Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘communalism’ Category

                        
एक अत्यन्त मेधावी, सुन्दर , और सं
वेदनशील युवा राजनैतिक तरुण की मौत ने भारतीय समाज को हिला दिया है। इस युवा में जोखिम उठाने का साहस था और अपने से ऊपर की पीढ़ी के उसूलों को आंख मूंद कर न मानने की फितरत थी। वह एक राजनैतिक कार्यकर्ता था,उसका संघर्ष राजनैतिक था । वह आतंक के आरोप में दी गई फांसी के विरुद्ध था तो साथ-साथ आतंक फैलाने के लिए सीमा पार से आये घुसपैठियों से मुकाबला करते हुए मारे गए जवानों की शहादत के प्रति श्रद्धावनत होकर उसने कहा था, ‘अम्बेडकरवादी होने के नाते मैं जिन्दगी का पक्षधर हूं । इसलिए उन जवानों की शहादत के प्रति नमन करता हूं।‘ उसकी मेधा से टक्कर लेने की औकात उसकी विरोधी विचारधारा से जुड़े उस शिक्षण संस्था के छात्रों में नहीं थी और न ही उस शैक्षणिक संस्था के बौने कर्णधारों में थी इसलिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे आकाओं की मदद से एक चक्रव्यूह रचा गया था । सत्ताधारी ताकतें रोहित द्वारा फांसी की सजा के विरोध की चर्चा करती हैं लेकिन रोहित के समूह (अम्बेडकर स्टुडेन्ट्स एसोशियेशन) द्वारा मनु-स्मृति दहन तथा गत नौ वर्षों में 9 दलित छात्रों द्वारा शैक्षणिक उत्पीडन के कारण की गई आत्महत्याओं के विरोध की चर्चा करने का साहस नहीं जुटा पातीं।
  लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में छात्रों के प्रत्यक्ष विरोध के बाद प्रधानमंत्री जिस भाषण में ‘मां भारती के लाल की मृत्यु’ के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं वहीं यह कहने से हिचकिचाते नहीं हैं कि बाबासाहब अपने जीवन में आने वाले कष्ट चुपचाप सहन कर जाते थे , किसी से शिकवा तक नहीं करते थे। बाबासाहब के बारे में प्रधानमंत्री का दावा निराधार है। बाबासाहब द्वारा महाड सत्याग्रह (अस्पृश्यों के वर्जित तालाब से घोषणा करके ,समर्थकों के साथ पानी पीना) तथा मनुस्मृति दहन चुपचाप सहन करते जाने का विलोम थे। पुणे करार के दौरान हुई बातचीत में गांधीजी ने उनकी वकालत के बारे में पूछा था। बाबासाहब ने उन्हें बताया था कि अपने राजनैतिक-सांगठनिक काम के कारण वे वकालत में कम समय दे पा रहे हैं। उसी मौके पर शैशव से तब तक उनके साथ हुए सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न की उनके द्वारा बताई गई कथा गांधी के विचार पत्रों -हरिजनबंधु (गुजराती), हरिजनसेवक (हिन्दी) तथा हरिजन (अंग्रेजी) में छपे थे।
भारतीय समाज और राजनीति में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। पिछड़े और दलित खुली स्पर्धा में अनारक्षित सीटों पर दाखिला पाते हैं,वजीफा हासिल करते हैं और लोक सेवा आयोग की अनारक्षित सीटों पर चुन जाते हैं । यह समाज की सकारात्मक दिशा में गतिशीलता का मानदण्ड बनता है। ऐसे युवाओं की तादाद उत्तरोत्तर बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। गैर आरक्षित खुली सीटों पर चुने जाने वाले ऐसे अभ्यर्थियों के कारण आरक्षित वर्गों के उतने अन्य अभ्यर्थियों को आरक्षण के अन्तर्गत अवसर मिल जाता है। यहां यह स्पष्ट रहे कि यदि अनारक्षित खुली स्पर्धा की सीटों पार आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को जाने से रोका जाए तब उसका मतलब गैर-आरक्षित तबकों के लिए पचास फीसदी आरक्षण देना हो जाएगा। सामाजिक यथास्थिति की ताकतें इस सकारात्मक परिवर्तन से खार खाती हैं। इस प्रकार पढ़ाई-लिखाई में कमजोर ही नहीं मेधावी छात्र-छात्राओं को भी विद्वेष का सामना करना पड़्ता है। यानी उत्पीडन का आधार छात्र का पढ़ाई में कमजोर या मजबूत होना नहीं अपितु उसकी जाति होती है।
  शैक्षणिक संस्थाएं व्यापक समाज का हिस्सा भी हैं और वहीं इनकी अपनी एक दुनिया भी है। हर जमाने के सत्ता संतुलन को बनाये रखने के लिए जिन लोगों की आवश्यकता होती है उनका निर्माण इन संस्थाओं में किया जाता है। रोहित को यथास्थितिवाद का पुर्जा बनाना शिक्षा व्यवस्था के बस की बात न थी। व्यापक समाज और विश्वविद्यालय परिसर को देखने की उसकी दृष्टि सृजनात्मक थी,दकियानुसी नहीं थी। हैदराबाद शहर के बाहर बसाये गये इस परिसर के पेड़-पौधे ,जीव-जंतुओं से लगायत अंतरिक्ष तक उसकी नजर थी। अपनी राजनीतिक पढ़ाई के अलावा कुदरत से मानव समाज की बढ़ रही दूरी को वह शिद्दत से महसूस करता था। उसके फेसबुक चित्रों का एक अल्बम हैदराबाद विश्वविद्यालय की वानस्पतिक और जैविक संपदा के सूक्ष्म निरीक्षण से खींचे गए फोटोग्राफ्स को समर्पित है।
  रोहित जैसा होनहार तरुण की प्रतिभा उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों में पुष्पित-पल्लवित हो सके यह अत्यन्त दुरूह है। इस दुर्गम पथ पर चलते वक्त उसे कदम-कदम पर लड़ना पड़ा होगा। राजनीति और शिक्षा के संचालकों को उसने चुनौती दी होगी। किसी देश का लोकतंत्र उसकी संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण से कमजोर होता है। उन संस्थाओं में लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक तंत्र के हर स्तर पर छात्र-अध्यापक-कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व हो। उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता की पोल खुलनी अब शेष नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री की शैक्षणिक ‘उपलब्धियों’ की सूचनाओं को देने के जिम्मेदार बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई के वक्त ही विश्वविद्यालयी आजादी के बाद केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की बाबत पहली समिति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी थी स्वायत्तता की हकीकत सामने आ गई थी। राष्ट्रीय महत्व की संस्थायें आई.आई.टी. से लगायत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट जैसे तमाम शिक्षण संस्थानों में दिल्ली में बैठे शैक्षणिक तंत्र के नौकरशाहों द्वारा बेहयाई से दखलंदाजियां की गई हैं।
     उच्च शिक्षा केन्द्रों में यौन उत्पीडन की रोकथाम के लिए सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा फैसले की सिफारिशों की मूल भावना के अनुरूप समितियां बनी हैं। जातिगत विद्वेष की रोकथाम के लिए भी इस प्रकार की समितियां गठित होनी चाहिए। फिलहाल विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ बने हुए हैं परन्तु वे नख-दन्त विहीन हैं। लाजमी तौर पर इन समितियों में  पिछड़े और दलित समूहों की नुमाइन्दगी भी होनी चाहिए। यह गौरतलब है कि गैर-शिक्षक कर्मचारी चयन,शिक्षक व गैर-शिक्षक आवास आवण्टन समिति में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर पदेन राष्ट्रपति होते हैं तथा इन्हें विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक-शैक्षणिक जांच के अधिकार का प्रावधान हर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कानून में होता है। इस प्रावधान के तहत सिर्फ काशी विश्वविद्यालय में दो बार विजिटोरियल जांच हुई है न्यायमूर्ति मुदालियर की अध्यक्षता में तथा न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अध्यक्ष रही माधुरी शाह की अध्यक्षता में सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जांच समिति गठित हुई थी। रोहित की मृत्यु के पश्चात एक व्यापक सन्दर्भ की जांच आवश्यक है। निर्भया कान्ड के बाद बने न्यायमूर्ति वर्मा की समयबद्ध कार्यवाही तथा बुनियादी सुधार के सुझावों से हमें सीख लेनी चाहिए तथा उच्च शिक्षा की बाबत उस प्रकार की जांच की जानी चाहिए। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा घोषित जांच इस व्यापक उद्देश्य की दृष्टि से नाकाफी प्रतीत होती है।
अफलातून

Advertisements

Read Full Post »

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

Read Full Post »

यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में

आग लगी हो

तो क्या तुम

दूसरे कमरे में सो सकते हो ?

यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में

लाशें सड़ रहीं हों

तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो ?

यदि हां तो मुझे तुम से

कुछ नहीं कहना है ।

………………

इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा

कुछ भी नहीं है

न ईश्वर

न ज्ञान

न चुनाव

………………

आखिरी बात बिल्कुल साफ

किसी हत्यारे को कभी मत करो माफ

चाहे हो वह तुम्हारा यार

धर्म का ठेकेदार ,

चाहे लोकतंत्र का

स्वनामधन्य पहरेदार ।

– सर्वेश्वरदयाल सक्सेना.

समाजवादी सरकारों का यह दावा हुआ करता था कि किसी भी साम्प्रदायिक हिंसा पर ३६ घण्टे के अन्दर काबू पाया जा सकता है। अन्तर्जातीय और अन्तर-धार्मिक पसन्द से किए गए विवाह करने वाले प्रेमी-युगलों के खिलाफ खापों में लिए गए फैसलों के अनुरूप हिंसक हमले और प्रतिहिंसा निश्चित तौर पर चिन्ता का विषय हैं किन्तु पश्चिमी उ.प्र. के लिए नई बात नहीं है । इस बार इनके बहाने साम्प्रदायिकता की आग को गांवों तक ले जाने में सभी दलों और सरकारी मशीनरी का घिनौना चेहरा सामने आया है । राहत शिविरों से अपने मूल गांव न लौटने के शपथ पत्र भरवाने की सरकार द्वारा कोशिश की गई। इसका परिणाम साम्प्रदायिक वैमनस्य को एक स्थायी भौगोलिक विभाजन देने जैसा हो जाता।शुक्र है कि न्यायपालिका ने इस मामले में हस्तक्षेप कर इसे रोका।

सूबे में सत्तानशीन दल के मुखिया ने कह दिया कि राहत शिविरों में कोई है ही नहीं । इसके दो ही दिन बाद मण्डलायुक्त द्वारा राहत शिविरों में ३४ बच्चों के ठण्ड से मरने की रपट आई है । उत्तर प्रदेश के नागरिक होने के नाते हम इस परिस्थिति से मर्माहत हैं। एक ओर साम्प्रदायिक हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों को सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया जाना तो दूसरी ओर प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारियों के द्वारा जानबूझकर एक तबके में असुरक्षा की भावना पैदा करने का क्रम चल रहा है। यह तत्काल रुकना चाहिए। सद्भाव का वातावरण फिर कायम हो सके और राहत शिविरों में रहने को मजबूर परिवार अपने गांवों में बेखौफ लौट सकें इसके लिए पहलकदमी ली जानी चाहिए।

इस कार्यक्रम के द्वारा हम यह संकल्प लेते हैं कि सद्भावना के माहौल में खलल डालने की किसी भी कोशिश को हम सफल नहीं होने देंगे। जान-माल की रक्षा और अमन-चैन बरकरार रखने की अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी पर राज्य सरकार तत्काल गंभीर पहल करे। इसके साथ ही सूबे में सक्रिय सभी राजनैतिक शक्तियों से हमारा आवाहन है कि भाई-चारा कायम रखने में मददगार साबित हों ।

निवेदक,

समाजवादी जनपरिषद , वाराणसी.

सैय्यद मकसूद अली – जिलाध्यक्ष , काशीनाथ – जिला महामन्त्री , अनवर खान- पूर्व जिला महामन्त्री , रामजनम – पूर्व प्रान्तीय महामन्त्री , डॉ स्वाति- पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष , चंचल मुखर्जी- पूर्व राष्ट्रीय सचिव,अफलातून – राष्ट्रीय सचिव

डॉ नीता चौबे , डॉ मुनीजा खान , अब्दुल हफीज, मो. नसीम उर्फ बच्चा, राम आसरे, दिनेश पटेल.

Read Full Post »

२ अक्टूबर ,१९५०,इंदौर,अपनी मृत्यु से तीन माह पूर्व सरदार पटेलने कहा – ‘हमारे नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं। बापूने अपने जीवन-कालमें उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और उसकी घोषणा कर दी। बापूके तमाम सिपाहियोंका धर्म है कि वे बापूके आदेशका पालन करें।जो उस आदेशको हृदयपूर्वक उसी भावनासे स्वीकार नहीं करता , वह ईश्वरके सामने पापी सिद्ध होगा। मैं बेवफा सिपाही नहीं हूं। मैं जिस स्थान पर हूं उसका मुझे कोई ख्याल नहीं है। मैं इतना ही जानता हूं कि जहां बापूने मुझे रखा था वहीं अब भी मैं हूं ।”
(पूर्णाहुति,चतुर्थ खण्ड,पृष्ट४६५,ले. प्यारेलाल,नवजीवन प्रकाशन,अहमदाबाद)

Read Full Post »

[ मित्रों, जो मित्र इसे व्यापक प्रसार लायक मानते हैं वे इसे जरूर साझा करें।]

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना १९२५ में हो गई थी।देश की आजादी की लड़ाई में उनकी क्या भूमिका थी,विभाजन के बाद वे किन करतूतों में लगे थे यह सब संघ के प्रचारक नरेन्द्र मोदी और लालकृष्ण अडवाणी नहीं बताते। बताते क्या हैं? यह कि आजाद भारत के मंत्रीमण्डल में हैदराबाद को भारत में शामिल करवाने की सरदार पटेल की कुशल रणनीति की बाबत – नेहरू पटेल को ‘साम्प्रदायिक’ मानते थे ! नेहरू ने पटेल को इस मसले पर ‘साम्प्रदायिक’ मानते हुए उन्हें मृत्यु पर्यन्त अपने मंत्रीमण्डल में कैसे झेला यह अडवाणी नहीं बताते।

भारत छोड़ो के आवाहन और आन्दोलन (१९४२) का विरोध करने के बाद से वाइसरॉय की कार्यकारिणी में श्यामाप्रसाद मुखर्जी सदस्य थे। यहां मैं सरदार पटेल की सेक्युलर-निष्ठा और प्रतिबद्धता से जुड़े दो महत्वपूर्ण प्रसंगों की चर्चा करूंगा । मोदी और अडवाणी के ‘राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद’ की शब्दावली में इनमें पहला प्रसंग ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ का तथा दोनों ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ के नमूने होंगे।

पश्चिम पाकिस्तान के अधिकारी काफी संख्या में पूर्व पाकिस्तान में प्रमुख पदों पर नियुक्त किए गए। इसके फलस्वरूप बड़े पैमाने पर हिन्दू अल्पसंख्यकों को सताया जाने लगा।नतीजा यह हुआ कि वहां से काफी बड़ी संख्या में हिन्दू भारत में चले आये।इससे पश्चिम बंगाल के सीमित साधनों पर बड़ा भार पड़ गया । भारत और पाकिस्तान के प्रधामंत्रियों – जवाहरलाल नेहरू और लियाकतअली खान के बीच एक समझौता हुआ,जो जनता में लोकप्रिय न हो सका। जवाहरलाल नेहरू के प्रति रही अपनी वफादारी के कारण खराब स्वास्थ्य होते हुए भी सरदार ने कलकत्ता जाना और वहाम इस समझौते के बचाव में सार्वजनिक भाषण करना स्वीकार किया । इसका बंगाल की जनता पर भारी प्रभाव पड़ा।

पूर्व बंगाल पर सरदार के भाषण का अंश

पूर्व बंगाल की समस्या कठिन है । वहां लगभग डेढ़ करोड़ हिन्दू हैं । वे निर्बल हैं और सौम्य हैं। पंजाब के लोग उनसे भिन्न थे।वे बलवान थे, अपनी बात को दृढ़तापूर्वक रख सकते थे और लड़ भी सकते थे। पूर्व बंगाल के हिन्दू दुखद स्थिति में हैं। कोई व्यक्ति किसी कारण के बिना अपना घरबार नहीं छोड़ना चाहता। अंत में तो भारत में उन्हें भूखों ही मरना होगा। वे अपना वतन छोड़कर भारत में इसलिए आते हैं कि वहां वे जिन परिस्थितियों में रहते हैं,वे बुरी हैं -दुःखदायी हैं । यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न था, जिसमें हाल में हुई आन्तर-औपनिवेशिक परिषद में चर्चा हुई थी और हम आशा करें कि दोनों सरकारों के बीच कोई संतोषप्रद समझौता इस बारे में हो जाएगा। बेशक ,यह एक गंभीर प्रश्न है और इसकी गंभीरता पाकिस्तान के सामने स्पष्ट कर दी गई है। जिन हिन्दुओं ने पूर्व बंगाल छोड़ दिया है और अब भारत में निराश्रित के रूप में रहते हैं,उन्हें वहां लौटना होगा।भारत उसका बोझ नहीं उठा सकता और यदि वे यहीं रहे और दूसरे आते जायें,तो भारत के सामने गंभीर समस्याएं खड़ी हो जायेंगी।पाकिस्तान सरकार को ऐसी परिस्थितियां पैदा करनी चाहिए ,जिससे ये लोग वहां जाकर अपने घरों में शान्ति से रह सकें। पाकिस्तान सरकार को त्रास या अत्याचार से उनकी रक्षा करनी चाहिए।उन्हें यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि पाकिस्तान में उनके प्राणों को कोई खतरा नहीं रहेगा। मैंने कुछ समय पहले सुझाया था कि अगर हिंदू पैदा की गई असंतोषप्रद स्थिति स्थिति के कारण बड़ी संख्या में पूर्व बंगाल छोड़ने को मजबूर हो जायें,तो पाकिस्तान सरकार को उन्हें बसाने के लिए अतिरिक्त भूमि भारत को देनी चाहिए। यह सुझाव पारस्परिक चर्चा और समझौते द्वारा इस कठिन समस्या के एक हल के एक उपाय के रूप में ही दिया गया था। यह सुझाव न तो चुनौती के रूप में रखा गया था और न उसे बलपूर्वक लादने का कोई इरादा था। मेरे मन में पाकिस्तान के खिलाफ कोई आक्रामक इरादा नहीं है और मैं यह मानता हूं कि दोनों उपनिवेशों को पारस्परिक चर्चाओं द्वारा मैत्रीभाव से यह समस्या हल करनी चाहिए। अगर मेरे मन में ऐसा इरादा होता, तो मैं गांधीजी के साथ सारा जीवन नहीं बिता सकता था।

