफ़ ट्रैवन्कोर में है। श्रीमती सरोजिनी नायडू ने इसे महागाथा अथवा एपिक की उपमा दी ।
विदेशी आधिपत्य और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष साथ-साथ चला । सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति का निर्माण रचनात्मक कार्यों से होता है। प्रत्येक सत्याग्रही दिन में हजार गज सूत कातते थे ।
आन्दोलन का एक अहम उसूल था- ’जिसकी लड़ाई , उसका नेतृत्व’ । गांधीजी द्वारा ’यंग इंडिया’ का सम्पादन शुरु करने के पहले उसका सम्पादन ज्यॉर्ज जोसेफ़ करते थे । ज्यॉर्ज जोसेफ़ साहब मोतीलाल नेहरू के इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार इंडीपेन्डेन्ट के भी सम्पादक थे । इनके बाद महादेव देसाई इंडीपेन्डेन्ट के सम्पादक बने तथा अंग्रेजों द्वारा छापे खाने पर रोक लगाने के बाद उन्होंने हस्तलिखित प्रतियाँ निकालनी शुरु की । दोनों को साल भर की सजा हुई । आगरा जेल में यह दोनों छ: महीने साथ थे।
बहरहाल, ज्यॉर्ज जोसेफ़ वाईकोम सत्याग्रह के शुरुआती नेताओं में एक थे । मन्दिर के निकट से गुजरने वाले मुद्दे पर श्री टी.के. माधवन एवं श्री के.पी. केशव मेनन के जेल जाने के बाद उन्होंने गांधीजी से उपवास करने की इजाजत मांगी । इसी प्रकार सिखों ने सत्याग्रह स्थल पर लंगर चलाने की इच्छा प्रकट की । गांधी यह मानते थे कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म की व्याधि है इसलिए इसके समाधान का नेतृत्व वे ही करेंगे- लिहाजा दोनों इजाजत नहीं मिलीं । ठीक इसी प्रकार प्लाचीमाड़ा में चले दानवाकार बहुदेशीय कम्पनी कोका-कोला विरोधी संघर्ष को दुनिया-भर से समर्थन मिला- फ़्रान्स के गांधी-प्रभावित वैश्वीकरण विरोधी किसान नेता जोशे बोव्हे , कैनेडा के ’ब्लू गोल्ड’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक द्वय मॉड बार्लो तथा टोनी क्लार्क , नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मेधा पाटकर एवं समाजवादी नेता वीरेन्द्रकुमार ने इस आन्दोलन को समर्थन दिया लेकि उसकी रहनुमा उस गाँव की आदिवासी महिला मायलम्मा ही रहीं । इसी कम्पनी ने जब बनारस के मेंहदीगंज आन्दोलन के दौरान कथित राष्ट्रीय समाचार-समूह को करोड़ों रुपये के विज्ञापन दिए तब मातृभूमि के वीरेन्द्रकुमार जैसे सम्पादक ने प्रथम-पेज सम्पादकीय लिख कर कोक-पेप्सी के विज्ञापन न लेने की घोषणा की तथा उसका पालन किया ।
प्लाचीमाड़ा के आन्दोलन को इस बात का गर्व भी होना चाहिए कि जब साहित्य के क्षेत्र में उपभोक्तावाद का प्रवेश बदनाम बहुराष्ट्रीय कम्पनी के पैसे से साहित्य अकादमी के पुरस्कार प्रायोजित कर हो रहा हो तब देश के वरिष्टतम साहित्यकारों में से एम.टी वासुदेवन नायर , एम.एन विजयन और सारा जोसेफ़ जैसे मलयाली साहित्यकारों ने कोका-कोला विरोधी समर समिति को खुला समर्थन दिया ।
यह तथ्य अत्यन्त रोचक व उल्लेखनीय है कि १२ साल चले केरल के सामाजिक सत्याग्रह के ठीक बीचोबीच बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा गांधीजी की यरवडा जेल में ऐतिहासिक बात-चीत हुई । इतिहासकार बाबासाहब को दलितों में स्वाभिमान का जनक तथा गांधीजी को सवर्णों में आत्म-शुद्धि का प्रेरक मानते हैं । इनकी ऐतिहासिक बातचीत की शुरुआत में बाबासाहब दलित वर्गों के शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान पर जोर दे रहे थे तथा गांधी इस समस्या के मूल में धार्मिक वजह मान रहे थे । बातचीत के बाद गांधी ने शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान के लिए ’हरिजन सेवक संघ’ बनाया तथा बाबासाहब ’धर्म-चिकित्सा’ एवं धर्मान्तरण तक गये । केरल के सत्याग्रह में हम आत्म-शुद्धि और आत्मसम्मान दोनों का संयोग देख सकते हैं ।
कन्नूर भी मेरे शहर बनारस की तरह हथकरघे के लिए मशहूर है । खेती के बाद हथकरघा ही सबसे बड़ा रोजगार मुहैया कराता था । अगूँठा-काट वस्त्र नीति ने यह परिदृश्य पूरी तरह बदल दिया है । इस नीति का तिहरा प्रभाव पड़ा है : गरीब तबके पोलियस्टर पहनने के लिए मजबूर हो गये हैम चूँकि यह सरकारी नीति और सब्सिडी के कारण अब सते हो गये हैं  , सरकार की इस नीति के कारण एक अज्ञात परिवार देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बन गया है तथा हथकरघा बुनकर अस्तित्व रक्षा के लिए सम्घर्ष कर रहे हैं ।
’मातृभूमि’ पत्र की साल भर चलने वाली यह मुहिम बुनकरों की रक्षा के लिए उपायों पर भी विचार करेगी , यह मैं आशा करता हूँ ।
स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों को मेरे हाथों सम्मानित कराने से एक नैतिक बोझ मेरे सिर पर आ पड़ा है। आजादी की लड़ाई के मूल्य : रचना-संघर्ष साथ-साथ ,जिसकी लड़ाई उसका नेतृत्व जैसे मूल्यों के साथ लड़ाई जारी रखने के लिए उनका आशीर्वाद मेरे जैसों को मिले यह प्रार्थना है ।
अफ़लातून , सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी , समाजवादी जनपरिषद .
इस केरल यात्रा से जुड़ी अन्य पोस्ट-

Read Full Post »

    भारत के मध्यम वर्ग को आकर्षित करने वाला ,  फाँय – फाँय अंग्रेजी बोलने वाला और अँग्रेजी में सोचने वाला शशि थरूर । पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद की होड़ में भी शरीक होने पर एक भारतीय मूल का व्यक्ति होने के नाते ज्यादातर भारतीयों की सहानुभूति बटोरने वाला !

    संयुक्त राष्ट्र , विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में ३ से ५ साल नौकरी कर लेने के बाद आजीवन डॉलर में पेंशन पाने वाली छोती-सी जमात का सदस्य । आज कल यह पेंशन लाखों रुपये प्रति माह में होती है । पिछले साल राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति के वेतन बढ़ाने के बाद भी इस पेंशन से कम है।

    ऐसे थोबड़ों को ही कोका कोला जैसी कम्पनियाँ कोका कोला इण्डिया फाउन्डेशन की सलाहकार समिति में रखती हैं और केरल के ही प्लाचीमाड़ा में चले कोका कोला कम्पनी द्वारा अकूत जल दोहन और प्रदूषण के खिलाफ़ आदिवासियों के आन्दोलन के खिलाफ़ बयान दिलवाने का काम करती है । जावेद अख़्तर और मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति जे एस वर्मा भी उक्त सलाहकार समिति की शोभा बढ़ाने वाले शक्स हैं ।

    पेप्सी कोला और कोका कोला की करतूतों के बारे में इस चिट्ठे पर चर्चा होती रही है । चाहे इन कम्पनियों द्वारा अकूत जल दोहन हो , बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो , मजदूरों के साथ रंगभेद हो , मजदूर नेताओं की हत्या हो , किसानों के साथ धोखाधड़ी हो अथवा उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा देना हो । पाठक इनके बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं ।

   फिलहाल कांग्रेस के टिकट पर केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम शशि थरूर चुनाव लड़ रहे हैं । अमेरिकी चुनाव में दोनों प्रमुख दलों को विशाल चन्दा देने वाली यह दोनों शीतल पेय कम्पनियाँ भारत में अपने प्रवक्ताओं को सीधे चुनाव लड़ा रही हैं । जन आन्दोलनों ने शशि थरूर को हराने के लिए अभियान चलाने का फैसला किया है । यह गौर तलब है कि संयुक्त संसदीय समिति द्वारा इन पेयों में कीटनाशक अवशेष पाये जाने की पुष्टि के बावजूद अब तक इस बाबत सरकार ने मानदण्ड तैयार नहीं किए हैं । कांग्रेस और भाजपा के प्रमुख वकील सांसद (कपिल सिब्बल और अरुण जेटली सरीखे)  इनके हक में न्यायालय में इनकी पैरवी करते हैं।

      शशि थरूर हराओ अभियान के प्रति आपके सहयोग और समर्थन की अपील कर रहा हूँ ।

Read Full Post »

”उपभोग जीवन की बुनियादी जरूरत है . इसके बगैर न जीवन सम्भव है और न वह सब जिससे हम जीवन में आनन्द का अनुभव करते हैं.

