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Archive for the ‘curruption’ Category

ज्यादातर पेट्रोल पंप केन्द्र सरकार के मन्त्रालय की PSUs द्वारा संचालित हैं।
आज कल इन पंपो पर ‘कर-चोरी के खिलाफ लडाई में मेरा पैसा सुरक्षित है’ अभियान चलाया जा रहा है।इस दोगले प्रचार अभियान से आपको गुस्सा नहीं आया?
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित है कि इसे मैं भी मनमाफिक नहीं निकाल सकता।
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि मुझे स्थायी तौर पर असुरक्षित कर दिया।
-मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि उसकी इज्जत हमारी ही नजरों में गिरा दी गई और उसका मूल्य अन्य मुद्राओं की तुलना में गिरता जा रहा है।
– अब तक कर-चोरी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? CAG ने जहां अम्बानी-अडाणी की अरबों रुपयों का कर न वसूलने पर आपत्ति की है,वह भी नहीं नहीं वसूलेंगे।
– देश का पैसा चुरा कर बाहर जमा करने वालों में से जिनके नाम पनामा वाली सूची में आए उन्हें कोई सजा क्यों नहीं दी गई ? HSBC द्वारा उजागर विदेश में देश का धन जमा करने वालों को क्या सजा दी?इसमें भी इनके यार थे।
– सितंबर में खत्म हुई आय की ‘स्व-घोषणा’ में भी टैक्स चोरों को इज्जत बक्शी गयी है अथवा नहीं?
– सुप्रीम कोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खस्ताहाल की मुख्य वजह अम्बानी,अडाणी और वेदान्त वाले अनिल अग्रवाल जैसों की बकायेदारी को बताया गया। इस पर नोटबंदी के पहले अरुण जेटली कह चुके हैं कि सरकारी बैंकों में पैसा पंप किया जाएगा। अब जनता का पैसा हचाहच पंप हो ही रहा है। Non performing assets बढेंगे तो इन धन पशुओं को रियायत मिल जाएगी। यह आपके यारों द्वारा कर-डकैती नहीं है?
– जिन गांवों में बैंक नहीं हैं वहां पहुंच कर पैसे क्यों नहीं बदले जा रहे? क्या आपको पता है कि समाज के सबसे कमजोर तबकों के साथ उनकी गाढी कमाई की ठगी से 500 के बदले 250 तक दिए गए हैं?

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अखबार की वह खबर हैरान करने वाली थी। मैंने सोचा कि शायद छपाई की कोई गलती है या दशमलव बिन्दु इधर-उधर हो गया है। लेकिन दूसरे अखबार में भी देखा। वह सच थी। यह खबर चालू वित्त वर्ष की प्रथम छ:माही में अग्रिम आयकर जमा करने वाले शीर्षस्थ लोगों के बारे में थी। इनमें दूसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी का नाम था। सबसे ज्यादा आयकर जमा करने वाले सौ लोगों की सूची में वह एकमात्र नेता है, बाकी लोग फिल्मी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी और उद्योगपति-व्यवसायी है। लेकिन ज्यादा हैरत-भरी बात जगनमोहन रेड्डी द्वारा अदा किए गए कर की राशि में वृ्द्धि है। पिछले वर्ष उसने मात्र 2.9 लाख रु. का टैक्स जमा किया था, किन्तु इस वर्ष मात्र छ: महीने के अग्रिम टैक्स के बतौर 6.6 करोड़ रु. अदा किए है। अनुमान है कि पूरे वर्ष के लिए वह 22 करोड़ रु. का टैक्स चुकाएगा। सिर्फ एक साल में इतनी जबरदस्त वृद्धि कैसे हुई ? कर राशि से आमदनी का अंदाजा लगाएं जो पिछले वर्ष जगनमोहन रेड्डी की सालाना आमदनी 10 लाख रु. रही होगी और इस वर्ष करीब 70 करोड़ रु रहेगी। यानी उसकी व्यक्तिगत आमदनी में 700 गुना वृद्धि हुई । प्रतिशत में देखें तो यह 69,900 प्रतिशत की वृद्धि है। जरुर जगनमोहन के पास कोई जादू की छड़ी या मंत्र है, जिसने उसे रातो-रात बेइंतहा दौलत और आमदनी का मालिक बना दिया है।
यही जादू की छड़ी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को भी मिल गई प्रतीत होती है। लेकिन जहां मधु कोड़ा को लेकर रोज छापे पड़ रहे हैं और हल्ला मचा है, जगनमोहन रेड्डी की बेहिसाब कमाई को लेकर कोई बवेला नहीं मचा है, कोई जांच भी शुरु नहीं हुई  है। यह कहा जा सकता है कि जगनमोहन रेड्डी की कमाई एक नंबर की है और उसने पूरा टैक्स अदा करना उचित समझा है। किन्तु आमदनी के कोई भी वैध तरीके एक वर्ष में 700 गुना वृ्द्धि नहीं कर सकते। जगमोहन रेड्डी ने उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का स्थान लिया है, जो पिछले वर्ष की सबसे ज्यादा आयकर देने वाली नेता थी। मायावती के समर्थकों ने भी यही दलील दी थी। यह हो सकता है कि दूसरे नेताओं ने अपनी कमाई ज्यादा छिपाई होगी। लेकिन यह सवाल रह जाता है कि जब उत्तर प्रदेश के दलितों सहित करोड़ों लोग नितांत कंगाली एवं अभावों में दिन काट रहे हों, बुंदेलखंड में लगातार कई सालों से सूखा पड़ा हो, तब उनकी नेता द्वारा अरबों रुपए की संपत्ति इकट्ठी करना कहां तक उचित है ?
