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Archive for the ‘obituary’ Category

पी. लंकेश कन्नड़ के लेखक ,पत्रकार और आंदोलनकारी।एक ऐसी जमात के प्रमुख स्तंभ जो लोहिया के मुरीद होने के कारण अम्बेडकर की समाज नीति और गांधी की अर्थ नीति के हामी थे।देवनूर महादेव,यू आर अनंतमूर्ति और किशन पटनायक के मित्र और साथी।
उनकी लोकप्रिय पत्रिका थी ‘लंकेश पत्रिके’।लंकेश के गुजर जाने के बाद उनकी इंकलाबी बेटी गौरी इस पत्रिका को निकालती थी।आज से ठीक साल भर पहले गौरी लंकेश की ‘सनातन संस्था’ से जुड़े कायरों ने हत्या की।समाजवादी युवजन सभा से अपना सामाजिक जीवन शुरू करने वाले महाराष्ट्र के अंध श्रद्धा निर्मूलन कार्यकर्ता डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या भी सनातन संस्था से जुड़े दरिंदों ने की थी यह सी बी आई जांचकर्ता कह रहे हैं।सनातन संस्था के लोगों के पास से भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद हुए तथा आतंक फैलाने की व्यापक साजिश का पर्दाफ़ाश हुआ है।यह पर्दाफाश भी राज्य की एजेंसी ने किया है।
महाराष्ट्र में व्यापक दलित आंदोलन को हिंसक मोड़ देने में RSS के पूर्व प्रचारक की भूमिका प्रमाणित है।ऐसे व्यक्ति के गैर नामजद FIR के आधार पर देश भर में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं की निराधार गिरफ्तारियों से स्पष्ट है कि आरएसएस और सनातन संस्था की राष्ट्रविरोधी कार्रवाइयों के उजागर हो जाने के कारण राजनाथ सिंह-मोदी का यह मूर्खतापूर्ण ‘बचाव’ है।
रिजर्व बैंक की अधिकृत रपट में नोटबंदी की विफलता मान ली गई है।प्रधान मंत्री ने 50 दिनों की जो मोहलत मांगी थी उसकी मियाद पूरी हुए साल भर हो गई है। ’50 दिन बाद चौराहे पर न्याय देना’ यह स्वयं प्रधान मंत्री ने कहा था इसलिए उनके असुरक्षित होने की वजह वे खुद घोषित कर चुके हैं।
एक मात्र सत्ताधारी पार्टी चुनाव में पार्टियों द्वारा चुनाव खर्च पर सीमा की विरोधी है।इस पार्टी ने अज्ञात दानदाताओं द्वारा असीमित चंदा लेने को वैधानिकता प्रदान कर राजनीति में काले धन को औपचारिकता प्रदान की है।
समाजवादी जन परिषद इस अलोकतांत्रिक सरकार को चुनाव के माध्यम से उखाड़ फेंकने का आवाहन करती हैं।
अफ़लातून,
महामंत्री,
समाजवादी जन परिषद।

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सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता , औरंगाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ट वकील , समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्य साथी प्रवीण वाघ हमारे बीच नहीं रहे । युवक क्रांति दल (युक्रांद) से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी जनपरिषद के संस्थापकों में प्रमुख थे। मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहब अम्बेडकर के नाम पर करने के आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी।  आपके पिता चन्द्रमोहन वाघ औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी में सक्रिय थे तथा डॉ. अम्बेडकर के निकट सहयोगी थे तथा अम्बेडकर साहब द्वारा शुरु पत्रिका का प्रकाशन करते थे।

प्रवीण वाघ

सामाजिक न्याय के प्रबल प्रवक्ता प्रवीण वाघ

असंगठित मजदूरों के सवाल को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाते थे । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के बहुजन समाज पर पड़ने दुष्प्रभाव को वे बखूबी प्रस्तुत करते थे।  कुटुम्बीजन इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति पायें ।

साथी तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचायेंगे।

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समाजवादी नेता एवं पूर्व सांसद श्री सुरेन्द्र मोहन का निधन (17 दिसंबर 2010) भारत के समाजवादी आंदोलन एवं जन आंदोलनों के लिए बड़ी क्षति है। उनकी मृत्यु से देश ने एक ईमानदार राजनेता, प्रखर विचारक और समर्पित समाजवादी खो दिया। उन्होंने अपना दीर्घ जीवन समाजवादी आदर्षो के लिए सतत् प्रयास में पूरी तरह समर्पित कर दिया। मृत्यु के एक दिन पहले भी वे जंतर-मंतर पर न्यायिक भ्रष्टाचार के बारे में धरने में शरीक हुए थे। पिछले पखवारे में मुंबई और केरल की यात्रा की थी। 84 वर्ष की उम्र के बाबजूद वे लगातार घूमते रहते थे और अंतिम समय तक सक्रिय रहे। छात्र जीवन से ही स्वाधीनता आंदोलन तथा फिर समाजवादी आंदोलन में वे जुड़ गये थे। वे एक सच्चे कर्मयोगी थे।
श्री सुरेन्द्र मोहन मुंबई से निरंतर प्रकाषित अंग्रेजी साप्ताहिक ‘जनता‘ के संपादक थे। हिन्दी और अंग्रेजी में लगातार लिखते रहते थे। ‘‘सादा जीवन उच्च विचार‘‘ की वे साक्षात मूर्ति थे। डॉ. राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी आयोजन समिति के वे प्रमुख स्तम्भ थे। वे मजदूर आंदोलन से भी जुड़े थे और देश में मजदूरों व कर्मचारियों के सबसे बड़े संगठन ‘हिन्द मजदूर सभा‘ के प्रमुख सलाहकार थे। कुछ महीने पहले हिन्द मजदूर सभा के प्रमुख नेताओं के साथ दो दिवसीय बैठक का आयोजन उन्होंने किया था जिसमें मजदूर आंदोलन एवं यूनियन कार्यकर्ताओं को समाजवादी विचार से जोड़ने पर विस्तार से चर्चा हुई। देश के विभिन्न जन आंदोलनों से भी उनका नाता था और उनके हर संकट में उनका सहायोग व समर्थन मिलता था।
समाजवादी जन परिषद, किसान आदिवासी संगठन और श्रामिक आदिवासी संगठन उनको हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते है।

फागराम                                           राजेन्द्र गढ़वाल                                        सुनील
किसान आदिवासी संगठन            श्रमिक आदिवासी संगठन                राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,

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    उत्तर भारत की राजनीति पर नज़र रखने वाले बसपा के गाँधी-विरोधी तेवर से परिचित होंगे। राजनीति की इतनी खबर रखने वाले यह भी जानते होंगे कि नक्सलबाड़ी उत्तर बंगाल का वह गाँव है जहाँ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हो कर भा.क.पा. ( मा-ले ) की स्थापना हुई और इस नई जमात द्वारा ” बुर्जुआ लोकतंत्र को नकारने तथा वर्गशत्रु के खात्मे” के सिद्धान्तों की घोषणा हुई ।

    उत्तर बंगाल के इन्हीं चार जिलों ( कूच बिहार , उत्तर दिनाजपुर , जलपाईगुड़ी , दार्जीलिंग ) से एक अन्य जनान्दोलन भी गत तीन दशकों में उभरा जिसने उत्तर बंग को एक आन्तरिक उपनिवेश के रूप में चिह्नित किया और बुलन्दी से इस बात को कहा कि आजादी के बाद विकास की जो दिशा तय की गई उसमें यह अन्तर्निहित है कि बड़े शहरों की अय्याशी उत्तर बंगाल , झारखण्ड , पूर्वी उत्तर प्रदेश , उत्तराखन्ड , छत्तीसगढ़ जैसे देश के भीतर के इन इलाकों को ‘आन्तरिक उपनिवेश’ बना कर,  लूट के बल पर ही मुमकिन है । नक्सलबाड़ी में वर्ग शत्रु की शिनाख्त सरल थी । खेती की लूट का शिकार छोटा किसान भी है और उसे खेत मजदूर के साथ मिल कर इस व्यवस्था के खिलाफ़ लड़ना होगा इस समझदारीके साथ उत्तर बंग में जो किसान आन्दोलन उभरा उसके प्रमुख नेता थे साथी जुगलकिशोर रायबीर जुगलदा की अगुवाई में उत्तर बंगाल के किसान आन्दोलन के दूसरी प्रमुख अनूठी बात थी कि इस जमात में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग जुटे जो अम्बेडकर की सामाजिक नीति के साथ गाँधी की अर्थनीति को लागू करने में यकीन रखते हैं। बंगाल के अलावा कर्नाटक का ‘दलित संघर्ष समिति’ ऐसी जमात है जिसके एक धड़े ने बहुजन समाज पार्टी में विलय से पहले  कांशीरामजी के समक्ष शर्त रखी थी कि आप गांधी की  आलोचना नहीं करेंगे।

    नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के मकसद से १९९२ में जब समाजवादी जनपरिषद की स्थापना हुई तब लाजमी तौर पर इसके पहले अध्यक्ष साथी जुगलकिशोर रायबीर चुने गए और इस बार ( सातवें सम्मेलन में ) पुन: राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। आज सुबह साढ़े चार बजे उनकी मृत्यु हुई । वे रक्त कैन्सर से जूझ रहे थे । अपने क्रान्तिकारी साथी की मौत पर हम संकल्प लेते हैं कि उनके सपनों को मंजिल तक पहुँचाने की हम कोशिश करेंगे।

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mailammamemorium.jpg” पृथ्वी से अच्छा बरताव करो ।पृथ्वी तुम्हें माँ-बाप ने नहीं दी है,आगे आने वाली पीढियों ने उसे तुम्हे कर्ज के रूप में दिया है ।हमें अपने बच्चों से उधार में मिली है पृथ्वी ।”

    आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के प्रथम शिकार ‘रेड इन्डियन’ लोगों की यह प्रसिद्ध कहावत प्लाचीमाडा के कोका-कोला विरोधी आन्दोलन की जुझारू महिला नेता मायलम्मा की भावना से कितनी मेल खाती है ! मायलम्मा ने कोका-कोला कम्पनी द्वारा भूगर्भ-जल-दोहन के भविष्य के परिणाम के प्रति चेतावनी दे कर कहा था , ‘तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी ? तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे ।’

    दो-सौ देशों में फैली बहुराष्ट्रीय कम्पनी के कारखाने के सामने घास-फूस के ‘समर-पंडाल’ के नीचे प्लाचीमाडा की आदिवासी महिलाओं का   अनवरत चला धरना अहिन्सक संघर्ष के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा ।

    प्राकृतिक संसाधनों पर हक किसका है ? एक दानवाकार कम्पनी का ?या स्थानीय समुदाय का ? हक़ की इस लड़ाई का नेता कौन होगा ? – इन प्रश्नों को दिमाग में लिए ‘मातृभूमि’ के सम्पादक और लोक-सभा सदस्य श्री एम.पी. वीरेन्द्रकुमार के निमंत्रण पर पहली बार २१,२२,२३ जनवरी,२००४ को प्लाचीमाडा में आयोजित ‘ विश्व जन-जल-सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला ।इस सम्मेलन में वैश्वीकरण विरोधी,गांधीजी से प्रभावित,फ़्रान्सीसी किसान नेता जोशे बोव्हे , पानी पर गिद्ध-दृष्टि गड़ाई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रति सचेत करने वाली किताब(द ब्ल्यू गोल्ड) की लेखिका मॊड बार्लो,यूरोपियन यूनियन के सांसद,मलयालम के वरिष्ठ साहित्यकार सुकुमार अझिकोड़,वासुदेवन नायर,सारा जोसेफ़ और केरल विधान-सभा में विपक्ष के नेता अच्युतानन्दन (मौजूदा मख्यमन्त्री ) ने भाग लिया था । इन सभी राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय दिग्गजों को पालघाट के इस गाँव की ओर आकर्षित करने वाला एक प्रमुख तत्व मायलम्मा का नेतृत्व था ।

    ‘ जिस की लड़ाई उसीका नेतृत्व’ जन-आन्दोलनों की इस बुनियादी कसौटी पर प्लाचीमाडा-आन्दोलन मायलम्मा जैसी प्रखर महिला नेता के कारण खरा उतरा था ।

    मेंहदीगंज में कोका-कोला विरोधी आन्दोलन को प्लाचीमाडा से प्रेरणा मिली थी । साथी मायलम्मा हमें बता गयीं हैं कि :

    (१) प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी का प्राथमिक हक़ है।

    (२) इस अधिकार के लिए संघर्ष स्थानीय नेतृत्व द्वारा ही चलाया जाएगा ।

    संसाधनों पर अधिकार का निर्णय राजनीति द्वारा होता है और इस दौर की नई राजनीति में प्लाचीमाडा की मयलम्मा को याद किया जाएगा ।

          – अफ़लातून , अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश।

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जन्म ५नवंबर १९११ ,

निधन २३ अगस्त २००६

 दिनेश दासगुप्त : एक परिचय , लेखक – अशोक सेकसरिया

     अगर सच्चे अर्थों में किसी को क्रांतिकारी समाजवादी कहा जा सकता है तो दिनेश दासगुप्त के नाम का स्मरण आयेगा ही . १६ वर्ष की उम्र में वे मास्टरदा सूर्य सेन के क्रांतिकारी दल से जुडे तो  अंत तक समाजवादी आंदोलन से . दिनेशदा की राजनीति आजादी के पहले देश को गुलामी से मुक्त करने की थी और आजादी के बाद देश में एक समतावादी समाजवादी समाज स्थापना की . इस संघर्षशील राजनीति में उन्होंने गुलाम भारत में और आजाद भारत में बार – बार कारावास वरण किया .

    दिनेश दासगुप्त का जन्म ५ नवंबर १९११ को हुआ . १६ वर्ष की उम्र में वे मास्टरदा सूर्य सेन की इंडियन रिपब्लिकन पार्टी में भर्ती हो गये और अप्रैल १९३० के चट्गांव शस्त्रागार अभियान में सक्रिय रूप से भाग लिया . चटगांव शस्त्रागार  अभियान के बाद ब्रिटिश सरकार के खिलाफ धौलाघाट में गुरिल्ला युद्ध में वे ब्रिटिश सेना द्वारा गिरफ़्तार कर लिये गए और उन्हें दस साल की जेल की सजा दे कर १९३२ में अंडमान सेल्यूलर जेल भेज दिया गया . इस जेल में उन्होंने कई बार भूख हडताल की . १९३८ में दिनेशदा और उनके सथी रिहा किए गए तो कुछ साथी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए पर दिनेशदा के मन में अंडमान जेल में रहते सरकार द्वारा अंडमान बंदियों के बीच मार्क्सवादी साहित्य के वितरण और अपने कुछ साथियों के देश की आजादी की लडाई को प्राथमिकता न देने के कारण कम्युनिस्टों के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया और वे कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल न हो कर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गये और चटगांव जिले में कांग्रेस सोशलिस्ट पर्टी का संगठन बनाने में जुट गये . १९४० में रामगढ कांग्रेस से लौटते हुए उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और १९४६ में कांग्रेस  के सारे नेताओं की रिहाई के बाद उन्हें रिहा किया गया . छह साल के कारावास में उन्हें हिजली (मेदनीपुर ) जेल , भूटान के निकट बक्सा किले और ढाका जेल में रखा गया.इस कारावास में भी उन्होंने भूख हडतालें कीं .

       आजादी के बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की पश्चिम बंगाल शाखा और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी , संसदीय बोर्ड के सदस्य और सेक्रेटरी व अध्यक्ष के पद पर बैठाये गये . किसी पद पर बैठना दिनेशदा ने कभी नहीं चाहा . पदों के लिए झगडा होने पर उन्हें पद पर बैठना पडता था . १९७७ में जनता पार्टी की सरकार बनी तो कुछ साथियों ने उनसे आग्रह किया कि वे ओडिशा या बिहार का राज्यपाल बनें तो उन्होंने इन साथियों को झिडक कर कहा कि क्या तुम लोग मुझे सफेद हाथी बनाना चाहते हो . दिनेश दा अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो एक साथ नेता और कार्यकर्ता दोनों थे .

         जब डॊ. रममनोहर लोहिया ने प्रजा सोशलिअट पार्टी से अलग हो कर सोशलिस्ट पर्टी की स्थापना की तो दिनेश दा उसमें चले आये . सोशलिस्ट पार्टी के सारे आंदोलनात्मक कार्यों में वे मनप्राण से जुटे रहे . इन आंदोलनों में उन्होंने बार – बार कारावास वरण किया . अंग्रेजी हटाओ आंदोलन , दाम बांधो आंदोलन , ट्रेड यूनियन आंदोलन ,मेहतर आंदोलन , आदिवासी आंदोलन आदि में वे लगातार सक्रिय रहे . बांग्ला में लोहिया साहित्य प्रकाशन के लिए उन्होंने राममनोहर लोहिया साहित्य प्रकाशन की स्थापना की .

         १९७१ में बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन में वे लगातार सक्रिय रहे . उन्होंने मुक्ति युद्ध के दौरान कई बार बांग्लादेश की गुप्त यात्राएं की . शेख मुजीबुर रहमान तक ने बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन में उनके अवदान की चर्चा की थी . १९७५ में एमरजेन्सी में जेल से रिहा होने के बाद वे जनता पार्टी में शामिल हुए . जनता पार्टी के भंग होने के बाद वे ज्यादातर आदिवासियों के बीच काम करते रहे .

       २००४ तक दिनेश दा पूरी तरह सक्रिय रहे . १५ अगस्त २००३ को स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने जो स्वागत समारोह आयोजित किया था,उस उस समारोह में वे सिर्फ इस उद्देश्य से गये थे कि राष्ट्रपति से सीधे निवेदन करें कि अंडमान शहीद पार्क का सावरकर पार्क नामांतरण रद्द किया जाए.उन्होंने राष्ट्रपति को स्पष्ट शब्दों में कहा शहीद पार्क में सावरकर की मूर्ति बैठाना तो शहीदों का घोर अपमान है क्योंकि सावरकर शहीद तो हुए ही नहीं उलटे उन्होंने ब्रिटिश सरकार से माफी मांगकर जेल से मुक्ति पायी और फिर देश के स्वाधीनता संग्राम में भाग ही नही लिया . इसी आशय का एक पत्र उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी लिखा .

   २००४ से दिनेश दा बीमार रहने लगे और दो बार तो मरते मरते बचे . आजीवन अविवाहित दिनेश दा की पिछले दस वर्षों से श्री अनाथचन्द्र सरकार ,उनकी पत्नी माया सरकार , दोनों बेटियां चुमकी और पिंकी ने जो सेवा की वह अविस्मरणीय है . सारे समाजवादी ,अनाथचन्द्र सरकार परिवार के प्रति कृतग्य है .

     इस २३ अगस्त २००६ को दिनेश दा चले गए लेकिन आजाद भारत में समाजवादी समाज का उनका सपना अभी भी बन हुआ है .

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रामगोपाल दीक्षित

इस क्रान्ति दिवस ( ९ अगस्त ) पर १९७४ में ‘क्रान्ति का बिगुल’ बजाने वाले कवि और वरिष्ट गांधीवादी रामगोपाल दीक्षित की ८९ वर्ष की अवस्था में म्रुत्यु हो गयी .सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के दौर में लाखों की जन – मेदिनी को लोकनायक जयप्रकाश सम्बोधित करते थे.इन सभाओं की शुरुआत दीक्षितजी के क्रान्ति गीत से ही हो यह उनकी फ़रमाइश होती थी . आपातकाल के ‘दु:शासन पर्व ‘ में ‘तिलक लगाने तुम्हे जवानों , क्रान्ति द्वार पर आई है ‘ के रचयिता दीक्षितजी की उत्तर प्रदेश पुलिस को तलाश थी.
लोक शैली में आल्हा सुनाने तथा कथा – वाचन में निपुणता के कारण दीक्षितजी तरुण शान्ति सेना के शिबिरों के लोकप्रिय प्रशिक्षक थे .सच्चे अर्थों में राष्ट्रीयता ( राष्ट्रतोडक राष्ट्रवाद नहीं ), अनुशासन और दायित्व के बोध व निर्वाह के गुणों के कारण वे शान्ति सेना के ‘तत्पर शान्ति सैनिक ‘ थे . सर्वोदय और सम्पूर्ण क्रान्ति से प्रेरित उनके गीत आन्दोलन को शक्ति देते थे और तरुणों के चित्त में त्वरा का संचार कर देते थे . बुन्देलख्ण्ड का होने की वजह से बागियों के आत्मसमर्पण के बाद बने चम्बल शान्ति मिशन से भी वे जुडे थे . तत्काल गीत रच देने और स्वर दे देने मे उन्हें प्रवीणता हासिल थी.
तरुण शान्ति सेना के शिबिरों में दीक्षितजी की कथा और गीतों के अलावा उनके द्वारा कराये जाने वाले खेलों का ज़िक्र भी जरूरी है . यह सभी खेल बिना किसी खर्च के खेले जाते थे तथा मनोविनोद के साथ साथ शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को तराशने वाले होते थे .
क़रीब दो वर्ष पहले पांव मे लगी चोट के कारण उन्हें कानपुर में भर्ती कराया गया था . चिकित्सकों का कहना था कि कम से कम छ: महीने उन्हें आराम करना चाहिये . दीक्षितजी ने कहा के वे आश्रित हो कर रहने के आदि नही नही रहे हैं और इसलिये वे हमीरपुर जिले के अपने पैत्रूक गांव मुसकर चले आए और प्रतिदिन दो -तीन किलोमीटर तक पैदल चलना भी शुरु कर दिया.
मुलायमसिंह यादव की सरकार ने ‘ लोकतंत्र सेनानियों ‘ को सम्मानित करने का फ़ैसला लिया है . ‘लोकतंत्र सेनानियों ‘ के सबसे बडे सेनापति लोकनायक जयप्रकाश नारायण के निकट सहयोगी और उनके विचारों को अपने गीतों द्वारा तरुणों के ह्रुदय में अंकित कर देने वाले दीक्षितजी की सुध किसी सरकार को नहीं रही और न ही वे सरकारी सुध के मुखापेक्षी थे यद्यपि अन्तिम दौर में आर्थिक कठिनाइयों का सामना उन्हे करना पडा .
अहिन्सक संघर्ष की तालीम मे रामगोपाल दीक्षितजी का योगदान स्थाई है.
(अफ़लातून )
अध्यक्षक्रान्ति गीत
जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है, तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है.
आज चलेगा कौन देश से भ्रष्टाचार मिटने को , बर्बरता से लोहा लेने,सत्ता से टकराने को.
आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है. (तिलक लगाने..)
पर्वत की दीवार कभी क्या रोक सकी तूफ़ानों को,क्या बन्दूकें रोक सकेंगी बढते हुए जवानों को?
चूर – चूर हो गयी शक्ति वह , जो हमसे टकराई है .(तिलक लगाने.. )
लाख़ लाख़ झोपडियों मे तो छाई हुई उदासी है,सत्ता – सम्पत्ति के बंगलों में हंसती पूरणमासी है.
यह सब अब ना चलने देंगे,हमने कसमें खाई हैं . (तिलक लगाने..)
सावधान, पद या पैसे से होना है गुमराह नही,सीने पर गोली खा कर भी निकले मुख से आह नही.
ऐसे वीर शहीदों ने ही देश की लाज बचाई है . ( तिलक लगाने..)
आओ क्रुषक , श्रमिक , नगरिकों , इंकलाब का नारा दो-कविजन ,शिक्षक , बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो.
फ़िर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है,तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है..
– रामगोपाल दीक्षित
, समाजवादी जनपरिषद (उ.प्र.)

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