  इसके विपरीत ऐसी वस्तुएं , जो वास्तव में मनुष्य की किसी मूल जरूरत या कला और ग्यान की वृत्तियों की दृष्टि से उपयोगी नहीं हैं लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से प्रचार के द्वारा उसके लिए जरूरी बना दी गयी हैं ,उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं . “

                                    – सच्चिदानन्द सिन्हा

  कोला पेय पूरी तरह उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं . पूरी तरह अनावश्यक और नुकसानदेह होने के बावजूद इनका एक बहुत बडा बाजार है . वर्ष २००२ में कोका – कोला कम्पनी की शुद्ध आय ३०५ करोड डॊलर थी और पेप्सीको की १९७ करोड डॊलर . शुद्ध आय में इन कम्पनियों के प्रमुखों को मिलने वाली धनराशि शामिल नही होती . शेयर , बोनस तथा अन्य मुआवजों को जोडने पर सन १९९८ के पेप्सीको प्रमुख रोजर एनरीको की वार्षिक आमदनी ११,७६७,४२१ डॊलर थी जबकि उनका ‘वेतन’ मात्र एक डॊलर था . अपने – अपने वेतन या मजदूरी के बल पर इस रकम की बराबरी करने में अमरीकी राष्ट्रपति को ५८ वर्ष लगते,औसत अमरीकी मजदूरी पाने वाले अमरीकी मजदू ४६१ वर्ष लगते तथा अमेरिका न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूर को १०९८ वर्ष लग जाते . १९९१ में कोका कोला के प्रमुख डगलस आईवेस्टर की वार्षिक आय ३३,५९३,५५२ डॊलर थी.अमेरिका में न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूर को यह रकम कमाने में ३१३६ वर्ष लगते ,औसत मजदूरी पाने वाले को १३१७ वर्ष तथा अमरीकी राष्ट्रपति को १६७ वर्ष लगते . कोका – कोला के प्रमुख डगलस डाफ़्ट को हजारों कर्मचारियों की छंटनी करने के पुरस्कारस्वरूप ३० लाख डॊलर बोनस के रूप में दिए गये.समाजवादी चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा के शब्दों में ‘उदारीकरण के आर्थिक दर्शन में मजदूरों की छंटनी औद्योगिक सक्षमता की अनिवार्य शर्त है’ . भारत में इन दोनों कम्पनियों के उत्पादो के प्रचार हेतु बनी चन्द मिनट की एक व्ग्यापन फिल्म का खर्च करोडों रुपये में आता है . इनमें काम करने वाले क्रिकेट खिलाडियों और सीने कलाकारों को कुच करोड रुपए तक मिल जाते हैं .जाहिर है इन कम्पनियों की शुद्ध आय इन खर्चों को काटने के बाद की है .इन पेयों की जो कीमत ग्राहकों से वसूली जाती है उसमें कम्पनी की आय और खर्च दोनों शामिल हैं.

शैशव में अतिक्रमण

पोषण के हिसाब से निकम्मे बल्कि नुकसानदेह इन उत्पादों के विपणन की रणनीति आक्रामक होती है . हाल के वर्षों में बच्चों के लिए लेखिका जे . के . राउलिंग द्वारा लिखी गई सबसे लोकप्रिय हैरी पॊटर पुस्तकमाला पर आधारित फिल्मों के एकमेव विपणन अधिकार के लिए कोका – कोला ने टाइम वार्नर के आनुषंगिक समूह वार्नर ब्रदर्स को १५ करोड डॊलर दिए . स्पष्ट तौर पर बच्चों को और अधिक मात्रा में अपना शीतल पेय पिलाने के लिए फांसने के मकसद से ही यह निवेश किया गया . जार्ज वाशिंग्टन विश्वविद्यालय के मेडिकल सेण्टर की बाल चिकत्सक डॊ . पेशन्स व्हाइट के अनुसार ‘कोका – कोला ने हैरी पॊटर के जादू के सहारे अपने पेयों की खपत बढाने का घृणित काम किया है . इससे मोटापे से पीडित किशोरों की संख्या दुगुनी हुई है ‘ . उनके तथा अन्य चिकित्सकों के अनुसार बचपन में मोटापे की यह महामारी अन्तत: मधुमेह की महामारी का रूप ले लेगी . बच्चों और किशोरों में शीतल पेयों की बिक्री सुनिश्चित करने के लिए इन दोनों कम्पनियों द्वारा कैनाडा और अमेरिका के पब्लिक ( अमेरिका में सरकारी स्कूलों को ही पब्लिक स्कूल कहा जाता है . भारत के पब्लिक स्कूलों से विपरीत . ) स्कूलों से अनुबन्ध काफी चर्चित रहे हैं . अतिरिक्त आमदनी के लिए स्कूलों ने यह अनुबन्ध किए हैं . इन दोनों कम्पनियों द्वारा शिक्षा के प्रयासों को ‘बढावा’ देने की डींग हांकने के पीछे मुनाफा कमाने और बच्चों में अपने पेयों की लत डालना ही असली मकसद होता है . उदाहरण के तौर पर एक क्षेत्र के अनुबन्ध को लें . कोलेरैडो स्प्रिंग्स स्कूल डिस्ट्रिक्ट के प्रत्येक स्कूल को इनमें से एक कम्पनी प्रतिवर्ष ३,००० से २५,००० डॊलर देगी बशर्ते यह स्कूल वर्ष में ७०,००० पेटियां शीतल पेय की बिक्री कर ले . प्रथम वर्ष बीतने के बाद यह स्कूल जब २१,००० पेटियां ही बेच पाया तब स्कूल बोर्ड ने सघन बिक्री अभियान चलाया जिसके तहत प्राचार्यों द्वारा क्लास के अन्दर पेय पीने की अनुमती दी गयी .

  अमेरिकी कषि विभाग के सर्वेक्षणों के अनुसार २० वर्ष पहले किशोरों में दूध की खपत इन पेयों से दुगुनी थी ,अब पेयों की खपत दूध से दुगुनी हो गई है .

   स्कूलों द्वारा किए गए अनुबन्धों की आलोचना और उसका विरोध भी हुआ है . कैनाडा की स्तम्भकार मार्गरेट वैन्ट अपने एक लेख (टोरेन्टो ग्लोब एन्ड मेल,२७ नवम्बर,२००३) में लिखती हैं,’चले आओ, लडके और लडकियों , अपने लिए शीतल पेय ले जाओ . इसके लिए व्यायामशाला के ठीक सामने एक चमचमाती नई मशीन लगा दी गयी है . तुम्हारे दांत इनसे जरूर सड जाएंगे , जितने तुम मोटे हो उससे कुछ अधिक फैल जाओगे , और साथ में मिलेगी एक तगडी झनझनाहट . मगर यहां इन सब से ज्यादा जरूरी चीज़ दांव पर लगी है-पैसा ! तुम्हारा स्कूल पैसों का भूखा है और इसीलिए हमने कम्पनी से एक धांसू व प्रेरणादायक अनुबन्ध कर लिया है . अपने छात्रों के बीच इन्हें बिक्री का एकाधिकार दे कर हमें तगडा बोनस भी मिलेगा . बिक्री का ३० प्रतिशत तो हमे मिलेगा ही , निर्धारित लक्ष्य पूरा करने पर भी बोनस मिलेगा . जितना तुम पीओगे उतना पैसा हम कमाएंगे ‘ .

  वे आगे लिखती हैं, ‘ कैनेडा के स्कूल बोर्डों द्वारा इन कम्पनियों से किए गए इन फाएदे के सौदों के बारे में शायद तुम सुन चुके होगे . हमें तो इनके पूरे विवरण मिल गये हैं . ओन्टारियो ( जिसके अन्तर्गत कई स्कूल आते हैं) पील स्कूल बोर्ड को १० साल के अनुबन्ध से अब तक ५५ लाख डॊलर मिल चुके हैं . एक अनुमान के अनुसार अमेरिका के ४० प्रतिशत स्कूल बोर्डों ने शीतल पेय अनुबन्ध किये हैं ‘ .