मुझे जो कुछ लगता है उसे कहने में मैं संकोच नहीं करता,फिर भले ही वह हिन्दुओं ,मुसलमानों या अन्य किसीको नाराज ही क्यों न करे। मैं स्वीकार करता हूं कि ऐसा मैं कठोर वाणी में करता हूं, परंतु उपयुक्त भाषा सीखने के लिए मुझे अगला जन्म भी गांधीजी के साथ बिताना पड़ेगा।
(सरदार पटेल ः चुना हुआ पत्र-व्यवहार,१९४५-१९५०,खण्ड२,पृ ३८६-३८७)

हैदराबाद को भारत में शामिल कराने की बाबत सरदार पटेल के कौशल की बाबत नेहरू के साथ हर कदम पर राय-मशविरा तो होता ही था । सरदार के इस पराक्रम के कायल बंगाल में मुस्लिम लीग के नेता और विभाजन के समय बंगाल के मुख्यमंत्री शहीद सुहरावर्दी भी किस हद तक थे उसकी झलक इस खत से मिलती है। गौरतलब है बंगाल में लीग की ‘सीधी कार्रवाई’ जिनके बाद दंगे हुए थे के जिम्मेवार इस नेता ने हैदराबाद को बाकी देश में मिलने के लिए मजबूर करने की कितनी प्रशंसा की।

सरदार को सम्बोधित २१-९-१९४८ के इस पत्र में शहीद सुहरावर्दी कहते हैं ः

‘ हैदराबाद के सम्बन्ध में आपकी नीति , पुलिस-कार्रवाई तथा उसके सफल परिणाम के विषय में आपको तथा आपके द्वारा स्वयं अपने को अभिनन्दन देने की स्वतंत्रता मैं लेता हूं;साथ ही मैं उस भाषण के लिए , जो हैदराबाद की पराजय से ठीक पहले आपने दिया था , भी आपको मेरे हार्दिक धन्यवाद और अभिनन्दन भेजने की इजाजत लेता हूं । आपके उस भाषण की भारत के मुसलमानों में व्यापक प्रशंसा हुई ; आपके भाषण में उन्हें अपनी भावी स्थिति के सम्बन्ध में तथा भारतीय संघ के नागरिकों के नाते अपनी वफादारी की मान्यता के सम्बन्ध में नया प्रोत्साहन मिला है। मेरे अनेक मुस्लिम मित्रों ने इतना गहरा हार्दिक सन्तोष तथा कृतज्ञता व्यक्त की है कि मुझे यह उचित प्रतीत होता है कि मैं उनकी भावनायें आप तक पहुंचा दूं ।

मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि हम अखबारों में लगातार दोहराई जाने वाली इन बातों से बड़े चिन्तित थे कि हैदराबाद का प्रश्न एक साम्प्रदायिक प्रश्न है, कि उसकी गंभीर सांप्रदायिक प्रतिक्रिया भारतीय संघ के भीतर हो सकती है,कि भारतीय संघ के सारे मुसलमान हैदराबाद के प्रति सहानुभूति रखते हैं , कि हैदराबाद पर भारतीय संघ का आक्रमण होने पर वे सब विद्रोह करके संघ के भीतर उपद्रव खड़े कर देंगे और इसलिए उन्हें पहले से ही दबा दिया जाना चाहिए,कि मुसलमानों,कि मुसलमान सामान्यतः राष्ट्रद्रोही है,कि मुसलमान गुप्त षड़्यंत्रों में,रजाकारों की भरती में,हैदराबाद के लिए फण्ड इकट्ठा करने में लगे हुए हैं – आदि आदि । ऐसा मालूम होता था कि कहीं इसका केन्द्रस्थान है,जहां से ये सब आक्षेप और अभियोग निरन्तर होते रहते हैं । शायद इसका कारण मुसलमानों के प्रति रहा घोर अविश्वास था अथवा भय और सन्देह की भावना थी , जो हमारे नये राष्ट्र के लिए बहुत स्वाभाविक थी; अथवा शायद यह मुख्यतः उन लोगों की योजना थी,जो इसे मुसलमानों को बदनाम करने का तथा उनके खिलाफ लोगों की भावनाओं को भड़काने का अच्छा मौका मानते थे – जिसका अंतिम परिणाम मुसलमानों के बहिष्कार में अथवा भारतीय संघ से उनके निकाले जाने में आये। पंडितजी का लखनऊ का भाषन ऐसा पहला भाषण था, जिसमें उन्होंने काश्मीर तथा हैदराबाद की घटनाओं के असाम्प्रदायिक पहलू पर जोर दिया;और उसके बाद तो पंडितजी के और आपके अनेक भाषणों और वक्तव्यों ने देश को सही नेतृत्व और मार्गदर्शन प्रदान किया तथा अविश्वास, भय और घृणा की इन भावनाओं पर अंतिम प्रहार किया,जिन्हें यदि बेरोकटोक फैलने दिया जाता तो उसका निश्चित परिणाम मुसलमानों के व्यापक संहार में आता। आपके दृढ़ निश्चय ने तथा आपके द्वारा दिल्ली में सम्पूर्ण साम्प्रदायिक हिंसा को दबाने के लिए उठाये गये प्रत्यक्ष कदमों ने भी आपके आशयों को बहुत स्पष्ट कर दिया होगा । ‘ (सरदार पटेल ः चुना हुआ पत्रव्यवहार,१९४५-१९५०,खण्ड२,पृ १२६-१२७)

सरदार और नेहरू के बीच के जो मतभेद थे वे छुपे हुए नहीं हैं । उनके बावजूद जिस प्रकार इन दोनों नेताओं ने एक साथ काम किया उसके पीछे एक सूत्र काम कर रहा था। यह सूत्र था महात्मा गांधी। ५-२-१९४८ को सरदार ने यह नेहरू को लिखे पत्र में साफ तौर पर बता दिया था ,’मुझे बापू के अवसान से पहले एक घंटे से अधिक समय तक उनके साथ अंतिम बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।उस समय उन्होंने मुझे बताया था कि उनके और आपके बीच तथा लार्ड माउन्टबेटन के साथ उनकी क्या बातें हुई थीं। उन्होंने दूसरे दिन हम दोनों से मिलने का समय भी निश्चित कर दिया था। उनकी राय भी हम दोनों को एकसाथ बांधती है और मैं आपको यह विश्वास दिला सकता हूं कि इसी भावना से अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियां पूरी करने का मैं दृढ़ निश्चय कर चुका हूं। (वही,पृ२१४)

Read Full Post »

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।

आजादी की लड़ाई का एक साफ मकसद था , गुलामी के जुए को उतार फेकना। जब उद्देश्य ऊंचा और साफ-साफ होता है तब समाज का हर तबका उस  राजनीति से जुड़ जाता है । मौजूदा विधान सभा चुनाव एक ऐसे दौर में हो रहा है जब देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ तीव्र भावना है । लेकिन राजनीति की मुख्यधारा के अधिकांश’ दलों के पांव भ्रष्टाचार के कीचड से सने हैं। इसी वजह से आम जनता का इन चुनावों में उत्साह कम दिख रहा है। देश में बड़े बड़े घोटालों की आई बाढ़ की जड़ से १९९२ से चलाई गई आर्थिक नीतियों का सीधा सम्बन्ध है। इन नीतियों को केन्द्र और राज्य में रही हर दल की सरकार ने अपना लिया है। इसीलिए ये तमाम पारटियां इस चुनाव में इन मसलों से मुंह चुरा रही हैं । 

शिक्षित नौजवानों को छोटी-सी नौकरी भी बिना रिश्वत नहीं मिल रही। नई आर्थिक नीतियों से रोजगार के अवसर संकुचित हुए हैं। आबादी के मुट्ठी-भर लोगों के लिए रोजगार,स्वास्थ्य,शिक्षा की सुविधाओं को बढ़ावा देने का सीधा मतलब है कि आम लोगों को इन सुविधाओं से दूर किया जाना। जब आम जनता की जरूरतों को पूरा करना उद्देश्य होगा तब ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वे रोजगार सुरक्षित रहेंगे। एक प्रभावशाली जन लोकपाल कानून की धज्जियां उड़ाने में सभी बड़े दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी ।  भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिए जन लोकपाल के अलावा भी अन्य पहल भी करनी होंगी।

बुनकरीजरदोजी तथा अन्य रोजगार , स्वास्थ्य , शिक्षा – इन सभी क्षेत्रों में जनता की दुशवारियां बढ़ गई हैं। आम बुनकर और दस्तकार को ध्यान में रखकर कपड़ा नीति और दस्तकार नीति अब तक नहीं बनी है । सभी बड़ी पार्टियां इसके लिए जिम्मेदार हैं । बुनकरों की सहकारी समिति के नाम पर फर्जीवाड़े के मामले भी सामने आए हैं । जरदोजी और दस्तकारी से जुड़े लोगों को बुनकरों के समान सुविधायें मिलनी चाहिए। बुनकर और दस्तकार इस देश के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं लेकिन उनकी तरक्की की हमेशा अनदेखी की जाती है।
खेती और दस्तकारी के बाद हमारे देश में सबसे बड़ा रोजगार खुदरा-व्यापार है जिस पर हमले की रणनीति बन चुकी है। केन्द्र सरकार की पार्टी के राजकुंवर की समझदारी के अनुसार दानवाकार विदेशी कम्पनियों को देश का खुदरा-व्यापार सौंप कर वे किसानों का भला करने जा रहे हैं । देश के सबसे बड़े घराने के द्वारा जिन सूबों में सब्जी का खुदरा-व्यवसाय हो रहा है क्या वहां के किसानों ने खुदकुशी से मुक्ति पा ली है ?
प्रदेश की सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को नया संस्थागत रूप दे दिया गया है। किसानों की जमीनें लेकर जो बिल्डर नये नगर और एक्सप्रेस-वे बनाने की जुगत में है, उनके खर्च पर प्रदेश सरकार पुलिस थाने ( चुनार ) का निर्माण करवाया है। कई पुलिस चौकियां अपराधियों के पैसों से बनवाई गई हैं। समाजवादी जनपरिषद नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए बना है। जिन इलाकों में दल ने संघर्ष किया है और मजबूत जमीन बना ली है सिर्फ वहीं चुनाव में शिरकत करता है।  मजबूत राजनैतिक विकल्प बनाने का काम व्यापक जन-आन्दोलन द्वारा ही संभव है । इसलिए भ्रष्ट राजनीति के दाएरे से बाहर चलने वाले आन्दोलनों और संगठनों के मोर्चे का वह हिस्सा है। राष्ट्रीय-स्तर पर लोक राजनीति मंच’ तथा जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ऐसी बड़ी पहल हैं तथा स्थानीय स्तर पर साझा संस्कृति मंच , जो सामाजिक सरोकारों का साझा मंच है ।
वाराणसी के हमारे प्रत्याशी की राजनैतिक यात्रा इसी शहर में भ्रष्टाचार विरोधी जयप्रकाश आन्दोलन के किशोर कार्यकर्ता के रूप में  शुरु हुई| छात्र-राजनीति को जाति-पैसे-गुंडागर्दी से मुक्त कराने की दिशा में समता युवजन सभा से वे जुड़े और एक नयी राजनीति की सफलता के शुरुआती प्रतीक बने। लोकतांत्रिक अधिकार और विकेन्द्रीकरण , सामाजिक न्याय ,पर्यावरण तथा आर्थिक नीति के दुष्परिणामों के विरुद्ध संगठनकर्ता बने तथा इन्हीं संघर्षों के लिए समाज-विरोधी ताकतों के लाठी-डंडे खाये और थोपे गए फर्जी मुकदमों में कई बार जेल गये। फिरकावाराना ताकतों का मुकाबला करने के लिए नगर में गठित ‘सद्भाव अभियान’ से वे सक्रियता से जुड़े । साम्प्रदायिक दंगों के दौरान थोपे गये फर्जी मुकदमों को हटाने के पक्ष में तथा हिंसा में शरीक लोगों पर लगे मुकदमों को सरकार द्वारा हटाने के विरुद्ध अफलातून ने कामयाब कोशिश की। पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हमारे समूह ने रचनात्मक संघर्ष का सहारा लिया है तथा मानवाधिकार आयोग द्वारा सार्थक हस्तक्षेप के लिए पहल की है ।
वाराणसी के स्त्री सरोकारों के साझा मंच – समन्वय के माध्यम से शहर में ही नहीं समूचे राज्य में हुए नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध कारगर आवाज उठाई गई है ।
रोज-ब-रोज की नागरिक समस्याओं का समाधान नगर निगम और उसके सभासदों के स्तर पर होना चाहिए । विधायक-नीधि का दुरुपयोग ज्यादा होगा यदि कोई ठेकेदार ही विधायक बन जाए।
इसलिए वाराणसी कैन्ट क्षेत्र में भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलों का विकल्प खोजने की आप कोशिश करेंगे तो आपकी निराशा दूर हो सकती है । बड़े दलों से जनता की निराशा के कारण फिर अस्पष्ट बहुमत का दौर शुरु होगा ऐसा प्रतीत हो रहा है।इसलिए समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार विधान सभा में विपक्ष में रहने और जन आकांक्षाओं की आवाज को बुलन्द करने का संकल्प लेते हैं। हमें जनता के विवेक पर भरोसा है। यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह होगी ही नहीं । सुबह होगी क्योंकि मत, बल,समर्थन आपके हाथ में है। भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलो से छुटकारा पाने की आपकी कोशिश सफल होगी यह हमे यकीन है। विधान सभा में आपकी आवाज बुलन्द हो इसलिए हम आप से अपील करते हैं कि अपना अमूल्य वोट देकर वाराणसी कैन्ट से समाजवादी जनपरिषद के साफ-सुथरे और जुझारु उम्मीदवार अफ़लातून को भारी मतों से विजयी बनाएं ।निवेदक,
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश
लोक राजनैतिक मंच                                     साझा संस्कृति मंच

Read Full Post »

अपनी आवाज अपना गला ( दुनिया मेरे आगे )

Monday, 26 December 2011 06:10

अफलातून जनसत्ता 26 दिसंबर, 2011: हरे राम, हरे कृष्ण’ संप्रदाय द्वारा रूसी में अनूदित गीता पर रूस में आक्षेप लगाए गए हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात की गई है। विदेश मंत्री ने संसद और देश को आश्वस्त किया है कि वे रूस सरकार से इस मामले पर बात करेंगे। मामला पर-राष्ट्र का है। क्या भारत में ही इस पुस्तक को लेकर परस्पर विपरीत समझदारी नहीं है? यह मतभेद और संघर्ष सहिष्णु बनाम कट्टरपंथी का है। लोहिया ने इसे ‘हिंदू बनाम हिंदू’ कहा। उन्होंने गांधी-हत्या (हत्यारों की शब्दावली में ‘गांधी-वध’) को भी हिंदू बनाम हिंदू संघर्ष के रूप में देखा। देश के विभाजन के बाद एक बार गांधीजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में निमंत्रित किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई थी। सरसंघचालक गोलवलकर ने गांधीजी का स्वागत करते हुए उन्हें ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी हैं। हिंदू धर्म की विशिष्टता, जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। अगर हिंदू यह मानते हों कि भारत में अ-हिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दर्जे से संतोष करना होगा तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा। मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।’
गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी-मंडली के एक सदस्य बोल उठे- ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।’ गांधीजी ने उत्तर दिया- ‘लेकिन यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।

(पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ- 17) इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया- ‘क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? अगर नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?’ गांधीजी ने कहा- ‘पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है? दूसरे शब्दों में- हमें ऐसा अधिकार मिल सकता है, जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की, तो यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली-भांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद, दोनों एक साथ बन जाएं तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे। उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए। कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।’ (संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड: 89)
आध्यात्मिक सत्य को समझाने के लिए कई बार भौतिक दृष्टांत की आवश्यकता पड़ती है। यह भाइयों के बीच लड़े गए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि हमारे स्वभाव में मौजूद ‘भले’ और ‘बुरे’ के बीच की लड़ाई का वर्णन है। मैं दुर्योधन और उसके दल को मनुष्य के भीतर की बुरी अंत:प्रेरणा और अर्जुन और उसके दल को उच्च अंत:प्रेरणा मानता हूं। हमारी अपनी काया ही युद्ध-भूमि है। इन दोनों खेमों के बीच आंतरिक लड़ाई चल रही है और ऋषि-कवि उसका वर्णन कर रहे हैं। अंतर्यामी कृष्ण, एक निर्मल हृदय में फुसफुसा रहे हैं। गांधीजी तब भले ही एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती हैं और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका ही गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी अपना!

