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Archive for the ‘recessation’ Category

पूंजीवाद एक बार फिर संकट में है। पिछले दिनों आई जबरदस्त मंदी ने इसकी चूलें हिला दी है और दुनिया अभी इससे पूरी तरह उबरी नहीं है। पूंजीवाद का संकट सिर्फ बैंकों, कंपनियों व शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। दुनिया में भूखे, कुपोषित, बेघर और बेरोजगार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आज दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं, यानी हर छठा आदमी भरपेट नहीं खा पाता है। इंसान की सबसे बुनियादी जरुरत भोजन को भी पूरा नहीं कर पाना पूंजीवादी सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता है। पर्यावरण का संकट भी गहराता जा रहा है, जिसे कोपनहेगन सम्मेलन की विफलता ने और उजागर कर दिया है।

इन संकटो ने पूंजीवादी सभ्यता के चमत्कारिक दावों पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इसके विकल्पों की तलाश तेज हो गई है। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि पहले इसकी बुनियादी गड़बड़ियों को समझा जाए और उनका सम्यक रुप से विश्लेषण किया जा सके।

कार्ल मार्क्स पूंजीजीवाद के सबसे बड़े और सशक्त व्याख्याकार व टीकाकार रहे हैं। किन्तु डेढ़ सौ सालों बाद उनके विश्लेषण और सिद्धांतों में कई कमियां दिखाई देती है। पूंजीवाद के विकास ,विनाश और क्रांति के बारे में उनकी भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुई हैं। पूरी दुनिया पूंजीपतियों और मजदूरों में नहीं बंटी। कारखानों का संगठित मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ अब नहीं रहा। रुस, पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम आदि में जो कम्युनिस्ट क्रांतियां हुई, वे धराशायी हो गई हैं, और ये देश वापस पूंजीवाद के आगोश में चले गए हैं। इधर लातीनी अमरीका में जो समाजवाद की बयार चली है, वह शास्त्रीय मार्क्सवादी धारा से काफी अलग है।

दुनिया में आंदोलन और संघर्ष तो बहुत हो रहे हैं। किन्तु मजदूर-मालिक संघर्ष अब खबरों में नहीं है। किसानों, आदिवासियों और असंगठित मजदूरों के आंदोलन, जल-जंगल-जमीन के आंदोलन, धार्मिक-सामुदायिक-राष्ट्रीय पहचान आधारित आंदोलन तो हैं , किन्तु वे मार्क्स के विचारों से काफी अलग हैं। तब हम इन्हें कैसे समझे ?

इस मामले में डॉ० राममनोहर लोहिया से हमें मदद मिल सकती है। उन्होंनें 1943 में ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ नामक निबंध लिखा। उन्होंने बताया कि पूंजीवादी शोषण का मुख्य आधार एक कारखाने या एक देश के अंदर मालिक द्वारा मजदूर का शोषण नहीं, बल्कि उपनिवेशों का शोषण है। उपनिवेशों के किसान, कारीगर व मजदूर ही असली सर्वहारा है। लेनिन का यह कथन गलत है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था है। बल्कि, यह पूंजीवाद की पहली और अनिवार्य अवस्था है। यदि पश्चिम यूरोप के देशों ने अमरीका, अफ्रीका, एशिया और आस्ट्रेलिया के विशाल भूभागों पर कब्जा करने और लूटने का काम न किया होता, तो वहां औद्योगिक क्रांति नहीं हो सकती थी।

उपनिवेशों के आजाद होने के बाद भी नव-औपनिवेशिक और नव-साम्राज्यवादी तरीकों से यह लूट व शोषण चालू है और इसीलिए पूंजीवाद फल-फूल रहा है। यह शोषण सिर्फ औपनिवेशिक श्रम का ही नहीं है। इसमें पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन, लूट और विनाश भी अनिवार्य रुप से छिपा है। इसीलिए आज दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़े प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हो रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण के संकट भी पैदा हो रहे हैं।