  कैनेडा की शिक्षा मंत्री क्रिस्टी क्लार्क ने ‘वैनकूवर सन ‘ को बताया (१८ नवम्बर,२००३) ‘ मेरे पास फोन-कॊलों और ई-मेलों की बाढ-सी आ गयी है तथा सडक पर रोक कर भी लोग मुझसे कह रहे हैं कि वे चाहते हैं कि उनके बच्चों के स्कूलों को ‘कचरा खाद्य’ (जंक फ़ूड) से मुक्त कराया जाए . ब्रिटिश कोलम्बिया स्कूल ट्रस्टी एसोशियेशन के अध्यक्ष गार्डेन ने कहा कि छात्रों को क्या बेचा जाए इसका फैसला स्थानीय शिक्षकों को लेना चाहिए न कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को .

  विरोध के मुखर स्वरों प्रभावित होकर इन कम्पनियों ने ६ जनवरी, २००४ को घोषणा की कि आगामी सत्रारम्भ से कैनेडा के प्राथमिक एवं माध्यमिक पाठशालाओं में शीतल पेयों की बिक्री रोक देंगे . हाई स्कूलों पर यह यह लागू नहीं किया गया .

  जनवरी २००४ में अमेरिकी बाल-रोग अकादमी ने ‘स्कूलों में शीतल पेय ‘ विषयक एक नीति वक्तव्य जारी किया है .अकादमी की शोध -पत्रिका ‘पीडियाट्रिक्स’ में यह प्रकाशित किया गया है . बच्चों के स्वास्थ्य पर शीतल पेयों के प्रभाव के सन्दर्भ में यह एक महत्वपूर्ण वक्तव्य है .

   

बच्चों के स्वास्थ्य पर शीतल पेयों के प्रभाव के सन्दर्भ में अमेरिकी बाल-रोग अकादमी का नीति वक्तव्य के प्रमुख अंश :

   ” अधिक मात्रा में शीतल पेय पीने से उत्पन्न स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए स्कूल बोर्डों को एहतियात के तौर पर इनकी बिक्री पर रोक लगानी चाहिए.बच्चों की रोजाना खुराक में ये पेय अतिरिक्त चीनी का मुक्य स्रोत हैं . इन पेयों के १२ आउन्स के एक टिन अथवा मशीन से परोसी गयी इतनी ही मात्रा में १० चम्मच चीनी का प्रभाव रहता है . ५६ से ८५ प्रतिशत स्कूली बच्चे हर रोज कम से कम एक बार यह पेय अवश्य पीते हैं . शीतल पेय पीने की मात्रा बढने के साथ – साथ दूध पीने की मात्रा घटती जाती है . इन चीनीयुक्त शीतल पेयों के पीने से मोटापा बढने का सीधा सम्बन्ध है.मोटापा आज-कल अमेरिकी बच्चों की प्रमुख समस्या है . अन्य बीमारियों में दांतों में गड्ढे पडना तथा दंत वल्क का क्षरण प्रमुख हैं . स्कूल स्थित दुकानों , कैन्टीनों व खेल – कूद आदि के मौकों पर यह उत्पाद सर्वव्यापी हो जाते हैं . स्कूलों की आय का पर्याप्त प्रमाण इन पेयों की बिक्री से आता है परन्तु इनके विकल्प के तौर पर पानी , फलों के रस तथा कम-वसा युक्त दूध बिक्री हेतु मुहैया कराया जा सकता है ताकि आमदनी भी होती रहे.”

  इस नीति में इस बात का संकल्प भी है कि बाल-रोग चिकित्सक स्कूलों से इन मीठे शीतल पेयों के खात्मे के लिए प्रयत्न करेंगे . इसके लिए यह जरूरी होगा कि वे स्कूल के प्रशासनिक अधिकारियों , अपने मरीजों व अभिवावकों को शीतल पेय पीने के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षित करें .

  इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि स्कूली-बच्चों तथा किशोरों पर शीतल पेयों के दुष्प्रभावों की बाबत अपनी बिगडी छवि में सुधार के लिए इन कम्पनियों ने ‘अमेरिकी बाल दन्त चिकित्सा अकादमी ‘ नामक संगठन को १० लाख डॊलर का अनुदान दे दिया तथा ‘राष्ट्रीय शिक्षक अभिवावक सम्घ’ की भी अनुदान दाता बन गयीं . बाल सरोकारों वाले ऐसे सम्मानित समूहों के साथ तालमेल बैठाने के बावजूद स्कूलों में शीतल पेयों के विरुद्ध अभियान जो पकड रहा है . कैलीफोर्निया राज्य ने एक कानून बना कर स्कूलों में कचरा खाद्य और शीतल पेयों पर लगा दी है . बीस अन्य राज्यों द्वारा ऐसी रोक लगाने पर विचार विमर्श शुरु हो चुका है.फिलादेल्फिया के स्कूल डिस्ट्रिक्ट के तहत २,१४,०० विध्यार्थी आते हैं.यहां की बोर्ड ने फैसला किया है कि इन स्कूलों में १ जुलाई २००४ से इन पेयों की जगह अब फलों के रस , पानी तथा दूध की बिक्री होगी .

श्रमिकों की हत्या , उत्पीडन

  

इन दोनों बहुरष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा गरीब देशों की इकाइयों में मजदूरों के साथ अत्यन्त अमानवीय कृत्य किए जाते हैं . दक्षिण अमेरिकी देश कोलोम्बिया में कोका – कोला कम्पनी द्वारा अपने मजदूरों पर दमन और अत्याचार सर्वाधिक चर्चित है . कोलोम्बिया की राष्ट्रीय खाद्य – पेय कामगार यूनियन – सिनालट्राइनाल ( SINALTRAINAL ) के अनुसार कोका – कोला की दक्षिणपन्थी सशस्त्र अर्धसैनिक गुंडा वाहिनी से सांठ – गांठ है तथा मजदूर नेताओं की हत्याओं का लम्बा सिलसिला , अपहरण , यूनियन गतिविधियों को कुचलने के लिए षडयंत्र ही कम्पनी की मुख्य रणनीति है . इन गिरोहों में कुछ पेशेवर सैनिक होते हैं और कुछ स्थानीय गुंडे . कोलोम्बिया में अमीर जमींदारों और नशीले पदार्थों के अवैध व्यवसाइयों ने ८० के दशक में वामपंथी विद्रोहियों का मुकाबला करने के लिए इनका गठन किया था . कोलोम्बिया के कई कोका – कोला संयंत्रों में इन्होंने अपने अड्डे या चौकियां बना ली हैं . इन संयंत्रों को वैश्वीकरण का प्रतीक मान कर वामपंथी विद्रोही इन पर हमला कर सकते हैं – यह बहाना देते हुए उनकी  ‘रक्षा ’ हेतु वे अपनी मौजूदगी को उचित बताते हैं . १९८९ से अब तक कोलोम्बिया के कोका – कोला संयंत्रों में कार्यरत आठ मजदूर नेताओं की हत्या इन गिरोहों द्वारा की जा चुकी है .

   वैसे,कोलोम्बिया में यूनियन नेताओं पर हिंसा एक व्यापक और आम घटना है . यह कहा जा सकता है कि कोलोम्बिया में श्रमिक संगठन बनाना दुनिया के अधिकतर मुल्कों से कहीं ज्यादा दुरूह काम है . एक अनुमान के अनुसार , १९८६ से अब तक वहां ३,८०० ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या हो चुकी है . श्रमिकों के अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुमान के अनुसार , दुनिया भर में होने वाली हर पांच ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की हत्याओं में से तीन कोलोम्बिया में होती हैं .

  कोलोम्बिया के कोरेपो स्थित कोका – कोला संयंत्र के यूनियन की कार्यकारिणी के सदस्य इसिडरो गिल की हत्या का मामला अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ है . घटनाक्रम इस प्रकार है . ५ दिसम्बर १९९६ , की सुबह एक अर्धसैनिक गिरोह से जुडे दो लोग मोटरसाइकिल से कोरेपो संयंत्र के भीतर पहुंचे . इन लोगों ने यूनियन नेता इसिडरो गिल पर दस गोलियां चलाईं जिससे उनकी मौत हो गयी . इसिडरो के सहकर्मी लुई कार्डोना ने बताया कि मैं काम पर था जब मैंने गोलियों की आवाज सुनी और इसिडरो के गिरते हुए देखा . मैं उसके पास दौड कर पहुंचा लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी . उसी रात यूनियन के दफ़्तर पर हमला हुआ . सभी दस्तावेज लूट लिए गये तथा दफ़्तर को जला दिया गया . कुछ घण्टों तक इस अर्धसैनिक गिरोह के अधिकारियों ने कार्डोना को रोक कर रखा . यहां से भाग निकलने में वह सफल रहा और स्थानीय पुलिस थाने में उसे शरण मिली . एक सप्ताह बाद इस अर्धसैनिक गिरोह के लोग फिर इस संयंत्र पर पहुंचे . इसिदरो गिल से जुडे सभी ६० मजदूरों को एक लाइन में खडा कर दिया गया और पहले से तैयार इस्तीफ़ों पर दस्तख़त करने का आदेश दिया गया . सभी ने दस्तख़त कर दिए . दो महीने बाद सभी कर्मचारियों ( जो सभी यूनियन से नहीं जुडे रहे ) को बर्खास्त कर दिया गया . २७ वर्षीय इसिडरो गिल इस संयंत्र में आठ वर्षों से कार्यरत था . उसकी विधवा एलसिरा गिल ने अपने पति की हत्या का विरोध किया तथा कोका – कोला से मुआवजे की मांग की . सन २०० में एलसिरा की भी इसी गिरोह ने हत्या कर दी . मृत दम्पति की दो अनाथ बेटियां रिश्तेदारों के पास छुप कर रहती हैं . कुछ समय बाद कोलोम्बिया की एक अदालत ने इसिडरो की हत्या के आरोपी लोगों को बरी कर दिया .