गांधी जी और संघ

जनसत्ता 29 दिसंबर, 2011: अपनी आवाज अपना गला’ (दुनिया मेरे आगे, 26 दिसंबर) में अफलातून जी ने कुछ तथ्यों को सही संदर्भों के साथ प्रस्तुत नहीं किया है। इसमें संघ-द्वेष से आपूरित पूर्वग्रह की झलक मिलती है। देश विभाजन के बाद गांधीजी किसी संघ शिविर में नहीं गए थे। दिल्ली में भंगी बस्ती की शाखा में उन्हें 16 सितंबर, 1947 को आमंत्रित किया गया था। आमंत्रित करने वाले व्यक्ति सरसंघचालक गोलवलकर नहीं, बल्कि दिल्ली के तत्कालीन प्रांत प्रचारक वसंत राव ओक थे। गांधीजी सदैव खुद को गौरवशाली सनातनी हिंदू कहते थे। वसंत राव ओक ने शाखा पर गांधीजी का परिचय ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ कह कर करवाया। गांधीजी ने इस परिचय पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
गोलवलकर से गांधीजी की बातचीत का वर्णन अफलातून जी ने ‘पूर्णाहुति’ का संदर्भ देकर किया है। इस मुलाकात का गांधी संपूर्ण वांग्मय में दो बार जिक्र है। पहला, 21 सितंबर, 1947 को प्रार्थना-प्रवचन में- ‘अंत में गांधीजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु (गोलवलकर) से अपनी और डॉ दिनशा मेहता की बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि मैंने सुना था कि इस संस्था के हाथ भी खून से सने हुए हैं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिलाया कि यह बात झूठ है। उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है। उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहींं है। वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है। उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है। उन्होंने (गुरुजी ने) मुझसे कहा कि मैं उनके विचारों को प्रकाशित कर दूं।’
इसका जिक्र गांधीजी ने भंगी बस्ती की शाखा पर अपने भाषण में किया- ‘कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई थीं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिया कि हालांकि संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचा कर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास

नहीं रखता। अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्मरक्षा का कौशल सिखाता है। प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया।’
इस मुलाकात का जैसा वर्णन अफलातून जी ने किया है और अंत में लिखा है कि ‘उन्होंने (गांधीजी ने) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।’ ये विचार प्यारेलाल जी के हो सकते हैं, गांधीजी के नहीं। गांधीजी ने अपने भाषण में जो संघ के विषय में कहा, वह इस प्रकार है- ‘संघ एक सुसंगठित और अनुशासित संस्था है। उसकी शक्ति भारत के हित में या उसके खिलाफ प्रयोग की जा सकती है। संघ के खिलाफ जो आरोप लगाए जाते हैं, उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।’
अफलातून जी ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई।’ इसका भी वर्णन संपूर्ण वांग्मय में है। किसी संघ अधिकारी ने गीता के संदर्भ में वहां कुछ भी नहीं कहा था। एक स्वयंसेवक ने गांधीजी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के संदर्भ में गीता का हवाला देते हुए यह पूछा था- ‘गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कौरवों का नाश करने के लिए जो उपदेश देते हैं, उसकी आप किस तरह व्याख्या करेंगे?’ गांधीजी ने स्वयंसेवक की समझदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, संजीदगी से जवाब दिया- ‘… पापी को सजा देने के अधिकार की जो बात गीता में कही गई है, उसका प्रयोग तो केवल सही तरीके से गठित सरकार ही कर सकती है।’ बाद में गांधीजी ने आग्रह किया कि कानून को अपने हाथ में लेकर सरकारी प्रयत्नों में बाधा न डालें।
लेख के अंत में गीता के अर्थ का जो आध्यात्मिक आयाम अफलातून जी ने प्रस्तुत किया है, उस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। अनावश्यक रूप से संघ को बदनाम करने और घृणा फैलाने के प्रयासों को जब इन आयामों में मिश्रित किया जाता है, तब हम समाज की सेवा नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे होते हैं।
’महेश चंद्र शर्मा, (पूर्व सांसद), द्वारका, नई दिल्ली

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

खुले मन की जरूरत

जनसत्ता 30 दिसंबर, 2011: जिस तरह महेश चंद्र शर्मा जी ने ‘संघ’ के बचाव में गांधीजी के निकट के साथी, सचिव और जीवनीकार प्यारेलाल जी पर लांछन लगाया है, वह ‘संघ’ के गोयबल्सवादी तौर-तरीके से मेल खाता है। संपूर्ण गांधी वांग्मय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान छेड़छाड़ की गई थी, उस पर यूपीए-एक सरकार ने वरिष्ठ सर्वोदयकर्मी नारायण देसाई की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। जांच समिति ने शोधकर्मियों द्वारा लगाए गए छेड़छाड़ के सभी आरोप सही पाए थे और उक्त संस्करण की पुस्तकों और सीडी की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने और असंशोधित मूल रूप की ही बिक्री करने की संस्तुति की थी। बहरहाल, जितनी तफसील में इस विषय पर लिखा जा सकता है, उसका मोह न कर मैं इतिहास-क्रम में उलटा जाते हुए सिर्फ ठोस प्रसंगों को रखूंगा।
गांधी को ‘संघ’ के प्रात:-स्मरणीयों में शरीक करने की चर्चा हम महेश जी, प्रबाल जी, अशोक भगत जी, रामबहादुर जी जैसे स्वयंसेवकों से जेपी आंदोलन के दौर (1974-75) से सुनते आ रहे थे। सितंबर और अक्टूबर 2003 में प्रकाशित संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका मेरे हाथ लग गई। स्मरणीय दिवसों में गांधी जयंती के विवरण में ‘देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।’ संघ के साहित्य-बिक्री पटलों पर ‘गांधी-वध क्यों’ नामक पुस्तक में ‘वध’ के ये कारण ही बताए गए हैं।
संघ की शाखा में गांधीजी के जाने की तारीख के उल्लेख में अपनी चूक मैं स्वीकार करता हूं। प्यारेलाल जी द्वारा लिखी जीवनी ‘महात्मा गांधी दी लास्ट फेस’ पर महेश जी ने पूर्वाग्रह का आरोप लगाया है। इसलिए दिल्ली डायरी, प्रार्थना प्रवचन और गांधी द्वारा संपादित पत्रों से ही उद्धरण पेश हैं।
गीता की बाबत दिया गया उद्धरण संपूर्ण गांधी वांग्मय (खंड 89) में मौजूद है।
‘अगस्त क्रांति-दिवस’ (9 अगस्त, 1942) को प्रकाशित ‘हरिजन’

