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Archive for the ‘jharkhand’ Category

पिछले भाग से आगे :

वैसे तो यह औद्योगिक व्यवस्था पूंजीवाद द्वारा पैदा की गयी है जिसमें निजी स्वामित्व की प्रधानता है , लेकिन धीरे धीरे उद्योगों का यह ढांचा , जो वृहद कॉर्पोरेशनों के रूप में विकसित हुआ है , पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियन्त्रण से मुक्त हो एक स्वतंत्र स्वरूप धारण करने लगा है और इसका मूल रुझान पूर्ववत श्रम और संसाधनों के शोषण से प्रतिष्ठानों के लिए ज्यादा मुनाफा कमाना होता है । विख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री गालब्रेथ ने विकसित हो रहे स्वायत्त पूंजी के व्यवस्थापकों के इस समूह को ’टेक्नोस्ट्रक्चर’ का नाम दिया था । निजी या सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में इनकी व्यवस्था को चलाने के लिए व्यवस्थापकों और नौकरशाहों का ऐसा ही संवेदनहीन ढांचा तैयार हुआ है जिसका एक मात्र लक्ष्य अपना विस्तार करना और कॉर्पोरेशन के मुनाफे को बढ़ाना भर है । सार्वजनिक क्षेत्र के कॉर्पोरेशन एक अर्थ में जरूर भिन्न होते हैं।  इनके मुनाफे पर एक हद तक – जहाँ लोकतंत्र है, जन प्रतिनिधियों का नियन्त्रण होता है । लेकिन इनकी मूल प्रवृत्तियाँ निजी पूंजीवादी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होतीं । और इसी कारण यह भी पूंजीवादी व्यवस्था के फैलाव और संकोच के व्यापार चक्र से बिल्कुल मुक्त नहीं होते । चूँकि बुनियादी तौर से यह निजी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होते सरकारें जब चाहें तो विनिवेश द्वारा इनकी पूँजी को निजी क्षेत्र में स्थानान्तरित कर सकती है – जैसा हाल में मनमोहन सिंह सरकार ने एन.टी.पी.सी में किया है ।

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

समग्र रूप से यह पूंजीवादी कॉर्पोरेटी दुनिया आम आदमियों , विशेष कर आदिवासियों और किसानों के जीवन पर कहर बरसाती है | जिस औपनिवेशिक शोषण के बल पूंजीवाद का विकास हुआ है वह शोषण और भी भयावह होता जा रहा है क्योंकि इस व्यवस्था की संसाधनों की भूख असीम है । इसका सरल सूत्र है – अधिक मुनाफे के लिए अधिक उत्पादन चाहिए और अधिक उत्पादन के लिए अधिक संसाधान यानी अधिक जंगल की कटाई , अधिक खनिजों का खनन , अधिक अन्न और दूसरे कृषिजन्य कच्चे माल । इनके संयन्त्रों के लिए भूमि और सबसे ऊपर व्यापार के लिए परिवहन का तानाबाना चाहिए , ताकि सभी दूरदराज स्थानों को यह ऑक्टोपस (अष्टपाद) की तरह अपनी गिरफ़्त में ले सकें । पिछले दिनों ’स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन ’के नाम पर और सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर एक्सप्रेस वे एवं हाईवे के लिए देश भर में भूमि अधिग्रहण का सिलसिला चलाया जा रहा है । इन्हीं के खिलाफ़ प्रतिरोध से सिंगूर और नन्दीग्राम की त्रासदीपूर्ण घटनाएं हुई हैं । इसके पहले उड़ीसा , छत्तीसगढ़  और स्वयं झारखण्ड में देशी , विदेशी बड़ी कंपनियों द्वारा आदिवासियों और किसानों की जमीन पर सरकारी बल के सहारे अधिग्रहण के ऐसे प्रयास लगातार होते रहे हैं और जगह जगह इनके खिलाफ़ आन्दोलन होते रहे हैं जिन्हें दबाने की कोशिश भी होती रही है । जहाँ तहाँ माओवादी गतिविधियों में उभार में भी यह जन प्रतिरोध प्रतिबिंबित होता है । जब भारत के प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह “नक्सली हिंसा” को देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बताते हैं तो उनकी चिंता व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए संसाधनों की उपलब्धि की ही है । विश्व बैंक की आर्थिक नीति को देश में लागू करने में अग्रिम भूमिका निभाने वाले हमारे प्रधान मन्त्री का यह रुख स्वाभाविक है ।

लेकिन हमारे माओवादी मित्र भी लगभग वैसे ही दृष्टिकोण के शिकार हैं । अगर उन्होंने माओ के देश चीन पर ध्यान दिया होता तो वे माओवाद की जगह समाज परिवर्तन की किसी वैकल्पिक नीति की तलाश करते । माओ के चीन में आज क्या हो रहा है ?  माओ के नेतृत्व में चालीस वर्ष से अधिक तक चलने वाले आन्दोलन – जिसमें अनगिनत लोगों ने अपनी आहुति – का अन्तिम परिणाम क्या हुआ? आज चीन पूंजीवादी विकास और कॉर्पोरेटी व्यवस्था का सबसे सशक्त और निर्मम नमूना है । वहाँ की सालाना विकास दर भारत से भी कहीं ज्यादा है , जो कभी १२ प्रतिशत पार कर गयी थी । लेकिन इसका फायदा वहाँ के नवोदित पूंजीपति वर्ग और व्यवस्थापक वर्ग को मिल रहा है , जिनकी सुविधायें पश्चिमी दुनिया के संपन्नों की बराबरी कर रही हैं । लेकिन आम किसानों और मजदूरों की स्थिति दर्दनाक बनी हुई है । सरकार को उनकी सुरक्षा की चिंता इतनी कम है कि हजारों लोग कोयला खदानों की दुर्घतनाओं में मरते रहते हैं । माओवादी मित्रों को इस पर विचार करना चाहिए कि वे माओ की तर्ज पर खूनी क्रांति में स्वयं अपनी और हजारों दूसरे प्रतिबद्ध लोगों की शहादत से फिर चीन जैसा ही पूंजीवादी ढांचा तैयार करना चाहते हैं क्या ? वैसे ढाचे में तो आदिवासी और किसान वैसे ही विस्थापित होंगे और कुचले जायेंगे जैसे भारत और दुनिया के दूसरे देशों में पूंजीवादी विकास के क्रम में हो रहा है । देंग या कुछ दूसरे व्यक्तियों पर इस “भटकाव” की जवाबदेही डाल हम गंभीर सामाजिक विश्लेषण से बच नहीं सकते ।

सजप सम्मेलन धनबाद

सजप सम्मेलन धनबाद

समाजवादी जन परिषद बुनियादी तौर से ऐसे विकास को ( भले ही वह समाजवाद के नाम पर हो रहा हो ) नकारती रही है और आगे भी नकारती रहेगी । हमें एक ऐसे वैकल्पिक ढांचे की तलाश जारी रखनी होगी जिसमें मेहनतकशों की स्वायत्तता और व्यवस्था की मानवीयता बनी रहे । हमें स्पष्ट रूप से यह घोषित करना है कि किसानों और आदिवासियों के जीवन पर आघात करने वाली किसी विकास की व्यवस्था को हम स्वीकार नहीं करेंगे । हमें ऐसी छोटी राजकीय और आर्थिक इकाइयाँ विकसित करने की दिशा में पहल करना होगा जिसमें आदमी पूरे अर्थ में स्वतंत्र हो और अपनी व्यवस्था बनाने के लिए उसे पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त हो । खनिजों की खुदाई के लिए किसानों और आदिवासियों के विस्थापन का हम शुरु से विरोध करते रहे हैं। बाल्को के गंधमार्दन में बॉक्साईट खनन का अहिंसक विरोध समता संगठन ( जिसके प्रयासों से बाद में समाजवादी जनपरिषद का निर्माण हुआ ) ने कुछ दूसरे सहयोगी संगठनों के साथ किया था और उसमें एक हद की सफलता भी मिली थी। हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि आगे भी हम सदा ऐसा अहिंसक प्रतिरोध जारी रखेंगे ।

ऐसे अहिंसक संघर्षों की श्रृंखला से ही भविष्य में वह वातावरण तैयार होगा जिसमें एक वैकल्पिक समाज व्यवस्था – जो केन्द्रीकृत राज्य व्यवस्था और विशाल पूंजीवादी और नौकरशाही शोषण से समाज को मुक्त कर सके – अस्तित्व में आये । समाजवादी जनपरिषद को अपने इस प्रयास में देश के तमाम शोषित लोगों , आदिवासियों , किसानों ,  मजदूरों एवं बुद्धिजीवियों को शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए । हमें लोगों को सचेत करना चाहिए कि प्राकृतिक संपदा के अन्धाधुंध दोहन की मुहिम को वर्तमान औद्योगिक विकास और उपभोक्तावादी संस्कृति से अलग कर नहीं देखें ।  जो लोग आज की विकास प्रक्रिया को तो कबूल करते हैं पर जल , जंगल , और जमीन के कॉर्पोरेटी अधिग्रहण का विरोध करते हैं , वे स्वयं अपने को और तमाम जनता को भ्रम में डालते हैं । दोनों का अनिवार्य संबंध है इस सत्य को हमें उजागर करते रहना है ।

हमारा पिछला राष्ट्रीय सम्मेलन सत्याग्रह आन्दोलन के शताब्दी वर्ष में हुआ था । आज का सम्मेलन “हिन्द स्वराज” के शताब्दी वर्ष में हो रहा है । आज की व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष के क्रम में विकेन्द्रित ग्राम गणतंत्र की दिशा में समाज को ले जाने के प्रयास में “हिन्द स्वराज” की मूल कल्पना से प्रेरणा मिलेगी यह आशा है ।

– सच्चिदानन्द सिन्हा , धनबाद ,२८ अक्टूबर , २००९ .

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[ २८ , २९ , ३० अक्टूबर २००९ को धनबाद में समाजवादी जनपरिषद का द्विवार्षिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ । सम्मेलन का उद्घाटन  दल से जुड़े चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा ने किया । प्रस्तुत है उनका उद्घाटन भाषण ]

सच्चिदानन्द सिन्हा

सच्चिदानन्द सिन्हा

झारखण्ड , जहाँ हम सम्मेलन में बैठे हैं , एक अर्थ में मानव इतिहास की समेकित प्रतिछाया प्रस्तुत करता है । अपनी बात को मैं थोड़ा स्पष्ट करना चाहता हूँ । मानव समाज के अनुभवों के परिपेक्ष्य में पिछली दो शताब्दी का इतिहास यह बतलाता है कि सारी आदिम समाज से कारपोरेटीकरण की तरफ़ संक्रमण और इस क्रम में आम आदमी के दरिद्रीकरण की रही है । दरिद्रीकरण , आधुनिक अर्थ में धन के अभाव से ही नहीं , बल्कि आदमी की स्वायत्तता , आत्म सम्मान एवं सामाजिक दायित्व बोध के लोप के अर्थ में भी । मार्क्स समेत ज्यादातर चिंतकों के विचार इस प्रक्रिया से बाहर कोष्ठकों में बन्द विवरण भर हैं ।

आम आदमी के जीवन में यह संक्रमण तीन चरणों में आया है – पहला , जब आदमी कबीले के सम्मानित सदस्य के रूप में स्थित था , दूसरा , जब वह किसान बना और अपने उत्पादन के अधिशेष से व्यवस्था एवं इसके शीर्ष पर उपस्थित विभिन्न तरह के शोषक समूहों का पोषण करता रहा , और तीसरा जब वह आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था में सर्वहारा या श्रमिक बन अपने काम और आय दोनों के लिए पराश्रित बना । वर्तमान पूंजीवादी समाज में वह कौन सा काम करेगा और किन उपक्रमों में किन स्थितियों में करेगा , दूसरों द्वारा निर्धारित होता है । दरअसल इतिहास बतलाता है मनुष्य पूर्ण स्वायत्तता की स्थिति में सिर्फ प्रथम चरण में ही था जब वह सामूहिक शिकार या वनोपजों के संग्रह से जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था । उस काल में सभी लोग वास्तविक या कल्पित लहू के संबंध से सगे और सहयोगी थे । हाल के अनेक अध्ययनों से यह बात सिद्ध होती है कि उनके कठोर जीवन और आपसी खूनी संघर्षों की कहानी प्राय: विद्वानों द्वारा वर्तमान समाज में फैले द्वेष – राग का प्रचीन स्थितियों पर प्रक्षेपण का परिणाम है ।

झारखण्ड में हम एक विकृत रूप में विकास के इन तीनों खण्डों का सह – अस्तित्व पाते हैं । (१) यहाँ आज भी अनेक कबीलायी समूह हैं जो मूल्त: आखेट और वनोपजों के संग्रह से जीविका पाते हैं – हाँलाकि आधुनिक खदानों , उद्योगों और शहरीकरण ने उन्हें अति छोटे दायरों में सीमित कर दिया है । वे आज विलुप्त होने की कगार पर हैं । (२) वर्तमान भूमि व्यवस्था के तहत खेतीबारी करने वाले किसान और (३) खदानों , कारखानों , निर्माण कार्यों एवं परिवहन में कार्यरत मजदूर जो स्थायी या दिहाड़ी मजदूरी पर काम करते हैं ।

झारखण्ड की त्रासदी यह है कि यहाँ वनोपजों की भरमार है ( या थी )और खनिजों का विपुल भंडार है – शायद भारत के तमाम खनिजों के तीस से चालीस प्रतिशत तक । इसलिए जब से भारत में आधुनिक औद्योगीकरण ने अपना पांव पसारना शुरु किया तब से कोयला , लौह – अयस्क , और दूसरे खनिजों के लिए यहाँ के उर्वर वनों से हरे भरे प्रदेश की खदानों के लिए खुदाई शुरु हुई । और यह हरा भरा प्रदेश उबड़ खाबड़ खड्डों और खंडहरों का बियाबान बनने लगा ।  पारंपरिक जीवन के आधार से विस्थापित यहाँ के स्वस्थ और सुन्दर पुरुष और स्त्रियों को बिचौलियों के माध्यम से दूर दराज स्थानों पर उत्तर बंग से लेकर असम तक के चाय बगानों में काम करने के लिए ले जाया गया । वहाँ वे अपनी पूरी सांस्कृतिक विरासत से कट गये , और आज जहाँ हैं और जिस जमीन को उन्होंने अपने खून पसीने से सींचा और बनाया है ,उस पर भी उनके सत्व की स्वीकृति नहीं है । पारंपरिक जीवन के आधार के नष्ट होने से आजीविका के साधन से हीन यहाँ के लोगों को आज भी बड़ी संख्या में ठेकेदारों द्वारा कठोर अस्थायी निर्माण कार्यों के लिए बाहर ले जाया रहा है ।

दूसरी तरफ़ झाखण्ड के खदानों और कारखानों में काम करने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से बड़ी तादाद में श्रमिक यहाँ आये । वे भी अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पैदा की गयी दरिद्रता और विस्थापन की एक कहानी के साथ आये थे । अंग्रेजी शासन ने वहाँ भी दरिद्रता और अकाल की एक व्यवस्था पैदा की थी । अत्यधिक शोषण और शासकीय लापरवाही से कृषि व्यवस्था नष्ट हो गयी थी और अकालों का एक सिलसिला शुरु हुआ । दूसरी ओर औद्योगिक क्रांति के बाद के बर्तानी उद्योगों की प्रतिस्पर्धा और शासकीय पक्षपात के कारण वहां के पारंपरिक घरेलू उद्योग नष्ट हो गये और इनमें लगे शिल्पी बेरोजगार हो गये । इसी पृष्टभूमि में वहाँ से बड़ी संख्या में लोगों को बंधुआ मजदूरों के रूप में मॉरिशस , सुरीनाम , गायना, फिजी आदि में ले जाया गया । जो बाकी बचे उनमें बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में कोलकाता , जैसे महानगरों या फिर झारखण्ड की खदानों में काम करने आये । कुछ ऐसे ही कारणों से छत्तीसगढ़ और बिलासपुर से भी बड़ी संख्या में लोग झारखंड की खदानों में काम करने आये । इससे इस इलाके में विभिन्न स्थानों से आये मजदूरों में भी एक दूसरे के प्रति तनाव पैदा होता रहा है । कोयला या दूसरे अयस्कों की ढुलाई के खर्च से बचने के लिए कुछ बड़े औद्योगिक संयन्त्र टाटा , बोकारो , हटिया , सिंदरी  आदि में लगे । पर इनमें दक्षता और बड़ी आय वाले स्थानों पर प्राय: वैसे लोगों को लगाया गया जो विकसित औद्योगिक क्षेत्रों से आते थे और दक्षता वाले कामों में प्रशिक्षित थे । नये तरह के उद्योगों में रोजगार देने की क्षमता घटती जा रही है और इससे रोजगार के लिए प्रतिस्पर्धा और श्रमिकों के विभिन्न समूहों में आपसी तनाव बढ़ता गया है । लोग इस बात को नजरअंदाज करते रहे हैं कि समस्या के मूल में आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था ही है जो लगातार उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या ऑटोमेशन और कम्प्यूटरीकरण के जरिये घटाती चलती है । चूँकि उद्योग धन्धे मूलत: वहीं विकसित होते हैं जहाँ संरचनात्मक सुविधाओं का विकास हुआ होता है । उद्योग प्राय: वहीं फैलते हैं जहाँ  इनका आधार एक बार निर्मित हो चुका होता है । देश के हर हिस्से से लोग ऐसे औद्योगिक नगरों की ओर रुख करते हैं और काम नहीं मिलने पर उनकी झुग्गियों और झोपड़ पट्टी को आबाद करते हैं । इन स्थानों पर लोगों में प्राय: मूल , भाषा आदि के सवाल पर तनाव पैदा होता है ।  यूरोप के देशों में इस तरह का विरोध बाहर से काम की तलाश में आने वाले अप्रवासियों के खिलाफ़ होता है । झारखंड में भी यदा कदा इस तरह का तनाव विभिन्न मूल के लोगों के बीच देखा जा सकता है । इसके मूल में वर्तमान पूंजीवादी उद्योगों का चरित्र है जिस में स्थायी और अस्थायी बेरोजगारी निहित है । इससे सीमित रोजगार के लिए मजदूरों में छीना झपटी होती रहती है ।

( जारी )

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