   जुलाई २००१ में अमेरिका की एक संघीय जिला अदालत में ‘विदेशी व्यक्ति क्षतिपूर्ति कानून ‘ के तहत मुकदमा कायम कर दिया गया . इसिडरो के परिजन व सिनालट्राइनाल के प्रताडित पांच यूनियन नेताओं की तरफ़ से वाशिंग्टन स्थित  ‘अन्तर्राष्ट्रीय श्रम – अधिकार संगठन ‘ तथा अमेरिकी इस्पात कर्मचारी संयुक्त यूनियन ने यह मुकदमा किया है . मुद्दई पक्षों ने आरोप लगाया कि कोका – कोला बोतलबन्द करने वाली कम्पनी ने अर्धसैनिक सुरक्षा बलों से सांठ- गांठ की है. इसके तहत चरम हिन्सा , हत्या , यातना तथा गैर कानूनी तरीके से निरुद्ध रखकर यूनियन नेताओं को ख़ामोश कर दिया जाता है . इसके अलावा यह मांग की गयी है कि कोका – कोला अपनी आनुषंगिक बोतलबन्द करने वाली कम्पनी की इन कारगुजारियों की जिम्मेदारी ले तथा इन अपराधों का हर्जाना भरे . इस मुकदमे में कोका -कोला के अलावा उसकी दो बोतलबन्द करने वाली आनुषंगिक कम्पनियों बेबीदास तथा पैनामको को प्रतिवादी बनाया गया है .

  इस मामले में ३१ मार्च , २००३ को अदालत ने फैसला दिया कि बोतलबन्द करने वाली दोनों कम्पनियों के खिलाफ़ अमेरिकी अदालत में मामला चलने योग्य है तथा ‘ यातना पीडित संरक्षण कानून ‘ के तहत भी मुद्दईगण दावा कर सकते हैं .इस निर्णय में कोका – कोला कम्पनी तथा कोका – कोला – कोलोम्बिया को इस आधार पर अलग रखा गया कि बोतलबन्द करने की बाबत हुए समझौते के अन्तर्गत श्रम-सम्बन्ध नहीं आते हैं . बहरहाल , मुकदमा करने वाली यूनियन व मजदूर नेता फैसले के इस हिस्से से सहमत नही हैं चूंकि कोका – कोला ने २००३ में बोतलबन्द करने वाली पैनामको का अधिग्रहण कर लिया था . मजदूर नेताओं का मानना है कि कोका – कोला के एक इशारे से यह आतंकी अभियान रुक सकता है .फिलहाल २१ अप्रैल २००४ को कोका -कोला को मुकदमे में पक्ष माने जाने की प्रार्थना के साथ संशोधित मुकदमा कायम कर दिया गया है .

  यह गौरतलब है कि बडी बडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के परिसंघ द्वारा यह मांग उठाई जाती रही है कि निगमों को इसके कानून के दाएरे से अलग करने के लिए कानून में संशोधन किया जाना चाहिए . बहरहाल अमेरिकी उच्चतम न्यायालय यह मांग अमान्य कर चुका है . यातना पीडित संरक्षण अधिनियम  के अन्तर्गत निगमों को ‘व्यक्ति’ न मानने का तर्क भी अदालत ने अस्वीकृत कर दिया है . यह गौरतलब है की इसी अमेरिकी कानून के अन्तर्गत भोपाल गैस पीडित महिला उद्योग संगठन की साथियों ने हत्यारी बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड एवं उसके तत्कालीन अध्यक्ष एन्डर्सन के खिलाफ़ मुकदमा ठोका है .

दोषसिद्ध रंगभेद

   

किन्हीं उपभोक्तावादी उत्पाद की निर्माता कम्पनी की मंशा यदि पूरी दुनिया के बाजार पर छा जाने की हो तब क्या वे रंगभेद का पालन कर सकती हैं ? सरसरी तौर पर सोचने पर लगेगा कि वे किसी भी समूह से भेद-भाव करने से बचने का प्रयास करेंगी . लेकिन ऐसा सोचना सच्चाई से परे है.

  कोका – कोला कम्पनी के अटलान्टा , अमेरिका स्थित मुख्यालय के काले कर्मचारियों ने १९९९ में कम्पनी के ख़िलाफ़ रंग भेद का मुकदमा दाखिल किया . अपने दावे को साबित करने के लिए इन कर्मचारियों ने दमदार आंकडे और किस्से प्रस्तुत किए . मसलन १९९८ में अफ़्रीकी – अमेरिकी कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ४५,२१५ डॊलर थी जबकि गोरे कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ७२,०४५ डॊलर थी . हांलाकि अफ़्रीकी-अमेरिकी कर्मचारी कुल संख्या का १५ फ़ीसदी हैं पर्न्तु सर्वोच्च वेतनमान में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है . कोका – कोला कम्पनी में पदोन्नति के लिए मूल्यांकन में व्यवस्थापकों के व्यक्तिपरक विवेक की अत्यधिक गुंजाइश की छूट है , जिसके फलस्वरूप मूल्यांकन में रंगभेद प्रकट होता है . इस मूल्यांकन पद्धति के कारण ही ऊपर के वेतनमानों में काले लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है . कोका – कोला के अधिकारी कई महीनों तक इन आरोपों को नकारते रहे .

  अप्रैल , २००० में तीस मौजूदा व पूर्व कर्मचारियों ने अपने मुकदमे के प्रचार तथा विवाद के न्यायपूर्ण निपटारे की मांग के साथ कम्पनी के अटलांटा स्थित मुख्यालय से एक बस पर सवार हो कर ‘ न्याय – यात्रा ‘ निकाली .यात्रा विलिमिंग्टन तक की थी जहां कम्पनी के शेयरधारकों की वार्षिक बैठक होने वाली थी . कोका – कोला कम्पनी ने अन्तत: १९ करोड ३० लाख डॊलर पर समझौता कर लिया . अमेरिकी रंगभेद – मुकदमों के इतिहास में यह सबसे बडी समझौता राशि है . समझौते के तहत पीडित कर्मचारियों को ११ करोड ३० लाख डॊलर , काले कर्मचारियों के वेतन बढाने के लिए ४ करोड ३५ लाख डॊलर , कम्पनी के नियुक्ति एवं पदोन्नति कार्यक्रम के मूल्यांकन व नियंत्रण के मद में ३ करोड ६० लाख डॊलर तथा वादी के कानूनी खर्च के मद में दो करोड डॊलर देने पडे .

  दक्षिण अफ़्रीका में जब रंगभेद चरम पर था तथा उस पर दुनिया के सभी देशों ने ‘ व्यापारिक प्रतिबन्ध ‘ लगा दिए थे तब भी पेप्सीको व कोका – कोला द्वारा अपने पेय वहां भेजे जा रहे थे . बर्मा में लोकतंत्र बहाली आन्दोलन की नेता आंग सांग सू की द्वारा तानाशाही शासन का व्यावसायिक बहिष्कार करने की अपील  के तहत कुछ संगठनों ने अभियान चलाया था . पेप्सीको द्वारा लम्बे समय तक बर्मा में व्यवसाय जारी रखने को मुद्दा बना कर उसके उत्पादों के बहिष्कार का अभियान भी इन संगठनों ने चलाया था .  कम्पनी ने बदनामी से बचने के लिए अमेरिकी विदेश नीति का हवाला दे कर बर्मा से अन्ततोगत्वा कामकाज समेट लिया .

