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Archive for the ‘media’ Category

समाजवादी जन परिषद के नेता साथी सुनील की स्मृति में आयोजित 6ठे सुनील स्मृति व्याख्यान का विषय था जीवंत लोकतंत्र और मीडिया। भाषण देने वाले थे प्रख्यात पत्रकार रवीश कुमार –

जीवंत लोकतंत्र और मीडिया,रवीश कुमार : सुनील स्मृति व्याख्यान

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15 अगस्त 2006 को ‘समाजवादी जनपरिषद’ नाम से ब्लागर पर हिन्दी चिट्ठा शुरु किया था । 14 दिनों बाद ही लगा कि निजी कम्पनी(गूगल) पर पूरी तरह आश्रित होना ठीक नहीं । सो , ‘ओपन सोर्स’ में यकीन रखने वाले वर्डप्रेस पर भी आ गया । नेट पर देवनागरी टंकण सीखने के पहले दिसम्बर 2003  में अंग्रेजी चिट्ठा बना लिया था ।
यह मेरी हिन्दी चिट्ठे की पहली पोस्ट  है । उस वक्त हिन्दी चिट्ठों की नई पोस्ट दिखाने के लिए एक मात्र संकलक या एग्रीगेटर ‘नारद’ था। मेरे चिट्ठों को नारद से जोडने में चार महीने लगे। इन चार महीनों में भूले भटके पाठक ही पहुंचते थे। कुछ दोस्तों ने अपने चिट्ठों पर लिंक दी थी , उनसे कुछ पाठक पहुंच जाते थे। साल भर पूरा किया तो उस वक्त के धुरंधर चिट्ठेकारों से भरपूर प्रोत्साहन मिला ।
वर्डप्रेस अपने ब्लगर्स को काफी तफसील में आंकडे देता है । दो साल पूरा होने पर मैंने इन आंकडों को प्रस्तुत किया –  इन्हें
१५ अगस्त की तारीख चुनने के पीछे १९४२ की एक शहादत की स्मृति थी ।

हिन्दी चिट्ठों की प्रविष्टियों को दिखाने वाला दूसरे संकलक चिट्ठाजगत और ब्लागवाणी भी आए और चले गये । संकलकों पर आश्रित हिन्दी चिट्ठेकारी का भारी नुकसान इनके बन्द हो जाने से हुआ । अपने चिट्ठों में नित्य-नूतन प्रविष्टियां डालने में जो सातत्य था वह टूटा ।लोग अपने ब्लागों पर जितना लिखते थे और जितनी गंभीरता से लिखते थे वह कम हो गया है। बने बनाये आकर्षक स्वरूप वाले फेसबुक ने रही-सही कसर पूरी कर दी है । फेसबुक पर छपी कृतियों पर लेखक का नहीं फेसबुक का हक हो जाता है – यह चिन्ता की बात है । फेसबुक के हिन्दी सदस्यों में समुदाय या समूह विकसित नहीं हुए हैं । मराठी में फेसबुक पर ‘अस्वस्थ भारत’ जैसे पृष्ट पर अच्छी बहस भी चलती है ।

हिन्दी लिखने वाले तरुण मित्रों से मेरी हार्दिक गुजारिश है कि वे चिट्ठेकारी अथवा ब्लागिंग से जुडें और उन पर सतत लिखें । पुराने ब्लागर मित्रों से भी निवेदन कर रहा हूं कि अपना सृजनात्मक लेखन अपने ब्लाग पर प्रकाशित करना न भूलें । मैं भी अपने चिट्ठों पर ज्यादा लिखने का प्रयास करूंगा ।

 

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बड़े मीडिया के अधिकांश अंग्रेजी स्तम्भ लेखकों के लेखों में चालाकी का भारी पुट रहता है । चालाकी एक प्रकार की बेईमानी है । आउटलुक (१० अप्रैल , २००१) में प्रेमशंकर झा तहलका से प्रकट हुए भ्रष्टाचार पर अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए जो लिखते हैं उसके पीछे उनका सामाजिक दर्शन भी छुपा हुआ है । सामाजिक दर्शन इस प्रकार है : समाज इसी तरह चलता रहेगा ; व्यक्ति-जीवन में भोग एकमात्र लक्ष्य है ; सामाजिक सन्दर्भ में उसको प्राप्त करने के लिए नैतिकता का पक्ष लेना पड़ेगा और भ्रष्टाचार की निन्दा करनी होगी ; क्योंकि समाज को चलाये रखना है ; अन्यथा नैतिकता कुछ होती नहीं है ।

प्रेमशंकर झा का कहना है कि बंगारु लक्ष्मण , जया जेटली और जार्ज फर्नांडीज चोर हैं । उनके निर्दोष होने की कल्पना करके और जार्ज को राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (राजग) के संयोजक के रूप में बरकरार रखकर प्रधानमन्त्री ने भारी गलती की है । जाँच के पहले इन राजनैतिक नेताओं को निर्दोष समझना और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कदम नहीं उठाना भ्रष्टाचार से समझौता है ।

ये बातें सही हैं और भाजपा के सारे विरोधी भी यही बात कर रहे हैं । यह बात भी सही है कि जाँच से कुछ निकलता नहीं है और निकले भी तो मुकदमा चलाकर कभी किसी बड़े नौकरशाह या नेता को कठोर दंड देने की मिसाल स्मृति में नहीं आती है । हवाला कांड का क्या हुआ ? शेयर घोटाले का क्या हुआ ?

