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Archive for the ‘news’ Category

आपातकाल के दौरान खबर के प्रकाशन के पहले और बाद दोनों सेन्सरशिप लागू थी। रामनाथ गोयन्का के एक्सप्रेस समूह,गुजराती के सर्वोदय आन्दोलन से जुड़े ‘भूमिपुत्र’,राजमोहन गांधी के ‘हिम्मत’ ,नारायण देसाई द्वारा संपादित ‘बुनियादी यकीन’आदि द्वारा दिखाई गई हिम्मत के अलावा जगह-जगह से ‘रणभेरी’,’चिंगारी’ जैसी स्टेन्सिल पर हस्तलिखित और साइक्लोस्टाईल्ड बुलेटिन ने इसका प्रतिवाद किया था। विलायत से स्वराज नामक बुलेटिन आती थी और बीबीसी हिन्दी भी खबरों के लिए ज्यादा सुनी जाती थी। उस दौर में संवैधानिक प्रावधान द्वारा समस्त मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए थे। ‘रणभेरी’ का संपादन-प्रकाशन इंकलाबी किस्म के समाजवादी युवा करते थे । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा इसके वितरण से इस टोली को आपत्ति नहीं थी। 1977 में आई जनता पार्टी की सरकार ने आंतरिक संकट की वजह से मौलिक अधिकार को निलंबित रखने के संवैधानिक प्रावधान को संवैधानिक संशोधन द्वारा दुरूह बना दिया। संसद के अलावा दो तिहाई राज्यों में दो-तिहाई बहुमत होने पर ही आन्तरिक संकट की वजह से आपातकाल लागू किया जा सकता है। जनता पार्टी लोकतंत्र बनाम तानाशाही के मुद्दे पर चुनी गई थी।आन्तरिक आपातकाल को दुरूह बनाने का संवैधानिक संशोधन इस सरकार का सर्वाधिक जरूरी काम था।उस सरकार को सिर्फ इस कदम के लिए भी इतिहास में याद किया जाएगा।

बहरहाल,1977 की जनता सरकार में सूचना प्रसारण मंत्रालय संघ से जुडे लालकृष्ण अडवाणी के जिम्मे था। उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन में जम कर ‘अपने’ लोगों को नौकरी दी। समय-समय पर वे अपनी जिम्मेदारी खूब निभाते हैं। कहा जाता है मंडल सिफारिशों को लगू करने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस राष्ट्र के नाम प्रसारण में अपना इस्तीफा दे रहे थे उसे एक विशिष्ट शत्रु-कोण से खींच कर प्रसारित किया जा रहा था। निजी उपग्रह चैनल तब नहीं थे।

नियमगिरी आन्दोलन की महिला आन्दोलनकारी

नियमगिरी आन्दोलन की महिला आन्दोलनकारी

मौजूदा दौर 1992 में शुरु हुई वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बाद का दौर है। जीवन के हर क्षेत्र को नकारात्मक दिशा में ले जाने वाली प्रतिक्रांति के रूप में वैश्वीकरण को समझा जा सकता है। लाजमी तौर पर सूचना-प्रसारण का क्षेत्र भी इस प्रतिक्रांति से अछूता नहीं रहा। निजी उपग्रह चैनल भी नन्हे-मुन्ने ही सही सत्ता-केन्द्र बन गए हैं। इनसे भी सवाल पूछना होगा।नरेन्द्र मोदी की सरकार ने NDTV-इंडिया को छांट कर ,सजा देने की नियत से एक असंवैधानिक आदेश दे दिया है। सभी लोकतांत्रिक नागरिकों, समूहों और दलों को इसका तीव्रतम प्रतिवाद करना चाहिए । नागरिकों के हाथ में अब एक नया औजार इंटरनेट भी है जिस पर रोक लगाना कठिन है। आपातकाल के बाद के दौर में भी बिहार प्रेस विधेयक जैसे प्रावधानों से जब अभिव्यक्ति को बाधित करने की चेष्टा हुई थी तब उसके राष्ट्रव्यापी प्रतिकार ने उसे विफल कर दिया था।

अभिव्यक्ति के बाधित होने में नागरिक का निष्पक्ष सूचना पाने का अधिकार भी बाधित हो जाता है। मौजूदा दौर में NDTV इंडिया के लिए जारी फरमान के जरिए हर नागरिक का निष्पक्ष सूचना पाने का अधिकार बाधित हुआ है। निष्पक्ष सूचनाएं अन्य वजहों से भी बाधित होती आई हैं। उन वजहों के खिलाफ इस दौर में प्रतिकार बहुत कमजोर है। इन आन्तरिक वजहों पर भी इस मौके पर गौर करना हमें जरूरी लगता है।

हमारे देश में अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है जिनकी वजह से भारतीय अर्थशास्त्र के पहले पाठ में पढाया जाता था-‘भारत एक समृद्ध देश है जिसमें गरीब बसते हैं’।संसाधनों पर हक उस दौर की राजनीति तय करती है। यह दौर उन संसाधनों को अडाणी-अम्बानी जैसे देशी और अनिल अग्रवाल और मित्तल जैसे विदेशी पूंजीपतियों को सौंपने का दौर है। मुख्यमंत्री और केंद्र में बैठे मंत्री वंदनवार सजा कर इनका स्वागत करते हैं। संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिए कंपनियां घिनौनी करतूतें अपनाती हैं। स्थानीय समूहों द्वारा इस प्रकार के दोहन का प्रतिकार किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर स्थानीय आबादी के बीच जनमत संग्रह कराया गया कि वेदांत कंपनी द्वारा नियामगिरी पर्वत से बॉक्साइट खोदा जाए अथवा नहीं। एक भी वोट इंग्लैण्ड स्टॉक एक्सचेंज में पंजीकृत वेदांत कंपनी के पक्ष में नहीं पड़ा। इसी प्रकार कोका कोला-पेप्सी कोला जैसी कंपनियों द्वारा भूगर्भ जल के दोहन से इन संयंत्रों के आस पास जल स्तर बहुत नीचे चला गया है। इंसान और पर्यावरण के विनाश द्वारा मुनाफ़ा कमाने वाली वेदान्त,कोक-पेप्सी जैसी कंपनियां  निजी मीडिया प्रतिष्ठानों को भारी पैसा दे कर कार्यक्रम प्रायोजित करती हैं। इस परिस्थिति में मीडिया समूह सत्य से परे होने के लिए बाध्य हो जाते हैं।
NDTV और उसके नव उदारवादी संस्थापक प्रणोय रॉय ने अपने चैनल के साथ वेदांत और कोका कोला कंपनी से गठबंधन किए हैं।लाजमी तौर पर इन कंपनियों की करतूतों पर पर्दा डालने में NDTV के यह कार्यक्रम सहायक बन जाते हैं। वेदान्त के साथ NDTV महिलाओं पर केन्द्रित कार्यक्रम चला रहा था तथा कोका कोला के साथ स्कूलों के बारे में कार्यक्रम चला रहा था। इस प्रकार के गठबंधनों से दर्शक देश बचाने के महत्वपूर्ण आन्दोलनों की खबरों से वंचित हो जाते हैं तथा ये घिनौनी कम्पनियां अपनी करतूतों पर परदा डालने में सफल हो जाती हैं।

वेदान्त का अनिल अग्रवाल मोदी और प्रणोय रॉय के बीच पंचायत कराने की स्थिति में है अथवा नहीं,पता नहीं।

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फिर जाड़ा आया , फिर गर्मी आई

फिर आदमियों के पाले से लू से मरने की खबर आई :

न जाड़ा ज़्यादा था न लू ज़्यादा

तब कैसे मरे आदमी

वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते ,

मर जाते हैं तब लोग जाड़े और लू की मौत बताते हैं ।

– रघुवीर सहाय

[ फरवरी , ’७२ ]

स्रोत: प्रतिनिधि कविताएँ : रघुवीर सहाय ,राजकमल पेपरबैक्स

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आम के पेड़ के नीचे बैठक चल रही है। इसमें दूर-दूर के गांव के लोग आए हैं। बातचीत हो रही है। यह दृश्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के आदिवासी बहुल केसला विकासखंड स्थित किसान आदिवासी संगठन के कार्यालय का है। यहां 5 जनवरी को किसान आदिवासी संगठन की मासिक बैठक थी जिसमें कई गांव के स्त्री-पुरुष एकत्र हुए थे। जिसमें केसला, सोहागपुर और बोरी अभयारण्य के लोग भी शामिल थे। इस बार मुद्दा था- पंचायत के उम्मीदवार का चुनाव प्रचार कैसे किया जाए? यहां 21 जनवरी को वोट पडेंगे।

बैठक में फैसला लिया गया कि कोई भी उम्मीदवार चुनाव में घर से पैसा नहीं लगाएगा। इसके लिए गांव-गांव से चंदा इकट्ठा किया जाएगा। चुनाव में मुर्गा-मटन की पारटी नहीं दी जाएगी बल्कि संगठन के लोग इसका विरोध करेंगे। गांव-गांव में साइकिल यात्रा निकालकर प्रचार किया जाएगा। यहां किसान आदिवासी संगठन के समर्थन से एक जिला पंचायत सदस्य और चार जनपद सदस्य के उम्मीदवार खड़े किए गए हैं।

सतपुड़ा की घाटी में किसान आदिवासी संगठन पिछले 25 बरस से आदिवासियों और किसानों के हक और इज्जत की लड़ाई लड़ रहा है। यह इलाका एक तरह से उजड़े और भगाए गए लोगों का ही है। यहां के आदिवासियों को अलग-अलग परियोजनाओं से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ा है। इस संगठन की शुरूआत करने वालों में इटारसी के समाजवादी युवक राजनारायण थे। बाद मे सुनील आए और यहीं के होकर रह गए। उनकी पत्नी स्मिता भी इस संघर्ष का हिस्सा बनीं। राजनारायण अब नहीं है उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। लेकिन स्थानीय आदिवासी युवाओं की भागीदारी ने संगठन में नए तेवर दिए।

इन विस्थापितों की लड़ाई भी इसी संगठन के नेतृत्व में लड़ी गई जिसमें सफलता भी मिली। तवा जलाशय में आदिवासियों को मछली का अधिकार मिला जो वर्ष 1996 से वर्ष 2006 तक चला। आदिवासियों की मछुआ सहकारिता ने बहुत ही शानदार काम किया जिसकी सराहना भी हुई। लेकिन अब यह अधिकार उनसे छिन गया है। तवा जलाषय में अब मछली पकड़ने पर रोक है। हालांकि अवैध रूप से मछली की चोरी का नेटवर्क बन गया है।

लेकिन अब आदिवासी पंचायतों में अपने प्रतिनिधित्व के लिए खड़े हैं। इसमें पिछली बार उन्हें सफलता भी मिली थी। उनके के ही बीच के आदिवासी नेता फागराम जनपद उपाध्यक्ष भी बने। इस बार फागराम जिला पंचायत सदस्य के लिए उम्मीदवार हैं। फागराम की पहचान इलाके में तेजतर्रार, निडर और ईमानदार नेता के रूप में हैं। फागराम केसला के पास भुमकापुरा के रहने वाले हैं। वे पूर्व में विधानसभा का चुनाव में उम्मीदवार भी रह चुके हैं।

संगठन के पर्चे में जनता को याद दिलाया गया है कि उनके संघर्ष की लड़ाई को जिन प्रतिनिधियों ने लड़ा है, उसे मजबूत करने की जरूरत है। चाहे वन अधिकार की लड़ाई हो या मजदूरों की मजदूरी का भुगतान, चाहे बुजुर्गों को पेंशन का मामला हो या गरीबी रेखा में नाम जुड़वाना हो, सोसायटी में राषन की मांग हो या घूसखोरी का विरोध, यह सब किसने किया है?

जाहिर है किसान आदिवासी संगठन ही इसकी लड़ाई लड़ता है। किसान आदिवासी संगठन राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी जन परिषद से जुड़ा है। समाजवादी जन परिषद एक पंजीकृत राजनैतिक दल है जिसकी स्थापना 1995 में हुई थी। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक इसके संस्थापकों में हैं। किशन जी स्वयं कई बार इस इलाके में आ चुके हैं और उन्होंने आदिवासियों की हक और इज्जत की लड़ाई को अपना समर्थन दिया है।

सतपुड़ा की जंगल पट्टी में मुख्य रूप से गोंड और कोरकू निवास करते हैं जबकि मैदानी क्षेत्र में गैर आदिवासी। नर्मदा भी यहां से गुजरती है जिसका कछार उपजाउ है। सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी भी यहीं है।

होशंगाबाद जिला राजनैतिक रूप से भिन्न रहा है। यह जिला कभी समाजवादी आंदोलन का भी केन्द्र रहा है। हरिविष्णु कामथ को संसद में भेजने का काम इसी जिले ने किया है। कुछ समर्पित युवक-युवतियों ने 1970 के दशक में स्वयंसेवी संस्था किशोर भारती को खड़ा किया था जिसने कृषि के अलावा षिक्षा की नई पद्धति होषंगाबाद विज्ञान की शुरूआत भी यहीं से की , जो अन्तरराष्ट्रीय पटल भी चर्चित रही। अब नई राजनीति की धारा भी यहीं से बह रही है।

इस बैठक में मौजूद रावल सिंह कहता है उम्मीदवार ऐसा हो जो गरीबों के लिए लड़ सके, अड़ सके और बोल सके। रावल सिंह खुद की स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर है। लेकिन उन्होंने संगठन के कार्यकर्ता के रूप में काम करते-करते पढ़ना-लिखना सीख लिया है।

समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सुनील कहते है कि हम पंचायत चुनाव में झूठे वायदे नहीं करेंगे। जो लड़ाई संगठन ने लड़ी है, वह दूसरों ने नहीं लड़ी। प्रतिनिधि ऐसा हो जो गांव की सलाह में चले। पंचायतों में चुप रहने वाले दब्बू और स्वार्थी प्रतिनिधि नहीं चाहिए। वे कहते है कि यह सत्य, न्याय व जनता की लड़ाई है।

फागराम

अगर ये प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं तो राजनीति में यह नई शुरूआत होगी। आज जब राजनीति में सभी दल और पार्टियां भले ही अलग-अलग बैनर और झंडे तले चुनाव लड़ें लेकिन व्यवहार में एक जैसे हो गए हैं। उनमें किसी भी तरह का फर्क जनता नहीं देख पाती हैं। जनता के दुख दर्द कम नहीं कर पाते। पांच साल तक जनता से दूर रहते हैं।

मध्यप्रदेश में जमीनी स्तर पर वंचितों, दलितों, आदिवासियों, किसानों और विस्थापितों के संघर्श करने वाले कई जन संगठन व जन आंदोलन हैं। यह मायने में मध्यप्रदेश जन संगठनों की राजधानी है। यह नई राजनैतिक संस्कृति की शुरूआत भी है। यह राजनीति में स्वागत योग्य कदम है।

– बाबा मायाराम की रपट । साभार जुगनु

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भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ती गानेन्द्र नारायण रे ने आम चुनाव में मुष्टीमेय समाचार पत्रों द्वारा चुनाव रिपोर्टिंग की बाबत प्रेस परिषद के दिशा निर्देशों के खुले आम उल्लंघन को गंभीरता से लिया है । न्यायमूर्ती रे आज लखनऊ में हिन्दी समाचार-पत्र सम्मेलन के मीडिया सेन्टर के नवनिर्मित भवन का उद्घाटन करने पधारे थे । इस अवसर पर हिन्दी समाचार-पत्र सम्मेलन के अध्यक्ष श्री उत्तम चन्द शर्मा ने प्रेस परिषद के अध्यक्ष का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि प्रेस परिषद के चुनाव-रिपोर्टिंग सम्बन्धी दिशा निर्देशों का कुछ प्रमुख हिन्दी अखबारों ने खुले आम उल्लंघन किया है । श्री शर्मा ने कहा है व्यावसायिकता के मोह में इन अखबारों द्वारा चुनाव के दौर में खबरों और विज्ञापन के बीच की सीमा रेखा का लोप कर दिया गया है । यह पाठकों और मतदाताओं के प्रति अन्याय है।
इस ब्लॉग के पाठक जानते हैं कि हिन्दी के दो प्रमुख दैनिक – हिन्दुस्तान तथा दैनिक जागरण द्वारा मौजूदा आम चुनाव के दौरान उम्मीदवारों से १० से २० लाख रुपये ले कर विज्ञापननुमा खबरें छापने की एक नई अलोकतांत्रिक परम्परा की शुरुआत की गई है । इस सन्दर्भ में १६ अप्रैल के वाराणसी हिन्दुस्तान के वाराणसी तथा चन्दौली-मुगलसराय संस्करण के मुखपृष्ट पर मुख्य सम्पादक के स्पष्टीकरण की छवि प्रस्तुत की गई थी । पता चला है कि कि समाजवादी जनपरिषद द्वारा चुनाव आयोग तथा सम्पादक को लिखे जाने के अलावा इस बाबत कांग्रेस के महामंत्री श्री राहुल गांधी ने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की प्रमुख सुश्री शोभना भरतिया से फोन पर शिकायत की थी ।
बहरहाल प्रेस परिषद के अध्यक्ष के लखनऊ के आज के दौरे में अखबारों द्वारा चुनाव में निभाई जा रही भूमिका का मुद्दा छाया रहा । हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन के अध्यक्ष उत्तम चन्द शर्मा के अलावा कई पत्रकारों ने इस सवाल को उठाया । कार्यक्रम में न्यायमूर्ती रे का स्वागत सम्मेलन की ओर से जुगलकिशोर शरण शास्त्री ने किया । कार्यक्रम का संचालन दैनिक जनमोर्चा की सुमन गुप्ता ने किया । सुश्री सुमन गुप्ता प्रेस परिषद की सदस्य भी हैं तथा प्रेस परिषद की आगामी बैठक में इस मसले को उठाने का उन्होंने आश्वासन दिया है । आज के कार्यक्रम में मुख्य रूप से पत्रकार अरविन्द सिंह और जनमोर्चा के सम्पादक शीतला सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए । कार्यक्रम के अन्त में वाराणसी से प्रकाशित सांध्य दैनिक गाण्डीव के सम्पादक तथा हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन के महामन्त्री राजीव अरोड़ा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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    मौजूदा आम चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख दैनिक ’हिन्दुस्तान’ तथा ’दैनिक जागरण’ द्वारा चुनाव रिपोर्टिंग के प्रेस परिषद द्वारा जारी दिशा निर्देशों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाने के बारे में मैंने ४ अप्रैल , २००९ को लिखा था । प्रेस परिषद की शिकायत प्रक्रिया के तहत मैंने उक्त दैनिकों के सम्पादकों से ऐसे आचरण पर तत्काल रोक लगाने की अपील भी की थी । यह उल्लेखनीय है कि हिन्दुस्तान के लखनऊ के स्थानीय सम्पादक श्री नवीन जोशी ने भी एकदा अखबारों के इस प्रकार के व्यावसायीकरण के खिलाफ़ अपनी लेखनी मजबूती से चलाई थी ।

    चुनाव आयोग को लिखे पत्र में मैंने कहा था कि चूँकि प्रेस परिषद में शिकायत की प्रक्रिया लम्बी है (पहले सम्पादक को लिखना आदि) इसलिए चुनाव आयोग तत्काल हस्तक्षेप करे । परसों शाम पहले चरण का प्रचार थमने के बाद १५ अप्रैल का जो हिन्दुस्तान आया उसके मुखपृष्ट पर प्रतिदिन की तरह दो टूक (पहले पन्ने पर छपने वाली सम्पादकीय टिप्पणी), सूर्योदय-सूर्यास्त का समय तथा तापमान,’हिन्दुस्तान की आवाज’(अखबार द्वारा कराये गये जनमत संग्रह का परिणाम तथा ’आज का सवाल’) एवं राजेन्द्र धोड़पकर का नियमित कार्टून स्तम्भ –’औकात’ छापे गये थे । इन नियमित तथा नियमित प्रथम पृष्ट होने का अहसास दिलाने वाले उपर्युक्त तमाम तत्वों के अलावा खबरों और चित्रों में जो कुछ छपा था आप खुद देख सकते हैं ।

   आज मतदान का दिन है । अपने बूथ पर शीघ्र पहुंचने वाला मैं छठा मतदाता था । मतदान के बाद इत्मीनान से आज १६ अप्रैल ,२००९ का हिन्दुस्तान देखा जिसमें  ’मुख्य सम्पादक’ ने एक ’माइक्रो नाप का स्पष्टीकरण छापा है । इसे भी आप चित्रों में देखें । सभी चित्रों को देखने के लिए चित्र पर खटका मारें । अलबम खुल जाने के बाद हर चित्र पर खटका मार कर बड़े आकार में देख सकते हैं ।

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वाराणसी लोक सभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार मुरलीमनोहर जोशी ने शुरुआत में इन अखबारों का प्रचार-पैकेज खरीदने से इनकार किया था लेकिन अन्तिम दौर में उन्होंने भी ’पैकेज” ग्रहण कर लिया ।
बहरहाल , दीवाल – लेखन और बैनर लेखन जैसे पारम्परिक प्रचार करने वाले मेहनतकशों को इस प्रक्रिया के बाहर ढ़केलने के बाद कथित निर्वाचन-सुधारों के तहत न सिर्फ़ बड़े अखबारों की तिजोरी भरी जा रही है , अखबारों की निष्पक्षता खत्म की जा रही है , भारी खर्च न कर पाने वाले प्रत्याशियों की खबरें ऐलानियां नहीं छप रही हैं तथा आम मतदाता – पाठक निष्पक्ष खबरें पाने से वंचित किया जा रहा है तथा इस प्रकार लोकतंत्र को बीमार और कमजोर करने में मीडिया का लोभी हिस्सा अपना घिनौना रोल अदा कर रहा है ।
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश समस्त राजनैतिक दलों ,पत्रकार एवं नागरिक अधिकार संगठनों तथा जागरूक नागरिकों से अपील करता है कि (१) अध्यक्ष प्रेस परिषद ,६ कॉपर्निकस मार्ग,नई दिल्ली तथा (२) मुख्य चुनाव आयुक्त,भारत का निर्वाचन आयोग,निर्वाचन सदन,अशोक मार्ग, नई दिल्ली (ईमेल cecATeciDOTgovDOTin ) को इस प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए लिखें ताकि कुछ कमजोर चौथे खम्भों की यह हरकत रुके ।

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  1. प्रेस का यह कर्तव्य होगा कि चुनाव तथा प्रत्याशियों के बारे में निष्पक्ष रिपोर्ट दे । समाचारपत्रों से अस्वस्थ्य चुनाव अभियानों में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । चुनावों के दौरान किसी प्रत्याशी , दल या घटना के बारे में अतिशियोक्तिपूर्ण रिपोर्ट न दी जाए । वस्तुत: पूरे मुकाबले के दो या तीन प्रत्याशी ही मीडिया का सारा ध्यान आकर्षित करते हैं । वास्तविक अभियान की रिपोर्टिंग देते समय समाचारपत्र  को किसी प्रत्याशी द्वारा उठाये गये किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहिए और न ही उसके विरोधी पर कोई प्रहार करना चाहिए ।
  2. निर्वाचन नियमावली के अन्तर्गत सांप्रदायिक अथवा जातीय आधार पर चुनाव अभियान की अनुमति नहीं है । अत: प्रेस को ऐसी रिपोर्टों से दूर रहना चाहिए जिनसे धर्म, जाति , मत , सम्प्रदाय अथवा भाषा के आधार पर लोगों के बीच शत्रुता अथवा घृणा की भावनाएं पैदा हो सकती हों ।
  3. प्रेस को किसी प्रत्याशी के चरित्र या आचरण के बारे में या उसके नामांकन के संबंध में अथवा किसी प्रत्याशी का नाम अथवा उसका नामांकन  वापस लिये जाने के बारे में ऐसे झूटे या आलोचनात्मक वक्तव्य छापने से बचना चाहिए जिससे चुनाव में उस प्रत्याशी की संभावनाएं दुष्प्रभावित होती हों । प्रेस किसी भी प्रत्याशी/दल के विरुद्ध अपुष्ट आरोप प्रकाशित नहीं करेगा ।
  4. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल की छवि प्रस्तुत करने के लिए किसी प्रकार का प्रलोभन – वित्तीय या अन्य स्वीकार नहीं करेगा । वह किसी भी प्रत्याशी/दल द्वारा उन्हें पेश किया गया आतिथ्य या अन्य सुविधायें स्वीकार नहीं करेगा ।
  5. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल – विशेष के प्रचार में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । यदि वह करता है तो वह अन्य प्रत्याशी/दल को उत्तर का अधिकार देगा ।
  6. प्रेस किसी दल/ सत्तासीन सरकार की उपलब्धियों के बारे में सरकारी खर्चे पर कोई विज्ञापन स्वीकार / प्रकाशित नहीं करेगा ।
  7. प्रेस निर्वाचन आयोग/निर्वाचन अधिकारियों अथवा मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा समय समय पर जारी सभी निर्देशों/अनुदेशों का पालन करेगा ।
  8. जब भी समाचारपत्र मतदान पूर्व सर्वेक्षण प्रकाशित करते हैं तो उन्हें सर्वेक्षण करवाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं का उल्लेख सावधानीपूर्वक करना चाहिए एव्म प्रकाशित होने वाली उपलब्धियों के नमूने का माप एवं उसकी प्रकृति , पद्धति में गलतियों के संभावित प्रतिशत का भी ध्यान रखना चाहिए । [ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदान पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगा दी गयी है ।-सं. ]
  9. अगर चुनाव अलग चरणों में हो तो किसी भी समाचारपत्र को मतदान पूर्व सर्वेक्षण चाहे वे सही भी क्यों न हो प्रकाशित नहीं करना चाहिए ।

भारत की प्रेस परिषद द्वारा चुनावों के सन्दर्भ में उपर्युक्त दिशा निर्देश जारी किए गए हैं । अपने मुख्य ब्लॉग की एक प्रविष्टी को पुष्ट करने के लिए इन निर्देशों को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है । उक्त प्रविष्टि के तथ्यों के प्रति भारत के चुनाव आयोग तथा सम्बन्धित अखबारों के सम्पादकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पत्र लिख दिए गए हैं । सम्पादकों द्वारा  उचित कार्रवाई न किए जाने पर प्रेस परिषद को लिखा जायेगा ।  मीडिया के इस गैर जिम्मेदाराना आचरण के विरुद्ध , लोकतंत्र के हक में पाठकों की आम राय प्रकट हुई है । इसकी हमें उम्मीद थी तथा इससे हमें नैतिक बल मिला है ।

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    अफवाहों में सच का अंश होता है । कुछ ऐसा तत्व जो अफवाह को विश्वसनीय बना देता है । उत्तर प्रदेश के तीन जिला मुख्यालयों की कचहरियों में एक साथ हुए बम विस्फोटों के बाद हाल ही में हुईं दो घटनाओं से जनता ने इनका सम्बन्ध जोड़ा । आतंकी घटनाओं के पक्ष में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता परन्तु आज हुई अमानुषिक कारगुजारी से जनता ने दो घटनाओं को जोड़ा।

    लखनऊ की कचहरी में पेश कुछ आतंकवादियों की वकीलों द्वारा पिटायी पहली घटना है । बनारस में इस ‘कारण’ से ज्यादा महत्व एक अन्य घटना को मिला । आज से तीन दिन पहले बनारस की अदालत में  हत्या के एक मामले में एक विधायक – माफिया-अभियुक्त के खिलाफ़ एक अन्य माफिया-विधायक द्वारा गवाही दिया जाना – दूसरी घटना है। आज के धमाकों के समय गवाही देने वाले विधायक के कचहरी परिसर में मौजूद होने की चर्चा से इस अफवाह को और बल मिला।

    जनता यह मानती है कि हत्या अभियुक्त विधायक तीनों शहरों में एक साथ धमाके करवाने की औकात रखता है । हत्या अभियुक्त विधायक है सपा समर्थित विधायक मुख़्तार अन्सारी जिस पर लगे अवधेश राय हत्याकाण्ड में भाजपा विधायक अजय राय ने गवाही दी है । अवधेश अजय के भाई थे ।

 

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