कोला कम्पनियाँ – रँगभेद और खाद्य मानकोँ मेँ दखल

   

किन्हीं उपभोक्तावादी उत्पाद की निर्माता कम्पनी की मंशा यदि पूरी दुनिया के बाजार पर छा जाने की हो तब क्या वे रंगभेद का पालन कर सकती हैं ? सरसरी तौर पर सोचने पर लगेगा कि वे किसी भी समूह से भेद-भाव करने से बचने का प्रयास करेंगी . लेकिन ऐसा सोचना सच्चाई से परे है.कोका – कोला कम्पनी के अटलान्टा , अमेरिका स्थित मुख्यालय के काले कर्मचारियों ने १९९९ में कम्पनी के ख़िलाफ़ रंग भेद का मुकदमा दाखिल किया . अपने दावे को साबित करने के लिए इन कर्मचारियों ने दमदार आंकडे और किस्से प्रस्तुत किए . मसलन १९९८ में अफ़्रीकी – अमेरिकी कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ४५,२१५ डॊलर थी जबकि गोरे कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ७२,०४५ डॊलर थी . हांलाकि अफ़्रीकी-अमेरिकी कर्मचारी कुल संख्या का १५ फ़ीसदी हैं पर्न्तु सर्वोच्च वेतनमान में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है . कोका – कोला कम्पनी में पदोन्नति के लिए मूल्यांकन में व्यवस्थापकों के व्यक्तिपरक विवेक की अत्यधिक गुंजाइश की छूट है , जिसके फलस्वरूप मूल्यांकन में रंगभेद प्रकट होता है . इस मूल्यांकन पद्धति के कारण ही ऊपर के वेतनमानों में काले लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है . कोका – कोला के अधिकारी कई महीनों तक इन आरोपों को नकारते रहे .अप्रैल , २००० में तीस मौजूदा व पूर्व कर्मचारियों ने अपने मुकदमे के प्रचार तथा विवाद के न्यायपूर्ण निपटारे की मांग के साथ कम्पनी के अटलांटा स्थित मुख्यालय से एक बस पर सवार हो कर ‘ न्याय – यात्रा ‘ निकाली .यात्रा विलिमिंग्टन तक की थी जहां कम्पनी के शेयरधारकों की वार्षिक बैठक होने वाली थी . कोका – कोला कम्पनी ने अन्तत: १९ करोड ३० लाख डॊलर पर समझौता कर लिया . अमेरिकी रंगभेद – मुकदमों के इतिहास में यह सबसे बडी समझौता राशि है . समझौते के तहत पीडित कर्मचारियों को ११ करोड ३० लाख डॊलर , काले कर्मचारियों के वेतन बढाने के लिए ४ करोड ३५ लाख डॊलर , कम्पनी के नियुक्ति एवं पदोन्नति कार्यक्रम के मूल्यांकन व नियंत्रण के मद में ३ करोड ६० लाख डॊलर तथा वादी के कानूनी खर्च के मद में दो करोड डॊलर देने पडे . 

दक्षिण अफ़्रीका में जब रंगभेद चरम पर था तथा उस पर दुनिया के सभी देशों ने ‘ व्यापारिक प्रतिबन्ध ‘ लगा दिए थे तब भी पेप्सीको व कोका – कोला द्वारा अपने पेय वहां भेजे जा रहे थे . बर्मा में लोकतंत्र बहाली आन्दोलन की नेता आंग सांग सू की द्वारा तानाशाही शासन का व्यावसायिक बहिष्कार करने की अपील के तहत कुछ संगठनों ने अभियान चलाया था . पेप्सीको द्वारा लम्बे समय तक बर्मा में व्यवसाय जारी रखने को मुद्दा बना कर उसके उत्पादों के बहिष्कार का अभियान भी इन संगठनों ने चलाया था . कम्पनी ने बदनामी से बचने के लिए अमेरिकी विदेश नीति का हवाला दे कर बर्मा से अन्ततोगत्वा कामकाज समेट लिया .

अन्तरराष्ट्रीय खाद्य मानकों में कचरा खाद्य खेमे की दख़ल
कचरा खाद्य उत्पादों को दुनिया भर में बेचते रहने के लिए कोला कम्पनियों के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि उनकी दखल और साँठ गाँठ राजनीति , विश्व स्वास्थ्य संगठन , विग्यापन और टेलीविजन कम्पनियों , विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों , बैंकों , कोडेक्स जैसी खाद्य मानक निर्धारित करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं , रसायन कम्पनियों तथा अन्य बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से हो . कोका – कोला और पेप्सीको ने अपनी करतूतों को बदस्तूर जारी रखने के लिए ऐसी संस्थाओं से औपचारिक सम्बन्ध बनाए हैं . मनुष्य और प्रकृति के शोषण व दोहन की प्रक्रिया में इन गठजोड़ों का परस्पर सहयोग रहता है . इस मिलीभगत के परिणाम आखिरकार आम आदमी के अहित में होते हैं तथा इनसे कम्पनियों के मुनाफ़े का इजाफ़ा होता है . कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाएगा . विश्व स्वास्थ्य संसद ( विश्व स्वास्थ्य संगठन की आम सभा ) ने १९ अप्रैल २००४ को ‘ आहार , शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य पर अन्तर्राष्ट्रीय रणनीति का मसविदा ‘ पेश किया है . कचरा – खाद्य और पेय उद्योग तथा विग्यापन कम्पनियाँ इस लचर मसविदे से खुश हैँ क्योंकि यह सदस्य देशों के बच्चों को लक्ष्य कर बनाए गए कचरा खाद्य के विग्यापनों पर प्रतिबन्ध लगाने की नीति की सिफ़ारिश नहीं करता है . टेलिविजन कम्पनियाँ इस बात पर गदगद होंगी कि इस नीति में मोटापा बढ़ाने में टेलिविजन की भूमिका का जिक्र नही है . प्रतिदिन खुराक में चीनी की खपत कुल कैलोरी खपत का दस फ़ीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए , यह कहने से बचा गया है . फलों और सब्जियों के उत्पादन और बिक्री को बढ़ावा देने की बात अमेरिका और कचरा खाद्य उद्योग के विरोध के चलते इस नीति में शामिल नहीं की गयी है . अंतर्राष्ट्रीय रणनीति में यह जरूर शामिल करना पड़ा है कि खाद्य और पेय विग्यापनों द्वारा बच्चों की अनुभवहीनता और भोलेपन का दोहन नहीं होना चाहिए तथा अस्वास्थ्यकर खुराक – आदतों को प्रोत्साहित करने वाले विग्यापन-संदेशों को बढ़ावा न दिया जाए . सदस्य देशों की सरकारों से यह जरूर कहा गया है कि ‘ स्कूलों में ज्यादा चीनी , ज्यादा नमक और ज्यादा वसा वाले खाद्यों की उपलब्धता को सीमित किया चाहिए ‘ .खाद्य मानकों के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारण हेतु गठित संगठन ‘ कोडेक्स एलिमेन्टारियस ‘ में यह कम्पनियाँ अमेरिका का प्रतिनिधित्व करती रही हैं . नतीजन इन पेयों में प्रयुक्त अखाद्य फॊस्फोरिक एसिड को अनुमति मिली हुई है .कशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भूभौतिकी विभाग को कोका – कोला कम्पनी ने एक शोध अनुदान दिया है . इस ‘ शोध ‘ द्वारा कम्पनी पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूगर्भ जल की उपलब्धता और पानी की विभिन्न सतहों की गहराइयों की जानकारी प्राप्त करेगी . भारत में लगभग पूरी तरह मुफ़्त पानी प्राप्त करने वाली कम्पनियाँ इस प्रकार की शोध योजनाओं की सूचनाओं के आधार पर नए संयंत्र लगा कर विस्तार करती हैं . प्लाचीमाड़ा और मेंहदीगंज में शुरु हुए आन्दोलनों के कारण भूगर्भ जल के दोहन का मुद्दा चर्चा का विषय बना है तथा संयुक्त संसदीय समिती तथा सर्वोच्च न्यायालय में भी यह चर्चा का मसला है . 

इन दोनों कम्पनियों की करतूतें विश्वव्यापी हैं . यह कम्पनियाँ उपभोक्तावादी संस्कृति की प्रतीक बन चुकी हैं . गरीब देशों में प्राकृतिक संसाधन के दोहन और श्रम के शोषण द्वारा यह अपनी लूट की मात्रा को बढ़ा लेती हैं .

इनके विरोध का वैश्वीकरण हो , यह वक्त का तकाजा है .

