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Archive for the ‘corruption’ Category

जारी है….

Note ban: Not only in Bihar, BJP went land shopping in Odisha as well

2000 के नोट की चिप से आतंकियो को ट्रेस कर मार गिराया :- तिहाड़ी चौधरी( छी न्यूज)

 

Pramod Singh

..दूसरी बात. महाधन का यह महाप्रताप है, या दूरगामी सांगठनिक सोच की विकट लीला, सभी सोशल वेबसाइट्स पर, और उससे बाहर की दुनिया में भी, भाजपाई तत्व भयानक रुप से सक्रिय हैं. इतनी गहराई तक उनका फैलाव हो गया है कि हो सकता है जो चादर ओढ़कर आप बैठे हो, उसके पैताने भाजपाई तत्व लटका हुआ हो. 2014 के ठीक पहले और उसके बाद से यह महापरिवर्तन कैसे घटित हुआ है, समाज वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं के लिए गंभीर विवेचना का विषय है. लेकिन यह महाक्रांतिकारी कृत्य जो घटित हुआ है, एक बड़ी वास्तविकता है और इस तोड़ और फोड़ का फ़ायदा बड़े ढंग से पूरा भाजपा और लगभग वैसे ही स्वार्थों पर फल, पोषित हो रहा बिरादर समाज, आर्थिक क्षेत्र से जुड़ी सभी संस्थाएं काट रहे हैं. यह आन्हर सेना सिर्फ़ आपकी बात का विरोध करने को हाज़िर हुई हो, ऐसा नहीं है. प्रकट गंदा फूहड़ विरोध करने के साथ-साथ, वह किसी भी सार्थक बातचीत को भटकाने, बेमतलब करने और कंफ्यूज़न फैलाने का नंगा नाच नाचने लगती है. यही इस पूरे महाकांड का मुख्य उद्देश्य भी है, कि इनके जघन्य कृत्य होते रहें, और उसकी प्रतिक्रिया में कोई भी बात, विरोध बड़े पैमाने पर फलित हो ना सके. अगर हो तो उसे कहनेऔर सुनने, सभी वालों को, हलकान करो, कंफ्यूज़ करो और पूरी प्रक्रिया को हास्यास्पद बना दो. इससे कैसे लड़ा जाए, बड़ा विकट संकट है. इस पर सोचिए, लगातार सोचिए, इसकी अब हमेशा ज़रूरत पड़ती रहेगी. आप भाजपा के सीधे विरोधी ना भी हों तो भी उनके तरीके और दुनिया वह ऐसी बना रहे हैं कि आपको बात नहीं करने देंगे और जो भी बात होगी भाजपाई फ़ायदों की बात होगी, और माथे पर ढोल बजा-बजा कर बताया जाएगा कि वही समाज और देश का भी फ़ायदा है.

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Himanshu Kumar

मोदी जी आपका तो रोम-रोम कारपोरेट के यहां गिरवी है

आगरा की रैली में पीएम मोदी ने कहा कि वो बिकाऊ नहीं हैं। यह बात उतनी ही असत्य है जितना यह कहना कि सूरज पश्चिम से निकलता है। जो व्यक्ति बाजार की पैदाइश है और जिसकी कारपोरेट ने खुलेआम बोली लगाई हो। उसके मुंह से यह बात अच्छी नहीं लगती है। शायद मोदी जी आप उस वाकये को भूल गए जब कारपोरेट घरानों के नुमाइंदों का लोकसभा चुनाव से पहले अहमदाबाद में जमावड़ा हुआ था। इसमें अंबानी से लेकर टाटा और बजाज से लेकर अडानी तक सारे लोग मौजूद थे। पूंजीपतियों के इस मेले में आप अकेले घोड़े थे। जिसके बारे में इन धनकुबेरों को विचार करना था। फिर वहीं पर आप के ऊपर दांव लगाने का फैसला हुआ था। उसके बाद से कारपोरेट ने अपनी पूरी तिजोरियां खोल दीं। निजी टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया से लेकर अपने निजी तंत्र को आपके हवाले कर दिया। लोकसभा चुनाव के दौरान पांच से लेकर सात चार्टर्ड विमान आपकी सेवा में लगा दिए गए। हेलीकाप्टरों की तो कोई गिनती ही नहीं थी। एक विदेशी एजेंसी के अनुमान के मुताबिक 24 हजार करोड़ रुपये आपने पानी की तरह बहाया। क्या ये पैसा बीजेपी के पास जमा था। या फिर संघ ने उसे मुहैया कराया था। या आपके घर-परिवार वालों ने दिया था। जनता के चंदे से तो पार्टी कार्यकर्ताओं का खाना भी नहीं चल पाता। ऐसे में यह मत कहिएगा कि जनता के बल पर चुनाव लड़े।

दरअसल कारपोरेट घरानों ने आपको गोद ले लिया था। क्योंकि उसे लग गया था कि यही वो शख्स है जो उसके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। अनायास नहीं अपनी पुरानी चहेती पार्टी कांग्रेस की नाव को छोड़कर यह हिस्सा रातों रात आपकी गाड़ी में सवार हो गया। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस उनका कोई अनभल कर रही थी। सच यह है कि इस देश को वैश्वीकरण के रास्ते से जोड़ने वाला शख्स ही उसका प्रधानमंत्री था। लिहाजा उस पर भरोसा न करने का कोई कारण नहीं था। लेकिन कारपोरेट जितनी तेजी से देश के संसाधनों को लूटना चाहता था। या उस पर काबिज होना चाहता था। कांग्रेस उसके लिए तैयार नहीं थी। क्योंकि उसने मानवीय चेहरे के साथ उदारीकरण के रास्ते पर बढ़ने का फैसला लिया था। जिसके चलते उसे तमाम कल्याणकारी योजनाओं को भी चलाना पड़ रहा था। कारपोरेट जिसके धुर खिलाफ था। क्योंकि बाजार में उसके फलने-फूलने की राह में यही सबसे बड़ी बाधा थी। इसलिए कारपोरेट ने सामूहिक तौर पर आपके साथ जाने का फैसला लिया। क्योंकि उसे पता था कि आप देश के संसाधनों से लेकर पूरे बाजार को उसके हवाले कर देंगे। नीतियां कारपोरेट की होंगी, लागू सरकार करेगी। अनायास नहीं सभी सरकारी संस्थाओं को पंगु बना दिया गया है। बारी-बारी से कल्याणकारी योजनाओं को वापस लिया जा रहा है।

