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Archive for the ‘intellectual imperialism’ Category

                        
एक अत्यन्त मेधावी, सुन्दर , और सं
वेदनशील युवा राजनैतिक तरुण की मौत ने भारतीय समाज को हिला दिया है। इस युवा में जोखिम उठाने का साहस था और अपने से ऊपर की पीढ़ी के उसूलों को आंख मूंद कर न मानने की फितरत थी। वह एक राजनैतिक कार्यकर्ता था,उसका संघर्ष राजनैतिक था । वह आतंक के आरोप में दी गई फांसी के विरुद्ध था तो साथ-साथ आतंक फैलाने के लिए सीमा पार से आये घुसपैठियों से मुकाबला करते हुए मारे गए जवानों की शहादत के प्रति श्रद्धावनत होकर उसने कहा था, ‘अम्बेडकरवादी होने के नाते मैं जिन्दगी का पक्षधर हूं । इसलिए उन जवानों की शहादत के प्रति नमन करता हूं।‘ उसकी मेधा से टक्कर लेने की औकात उसकी विरोधी विचारधारा से जुड़े उस शिक्षण संस्था के छात्रों में नहीं थी और न ही उस शैक्षणिक संस्था के बौने कर्णधारों में थी इसलिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे आकाओं की मदद से एक चक्रव्यूह रचा गया था । सत्ताधारी ताकतें रोहित द्वारा फांसी की सजा के विरोध की चर्चा करती हैं लेकिन रोहित के समूह (अम्बेडकर स्टुडेन्ट्स एसोशियेशन) द्वारा मनु-स्मृति दहन तथा गत नौ वर्षों में 9 दलित छात्रों द्वारा शैक्षणिक उत्पीडन के कारण की गई आत्महत्याओं के विरोध की चर्चा करने का साहस नहीं जुटा पातीं।
  लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में छात्रों के प्रत्यक्ष विरोध के बाद प्रधानमंत्री जिस भाषण में ‘मां भारती के लाल की मृत्यु’ के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं वहीं यह कहने से हिचकिचाते नहीं हैं कि बाबासाहब अपने जीवन में आने वाले कष्ट चुपचाप सहन कर जाते थे , किसी से शिकवा तक नहीं करते थे। बाबासाहब के बारे में प्रधानमंत्री का दावा निराधार है। बाबासाहब द्वारा महाड सत्याग्रह (अस्पृश्यों के वर्जित तालाब से घोषणा करके ,समर्थकों के साथ पानी पीना) तथा मनुस्मृति दहन चुपचाप सहन करते जाने का विलोम थे। पुणे करार के दौरान हुई बातचीत में गांधीजी ने उनकी वकालत के बारे में पूछा था। बाबासाहब ने उन्हें बताया था कि अपने राजनैतिक-सांगठनिक काम के कारण वे वकालत में कम समय दे पा रहे हैं। उसी मौके पर शैशव से तब तक उनके साथ हुए सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न की उनके द्वारा बताई गई कथा गांधी के विचार पत्रों -हरिजनबंधु (गुजराती), हरिजनसेवक (हिन्दी) तथा हरिजन (अंग्रेजी) में छपे थे।
भारतीय समाज और राजनीति में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। पिछड़े और दलित खुली स्पर्धा में अनारक्षित सीटों पर दाखिला पाते हैं,वजीफा हासिल करते हैं और लोक सेवा आयोग की अनारक्षित सीटों पर चुन जाते हैं । यह समाज की सकारात्मक दिशा में गतिशीलता का मानदण्ड बनता है। ऐसे युवाओं की तादाद उत्तरोत्तर बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। गैर आरक्षित खुली सीटों पर चुने जाने वाले ऐसे अभ्यर्थियों के कारण आरक्षित वर्गों के उतने अन्य अभ्यर्थियों को आरक्षण के अन्तर्गत अवसर मिल जाता है। यहां यह स्पष्ट रहे कि यदि अनारक्षित खुली स्पर्धा की सीटों पार आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को जाने से रोका जाए तब उसका मतलब गैर-आरक्षित तबकों के लिए पचास फीसदी आरक्षण देना हो जाएगा। सामाजिक यथास्थिति की ताकतें इस सकारात्मक परिवर्तन से खार खाती हैं। इस प्रकार पढ़ाई-लिखाई में कमजोर ही नहीं मेधावी छात्र-छात्राओं को भी विद्वेष का सामना करना पड़्ता है। यानी उत्पीडन का आधार छात्र का पढ़ाई में कमजोर या मजबूत होना नहीं अपितु उसकी जाति होती है।
  शैक्षणिक संस्थाएं व्यापक समाज का हिस्सा भी हैं और वहीं इनकी अपनी एक दुनिया भी है। हर जमाने के सत्ता संतुलन को बनाये रखने के लिए जिन लोगों की आवश्यकता होती है उनका निर्माण इन संस्थाओं में किया जाता है। रोहित को यथास्थितिवाद का पुर्जा बनाना शिक्षा व्यवस्था के बस की बात न थी। व्यापक समाज और विश्वविद्यालय परिसर को देखने की उसकी दृष्टि सृजनात्मक थी,दकियानुसी नहीं थी। हैदराबाद शहर के बाहर बसाये गये इस परिसर के पेड़-पौधे ,जीव-जंतुओं से लगायत अंतरिक्ष तक उसकी नजर थी। अपनी राजनीतिक पढ़ाई के अलावा कुदरत से मानव समाज की बढ़ रही दूरी को वह शिद्दत से महसूस करता था। उसके फेसबुक चित्रों का एक अल्बम हैदराबाद विश्वविद्यालय की वानस्पतिक और जैविक संपदा के सूक्ष्म निरीक्षण से खींचे गए फोटोग्राफ्स को समर्पित है।
  रोहित जैसा होनहार तरुण की प्रतिभा उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों में पुष्पित-पल्लवित हो सके यह अत्यन्त दुरूह है। इस दुर्गम पथ पर चलते वक्त उसे कदम-कदम पर लड़ना पड़ा होगा। राजनीति और शिक्षा के संचालकों को उसने चुनौती दी होगी। किसी देश का लोकतंत्र उसकी संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण से कमजोर होता है। उन संस्थाओं में लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक तंत्र के हर स्तर पर छात्र-अध्यापक-कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व हो। उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता की पोल खुलनी अब शेष नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री की शैक्षणिक ‘उपलब्धियों’ की सूचनाओं को देने के जिम्मेदार बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई के वक्त ही विश्वविद्यालयी आजादी के बाद केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की बाबत पहली समिति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी थी स्वायत्तता की हकीकत सामने आ गई थी। राष्ट्रीय महत्व की संस्थायें आई.आई.टी. से लगायत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट जैसे तमाम शिक्षण संस्थानों में दिल्ली में बैठे शैक्षणिक तंत्र के नौकरशाहों द्वारा बेहयाई से दखलंदाजियां की गई हैं।
     उच्च शिक्षा केन्द्रों में यौन उत्पीडन की रोकथाम के लिए सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा फैसले की सिफारिशों की मूल भावना के अनुरूप समितियां बनी हैं। जातिगत विद्वेष की रोकथाम के लिए भी इस प्रकार की समितियां गठित होनी चाहिए। फिलहाल विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ बने हुए हैं परन्तु वे नख-दन्त विहीन हैं। लाजमी तौर पर इन समितियों में  पिछड़े और दलित समूहों की नुमाइन्दगी भी होनी चाहिए। यह गौरतलब है कि गैर-शिक्षक कर्मचारी चयन,शिक्षक व गैर-शिक्षक आवास आवण्टन समिति में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर पदेन राष्ट्रपति होते हैं तथा इन्हें विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक-शैक्षणिक जांच के अधिकार का प्रावधान हर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कानून में होता है। इस प्रावधान के तहत सिर्फ काशी विश्वविद्यालय में दो बार विजिटोरियल जांच हुई है न्यायमूर्ति मुदालियर की अध्यक्षता में तथा न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अध्यक्ष रही माधुरी शाह की अध्यक्षता में सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जांच समिति गठित हुई थी। रोहित की मृत्यु के पश्चात एक व्यापक सन्दर्भ की जांच आवश्यक है। निर्भया कान्ड के बाद बने न्यायमूर्ति वर्मा की समयबद्ध कार्यवाही तथा बुनियादी सुधार के सुझावों से हमें सीख लेनी चाहिए तथा उच्च शिक्षा की बाबत उस प्रकार की जांच की जानी चाहिए। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा घोषित जांच इस व्यापक उद्देश्य की दृष्टि से नाकाफी प्रतीत होती है।
अफलातून