औपनिवेशिक शोषण की जरुरत पूंजीवादी विकास के लिए इतनी जरुरी है, कि तीसरी दुनिया के जिन देशों ने इस तरह का विकास करने की कोशिश की, बाहरी उपनिवेश न होने पर उन्होंनें आंतरिक उपनिवेश विकसित किए। आंतरिक उपनिवेश सिर्फ क्षेत्रीय व भौगोलिक ही नहीं होते हैं। अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से भी (जैसे गांव या खेती) आंतरिक उपनिवेश बन जाते हैं। भारतीय खेती के अभूतपूर्व संकट और किसानों की आत्महत्याओं के पीछे आंतरिक उपनिवेश की व्यवस्था ही है।

सोवियत संघ का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही था कि उसने उसी तरह का औद्योगीकरण और विकास करने की कोशिश की, जैसा पूंजीवादी यूरोप-अमरीका में हुआ था। किन्तु बाहरी और आंतरिक उपनिवेशों की वैसी सुविधा उसके पास नहीं थी।

इसलिए, पूंजीवाद का एक बुनियादी नियम हम इस तरह बयान कर सकते हैं :

पूंजीवादी विकास के लिए औपनिवेशिक, नव-औपनिवेशिक या आंतरिक – औपनिवेशिक

शोषण जरुरी है। यह शोषण दोनों का होता है – श्रम का भी और प्राकृतिक संसाधनों का भी।

दुनिया के स्तर पर इस नियम का अभी तक कोई महत्वपूर्ण अपवाद नहीं है।

लोहिया के पहले गांधी ने आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता के इस शोषणकारी-विनाशकारी चरित्र के बारे में चेतावनी दी थी। मार्क्स के अनुयायियों में रोजा लक्ज़मबर्ग ने इस विषय में मार्क्स की खामियों को उजागर किया था और उसे सुधारने की कोशिश की। लोहिया के बाद लातीनी अमरीका के आन्द्रे गुन्दर फ्रेंक और मिस्त्र के समीर अमीन नामक मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने लोहिया से मिलती-जुलती बातें कही है।

यदि ऊपर कही गई बातें सही हैं, तो इनसे कई निष्कर्ष निकलते हैं :

’ तीसरी दुनिया के गरीब देशों में यूरोप-अमरीका जैसा औद्योगीकरण एवं विकास संभव नहीं है, चाहे वह पूंजीवादी तरीके से किया जाए या साम्यवादी (राज्य पूंजीवादी) तरीके से किया जाए।

’ चूंकि अमरीका-यूरोप की समृद्धि व जीवन-शैली पूरी दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिकी है, वह दुनिया के सारे लोगों के लिए हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए समाजवादियों को उसका सपना छोड़ देना होगा। सबकी न्यूनतम बुनियादी जरुरतें तो पूरी हो सकती हैं, किन्तु विलासितापूर्ण जीवन सबका नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में ‘स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व’ के साथ ‘सादगी’ और ‘स्वावलंबन’ भी समाजवादी समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण एवं जरुरी सूत्र होंगे।

’ इस अर्थ में दुनिया का आर्थिक-राजनैतिक संकट और पर्यावरणीय संकट आपस में जुड़े हैं। एक वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था में ही दोनों संकटों से मुक्ति मिल सकेगी। दूसरे शब्दों में, समाजवाद निर्माण के किसी भी प्रयास में दोनों तरह के आंदोलनों – आर्थिक-सामाजिक बराबरी के आंदोलन एवं पर्यावरण के आंदोलन – को मिलकर ताकत लगाना होगा।

’ विकल्प सिर्फ पूंजीवाद (उत्पादन संबंधों के संकुचित अर्थ में) का नहीं हो सकता। निजी संपत्ति को खतम करना काफी नहीं है। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के साथ पूंजीवादी तकनालॉजी, जीवन-शैली और जीवन-मूल्यों का भी विकल्प खोजना होगा। दूसरे शब्दों में हमें ‘पूंजीवादी सभ्यता’ का विकल्प खोजना होगा। एक नयी सभ्यता का निर्माण करना होगा।