इसलिए मोदी जी बिकाऊ की बात तो दूर आपका तो रोम-रोम कारपोरेट के यहां गिरवी है। और अब आप बारी-बारी से उसी कर्जे को उतार रहे हैं। अदानी को पूरे कच्छ जिले की जमीन 1 रुपये प्रति एकड़ की लीज पर देना उसी का हिस्सा है। देश का पूरा सोलर प्रोजेक्ट अडानी के हाथ में है। कोई हफ्ता शायद ही बीतता हो जब बाबा रामदेव के लिए किसी तोहफे की घोषणा न होती हो। अंबानी का तो पहले साउथ ब्लाक तक ही रिश्ता था। वह भी दलालों के जरिये। लेकिन अब उनकी सीधे पीएमओ में दखल हो गई है। नोटबंदी का फैसला इसी कारपोरेट को सीधे लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। आप ने आगरा की रैली में खुश होकर कहा कि 5 लाख करोड़ रुपये आ गए हैं। और अब जनता और जरूरतमंद को लोन दिया जाएगा। लेकिन सच यही है कि उससे जनता नहीं बल्कि कारपोरेट की झोली भरी जाएगी। और जनता के बीच से जो लोग लोन लेंगे वो भविष्य में आत्महत्या करेंगे। लेकिन कारपोरेट का लोन माफ कर दिया जाएगा।

आपने कालाधन धारियों को गिरफ्तार कर सजा देने की बात कही है। कुछ जगहों पर छापे की खबरें भी आ रही हैं। ये कितनी अफवाह हैं और कितनी नौटंकी। इसका कुछ समय बाद ही पता चलेगा। लेकिन सच यही है कि निशाने पर अभी भी छोटी मछलियां ही हैं। अगर आप इस पूरी कवायद को लेकर गंभीर होते। तो अडानी के तकरीबन 5400 करोड़ रुपये के बाहर भेजे जाने वाले मामले में एसआईटी की जांच में बांधा नहीं डालते। लेकिन सच यही है कि आपको बड़े कारपोरेट घरानों के काले धन से कुछ नहीं लेना देना। और न ही विदेशों में जमा धन आपकी चिंता का विषय है। आप का मुख्य मकसद जनता के पैसे को बैंकों में लेकर उसे कारपोरेट के हवाले करना है।

मोदी जी जुमलों की एक सीमा होती है। यह भ्रम भी बहुत दिनों तक नहीं रहने वाला। क्योंकि इसका असर सीधे जनता पर पड़ेगा। जनता को जुमला और कारपोरेट को थैली का पर्दाफाश होकर रहेगा। वैसे भी झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है।

ध्यान रहे कि 30 दिसंबर तक जितने मूल्य के 500 ,1000 के नोट रिजर्व बैंक में वापस जमा होंगे उस राशि को रिजर्व बैंक द्वारा जारी इन नोटों के कुल मूल्य से घटाने पर एक अन्दाज लगेगा, 500 और हजार के नोटों के रूप में काले धन का।
कुल काले धन का यह बहुत छोटा हिस्सा होगा। अर्थशास्त्री राष्ट्रीय आय का 40 फीसदी काला धन होने का अनुमान बताते हैं।

Aflatoon Afloo

उपचुनावों में जो जहां सत्ता में था जीत गया।भाजपा म प्र में ,तृणमूल बंगाल में,माकपा त्रिपुरा में,अन्नाद्रमुक तमिलनाडु में

Aflatoon Afloo

गुजरात में घूस की रकम 2000 रुपये के नोटों में पकड़ाई,दो आतंकियों के पास 2000 रु के नोट मिले और अब 2000 के नकली नोट भी मिल गये। क्या बचा?
बची है बडे उद्योगपतियों की सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में देनदारी।तो वह आम जनता के खून पसीने की कमाई निचोड कर जमा कर लेने के बाद सलट जाएगी।

Rs. 4 Lakh In Fake 2,000 Rupee Notes Seized In Odisha, 1 Arrested

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Sanjay Jothe

गाँव वाले ‘ऑनलाइन’ का अर्थ समझ रहे हैं – ‘लाइन में लगना ही ऑनलाइन होना है’ … JIO डिजिटल इंडिया

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Aparna Krishnan

Please never go cashless even if it may reduce corruption.

Life and livlihoods come first. Small people survive on cash – flower vendors, small shopkeepers, small farmers. Fighting corruption comes second, only after survival is taken care of.

BUSINESS
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Raj Kishore

नोटबंदी से अमीर लोगों की शामत आई होती, तो अ. बच्चन जैसे अमीर इसका समर्थन क्यों कर रहे होते? क्या मोदी अचानक वामपंथी हो गए हैं? समझदार जवाब को कोई इनाम नहीं।

दिनेशराय द्विवेदी‘s post.

दिनेशराय द्विवेदी

शादी के लिए 2,50,000/- रुपए की नकदी नहीं मिलेगी किसी को

वाह! मोदी सरकार!
वाह! रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया!

यदिआप को किसी को नकदी देनी ही नहीं है तो क्यूँ इस बात की वाह वाही लूटी जा रही है कि शादी वालों को ढाई लाख नकदी दे दी जाएगी?

सीधे सीधे कह क्यों नहीं देते कि कमाओ और बैंक में जमा करो। इस्तेमाल तो तभी करना जब सरकार और आरबीआई करने दे।

ढाई लाख में क्या आता है? एक दिन की शादी के लिए कोई ढंग का मैरिज हॉल भी बुक नहीं होता।

सरकार इतनी दिवालिया हो चुकी है कि वह भी देना नहीं चाहती।

बैंक जब 2000 रुपये का विड्रॉल नहीं दे सकते तो ढाई लाख कहाँ से देंगे?

शादी के लिए बैंक कह रहे हैं कि अभी नोटिफिकेशन नहीं आया।

रिजर्व बैंक ने आज वह नोटिफिकेशन निकाला है। आप खुद पढ़ लीजिए। इस की शर्तें पढ़ कर आप को पता लग जाएगा कि सरकार का इरादा किसी को भी शादी के लिए ढाई लाख तो क्या एक रुपया भी देने का नहीं है।

क्यों थोथी घोषणाएँ कर कर के जनता को उल्लू बना रहे हैं?

Notifications

Withdrawal of Legal Tender Character of existing ₹ 500/- and ₹ 1000/- Specified Bank Notes (SBNs) – Cash withdrawal for purpose of celebration of wedding

RBI/2016-2017/145 DCM (Plg) No.1320/10.27.00/2016-17 November 21, 2016

The Chairman / Managing Director/Chief Executive Officer, Public Sector Banks / Private Sector Banks/ Private Sector Banks/ Foreign Banks Regional Rural Banks / Urban Co-operative Banks / State Co-operative Banks

Dear Sir,
Withdrawal of Legal Tender Character of existing ₹ 500/- and ₹ 1000/- Specified Bank Notes (SBNs) – Cash withdrawal for purpose of celebration of wedding
Please refer to our Circular No. DCM (Plg) No.1226/10.27.00/2016-17 dated November 08, 2016 on the captioned subject.
2. With a view to enable members of the public to perform and celebrate weddings of their wards it has been decided to allow higher limits of cash withdrawals from their bank deposit accounts to meet wedding related expenses. Yet, banks should encourage families to incur wedding expenses through non-cash means viz. cheques /drafts, credit/debit cards, prepaid cards, mobile transfers, internet banking channels, NEFT/RTGS, etc. Therefore, members of the public should be advised, while granting cash withdrawals, to use cash to meet expenses which have to be met only through cash mode. Cash withdrawals shall be subject to the following conditions:
i. A maximum of ₹ 250000/- is allowed to be withdrawn from the bank deposit accounts till December 30, 2016 out of the balances at credit in the account as at close of business on November 08, 2016.
ii. Withdrawals are permitted only from accounts which are fully KYC compliant.
iii. The amounts can be withdrawn only if the date of marriage is on or before December 30, 2016.
iv. Withdrawals can be made by either of the parents or the person getting married. (Only one of them will be permitted to withdraw).
v. Since the amount proposed to be withdrawn is meant to be used for cash disbursements, it has to be established that the persons for whom the payment is proposed to be made do not have a bank account.
vi. The application for withdrawal shall be accompanied by following documents:
(a) An application as per Annex
(b) Evidence of the wedding, including the invitation card, copies of receipts for advance payments already made, such as Marriage hall booking, advance payments to caterers, etc.
(c) A detailed list of persons to whom the cash withdrawn is proposed to be paid, together with a declaration from such persons that they do not have a bank account. The list should indicate the purpose for which the proposed payments are being made
3. Banks shall keep a proper record of the evidence and produce them for verification by the authorities in case of need. The scheme will be reviewed based on authenticity/ bona fide use thereof.
Yours faithfully,
(P Vijaya Kumar)
Chief General Manager

Encl: As above
Annex – Application Form
Name of the person making withdrawal:
Amount to be withdrawn:
PAN Number (photocopy to be retained):
Address:
Name of Bride and Groom:
Identity proof of Bride and Groom:
(Any valid identity proof, copy to be retained)
Address of Bride:
Address of Groom:
Date of marriage:
Declaration
I ——————-(Name) certify that no other person in the Groom’s/Bride’s (strike whatever is not applicable) family is withdrawing cash for the same wedding from your bank or any other bank. I hereby declare that the information provided herein and the enclosures is true and correct and I am aware that any false information makes me liable for action by the authorities.
Signature of the Applicant:
Name:
Date:
Verified by
(Name, signature and seal of the bank official not below the rank of a branch manager.

बहुत प्रिय मित्र Farid फ़रीद Khan ख़ाँ की जरूरी टिप्पणी। वे मुम्बई रहते हैं।
” नए नोट तो अभी तक नहीं मिले. सब्ज़ी भी बड़े मॉल से ख़रीदने पर मजबूर हैं क्योंकि कार्ड से पेमेंट हो सकता है वहाँ. और घूसखोरी तो दो हज़ार के नोट से भी शुरू हो चुकी है. देखा नहीं गुजरात में चार लाख सिर्फ़ दो हज़ार के नोटों में मिले हैं घूस लेते और देते हुए. सरकार घूस खोरों तक नियमित तरीके से नए नोट पहुँचा रही है लेकिन हम तक नहीं पहुँचा रही है. हम उसके किसी काम के नहीं हैं, ऊपर से विरोध भी करते हैं. उधर आतंकवाद भी शुरू हो गया है. जैसे घूस खोरों के पास पैसा आया वैसे आतंकवादियों के पास. सब चल रहा है वैसे ही.”

2016 से ही हजार के नोटों के जरिए धन बाहर जा रहा था।

Were Rs 1000 Notes Moving Towards Safe Haven Assets in Early 2016?

Via Bhaswati Ghosh :
…The effects of demonetization could last for years, driving the country into recession and pushing Indians to keep their wealth in more stable currencies, such as the euro or U.S. dollar.

“When you don’t trust a currency and you don’t trust a government you start using foreign currencies,” said Hanke. “That’s what this is going to do, I think: People will not trust the rupee.”

The Effects of India’s Currency Reform? ‘Chaos’ Say Analysts

एक पेंटर ने किसी धन पशु के यहां ₹ 4000 का काम किया। उसे सेठ ने 1 लाख के पुराने नोट दिए और वापस करने की शर्त भी नहीं रखी।ऐसे किस्से क्यों सुनने में नहीं आ रहे?

मकान की रजिस्ट्री शुल्क में पुराने नोट लिए जा रहे हैं ! काले का सफ़ेद चालू आहे।’अपने’ महाराष्ट्र में।

आज मेरी परचून की दुकान वाले 500 के नोट ले रहे थे। मिठाई वाले ने कहा बिक्री 60% कम हो गयी है। मिठाई वाले कर्मचारी को कहा गया था कि 500 की मिठाई लेने पर 500 का नोट ले लेना।बिना खाता वाले बैंकों मेँ फार्म भर कर 4000 तक के नोट बदलवाने के लिए लम्बी लाइन लगा रहे हैं।उस फार्म की भराई 10 रु. है।
सरकार के किसी जिम्मेदार से किसी ने सुना कि नये छोटे नोट भी छापे गये हैं? RBI के आंकडे के हिसाब से 80 फीसदी बडे वाले नोट चलन में थे।कुल 16 लाख करोड की मुद्रा में चलन थी।यानि 20 फीसदी ही छोटे वाले थे। 2000 ,1000 के नये नोट की बात आई है। 100,50,20,10 के पर्याप्त नये नोट नहीं आये तो छोटे व्यवसाय और खरीद -फरोख्त में हाहाकार छाया रहेगा।
1978 में 1000,5000 और 10,000 के नोटों का चलन बन्द किया गया था। ऐसे 165 करोड रुपये के नोट चलन में थे,रद्द किए जाने के बाद 135 करोड के नोट जमा हुए। काले धन पर कोई बडा प्रभाव नहीं पडा था।उसके बाद भी काले धन की व्यवस्था फलती फूलती रही। उस कदम का आम आदमी पर असर नहीं पडा था।नोट लौटाने के लिए ऐसी कतारें न थीं। लोग 10 और अधिक से अधिक 100 के नोट ले कर चलते थे इसलिए व्यापार पर असर नहीं पडा था।
यह ध्यान रहे कि हमारी अर्थव्यवस्था में चेक और प्लास्टिक मनी अभी खास प्रचलित नहीं है।हांलाकि वित्त मंत्री ने आज उसका प्रचार किया।
भारत में काला धन का शास्त्रीय अध्ययन करने वले अर्थशास्त्री (Author of `The Black Economy in India’, Penguin (India)) का अनुमान है कि 70 लाख करोड काला धन है और इसमें नगद का हिस्सा चन्द लाख करोड से अधिक नहीं है।
आम आदमी के अलावा छोटा व्यवसायी नोटबन्दी से प्रभावित हुआ है।प्रधान मन्त्री जन धन योजना के बन्द पडे खाली खाते में भी कुछ काला धन आ जाए तो अच्छा ही होगा,बशर्ते उन गरीबों को उससे कुछ लाभ हो। छोटे व्यवसाइयों पर जनसंघ के जमाने से संघ की पकड़ थी,उसमें कमी निश्चित आएगी।
– अफलातून.

‘मोदी साहब का कचरा हम लोग साफ़ कर रहे हैं।’ मेरी बैंक शाखा के साथी कैशियर ने कहा।

रिजर्व बैंक फटे,सड़े-गले नोट हर साल नष्ट करती है,नये नोट छापती है।रिजर्व बैंक का कहना है 500 और 1000 के नोट कुल मुद्रा का 86% थे।यह बैंक में जमा हो रहे हैं,सरकार के एक आदेश से।कमा कर की गई बचत नहीं है,यह।इसे धीरे-धीरे ही निकाला जा सकेगा। प्रधान मन्त्री जन धन योजना में थोक में खाते खुल गये थे,अधिकांश में लगातार जमा करने के लिए पैसे नहीं थे। सर्वोच्च न्यायालय जब अम्बानी जैसे बडे बडे बकायेदारों की सूची जारी करने को कहती है तो सरकार लजाती है। बैंकों का धन इन बकायेदारों ने खाली किया अब उनके हमदर्द साधारण जनता बैंक में धन जमा करा रहे हैं।बढ़ी हुई कुल जमा राशि के आधार पर बकायेदारों की वसूली रुक जाएगी।काला धन खुले आम सोने में और विदेशी मुद्रा (डॉलर,पाउन्ड,यूरो) में बदला जा रहा है। सचमुच उन्नति और उत्पादन होता और लोग बचत करने की स्थिति में होते तब आदर्श स्थिति होती। इससे विपरीत सरकार के निर्णय से बाध्य हो कर बैंकों में जमा राशि बचत नहीं है,बकायेदार पूंजीपतियों को इमदाद है।
रेल के उदाहरण को लें।रेल में आरक्षण कराने की मियाद बढ़ा देने की वजह से हमे उसके सूद से वंचित करते हुए रेलवे के पास हमारा पैसा तीन महीने रहता हैऔर मंत्री प्रभु उसमें से निजी बीमा कम्पनियों को दे रहे हैं।

‘सोने को छिपाना,गुपचुप ले जाना या इसका लेन-दे न करना आसान है।करोड़ों रुपये के नोट कहीं रखना आसान नहीं है किन्तु करोड़ों रुपये का सोना आसानी से बैंक के एक छोटे से लॉकर में छिपाकर रखा जा सकता है। सोने की मांग और हवस को घटाना,हतोत्साहित करना और नियंत्रित करना देश के हित में होगा।’ – सुनील

‘ आज समझ में आया की हमारे प्रधान मंत्री महोदय ने सभी के अकॉउंट क्यों खुलवाये थे।
50 दिन का समय है आपके पास नोट बदलाव सकते हो। मतलब जिसके पास बोरी भरी हुई है वो 100 लोगो को पकड़ेगा उनके अकॉउंट में थोड़े-थोड़े रूपये डलवायेगा। फिर निकाल लेगा।
वैसे समय मार्च 2017 तक है। हजारो रास्ते है चोरों के पास निकलने के लिए। क्योकि ये रास्ते छोड़े गए है चोरों के लिए।’ कहना है,मित्र Uday Che का।

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ज्यादातर पेट्रोल पंप केन्द्र सरकार के मन्त्रालय की PSUs द्वारा संचालित हैं।
आज कल इन पंपो पर ‘कर-चोरी के खिलाफ लडाई में मेरा पैसा सुरक्षित है’ अभियान चलाया जा रहा है।इस दोगले प्रचार अभियान से आपको गुस्सा नहीं आया?
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित है कि इसे मैं भी मनमाफिक नहीं निकाल सकता।
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि मुझे स्थायी तौर पर असुरक्षित कर दिया।
-मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि उसकी इज्जत हमारी ही नजरों में गिरा दी गई और उसका मूल्य अन्य मुद्राओं की तुलना में गिरता जा रहा है।
– अब तक कर-चोरी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? CAG ने जहां अम्बानी-अडाणी की अरबों रुपयों का कर न वसूलने पर आपत्ति की है,वह भी नहीं नहीं वसूलेंगे।
– देश का पैसा चुरा कर बाहर जमा करने वालों में से जिनके नाम पनामा वाली सूची में आए उन्हें कोई सजा क्यों नहीं दी गई ? HSBC द्वारा उजागर विदेश में देश का धन जमा करने वालों को क्या सजा दी?इसमें भी इनके यार थे।
– सितंबर में खत्म हुई आय की ‘स्व-घोषणा’ में भी टैक्स चोरों को इज्जत बक्शी गयी है अथवा नहीं?
– सुप्रीम कोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खस्ताहाल की मुख्य वजह अम्बानी,अडाणी और वेदान्त वाले अनिल अग्रवाल जैसों की बकायेदारी को बताया गया। इस पर नोटबंदी के पहले अरुण जेटली कह चुके हैं कि सरकारी बैंकों में पैसा पंप किया जाएगा। अब जनता का पैसा हचाहच पंप हो ही रहा है। Non performing assets बढेंगे तो इन धन पशुओं को रियायत मिल जाएगी। यह आपके यारों द्वारा कर-डकैती नहीं है?
– जिन गांवों में बैंक नहीं हैं वहां पहुंच कर पैसे क्यों नहीं बदले जा रहे? क्या आपको पता है कि समाज के सबसे कमजोर तबकों के साथ उनकी गाढी कमाई की ठगी से 500 के बदले 250 तक दिए गए हैं?

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  नोट छापने का काम रिजर्व बैंक का है। जो नोट कट-फट जाते हैं या सड़ जाते हैं उन्हें नष्ट करके बाजार में विभिन्न मूल्य वाले नये नोट छापने का काम भी रिजर्व बैंक का है। हमारी अर्थव्यवस्था में 86 फीसदी नोट 500 तथा 1000 रुपये के थे। यानि छोटे नोट अर्थव्यवस्था में मात्र 14 फीसदी रहे होंगे। इस निर्णय के पहले से बैंकों के ए टी एम से अधिकतर 500 और हजार के नोट ही मिलते थे।प्रधान मंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश के माध्यम से 500 और 1000 रुपये के नोट सन्देश के चार घन्ट के बाद से रद्द करने की घोषणा की।उनका दावा था कि इससे काला धन पर प्रभावी रोक लगेगी और अर्थव्यवस्था का शुद्धीकरण हो जाएगा।

  यह भी कहा गया कि ऐसा पहली बार किया जा रहा है।यह बात गलत थी।1978 में जनता पार्टी की सरकार ने  हजार, 5 हजार और 10 हजार के नोटों को रद्द किया था। तब यह बडे नोट 165 करोड मूल्य के थे तथा नोटबंदी के बाद 135 करोड के नोट वापस जमा हो गये थे। काले धन पर विशेष प्रभाव नहीं पडा था तथा इस कदम के बाद भी काले पैसे की अर्थव्यवस्था फलती-फूलती रही।उस जमाने में आम आदमी की जेब में आम तौर पर 10-10 के नोट और कभी कदाच 100 के नोट रहते थे। रद्द किए गए नोटों को लौटाने के लिए लम्बी कतारें नहीं थीं।तथा अर्थव्यवस्था में छोटे व्यवसायों और उससे जुडे लोगों पर इसका कोई असर नहीं पडा था।

  80-85 फीसदी मुद्रा के चलन पर रोक से स्वाभाविक तौर जनता में हाहाकार मचा हुआ और अत्यन्त तंगी का सामना करना पड रहा है। छोटे व्यवसाय पर भारी असर हुआ है।अब भी सरकार द्वारा नये छोटे नोटों को छापने की बात नहीं हो रही है।इसलिए यह संकट लम्बे समय तक चलेगा ऐसा लगता है। इस कदम से गैर कानूनी मुद्रा बाजार (हवाला) में तेजी आ गई है। काले धन को समय समय पर सोने,डॉलर में परिवर्तित कर लिया जाता है इसलिए सोने और हवाला कारोबार में भी तेजी बनी रहेगी।

   जहां तक काला धन समाप्त करने का सवाल यह कदम न सिर्फ अपर्याप्त है बल्कि काला धन बनाने के स्रोतों और उसकी मशीनरी पर भी चोट नहीं करता है। घूस कभी चेक से नहीं दी जाती इसलिए यदि घूस लेना चालू रहा तो नगद में काले धन की जरूरत बनी रहेगी।

  जनता द्वारा अच्छा उत्पादन,व्यवसाय और रोजगार करने के बाद यदि पैसा बचाया जाता है तो उससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।

उत्पादन,व्यवसाय,रोजगार के विकास के बिना जनता का पैसा बैंक में जमा करने के उपाय विफल होते हैं। प्रधान मंत्री जन-धन योजना में खुले अधिकांश खाते बिना लेन-देन के पडे रहे। ऐसा माना जा रहा है चूंकि इनमें से अधिकांश गरीबों के खाते थे जो पहली बार खुल रहे थे इसलिए इनका उपयोग काले धन को बचाने की प्रक्रिया में उपयोग हो सकता है।इसमें उन गरीबों का लाभ नगण्य होगा।
  काल धन पर गहराई से अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का मत है कि अर्थव्यवस्था से जुडा करीब 90 लाख करोड रुपया काला धन है| इस कदम से इसका एक बहुत छोटा हिस्सा प्रभावित होगा और विभिन्न क्षेत्रों में काला धन बनने के स्रोत बने रहेंगे।

इस कदम से पूरी तरह से अप्रभावित वह पूंजीपति वर्ग है जिन्हें सरकार के निर्णयों से हजारों करोड का लाभ होता है। यह निर्णय प्राकृतिक संसाधनों को इन लोगों को सौंपने से होने वाले अरबों के मुनाफे तथा सरकारी बैंकों में इन लोगों के बकाया हजारों करोड की वसूली न करने को कहां प्रभावित करता है? सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खिंचाई के बाद इन बडे बकायेदारों की सूची गोपनीय तौर पर न्यायालय को सौंपी गयी है। बैंकों द्वारा कर्जा देने की सीमा निर्द्धारित होती है बैंकों में जमा पैसे से। बहरहाल  जनता की ईमानदारी की कमाई का पैसा बैंकों में जमा होगा तथा इसको निकालने पर सरकार का नियन्त्रण होगा।इस तरीके से बालात की गयी बचत के बहाने इन बडे बकायेदारों को राहत न मिले यह देखने वाली बात होगी।

अफलातून
संगठन सचिव,समाजवादी जनपरिषद

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मार्क्स हों ,गांधी हों या लोहिया उनके बताये रस्ते पर चलते रहने के बजाए नई पगडंडिया बनाने वाला ही योग्य अनुगामी होता है। वह लकीर का फकीर नहीं होता , नए उसूल बताता है और उन पर चल कर दिखाता है। सुनील ने इन महापुरुषों के विचार ,सिद्धान्त और काम में नया जोड़ा। सुनील की बनाई पगडंडियों की आज चर्चा का दिन है। सुनील इन पगडंडियों पर चला भी इसलिए यह चर्चा आगे भी प्रासंगिक रहेगी।

केसला इलाके में पीने के पानी और सिंचाई के लिए छोटे बन्धों के लिए भौंरा बेतूल पैदल मार्च इलाके को रचनात्मक उर्जा देने वाला कार्यक्रम सिद्ध हुआ। इन बन्धों का प्रस्ताव मोतीलाल वोरा को किसान आदिवासी संगठन ने दिया।

आदिवासी गांव में नियुक्त मास्टर की मौजूदगी के लिए भी इस व्यवस्था में महीनों जेल जाना पड़ता है यह राजनारायण और सुनील ने बताया।

सुनील ने लम्बे चौड़े विधान सभा ,लोक सभा क्षेत्रों के बजाए व्यावाहारिक विकेन्द्रीकरण का मॉडल बताया जिनमें पंचायती व्यवस्था के वित्तीय-आर्थिक अधिकार का प्रावधान होता। पूंजीपतियों के भरोसे चलने वाले मुख्यधारा के दल ही इन बड़े चुनाव क्षेत्रों में सफल होते हैं।

जल,जंगल,जमीन के हक को स्थापित करने के लिए आदिवासी में स्वाभिमान जगाने के बाद और लगातार अस्तित्व के लिए संघर्ष करते करते सहकारिता की मिल्कियत का एक अनूठा मॉडल चला कर दिखाया।

संसदीय लोकतंत्र ,रचनात्मक काम और संघर्ष इनके प्रतीक ‘वोट,फावड़ा ,जेल’ का सूत्र लोहिया ने दिया।’वोट , फावड़ा,जेल’ के इन नये प्रयोगों के साथ-साथ सुनील ने इस सूत्र में दो नये तत्व जोड़े- संगठन और विचार । जीवन के हर क्षेत्र को प्रतिकूल दिशा में ले जाने वाली ‘प्रतिक्रांति’ वैश्वीकरण के षड़्यन्त्र को कदम-कदम पर बेनकाब करने का काम सुनील ने किया। ‘पूंजी के आदिम संचय’ के दौरान होने वाला प्रकृति का दोहन सिर्फ आदिम प्रक्रिया नहीं थी,सतत प्रक्रिया है। १९४३ में लिखे लोहिया के निबन्ध ‘अर्थशास्त्र , मार्क्स से आगे’। मार्क्स की शिष्या रोजा लक्सेमबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद को टिकाये रखने के लिए साम्राज्यवादी शोषण जरूरी है। समाजवादी मनीषी सच्चिदानन्द ने आन्तरिक उपनिवेशवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। सुनील ने इस सिद्धान्त को परिमार्जित करते हुए कहा कि  सिर्फ देश के अन्दर के पिछाड़े गये भौगोलिक इलाके ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के खेती,छोटे उद्योग जैसे क्षेत्र भी आन्तरिक उपनिवेश हैं। खेती के शोषण से भी पूंजीवाद को ताकत मिलती है।

्सुनील

सुनील

भ्रष्टाचार और घोटालों से उदारीकरण की नीतियों का संबध है यह सुनील हर्षद मेहता के जमाने से सरल ढंग से समझाते आए थे। इस संबंध को पिछले दिनों चले ‘भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन’ ने पूरी तरह नजरअन्दाज किया था। बल्कि इस आन्दोलन के तमाम प्रणेता इसे सिर्फ नैतिकतावादी मुहिम के रूप में चला कर घोटालों से जुड़े कॉर्पोरेट घरानों और फिक्की जैसे उद्योगपतियों के समूहों को इस बात द्वारा आश्वस्त करते रहे कि आपको लाभ देने वाली नीतियों की चर्चा को हम अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं बना रहे हैं ।

सुनील की बताई राह यथास्थितिवाद की राह नहीं है , बुनियादी बदलाव की राह है। सुनील के क्रांति के लिए समर्पित जीवन से हम ताकत और प्रेरणा पाते रहेंगे।

सुनील की स्मृति में कुछ चित्र

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बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

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जब खबरें टुकडों में मिलती है तो उनका पूरा अर्थ पता नहीं चलता है। उनको आपस में जोड़ने से पूरा रहस्य खुलता है। वैश्वीकरण के इस जमाने में कारपोरेट बन चुका मीडिया भी कोशिश करता है कि खबरें सनसनी के रूप में ही मिले, समग्रता में नहीं और सच परदे में ही रहे।
ऐसी ही एक खबर दिसंबर में आई। एक प्रवासी भारतीय पूंजीपति ने अपनी बेटी की शादी स्पेन के बार्सीलोना शहर में इतने धूमधाम से की कि यह दुनिया की दूसरी सबसे महंगी शादी बन गई। प्रमोद मित्तल की बेटी सृष्टि की शादी में 505 करोड़ रूपये खर्च हुए। प्रमोद मित्तल दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में शामिल लक्ष्मी निवास मित्तल का छोटा भाई है। लक्ष्मी मित्तल की बेटी वनिषा की शादी 2004 में फ्रांस में हुई, वह भी कोई कमजोर नहीं थी। उसमें भी करीब 400 करोड़ रूपये खर्च हुए। प्रमोद की पहली बेटी वर्तिका की शादी 2011 में तुर्की के इस्तंबुल शहर में हुई, वह भी दुनिया की महंगी शादियों में एक है।
ऐसा लगता है कि भाईयों में बेटियों की शादियों में खर्च करने की होड़ चल रही है। लक्ष्मी मित्तल 2004 में तब भी चर्चा में आया जब उसने लंदन में करीब 600 करोड़ रूपये की कोठी खरीदी, जिसे दुनिया के सबसे महंगे घर की पदवी मिली। चार साल बाद उसने अपनी बेटी वनिषा को इससे भी महंगा घर खरीदकर दिया। वह दुनिया की इस्पात की सबसे बड़ी कंपनी ‘‘आर्सलर मिततल’’ का मालिक है।
इतनी खबर मिलने पर कई लोग इसे भारत की बढ़ती समृद्धि, भारतीयों की बढ़ती सफलता, भारतीयों की उद्यमिता आदि का प्रतीक मान सकते हैं और इसे भारत के लिए गौरव का विषय मान सकते हंै। लेकिन एक सहज सवाल उठता है कि यह अनाप-शनाप पैसा आया कहां से ? इसका स्त्रोत क्या है ?
कर्ज लो और अय्याशी करो
एक दूसरी जानकारी जो इस खबर के साथ नहीं आई, से रहस्य की परतें खुलती है। वह यह कि प्रमोद मित्तल और उनकी कंपनी इस देश के बड़े डिफाल्टर कर्जदारों में से एक रहे हैं। अपने भाई विनोद मित्तल के साथ वे 2010 तक इस्पात इंडस्ट्रीज नामक भारत की प्रमुख इस्पात कंपनी के मालिक रहे है। इस कंपनी को भारत के बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने बार-बार विशाल कर्जे दिए, न चुकाने पर माफ किए या उनका नवीनीकरण किया। यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित ‘कंपनी कर्ज पुनर्गठन’ (कारपोरेट डेब्ट रिस्ट्रक्चरिंग) योजना के तहत किया गया। इसके तहत कोई कंपनी मुसीबत में है और कर्जों को नहीं चुका पा रही है, तो उसको कुछ रियायतें देकर, कुछ माफ करके, कुछ और वक्त देकर, नए कर्जे दे दिए जाते हैं तथा पुराने कर्जो का समायोजन कर दिया जाता है। कुछ कर्जों के बदले शेयर भी बैंकों को दे दिए जाते हैं। उस कंपनी को जितने बैंकों व संस्थाओं ने कर्जा दिया है सब मिलकर यह फैसला करते हैं। रिजर्व बैंक ने यह योजना 2001 में शुरू की थी और इसके लिए एक प्रकोष्ठ बनाया है।
इस्पात इंडस्ट्रीज के कर्जों का पुनगर्ठन 2003 और 2009 में किया गया था। फिर भी हालत नहीं सुधरी, तब दिसंबर 2010 में जिंदल स्टील वक्र्स के साथ इसका विलय कर दिया गया। उस वक्त इस्पात इंडस्ट्रीज 323 करोड़ रूपये के घाटे में थी। उसके ऊपर 15 कर्जदाता संस्थाओं का 7156 करोड़ रूपये का कर्जा था। इसमें 400 करोड़ का कर्जा डूबत खाते में था। लेकिन इस पूरे दौर में मित्तल बंधुओं के माथे पर शिकन भी नहीं आई और वे बेहिसाब पैसा उड़ाते रहे। 2006 में प्रमोद मित्तल ने करीब 100 करोड़ रूपये में बलगारिया का एक फुटबाल क्लब खरीद लिया। मजदूरांे-कर्मचारियों को वेतन देने के लिए कंपनी के पास पैसा नहीं था। बिजली-पानी का बिल भरने और कच्चा माल खरीदने के लिए भी पैसा नहीं था। लेकिन पूरे वक्त मित्तल बंधु विदेशों में घर, गरम पानी की स्विमिंग पुल, छत पर हेलीपेड और महंगी कारों पर अरबों रूपया लुटाते रहे।
इसी के साथ हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्रसिंह को इस्पात इन्डस्ट्रीज द्वारा 2.8 करोड़ रूपये के भुगतान की सीबीआई जांच की खबरों को भी जोड़ लीजिए। ये भुगतान ‘‘वीबीएस’ के नाम से 2009 और 2010 में किए गए थे। वीरभद्र सिंह उस समय केन्द्रीय इस्पात मंत्री थे।
किंगफिशर एयरलाईन्स और उसके मालिक शराब किंग विजय माल्या का मामला खबरों में ज्यादा रहा है। 2005 में स्थापित माल्या की इस कंपनी ने कभी मुनाफा नहीं कमाया। 2010 में कर्जों का पुनर्गठन भी इसका संकट दूर नहीं कर पाया। सितंबर 2012 तक इसका सचित घाटा 8016 करोड़ हो चला था। कंपनी पर तब 13 बैंकों का 13750 करोड़ रूपये कर्जा था। इसके कर्जों के पुनर्गठन की कारवाई फिर चल रही है। अक्तूबर 2012 में सात महीनों से वेतन नहीं मिलने के कारण एक कर्मचारी की पत्नी ने आत्महत्या कर ली। उसी वक्त माल्या के छोटे बेटे ने ट्विटर पर लिखा, ‘‘मैं बिकनी-पहनी माॅडलों के साथ बाॅलीबाॅल खेल रहा हूं।’’ उसके बाद 18 दिसंबर 2012 को अपने जन्मदिन पर विजय माल्या ने तिरूपति जाकर 3 किलो सोना चढ़ाया, जिसकी कीमत करीब एक करोड़ रूपये होती है। गौरतलब यह भी है कि विजय माल्या 2002 से भारत की संसद में राज्यसभा का सदस्य है।
यदि अंबानी की चर्चा नहीं करेंगे तो किस्सा अधूरा रहेगा। मुंबई में 5000 करोड़ रूपये का दुनिया का सबसे महंगा घर ‘‘एंटीलिया’’ बनाने वाले मुकेश अंबानी ने पिछले दिनों अपनी पत्नी नीता का जन्मदिन वहां न मनाकर राजस्थान के राजमहलों में मनाया। मेहमान 32 चार्टर्ड विमानों से आए जिनमें केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री, क्रिकेट खिलाडी सचिन तेंदुलकर, फिल्मी हीरो आमिर खान, रणबीर कपूर आदि शामिल थे। इसी अंबानी की रिलायंस कंपनी को भारत सरकार ने पिछले एक साल से प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ाकर तगड़ी कमाई का मौका दिया।
बैंको की लूट
एक और खबर पूरे तिलिस्म को समझने में सहायक होती है। यह महत्वपूर्ण खबर कुछ आर्थिक अखबारों व पत्रिकाओं में सिमट कर रह गई। 5 दिसंबर 2013 को चेन्नई में अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ ने एक पत्रकार वार्ता करके पूंजीपतियों द्वारा भारतीय बैंकों की इस विशाल लूट पर सवाल उठाए। संघ ने भारतीय बैंकों (भारतीय स्टेट बैंक, आईडीबीआई और विदेशी बैंक छोड़कर) के सबसे बड़े 50 डिफाल्टरों की सूची जारी की, जिन पर 40,528 करोड़ रूपये का कर्जा फंसा हुआ है। इस सूची में ज्यादातर बड़ी कंपनियां है। केवल चार सबसे बड़ी डिफाल्टर कंपनियों (जिनमें किंगफिशर एयरलाईन्स एक है) पर 22,666 करोड़ रूपये का डूबता हुआ कर्जा है।
संघ ने यह भी बताया कि भारत के सरकारी बैंकों के खराब कर्जों (जिनका समय पर भुगतान नहीं हो रहा है) का आकार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। मार्च 2008 में 39,000 करोड़ रूपये से बढ़कर मार्च 2013 में यह 1,64,000 करोड़ रूपये हो चुका है। (हाल ही में जारी रिजर्व बैंक की रपट के मुताबिक अब यह राशि 2,29,000 करोड़ पर पहुंच चुकी है।) इनके अलावा इस अवधि में 3,25,000 करोड़ रूपये के खराब कर्जों का पुनर्गठन करके उन्हें अच्छे कर्जो में बदला गया है। इनमें 83 फीसदी कर्जे बड़ी कंपनियों के हैं। इसका बैंकों के मुनाफों पर भी भारी असर पड़ा है। इन पांच सालों में खराब कर्जों के कारण बैंकों के मुनाफे कुल मिलाकर 1,40,266 करोड़ रूपये कम हो गए। उनमें करीब 40 फीसदी की कमी हो गई। लेकिन यह केवल बैंकों के मुनाफे का सवाल नहीं है, इससे करोड़ों जमाकर्ताओं के हितों का भी सवाल जुड़ा है। ज्यादातर बैंक सरकारी है और यह देश की जनता के पैसे की लूट है। दूसरा खतरा यह है कि चंद कंपनियों पर ये विशाल कर्जे डूबने पर पूरे बैंकिंग उद्योग के लिए संकट पैदा कर सकते है। 2007-08 की वैश्विक मंदी में तो भारतीय बैंक बच गए, लेकिन अब ध्वस्त हो सकते है।
बीमार उद्योग, मस्त उद्योगपति
संघ ने इस प्रचलित कहावत को उद्धृत किया है कि ‘भारत में बीमार उद्योग तो हैं, लेकिन कोई बीमार उद्योगपति नहीं है।’ दरअसल कर्जो के पुनर्गठन के कारण कंपनियों का संकट टलता जाता है और उनके काम को दुरूस्त करने तथा खर्चे कम करने का कोई दबाव नहीं बनता है। बैंकों के प्रबंधन के लिए भी यह आसान रास्ता होता है, क्योंकि इससे उनकी बैलेंस शीट में खराब कर्जों या डूबत कर्जों (नाॅन-परफाॅर्मिंग एसेट या एनपीए) की मात्रा कम हो जाती है। ‘‘कंपनी कर्ज पुनर्गठन’’ के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं। मार्च 2009 में खतम होने वाले वित्तीय वर्ष में 184 मामले थे जिनमें 86,536 करोड़ रूपये की राशि स्वीकृत की गई। 2012-13 में ढ़ाई गुना बढ़कर यह संख्या 401 और राशि 2,29,013 करोड़ रूपये हो गई। चालू वित्तीय वर्ष के केवल प्रथम तिमाही में कर्ज पुनर्गठन के 415 मामले और 2,50,279 करोड़ रूपये स्वीकृत किए गए। दूसरी तिमाही में यह राशि 4,00,000 करोड़ हो गई। स्वयं रिजर्व बैंक के अधिकारियों को इस पर चिंता जाहिर करना पड़ा। उप-गवर्नर के सी चक्रवर्ती को यह कहना पड़ा कि 2008 में चुनाव के पहले करोड़ों किसानों के 50,000 करोड़ रूपये के कर्जे माफ किए गए थे, उसके मुकाबले चंद कंपनियों की यह कर्ज-माफी काफी ज्यादा है।
यहां पर हमारी पूंजीवादी व्यवस्था का दोहरा चरित्र नंगे रूप में सामने आता है। किसान किसी मजबूरी से अपना छोटा सा पच्चीस-पचास हजार का कर्जा नहीं चुका पाता है, तो जलील किया जाता है और खुदकुशी कर लेता है। ये पूंजीपति अरबों रूपये के कर्ज डकारकर अय्याशी की सारी हदें तोड़ते जाते हंै।
इस पूरे खेल में पूंजीपतियों, बैंक अफसरों, नौकरशाहों और राजनेताओं की गहरी सांठगांठ से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके पीछे भारत सरकार की वह नीति और इच्छा भी रही है कि येन-केन-प्रकारेण कंपनियों को बचाया जाए व बढ़ाया जाए और इस तरह से राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर और तेज विकास का भ्रम बनाकर रखा जाए।
भारत के कर्मचारी संगठन अक्सर केवल अपने वेतन-भत्तों की लड़ाई लड़ते रहते हैं। अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ ने भारतीय जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे की इस लूट को उजागर करके देश का भला किया है। ऐसा ही काम उन्हांेने करीब 15 साल पहले किया था। तब भारतीय पूंजीपतियों के एक संगठन ने सरकारी बैंकों के विशाल बकाया कर्जे का हवाला देते हुए तीन बैंकों के निजीकरण की मांग करते हुए मुहिम शुरू की थी। कर्मचारी संघ ने बड़े बकायादारों की सूची निकाल दी और बताया कि इनमें शीर्ष पर उन्हीं पूंजीपतियों की कंपनियां है, जो इस मुहिम को चला रहे है। तब ये पूंजीपति शांत हो गए।
करों में विशाल छूट के तोहफे
दो और जानकारी या खबरें जोड देने से इक्कीसवीं सदी में भारत की पूंजीवादी-नवउदारवादी लूट की तस्वीर पूरी होती है। एक तो वह जिसे पत्रकार पी सांईनाथ बार-बार हमारे ध्यान में लाते हैं। कंपनियों को संकट से राहत देने के नाम पर केन्द्र सरकार साल-दर-साल केन्द्रीय करों में विशाल छूट देती जा रही है। पिछले आठ सालों में मिलाकर केवल चार केन्द्रीय करों में उन्हें 31,88,757 करोड़ रूपये की टेक्स-माफी-छूट के उपहार दिए जा चुके हैं। अन्य तरह के उपहार (जैसे सस्ती जमीन) और राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली कर-रियायतें इसके अतिरिक्त है।
दूसरी खबर ‘ग्लोबल फाईनेंशियल इंटिग्रिटी’ के स्त्रोत से आई है। दुनिया में धन के अवैध प्रवाह पर नजर रखने वाली यह संस्था है। यह बताती है कि भारत से बाहर जाने वाले दो नंबरी धन का प्रवाह बढ़ता जा रहा है और 2011 में 4,00,000 करोड़ रूपये देश से बाहर गया। यदि 2002 से 2011 के बीच पूरे दशक का मीजान लगाएं तो 15,70,000 करोड़ रूपये अवैध रूप से देश के बाहर गया। 2011 में धन के गैर कानूनी प्रवाह में रूस और चीन के बाद भारत का स्थान दुनिया में तीसरा रहा।
इन सब खबरों और जानकारियों को मिला देने से काफी बातें साफ होती है। पिछले दो दशकों में जिसे भारत की प्रगति, समृद्धि और उभरती हुई आर्थिक ताकत बताया जा रहा था, और भारत की राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर का जो गुणगान गाया जा रहा था, वह दरअसल कर्जांे और लूट पर खड़ा ताश का महल है। यह ऐसा भ्रष्टाचार है जो वैश्वीकरण और उदारवाद की नीतियों में छिपा है। इसे शायद कोई लोकपाल नहीं पकड़ पाएगा। भारतीय जनता के लगातार बढ़ते कष्टों अभावों और गरीबी के कारण भी इस लूट व डकैती में देखे जा सकते है।
उन्नीसवीं सदी में दादाभाई नोरोजी ने अंग्रेजों द्वारा भारत की लूट पर किताब लिखी थी और वह आजादी के आंदोलन का मुख्या आधार बनी थी। इक्कीसवी सदी में हमारे अपनों द्वारा कई गुना बड़ी इस लूट को कौन रोकेगा, यह चुनौती हमारे सामने है।
लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय महामंत्री एवं सामयिक वार्ता का संपादक है।
पता – ग्राम पोस्ट केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461111
मोबाईल नं. 09425040452