यह जादू की छड़ी है राजनीति जिसे चालाक और स्वार्थी लोगों ने वैध-अवैध तरीके से बेहिसाब कमाई का जरिया बना लिया है। अब राजनीति जनसेवा या देशसेवा का माध्यम नहीं रह गई है। राजनीति में त्याग , तपस्या , सादगी , ईमानदारी आदि की बातें अब अप्रासंगिक हो चली हैं। ये सब आजादी के आंदोलन के वक्त की दकियानूसी बातें हैं, जिनसे हम बहुत आगे बढ़ गए है। जगनमोहन रेड्डी या मधु कोड़ा कोई अपवाद नहीं है। कमोबेश मात्रा में देश की सभी प्रमुख पार्टियों के नेता इसी काम में लगे हैं। राजनीति और व्यापार का फर्क मिटता जा रहा है। नेशनल इलेक्शन वाच ने लोकसभा चुनाव तथा महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव में उम्मीदवारों की संपत्ति घोषणाओं का विश्लेषण किया है।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री विलासराव देशमुख की संपत्ति 5 वर्ष में 2.7 करोड़ रु. बढ़ गई है। अर्थात उन्होंने प्रतिवर्ष औसतन 55 लाख रु. अपनी संपत्ति में जोड़े। महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री सुरेश जैन की संपत्ति 2004 में 26 करोड़ रु. से बढ़कर 2009 में 79 करोड़ रु. हो गई। यानी सुरेश दादा की संपत्ति में हर साल 10 करोड़ रु. या हर माह 80 लाख रु. से ज्यादा का इजाफा हुआ। अन्ना हजारे ने जिन मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच को लेकर अनशन किया था, उनमें एक सुरेश जैन थे। महाराष्ट्र के जो विधायक दुबारा निर्वाचित हुए, उनकी संपत्ति में औसतन साढ़े तीन करोड़ रु. की बढ़ोत्तरी पांच साल में हुई। हरियाणा के पुन: निर्वाचित विधायकों की संपत्ति औसतन 600 प्रतिशत पांच वर्ष में बढ़ी।
राजनीति और व्यापार के इस घालमेल में एक और रेड्डी बंधु चर्चा में है। ‘बेल्लारी बंधु’ के नाम से मशहूर इन रेडि्डयों ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की कुर्सी अस्थिर कर दी और भाजपा हाईकमान भी उनके सामने असहाय नजर आई। भाजपा विधायक भी उनकी मुठ्ठी में थे और कर्नाटक में आई बाढ़ की त्रासदी से बेखबर सैरगाहों में आराम फरमा रहे थे। कारण बहुत साफ है कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश की लोहा खदानों के बेताज बादशाह बनकर उभरे इन रेड्डी बंधुओं के पास बेतहाशा पैसा है, जो उन्होंने भाजपा के चुनाव में लगाया था। कहा जाता है कि जब सुषमा स्वराज बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ी थी, तब भी इन्हीं बंधुओं ने मदद की थी। जिसका पैसा होगा, राजनीति में उसी की चलेगी। जब बेल्लारी बंधुओं के हित प्रभावित होने लगे और येदिउरप्पा ने उनके पर करतने की कोशिश की, तो उन्होंने बगावत करवा दी। वे सोचने लगे कि वे स्वयं क्यों न मुख्यमंत्री बन जाए ? ठीक वैसे ही, जैसे दूसरो को वोट दिलाते-दिलाते अपराधियों-रंगदारों ने सोचा कि वे स्वयं क्यों न विधायक और सांसद बन जाएं।