Read Full Post »

किन्हीं उपभोक्तावादी उत्पाद की निर्माता कम्पनी की मंशा यदि पूरी दुनिया के बाजार पर छा जाने की हो तब क्या वे रंगभेद का पालन कर सकती हैं ? सरसरी तौर पर सोचने पर लगेगा कि वे किसी भी समूह से भेद-भाव करने से बचने का प्रयास करेंगी . लेकिन ऐसा सोचना सच्चाई से परे है.कोका – कोला कम्पनी के अटलान्टा , अमेरिका स्थित मुख्यालय के काले कर्मचारियों ने १९९९ में कम्पनी के ख़िलाफ़ रंग भेद का मुकदमा दाखिल किया . अपने दावे को साबित करने के लिए इन कर्मचारियों ने दमदार आंकडे और किस्से प्रस्तुत किए . मसलन १९९८ में अफ़्रीकी – अमेरिकी कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ४५,२१५ डॊलर थी जबकि गोरे कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ७२,०४५ डॊलर थी . हांलाकि अफ़्रीकी-अमेरिकी कर्मचारी कुल संख्या का १५ फ़ीसदी हैं पर्न्तु सर्वोच्च वेतनमान में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है . कोका – कोला कम्पनी में पदोन्नति के लिए मूल्यांकन में व्यवस्थापकों के व्यक्तिपरक विवेक की अत्यधिक गुंजाइश की छूट है , जिसके फलस्वरूप मूल्यांकन में रंगभेद प्रकट होता है . इस मूल्यांकन पद्धति के कारण ही ऊपर के वेतनमानों में काले लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है . कोका – कोला के अधिकारी कई महीनों तक इन आरोपों को नकारते रहे .अप्रैल , २००० में तीस मौजूदा व पूर्व कर्मचारियों ने अपने मुकदमे के प्रचार तथा विवाद के न्यायपूर्ण निपटारे की मांग के साथ कम्पनी के अटलांटा स्थित मुख्यालय से एक बस पर सवार हो कर ‘ न्याय – यात्रा ‘ निकाली .यात्रा विलिमिंग्टन तक की थी जहां कम्पनी के शेयरधारकों की वार्षिक बैठक होने वाली थी . कोका – कोला कम्पनी ने अन्तत: १९ करोड ३० लाख डॊलर पर समझौता कर लिया . अमेरिकी रंगभेद – मुकदमों के इतिहास में यह सबसे बडी समझौता राशि है . समझौते के तहत पीडित कर्मचारियों को ११ करोड ३० लाख डॊलर , काले कर्मचारियों के वेतन बढाने के लिए ४ करोड ३५ लाख डॊलर , कम्पनी के नियुक्ति एवं पदोन्नति कार्यक्रम के मूल्यांकन व नियंत्रण के मद में ३ करोड ६० लाख डॊलर तथा वादी के कानूनी खर्च के मद में दो करोड डॊलर देने पडे .

दक्षिण अफ़्रीका में जब रंगभेद चरम पर था तथा उस पर दुनिया के सभी देशों ने ‘ व्यापारिक प्रतिबन्ध ‘ लगा दिए थे तब भी पेप्सीको व कोका – कोला द्वारा अपने पेय वहां भेजे जा रहे थे . बर्मा में लोकतंत्र बहाली आन्दोलन की नेता आंग सांग सू की द्वारा तानाशाही शासन का व्यावसायिक बहिष्कार करने की अपील के तहत कुछ संगठनों ने अभियान चलाया था . पेप्सीको द्वारा लम्बे समय तक बर्मा में व्यवसाय जारी रखने को मुद्दा बना कर उसके उत्पादों के बहिष्कार का अभियान भी इन संगठनों ने चलाया था . कम्पनी ने बदनामी से बचने के लिए अमेरिकी विदेश नीति का हवाला दे कर बर्मा से अन्ततोगत्वा कामकाज समेट लिया .

अन्तरराष्ट्रीय खाद्य मानकों में कचरा खाद्य खेमे की दख़ल
कचरा खाद्य उत्पादों को दुनिया भर में बेचते रहने के लिए कोला कम्पनियों के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि उनकी दखल और साँठ गाँठ राजनीति , विश्व स्वास्थ्य संगठन , विग्यापन और टेलीविजन कम्पनियों , विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों , बैंकों , कोडेक्स जैसी खाद्य मानक निर्धारित करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं , रसायन कम्पनियों तथा अन्य बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से हो . कोका – कोला और पेप्सीको ने अपनी करतूतों को बदस्तूर जारी रखने के लिए ऐसी संस्थाओं से औपचारिक सम्बन्ध बनाए हैं . मनुष्य और प्रकृति के शोषण व दोहन की प्रक्रिया में इन गठजोड़ों का परस्पर सहयोग रहता है . इस मिलीभगत के परिणाम आखिरकार आम आदमी के अहित में होते हैं तथा इनसे कम्पनियों के मुनाफ़े का इजाफ़ा होता है . कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाएगा . विश्व स्वास्थ्य संसद ( विश्व स्वास्थ्य संगठन की आम सभा ) ने १९ अप्रैल २००४ को ‘ आहार , शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य पर अन्तर्राष्ट्रीय रणनीति का मसविदा ‘ पेश किया है . कचरा – खाद्य और पेय उद्योग तथा विग्यापन कम्पनियाँ इस लचर मसविदे से खुश हैँ क्योंकि यह सदस्य देशों के बच्चों को लक्ष्य कर बनाए गए कचरा खाद्य के विग्यापनों पर प्रतिबन्ध लगाने की नीति की सिफ़ारिश नहीं करता है . टेलिविजन कम्पनियाँ इस बात पर गदगद होंगी कि इस नीति में मोटापा बढ़ाने में टेलिविजन की भूमिका का जिक्र नही है . प्रतिदिन खुराक में चीनी की खपत कुल कैलोरी खपत का दस फ़ीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए , यह कहने से बचा गया है . फलों और सब्जियों के उत्पादन और बिक्री को बढ़ावा देने की बात अमेरिका और कचरा खाद्य उद्योग के विरोध के चलते इस नीति में शामिल नहीं की गयी है . अंतर्राष्ट्रीय रणनीति में यह जरूर शामिल करना पड़ा है कि खाद्य और पेय विग्यापनों द्वारा बच्चों की अनुभवहीनता और भोलेपन का दोहन नहीं होना चाहिए तथा अस्वास्थ्यकर खुराक – आदतों को प्रोत्साहित करने वाले विग्यापन-संदेशों को बढ़ावा न दिया जाए . सदस्य देशों की सरकारों से यह जरूर कहा गया है कि ‘ स्कूलों में ज्यादा चीनी , ज्यादा नमक और ज्यादा वसा वाले खाद्यों की उपलब्धता को सीमित किया चाहिए ‘ .खाद्य मानकों के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारण हेतु गठित संगठन ‘ कोडेक्स एलिमेन्टारियस ‘ में यह कम्पनियाँ अमेरिका का प्रतिनिधित्व करती रही हैं . नतीजन इन पेयों में प्रयुक्त अखाद्य फॊस्फोरिक एसिड को अनुमति मिली हुई है .कशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भूभौतिकी विभाग को कोका – कोला कम्पनी ने एक शोध अनुदान दिया है . इस ‘ शोध ‘ द्वारा कम्पनी पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूगर्भ जल की उपलब्धता और पानी की विभिन्न सतहों की गहराइयों की जानकारी प्राप्त करेगी . भारत में लगभग पूरी तरह मुफ़्त पानी प्राप्त करने वाली कम्पनियाँ इस प्रकार की शोध योजनाओं की सूचनाओं के आधार पर नए संयंत्र लगा कर विस्तार करती हैं . प्लाचीमाड़ा और मेंहदीगंज में शुरु हुए आन्दोलनों के कारण भूगर्भ जल के दोहन का मुद्दा चर्चा का विषय बना है तथा संयुक्त संसदीय समिती तथा सर्वोच्च न्यायालय में भी यह चर्चा का मसला है .

इन दोनों कम्पनियों की करतूतें विश्वव्यापी हैं . यह कम्पनियाँ उपभोक्तावादी संस्कृति की प्रतीक बन चुकी हैं . गरीब देशों में प्राकृतिक संसाधन के दोहन और श्रम के शोषण द्वारा यह अपनी लूट की मात्रा को बढ़ा लेती हैं .

इनके विरोध का वैश्वीकरण हो , यह वक्त का तकाजा है .

Read Full Post »

इन दोनों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा गरीब देशों की इकाइयों में मजदूरों के साथ अत्यन्त अमानवीय कृत्य किए जाते हैं . दक्षिण अमेरिकी देश कोलोम्बिया में कोका – कोला कम्पनी द्वारा अपने मजदूरों पर दमन और अत्याचार सर्वाधिक चर्चित है . कोलोम्बिया की राष्ट्रीय खाद्य – पेय कामगार यूनियन – सिनालट्राइनाल ( SINALTRAINAL ) के अनुसार कोका – कोला की दक्षिणपन्थी सशस्त्र अर्धसैनिक गुंडा वाहिनी से सांठ – गांठ है तथा मजदूर नेताओं की हत्याओं का लम्बा सिलसिला , अपहरण , यूनियन गतिविधियों को कुचलने के लिए षडयंत्र ही कम्पनी की मुख्य रणनीति है . इन गिरोहों में कुछ पेशेवर सैनिक होते हैं और कुछ स्थानीय गुंडे . कोलोम्बिया में अमीर जमींदारों और नशीले पदार्थों के अवैध व्यवसाइयों ने ८० के दशक में वामपंथी विद्रोहियों का मुकाबला करने के लिए इनका गठन किया था . कोलोम्बिया के कई कोका – कोला संयंत्रों में इन्होंने अपने अड्डे या चौकियां बना ली हैं . इन संयंत्रों को वैश्वीकरण का प्रतीक मान कर वामपंथी विद्रोही इन पर हमला कर सकते हैं – यह बहाना देते हुए उनकी  ‘रक्षा ’ हेतु वे अपनी मौजूदगी को उचित बताते हैं . १९८९ से अब तक कोलोम्बिया के कोका – कोला संयंत्रों में कार्यरत आठ मजदूर नेताओं की हत्या इन गिरोहों द्वारा की जा चुकी है .