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ईसा मसीह स्वयं  पैदाइशी तौर पर यहूदी थे । वैसे ही नया दल बनाने की घोषणा करने वाले  केजरीवाल का कार्यक्रम लाजमी तौर पर  ‘इन्डिया अगेंस्ट करप्शन’ द्वारा बुलाया गया था – नए दल द्वारा नहीं  । नए दल का नाम ,संविधान और शायद पदाधिकारियों की सूची नवम्बर 26 को घोषित  किए जाएंगे – यह उस मंच से  परसों घोषित किया गया । कल के ‘दी हिन्दू ‘ मे  यह पहले पेज की मुख्य खबर में था  । खबर के अनुसार दल के नाम ,संविधान और पदाधिकारियों केके नाम आदि की घोषणा ”नवम्बर 26 ,अम्बेडकर जयन्ती ” के दिन होंगी । क्या यह सामान्य सी चूक थी ? दल का नाम आदि कब घोषित होगा यह भली प्रकार सोचा गया होगा । उसकी तिथि भी अच्छी तरह सोच-विचार कर तय की गई होगी । राजनीति में कदम रख रहे रहे हैं तो ‘राजनैतिक रूप से सही’ कदम के तौर पर बाबासाहब से जोड़ना भी लगा होगा। तब ? क्या पता ‘दी हिन्दू’ वालों ने यह गलती की हो?

केजरीवाल की अब तक की एक-सूत्री मांग लोकपाल  के  42 साल पहले जब जयप्रकाश लोकपाल की मांग करते थे तब भी वे योरप में कुछ स्थानों पर लागू ओमबड्समन की चर्चा करते थे। प्रशासन के अलावा संस्थाएं भी ओमबड्समन रखती हैं। भारतीय मीडिया जगत में ‘दी हिन्दू’ एक मात्र संस्था है-जहां लोकपाल,लोकायुक्त,ओमबड्समन से मिलता जुलता एक निष्पक्ष अधिकारी बतौर ‘रीडर्स एडिटर ‘ नियुक्त है । अभी तीन दिन पहले ही श्री पनीरसेल्वन इस पद पर नियुक्त हुए हैं । तो हमने उनसे तत्काल पूछा की कल अक्टूबर 3 ,2012 के अखबार में पहले पन्ने के मुख्य समाचार में यह जो कहा गया है – कि ”अम्बेडकर जयन्ती नवम्बर 26” को है यह यह उस जलसे वालों की गलती है या अखबार की ? हमने यह भी गुजारिश की मेहरबानी कर इस मसले  की हकीकत का  सार्वजनिक तौर पर ऐलान करें चूंकि की यह देश के एक बड़े  नेता के प्रति कथित ‘नई  राजनीति’ के दावेदारों की अक्षम्य उपेक्षा को दरसाता है । हमने यह इ-पत्र  लिखा :

To,
Readers’ Editor,
The Hindu.
Dear Sir ,
I want to draw your attention to the main news on page 1, Delhi edition,dated October 3,2012 with the heading ‘Kejriwal launches party,vo
ws to defeat ‘VIP system’. The news declares November 26 as ‘Ambedkar Jayanti’ which is factually wrong and shows ignorance about one of our national leaders . It should be made clear by you to the readers in general and the public in general whether this mistake is committed by the proposed new party or by The Hindu.
With regards,
Sincerely yours,
Aflatoon,
Member,National Executive,
Samajwadi Janaparishad.

आज अक्टूबर 4 ,2012 के अखबार (छपे संस्करण में) मेरे ख़त का जवाब आ गया है। ‘नवम्बर 26 को को अम्बेडकर जयन्ती बताने का का सन्दर्भ गलत है।विशेष संवाददाता का की सफाई  : यह (नवम्बर 26 को अम्बेडकर जयन्ती बताना ‘इंडिया  अगेंस्ट करप्शन ‘ के जलसे  के मंच से हुआ था।

>> In “Kejriwal launches party , vows to defeat ‘VIP system’ (page1,Oct 3,2012), the reference to November 26 as Ambedkar Jayanti is incorrect. The Special Correspondent’s clarification : It (November 26 as Ambedkar Jayanti remark ) was made from the dais during the India Against Corruption function.

 

तो भाई ‘द हिन्दू ‘ के लोकपाल जिन्हें  रीडर्स एडिटर कहा जाता है, ने यह साफ़ कर दिया कि अम्बेडकर जयन्ती की बाबत गलत सूचना इस नए दल वालों की थी।  अरविंद केजरीवाल एक समूह का प्रमुख विचारक माना जाता रहा है, उसके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में उस समूह के मकसद के अनुरूप भाषण करता रहा है । यह समूह है – आरक्षण का विरोध करने के लिए बना समूह – यूथ फॉर इक्वालिटी  – मकसद है गैर-बराबरी कायम रखना और और नाम धरा है ‘बराबरी’ ! अन्ना के साथ जब पहली बार जंतर-मंतर पर जब केजरीवाल पहली बार धरना दे रहे थे तब इसी समूह से जुडे लड़के ‘ आरक्षण संवैधानिक भ्रष्टाचार है’ के नारे पहने हुए थे । नए दल के नजरिए में आरक्षण के समर्थन में वचन हैं । दूसरे के नजरिए को पचाने में वक्त लग सकता है? उस बीच के वक्त में ऐसी चूक हो सकती है? अगर महात्मा फुले की पुण्य तिथि  नवम्बर 28 से कन्फ्यूजिया रहे हों ? वह भी 26 नहीं 28 है।

परसों शाम मुझे योगेन्द्र यादव का इमेल मिला।केजरीवाल की प्रस्तावित पार्टी का दस्तावेज उसके साथ संलग्न था। सुनते  हैं  कि यह ड्राफ्ट भी योगेन्द्र का लिखा  । ऐसा होने पर  वे इस नई  प्रक्रिया के मात्र  प्रेक्षक नहीं रह जायेंगे ।   योगेन्द्र यादव ने केजरीवाल के मंच से बताया की वे समाजवादी जनपरिषद के सदस्य हैं । समाजवादी जनपरिषद के सक्रीय सदस्यों की भी एक आचार संहिता है। कथित नए दल की प्रस्तावित हल्की-फुल्की और त्रुटि -पूर्ण आचार संहिता की भांति  नहीं है समाजवादी जनपरिषद की आचार-संहिता। बिहार आन्दोलन के वरिष्ट साथी बिपेंद्र कुमार ने बताया की’वी आई पी संस्कृति’ के निषेध के लिए इस नए समूह की घोषणा कितनी हास्यास्पद है।दरअसल जड़ से कटा होने के कारण ऐसा होता है- ”हमारे विधायक और सांसद लाल बत्ती नहीं लगायेंगे” जोश में कह दिया । कहीं भी विधायक-सांसद यदि उन पर मंत्री जैसी जिम्मेदारी न हो तो बत्ती नहीं लगाते। शेषन , खैरनार,अनादी  साहू जैसे नौकराशाहों से इस पूर्व नौकरशाह और एन जी ओ संचालक की स्थिति मिलती जुलती हो यह बहुत मुमकिन है। स्वयंसेवी सन्स्थाओं  की पृष्टभूमि वाले राजनैतिक कर्मियों और उनसे अलग सच्चे अर्थों में राजनैतिक कर्मियों के बारे में किशन पटनायक ने हमें साफ़ समझ दी है :

‘वही एन जी ओ कार्यकर्ताओं को पाल पोस सकते हैं जो विदेशी दाता सम्स्थाओँ से पैसा प्राप्त करते हैं ।धनी देशों के एनजीओ के बारे हम कम जानते हैं। अधिकाँश दाताओं का उद्देश्य रहता है की उनके पैसे से जो सार्वजनिक कार्य होता है वह नवउदारवाद  और पूंजीवाद का समर्थक हो ।जो सचमुच लोकतंत्र  का कार्यकर्ता है उसके राजनैतिक खर्च के लिए या न्यूनतम पारिवारिक खर्च के लिए इन देशों में पैसे का कोई स्थायी या सुरक्षित बंदोबस्त नहीं होता है। देश में हजारों ऐसे कार्यकर्ता हैं जो पूंजीवाद विरोधी राजनीति में जहां एक ओर  पूंजीवाद और राज्य-शक्ति के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपने मामूली खर्च के लिए इमानदारी से स्खलित न होने का संघर्ष  जीवन भर कर रहे हैं ।उनमें से एक-एक का जीवन एक संवेदनापूर्ण किस्सा है , गाथा है , जो अभी तक न विद्वानों के शास्त्र का विषय बना है , न साहित्यिकों की कहानियों का विषय।हमारे लिए हैं वे हैं लोकतंत्र के आलोक-स्तम्भ ।”

इस बुनियादी समझ के साथ समाजवादी जनपरिषद ने सक्रीय सदस्यों  के लिए बनी अपनी आचार-संहिता में :

दल के संविधान की 3.1.(2) के अनुसार सक्रिय सदस्य दल द्वारा स्वीकृत आचरण संहिता का पालन करेगा। दल की आचरण संहिता पर हमे फक्र है तथा नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इसे हम अनिवार्य मानते हैं। इसे यहाँ पूरा दे रहा हूँ :

समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सक्रिय सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह-

1.1 जनेऊ जैसे जातिश्रेष्ठता के चिह्न धारण नहीं करेगा।

1.2 छुआछूत का किसी भी रूप में पालन नहीं करेगा।

1.3 जाति आधारित गालियों का प्रयोग नहीं करेगा ।

1.4 दबी हुई जातियों को छोड़कर किसी भी अन्य जाति विशेष संगठन की सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।

2.1 दहेज नहीं लेगा ।

2.2 औरत की पिटाई नहीं करेगा और औरत(नारी) विरोधी गालियों का व्यवहार नहीं करेगा।

2.3 एक पत्नी या पति के रहते दूसरी शादी नहीम करेगा और न ही उस स्थिति में बिना शादी के किसी अन्य महिला/पुरुष के साथ घर बसाएगा ।

3 धार्मिक या सांप्रदायिक द्वेष फैलाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होगा ।

4 समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह ऐसे किसी गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्था (  NGO ), जो मुख्यत: विदेशी धन पर निर्भर हो,

(क) का संचालन नहीं करेगा ।

(ख) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली समिति का सदस्य नहीं होगा।

(ग) से आजीविका नहीं कमाएगा ।

5.1 सदस्यता-ग्रहण/नवीनीकरण के समय अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति व आय की घोषणा करेगा ।

5.2 अपनी व्यक्तिगत आय का कम से कम एक प्रतिशत नियमित रूप से समाजवादी जनपरिषद को देगा।

5.3 विधायक या सांसद  चुने जाने पर अपनी सुविधाओं का उतना अंश दल को देगा जो राष्ट्रीय  कार्यकारिणी द्वारा तय किया जायेगा।

बहरहाल योगेन्द्र यादव पर समाजवादी जनपरिषद के सक्रीय सदस्यों के लिए बनी ऊपर दी गयी आचार संहिता लागू नहीं है । इसकी धारा 4 से भी मुक्त हैं ,वे। सिर्फ सक्रीय सदस्य ही दल की जिम्मेदारियां लेता है ।किसी प्रस्तावित दल  के दस्तावेज का ड्राफ्ट बना कर  प्रेक्षक की सीमा का उल्लंघन किया अथवा नहीं यह दिल्ली की इकाई तय करेगी । दल का सदस्य जिस स्तर  का होता है उस स्तर  की समिति उससे जुड़े अनुशासन को देखती है ।

 

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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए  गए भोपाल गैस कांड संबंधी फैसले से हर देश प्रेमी आहत हुआ है |  पचीस साल पहले राजेन्द्र राजन ने इस मसले पर कवितायें लिखी थीं , इस निर्णय के बाद यह कविता लिखी है |

भोपाल-तीन

हर चीज में घुल गया था जहर
हवा में पानी में
मिट्टी में खून में

यहां तक कि
देश के कानून में
न्याय की जड़ों में

इसीलिए जब फैसला आया
तो वह एक जहरीला फल था।

राजेन्द्र राजन

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पूंजीवाद एक बार फिर संकट में है। पिछले दिनों आई जबरदस्त मंदी ने इसकी चूलें हिला दी है और दुनिया अभी इससे पूरी तरह उबरी नहीं है। पूंजीवाद का संकट सिर्फ बैंकों, कंपनियों व शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। दुनिया में भूखे, कुपोषित, बेघर और बेरोजगार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आज दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं, यानी हर छठा आदमी भरपेट नहीं खा पाता है। इंसान की सबसे बुनियादी जरुरत भोजन को भी पूरा नहीं कर पाना पूंजीवादी सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता है। पर्यावरण का संकट भी गहराता जा रहा है, जिसे कोपनहेगन सम्मेलन की विफलता ने और उजागर कर दिया है।

इन संकटो ने पूंजीवादी सभ्यता के चमत्कारिक दावों पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इसके विकल्पों की तलाश तेज हो गई है। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि पहले इसकी बुनियादी गड़बड़ियों को समझा जाए और उनका सम्यक रुप से विश्लेषण किया जा सके।

कार्ल मार्क्स पूंजीजीवाद के सबसे बड़े और सशक्त व्याख्याकार व टीकाकार रहे हैं। किन्तु डेढ़ सौ सालों बाद उनके विश्लेषण और सिद्धांतों में कई कमियां दिखाई देती है। पूंजीवाद के विकास ,विनाश और क्रांति के बारे में उनकी भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुई हैं। पूरी दुनिया पूंजीपतियों और मजदूरों में नहीं बंटी। कारखानों का संगठित मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ अब नहीं रहा। रुस, पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम आदि में जो कम्युनिस्ट क्रांतियां हुई, वे धराशायी हो गई हैं, और ये देश वापस पूंजीवाद के आगोश में चले गए हैं। इधर लातीनी अमरीका में जो समाजवाद की बयार चली है, वह शास्त्रीय मार्क्सवादी धारा से काफी अलग है।

दुनिया में आंदोलन और संघर्ष तो बहुत हो रहे हैं। किन्तु मजदूर-मालिक संघर्ष अब खबरों में नहीं है। किसानों, आदिवासियों और असंगठित मजदूरों के आंदोलन, जल-जंगल-जमीन के आंदोलन, धार्मिक-सामुदायिक-राष्ट्रीय पहचान आधारित आंदोलन तो हैं , किन्तु वे मार्क्स के विचारों से काफी अलग हैं। तब हम इन्हें कैसे समझे ?

इस मामले में डॉ० राममनोहर लोहिया से हमें मदद मिल सकती है। उन्होंनें 1943 में ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ नामक निबंध लिखा। उन्होंने बताया कि पूंजीवादी शोषण का मुख्य आधार एक कारखाने या एक देश के अंदर मालिक द्वारा मजदूर का शोषण नहीं, बल्कि उपनिवेशों का शोषण है। उपनिवेशों के किसान, कारीगर व मजदूर ही असली सर्वहारा है। लेनिन का यह कथन गलत है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था है। बल्कि, यह पूंजीवाद की पहली और अनिवार्य अवस्था है। यदि पश्चिम यूरोप के देशों ने अमरीका, अफ्रीका, एशिया और आस्ट्रेलिया के विशाल भूभागों पर कब्जा करने और लूटने का काम न किया होता, तो वहां औद्योगिक क्रांति नहीं हो सकती थी।

उपनिवेशों के आजाद होने के बाद भी नव-औपनिवेशिक और नव-साम्राज्यवादी तरीकों से यह लूट व शोषण चालू है और इसीलिए पूंजीवाद फल-फूल रहा है। यह शोषण सिर्फ औपनिवेशिक श्रम का ही नहीं है। इसमें पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन, लूट और विनाश भी अनिवार्य रुप से छिपा है। इसीलिए आज दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़े प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हो रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण के संकट भी पैदा हो रहे हैं।

औपनिवेशिक शोषण की जरुरत पूंजीवादी विकास के लिए इतनी जरुरी है, कि तीसरी दुनिया के जिन देशों ने इस तरह का विकास करने की कोशिश की, बाहरी उपनिवेश न होने पर उन्होंनें आंतरिक उपनिवेश विकसित किए। आंतरिक उपनिवेश सिर्फ क्षेत्रीय व भौगोलिक ही नहीं होते हैं। अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से भी (जैसे गांव या खेती) आंतरिक उपनिवेश बन जाते हैं। भारतीय खेती के अभूतपूर्व संकट और किसानों की आत्महत्याओं के पीछे आंतरिक उपनिवेश की व्यवस्था ही है।

सोवियत संघ का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही था कि उसने उसी तरह का औद्योगीकरण और विकास करने की कोशिश की, जैसा पूंजीवादी यूरोप-अमरीका में हुआ था। किन्तु बाहरी और आंतरिक उपनिवेशों की वैसी सुविधा उसके पास नहीं थी।

इसलिए, पूंजीवाद का एक बुनियादी नियम हम इस तरह बयान कर सकते हैं :