(पृष्ठ 261) में गांधीजी ने लिखा- ‘शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके 3,000 सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- ‘पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो, उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे। अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।’ बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसी ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है।
नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा, और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।
धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।’
महेश जी खुले दिमाग से तथ्यों को आत्मसात करें और ‘प्रात: स्मरणीय’ के पक्ष से परेशान न हों।
’अफलातून, काहिवि, वाराणसी

अप्रासंगिक विषय

चौपाल’ (30 दिसंबर) में अफलातून का जवाब पढ़ा।  उन्होंने अप्रासंगिक विषयों को अपने पत्र में उठाया है, जैसे गांधी संपूर्ण वांग्मय से राजग सरकार ने छेड़छाड़ की और संघ ने महात्मा गांधी का नाम कैसे ‘प्रात: स्मरण’ में जोड़ा। इन मुद्दों का न तो मेरे पत्र में उल्लेख था, न ही अफलातून के मूल लेख में। इस संदर्भ में केवल इतना  कहना है कि मैं संपूर्ण वांग्मय के जिन खंडों को उद्धृत कर रहा हूं, वे राजग सरकार के समय छपे हुए नहीं, बल्कि मई 1983 में नवजीवन ट्रस्ट, अमदाबाद द्वारा प्रकाशित हैं। जो उद्धरण मैंने दिए हैं वे किसी छेड़छाड़ के नहीं, उसी अधिकृत संपूर्ण वांग्मय के हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शिविरों में भारत के महान पुरुषों के नामों का स्मरण ‘प्रात: स्मरण’ में करता है। अफलातून इससे क्यों नाराज हैं! मैंने प्यारेलाल जी पर कोई लांछन अपने पत्र में नहीं लगाया, कृपया पत्र को पुन: ध्यान से पढ़ें। मैंने अफलातून को ‘पूर्वाग्रह-ग्रस्त’ अवश्य कहा है। यदि अफलातून को संघ विषयक कोई ‘पूर्वाग्रह’ नहीं है, तो निश्चय ही यह खुशी की बात है।
अफलातून ने पुन: गांधीजी को सही प्रकार से उद्धृत नहीं किया। जिस तथाकथित नारे और भाषण की शिकायत दिल्ली प्रांत कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने गांधीजी से की थी, उसके संदर्भ में गांधीजी ने जो कुछ ‘हरिजन’ में लिखा उसके वे अंश जो अफलातून ने उद्धृत नहीं किए उन्हें उद्धृत करने से पूरी वास्तविकता ही बदल जाती है।
गांधीजी ने कहा है ‘‘मैं तो यही उम्मीद कर सकता हूं यह नारा अनधिकृत है, और जिस वक्ता के बारे में यह कहा गया है कि उसने ऊपर के विचार व्यक्त किए हैं, वह कोई जिम्मेदार आदमी नहीं है।’’ एक अनधिकृत, गैर-जिम्मेदार नारे और वक्तव्य को लेकर अफलातून क्या सिद्ध करना चाहते हैं, जिसके लेखक के बारे में किसी को कुछ पता नहीं। ऐसे वाहियात नारों और वक्तव्यों के आधार पर आप संघ का आकलन करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई आपको पूर्वाग्रही भी न कहे! संघ को थोड़ा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि शाखाओं में कभी नारेबाजी नहीं होती।
उस वाहियात भाषण का भी गांधीजी जवाब देते हैं, यह उनकी संजीदगी है।
अफलातून से केवल इतना निवेदन है कि उन्हें संघ से जो शिकायत हो, वे स्वयं अपने तर्कों से उसे प्रस्तुत करें, किसी महापुरुष की आड़ लेकर उन्हें प्रहार करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। पता नहीं काशी प्रांत की कौन-सी शाखा पुस्तिका उनके हाथ लग गई। देश विभाजन को न रोक पाने के कारण महात्मा जी बहुत दुखी थे, वे 15 अगस्त 1947 के उत्सव में भी शामिल नहीं हुए और द्वि-राष्ट्रवादी पृथकतावादियों के आक्रमण से परेशान हिंदुओं ने गांधीजी के सामने अपनी पीड़ाओं और आक्रोश को व्यक्त किया था। इसका उल्लेख करने में अफलातून को उस पुस्तिका से क्या शिकायत है?
’महेश चंद्र शर्मा, नई दिल्ली

हिन्दू द्विराष्ट्रवादी

महात्मा गांधी का संपूर्ण वांग्मय हिंदी और अंग्रेजी (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) में प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने छापा है, नवजीवन ट्रस्ट ने नहीं। उसका स्वत्वाधिकार जरूर 1983 से 2008 तक नवजीवन ट्रस्ट के पास रहा। ‘गांधीजीनो अक्षरदेह’ (गुजराती वांग्मय) जरूर नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिस उद्धरण का हवाला महेश जी ने दिया है, उसे मैंने ‘हरिजन’ (गांधीजी का अंग्रेजी मुखपत्र) के पृष्ठ 261 से लिया है। द्वि-राष्ट्रवादी केवल मुसलिम लीग के लोग नहीं थे, हिंदुओं के लिए हिंदू राष्ट्र को मानने वाले भी द्वि-राष्ट्रवादी हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलिम लीग से पहले सावरकर ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे

की बात शुरू कर दी थी। हिंदू-राष्ट्रवादी गांधी के समक्ष अपनी शिकायत कभी प्रार्थना सभा में बम फेंक कर कर रहे थे। अंतत: उन्हीं गांधी जी को गोली मार दी। महेश जी के शब्दों में यह उनकी पीड़ा और आक्रोश मात्र था, जिन्हें शाखा-पुस्तिका में असली हिंदू माना गया है। महेश जी ने शाखा-पुस्तिका के उद्धरण का खंडन नहीं किया है, भले ही उन्हें यह पता न हो कि मेरे हाथ कौन-सी पुस्तिका लग गई। शाखा में नारे नहीं उद्घोष होते हैं, पथ-संचलन भी मौन नहीं हुआ करते।
गांधी-हत्या को ‘गांधी-वध’ कहने वालों की किताबें भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय 11, अशोक मार्ग पर भी बिक रही थीं-

http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2011/09/post-195.html
’अफलातून, वाराणसी

 

Read Full Post »

Older Posts »

%d bloggers like this: