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Archive for the ‘Maoist Ideology’ Category

श्री नवीन पटनायक,

मुख्यमंत्री, ओडिशा,

भुवनेश्वर, ओडिशा

 

प्रिय मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक जी,

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बहरहाल, नियमगिरी में अनिल अग्रवाल की इंग्लैण्ड की कम्पनी वेदान्त द्वारा खनन कराने अथवा न कराने के सन्दर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश से तथा न्यायपालिका की देखरेख में जनमत-संग्रह हुआ था जिसमें एक भी वोट वेदान्त द्वारा बॉक्साइट खनन के पक्ष में नहीं पड़ा था। आपकी सरकार से जुड़े माइनिंग कॉर्पोरेशन के अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदलवाने के प्रयास को न्यायपालिका ने अस्वीकार कर दिया है। आपके गृह विभाग को यह भलीभांति पता है कि प्रतिबन्धित भाकपा (माओवादी) ने जनमत संग्रह के बहिष्कार की अपील की थी। जनता ने जैसे वेदान्त द्वारा खनन को पूरी तरह से नकार दिया था, उसी प्रकार माओवादियों द्वारा जनमत-संग्रह बहिष्कार की अपील को भी पूरी तरह नकार दिया था।

इस परिस्थिति में ओडिशा पुलिस द्वारा नियमगिरी सुरक्षा समिति से जुडे कार्यकर्ताओं पर फर्जी मामले लादने और उन्हें ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताने की कार्रवाई नाटकीय, घृणित और जनमत की अनदेखी करते हुए वेदान्त कम्पनी के निहित स्वार्थ में है।

पुलिस द्वारा कुनी सिकाका की गिरफ्तारी, उसके ससुर तथा नियमगिरी सुरक्षा समिति के नेता श्री दधि पुसिका, दधि के पुत्र श्री जागिली तथा उसके कुछ पड़ोसियों को मीडिया के समक्ष ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताना ड्रामेबाजी है तथा इसे रोकने के लिए तत्काल आपके हस्तक्षेप की मैं मांग कर रहा हूं। कुनी, उसके ससुर और पड़ोसियों पर से तत्काल सभी मुकदमे हटा लीजिए जो आपकी पुलिस ने फर्जी तरीके से बेशर्मी से लगाए हैं।

इस पत्र के साथ मैं कुनी सिकाका के दो चित्र संलग्न कर रहा हूं। पहला चित्र सितम्बर 2014 में हमारे दल द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में का है जिसमें सर्वोदय नेता स्व. नारायण देसाई द्वारा कुनी को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया जा रहा है। दूसरे चित्र में कुनी इस संगोष्ठी को माइक पर संबोधित कर रही है और हमारे दल समाजवादी जन परिषद का बिल्ला लगाये हुए है।

तीसरा चित्र गत वर्ष 5 जून पृथ्‍वी दिवस के अवसर पर नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आयोजित खुले अधिवेशन का है। इस कार्यक्रम के मंच पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ पर्यावरण-अधिवक्ता के सामने कुनी बैठी है, मंच पर सुश्री मेधा पाटकर व प्रफुल्ल सामंतराय भी बैठे हैं। मैं भी इस कार्यक्रम में नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आमंत्रित था तथा वह चित्र मैंने खींचा है। कार्यक्रम में पूरा पुलिस बन्दोबस्त था तथा आपके खुफिया विभाग के कर्मी भी मौजूद थे।

संसदीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और संविधान सम्मत अहिंसक प्रतिकार करने वाली नियमगिरी सुरक्षा समिति को माओवादी करार देने की कुचेष्टा से आपकी सरकार को बचना चाहिए। राज्य की जनता,सर्वोच्च न्यायपालिका और पर्यावरण के हित का सम्मान कीजिए तथा एक अहिंसक आन्दोलन को माओवादी करार देने की आपकी पुलिस की कार्रवाई से बाज आइए।

चूंकि हमारी साथी कुनी सिकाका को गैर कानूनी तरीके से घर से ले जाने में अर्धसैनिक बल भी शामिल था इसलिए इस पत्र की प्रतिलिपि केन्द्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह को भी भेज रहा हूं। इस पत्र को सार्वजनिक भी कर रहा हूं।

 

विनीत,

अफलातून

महामंत्री, समाजवादी जन परिषद

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पिछला हिस्सा

इन छोटे-छोटे जनांदोलनों की जो कमी या विफलता है, वह यह है कि वे मिलकर व्यवस्था-परिवर्तन की कोई बड़ी धारा नहीं बना पा रहे हैं। एक-एक मुद्दे वाले इन आंदोलनों में कई बार वैचारिक-राजनैतिक दृष्टि का अभाव रहता है। इसीलिए वे कोई बड़ी शक्ल नहीं ले पा रहे हैं और कोई निरंतरता भी उनमें नहीं दिखाई देती है। उनके नेतृत्व की व्यक्तिवादिता तथा एनजीओ की भारी घुसपैठ भी दो बड़ी बाधाएं हैं। वास्तव में यह एक बड़ी चुनौती है। इन छोटे-छोटे जनांदोलनों में भी एक समय के बाद ठहराव आ जाता है। उनकी ऊर्जा को समेटते हुए, एक वैचारिक प्रक्रिया चलाते हुए, राजनैतिक दिशा देते हुए, एक देशव्यापी परिवर्तनवादी आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है।

माओ

पिछले महीने , २७-२८ मार्च को इलाहाबाद में देश के जनांदोलनों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े करीब एक सौ लोगों की बैठक इसी मकसद से हुई थी । इसका कोई ठोस नतीजा निकलेगा या नहीं,इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है । लेकिन इतना तय है कि अब छोटे ,एक-लक्ष्यी आंदोलनों से काम नहीं चलेगा । देश को बचाने के लिए परिवर्तन की धारा बहे , यह वक्त की पुकार है । आज के हालात १९७३ -७४ से ज्यादा अलग नहीं हैं ।

माओवादियों की विकास नीति क्या है ?

माओवादियों के रास्ते के बारे में भी कई सवाल स्वयं अरुंधती राय के वृतांत को पढ़ते हुए खड़े होते हैं। एक तो किस तरह का बर्बरीकरण सरल आदिवासी समाजों का हो रहा है, जब 17 साल की लड़की कमला कहती है कि उसे कोई और फिल्म अच्छी नहीं लगती ? वह सिर्फ एम्बुश (घात लगाकर हमला) वीडियो देखती है, जिनमें मानव शरीरों के परखच्चे उड़ जाते हैं। या फिर वह मां, जिसके बेटे को पुलिस ने मार दिया और लाश भी नहीं दी। वह कहती है कि वह खून का बदला खून से लेगी। या माओवादियों द्वारा विरोधी खेमे के आदिवासियों की सामूहिक हत्या। या किसी पुलिस के सिपाही का सिर धड़ से अलग कर देना। जब हम अदालतों द्वारा दी गई फांसी और मृत्युदंड को भी गलत मानते हैं और उनके विरुद्ध अभियान चलाए जाते हैं तब क्या इस तरह की हत्याएं उचित ठहराई जा सकती हैं ? हरियाणा की खाप पंचायतें और तालिबानी जन अदालतें हमें भयानक लगती हैं तब क्या गारंटी है कि माओवादी जन-अदालतों एवं बंदूकों की ताकत का दुरुपयोग नहीं होगा ?

अंतहीन हिंसा के इस दुष्चक्र में आखिरकार कौन मारे जा रहे हैं ? क्या गरीब आदिवासी या पुलिस व अर्ध फौजी बलों के सिपाही नहीं ? नारायणपुर में रहने वाले 4000 मुखबिर कौन होंगे ? क्या साधारण छोटे लोग नहीं ? सलवा जुडुम में भी तो शामिल आदिवासी लड़के ही हैं। अरुंधती को एक माओवादी आदिवासी युवक ने बताया कि उसका सगा भाई सलवा जुडुम का ’विशेष पुलिस अधिकारी’ है। वह चाहे भी  तो अब कभी लौट नहीं सकता। ऐसा कैसे हो गया कि आदिवासी एक दूसरे को मार रहे हैं ? हर समाज में कुछ गलत तत्व होते हैं, जो लालच एवं दुष्टता के शिकार हो जाते हैं। लेकिन क्या उनकी सजा मौत ही होगी ? क्या पश्चाताप सुधार या माफी की कोई गुंजाईश नहीं होगी ? यदि इस तरह की हिंसा को उचित माना जाएगा तो क्या तालिबानी आतंकवादियों को गलत कहा जा सकेगा ? अपनी समझ के मुताबिक वे भी तो एक महान और पवित्र उद्देश्य के लिए दूसरों को बम से उड़ा रहे हैं।

अरुंधती राय इन हालातों के लिए भारतीय राजसत्ता को दोषी ठहराती है। वे बहुत हद तक सही हैं। लेकिन क्या किशोरों और किशोरियों के हाथों में बंदूके थमाने वाले माओवादियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? सोच समझकर चुना गया चारु मजूमदार का ‘जन-संहार’ (एनिहिलेशन) का यह रास्ता कहां पहुंचाएगा ? क्या सचमुच इसकी राख से नया इंसानी समाज निकल पाएगा ?

माओवादी नेता किशनजी कहते हैं कि वे 2050 तक दिल्ली में अपना झंडा फहरा देंगें। इसे मान भी लिया जाए तो इसका मतलब है कि 40 साल तक हिंसा का यह भयानक दौर चलता रहेगा। इसका क्या नतीजा होगा ? क्या बाद के समाज पर भी इसकी छाया नहीं रहेगी ? अभी तक जितनी भी हिंसक क्रांतियां हुई हैं, उन्होंने तानाशाही को ही जन्म दिया है। कारण बहुत साफ है। जिनके पास बंदूक की ताकत होती है, उनको उसका नशा भी चढ़ जाता है। फिर लंबे समय तक हथियारबंद युद्ध लड़ने वाले क्रांतिकारी संगठनों का ढांचा लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। युद्ध में बहस या मतभेदों की जगह नहीं होती। वहां तो कमांडर को हुक्म मानना ही है। इसीलिए नक्सलवादियों में जरा भी मतभेद होने पर टूट हो जाती है और कल तक का साथी आज का दुश्मन नं० एक हो जाता है।

गांधी

ऐसे भूमिगत संघर्षों में असुरक्षा की भावना भी बहुत हावी रहती है। क्या मालूम कब कौन पुलिस का एजेन्ट निकल जाए ? इसलिए जिन औजारों और तरीकों से आप लड़ रहे हैं , लड़ाई का नतीजा और वैकल्पिक समाज का चरित्र भी कहीं न कहीं उनसे प्रभावित होगा । गांधी ने साधन और साध्य की सम्गति की बात अकारण या अमूर्त सिद्धान्त के तौर पर नहीं की थी । उसके पीछे मानव समाज के ठोस अनुभव थे ।

तर्क के लिए यह कहा जा सकता है कि पूंजीवादी व्यवस्था और राजसत्ता में भी बहुत हिंसा और तानाशाही छिपी है। और टूट तो गैर-हथियारबंद आंदोलनों में भी होती है। व्यक्तिवादिता, गुटबाजी और तानाशाही उनमें भी बहुत है। किन्तु दूसरों का दोष दिखानें से अपना दोष कम नहीं हो जाता। नया समाज गढ़ने की इच्छा रखने वालों को नये तरीके भी गढ़ने होंगें। खास तौर पर जब पिछली एक-डेढ़ सदी के अनुभव हमारे सामने हैं, जिनसे हम सीख सकते हैं।

हिंसा- अहिंसा की बहस अंतहीन है, क्योंकि अंत में यह मामला तर्क का नहीं, विश्वास का बन जाता है। लेकिन एक ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है विकास के मॉडल का, जो अरुंधती राय के मन में भी उठा है। जो माओवादी पार्टी आज बॉक्साईट या लौह अयस्क के खनन का विरोध कर रही है, कल उसका राज आएगा तो क्या होगा ? आधुनिक जीवन-शैली, भोगवाद, समृद्धि, आधुनिक उद्योगों, आधुनिक तकनालाजी, पर्यावरण आदि के बारे में उसके क्या विचार है ? आधुनिक विकास में तो इस तरह का खनन, विस्थापन और विनाश नीहित है।

कुछ समय पहले समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने खनन परियोजनाओं के संदर्भ में यह बात उठाई थी कि मामला सिर्फ विस्थापन और जंगलों के विनाश का नहीं है। इतना ज्यादा खनिज निकालने की जरुरत क्या है और यह किसके लिए है ? फेलिक्स और समरेन्द्र दास की ताजा किताब से और इसके पहले विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की खनन पर केन्द्रित नागरिक रपट से भी इसी तरह के सवाल निकलते हैं। इनके बारे में माओवादियों के विचार क्या है ? क्या वे आधुनिक विकास का मोह छोड़ने के लिए तैयार हैं ?

ये सवाल पूछना इसीलिए जरुरी है क्योंकि मार्क्सवादी समूहों में इन पर काफी संभ्रांति, उलझन और अस्पष्टता रही है। नेपाल के दोनों प्रमुख माओवादी नेताओं प्रचण्ड और बाबूराम भट्टराई के जो साक्षात्कार 2008 में प्रकाशित हुए, वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने कहा कि वे पनबिजली के लिए बड़े बांध बनाएंगे, पर्यटन को बढ़ावा देंगे, खेती का आधुनिकीकरण करेंगे, सरकारी-निजी भागीदारी को बढ़ावा देंगे और विदेशी पूंजी को भी आमंत्रित करेंगे। विश्व व्यापार संगठन से बाहर आने के बारे में उनका कोई फैसला नहीं है। भारत के माओवादियों के विचार भी क्या इसी तरह के हैं या इनसे अलग है? अलग हैं तो कितना ?

अरुंधती राय ने इस बात पर चुटकी ली कि कभी नक्सलवाद के प्रणेता चारु मजूमदार जो कहते थे, उस मंत्र का जाप आज नक्सलियों का दमन करने वाली भारत सरकार कर रही है – ‘चीन का रास्ता हमारा रास्ता है’। सवाल यह है कि चीन इस मुकाम पर कैसे पहुंचा ? तीसरी दुनिया के अनूठे एवं प्रेरणास्पद साम्यवादी मॉडल से वह घोर पूंजीवादी मुकाम पर कैसे पहुंच गया ? क्या इसके पीछे भी कहीं चीन के साम्यवादी शासकों के मन में आधुनिक विकास एवं समृद्धि की वही अवधारणा नहीं थी, जो पूंजीवादी औद्योगिक देशों की है ? भारतीय माओवादियों की मंजिल क्या है ? आज के चीन और उसके ‘बाजार समाजवाद’ के बारे में वे क्या सोचते हैं ? अच्छा होता यदि अरुंधती  राय इन सवालों को मन में न रखकर माओवादी नेताओं से पूछती, कुरेदती और उनके जबाब बाकी लोगों को बताती। उन पर एक बहस चल सकती थी। आखिर चीन की क्रांति भी बड़ी जबरदस्त थी, लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी थी। क्या फिर भारत में भी उतनी कुर्बानियां देकर उसी मुकाम पर पहुंचना है ?

जब दंतेवाडा का पुलिस अधीक्षक अरुंधति राय से कहता है कि अगर हर आदिवासी को एक टीवी दे दिया जाए तो उनका प्रतिरोध टूट सकता है,तो वह एक गहरी बात कह रहा है । अगर आदिवासी आज के वैश्विक बाजार , उपभोक्ता संस्कृति और उसकी ललक का हिस्सा बन गए तो उन्हें परास्त करना आसान हो जाएगा । मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम बताया था,पर समाजवादी चिंतक सच्चिदानन्द सिन्हा ने उपभोक्तावादी संस्कृति को गुलाम मानसिकता की अफ़ीम निरूपित किया है। इस तरह दंतेवाड़ा में दो अलग संस्कृतियों,सोच और जीवन मूल्यों की टकराहट भी है। आधुनिक विकास की टक्कर माओवादियों के अस्तित्व से हो रही है ।सवाल है कि माओवादियों की इस बारे में क्या दृष्टि है?

जैसे ही आधुनिक विकास पर सवाल उठते हैं, गांधी प्रासंगिक हो जाते हैं। अरुंधती राय ने माओवादियों को बंदूकधारी गांधीवादी कहा है। किन्तु गांधी के इस पक्ष हिंसा-अहिंसा पर माओवादी क्या सोचते हैं ? कोई अरुंधती को भी बता दे कि गांधी का मतलब सिर्फ भूख हड़ताल या जंगल में मजबूरी में सादगी से रहना नहीं है। न ही गांधीगिरी का मतलब महज किसी को फूल भेंट करना है। गांधी के पास एक वैकल्पिक विकास और वैकल्पिक सभ्यता की सोच है, जो समय के साथ ज्यादा जरुरी और ज्यादा प्रासंगिक होती जा रही है।

बीसवीं सदी में तीसरी दुनिया में दो बड़े क्रांतिकारी हुए है – गांधी और माओ। दोनों में कुछ समानताएं होते हुए भी दोनों की नयी दुनिया की कल्पनाएं अलग-अलग थी। माओ का रास्ता आजमाया जा चुका है। गांधी के सत्याग्रह के तरीके का उपयोग आजादी के आंदोलन में हुआ, किन्तु आजाद भारत के शासकों के विश्वासघात के कारण उनके विचारों का ‘स्वराज’ नहीं आ सका। अब दोनों विचारकों, उनकी विचारधाराओं और उनके प्रयोगों की सफलताओं – असफलताओं से सीखकर ही इक्कीसवीं सदी की क्रांति का पथ प्रशस्त हो सकेगा।

संदर्भ:

1.              अरुंधती राय, ‘वाकिंग विद द कॉमरेड्स’, आउटलुक, 29 मार्च 2010

2.              किशन पटनायक, ‘विजन्स ऑफ डेवलपमेंट: द इनएविटेबल नीड फॉर आल्टरनेटिव्ज’

फ्यूचर्स, नं. 36, 2004

3.              सुनील, ‘नेपाली माओवादियों की सीमाएं‘, जनसत्ता, 23जून, 2008

4.              सुनील, ‘लोकतंत्र और सत्याग्रह’, जनसत्ता, 2 दिसंबर, 2009

5.              फेलिक्स पैडल एवं समरेन्द्र दास, ‘आउट ऑफ दिस अर्थ: ईस्ट इंडिया                       आदिवासीज़ एंड द एल्युमिनियम कार्टेल’, 2010

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

– सुनील

ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)

पिन कोड: 461 111

मोबाईल 09425040452

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[ स्कूल के दौरान ही सुनील को गाँधीजी की आत्मकथा मिली थी और वे उससे प्रभावित हुए थे। मध्य प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में मेरिट सूची में स्थान पाने के बाद एक छोटे कस्बे से ही उन्होंने स्नातक की उपाधि ली। देश के अभिजात विश्वविद्यालय माने जाने वाले – जनेवि में दाखिला पाया । विद्यार्थी जीवन में ही लोकतांत्रिक समाजवाद में निष्ठा रखने वाले युवजनों की जमात से जुड़ गये । जलते असम और पंजाब के प्रति देश में चेतना जागृत करने के लिए साइकिल यात्रा और पदयात्रा आयोजित कीं । समता एरा और सामयिक वार्ता के सम्पादन से जुड़े रहे तथा दर्जनों पुस्तकें लिखीं और सम्पादित की। जनेवि में हरित क्रांति के प्रभावों पर पीएच.डी का काम छोड़ मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के केसला प्रखण्ड के किसान-आदिवासियों को संगठित करने में जुट गये ।गत पचीस वर्षों से उस क्षेत्र को वैकल्पिक राजनीति का सघन क्षेत्र बनाया है। दर्जनों बार जेल यात्राएं हुईं -सरकार द्वारा थोपे गये फर्जी मुकदमों के तहत । प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी के हक को लेकर सफल नये प्रयोग किए । देश में नई राजनैतिक ताकत की स्थापना के लिए समाजवादी जनपरिषद नामक दल की स्थापना करने वालों में प्रमुख रहे। माओवादी राजनीति की बाबत गंभीर अंतर्दृष्टि के साथ लिखा गया यह लम्बा लेख एक नई दिशा देगा। आज के ’जनसत्ता’ से साभार ।- अफ़लातून ]

सुनील

दंतेवाड़ा ने देश को दहला दिया है। यह साफ है कि दंतेवाड़ा,लालगढ़, मलकानगिरि जैसे कुछ आदिवासी इलाकों में माओवादियों ने अपने आजाद क्षेत्र बना लिये हैं, आदिवासियों का ठोस समर्थन और आदिवासी युवा उनके साथ हैं तथा वे पूरी तैयारी और सुविचारित रणनीति के साथ अपना युद्ध लड़ रहे हैं।

6 अप्रैल को दंतेवाड़ा में अभी तक की पुलिस व अर्धफौजी बलों की सबसे बड़ी क्षति हुई है। इस घटना की प्रतिक्रिया में रस्मी तौर पर बयान आ रहे हैं और तलाशी अभियान चल रहे हैं। कई बेगुनाहों को इस चक्कर में पकड़ा, मारा या सताया जाएगा। हिंसा और अत्याचारों का दौर दोनों तरफ चलता रहेगा। लेकिन इससे कुछ नहीं निकलेगा। हालात और बिगडे़गी। वक्त आ गया है कि जब देश गंभीरता से विचार करे कि ये हालातें क्यों पैदा हुई, माओवादियों का इतना जनाधार कैसे बढ़ा, सरल और शांतिप्रिय आदिवासी मरने व मारने पर क्यों उतारु हुए ? इस हिंसा की जड़ में क्या है ?

माओवाद या नक्सलवाद के बारे में देश आम तौर पर तभी सोचता है, जब ऐसी कोई बड़ी घटना होती है। मीडिया के जरिये कभी-कभी जो अन्य कहानियां या खबरें मिलती हैं, वे सतही और पूर्वाग्रहग्रस्त रहती हैं। ऐसी हालत में देश की एक बड़ी अंग्रेजी लेखिका अरुंधती राय ने करीब एक सप्ताह दंतेवाड़ा के जंगलों में सशस्त्र माओवादियों के साथ बिता कर उसका वृत्तांत ‘आउटलुक’ (29 मार्च, 2010) पत्रिका में देकर हमारा एक उपकार किया है। ऐसा नहीं है कि वे पूरी तरह निष्पक्ष है। माओवादियों के प्रति उनकी सराहना, सहानुभूति और उनका रोमांच साफ है। किन्तु इससे दूसरी तरफ की, अंदर की, बहुत सारी बातें जानने एवं समझने को मिलती है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछले काफी समय से सरकार ने इन इलाकों को सील कर रखा है और बाहर से किसी को जाने नहीं दे रही है। मेधा पाटेकर, संदीप पांडे या महिला दल की जनसुनवाई या पदयात्रा को भी सरकार और सरकारी गुर्गों ने होने नहीं दिया। उनकी घेरेबंदी को भेदकर, भारी जोखिम लेकर, काफी कष्ट सहकर, अरुंधती ने बड़ा काम किया है। भारत के बुद्धिजीवी जिस तरह से वातानुकूलित घेरों के अंदर बुद्धि-विलास तक सीमित होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए भी यह काबिले तारीफ है।

तीन संकट:

इस वृतांत से एक बात तो यह पता चलती है कि वहां के आदिवासियों का एक प्रमुख मुद्दा जमीन और जंगल (तेदूंपत्ता या बांस कटाई) की मजदूरी का रहा है। बड़े स्तर पर वनभूमि पर आदिवासियों का कब्जा करवाकर और वन विभाग के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाकर माओवादियों ने अपना ठोस जनाधार बनाया है। वास्तव में, देश के सारे जंगल वाले आदिवासी इलाकों में  तनाव, टकराव और जन-असंतोष का यह एक बड़ा कारण है। अब तो देश को यह अहसास होना चाहिए कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रुप से अन्याय हुआ है, भारत के वन कानून जन-विरोधी और आदिवासी – विरोधी हैं, आजादी के बाद हालातें नहीं बदली हैं, बल्कि राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारण्यों एवं टाईगर रिजर्वों के रुप में उनकी जिंदगियों पर नए हमले हुए हैं। संसद में पारित आधे-अधूरे वन अधिकार कानून से यह समस्या हल नहीं हुई है। जैसे नरेगा से रोजगार की समस्या हल नहीं हो सकती, सूचना के अधिकार से प्रशासनिक सुधार का काम पूरा नहीं हो जाता, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून से देश में भूख एवं कुपोषण खतम नहीं होने वाला हैं, उसी तरह वन-अधिकार कानून भी ज्यादातर एक दिखावा ही साबित हुआ है। भारत के जंगलों पर पहला अधिकार वहां रहने वाले लोगों का है, उनकी बुनियादी जरुरतें सुनिश्चित होनी चाहिए, तथा अंग्रेजों द्वारा कायम वन विभाग की नौकरशाही को तुरंत भंग करके स्थानीय भागीदारी से वनों की देखरेख का एक वैकल्पिक तंत्र बनाना चाहिए। भारत के जंगल क्षेत्रों में खदबदा रहे असंतोष का दूसरा कोई इलाज नहीं हैं। और यही जंगलों एवं वन्य प्राणियों के भी हित में होगा।

वैश्वीकरण के दौर में, निर्यातोन्मुखी विकास और राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर के चक्कर में, देशी विदेशी कंपनियों और सरकार के सहयोग से इन इलाकों के जल-जंगल-जमीन पर हमले का एक नया दौर शुरु हुआ है। खदानों व कारखानों के बेतहाशा करारनामे और समझौते हो रहे हैं। यदि सबका क्रियान्वयन हो गया, तो भारत के बड़े इलाकों से जंगल और आदिवासी दोनों साफ हो जाएंगे। सलवा जुडुम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के पीछे सरकार के जोर लगाने का एक बड़ा कारण यही है कि इन इलाकों में खनिज के भंडार भरे हुए हैं। सलवा जुडुम के लिए टाटा और एस्सार कंपनी ने भी पैसा दिया है, इस तरह के तथ्य सामने लाने का भी काम अरुंधती राय ने किया है। भारत के मौजूदा गृहमंत्री चिदंबरम साहब भी वेदांत एवं अन्य कंपनियों से जुडे़ रहे हैं। यह हमला व यह सांठगांठ देश में लगभग हर जगह चल रहा है। कई जगह लोग गैर-हथियारबंद तरीकों से लड़ रहे हैं। यदि देश को बचाना है, तो इस कंपनी साम्राज्यवाद को तत्काल रोकना होगा। यह दूसरा निष्कर्ष सिर्फ अरुंधती राय के लेख से नहीं, देश के कोने-कोने से आने वाली सैकड़ों रपटों व खबरों से निकलता है।

माओवाद के नाम पर इन तमाम गैर-हथियारबंद आंदोलनों को भी कुचला जा रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि भारतीय राजसत्ता और माओवादी दोनों के लिए यह स्थिति सुविधाजनक है और दोनों इसे बनाए रखना चाहते हैं। माओवाद प्रभावित इलाकों के आसपास के जिलों में भी अब कोई भी भ्रष्टाचार या पुलिस ज्यादतियों का मामला भी नहीं उठा सकता। उसे माओवादी कहकर जेल में सड़ा दिया जाएगा या फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाईश और जगह खतम होने से लोग मजबूर होकर माओवाद की शरण में जाएंगे, इसलिए यह माओवादियों के  हित में भी है। लालगढ़ में ‘‘पुलिस संत्रास बिरोधी जनसाधारणेर कमिटी’’, कलिंग नगर में टाटा कारखाने के विरोध में आंदोलन, नारायणपटना में अपनी जमीन वापसी की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी — ये सब गैर-हथियारबंद लोकतांत्रिक आंदोलन थे। इनके नेताओं को जेल में डालकर, इन पर लाठी – गोली चलाकर सरकार इनको माओवादियों की झोली में डाल रही है।

अतएव हमें तीसरा अहसास भारतीय लोकतंत्र पर छाए गंभीर संकट का होना चाहिए। भारतीय राजसत्ता जहां चाहे, जब चाहे, लोकतांत्रिक नियमों और मान-मर्यादाओं को ताक में रख देती है। विशेषकर जो इलाके और समुदाय भारत की मुख्य धारा के हिस्से नहीं है, जैसे पूर्वोत्तर और कश्मीर, दलित, आदिवासी और मुसलमान, उनके साथ वह बर्बरता और क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ जाती है। उसका बरताव वैसा ही होता है, जैसा एक तानाशाह का होता है। सशस्त्र संघर्ष तो अलग बात है, लोकतांत्रिक एवं अहिंसक तरीकों से होने वाले जनप्रतिरोध को भी उपेक्षित करने व कुचलने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आखिर दस वर्षों से चल रहा इरोम शर्मिला का अनशन तो एक गांधीवादी प्रतिरोध ही है, जो इस राजसत्ता की संवेदनशून्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अपने दमन और अत्याचारों से यह राजसत्ता लोगों को उल्टे हिंसा की और धकेलती एवं मजबूर करती है।

भारत में बढ़ता हुआ उग्रवाद, आतंकवाद और माओवाद कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र की गहरी विफलता की ओर इशारा करता है, जिसमें लोगों को अपनी समस्याओं और अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने तथा उनके निराकरण के जरिये नहीं मिल पा रहे हैं। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की इस विफलता को देश के मुख्य इलाकों के आम लोग भी महसूस कर रहे हैं। उनकी हताशा कम मतदान, आम बातचीत में नेताओं को गाली देने, तुरंत कानून अपने हाथ में लेने या हिंसा व आगजनी की घटनाओं में प्रकट होती है। देश की आजादी के बाद लोकतंत्र का जो ढांचा हमारे संविधान निर्माताओं ने अपनाया, वह शायद बहुत ज्यादा उपयुक्त नहीं था। अब पिछले छः दशकों के अनुभव के आधार पर इसकी समीक्षा करने का समय आ गया है। माओवादियों की तो इसमें कोई रुचि नहीं होगी कि इस ‘बुर्जुआ’ लोकतंत्र को बचाया जाए। लेकिन बाकी देशप्रेमी लोगों को इस लोकतंत्र की अच्छी बातों जैसे वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, कमजोर तबकों के लिए आरक्षण, आदि को संजोते हुए इसके ज्यादा विक्रेन्द्रित, जनता के ज्यादा नजदीक, नए वैकल्पिक ढांचे के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

इस लेख में अरुंधती राय ने विरोध के गांधीवादी, अहिंसक एवं लोकतांत्रिक तरीकों का कुछ हद तक मजाक उड़ाया है और बताया है कि वे सब असफल हो गए है। यह भी पूछा है कि आखिर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कौन-कौन सा दरवाजा नहीं खटखटाया ? वे बताना चाहती हैं कि हथियार उठाने, युद्ध लड़ने, सत्ता के मुखबिरों को मारने-काटने का जो रास्ता माओवादियों ने चुना है, उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। किन्तु क्या सचमुच ऐसा है ? पता नहीं, अरुंधती राय को मालूम है या नहीं, देश के कई हिस्सों में इस वक्त सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे आंदोलन चल रहे हैं जो सब लोकतांत्रिक और गैर-हथियारबंद है। वास्तव में माओवादियों के मुकाबले उनका दायरा काफी बड़ा है। सफलता-असफलता की उनकी स्थिति भी मिश्रित है, एकतरफा नहीं। बल्कि सूची बनाएं, तो ऐसे कई छोटे-छोटे जनांदोलन पिछले दो-ढाई दशक में हुए हैं जो विनाशकारी परियोजनाओं को रोकने के अपने सीमिति मकसद में सफल रहे हैं। झारखंड में कोयलकारो, उड़ीसा में गंधमार्दन, चिलिका, गोपालपुर, बलियापाल एवं कलिंगनगर, गोआ में डूपों और सेज विरोधी आंदोलन, महाराष्ट्र में नवी मुंबई और गोराई के सेज -विरोधी आंदोलन  आदि। बंगाल में सिंगुर और नन्दीग्राम में भी हिंसा जरुर हुई, लेकिन वे मूलतः लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर के आंदोलन थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन भले ही नर्मदा के बड़े बांधों को रोक नहीं पाया, लेकिन उसने बड़े बांधों और उससे जुड़े विकास के मॉडल पर एक बहस देश में खड़े करने में जरुर सफलता पाई। विस्थापितों की दुर्दशा के सवाल को भी वह एक बड़ा सवाल बना सका, नहीं तो पहले इसकी कोई चर्चा ही नहीं होती थी। लेकिन यह भी सही है कि नवउदारवादी दौर में राजसत्ता का जो दमनकारी चरित्र बनता जा रहा है, उसमें आंदोलन एवं प्रतिरोध करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। गांधी के देश में गांधी के रास्ते पर चलना कठिनतर होता जा रहा है। (जारी)

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* ” जो सरकार किसी भी प्रकार के लोकमत से चुनी गई हो ,चाहे वह फर्जी लोकमत ही क्यों न हो तथा कम से कम संवैधानिक- कानूनी दिखने वाली होगी वहाँ गुरिल्ला विद्रोह को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता,चूँकि शान्तिपूर्ण संघर्ष की संभावनाओं को पूरी तरह आजमाया नहीं जा चुका होता है । ” चे ग्वारा, गुरिल्ला वॉरफ़ेयर ,भाग १ ,पृष्ट १४। नेट पर

** संपूर्ण क्रान्ति के दौर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण लाखों की सभा में कहते थे , ’ माओ ने कहा कि राजनैतिक शक्ति का जन्म बन्दूक की नली से होता है । कितने लोगों को बन्दूक दिला सकते हो ? कोई थाना फूँक दोगे , डाकखाना फूँक दोगे,ये छिट-पुट छिट-पुट से काम नहीं चलेगा। हिंसा की बड़ी ताकत सरकार के पास है।बड़ी हिंसा छोटी हिंसा को दबाया दिया करती है। उसका मुकाबला अहिंसा से ही हो सकता है। ’जेल से ही स्वराज्य पैदा हुआ है । जेल से ही तुम्हारे अधिकार प्राप्त होंगे , जनता के अधिकार प्राप्त होंगे और सच्चा स्वराज्य मिलेगा।’ उन्होंने ५ जून ,१९७४ के ऐतिहासिक भाषण में कहा , ’यह संघर्ष अगर जन-संघर्ष है तो यह पुलिस के जवानों का भी है। क्या उनके सामने महँगाई का प्रश्न नहीं है, गरीबी का प्रश्न नहीं है ? उन्हें भी परिवार का पोषण करना है,बेटे की पढ़ाई का खर्च देना है ,बेटी की शादी करनी है ।’

भाकपा (माओवादी) हिंसा का रास्ता छोड़े । हिंसक कार्रवाई के लिए उसे साधन देश के बाहर से ही मिल रहे हैं । वैश्वीकरण और देश की प्राकृतिक सम्पदा की लूट के खिलाफ़ जहाँ जन आन्दोलन चल रहे हैं उन्हें सरकारी हिंसा के बल पर दबाने का अवसर माओवादियों की रणनीति से मिल रहा है ।

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पिछले भाग से आगे :

वैसे तो यह औद्योगिक व्यवस्था पूंजीवाद द्वारा पैदा की गयी है जिसमें निजी स्वामित्व की प्रधानता है , लेकिन धीरे धीरे उद्योगों का यह ढांचा , जो वृहद कॉर्पोरेशनों के रूप में विकसित हुआ है , पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियन्त्रण से मुक्त हो एक स्वतंत्र स्वरूप धारण करने लगा है और इसका मूल रुझान पूर्ववत श्रम और संसाधनों के शोषण से प्रतिष्ठानों के लिए ज्यादा मुनाफा कमाना होता है । विख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री गालब्रेथ ने विकसित हो रहे स्वायत्त पूंजी के व्यवस्थापकों के इस समूह को ’टेक्नोस्ट्रक्चर’ का नाम दिया था । निजी या सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में इनकी व्यवस्था को चलाने के लिए व्यवस्थापकों और नौकरशाहों का ऐसा ही संवेदनहीन ढांचा तैयार हुआ है जिसका एक मात्र लक्ष्य अपना विस्तार करना और कॉर्पोरेशन के मुनाफे को बढ़ाना भर है । सार्वजनिक क्षेत्र के कॉर्पोरेशन एक अर्थ में जरूर भिन्न होते हैं।  इनके मुनाफे पर एक हद तक – जहाँ लोकतंत्र है, जन प्रतिनिधियों का नियन्त्रण होता है । लेकिन इनकी मूल प्रवृत्तियाँ निजी पूंजीवादी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होतीं । और इसी कारण यह भी पूंजीवादी व्यवस्था के फैलाव और संकोच के व्यापार चक्र से बिल्कुल मुक्त नहीं होते । चूँकि बुनियादी तौर से यह निजी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होते सरकारें जब चाहें तो विनिवेश द्वारा इनकी पूँजी को निजी क्षेत्र में स्थानान्तरित कर सकती है – जैसा हाल में मनमोहन सिंह सरकार ने एन.टी.पी.सी में किया है ।

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

समग्र रूप से यह पूंजीवादी कॉर्पोरेटी दुनिया आम आदमियों , विशेष कर आदिवासियों और किसानों के जीवन पर कहर बरसाती है | जिस औपनिवेशिक शोषण के बल पूंजीवाद का विकास हुआ है वह शोषण और भी भयावह होता जा रहा है क्योंकि इस व्यवस्था की संसाधनों की भूख असीम है । इसका सरल सूत्र है – अधिक मुनाफे के लिए अधिक उत्पादन चाहिए और अधिक उत्पादन के लिए अधिक संसाधान यानी अधिक जंगल की कटाई , अधिक खनिजों का खनन , अधिक अन्न और दूसरे कृषिजन्य कच्चे माल । इनके संयन्त्रों के लिए भूमि और सबसे ऊपर व्यापार के लिए परिवहन का तानाबाना चाहिए , ताकि सभी दूरदराज स्थानों को यह ऑक्टोपस (अष्टपाद) की तरह अपनी गिरफ़्त में ले सकें । पिछले दिनों ’स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन ’के नाम पर और सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर एक्सप्रेस वे एवं हाईवे के लिए देश भर में भूमि अधिग्रहण का सिलसिला चलाया जा रहा है । इन्हीं के खिलाफ़ प्रतिरोध से सिंगूर और नन्दीग्राम की त्रासदीपूर्ण घटनाएं हुई हैं । इसके पहले उड़ीसा , छत्तीसगढ़  और स्वयं झारखण्ड में देशी , विदेशी बड़ी कंपनियों द्वारा आदिवासियों और किसानों की जमीन पर सरकारी बल के सहारे अधिग्रहण के ऐसे प्रयास लगातार होते रहे हैं और जगह जगह इनके खिलाफ़ आन्दोलन होते रहे हैं जिन्हें दबाने की कोशिश भी होती रही है । जहाँ तहाँ माओवादी गतिविधियों में उभार में भी यह जन प्रतिरोध प्रतिबिंबित होता है । जब भारत के प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह “नक्सली हिंसा” को देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बताते हैं तो उनकी चिंता व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए संसाधनों की उपलब्धि की ही है । विश्व बैंक की आर्थिक नीति को देश में लागू करने में अग्रिम भूमिका निभाने वाले हमारे प्रधान मन्त्री का यह रुख स्वाभाविक है ।

लेकिन हमारे माओवादी मित्र भी लगभग वैसे ही दृष्टिकोण के शिकार हैं । अगर उन्होंने माओ के देश चीन पर ध्यान दिया होता तो वे माओवाद की जगह समाज परिवर्तन की किसी वैकल्पिक नीति की तलाश करते । माओ के चीन में आज क्या हो रहा है ?  माओ के नेतृत्व में चालीस वर्ष से अधिक तक चलने वाले आन्दोलन – जिसमें अनगिनत लोगों ने अपनी आहुति – का अन्तिम परिणाम क्या हुआ? आज चीन पूंजीवादी विकास और कॉर्पोरेटी व्यवस्था का सबसे सशक्त और निर्मम नमूना है । वहाँ की सालाना विकास दर भारत से भी कहीं ज्यादा है , जो कभी १२ प्रतिशत पार कर गयी थी । लेकिन इसका फायदा वहाँ के नवोदित पूंजीपति वर्ग और व्यवस्थापक वर्ग को मिल रहा है , जिनकी सुविधायें पश्चिमी दुनिया के संपन्नों की बराबरी कर रही हैं । लेकिन आम किसानों और मजदूरों की स्थिति दर्दनाक बनी हुई है । सरकार को उनकी सुरक्षा की चिंता इतनी कम है कि हजारों लोग कोयला खदानों की दुर्घतनाओं में मरते रहते हैं । माओवादी मित्रों को इस पर विचार करना चाहिए कि वे माओ की तर्ज पर खूनी क्रांति में स्वयं अपनी और हजारों दूसरे प्रतिबद्ध लोगों की शहादत से फिर चीन जैसा ही पूंजीवादी ढांचा तैयार करना चाहते हैं क्या ? वैसे ढाचे में तो आदिवासी और किसान वैसे ही विस्थापित होंगे और कुचले जायेंगे जैसे भारत और दुनिया के दूसरे देशों में पूंजीवादी विकास के क्रम में हो रहा है । देंग या कुछ दूसरे व्यक्तियों पर इस “भटकाव” की जवाबदेही डाल हम गंभीर सामाजिक विश्लेषण से बच नहीं सकते ।

सजप सम्मेलन धनबाद

सजप सम्मेलन धनबाद

समाजवादी जन परिषद बुनियादी तौर से ऐसे विकास को ( भले ही वह समाजवाद के नाम पर हो रहा हो ) नकारती रही है और आगे भी नकारती रहेगी । हमें एक ऐसे वैकल्पिक ढांचे की तलाश जारी रखनी होगी जिसमें मेहनतकशों की स्वायत्तता और व्यवस्था की मानवीयता बनी रहे । हमें स्पष्ट रूप से यह घोषित करना है कि किसानों और आदिवासियों के जीवन पर आघात करने वाली किसी विकास की व्यवस्था को हम स्वीकार नहीं करेंगे । हमें ऐसी छोटी राजकीय और आर्थिक इकाइयाँ विकसित करने की दिशा में पहल करना होगा जिसमें आदमी पूरे अर्थ में स्वतंत्र हो और अपनी व्यवस्था बनाने के लिए उसे पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त हो । खनिजों की खुदाई के लिए किसानों और आदिवासियों के विस्थापन का हम शुरु से विरोध करते रहे हैं। बाल्को के गंधमार्दन में बॉक्साईट खनन का अहिंसक विरोध समता संगठन ( जिसके प्रयासों से बाद में समाजवादी जनपरिषद का निर्माण हुआ ) ने कुछ दूसरे सहयोगी संगठनों के साथ किया था और उसमें एक हद की सफलता भी मिली थी। हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि आगे भी हम सदा ऐसा अहिंसक प्रतिरोध जारी रखेंगे ।

ऐसे अहिंसक संघर्षों की श्रृंखला से ही भविष्य में वह वातावरण तैयार होगा जिसमें एक वैकल्पिक समाज व्यवस्था – जो केन्द्रीकृत राज्य व्यवस्था और विशाल पूंजीवादी और नौकरशाही शोषण से समाज को मुक्त कर सके – अस्तित्व में आये । समाजवादी जनपरिषद को अपने इस प्रयास में देश के तमाम शोषित लोगों , आदिवासियों , किसानों ,  मजदूरों एवं बुद्धिजीवियों को शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए । हमें लोगों को सचेत करना चाहिए कि प्राकृतिक संपदा के अन्धाधुंध दोहन की मुहिम को वर्तमान औद्योगिक विकास और उपभोक्तावादी संस्कृति से अलग कर नहीं देखें ।  जो लोग आज की विकास प्रक्रिया को तो कबूल करते हैं पर जल , जंगल , और जमीन के कॉर्पोरेटी अधिग्रहण का विरोध करते हैं , वे स्वयं अपने को और तमाम जनता को भ्रम में डालते हैं । दोनों का अनिवार्य संबंध है इस सत्य को हमें उजागर करते रहना है ।

हमारा पिछला राष्ट्रीय सम्मेलन सत्याग्रह आन्दोलन के शताब्दी वर्ष में हुआ था । आज का सम्मेलन “हिन्द स्वराज” के शताब्दी वर्ष में हो रहा है । आज की व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष के क्रम में विकेन्द्रित ग्राम गणतंत्र की दिशा में समाज को ले जाने के प्रयास में “हिन्द स्वराज” की मूल कल्पना से प्रेरणा मिलेगी यह आशा है ।

– सच्चिदानन्द सिन्हा , धनबाद ,२८ अक्टूबर , २००९ .

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पिछला भाग (नेपाली माओवादियों के समाजवाद की सीमा)।

कृषि के क्षेत्र में माओवादी भूमि – सुधारों और आधुनिकीकरण पर जोर देते हैं । भट्टराई कहते हैं कि हम अनुपस्थित जमींदारों को खतम करेंगे और जोतनेवाले को जमीन का मालिक बनाएंगे । गरीब किसानों की सहकारी समितियाँ बनाएंगे । विश्व बैंक और खाद्य एवं कृषि संगठन की निर्यातोन्मुखी खेती की नीति पर चलने के बजाय देश की जरूरतों के लिए अनाज उत्पादन एवं खाद्य सुरक्षा पर जोर देंगे । इसी के साथ हम खेती का आधुनिकीकरण करेंगे , जिसका मतलब मशीनीकरण , आधुनिक सिंचाई आदि होगा । जब प्रश्नकर्ता ने भट्टराई से पूछा कि आपके शोधप्रबन्ध में नेपाल की खेती के विकास को नापने के लिए प्रचलित मानदण्डों जैसे रासायनिक खाद का उपयोग , मशीनों का उपयोग , भूमि का संकेन्द्रण आदि का इस्तेमाल किया गया तो भट्टराई सफाई में कहते हैं कि आंकड़ों की कमी की वजह से उन्होंने ऐसा किया । किंतु कृषि विकास की इस प्रचलित अवधारणा में कोई दिक्कत है , यह फिर भट्टराई की बातों में दिखाई नहीं देता ।

    नेपाली माओवादियों के यह विचार काफ़ी निराशाजनक हैं । राजशाही और सामंतवाद के खिलाफ बहादुरीपूर्ण संघर्ष के बाद नये नेपाल का निर्माण कैसे किया जाये , इसके बारे में उनके विचार वही पुराने हैं , जिनमें पिछली एक सदी के अनुभवों की कोई झलक नहीं मिलती । ऐसा प्रतीत होता है कि उनके दिमाग में इतिहास की वही यूरोपीय समझ बैठी हुई है कि सामंतवाद के बाद औद्योगिक पूंजीवाद का विकास अनिवार्य है , समाजवाद को लाने का कोई गैर- पूंजीवादी , गैर- यूरोपीय रास्ता नहीं हो सकता । इतिहास की इसी गलत समझ के कारण सोवियत संघ , चीन और पूर्वी यूरोप के साम्यवादी शासकों ने भारी औद्योगीकरण का गलत रास्ता अपनाया और इस चक्कर में किसानों , गांवों  और पिछड़े इलाकों का दोहन शोषण किया व आंतरिक उपनिवेश बनाए । आधुनिक किस्म के औद्योगीकरण में में बाहरी या आंतरिक उपनिवेशों का निर्माण , श्रम का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शोषण एवं प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन एवं विनाश अनिवार्य रूप से निहित है । इसी राह के अंतर्विरोध    अंतत: सोवियत , चीनी , पूर्वी यूरोपीय साम्यवाद को ले डूबे । लेकिन लगता है कि नेपाली माओवादी अभी तक इस सच्चाई को समझ नहीं पाए हैं ।

    उनके मन में शायद नेपाल की विशाल बेरोजगारी की समस्या छाई है , जिसे दूर करने के लिए वे औद्योगिक पूंजीवाद की वकालत कर रहे हैं और विदेशी पूंजी एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भी आमंत्रित करना चाहते हैं । लेकिन इस मामले में भी वे एक और बड़ा भ्रम पाले हुए हैं । सच तो यह है कि आधुनिक औद्योगीकरण से दुनिया में कहीं भी , इतिहास के किसी भी दौर में बेरोजगारी दूर नहीं हुई है बल्कि पैदा हुई है व बढ़ी है । ब्रिटेन व पश्चिमी यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के दौर में खेती व ग्रामोद्योगों के विनाश – विस्थापन एवं मशीनीकरण से भारी बेरोजगारी पैदा हुई , जिसे स्वयं मार्क्स ने ‘श्रम की सुरक्षित फौज’ कहा तथा उद्योगों के लिये सस्ते मजदूर उपलब्ध कराने के रूप में पूंजीवाद के विकास में उसकी अहम भूमिका को मंजूर की । यूरोप की यह बेरोजगारी औद्योगीकरण से नहीं , बड़े पैमाने पर अमरीका , अफ्रीका , एशिया और ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीयों के प्रवास से दूर हुई । दूसरे शब्दों में , साम्राज्य निर्माण , औपनिवेशिक लूट और शोषण का इस औद्योगिक पूंजीवाद से गहरा रिश्ता था और आज भी है । नेपाल के माओवादी इस रिश्ते को कैसे भूल सकते हैं ? वे कहाँ से उपनिवेश लाएंगे ? या देश के अंदर गांवों को व पिछड़े इलाकों को उपनिवेश बनाएंगे ?

    भारत के अंदर आजकल औद्योगीकरण और विकास के सवालों पर काफी बहस , विरोध व विवाद चल रहा है । नर्मदा , नन्दीग्राम , सिंगूर , कलिंगनगर , काशीपुर जैसे संघर्षों ने इन विवादों को हवा दी है । अचरज की बात है कि नेपाल के माओवादी नेताओं ने बिल्कुल बगल के पड़ोसी देश के इन द्वन्द्वों और विसंगतियों पर भी गौर करने की जरूरत नहीं समझी । स्वयं नेपाल में पनबिजली की बड़ी परियोजनाओं से जो बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा या पयतन से जो सामाजिक – सांस्कृतिक दुष्प्रभाव होंगे , उनके बारे में भी माओवादी मौन हैं ।

    जल – जंगल – जमीन के सवाल आज पूरी दुनिया में उठ रहे हैं । प्राकृतिक संसाधन दुनिया के संघर्षों के केन्द्र में आ गए हैं । विस्थापन का विरोध अंतर्राष्ट्रीय रूप लेता जा रहा है । आधुनिक विकास , औद्योगीकरण और आधुनिक जीवनशैली की विडम्बनाएं तथा उनके कारण पैदा संकट जग जाहिर हो चुके हैं । पर्यावरण के संकट व जलवायु परिवर्तन के खतरे पूरी दुनिया की चिंता का विषय है । इन सारे सवालों के बारे में लेशमात्र की जागरूकता भी प्रचण्ड एवं भट्टराई के विचारों में नहीं झलकती । ऐसा लगता है कि वे एक सदी पहली की मार्क्सवादी दुनिया में जी रहें हैं ।

    [ जारी , अगली किश्त में समाप्य ] 

   

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(नेपाली) माओवादियोँ के समाजवाद की सीमायेँ / सुनील

यह एक इतिहास का चमत्कार माना जाएगा कि जब पूरी दुनिया मेँ साम्यवादी धारा का पराभव हो चुका है या हो रहा है , नेपाल मेँ एक माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी बड़ी ताकत के रूप में उभर कर आई है और सत्ता पर काबिज हुई है | नेपाल में राजशाही के अंत में इसकी प्रमुख भूमिका रही है | हथियारबन्द लड़ाई लड़ते लड़ते हथियार छो्ड़कर मतपेटी का रास्ता सत्ता में आने के लिये इसने अपनाया है , यह इतिहास का दूसरा चमत्कार है| हिमालय की तराई में बसे इस गरीब , पहाड़ी मुल्क में हो रहे परिवर्तनों पर दुनिया की नजर है| वामपंथी , प्रगतिशील ,परिवर्तनादी लोग तो इसे विशेष कौतूहल और आशा से देख रहे हैं |
संविधान सभा के जिस चुनाव में नेपाल की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जीत कर आई है , उसमें उसने एक ‘नया नेपाल’ बनाने का नारा दिया था | यह नया नेपाल कैसा होगा , नेपाली माओवादियों का साम्यवाद कैसा होगा , इसकी कुछ तस्वीर इसके दो प्रमुख नेताओं के पिछले दिनों प्रकाशित साक्षात्कारों से मिलती है| पार्टी के अध्यक्ष श्री प्रचन्ड का एक लम्बा साक्षात्कार ‘द हिन्दू’ अखबार में दि दिनों तक आया 28 एवं 29 अप्रैल 2008 को प्रकाशित हुआ है | पार्टी के दूसरे प्रमुख नेता और प्रमुख विचारक श्री बाबूराम भट्टराई का लम्बा साक्षात्कार ‘इकानामिक एण्ड पालिटिकल वीकली ‘ के 10 मई 2008 के अंक में प्रकाशित हुआ है | अन्यत्र प्रकाशित रपटों व समाचारों में भी उनके विचारों व रुझानों के झलक मिलती है |
एक महत्वपूर्ण बात बहुदलीय लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता की है | जो पार्टी कल तक सशस्त्र क्रांति की लाईन पर चल रही थी , उसके अध्यक्ष प्रचण्ड कहते हैं ,
” जब जनयुद्ध चल रहा था , तभी हम, इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि समाजवाद में भी बहुदलीय प्रतिस्पर्धा जरूरी होगी | न केवल लोकतांत्रिक क्रांति के दौर में ,बल्कि समाजवाद के दौर में भी,यदि बहुदलीय प्रतिस्पर्धा नहीं होगी , एक जीवंत समाज बनाना संभव नहीं होगा |”

प्रचंड यह भी कहते हैं कि ,
“हम जो कर रहे हैं ,उससे सिर्फ भारतीय माओवादियों को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में माओवादियों को एक सशक्त सन्देश जाएगा कि किसे नेपाली माओवादी बंदूक से वोट तक पहुंचे , कैसे उन्होंने नेपाली जनता के दिलों व दिमागों को प्रभावित किया व जीता ,कैसे वे सरकार का नेत्रुत्व करने और एक नया संविधान बनाने की स्थिति में आए |”
नेपाली माओवादियों के नेताओं के विचारों की सीमाओं का पता चलता है , जब वे आर्थिक सवालों पर बात करते हैं | वे बार- बार खते हैं कि हम पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हैं , हमारी लडाई सामंतवाद एवं राजशाही से है | भट्टराई कहते हैं कि हम परजीवी एवं नौकरशाही पूंजीवाद के खिलाफ तो हैं , लेकिन उत्पादक एवं  औद्योगिक पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हैं |हम राष्ट्रीय पूंजीवाद को बढ़ावा देना चाहते हैं | फिलहाल इस अंतरिम दौर में हम ऐसे औद्योगिक पूंजीवाद को बढाना चाहेंगे , जिसका रुझान समाजवाद की तरफ हो | इसीसे हम रोजगार पैदा कर पाएंगे और उत्पादक शक्तियों का विकास कर पाएंगे |

संविधान सभा के चुनाव मेँ जीतने के बाद काठमाण्डू के एक होटल मेँ बडी तादाद में मौजूद उद्योगपतियों और व्यापारियों के साथ बैठक में प्रचण्ड एवं भट्टराई ने जो कहा , वह भी गौरतलब है |
भट्टराई ने कहा ,
” हमारी लड़ाई पूंजीवाद से नहीं है | यह सामंतवाद के खिलाफ है | हम सरकारी-निजी भागीदारी (पब्लिक-प्राईवेट पार्टनरशिप) में विश्वास करते हैं | सामूहिकीकरण ,समाजीकरण और राष्ट्रीयकरण हमारे वर्तमान एजेण्डे में नहीं है | हमें बडे पैमाने पर रोजगार पैदा करना है ,जिसके लिए पनबिजली , पर्यटन आदि में पूंजीनिवेश और क्षमताओं के अधिकतम उपयोग की जरूरत है |”
इस औद्योगिक पूंजीवाद में विदेशी पूंजी की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर भट्टराई उससे पूरी तरह इंकार नहीं करते हैं | वे कहते हैं कि हमारा मुख्य जोर आंतरिक संसाधनों को जुटाने पर होगा , लेकिन दीर्घकालीन विकास के लिये और आधारभूत ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) में निवेश के लिये हमें अंतर्राष्ट्रीय पूंजी की जरूरत होगी| हम उनके साथ सम्पर्क में हैं व चर्चा कर रहे हैं | इसका मतलब है कि भट्टराई आश्वस्त कर रहे हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये नेपाल के दरवाजे बन्द नहीं होंगे | पता चला है कि विश्व बैंक के प्रतिनिधियों के साथ भी माओवादी नेताओं की चर्चा हुई है | विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता के बारे में पूछने पर भट्टराई कहते हैं कि विश्व व्यापार संगठन से पूरी तरह आना संभव नहीं है , इसके अन्दर रहना भी कठिन है | इस मामले में हम दुविधा में हैं और हमने इस बारे में औपचारिक रूप से कोई नीति तय नहीं की है |
[ जारी ]

 

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