पूंजीवादी विकास के लिए औपनिवेशिक, नव-औपनिवेशिक या आंतरिक – औपनिवेशिक

शोषण जरुरी है। यह शोषण दोनों का होता है – श्रम का भी और प्राकृतिक संसाधनों का भी।

दुनिया के स्तर पर इस नियम का अभी तक कोई महत्वपूर्ण अपवाद नहीं है।

लोहिया के पहले गांधी ने आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता के इस शोषणकारी-विनाशकारी चरित्र के बारे में चेतावनी दी थी। मार्क्स के अनुयायियों में रोजा लक्ज़मबर्ग ने इस विषय में मार्क्स की खामियों को उजागर किया था और उसे सुधारने की कोशिश की। लोहिया के बाद लातीनी अमरीका के आन्द्रे गुन्दर फ्रेंक और मिस्त्र के समीर अमीन नामक मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने लोहिया से मिलती-जुलती बातें कही है।

यदि ऊपर कही गई बातें सही हैं, तो इनसे कई निष्कर्ष निकलते हैं :

’ तीसरी दुनिया के गरीब देशों में यूरोप-अमरीका जैसा औद्योगीकरण एवं विकास संभव नहीं है, चाहे वह पूंजीवादी तरीके से किया जाए या साम्यवादी (राज्य पूंजीवादी) तरीके से किया जाए।

’ चूंकि अमरीका-यूरोप की समृद्धि व जीवन-शैली पूरी दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिकी है, वह दुनिया के सारे लोगों के लिए हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए समाजवादियों को उसका सपना छोड़ देना होगा। सबकी न्यूनतम बुनियादी जरुरतें तो पूरी हो सकती हैं, किन्तु विलासितापूर्ण जीवन सबका नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में ‘स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व’ के साथ ‘सादगी’ और ‘स्वावलंबन’ भी समाजवादी समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण एवं जरुरी सूत्र होंगे।

’ इस अर्थ में दुनिया का आर्थिक-राजनैतिक संकट और पर्यावरणीय संकट आपस में जुड़े हैं। एक वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था में ही दोनों संकटों से मुक्ति मिल सकेगी। दूसरे शब्दों में, समाजवाद निर्माण के किसी भी प्रयास में दोनों तरह के आंदोलनों – आर्थिक-सामाजिक बराबरी के आंदोलन एवं पर्यावरण के आंदोलन – को मिलकर ताकत लगाना होगा।

’ विकल्प सिर्फ पूंजीवाद (उत्पादन संबंधों के संकुचित अर्थ में) का नहीं हो सकता। निजी संपत्ति को खतम करना काफी नहीं है। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के साथ पूंजीवादी तकनालॉजी, जीवन-शैली और जीवन-मूल्यों का भी विकल्प खोजना होगा। दूसरे शब्दों में हमें ‘पूंजीवादी सभ्यता’ का विकल्प खोजना होगा। एक नयी सभ्यता का निर्माण करना होगा।

इक्कीसवीं सदी में समाजवाद की किसी भी संकल्पना, तलाश और कोशिश में ये महत्वपूर्ण सूत्र होंगे। इनके लिए हम लोहिया के आभारी हैं।

————–’’’…………………………

(साहित्य अकादमी द्वारा डॉ० राममनोहर लोहिया पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी (18-20फरवरी 2010) में पेश आलेख – हिन्दी सारांश)

– सुनील

ग्रा/पो केसला,

जि. होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

461111

ईमेल – sjpsunil@gmail.com

कार्य :- समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार। आदिवासियों, किसानों,

मछुआरों एवं विस्थापितों के संघर्ष एवं संगठन में पिछले 25 वर्ष से सक्रिय। अखबारों, पत्रिकाओं में लेखन। कई पुस्तिकाएं भी प्रकाशित।

पद :- राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, समाजवादी जन परिषद।

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 भारतीय बुद्धिजीवियों का विदेश-प्रेम [   पिछले भाग से आगे ] : इसके अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं ।साठ के दशक में डॉ. रिछारिया जैसे प्रखर कृषि वैज्ञानिक की चेतावनी को नजरंदाज करके हमने रासायनिक खेती वाली हरित क्रांति को अपनाया , जिसके दुष्परिणाम आज हम भोग रहे हैं और वापस जैविक खेती की बात करने लगे हैं।

    इस दोषपूर्ण तकनालाजी को अपनाने में भारत के कृषि वैज्ञानिकों व नीति निर्माताओं पर विश्व बैंक , अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान , फोर्ड फाउन्डेशन , रॉकफेलर फाउन्डेशन जैसी संस्थाओं के प्रभाव एवं शिकंजे का बड़ा योगदान था । हमारे वैज्ञानिक और हमारी सरकार देश की उर्जा जरूरतों के लिए कोयला , पेट्रोल , पनबिजली , व परमाणु बिजली पर ही पूरी तरह निर्भरता बढ़ाते रहे  हैं । उर्जा के पारंपरिक एवं नवीनीकरण योग्य स्रोतों के संरक्षण एवं विकास पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया , इसके पीछे भी पश्चिमी अमीर देशों की नकल की प्रवृत्ति ही रही है । अमरीका – यूरोप ठण्डे मुल्क हैं , जहाँ वर्ष के ज्यादातर दिनों में सूरज की गरमी कम ही पहुंचती है । लेकिन सूरज की भरपूर रोशनी व गरमी पाने वाले भारत ने सौर- उर्जा की उपेक्षा क्यों की , इस सवाल का जवाब भी इस प्रवृत्ति में मिलेगा ।

    नब्बे के दशक में वैश्वीकरण , उदारीकरण , निजीकरण , विनियंत्रण व मुक्त व्यापार की आत्मघाती नीतियों को भी जब भारत ने अपनाया , तो उनके समर्थन में अर्थशास्त्रियों व अफसरों की एक फौज को पहले ही इसी तरीके से तैयार किया जा चुका था । विश्व बैंक , अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ,एशियाई विकास बैंक , पश्चिमी विश्वविद्यालय और अंतरराष्ट्रीय दानदाता संस्थाओं ने भारत के अनेक अर्थशास्त्रियों , प्रोफेसरों , अफसरों आदि को लगातार अपने यहाँ ऊँचे वेतन पर नौकरी देकर , प्रोजेक्ट देकर , गोष्ठियों – सम्मेलनों में बुलाकर अपने वश में कर लिया था और उनके दिल – दिमाग को अपने अधीन कर लिया था । अब स्वयं अमरीका – यूरोप में भीषण मंदी के बाद इन नीतियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं , तो ये लोग बगले झाँक रहे हैं । ashourie    -Manmohansingh04052007

    इस वैचारिक गुलामी और नकल की प्रवृत्ति में बड़ी भूमिका अंग्रेजी भाषा की भी है । अंग्रेजी का वर्चस्व महज भाषा का मामला नहीं है। यह उच्च वर्ग के वर्चस्व और विशेषकाधिकारों को बनाए रखने का माध्यम तो है ही । लेकिन सबसे बड़ा नुकसान तो यह हुआ है कि हमारा शास्त्र , शिक्षण , अनुसंधान , बौद्धिक विमर्श सबमें विदेशी विचार ही हावी होते रहे हैं और मौलिक चिंतन – अनुसंधान नहीं के बराबर हो रहा है । भारत के अनेक पढ़े – लिखे लोग अंधविश्वास की हद तक अंग्रेजी के भक्त हैं । बहुत लोग यह मानते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति , अनुसंधान ,अंतरराष्ट्रीय संवाद , अंतरराष्ट्रीय व्यापार आदि अंग्रेजी और सिर्फ अंग्रेजी में ही हो सकता है । जापान के इस वैज्ञानिक के बारे में कोई उन्हें बताएगा क्या ? क्या कोई उन्हें यह भी बताएगा कि जो देश अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं या जहाँ अंग्रेज बड़ी संख्या में बसे हैं , उन्हें छोड़कर कहीं भी अंग्रेजी में शिक्षण , प्रशासन , अनुसंधान एवं विमर्श नहीं होता है? दुनिया का कोई भी देश विदेशी भाषा को पनाकर – लादकर प्रगति नहीं कर पाया है ।Montekahuwalia

    कहने का मतलब यह नहीं है कि भारत को अपने दरवाजे बंद कर लेना चाहिए या वैचारिक – वैज्ञानिक विनिमय नहीं करना चाहिए । लेकिन यह लेनदेन एकतरफ़ा , गैरबराबर और असंतुलित नहीं होना चाहिए । इससे हम क्या हासिल कर रहे हैं , यह भी देखना होगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि कहीं हम वैचारिक – सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के शिकार तो नहीं बन रहे हैं ? हमारे बुद्धिजीवियों के ये पासपोर्ट कहीं बौद्धिक गुलामी और वैचारिक दिवालियापन के माध्यम तो नहीं बने हुए हैं ?

सुनील ( लेखक समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनका ई-पता sjpsunil@gmail.com है )

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[ लेखक सुनील समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उनका ई-ठिकाना sjpsunil@gmail.com है । ]

    एक छोटी-सी खबर पर मेरी नजर अटक गई । खबर का शीर्षक था – ‘ पासपोर्ट तक नहीं है नोबेल विजेता के पास ‘ । इसमें बताया गया था कि भौतिकी में शोध के लिए वर्ष २००८ का साझा नोबेल पुरस्कार जीतने वाले जापान के वैज्ञानिक तोशिहिदे मस्कावा बेहद सादगीपसंद और अपने काम में ही व्यस्त रहने वाले इंसान हैं । उन्हें विदेश यात्रा पसंद नहीं है और उनके पास पासपोर्ट तक नहीं है । नोबेल पुरस्कार ग्रहण करने के लिए स्टाकहोम के समारोह में जाने के पहले उन्हें पासपोर्ट हासिल करने के लिए आवेदन करना होगा । वे अंग्रेजी भी ठीक से नहीं बोल पाते हैं तथा अंग्रेजी बोलते हुए खुद को असहज महसूस करते हैं ।

maskawa [ चित्र : क्योटो विश्वविद्यालय]  तोशिहिदे मस्कावा

    मेरा मन तत्काल इसकी तुलना भारत के वैज्ञानिकों , विशेषज्ञों , प्रोफेसरों आदि से करने लगा । भारत के लगभग हर विषय के बड़े विद्वान तो विदेश जाते ही रहते हैं । अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों , सम्मेलनों व कार्यशालाओं में उनका आना-जाना लगा रहता है । कह सकते हैं कि उनका एक पैर विदेश में ही रहता है । उनके कई शोध-प्रोजेक्ट विदेशी – अनुदान से ही चलते हैं  , उसके सिलसिले में भी उन्हें जाना पड़ता है । इस प्रक्रिया में कई लोग वहीं बस जाते हैं । यदि लौटकर आते हैं , तो ‘फ़ोरेन रिटर्न्ड’ के रूप में प्रतिष्ठा पाते हैं । विदेशी संस्थानों के फेलो , ‘एफ़ आर सी एस ‘ जैसी उपाधियाँ भी वे बड़े गर्व से लगाते हैं ।

    कुल मिलाकर , भारत के बड़े विद्वानों , वैज्ञानिकों , समाज – विज्ञानियों आदि के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि उनमें से किसी के पास विदेश जाने का पासपोर्ट तक न हो । छोटे शहरों व कस्बों के प्राध्यापक , शोधकर्ता , अफसर भी विदेश जाने को लालायित रहते हैं । उनमें से किसी को अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का निमंत्रण मिले , तो इस समाचार को फोटो सहित अखबारों में छापा जाता है ।

    भारतीय बुद्धिजीवियों का यह विदेश – प्रेम इतना आम , इतना स्वीकार्य और सर्वमान्य हो गया है कि इसकी उपयोगिता , प्रासंगिकता , जरूरत और इसके औचित्य पर बहुत कम सवाल उठाये जाते हैं । लेकिन इन विदेश – यात्राओं के बारे में कुछ बातें गौरतलब हैं ।

    पहली सच्चाई तो यह है कि इनमें से ९० फीसदी यात्राएं सम्युक्त राज्य अमेरिका , कनाडा , यूरोप , आस्ट्रेलिया , जापान जैसे अमीर पूंजीवादी मुल्कों के लिए ही होती है । यह ठीक है कि हमें कूपमंडूक नहीं बनना है और दुनिया के साथ हमारा वैचारिक , वैज्ञानिक , शैक्षणिक आदान-प्रदान चलते रहना चाहिए । लेकिन हमारी यह ‘दुनिया’ सिर्फ गोरी चमड़ी वाले इन थोड़े-से देशों तक क्यों सीमित हो जाती है ?  एशिया , अफ़्रीका व लातीनी अमेरिका के विशाल भूभागों में जहाँ दुनिया की ८० फीसदी आबादी रहती है और जहाँ की दशाएं हमसे ज्यादा मिलती हैं , वहाँ हमारे बुद्धिजीवी और विद्वान क्यों नहीं जाते ?

    इसका जवाब भी बहुत सीधा है । दरअसल इन विदेश यात्राओं और सेमिनारों – सम्मेलनों के लिए धन इन्हीं गोरे अमीर देशों से आता है । यही नहीं , शोध व अनुसंधान की ज्यादातर योजनाओं की धनराशि का स्रोत भी ये ही देश होते हैं । उनका एक डॉलर भारत के पचास रुपये का होता है । गरीब देशों के बुद्धिजीवी एवं वैज्ञानिक इन्हीं डॉलरों , पाउन्डों ,मार्कों , येनों की ताकत से आकर्षित कर लिये जाते हैं । गरीब देशों से प्रतिभा पलायन भी इनकी ही ताकत से होता है । प्रतिभाओं का जन्म तो गरीब देशों में होता है , लालन – पालन वहीं होता है , शिक्षा – दीक्षा भी वहीं होती है , लेकिन जब देश या समाज के लिए कुछ करने की उम्र होती है , तो वे अमीर देशों में चली जाती हैं । उनकी सेवाएं अमीर देशों को मिलती हैं । उन्हीं की प्रगति में उनका योगदान होता है । इस प्रतिभा पलायन के दुष्चक्र के चलते गरीब देश गरीब और पिछड़े बने रहते हैं ।

   लेकिन जो प्रोफेसर , वैज्ञानिक व शोधकर्ता अपने देशों में रहते हैं , इन विदेश – यात्राओं की बदौलत , और शोध – अनुसंधा-अध्ययन की विदेशी फन्डिंग के चलते , वे भी बहुधा विदेशों से ही नियंत्रित – निर्देशित तथा परिचालित – प्रेरित रहते हैं । उनकी दिशा और उनका एजेण्डा बहुत हद तक विदेशों से ही तय होता है । इसके चलते हमारे शिक्षण , शोध , अनुसंधान , प्रशान और नीतियों में एक पश्चिमी प्रभाव एवं पूर्वाग्रह आ जाता है । अपने देश की परिस्थितियों , प्राथमिकताओं एवं जरूरत के मुताबिक मौलिक बौद्धिक कार्य हमारे देश में नहीं हो पा रहा है , इसका संभत: यह एक प्रमुख कारण है ।

[ जारी ]

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बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख़्त – ले. अफ़लातून , भाग -२

 

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