   वैसे,कोलोम्बिया में यूनियन नेताओं पर हिंसा एक व्यापक और आम घटना है . यह कहा जा सकता है कि कोलोम्बिया में श्रमिक संगठन बनाना दुनिया के अधिकतर मुल्कों से कहीं ज्यादा दुरूह काम है . एक अनुमान के अनुसार , १९८६ से अब तक वहां ३,८०० ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या हो चुकी है . श्रमिकों के अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुमान के अनुसार , दुनिया भर में होने वाली हर पांच ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की हत्याओं में से तीन कोलोम्बिया में होती हैं .

  कोलोम्बिया के कोरेपो स्थित कोका – कोला संयंत्र के यूनियन की कार्यकारिणी के सदस्य इसिडरो गिल की हत्या का मामला अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ है . घटनाक्रम इस प्रकार है . ५ दिसम्बर १९९६ , की सुबह एक अर्धसैनिक गिरोह से जुडे दो लोग मोटरसाइकिल से कोरेपो संयंत्र के भीतर पहुंचे . इन लोगों ने यूनियन नेता इसिडरो गिल पर दस गोलियां चलाईं जिससे उनकी मौत हो गयी . इसिडरो के सहकर्मी लुई कार्डोना ने बताया कि मैं काम पर था जब मैंने गोलियों की आवाज सुनी और इसिडरो के गिरते हुए देखा . मैं उसके पास दौड कर पहुंचा लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी . उसी रात यूनियन के दफ़्तर पर हमला हुआ . सभी दस्तावेज लूट लिए गये तथा दफ़्तर को जला दिया गया . कुछ घण्टों तक इस अर्धसैनिक गिरोह के अधिकारियों ने कार्डोना को रोक कर रखा . यहां से भाग निकलने में वह सफल रहा और स्थानीय पुलिस थाने में उसे शरण मिली . एक सप्ताह बाद इस अर्धसैनिक गिरोह के लोग फिर इस संयंत्र पर पहुंचे . इसिदरो गिल से जुडे सभी ६० मजदूरों को एक लाइन में खडा कर दिया गया और पहले से तैयार इस्तीफ़ों पर दस्तख़त करने का आदेश दिया गया . सभी ने दस्तख़त कर दिए . दो महीने बाद सभी कर्मचारियों ( जो सभी यूनियन से नहीं जुडे रहे ) को बर्खास्त कर दिया गया . २७ वर्षीय इसिडरो गिल इस संयंत्र में आठ वर्षों से कार्यरत था . उसकी विधवा एलसिरा गिल ने अपने पति की हत्या का विरोध किया तथा कोका – कोला से मुआवजे की मांग की . सन २०० में एलसिरा की भी इसी गिरोह ने हत्या कर दी . मृत दम्पति की दो अनाथ बेटियां रिश्तेदारों के पास छुप कर रहती हैं . कुछ समय बाद कोलोम्बिया की एक अदालत ने इसिडरो की हत्या के आरोपी लोगों को बरी कर दिया  इसिडरो

   जुलाई २००१ में अमेरिका की एक संघीय जिला अदालत में ‘विदेशी व्यक्ति क्षतिपूर्ति कानून ‘ के तहत मुकदमा कायम कर दिया गया . इसिडरो के परिजन व सिनालट्राइनाल के प्रताडित पांच यूनियन नेताओं की तरफ़ से वाशिंग्टन स्थित  ‘अन्तर्राष्ट्रीय श्रम – अधिकार संगठन ‘ तथा अमेरिकी इस्पात कर्मचारी संयुक्त यूनियन ने यह मुकदमा किया है . मुद्दई पक्षों ने आरोप लगाया कि कोका – कोला बोतलबन्द करने वाली कम्पनी ने अर्धसैनिक सुरक्षा बलों से सांठ- गांठ की है. इसके तहत चरम हिन्सा , हत्या , यातना तथा गैर कानूनी तरीके से निरुद्ध रखकर यूनियन नेताओं को ख़ामोश कर दिया जाता है . इसके अलावा यह मांग की गयी है कि कोका – कोला अपनी आनुषंगिक बोतलबन्द करने वाली कम्पनी की इन कारगुजारियों की जिम्मेदारी ले तथा इन अपराधों का हर्जाना भरे . इस मुकदमे में कोका -कोला के अलावा उसकी दो बोतलबन्द करने वाली आनुषंगिक कम्पनियों बेबीदास तथा पैनामको को प्रतिवादी बनाया गया है .

  इस मामले में ३१ मार्च , २००३ को अदालत ने फैसला दिया कि बोतलबन्द करने वाली दोनों कम्पनियों के खिलाफ़ अमेरिकी अदालत में मामला चलने योग्य है तथा ‘ यातना पीडित संरक्षण कानून ‘ के तहत भी मुद्दईगण दावा कर सकते हैं . इस निर्णय में कोका – कोला कम्पनी तथा कोका – कोला – कोलोम्बिया को इस आधार पर अलग रखा गया कि बोतलबन्द करने की बाबत हुए समझौते के अन्तर्गत श्रम-सम्बन्ध नहीं आते हैं . बहरहाल , मुकदमा करने वाली यूनियन व मजदूर नेता फैसले के इस हिस्से से सहमत नही हैं चूंकि कोका – कोला ने २००३ में बोतलबन्द करने वाली पैनामको का अधिग्रहण कर लिया था . मजदूर नेताओं का मानना है कि कोका – कोला के एक इशारे से यह आतंकी अभियान रुक सकता है .फिलहाल २१ अप्रैल २००४ को कोका -कोला को मुकदमे में पक्ष माने जाने की प्रार्थना के साथ संशोधित मुकदमा कायम कर दिया गया है .

  यह गौरतलब है कि बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के परिसंघ द्वारा यह मांग उठाई जाती रही है कि निगमों को इसके कानून के दाएरे से अलग करने के लिए कानून में संशोधन किया जाना चाहिए . बहरहाल, अमेरिकी उच्चतम न्यायालय यह मांग अमान्य कर चुका है . यातना पीडित संरक्षण अधिनियम  के अन्तर्गत निगमों को ‘व्यक्ति’ न मानने का तर्क भी अदालत ने अस्वीकृत कर दिया है . यह गौरतलब है की इसी अमेरिकी कानून के अन्तर्गत भोपाल गैस पीडित महिला उद्योग संगठन की साथियों ने हत्यारी बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड एवं उसके तत्कालीन अध्यक्ष एन्डर्सन के खिलाफ़ मुकदमा ठोका है .

[अगली प्रविष्टि : कोला कम्पनियों द्वारा दोषसिद्ध रंगभेद ]

पिछला लेख

Read Full Post »

”उपभोग जीवन की बुनियादी जरूरत है . इसके बगैर न जीवन सम्भव है और न वह सब जिससे हम जीवन में आनन्द का अनुभव करते हैं.