इक्कीसवीं सदी में समाजवाद की किसी भी संकल्पना, तलाश और कोशिश में ये महत्वपूर्ण सूत्र होंगे। इनके लिए हम लोहिया के आभारी हैं।

————–’’’…………………………

(साहित्य अकादमी द्वारा डॉ० राममनोहर लोहिया पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी (18-20फरवरी 2010) में पेश आलेख – हिन्दी सारांश)

– सुनील

ग्रा/पो केसला,

जि. होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

461111

ईमेल – sjpsunil@gmail.com

कार्य :- समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार। आदिवासियों, किसानों,

मछुआरों एवं विस्थापितों के संघर्ष एवं संगठन में पिछले 25 वर्ष से सक्रिय। अखबारों, पत्रिकाओं में लेखन। कई पुस्तिकाएं भी प्रकाशित।

पद :- राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, समाजवादी जन परिषद।

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जब बुनियादी सवालों पर प्रमुख दलों में वैचारिक अन्तर न रह गया हो तब हार – जीत के नकली कारण प्रकट होने लगते हैं । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आशा से अधिक सफलता से प्रफुल्लित मनमोहन सिंह से लगायत छुटभैय्ये कांग्रेसी और उनकी मस्केबाजी करने वाले टेवि चर्चाकार बेशर्मी से क्या-क्या कह रहे हैं ?
१. इसका श्रेय राहुल गांधी के प्रचार अभियान को जाता है ।
२. किसानों की कर्ज माफी का लाभ हमें मिला ।

कांग्रेस ने राहुल गांधी को प्रधान मन्त्री का उम्मीदवार न बना कर यह चुनाव लड़ा इसलिए वंशवाद के जायज आरोप से बची रही ।
चौधरी देवीलाल द्वारा १० हजार रुपये तक के किसानों के कर्ज जब माफ किए गए थे तब अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने उस कदम को गलत ठहराया था और कहा था कि इससे अर्थव्यवस्था का नुकसान हुआ है ।
मौजूदा चुनाव का सबसे बड़ा सबक होगा कि जब प्रमुख दलों में मुख्य नीतियों में फरक न रह जाए तब एक संघर्षशील प्रतिपक्ष को खड़ा करने के लिए सक्रिय हुआ जाए ।

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  1. प्रेस का यह कर्तव्य होगा कि चुनाव तथा प्रत्याशियों के बारे में निष्पक्ष रिपोर्ट दे । समाचारपत्रों से अस्वस्थ्य चुनाव अभियानों में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । चुनावों के दौरान किसी प्रत्याशी , दल या घटना के बारे में अतिशियोक्तिपूर्ण रिपोर्ट न दी जाए । वस्तुत: पूरे मुकाबले के दो या तीन प्रत्याशी ही मीडिया का सारा ध्यान आकर्षित करते हैं । वास्तविक अभियान की रिपोर्टिंग देते समय समाचारपत्र  को किसी प्रत्याशी द्वारा उठाये गये किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहिए और न ही उसके विरोधी पर कोई प्रहार करना चाहिए ।
  2. निर्वाचन नियमावली के अन्तर्गत सांप्रदायिक अथवा जातीय आधार पर चुनाव अभियान की अनुमति नहीं है । अत: प्रेस को ऐसी रिपोर्टों से दूर रहना चाहिए जिनसे धर्म, जाति , मत , सम्प्रदाय अथवा भाषा के आधार पर लोगों के बीच शत्रुता अथवा घृणा की भावनाएं पैदा हो सकती हों ।
  3. प्रेस को किसी प्रत्याशी के चरित्र या आचरण के बारे में या उसके नामांकन के संबंध में अथवा किसी प्रत्याशी का नाम अथवा उसका नामांकन  वापस लिये जाने के बारे में ऐसे झूटे या आलोचनात्मक वक्तव्य छापने से बचना चाहिए जिससे चुनाव में उस प्रत्याशी की संभावनाएं दुष्प्रभावित होती हों । प्रेस किसी भी प्रत्याशी/दल के विरुद्ध अपुष्ट आरोप प्रकाशित नहीं करेगा ।
  4. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल की छवि प्रस्तुत करने के लिए किसी प्रकार का प्रलोभन – वित्तीय या अन्य स्वीकार नहीं करेगा । वह किसी भी प्रत्याशी/दल द्वारा उन्हें पेश किया गया आतिथ्य या अन्य सुविधायें स्वीकार नहीं करेगा ।
  5. प्रेस किसी प्रत्याशी/दल – विशेष के प्रचार में शामिल होने की आशा नहीं की जाती । यदि वह करता है तो वह अन्य प्रत्याशी/दल को उत्तर का अधिकार देगा ।
  6. प्रेस किसी दल/ सत्तासीन सरकार की उपलब्धियों के बारे में सरकारी खर्चे पर कोई विज्ञापन स्वीकार / प्रकाशित नहीं करेगा ।
  7. प्रेस निर्वाचन आयोग/निर्वाचन अधिकारियों अथवा मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा समय समय पर जारी सभी निर्देशों/अनुदेशों का पालन करेगा ।
  8. जब भी समाचारपत्र मतदान पूर्व सर्वेक्षण प्रकाशित करते हैं तो उन्हें सर्वेक्षण करवाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं का उल्लेख सावधानीपूर्वक करना चाहिए एव्म प्रकाशित होने वाली उपलब्धियों के नमूने का माप एवं उसकी प्रकृति , पद्धति में गलतियों के संभावित प्रतिशत का भी ध्यान रखना चाहिए । [ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदान पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगा दी गयी है ।-सं. ]
  9. अगर चुनाव अलग चरणों में हो तो किसी भी समाचारपत्र को मतदान पूर्व सर्वेक्षण चाहे वे सही भी क्यों न हो प्रकाशित नहीं करना चाहिए ।

भारत की प्रेस परिषद द्वारा चुनावों के सन्दर्भ में उपर्युक्त दिशा निर्देश जारी किए गए हैं । अपने मुख्य ब्लॉग की एक प्रविष्टी को पुष्ट करने के लिए इन निर्देशों को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है । उक्त प्रविष्टि के तथ्यों के प्रति भारत के चुनाव आयोग तथा सम्बन्धित अखबारों के सम्पादकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पत्र लिख दिए गए हैं । सम्पादकों द्वारा  उचित कार्रवाई न किए जाने पर प्रेस परिषद को लिखा जायेगा ।  मीडिया के इस गैर जिम्मेदाराना आचरण के विरुद्ध , लोकतंत्र के हक में पाठकों की आम राय प्रकट हुई है । इसकी हमें उम्मीद थी तथा इससे हमें नैतिक बल मिला है ।

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[ लेखक समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा अर्थशास्त्री हैं | डा. राममनोहर लोहिया की प्रसिद्ध पुस्तक Marx , Gandhi and Socialism का एक अध्याय है-Economics after Marx |प्रस्तुत आलेख उसके आगे का कथन है | ]

मानव इतिहास के हर दौर में दुनिया को बदलने और बेहतर बनाने की कोशिशें हुई हैं। ऐसी हर कोशिश के पीछे दुनिया की मौजूदा व्यवस्था और विकास की एक समझ रहती है। मार्क्स और गांधी आधुनिक युग के दो प्रमुख विचारक रहे हैं जिनकी सोच व समझ परिवर्तनकर्मियों के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत रही है । डॉ. राममनोहर लोहिया जिनकी जन्म शताब्दी इस वर्ष मनायी जाने वाली है , को मार्क्स और गांधी के बीच एक वैचारिक पुल बनाने वाला माना ज सकता है ।

कार्ल मार्क्स ने हमे बताया कि किस प्रकार पूंजीवाद का पूरा ढाँचा मजदूरों के शोषण पर टिका है । मजदूर की मेहनत से जो पैदा होता है , उसका एक हिस्सा ही उसको मजदूरी के रूप में दिया जाता है । शेष हिस्सा ‘अतिरिक्त मूल्य’ होता है , जो पूँजीपति के मुनाफे का आधार होता है । यही मुनाफा पूँजीवादी विकास का आधार होता है । मार्क्स ने कल्पना की थी कि औद्योगीकरण के साथ बड़े बड़े कारखानों में बहुत सारे मजदूर एक साथ काम करेंगे । वर्ग चेतना के विकास के साथ वे संगठित होंगे , ज्यादा मजदूरी पाने के लिए आन्दोलन करेंगे । लेकिन मुनाफा और मजदूरी एक साथ नहीं बढ़ सकते । यही वर्ग संघर्ष बढ़ते बढ़ते क्रांति का रूप ले लेगा और तब समाजवाद आएगा । मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि पश्चिम यूरोप जहाँ पूँजीवादी औद्योगीकरण सबसे पहले व ज्यादा हुआ है , वहीं क्रांति सबसे पहले होगी ।

किन्तु मार्क्स की भविष्यवाणी सही साबित नहीं हुई । क्रांति हुई भी तो रूस में , जो अपेक्षाकृत पिछड़ा , सामंती और कम औद्योगीकृत देश था । इसके बाद चीन में क्रांति हुई , वहाँ तो औद्योगीकरण नहीं के बराबर हुआ था । चीन की क्रांति तो पूरी की पूरी किसानों की क्रांति थी , जबकि मार्क्स की कल्पना थी कि सर्वहारा मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ होगा । पश्चिमी यूरोप में पूँजीवादी औद्योगीकरण के दो सौ वर्ष बाद भी क्रांति नहीं हुई । पूँजीवाद भी इस दौर में नष्ट होने के बजाए , संकटों को पार करते हुए , फलता फूलता गया ।

मार्क्सवाद की इस उलझन को सुलझाने का एक सूत्र तब मिला जब १९४३ में डॉ. राममनोहर लोहिया का निबन्ध ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ प्रकाशित हुआ । इसे दुनिया के गरीब पिछड़े मुल्कों के नजरिए से मार्क्सवाद की मीमांसा भी कहा जा सकता है । लोहिया ने बताया की पूंजीवाद का मूल आधार पूंजीवादी देशों में पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण नहीं बल्कि उपनिवेशों के किसानों ,कारीगरों और मजदूरों का शोषण है । यही ‘अतिरिक्त मूल्य’ का मुख्य स्रोत है । इसीके कारण पूंजीवादी देशों में मुनाफा मजदूरी का द्वन्द्व टलता गया , क्योंकि दुनिया के विशाल औपनिवेशिक देशों की लूट का एक हिस्सा पूंजीवादी देशों के मजदूरों को भी मिल गया । यह संभव हुआ कि मजदूरी और मुनाफा दोनों साथ साथ बढ़ें। इसीलिए पश्चिमी यूरोप में क्रांति नहीं हुई । इसी के साथ लोहिया ने लेनिन की इस बात को भी काटा कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अन्तिम अवस्था है । लोहिया ने कहा कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का प्रारंभ और विकास एक साथ हुआ । बिना साम्राज्यवाद के पूंजीवाद का विकास हो ही नहीं सकता । मार्क्स की ही एक शिष्या रोजा लक्समबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद के विकास के लिए एक बाहरी उपनिवेश जरूरी है , जहाँ के बाजारों में माल बेचा जा सके और जहाँ से सस्ता कच्चा माल और सस्ता श्रम मिल सके । इसी विश्लेषण के आधार पर लोहिया ने कहा कि असली सर्वहारा तो तीसरी दुनिया के किसान मजदूर हैं । वे ही पूंजीवाद की कब्र खोदेंगे ।

जब लोहिया ने यह निबंध लिख तब दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था और उसके पहले जबरदस्त मंदी का दौर आ चुका था । पूंजीवाद के संकटों को समझने के लिए भी लोहिया ने एक नई दृष्टि दी । कीन्स और मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों के मुताबिक पूंजीवादी देशों की उत्पादन क्षमता और मांग या क्रय शक्ति के अंतर से ये संकट आते हैं । लोहिया के मुताबिक सिर्फ इतना कहना अर्ध सत्य है । इन संकटों का असली स्रोत साम्राज्यवादी प्रक्रिया में है । लोहिया के शब्दों में , ‘ उत्पादन के पुराने तरीके से किसी साम्राज्यवादी क्षेत्र की शोषण – सीमा के समाप्त होने पर आर्थिक संकट उत्पन्न होता है , जो किसी नये क्षेत्र की खोज के उपरान्त समाप्त होता है , जहाँ नये आविष्कारों का उपयोग किया जा सके ।’

इसी विश्लेषण के आधार पर लोहिया ने उस निबंध में कहा कि चूंकि पूरी दुनिया को उपनिवेश बनाया जा चुका है , अब कोई नया भूभाग उपनिवेश बनाने के लिए बचा नहीं है, पूंजीवाद स्थाई संकट की अवस्था में पहुंच गया है । इसकी वृद्धि का मार्ग बन्द हो चुका है , इसकी सीमा आ चुकी है । या तो यह टूट जायेगा या धन के निम्न स्तर पर स्थायित्व प्राप्त कर लेगा । पूंजीवाद के सिरमौर के रूप में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के उदय और पश्चिमी यूरोप की जगह लेने को लोहिया नो्ट करते हैं लेकिन उसके नेतृत्व में पूंजीवाद के संकट का हल हो सकेगा ,इसमें वे गहरी शंका जाहिर करते हैं ।

[ जारी ]

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[ इस पोस्ट में सेक्स तथा यौनिकता आदि पर भी चर्चा है। जिन्हें यह विषय अनुचित लगता हो कृपया आगे न पढ़ें ।]

उद्योग- व्यवसाय में सरकार का हस्तक्षेप  उत्तरोत्तर कम होता चला जाए – यह ग्लोबीकरण का एक प्रमुख औजार था । बहरहाल , चक्की उलटी चलनी शुरु हुई है । विभिन्न बड़े उद्योगों को दीवालिया होने से बचाने के लिए सरकारी खजानों से मदद देना शुरु हो गया है । अमेरिकी सरकार ने सब से पहले बैंक/बीमा और फिर मोटरगाड़ी उद्योग को बड़ी मदद देने की घोषणाएं की हैं ।

अमेरिकियों की यौनेच्छा को जागृत करने के लिए पोर्न उद्योग के कर्णधारों ने भी दो दिन पहले अमेरिकी सरकार से एक प्रेस कॉन्फ़रेन्स बुला कर ५ अरब डॉलर की मदद की गुहार लगाई है। इन पुरोधाओं का कहना है कि चूँकि अमेरिकी संसद प्रमुख उद्योगों को मदद देने की बात सोच रही है इसलिए १३ अरब डॉलर के इस उद्योग पर भी विचार किया जाए । ‘हसलर’ पत्रिका के मालिक लैरी फ़्लिन्ट और टेलिविजन कार्यक्रम ‘गर्ल्स गॉन वाइल्ड’ के निर्माता जो फ़्रन्सिस ने यह प्रेस कॉन्फ़रेंस बुलायी थी । फ़्लिन्ट का कहना है कि लाजमी तौर पर मन्दी के दौर में अमेरिकियों की यौनेच्छा कम हो गयी है तथा भले ही मो्टर गाड़ियां न खरीदी जाए लेकिन इस बीमारी को व्यापक होने नहीं दिया जा सकता है ।

मिलते – जुलते सन्दर्भों में भारतीय मीडिया और यौन- उद्योगपर दृष्टिपात करें । मेरे अन्दाज से भारतीय यौन-उद्योग बाजार का असंगठित क्षेत्र अखबार और टेलिविजन से प्रभावित नहीं होता । मजमा लगा कर जन सम्प्रेषण हेतु ‘लकड़ी पर मारोगे बोलेगा खट – खट , लोहे पर मारोगे बोलेगा टन टन्न’ जैसे मन्त्रोच्चार द्वारा जरूरतमन्दों को अपने उत्पाद बेचने वाले समूह आधुनिकता के इस दौर में पूरी तरह लुप्त नहीं हुए हैं । बल्कि,हिन्दी अखबार मन्दी के इस दौर में यौन-मन्दी को  एक व्यापक महामारी का दरजा देते हुए लगता है अपनी मन्दी दूर करना चाहते हैं । मेरे घर हिन्दुस्तान अखबार आता है और यह अखबार ऐसे विज्ञापनों से अटा पड़ा रहता है । अखबार की की्मत तीन से साढे तीन करते वक्त बिड़ला का यह अखबार हॉकरों का कमीशन नहीं बढ़ाता है और विज्ञापन की आमदनी के लिए इन विज्ञापनों द्वारा युवाओं में भ्रम झूट और भय फैलाने में गुरेज नहीं करता ।

हास्यास्पद यह है कि यही विज्ञापन उसी प्रकाशन के अंग्रेजी अखबार Hindustan Times में नहीं छपते ! क्या अंग्रेजी जा्नने वाले इन ‘व्याधियों’ से पीड़ित नहीं होते? या उन्हें इन झोला छाप डॉक्टरों तथा भ्रामक उत्पादों की आवश्यकता नहीं होती? वे बड़े अस्पतालों के प्रजनन क्लीनिकों में जाते होंगे !

इन विज्ञापनों की एक बानगी देखें :

सदियों से स्त्री की सुंदरता को देखकर पुरुष युवावस्था में अपने मन में अलग-२ विचारधाराएं बनाता और सोचता है और मनघडंत खयालों में उलझ कर उस पर मोहित होता आया है । जिसके फलस्वरूप कामदेव के तीर के प्रभाव में आकर वह अपने हाथों से अपने जोश को शांत करने की कोशिश में अलग-२ प्रक्रियाएं करता अहता है । अपनी अज्ञानता व नासमझी के कारण वह इन्द्रियों व नसों के विकास को रोक देता है और विभिन्न प्रकार की व्याधियों जैसे कि स्वप्नावस्था में ही शरीर की सबसे कीमती धातु का निकल जाना,… आदि को जाने अनजाने में निमन्त्रण दे बैठता है ।

—  मैं पी.के. चतुर्वेदी उम्र ४५ वर्ष अपनी कुछ कमजोरियों व बचपन की गलतियों की वजह से वैवाहिक जीवन का सुख न तो ले पा रहा था नाही पत्नी को वैवाहिक जीवन का सुख दे पा रहा था ।—— फिर मुझे ऐसा लगा कि मेरी कमजोरी की वजह से मेरी पत्नी दूसरों की तरफ आकर्षित होने लगी है । … जापानी तेल लगाना शुरु करने के बाद मुझे कुछ आराम मिलना शुरु हुआ । सुबह शाम रोजाना लगाना शुरु किया जिससे मेरा आत्म वि्श्वास बढ़ना शुरु हुआ और एक महीने के अन्दर सालों पुरानी मेरी समस्या जिसके कारण मेरी पत्नी मुझसे दूर हो रही थी उस समस्या से मुझे जापानी तेल से बहुत आराम मिला।

इसी तेल का एक अन्य विज्ञापन कहता है ,’आप के शरीर का एक एक अंग अनमोल है कृपया साधारण तेल लगाने से बचें ।

इन विज्ञापनों द्वारा तरुणों में हस्त मैथुन , स्वप्नदोष की बाबत भ्रम , भय फैलाने और उस आधार पर अपने उत्पाद बेचने की मंशा रहती है । क्या इन अखबारों के प्रकाशन हेतु जिम्मेदार इन सामान्य से तथ्यों को नहीं जानते कि यह विज्ञापन भ्रामक ,झूटे और भय पैदा करने वाले हैं तथा हस्त मैथुन किसी स्थायी व्याधि का कारण नहीं है ?

क्या प्रेस काउंसिल ऑफ़ इण्डिया ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती ?

हिन्दी अखबारों के विज्ञापनों में यौनिकता की विकृतियों के बारे में कभी और चर्चा करेंगे ।


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