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उ.प्र. विधान सभा चुनाव २०१२ के मौके पर ,फिर प्रकाशित .

समाजवादी जनपरिषद

अखबार की वह खबर हैरान करने वाली थी। मैंने सोचा कि शायद छपाई की कोई गलती है या दशमलव बिन्दु इधर-उधर हो गया है। लेकिन दूसरे अखबार में भी देखा। वह सच थी। यह खबर चालू वित्त वर्ष की प्रथम छ:माही में अग्रिम आयकर जमा करने वाले शीर्षस्थ लोगों के बारे में थी। इनमें दूसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी का नाम था। सबसे ज्यादा आयकर जमा करने वाले सौ लोगों की सूची में वह एकमात्र नेता है, बाकी लोग फिल्मी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी और उद्योगपति-व्यवसायी है। लेकिन ज्यादा हैरत-भरी बात जगनमोहन रेड्डी द्वारा अदा किए गए कर की राशि में वृ्द्धि है। पिछले वर्ष उसने मात्र 2.9 लाख रु. का टैक्स जमा किया था, किन्तु इस वर्ष मात्र छ: महीने के अग्रिम टैक्स के बतौर 6.6 करोड़ रु. अदा किए है। अनुमान है कि पूरे वर्ष के लिए वह 22 करोड़ रु. का टैक्स…

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