मधु कोड़ा, मायावती, अमरसिंह, सुखराम, जगमोहन रेड्डी, बेल्लारी के रेड्डी बंधु – ये सब भारतीय राजनीति की तेजी से उभरती नई तस्वीर के चेहरे हैं। राजनीति धंधा बन गई है और धंधेबाज राजनीति में आ गए हैं। राजनीति और व्यवसाय के इस संकरन से नेता-व्यवसायी के नए क्लोन तैयार हो रहे हैं। कोई नेता से व्यवसायी बन रहा है तो कोई ठेकेदार-उद्योगपति से नेता बन रहा है। इसी के कारण अब चुनावों में बेतहाशा पैसा पानी की तरह बहाया जाता है और साधारण लोग या सिद्धांत की राजनीति करने वाले लोग दौड़ से बाहर होते जा रहे हैं। राजनीति तेजी से करोड़पतियों -अरबपतियों की मुठ्ठी में कैद होती जो रही है। धनकुबेरों ने चुनाव और राजनीति को पूंजी निवेश का एक और क्षेत्र बना लिया है। पहले वे चुनाव में वे काफी पैसा खर्च करके चुनाव जीतते या जितवाते हैं, फिर उससे कई गुना कमाते हैं और फिर अगले चुनाव में और ज्यादा खर्च करते हैं। भारतीय राजनीति का यह दुष्चक्र अपराध-राजनीति के गठजोड़ से ज्यादा बड़ा और खतरनाक है। राजनीति में अपराधियों को ज्यादा जन मान्यता नहीं मिलती। लोग डर के मारे ही वोट देते हैं। लेकिन पैसे वालों के राजनीति में वर्चस्व को जन-मान्यता भी मिलती जा रही है। नई लोकसभा में 300 से ज्यादा सांसद करोड़पति हैं। संसद में विश्वास मत में अंबानी की भूमिका बड़ी हो जाती है। नवीन जिन्दल, विजय माल्या जैसे पूंजीपति अब रिमोट कंट्रोल के बजाय सीधे राजनीति में उतर रहे हैं। पैसे के इस खेल में जन-समस्याएं और देशहित के मुद्दे गौण होते जाते हैं। भारतीय लोकतंत्र का ढांचा खोखला होता जाता है।
पहले राष्ट्रीयकरण, सरकारी हस्तक्षेप और लाईसेन्स राज को भ्रष्टाचार तथा राजनीति-व्यवसाय के घालमेल के लिए दोष दिया जाता था। किन्तु पिछले डेढ़-दो दशक का अनुभव उल्टा है। निजीकरण और कथित ‘निजी-सार्वजनिक भागीदारी’(पीपीपी) ने कई क्षेत्रों में निजी हाथों में वैध-अवैध कमाई की बाढ़ ला दी है। एक बड़ा कमाई का क्षेत्र खनिज व खदानें उभर कर आया है, जो दुनिया के स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों की बढ़ती मांग और मुक्त व्यापार के कारण काफी महत्वपूर्ण बन गया है। अभी तक शराब माफिया, शिक्षा माफिया, चीनी लाबी राजनीति को प्रभावित नियंत्रित करते थे। अब इसमें खनिज माफिया भी जुड़ गया है। कर्नाटक, आंध्र, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि कई राज्यों में अब खनिज की कमाई से राजनीति चलाई जा रही है।
उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों ने एक और तरीके से राजनीति में पैसे का दखल बढ़ाया है। इन नीतियों के तहत निजी आय और संपत्ति पर नियंत्रण पूरी तरह हटा दिए गए हैं। जैसे कंपनी डायरेक्टरों के वेतन पर या बड़े घरानों के साम्राज्य विस्तार पर पहले जो पाबंदियां थी, वे हटा दी गई। देश में गैरबराबरी जबरदस्त ढंग से बढ़ी है। कुछ लोगों के हाथ में आय व संपत्ति का केन्द्रीकरण भी काफी बढ़ा है। नव-धनाढ्यों में इस कमाई का उपयोग राजनीति में करके अपनी कमाई को और बढ़ाने की लालसा स्वाभाविक है। जब धन-आय की इतनी विषमता होगी, तो लोकतंत्र कैसे स्वस्थ ढंग से काम कर सकता है ? इसीलिए लोहिया-जयप्रकाश की धारा के भारतीय समाजवादी पहले से कहते आए हैं कि लोकतंत्र और समाजवाद दोनों अभिन्न हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। भारतीय लोकतंत्र को बचाना है तो घोर पूंजीवादी व्यवस्था को त्यजकर मौजूदा दिशा को उलटकर, बराबरी एवं न्यायपूर्ण समाज की दिशा में बढ़ना ही पड़ेगा।

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(लेखक समाजवादी जनपरिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)
सम्पर्क पता :
सुनील, ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
फोन नं० – 09425040452,

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