राजनैतिक नेताओं को नरक में ढकेलने के बाद प्रेमशंकर झा एक नौकरशाह को स्वर्ग में स्थापित करने के लिए अंगरेजी के चुने हुए शब्दों का इस्तेमाल करते हैं । वे इस आदमी का वर्णन ” भारत के सार्वजनिक संगठनों का योग्यतम नौकरशाह ” के रूप में करते हैं जिसको कुछ साल पहले ” अनावश्यक ही गर्मी के दिनों में सुविधाविहीन तिहाड़ जेल में रखा गया था , जबकि अदालत में वह निर्दोष पाया गया , क्योंकि पुलिस के पास प्रमाण नाम की चीज नहीं थी । ” वे उस घोटाले का नाम भी नहीं बताते है जिसके यह शख्स यानी बी. कृष्णमूर्ति प्रधान खलनायक थे ।  यह था उदारीकरण युग का पहला भ्यावह घोटाला , जिसके बारे में एक भारी-भरकम जाँच हुई और रिपोर्ट भी बढ़िया ढंग से तैयार हुई , लेकिन अन्त में किसी भी नामी आदमी को जेल में जीवन नहीं बिताना पड़ा । कारण , पुलिस के पास प्रमाण नहीं थे । एक तरफ जाँच के पहले एक अभियुक्त को प्रधानमन्त्री निर्दोष होने की मान्यता दे रहे हैं , दूसरी तरफ़ अदालत में अभियोग प्रमाणित न होने के कारण झा जीउस अभियुक्त को सर्वश्रेष्ठ नौकरशाह का खिताब दे रहे हैं और मुकदमे के पहले दिए गए दंड को बर्बरता कह रहे हैं । दोनों ही गलत प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं । अंगरेजी का स्तंभ लेखक नौकरशाह का बचाव कर रहा है और प्रधान मन्त्री नेता तथा नौकरशाह दोनों का बचाव कर रहे हैं ।

गलत प्रतिमानों के चलते ही पिछले पचास सालों में भ्रष्टाचारी नेता और नौकरशाह दंड से बचे हुए हैं; वे सामाजिक प्रतिष्ठा भी पा रहे हैं । सीवान के शहाबुद्दीन प्रतिष्ठित हो रहे हैं। अगर अंग्रेजी पत्रकार की कसौटी को मान लें, तो यह कसौटी शाह्बुद्दीन के पक्ष में है । पुलिस अभी तक शहाबुद्दीन को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दंडित कराने में असफल रही है । किसी भी भाषा में शब्दों के चालाकी -भरे प्रयोग से तर्क की विसंगतियां छुप जाती हैं ; अंगरेजी में यह ज्यादा होता है ।

हिन्दी का पत्रका ज्यादा ईमानदारी से भारतीय समाज के कुछ प्रश्नों की दीवारों पर सर टकराता है । जनसत्ता के लेखक अरुण कुमार त्रिपाठी लिखते हैं कि मौजूदा राजनीति भ्रष्टाचार द्वारा कलंकित होने से अपने को बचाने में असमर्थ है । कारण , उसके पास बचाव के दो ही उपाय हैं : सबूत का अभाव और साजिश । ( भ्रष्ट कृष्णमूर्ति को बचाने के लिए प्रेमशंकर झा ने दोनों उपायों का इस्तेमाल किया है – साजिश के द्वारा उसको फँसाया गया और अदालत ने उसे दंडित नहीं किया )। अरुण कुमार त्रिपाठी ने लिखा है कि ऐसे कमजोर प्रतिमानों को चलाकर भ्रष्टाचार को रोका नहीं जा सकता , क्योंकि  भ्रष्टाचार अपने में एक बीमारी नहीं है बल्कि एक बड़ी बीमारी का लक्षण मात्र है । इसी बड़ी बीमारी को बढ़ाने के लिए हिन्दी लेखक उदारीकरण को उत्तरदायी मानता है ।

उदारीकरण भ्रष्टाचार को शुरु नहीं करता है , लेकिन जब उदारीकरण के द्वारा समाज के सारे स्वास्थ्य-प्रदायक तन्तुओं  को कमजोर कर दिया जाता तब भ्रष्टाचार न सिर्फ बढ़ता है बल्कि नियंत्रण के बाहर हो जाता है । भारत में उदारीकरण का यह चरण आ चुका है । जब अधिकांश नागरिकों के जीवन में भविष्य की अनिश्चितता आ जाती है , चन्द लोगों के लिए धनवृद्धि और खर्चवृद्धि की सीमा नहीं रह जाती , वर्गों और समूहों के बीच गैर-बराबरियाँ निरन्तर बढ़ती जाती हैं ,सार्वजनिक सम्पत्तियों को बेचने की छूट मिल जाती है , उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को देश के बाहर से निर्देश लेने होते हैं , जायज तरीकों से मिलनेवाली आय और नाजायज कमाई की मात्रा में आकाश-पाताल का अन्तर होता है , तब भ्रष्टाचार को रोकेगा कौन ?

( जारी )

पढ़ें , भ्रष्टाचार पर किशन पटनायक के कुछ अन्य लेख :

असहाय सत्य

भ्रष्टाचार की एक पड़ताल

भ्रष्टाचार की बुनियाद कहाँ है ?

राजनीति में मूल्य

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मुख्य अतिथिद्वय

मुख्य अतिथिद्वय

प्रियंकर साहित्य , काम – काज की भाषा और चिट्ठेकारी इन सभी मोर्चों पर हिन्दी-सेवा में लगे हैं । अपने तजुर्बे से उन्हों ने मुझे बताया था कि तदर्थवाद ने हिन्दी का नुकसान किया है । विभूति राय प्रशासनिक अधिकारी रहते हुए सिर्फ़ साहित्य से नहीं जुड़े रहे उनके स्पष्ट , प्रतिबद्ध सामाजिक सरोकार भी रहे हैं । इसलिए तदर्थवाद की कमजोरी को वे भी समझते ही होंगे । इस सेमिनार के तदर्थवाद की बाबत निमन्त्रणकर्ताओं से जल्दबाजी की शिकायत  के बारे में उन्होंने उद्घाटन सत्र की सदारत करते हुए खुद जिक्र किया तथा खेद प्रकट किया । निश्चित तौर पर किसी हद तक सेमिनार और चिट्ठेकारी ने इसका खामियाजा भुगता । स्कू्ली बच्चों को जैसे ’अधिकार के साथ कर्तव्य’ पर निबन्ध लिखवाया जाता है या ’विज्ञान : वरदान नहीं अभिशाप है’ पर वाद-विवाद करवाया जाता है उसी लहजे में नामवर सिंह ने जो विधा ही खुद अभी पल्लवित हो रही है उससे जुड़े़ लोगों को सन्देश दिया ।

लाजमी तौर पर स्मरण हो आया कि हमारे देश में अभिव्यक्ति के तमाम हक़ जिन १९ महीनों में मुल्तबी रखे गये थे तब नामवर सिंह का दल (भाकपा,इसके निशान पर वे चुनाव भी लड़े हैं) और उससे जुड़ा अध्यापक संगठन कैसे तानाशाह के छुटभैय्ये बने हुए थे । भाकपा का गद्दारी करने के बाद ’ऐतिहासिक भूल कबूलने’ का भी इतिहास है । ’७४ दिसम्बर में इलाहाबाद में तरुण शान्ति सेना द्वारा युवाओं के राष्ट्रीय सम्मेलन में ’जयप्रकाशजी आए हैं ,सन’  ’४२ लाए हैं’ के नारों से अगस्त क्रान्ति के नायक का युवजनों ने अभिवादन हमने भी किया था । अगस्त क्रान्ति ( ’४२ ) तथा दु:शासन पर्व (अपातकाल ) के गद्दारों को याद करना जरूरी नहीं है। लोहिया कहते थे ,’गद्दार या गद्दारी अपने आप में इतना खतरनाक नहीं होते । यदि जनता साथ न दे तो वे बेमानी होंगे । वे खतरनाक साबित होते हैं यदि वे जनता का समर्थन हासिल करने में कामयाब हो जाएं ’ । यह गौरतलब है कि हिन्दुत्ववादी धारा ने भी कम्युनिस्टों की तरह भारत छोड़ों आन्दोलन में हिस्सा न लेना उचित समझा था । इस उमर में अब नामवर दलों की दाएरों से ऊपर उठ गए हैं – राजस्थान की भाजपा सरकार के कोटे से हिन्दी के अंतर्रा्ष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत में उन्हें दिक्कत नहीं होती । काशी विश्वविद्यालय के मसले पर पूर्व छात्रों के एक प्रतिनिधिमण्डल का  रामबहादुर राय के अनुरोध पर नेतृत्व करते हुए वे जब तत्कालीन प्रधान मन्त्री से मिलने गए तब अटलजी ने स्वाभाविक तौर पर उन्हें सम्मान दिया था । रामबहादुर राय साहब के गुरु से भी परस्पर पीठ खजुआने का उनका नाता है । रामबहादुर राय साहब ने जब प्रभाष जोशी का भव्य जनमदिवस आयोजन किया तो प्रमुख मेहमान नामवर थे । क्या पता सती – प्रथा एवं जाति – प्रथा पर भी इसी लिहाज से न बोलें -’ कर्व्यनिष्ठ अभिव्यक्ति की आजादी’ के तहत !

रवि भाई ने चिट्ठों के राजनैतिक होने पर अपना भय उद्घाटन सत्र के अपने प्रस्तुतीकरण में प्रकट किया । हांलाकि उनका आशय प्रचलित, भ्रष्ट और डॉ. अरविन्द मिश्र के अल्फ़ाज़ में ’बेहयाई वाली राजनीति ’ से रहा होगा । रवि रतलामी और डॉ. अरविन्द मिश्र संसदीय लोकतंत्र को क्या नक्सलवादियों की तरह पूरी तरह खारिज करते होंगे ? शायद नहीं । जैसा भी लोकतंत्र है उसे गंवा कर न सिर्फ किसी भी जन आन्दोलन को कठिनाई होगी , अरविन्द भाई के अन्धविश्वास निर्मूलन अभियान को भी होगी । क्या संसदीय लोकतंत्र बिना दलीय राजनीति के भी चल सकता है ? इससे आगे बढ़कर विभूति राय ने ’राजनैतिक न होने की राजनीति’ का जिक्र किया । उन्होंने तानाशाही सत्ता और कठमुल्लों के विरुद्ध पाकिस्तान की ब्लॉगिंग तथा चीन में जम्हूरियत स्थापित करने की इच्छा रखने वालों द्वारा ब्लॉगिंग का भी जिक्र किया । उन्होंने बताया कि कट्टर पंथी मुल्लाओं के खिलाफ़ लिखे जा रहे ब्लॉगों को पढ़ते हुए उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।

रवि रतलामी

रवि रतलामी

मुझे बनारस के बुनकरों के मोहल्ले में सदभाव अभियान द्वारा आयोजित गोष्ठी में बोलते विभूति राय की याद आ गई । राजस्थान के उन मुसलिम किसानों की मिसाल उन्होंने दी थी जो पारम्परिक तौर पर धोती पहनते आए हैं तथा जिन पर उन कट्टरपंथियों का असर नहीं होता जो चाहते हैं कि धोती को हिन्दू-वस्त्र मानते हुए वे पहनना छोड़ दें ।

विशिष्ट श्रोता रामजी राय इरफ़ान के साथ

विशिष्ट श्रोता रामजी राय, इरफ़ान

सिद्धार्थ मिश्र के चिट्ठों की किताब का लोकार्पण हुआ । युनीकोड नेट पर विभिन्न भाषाओं को सर्वव्यापी बनाने के लिए है ,किताब छापने के लिए नहीं। बिना फिर से टंकण कराये भी वे कागजी मुद्रण के लिए फॉन्ट तब्दीली कर सकते थे । लेकिन शायद कितबिया तब दुबरा जाती । किताब पर चर्चा के लिए उन्होंने दो गैर चिट्ठेकारों को बुलवाया । चिट्ठे पढ़ने वालों ने किताब में संकलित चिट्ठे आदि पढ़े होंगे इस आधार पर वे चिट्ठेकारों को भी किताब पर चर्चा के लिए बुला सकते थे। मुझे लगा कि वे जानबूझकर ऐसा नहीं करना चाहते थे। संचालन से अलग सेमिनार के किसी भी विषय पर बोलने लायक उन्होंने खुद  को नहीं समझा । ब्लॉगिंग के ’ नारद विवाद’ के दौरान भी मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में कबड्ड़ी खेल में प्रचलित ’गूँगी कबड्डी’ का जिक्र किया था। (प्रथा समझने के लिए इस लिंक पर जांए ) । ’ प ’ बोलते वक्त होंठ बन्द हो जाते हैं । इसलिए ’चार सेना हड़प्प ’ बोल कर खिलाड़ी प्रतिद्वन्द्वी पाले में घुसता है । अपनी किताब का जिक्र जब सिद्धार्थ ने अपने ब्लॉग पर किया था तब किन्हीं ’बेनामी’ ने यह तथ्य अपनी टिप्पणी से प्रसारित कर दिया था कि किताब छापने वाली संस्था का कोषाध्यक्ष ही लेखक है । चिट्ठेकारी पर चर्चा के लायक तमाम जरूरी मुद्दों से ज्यादा तरजीह ’कुंठासुर’ – बेनामी वाले विषय को दी गयी थी । सिद्धार्थ को एक कविता छापने की नामंजूरी सार्वजनिक तौर पर मिली थी , घुघूती बासूती के ब्लॉग पर । एक दिन पहले किए गए सार्वजनिक आमन्त्रण से अलग निमन्त्रितों में घुघूती बासूती को नहीं शरीक किया गया था। हिन्दी चिट्ठेकारी करने वालों में दो मत न होगा कि घुघूती बासूती एक प्रमुख चिट्ठेकार है ।

उभरता सितारा : विनीत कुमार

उभरता सितारा : विनीत कुमार

इस सेमिनार के कारण कई ब्लॉगरों और मित्रों से पहलेपहल मिलने का मौका मिला । साहित्यिक ब्लॉगर और प्रिय मित्र प्रियंकर , प्रिय सांस्कृतिक – राजनैतिक कर्मी इरफ़ान , तेज तर्रार युवा खबरनवीस विनीत कुमार , जनतंत्र वाले समरेन्द्र ,विस्फोट वाले संजय तिवारी , हिन्दुत्ववादी- वरिष्ट -युवा ब्लॉगर प्रमेन्द्र तथा प्रगतिशील ब्लॉगर रेयाज-उल-हक़ , विज्ञान ब्लॉगिंग करने वाले बाल साहित्यकार जाकिर अली रजनीश ,विज्ञान और विज्ञान गल्प ब्लॉगिंग से जुड़े डॉ. अरविन्द मिश्रा,संगीत -व्यंग्य-नाटक और एनीमेशन से जुड़े युवा वकील ब्लॉगर कृष्ण मोहन मिश्र तथा मेरे पड़ौसी जिले चन्दौली के उभरते चिट्ठा – चर्चाकार हिमान्शु पाण्डे । हिन्दी विश्वविद्यालय के सन्तोष भदौरिया चिट्ठेकार तो शायद अभी नहीं हैं लेकिन उन से मिलने में गर्म जोशी का अहसास हुआ ।

मेरे मित्र विप्लव राही का लम्बे समय से आग्रह था कि मेरी समरेन्द्र से मुलाकात हो । समरेन्द्र को अलग टिकाया गया था । हांलाकि वह जगह हमारे अतिथि भवन से दूर न थी फिर भी सतसंगति का अवसर हम चूक गये ।

प्रियंकर / अध्यक्ष/भाषा -सत्र

प्रियंकर / अध्यक्ष/भाषा -सत्र

अभय की फिल्म सरपत दूसरी बार देखने का अवसर मिला । स्टेशन पर अनूप से पता चला कि के.के पाण्डे से फिल्म का डीवीडी मिला था । पहले पता चलता तो मैं निश्चित ही उनसे सम्पर्क करता,मिलना चाहता । केके काशी विश्वविद्यालय में एक युवा संगठन के प्रभारी होकर आये थे । उन्होंने अपने साथी कवि महेश्वर को अपना गुर्दा प्रदान किया था ।

मसिजीवी से दिल्ली में ब्लॉगवाणी के दफ़्तर में मुलाकात हुई थी । पहली बार मंच से बोलते सुना । उनकी शैली और लहजा सुन कर मुझे लगा कि इनका निर्धारण भौगोलिक इलाकों के अलावा भी होता है। मसिजीवी दिल्ली की एक संस्था में काम कर चुके हैं । उस संस्था से मुझसे परिचित एक व्यक्ति भी जुड़ा रहा है । मुझे भारी अचरज हुआ कि इन दोनों का लहजा और शैली असाधारण तौर पर समान हैं । वैसे , साथ काम करने वालों के बोलने ढंग का असर परस्पर तो होता ही है ।

मसिजीवी , प्रियंकर , अनूप,रविजी (बाँ. से दाँ.)

मसिजीवी , प्रियंकर , अनूप,रविजी (बाँ. से दाँ.)

विनीत कुमार की लेखन शैली से मैं हाल ही में परिचित हुआ था और प्रभावित भी । उसने दो सत्रों में अपने विचार बहुत ही स्पष्ट और नियोजित ढंग से रखे । सेमिनार के दौरान वह सीधे लोटपोट पर नोट्स ले रहा था ।

लोटपोट का प्रयोग यहाँ जानबूझकर किया गया है । जैसे नामवर द्वारा ’चिट्ठेकारी’ के अपहरण से अनूप आहत है और शब्द के जन्मदाता को सचेत कर रहा है वैसे ही ’लोटपोट’ का इस्तेमाल बिना श्रेय दिए चिट्ठा चर्चा की हेडिंग में कर दिया है । लाजमीतौर पर जनक पीडित होंगे/होंगी । ’ताकि सनद रहे वक्त पर काम दे’ , यह बात दर्ज की गई ।

अभय के फिल्म की ग्रामीण नायिका के परदे पर आते ही मेरे बगल में बैठे युवा में तेज हरकत हुई । यह युवा अधिवक्ता कृष्ण मोहन मिश्र था । अवसर पाते ही उसने बताया कि ८-९ वर्ष पहले उसने ’मैला आंचल’ में उस अभिनेत्री (गरिमा श्रीवास्तव?)के साथ अभिनय किया था। कृष्ण मोहन अपनी गाड़ी में हमें स्टेशन / बस स्टैण्ड छोड़ने जा रहा था । गाड़ी पत्थर गिरजा से स्टेशन वाली सड़क पर घूमी तो अनूप ने कहा कि निर्माता अभय बता रहे थे कि फिल्म में कहाँ से ट्विस्ट आता है । याद करने का प्रयास करने के बावजूद कृष्ण मोहन नायिका के पति (वास्तविक जीवन में ) का नाम याद न कर सके ।

समापन सत्र के अध्यक्ष ने एक परिभाषा उद्धृत करते हुए कहा कि समस्त संचित ज्ञान – निधि साहित्य का हिस्सा है  । इस प्रकार विज्ञान , कला ,खेल आदि सभी क्षेत्रों के चिट्ठों को साहित्य की परिधि में गिना जा सकता है । कृ्ष्ण मोहन ने फिर मुझे खुश होकर बताया कि इन्हें चिट्ठों के बारे में मैंने ही पहले पहल   बताया था ।

मैंने उम्मीद की थी जनमत के सम्पादक रामजी राय जो उद्घाटन सत्र में मौजूद थे आगे के सत्रों में भी रहेंगे तथा हमें उनके विचार सुनने को मिलेंगे । लगता है अन्य व्यस्तताओं के कारण ऐसा न हो सका।

जो भी विषय निर्धारित किए गए थे उन पर गंभीर चर्चाएं हुई । विनीत ने बताया कि ब्लॉगों पर महिला – लेखन और स्त्री विमर्श मजबूती से हुआ है । प्रियंकर ने अनाम चिट्ठेकारों की प्रभावशाली लेखन शैली से उनके अनाम होने से बाधा कत्तई नहीं आई है ,यह कहा । संजय तिवारी ने आगाह किया कि तकनीकी के परिवर्तनों में आ रहे त्वरण का चिट्ठेकारी पर भी प्रभाव पड़ सकता है तथा इसके प्रति हमे सचेत रहना पड़ेगा । डॉ. अरविन्द मिश्रा ने सन्तुलित ढंग से हिन्दी चिट्ठेकारी में विज्ञान लेखन की स्थिति का ब्यौरा दिया । चूंकि वे विज्ञान पर लिखने वालों में प्रमुख हैं इसलिए उनके द्वारा अपने और साइंस ब्लॉगर एसोशियेशन का कार्य विवरण न देना विषय के साथ अन्याय होता । वरिष्ट चिट्ठेकार उन्मुक्त के लेखन का भी उन्होंने हवाला दिया । वे आत्म प्रचार करते नहीं दिखे। मैंने इन्टरनेट के कथित खुलेपन पर बन्दिशें लगानी की साजिशों के बारे में लिखे एक लेख का जिक्र किया ।

’ अपना ’ प्रमेन्द्र दोनों दिन घर में चल रहे मरम्मत- काम से समय निकाल कर आया था । पहले दिन साथ में अदिति भी थी । विनीत के चिट्ठे पर आने के पहले जो लिस्ट छापी गयी थी उसमें भी उसका नाम था । प्रमेन्द्र का हवाला अलग अनुच्छेद में क्योंकि कहीं सरसरी तौर पर लिखा देखा कि हिन्दुत्ववादियों को नहीं बुलाया गया ।

चिट्ठेकार खुश थे की मुख्यधारा की एक संस्था ( गांधी हिन्दी वि. वि. ,वर्धा ) ने यह सेमिनार करवा दिया । हमें विश्वास है कि इस विश्वविद्यालय से जुड़े सन्तोष भदौरिया अपनी  टीम के सहयोग से सेमिनार में हुई चर्चा का दस्तावेजीकरण भी करेंगे । ऐसे आयोजनों में पहले से विभिन्न पहलुओं पर चिट्ठेकारों से परचे आमन्त्रित किए जाने चाहिए थे । प्रशिक्षण के लिए हिन्दी विश्वविद्यालय को रवि रतलामी जैसे विशेषज्ञों के सहयोग से कार्यशालायें चलाने की योजना चलानी चाहिए । ब्लॉगिंग से पहले तो इन्टरनेट की बाबत B.B.C Webwise जैसा कार्यक्रम हिन्दी में प्रस्तुत करना चाहिए ।

( ताजा कलम : अनूप ने इस रपट के बाद अपनी रपट में पुनश्च लगा कर सुधार कर लिया है।इस बहाने मुझे ता.क. चलाने का मौका मिला। गांधी के पत्रों में पुनश्च की जगह ता.क रहता था।ताजा कलम।मुझे पुनश्च से सुन्दर लगा था।हांलाकि अब कलम ही नहीं रही। )

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जब बुनियादी सवालों पर प्रमुख दलों में वैचारिक अन्तर न रह गया हो तब हार – जीत के नकली कारण प्रकट होने लगते हैं । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आशा से अधिक सफलता से प्रफुल्लित मनमोहन सिंह से लगायत छुटभैय्ये कांग्रेसी और उनकी मस्केबाजी करने वाले टेवि चर्चाकार बेशर्मी से क्या-क्या कह रहे हैं ?
१. इसका श्रेय राहुल गांधी के प्रचार अभियान को जाता है ।
२. किसानों की कर्ज माफी का लाभ हमें मिला ।

कांग्रेस ने राहुल गांधी को प्रधान मन्त्री का उम्मीदवार न बना कर यह चुनाव लड़ा इसलिए वंशवाद के जायज आरोप से बची रही ।
चौधरी देवीलाल द्वारा १० हजार रुपये तक के किसानों के कर्ज जब माफ किए गए थे तब अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने उस कदम को गलत ठहराया था और कहा था कि इससे अर्थव्यवस्था का नुकसान हुआ है ।
मौजूदा चुनाव का सबसे बड़ा सबक होगा कि जब प्रमुख दलों में मुख्य नीतियों में फरक न रह जाए तब एक संघर्षशील प्रतिपक्ष को खड़ा करने के लिए सक्रिय हुआ जाए ।

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भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ती गानेन्द्र नारायण रे ने आम चुनाव में मुष्टीमेय समाचार पत्रों द्वारा चुनाव रिपोर्टिंग की बाबत प्रेस परिषद के दिशा निर्देशों के खुले आम उल्लंघन को गंभीरता से लिया है । न्यायमूर्ती रे आज लखनऊ में हिन्दी समाचार-पत्र सम्मेलन के मीडिया सेन्टर के नवनिर्मित भवन का उद्घाटन करने पधारे थे । इस अवसर पर हिन्दी समाचार-पत्र सम्मेलन के अध्यक्ष श्री उत्तम चन्द शर्मा ने प्रेस परिषद के अध्यक्ष का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि प्रेस परिषद के चुनाव-रिपोर्टिंग सम्बन्धी दिशा निर्देशों का कुछ प्रमुख हिन्दी अखबारों ने खुले आम उल्लंघन किया है । श्री शर्मा ने कहा है व्यावसायिकता के मोह में इन अखबारों द्वारा चुनाव के दौर में खबरों और विज्ञापन के बीच की सीमा रेखा का लोप कर दिया गया है । यह पाठकों और मतदाताओं के प्रति अन्याय है।
इस ब्लॉग के पाठक जानते हैं कि हिन्दी के दो प्रमुख दैनिक – हिन्दुस्तान तथा दैनिक जागरण द्वारा मौजूदा आम चुनाव के दौरान उम्मीदवारों से १० से २० लाख रुपये ले कर विज्ञापननुमा खबरें छापने की एक नई अलोकतांत्रिक परम्परा की शुरुआत की गई है । इस सन्दर्भ में १६ अप्रैल के वाराणसी हिन्दुस्तान के वाराणसी तथा चन्दौली-मुगलसराय संस्करण के मुखपृष्ट पर मुख्य सम्पादक के स्पष्टीकरण की छवि प्रस्तुत की गई थी । पता चला है कि कि समाजवादी जनपरिषद द्वारा चुनाव आयोग तथा सम्पादक को लिखे जाने के अलावा इस बाबत कांग्रेस के महामंत्री श्री राहुल गांधी ने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की प्रमुख सुश्री शोभना भरतिया से फोन पर शिकायत की थी ।
बहरहाल प्रेस परिषद के अध्यक्ष के लखनऊ के आज के दौरे में अखबारों द्वारा चुनाव में निभाई जा रही भूमिका का मुद्दा छाया रहा । हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन के अध्यक्ष उत्तम चन्द शर्मा के अलावा कई पत्रकारों ने इस सवाल को उठाया । कार्यक्रम में न्यायमूर्ती रे का स्वागत सम्मेलन की ओर से जुगलकिशोर शरण शास्त्री ने किया । कार्यक्रम का संचालन दैनिक जनमोर्चा की सुमन गुप्ता ने किया । सुश्री सुमन गुप्ता प्रेस परिषद की सदस्य भी हैं तथा प्रेस परिषद की आगामी बैठक में इस मसले को उठाने का उन्होंने आश्वासन दिया है । आज के कार्यक्रम में मुख्य रूप से पत्रकार अरविन्द सिंह और जनमोर्चा के सम्पादक शीतला सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए । कार्यक्रम के अन्त में वाराणसी से प्रकाशित सांध्य दैनिक गाण्डीव के सम्पादक तथा हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन के महामन्त्री राजीव अरोड़ा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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    मौजूदा आम चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख दैनिक ’हिन्दुस्तान’ तथा ’दैनिक जागरण’ द्वारा चुनाव रिपोर्टिंग के प्रेस परिषद द्वारा जारी दिशा निर्देशों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाने के बारे में मैंने ४ अप्रैल , २००९ को लिखा था । प्रेस परिषद की शिकायत प्रक्रिया के तहत मैंने उक्त दैनिकों के सम्पादकों से ऐसे आचरण पर तत्काल रोक लगाने की अपील भी की थी । यह उल्लेखनीय है कि हिन्दुस्तान के लखनऊ के स्थानीय सम्पादक श्री नवीन जोशी ने भी एकदा अखबारों के इस प्रकार के व्यावसायीकरण के खिलाफ़ अपनी लेखनी मजबूती से चलाई थी ।

    चुनाव आयोग को लिखे पत्र में मैंने कहा था कि चूँकि प्रेस परिषद में शिकायत की प्रक्रिया लम्बी है (पहले सम्पादक को लिखना आदि) इसलिए चुनाव आयोग तत्काल हस्तक्षेप करे । परसों शाम पहले चरण का प्रचार थमने के बाद १५ अप्रैल का जो हिन्दुस्तान आया उसके मुखपृष्ट पर प्रतिदिन की तरह दो टूक (पहले पन्ने पर छपने वाली सम्पादकीय टिप्पणी), सूर्योदय-सूर्यास्त का समय तथा तापमान,’हिन्दुस्तान की आवाज’(अखबार द्वारा कराये गये जनमत संग्रह का परिणाम तथा ’आज का सवाल’) एवं राजेन्द्र धोड़पकर का नियमित कार्टून स्तम्भ –’औकात’ छापे गये थे । इन नियमित तथा नियमित प्रथम पृष्ट होने का अहसास दिलाने वाले उपर्युक्त तमाम तत्वों के अलावा खबरों और चित्रों में जो कुछ छपा था आप खुद देख सकते हैं ।

   आज मतदान का दिन है । अपने बूथ पर शीघ्र पहुंचने वाला मैं छठा मतदाता था । मतदान के बाद इत्मीनान से आज १६ अप्रैल ,२००९ का हिन्दुस्तान देखा जिसमें  ’मुख्य सम्पादक’ ने एक ’माइक्रो नाप का स्पष्टीकरण छापा है । इसे भी आप चित्रों में देखें । सभी चित्रों को देखने के लिए चित्र पर खटका मारें । अलबम खुल जाने के बाद हर चित्र पर खटका मार कर बड़े आकार में देख सकते हैं ।

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वाराणसी लोक सभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार मुरलीमनोहर जोशी ने शुरुआत में इन अखबारों का प्रचार-पैकेज खरीदने से इनकार किया था लेकिन अन्तिम दौर में उन्होंने भी ’पैकेज” ग्रहण कर लिया ।
बहरहाल , दीवाल – लेखन और बैनर लेखन जैसे पारम्परिक प्रचार करने वाले मेहनतकशों को इस प्रक्रिया के बाहर ढ़केलने के बाद कथित निर्वाचन-सुधारों के तहत न सिर्फ़ बड़े अखबारों की तिजोरी भरी जा रही है , अखबारों की निष्पक्षता खत्म की जा रही है , भारी खर्च न कर पाने वाले प्रत्याशियों की खबरें ऐलानियां नहीं छप रही हैं तथा आम मतदाता – पाठक निष्पक्ष खबरें पाने से वंचित किया जा रहा है तथा इस प्रकार लोकतंत्र को बीमार और कमजोर करने में मीडिया का लोभी हिस्सा अपना घिनौना रोल अदा कर रहा है ।
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश समस्त राजनैतिक दलों ,पत्रकार एवं नागरिक अधिकार संगठनों तथा जागरूक नागरिकों से अपील करता है कि (१) अध्यक्ष प्रेस परिषद ,६ कॉपर्निकस मार्ग,नई दिल्ली तथा (२) मुख्य चुनाव आयुक्त,भारत का निर्वाचन आयोग,निर्वाचन सदन,अशोक मार्ग, नई दिल्ली (ईमेल cecATeciDOTgovDOTin ) को इस प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए लिखें ताकि कुछ कमजोर चौथे खम्भों की यह हरकत रुके ।

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  1. प्रेस का यह कर्तव्य होगा कि चुनाव तथा प्रत्याशियों के बारे में निष्पक्ष रिपोर्ट दे । समाचारपत्रों से अस्वस्थ्य चुनाव अभियानों में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । चुनावों के दौरान किसी प्रत्याशी , दल या घटना के बारे में अतिशियोक्तिपूर्ण रिपोर्ट न दी जाए । वस्तुत: पूरे मुकाबले के दो या तीन प्रत्याशी ही मीडिया का सारा ध्यान आकर्षित करते हैं । वास्तविक अभियान की रिपोर्टिंग देते समय समाचारपत्र  को किसी प्रत्याशी द्वारा उठाये गये किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहिए और न ही उसके विरोधी पर कोई प्रहार करना चाहिए ।
  2. निर्वाचन नियमावली के अन्तर्गत सांप्रदायिक अथवा जातीय आधार पर चुनाव अभियान की अनुमति नहीं है । अत: प्रेस को ऐसी रिपोर्टों से दूर रहना चाहिए जिनसे धर्म, जाति , मत , सम्प्रदाय अथवा भाषा के आधार पर लोगों के बीच शत्रुता अथवा घृणा की भावनाएं पैदा हो सकती हों ।
  3. प्रेस को किसी प्रत्याशी के चरित्र या आचरण के बारे में या उसके नामांकन के संबंध में अथवा किसी प्रत्याशी का नाम अथवा उसका नामांकन  वापस लिये जाने के बारे में ऐसे झूटे या आलोचनात्मक वक्तव्य छापने से बचना चाहिए जिससे चुनाव में उस प्रत्याशी की संभावनाएं दुष्प्रभावित होती हों । प्रेस किसी भी प्रत्याशी/दल के विरुद्ध अपुष्ट आरोप प्रकाशित नहीं करेगा ।
  4. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल की छवि प्रस्तुत करने के लिए किसी प्रकार का प्रलोभन – वित्तीय या अन्य स्वीकार नहीं करेगा । वह किसी भी प्रत्याशी/दल द्वारा उन्हें पेश किया गया आतिथ्य या अन्य सुविधायें स्वीकार नहीं करेगा ।
  5. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल – विशेष के प्रचार में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । यदि वह करता है तो वह अन्य प्रत्याशी/दल को उत्तर का अधिकार देगा ।
  6. प्रेस किसी दल/ सत्तासीन सरकार की उपलब्धियों के बारे में सरकारी खर्चे पर कोई विज्ञापन स्वीकार / प्रकाशित नहीं करेगा ।
  7. प्रेस निर्वाचन आयोग/निर्वाचन अधिकारियों अथवा मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा समय समय पर जारी सभी निर्देशों/अनुदेशों का पालन करेगा ।
  8. जब भी समाचारपत्र मतदान पूर्व सर्वेक्षण प्रकाशित करते हैं तो उन्हें सर्वेक्षण करवाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं का उल्लेख सावधानीपूर्वक करना चाहिए एव्म प्रकाशित होने वाली उपलब्धियों के नमूने का माप एवं उसकी प्रकृति , पद्धति में गलतियों के संभावित प्रतिशत का भी ध्यान रखना चाहिए । [ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदान पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगा दी गयी है ।-सं. ]
  9. अगर चुनाव अलग चरणों में हो तो किसी भी समाचारपत्र को मतदान पूर्व सर्वेक्षण चाहे वे सही भी क्यों न हो प्रकाशित नहीं करना चाहिए ।

भारत की प्रेस परिषद द्वारा चुनावों के सन्दर्भ में उपर्युक्त दिशा निर्देश जारी किए गए हैं । अपने मुख्य ब्लॉग की एक प्रविष्टी को पुष्ट करने के लिए इन निर्देशों को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है । उक्त प्रविष्टि के तथ्यों के प्रति भारत के चुनाव आयोग तथा सम्बन्धित अखबारों के सम्पादकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पत्र लिख दिए गए हैं । सम्पादकों द्वारा  उचित कार्रवाई न किए जाने पर प्रेस परिषद को लिखा जायेगा ।  मीडिया के इस गैर जिम्मेदाराना आचरण के विरुद्ध , लोकतंत्र के हक में पाठकों की आम राय प्रकट हुई है । इसकी हमें उम्मीद थी तथा इससे हमें नैतिक बल मिला है ।

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दीवाल  –  लेखन  नहीं , परचे नहीं , नुक्कड़ सभायें पहले से कहीं कम , इसके बावजूद  चुनाव खर्च की ऊपरी सीमा में लगातार वृद्धि !  माना जा रहा है कि यह सब कदम गलत – राजनीति पर नकेल कसने के लिए लिए गए हैं !

पिछले ही रविवार को ही हिन्दुस्तान की सम्पादक मृणाल पाण्डे ने अपने नियमित स्तम्भ में बताया कि दुनिया के बड़े अखबार मन्दी का मुकाबला करने के लिए कैसे खुद को दीवालिया घोषित करने से ले कर छँटनी की कार्रवाई कर रहे हैं तथा –

” मीडिया की छवि बिगाड़ने वाली घटिया पत्रकारिता के खिलाफ ईमानदार और पेशे का आदर करने वाले पत्रकारों का भी आंदोलित और संगठित होना आवश्यक बन गया है । “

विश्वव्यापी मन्दी के दौर में हो रहे दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र के इस आम चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश में “चुनावी रिपोर्टिंग” के नाम पर प्रमुख हिन्दी दैनिक पत्रकारिता में गलीजपन की नई हदें स्थापित कर रहे हैं । न सिर्फ़ इस गलीजपन की पत्रकारिता से जनता के जानने के हक पर कुठाराघात हो रहा है अपितु इन अखबारों को पढ़ कर राय बनाने में जनता के विवेक पर हमला हो रहा है । इस प्रकार स्वस्थ और निष्पक्ष चुनावों में बाधक के रूप में यह प्रमुख हिन्दी दैनिक  अपनी भूमिका तय कर चुके हैं । यह गौरतलब है इन प्रमुख दैनिकों द्वारा अनैतिक, अवैध व्यावसायिक लेन- देन को खुले आम बढ़ावा दिया जा रहा है । क्या अखबार मन्दी का मुकाबला करने के लिए इन अनैतिक तरीकों से धनार्जन कर रहे हैं ?

गनीमत है कि यह पतनशील नीति अखबारों के शीर्ष प्रबन्धन द्वारा क्रियान्वित की जा रही है और उन दैनिकों में काम करने वाले पत्रकार  इस पाप से सर्वथा मुक्त हैं । आपातकाल के पूर्व तानाशाही की पदचाप के तौर पर सरकार द्वारा अखबारों के विज्ञापन रोकना और अखबारी कागज के कोटा को रोकना आदि गिने जाते थे । आपातकाल के दौरान बिना सेंसरशिप की खबरों के स्रोत भूमिगत साइक्लोस्टाइल बुलेटिन और बीबीसी की विश्व सेवा हो गये थे ।  “हिम्मत” (सम्पादक राजमोहन गांधी , कल्पना शर्मा ) , “भूमिपुत्र” (गुजराती पाक्षिक ,सम्पादक – कान्ति शाह ) जैसी छोटी पत्रिकाओं ने प्रेस की आज़ादी के लिए मुद्रणालयों की तालाबन्दी सही और उच्च न्यायालयों में भी लड़े । भूमिपुत्र के प्रेस पर तालाबन्दी होने के बाद रामनाथ गोयन्का ने अपने गुजराती दैनिक के मुद्रणालय में उसे छापने दिया ।  तानाशाही का मुकाबला करने वाली इन छोटी पत्रिकाओं से जुड़े युवा पत्रकार आज देश की पत्रकारिता में अलग पहचान रखते है – कल्पना शर्मा , नीरजा चौधरी , संजय हजारिका ।

दूसरी ओर मौजूदा चुनावों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख अखबार हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण ने चुनावी विज्ञापनों को बतौर  “खबर”   छापने के लिए मुख्यधारा के दलों के हर  उम्मीदवारों से बिना रसीद अवैध रूप से दस से २० लाख रुपये लिये हैं। धन देने के बाद न सिर्फ़ विज्ञापननुमा एक – एक पृष्ट चित्र- संग्रह छापे जा रहे हैं तथा समाचार भी धन प्रभावित तरीके से बनाये जा रहे हैं ।

आम चुनावों के पहले हुए विधान परिषद के लिए हुए स्नातक सीट के निर्वाचन में प्रत्याशी रह चुके समाजवादी डॉ. सुबेदार सिंह बताते हैं कि अखबारों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की चाह पूरी न कर पाने के कारण मतदान के एक सप्ताह पहले ही अखबारों से उनका लोप हो गया था । अम्बेडकरवादी चिन्तक डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं अखबारों द्वारा अपनाई गई यह चुनाव नीति लोकतंत्र के भविष्य के लिए खतरनाक है ।

समाजवादी जनपरिषद की उत्तर प्रदेश इकाई अखबारों द्वारा अपनाये जा रहे इस लोकतंत्र विरोधी आचरण के सन्दर्भ में चुनाव आयोग तथा प्रेस परिषद से हस्तक्षेप करने की अपील करती है ।  दल ने यह निश्चय किया है कि इस खतरनाक रुझान के सन्दर्भ में लोक राजनैतिक मंच के न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर तथा वरिष्ट पत्रकार कुलदीप नैयर का ध्यान भी खींचा जायेगा।

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