  इसके विपरीत ऐसी वस्तुएं , जो वास्तव में मनुष्य की किसी मूल जरूरत या कला और ग्यान की वृत्तियों की दृष्टि से उपयोगी नहीं हैं लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से प्रचार के द्वारा उसके लिए जरूरी बना दी गयी हैं ,उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं . “

                                    – सच्चिदानन्द सिन्हा

  कोला पेय पूरी तरह उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं . पूरी तरह अनावश्यक और नुकसानदेह होने के बावजूद इनका एक बहुत बडा बाजार है . वर्ष २००२ में कोका – कोला कम्पनी की शुद्ध आय ३०५ करोड डॊलर थी और पेप्सीको की १९७ करोड डॊलर . शुद्ध आय में इन कम्पनियों के प्रमुखों को मिलने वाली धनराशि शामिल नही होती . शेयर , बोनस तथा अन्य मुआवजों को जोडने पर सन १९९८ के पेप्सीको प्रमुख रोजर एनरीको की वार्षिक आमदनी ११,७६७,४२१ डॉलर थी जबकि उनका ‘वेतन’ मात्र एक डॉलर था . अपने – अपने वेतन या मजदूरी के बल पर इस रकम की बराबरी करने में अमरीकी राष्ट्रपति को ५८ वर्ष लगते,औसत अमरीकी मजदूरी पाने वाले अमरीकी मजदू ४६१ वर्ष लगते तथा अमेरिका न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूर को १०९८ वर्ष लग जाते . १९९१ में कोका कोला के प्रमुख डगलस आईवेस्टर की वार्षिक आय ३३,५९३,५५२ डॉलर थी.अमेरिका में न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूर को यह रकम कमाने में ३१३६ वर्ष लगते ,औसत मजदूरी पाने वाले को १३१७ वर्ष तथा अमरीकी राष्ट्रपति को १६७ वर्ष लगते . कोका – कोला के प्रमुख डगलस डाफ़्ट को हजारों कर्मचारियों की छंटनी करने के पुरस्कारस्वरूप ३० लाख डॉलर बोनस के रूप में दिए गये.समाजवादी चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा के शब्दों में ‘उदारीकरण के आर्थिक दर्शन में मजदूरों की छंटनी औद्योगिक सक्षमता की अनिवार्य शर्त है’ . भारत में इन दोनों कम्पनियों के उत्पादो के प्रचार हेतु बनी चन्द मिनट की एक विज्ञापन फिल्म का खर्च करोडों रुपये में आता है . इनमें काम करने वाले क्रिकेट खिलाडियों और सीने कलाकारों को कुछ करो्ड़ रुपए तक मिल जाते हैं .जाहिर है इन कम्पनियों की शुद्ध आय इन खर्चों को काटने के बाद की है .इन पेयों की जो कीमत ग्राहकों से वसूली जाती है उसमें कम्पनी की आय और खर्च दोनों शामिल हैं.

बच्चों के स्वास्थ्य पर शीतल पेयों के प्रभाव के सन्दर्भ में अमेरिकी बाल-रोग अकादमी का नीति वक्तव्य के प्रमुख अंश :

   ” अधिक मात्रा में शीतल पेय पीने से उत्पन्न स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए स्कूल बोर्डों को एहतियात के तौर पर इनकी बिक्री पर रोक लगानी चाहिए.बच्चों की रोजाना खुराक में ये पेय अतिरिक्त चीनी का मुख्य स्रोत हैं . इन पेयों के १२ आउन्स के एक टिन अथवा मशीन से परोसी गयी इतनी ही मात्रा में १० चम्मच चीनी का प्रभाव रहता है . ५६ से ८५ प्रतिशत स्कूली बच्चे हर रोज कम से कम एक बार यह पेय अवश्य पीते हैं . शीतल पेय पीने की मात्रा बढने के साथ – साथ दूध पीने की मात्रा घटती जाती है . इन चीनीयुक्त शीतल पेयों के पीने से मोटापा बढने का सीधा सम्बन्ध है.मोटापा आज-कल अमेरिकी बच्चों की प्रमुख समस्या है . अन्य बीमारियों में दांतों में गड्ढे पडना तथा दंत वल्क का क्षरण प्रमुख हैं . स्कूल स्थित दुकानों , कैन्टीनों व खेल – कूद आदि के मौकों पर यह उत्पाद सर्वव्यापी हो जाते हैं . स्कूलों की आय का पर्याप्त प्रमाण इन पेयों की बिक्री से आता है परन्तु इनके विकल्प के तौर पर पानी , फलों के रस तथा कम-वसा युक्त दूध बिक्री हेतु मुहैया कराया जा सकता है ताकि आमदनी भी होती रहे.”

  इस नीति में इस बात का संकल्प भी है कि बाल-रोग चिकित्सक स्कूलों से इन मीठे शीतल पेयों के खात्मे के लिए प्रयत्न करेंगे . इसके लिए यह जरूरी होगा कि वे स्कूल के प्रशासनिक अधिकारियों , अपने मरीजों व अभिवावकों को शीतल पेय पीने के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षित करें .

  इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि स्कूली-बच्चों तथा किशोरों पर शीतल पेयों के दुष्प्रभावों की बाबत अपनी बिगडी छवि में सुधार के लिए इन कम्पनियों ने ‘अमेरिकी बाल दन्त चिकित्सा अकादमी ‘ नामक संगठन को १० लाख डॊलर का अनुदान दे दिया तथा ‘राष्ट्रीय शिक्षक अभिवावक सम्घ’ की भी अनुदान दाता बन गयीं . बाल सरोकारों वाले ऐसे सम्मानित समूहों के साथ तालमेल बैठाने के बावजूद स्कूलों में शीतल पेयों के विरुद्ध अभियान जो पकड रहा है . कैलीफोर्निया राज्य ने एक कानून बना कर स्कूलों में कचरा खाद्य और शीतल पेयों पर लगा दी है . बीस अन्य राज्यों द्वारा ऐसी रोक लगाने पर विचार विमर्श शुरु हो चुका है.फिलादेल्फिया के स्कूल डिस्ट्रिक्ट के तहत २,१४,०० विध्यार्थी आते हैं.यहां की बोर्ड ने फैसला किया है कि इन स्कूलों में १ जुलाई २००४ से इन पेयों की जगह अब फलों के रस , पानी तथा दूध की बिक्री होगी . ( जारी)

Read Full Post »

mailammamemorium.jpg” पृथ्वी से अच्छा बरताव करो ।पृथ्वी तुम्हें माँ-बाप ने नहीं दी है,आगे आने वाली पीढियों ने उसे तुम्हे कर्ज के रूप में दिया है ।हमें अपने बच्चों से उधार में मिली है पृथ्वी ।”

    आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के प्रथम शिकार ‘रेड इन्डियन’ लोगों की यह प्रसिद्ध कहावत प्लाचीमाडा के कोका-कोला विरोधी आन्दोलन की जुझारू महिला नेता मायलम्मा की भावना से कितनी मेल खाती है ! मायलम्मा ने कोका-कोला कम्पनी द्वारा भूगर्भ-जल-दोहन के भविष्य के परिणाम के प्रति चेतावनी दे कर कहा था , ‘तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी ? तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे ।’

    दो-सौ देशों में फैली बहुराष्ट्रीय कम्पनी के कारखाने के सामने घास-फूस के ‘समर-पंडाल’ के नीचे प्लाचीमाडा की आदिवासी महिलाओं का   अनवरत चला धरना अहिन्सक संघर्ष के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा ।

    प्राकृतिक संसाधनों पर हक किसका है ? एक दानवाकार कम्पनी का ?या स्थानीय समुदाय का ? हक़ की इस लड़ाई का नेता कौन होगा ? – इन प्रश्नों को दिमाग में लिए ‘मातृभूमि’ के सम्पादक और लोक-सभा सदस्य श्री एम.पी. वीरेन्द्रकुमार के निमंत्रण पर पहली बार २१,२२,२३ जनवरी,२००४ को प्लाचीमाडा में आयोजित ‘ विश्व जन-जल-सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला ।इस सम्मेलन में वैश्वीकरण विरोधी,गांधीजी से प्रभावित,फ़्रान्सीसी किसान नेता जोशे बोव्हे , पानी पर गिद्ध-दृष्टि गड़ाई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रति सचेत करने वाली किताब(द ब्ल्यू गोल्ड) की लेखिका मॊड बार्लो,यूरोपियन यूनियन के सांसद,मलयालम के वरिष्ठ साहित्यकार सुकुमार अझिकोड़,वासुदेवन नायर,सारा जोसेफ़ और केरल विधान-सभा में विपक्ष के नेता अच्युतानन्दन (मौजूदा मख्यमन्त्री ) ने भाग लिया था । इन सभी राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय दिग्गजों को पालघाट के इस गाँव की ओर आकर्षित करने वाला एक प्रमुख तत्व मायलम्मा का नेतृत्व था ।

    ‘ जिस की लड़ाई उसीका नेतृत्व’ जन-आन्दोलनों की इस बुनियादी कसौटी पर प्लाचीमाडा-आन्दोलन मायलम्मा जैसी प्रखर महिला नेता के कारण खरा उतरा था ।

    मेंहदीगंज में कोका-कोला विरोधी आन्दोलन को प्लाचीमाडा से प्रेरणा मिली थी । साथी मायलम्मा हमें बता गयीं हैं कि :

    (१) प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी का प्राथमिक हक़ है।

    (२) इस अधिकार के लिए संघर्ष स्थानीय नेतृत्व द्वारा ही चलाया जाएगा ।

    संसाधनों पर अधिकार का निर्णय राजनीति द्वारा होता है और इस दौर की नई राजनीति में प्लाचीमाडा की मयलम्मा को याद किया जाएगा ।

          – अफ़लातून , अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश।

Read Full Post »

Older Posts »

%d bloggers like this: