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Archive for the ‘samajwadi janparishad’ Category

प्रेस विज्ञप्ति
केसला, जनवरी 9।
अघोषित छुपा धन समाप्त करने,नकली नोटों को ख़त्म करने तथा आतंकियों के आर्थिक आधार को तोड़ने के घोषित उद्देश्यों को पूरा करने में नोटबंदी का कदम पूरी तरह विफल रहा है। इसके साथ ही इस कदम से छोटे तथा मझोले व्यवसाय व् उद्योगों को जबरदस्त आघात लगा है।महिलाओं, किसानों और मजदूरों तथा आदिवासियों की माली हालत व रोजगार के अवसरों पर भीषण प्रतिकूल असर पड़ा है।इस संकट से उबरने में लंबा समय लग जाएगा।
उपर्युक्त बाते समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की होशंगाबाद जिले के ग्राम भूमकापुरा में हुई बैठक में देश की वर्तमान परिस्थिति पर पारित प्रस्ताव में कही गयी है।इस प्रस्ताव में कहा गया है कि केंद्र सरकार का ‘नागदीविहीन अर्थव्यवस्था’ का अभियान चंद बड़ी कंपनियों को विशाल बाजार मुहैया कराने के लिए है। प्रस्ताव में कहा गया है कि जमीन, मकान तथा गहनों की खरीद फरोख्त में नागदविहीन लेन देन को अनिवार्य किए जाने से छुपे,अघोषित धन के एक प्रमुख स्रोत पर रोक लगाई जा सकती है परंतु सरकार की ऐसी कोई मंशा दिखाई नहीं दे रही है।
एक अन्य प्रस्ताव में विदेशों से गेहूं के आयात पर आयात शुल्क पूरी तरह हटा लिए जाने की घोर निंदा की गयी तथा समस्त किसान संगठनों से आवाहन किया गया कि इस निर्णय का पुरजोर विरोध करें।
दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भारत के चुनाव आयोग से मांग की है कि पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों के पूर्व आम बजट पेश करने पर रोक लगाए।आयोग को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि आगामी 31 मार्च 2017 के पूर्व बजट पेश करना गैर जरूरी है तथा यह चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित करेगा।
दल का आगामी राष्ट्रीय सम्मलेन 29,30 अप्रैल तथा 1मई को पश्चिम बंग के जलपाईगुड़ी में होगा।सम्मलेन में नौ राज्यों के 250 प्रतिनिधि भाग लेंगे।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुख्यत: निशा शिवूरकर,संतू भाई संत,विक्रमा मौर्य, राजेंद्र गढवाल, रामकेवल चौहान,अनुराग मोदी,फागराम,अखिला,रणजीत राय,अफलातून,स्मिता,डॉ स्वाति आदि ने भाग लिया।अध्यक्षता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जोशी जेकब ने की।
प्रेषक,
अफलातून,
राष्ट्रीय संगठन मंत्री,समाजवादी जनपरिषद।

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बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

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जब देश की राजनीति बहुत नीचे गिरने लगी और उसमें भ्रष्टाचार , स्वार्थ , मौकापरस्ती और सिद्धांतहीनता का बोलबाला होने लगा तब देश को बचाने के लिए १९९५ महाराष्ट्र के ठाणे में समाजवादी जनपरिषद नामक एक नई राजनैतिक पार्टी का गठन किया गया । उसका उद्देश्य अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी,ऊंच-नीच,शोषण और पर्यावरण नाश करनेवाली मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था को जड़ से मिटाना है – एक नया भारत और एक नयी दुनिया बनाना है । इसके लिए नीचे से लोगों की समस्याओं के लिए संघर्ष करते हुए जनशक्ति का निर्माण , जनजागृति और रचनात्मक कार्यों का रास्ता इसने चुना है । देश के नौ राज्यों – बंगाल,बिहार,झारखंड,ओड़िशा,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,म्महाराष्त्र,केरल और दिल्ली में इसकी इकाइयां हैं । महात्मा गाम्धी,राममनोहर लोहिया,बाबा साहब अम्बेडकर ,बिरसा मुंडा और किशन पटनायक इसके प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन यह किसी एक व्यक्ति का अंधानुकरन भी नहीं करती है । देश को बदलना है तो राजनीति को बदलना होगा। बेईमानों, मौकापरस्तों और देश के दुश्मनों के हाथ में राजनीति कैद है। उनके कब्जे से छुड़ाकर राजनीति को किसानों , मजदूरों , छोटे दुकानदारों, नौजवानों,पिछड़ों,दलितों,आदिवासियों और महिलाओं के हक में संघर्ष का औजार बनेगी समाजवादी जनपरिषद। आप भी इस मुहिम में शामिल हों।
सुनील जोशी जेकब
महामंत्री अध्यक्ष
समाजवादी जनपरिषद समाजवादी जनपरिषद

कोक विरोधी प्रदर्शन

मेहदीगंज,कोक विरोधी प्रदर्शन

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                               समाजवादी जनपरिषद
समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की दो दिवसीय बैठक की समाप्ति पर देश की राजनैतिक परिस्थिति यह वक्तव्य जारी किया गया है । वाराणसी के पाण्डे हवेली में सम्पन्न इस बैठक में दल के राष्ट्रीय महासचिव सुनील , उपाध्यक्ष कमल बनर्जी तथा लिंगराज प्रधान , सचिव अफलातून एवं रणजीत रॉय ने भाग लिया ।
बयान
वाराणसी , दिसम्बर 23
देश में वैकल्पिक तीसरी ताकत जरूरी है पिछले दिनों संपन्न हुए पांच विधानसभा चुनावों के नतीजों से एक बात साफ हुई है । कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से जनता त्रस्त हो गई है और इसे हटाना चाहती है । मंहगाई और रोजी-रोटी का संकट इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा था , भ्रष्टाचार दूसरे नम्बर का मुद्दा था । दोनों का गहरा संबंध मौजूदा विकास-नीति और वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की जन-विरोधी नीतियों से हैं जिन पर मनमोहन सरकार आंख मूंदकर चल रही है । इस मायने में यह इन नीतियों के खिलाफ एक वोट था । चूंकि किसी राजनैतिक दल ने चुनाव में इन नीतियों को मुद्दा नहीं बनाया ,खुले रूप में यह बात सामने नहीं आ पाई है । दिल्ली में आम आदमी पार्टी के रूप में एक नई पार्टी का उदय और उसे अच्छी चुनावी सफलता एक महत्वपूर्ण घतना है । समाजवादी जन परिषद ‘आआपा’ को और दिल्ली की जनता को इसके लिए बधाई देती है । इसने जाहिर किया कि जन-विरोधी कामों,भ्रष्टाचार,अवसरवाद और सिद्धान्तहीनता का पर्याय बन चुकी मौजूदा पार्टियों से जनता मुक्ति चाहती है और बदलाव चाहती है । यह भी भी जाहिर हुआ कि ईमानदारी , पारदर्शिता व सिद्धान्त के साथ रअजनीति की जा सकती है । देश में माफिया , भ्रष्टाचार , दो नंबरी पैसे और राजनीति का जो नापाक गठजोड़ बन चुका है जिसमें राजनीति कमाई का एक जरिया और धंधा बन चुकी है , उससे अलग जनता के चंदे से भी चुनाव लड़ा जा सकता है, यह जाहिर हुआ । वैकल्पिक राजनीति की नई संभावनायें पैदा हुई हैं । आगामी चुनाव नरेन्द्र मोदी और भाजपा की आसान जीत में एक रुकावट और तीसरी ताकत की संभावना भी बढ़ी है । लेकिन समाजवादी जन परिषद यह भी मानती है कि वैकल्पिक नीतियों और विचार के साथ जुड़ने से ही सही मायने में राजनैतिक विकल्प बन सकेगा और व्यवस्था में बदलाव आ सकेगा । बिना विचार के कोई क्रांति नहीं हो सकती । समाजवादी जन परिषद मानती है कि भारत की मौजूदा व्यवस्था में बुनियादी बदलाव के लिए तीन मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण है :

1.वैकल्पिक विकास मॉडल और वैकल्पिक अर्थनीति
2.सामाजिक बराबरी (जिसमें स्त्री-पुरुष बराबरी , जाति आधारित भेदभाव से संघर्ष एवं आदिवासियों और अन्य वंचित समोदायों के प्रति न्याय न्याय ,शामिल है है ); और
3.कट्टरता ,संकीर्णता और सांप्रदायिकता की ताकतों से संघर्ष ।

समाजवादी जनपरिषद आह्वान करती है कि इन मुद्दों पर देश में संघर्ष और राजनीति की धारा को आगे बढ़ाया जाए । आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले मोर्चों के खिलाफ एक तीसरी वैकल्पिक राजनैतिक ताकत का उभरना जरूरी है। नरेन्द्र मोदी के रूप में सांप्रदायिक , तानाशाही और कार्पोरेट ताकतों के नए गठजोड़ का जो खतरा सामने है , उसका मुकाबला भी करना जरूरी है । इस संदर्भ में व्यापक एकता बनाने के लिए ‘आआपा’,सोशलिस्ट पार्टी व अन्य दलों , जनांदोलनों आदि संवाद की पहल समाजवादी जन परिषद करेगी।वाराणसी , 23 / 12/ 2013 प्रेषक, अफलातून

— Aflatoon अफ़लातून ,राष्ट्रीय सचिव ,समाजवादी जनपरिषद ,५ , रीडर आवास ,जोधपुर कॉलॉनी,काशी विश्वविद्यालय , वाराणसी – २२१००५National Secretary,Samajwadi Janparishad,5,Readers Flats,Jodhpur Colony,Banaras Hindu University,Varanasi,Uttar Pradesh,INDIA 221005Phone फोन : +918004085923

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समाजवादी जनपरिषद
राष्ट्रीय परिपत्र सं. ०२ / २०१३

                                                                                                           दिनांक अक्टूबर ११ , २०१३

प्रिय साथी ,
खादी परिसर , कन्हौली, मुजफ्फरपुर में ८-९ अक्टूबर २०१३ को सजप की राष्त्रीय कार्यकारिणी की बैठक सम्पन्न हुई । इसी जगह दिनांक ६ से ८ अक्टूबर को विद्यार्थी युवजन सभा का राष्ट्रीय शिबिर तथा सम्मेलन भी सम्पन्न हुआ। कार्यकारिणी की बैठक में साथी जोशी जेकब,कमल बनर्जी,लिंगराज,शिवाजी गायकवाड़,सुनील,निशा शिवूरकर,रणजीत,लिंगराज आजाद,अफलातून,बालेश्वर प्रसाद,राधाकांत बहिदार,डॉ स्वाति,संतू भाई संत, नवल किशोर सिंह,सुधाकरराव देशमुख,सरयू प्रसाद सिंह,बालकृष्ण संढ,रामकेवल चौहान,सच्चिदानन्द सिन्हा,विश्वनाथ बागी,अखिला,नरेन्द्र सिंह,नवीन,जगतनारायण,रणजीत,अरमा

न, तथा शिवली ने भाग लिया।

विभिन्न राज्यों तथा वि.यु.स की रपट प्रस्तुत की गई। मऊ,उ.प्र के दल के वरिष्ट साथी बृजबिहारी मल्ल की मृत्यु तथा महाराष्ट्र के अंधश्रद्धा निर्मूलन नेता डॉ नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या पर शोक प्रस्ताव पारित किए गए। मौजूदा आर्थिक राजनैतिक स्थिति पर तफसील से चर्चा के बाद सर्वसम्मति प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव संलग्न है ।
आगामी दिनों में होने वाले विधान सभा के चुनावों में सजप मध्य प्रदेश के चार जिलों की चार सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।इस बाबत राज्य समिति शीघ्र निर्णय लेगी।
महाराष्ट्र तथा ओड़ीशा में राज्य स्तरीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिबिर संपन्न हुए हैं। साथी निशा शिवूरकर तथा शिवाजी गायकवाड़ ने सूचित किया कि ‘किशन पटनायक ट्रस्ट’ के गठन का काम शुरु किया जा चुका है।इसके मसविदे को पढ़कर विचार देने के लिए उन्होंने निवेदन किया।
वि.यु.स के शिबिर/सम्मेलन के विशेष सत्र में नियमगिरी सुरक्षा आन्दोलन से जुड़े दल के साथी राजकिशोर,राष्ट्रीय सचिव लिंगराज आजाद तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का सार्वजनिक सम्मान किया गया। पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. महेन्द्र कर्ण इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे तथा वरिष्त साथी विश्वनाथ बागी ने अध्यक्षता की ।
फैसला हुआ कि दल के अभिलेख,रजिस्टर इत्यादि अफलातून व चंचल मुखर्जी डॉ सोमनाथ त्रिपाठी से प्राप्त करेंगे। बैंक खाता स्थान्तरण हेतु भी डॉ सोमनाथ त्रिपाठी से यह दोनों साथी बात करेंगे।
कर्नाटक की युवा समाजवादी अधिवक्ता साथी अखिला ने दल की सदस्यता ग्रहण की है । उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का निमन्त्रित सदस्य बनाया गया। दल के वरिष्ट साथी चंचल मुखर्जी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थायी निमन्त्रित होंगे। राष्ट्रीय महामंत्री सुनील ने आवाहन किया कि दल के दस हजार सदस्य बनाये जांए ।
अक्टूबर २,२०१३ से मार्च ८ , २०१४ तक महिला केन्द्रित कार्यक्रम लेने का फैसला राष्ट्रीय सम्मेलन में हुआ था। कार्यकारिणी की इस बैठक में निर्णय लिया गया है कि इस अवधि में हर जिला इकाई नर-नारी समता के मुद्दे पर एक शिविर आयोजित करेगी जिसमें पुरुष साथियों के अलावा महिला साथियों की अच्छी भागीदारी का प्रयास करना होगा। इसी अभियान के तहत जनवरी३ ,२०१४ को सावित्रीबाई फुळे की जयन्ती के मौके पर स्त्री-शिक्षा पर केन्द्रित कार्यक्रम लिए जाएंगे। दलित-स्त्री उत्पीड़न पर निशा शिवूरकर शीघ्र एक नोट प्रसारित करेंगी।
नीचे लिखी जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं –
महाराष्ट्र ;उ.प्र -सुनील,  ओड़ीशा; – कमल बनर्जी,रणजीत,  बिहार-कमल बनर्जी,रणजीत,चंचल मु

खर्जी   झारखण्ड;किसान मोर्चा-लिंगराज ,  दक्षिण भारत – जोशी जेकब,  असंगठित मजदूर- सुभाष लोमटे   पूर्वोत्तर राज्य – कमल बनर्जी,   म.प्र.;केरल; महिला मोर्चा – निशा शिवूरकर,  शिवाजी गायकवाड-गोआ, आन्ध्र प्रदेश;दलित आदिवासी मोर्चा;विस्थापित आन्दोलन – लिंगराज आजाद,    दिल्ली;पश्चिम बंग; वि.यु.स. – अफलातून ।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की अगली बैठक कर्नाटक में १०,११,१२ जनवरी २०१४ को होगी ।
कृपया परिपत्र मिलने की सूचना पोस्ट कार्ड द्वारा अवश्य दीजिए।अपने अपने राज्यों के अध्यक्ष-महामंत्री के पते/फोन मुझे भेजें तथा राज्य समिति के सदस्यों की पतों सहित सूची संगठन मंत्री को भेजें । सभी कार्यक्रमों की रपट राष्ट्रीय कार्यालय (राजनारायण स्मृति भवन,ग्रा/पोस्ट केसला,वाया इटारसी,जि होशंगाबाद,म.प्र – ४६११११) को भेजें।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
आपका,
अफलातून.
राष्ट्रीय सचिव, ५ रीडर आवास,जोधपुर कॉलोनी,काशी विश्वविद्यालाय,वाराणसी-२२१००५. (उ.प्र.)

देश व दुनिया के हालात पर प्रस्ताव ,समाजवादी जनपरिषद राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक 8-9 अक्टूबर 2013, मुजफ्फरपुर (बिहार)

देश व दुनिया के हालात पर प्रस्तावसमाजवादी जनपरिषद राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक 8-9 अक्टूबर 2013, मुजफ्फरपुर (बिहार),    डाॅलर की तुलना में रूपये का मूल्य में तेज गिरावट रूपी लक्षण के माध्यम से भारत का गंभीर आर्थिक संकट हाल में प्रकट हुआ। देश फिर एक बार 1991 जैसी हालात के कगार पर है इस तरह की चर्चा भी होने लगी। लेकिन बाद में मामूली सुधार के आधार पर केन्द्र सरकार की ओर से यह अहसास पैदा करने की कोशिश हो रही है कि सब कुछ सामान्य हो जाएगा। वास्तव में देश की गंभीर आर्थिक हालत आज भी बरकरार है। देश के विदेशी व्यापार के भुगतान संतुलन में जो जबरदस्त घाटा पैदा हो चुका है, इस संकट का यह एक मूल कारण है। विगत दो दशकों से उदारीकरण-भूमंडलीकरण के नाम पर जो नीतियां चलायी गयीं, उसके एक तार्किक नतीजे के रूप में इस संकट को देखा जा सकता है। देश के बाजार को विदेशी पूंजी व विदेशी कंपनियों के लिए संपूर्ण मुक्त कर निर्यात बढ़ावे की मृग मरीचिका के पीछे दौड़ने का फलस्वरूप विदेशी व्यापार के चालू खाते में घाटा बढ़ता गया एवं सरकार द्वारा विदेशी कर्ज और विदेशी पूंजी के जरिए उसको ढ़कने का नतीजा आज का मूल संकट है। विश्व बैंक-मुद्रा कोष निर्देशित इन नीतियों के नतीजों से सबक लेकर देश को इस संकट से उबारने की वैकल्पिक नीति के बारे में सोचने के बजाय मुद्राकोष के पूर्व पदाधिकारी वफादार अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह उसी विचार के अपनी अर्थशास्त्री टोली के सहारे उन्हीं नीतियों को और तेज करने पर तुले हुए हैं। मनमोहन सिंह के नक्शे कदम पर मुद्राकोष में पदाधिकारी बनकर अमेरीका का राष्ट्रपति के भी आर्थिक सलाहकार के रूप में काम करने के बाद लौटे हाल में भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाए गए रघुराम राजन को इस संकट का तारणहार के रूप में पेश किया जा रहा है। समाजवादी जनपरिषद का स्पष्ट मत है कि जिन आर्थिक नीतियों के चलते आज का संकट गहराया है उन्हीं नीतियों को और तेज करने से यह संकट और घनीभूत होगा। स0ज0प0 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का मानना है कि इस विदेशी कर्ज और विदेशी पूंजी पर निर्भर आर्थिक नीति को त्याग कर एक वैकल्पिक विकास माॅडल के साथ देश हित में स्वावलम्बी आर्थिक नीति अपनाने से ही देश इस गंभीर संकट से निजात पा सकता है।     देश जब न सिर्फ विदेशी व्यापार के क्षेत्र में इस तरह का आर्थिक संकट से जूझ रहा है, बल्कि देश की आम जनता उसके ही परिणाम स्वरूप गंभीर रोजमर्रा समस्याओं का सामना कर रही हैं, तब देश का प्रमुख विपक्षी दल भा0ज0पा0 नरेंद्र मोदी को अपने प्रधान मंत्री के रूप में पेश करने बाद वही पुरानी हिन्दूत्ववादी कार्ड खेल कर आगामी विधान सभा और लोकसभा चुनाव में जनमानस को गोलबंद करने की रणनीति के साथ उतर चुकी है। शासक कांग्रेस दल भी नरेंद्र मोदी को एक सांप्रदायिक खलनायक के रूप में हमला करते हुए देश में राजनैतिक बहस को सेक्यूलारवाद बनाम सांप्रदायिकता में केन्द्रीत करने की राणनीति को आजमा रही है। देश के दूसरे स्थापित दल भी इसी कृत्रिम वाद बहस के ईदगिर्द मोर्चाबंदी में लग गए हैं। इस तरह का राजनैतिक धु्रवीकरण का माहौल भी 1991 के दौर की स्थिति की याद को ताजा करता है। जब देश ड़ंकल प्रस्ताव को अपना कर एक नयी गुलामी का चक्रव्यूह में फंसने जा रहा था, तब इसी विचारधारा की ताकतें बाबरी मस्जिद- राममंदिर का दंगल को तीव्र कर आम जनता को सांप्रदायिक तनाव की आग में झोंकने का काम कर रही थी। राजनीति के तथाकथित गैर-सांप्रदायिक ताकतों ने इसी को सबसे बड़ा खतरा बताकर देश की अर्थ व्यवस्था को नयी गुलामी की ओर ढ़केलने में मदद की थी। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किए जाने का भाजपा के निर्णय के बाद उसके दाहिने हाथ माने जाने वाले अमित शाह को उ0प्र0 का प्रभारी बनाया गया एवं उनके मागदर्शन में उ0प्र0 में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की सुनियोजित साजिश जारी है। इसी के तहत अयोध्या से 84 कोसी यात्रा निकालने की असफल कोशिश हुई। बाद में पश्चिम उ0प्र0 के मुजफ्फरनगर इलाके में जाठ-मुसलमान सांप्रदायिक सदभाव को समाप्त करने के लिए जो कोशिश चल रही थी, उसके भयंकर परिणाम के रूप में हाल का दंगा हुआ। गाँव-गाँव दंगा फैल गया एवं बड़ी संख्या में मासूम मुसलमान मारे गए। जो भारतीय किसान यूनियन एक जमाने में सांप्रदायिक सदभाव का वाहक माना जाता था वह भी इस आगजनी में शामिल हो गया। यह एक बहुत ही चिंताजनक घटना है। समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी आगामी लोकसभा चुनाव को नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी के रूप में पेश करने की नूरा कुश्ती को भारतीय लोकतंत्र के प्रति एक मजाक मानती है एवं आम जनता से अपील करती है कि इन राजनैतिक दलों की साजिश को समझें तथा देश व जनता जूझ रही बुनियादी समस्याओं को चुनाव का केन्द्रीय मुद्दा बनाने के लिए दबाव बनाएं।     नव-उदारवाद के इस युग में देश के ज्यादातर स्थापित राजनैतिक दलों में न सिर्फ आर्थिक व विकास नीति के स्तर पर बल्कि चरित्र के स्तर पर भी वे समान बन चुके हैं। विगत कुछ दशकों में चुनाव राजनीति पर धन बल और बाहुबल का बोलबाला भयंकर बढ़ गया है। संसद और विधान सभाओं तथा अन्य निर्वाचित निकायों में पूँजीपतियों तथा अपराधी तत्वों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हो चुका है। उसके चलते देश का लोकतंत्र पर खतरा मंडरा रहा है। सभी स्तर पर भ्रष्टाचार का राज कायम हो चुका है। ऐसी परिस्थिति में जब बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिए देश के प्रमुख राजनैतिक दलों तथा संसद या विधान सभाओं से कोई पहल का संकेत नहीं मिल रहा है, तब देश का सर्वोच्च न्यायालय से एक के बाद एक राय के जरिए कानूनी व्याख्या/हस्तक्षेप से आम जनता में कुछ उम्मीद जगाने वाली घटनाएं हो रही है। दागी विधायकों तथा सांसदों को अयोग्य घोषित करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट की राय उसका ताजा और अहम उदाहरण है। इस राय को निरस्त करने के लिए विभिन्न दलों के दबाव से केन्द्र सरकार की ओर से एक अध्यादेश जारी किया गया था। लेकिन एक नाटकीय घटनाक्रम में (राहुल गांधी द्वारा उसे ‘बकवास’ करार देने के बाद) उस अध्यादेश को वापस लिया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट की राय को निरस्त करने के लिए सरकार के अध्यादेश के बाद जो जन भावना उमड़ रही थी उसका दबाव इस वापसी के निर्णय के पीछे अवश्य है। कुछ ही दिन पहले जब केन्द्रीय सूचना आयोग ने सभी बड़े राजनैतिक दलों को सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाने संबंधी राय दी थी, तब सभी दलों ने सर्वसम्मति से कानून में प्रावधान कर उसे निरस्त कर दिया था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट की एक राय के तहत वोट देते वक्त सभी प्रत्याशियों को नकारने का अधिकार ;त्पहीज जव त्मरमबजद्ध को कानूनी दर्जा दे दिया है। इस छोटे से प्रावधान से भले ही कोई विशेष गुणात्मक फर्क होने वाला नहीं है, राजनैतिक दलों पर सही उम्मीदवार खड़े करने के लिए दबाव का एक औजार बना सकता है। समाजवादी जनपरिषद राष्ट्रीय कार्यकारिणी सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा रही सकारात्मक कानूनी हस्तक्षेप को स्वागत करती है और देश के सभी स्थापित राजनैतिक दलों को आव्हान करती है कि देश में लोकतंत्र को मजबूत व बेहेतर करने संबंधी आवश्यक सुधारों के बारे में वे भी पहल करें, वरना न्यायिक सक्रियता का यह सिलसिला संसद की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकता है।     गत 18 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की जिस ऐतिहासिक राय के तहत ओडि़शा के कालाहांडि-रायगढ जिले स्थित नियमगिरि पर्वत के 12 गाँव में अगस्त-सितम्बर माह में जिला जज की निगरानी में पल्ली सभा/ग्राम सभा का आयोजन हुआ एवं उस क्षेत्र के आदिवासी/परंपरागत वनवासी लोगों को नियमगिरि में वेदांत कंपनी का बाक्साईट प्रोजेक्ट को सर्वसम्मति से नकारने का मौका मिला वह भारत के जन आंदोलनों के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना है। गत दस सालों से नियमगिरि सुरक्षा समिति के नेतृत्व में जारी मौजूदा गलत व जनविरोधी विकास माॅडल को चुनौती देने वाले इस आंदोलन में लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई करने वालों की धारा की एक महत्वपूर्ण जीत लगती है। इस आंदोलन में ओडि़शा के समाजवादी जनपरिषद के कार्यकर्ताओं का एक नेतृत्वकारी भूमिका होने को लेकर स0ज0प0 को फक्र है। कुछ साल पूर्व महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में प्रस्तावित रिलांयस कंपनी का एक एस0ई0जेड0 के खिलाफ जनआंदोलन के दरम्यान वहाँ की राज्य सरकार ने जनमत संग्रह करवाने का निर्णय लिया था और लोगों ने उस प्रोजेक्ट को बहुमत से नकार दिया था। जन आंदोलनों के दबाव से सरकार कभी कभार लोगों की राय को सुन रही है। वरना लगभग सभी जगह विकास और उद्योगीकरण के नाम पर छल बल का प्रयोग कर सरकारों ने आम जनता को कुचलने को ही अपना ‘राजधर्म’ मान लिया है। समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी नियमगिरि सुरक्षा आंदोलन की इस सफलता के लिए वहां की संघर्षशील जनता को सलाम करती है एवं सभी सरकारों से मांग करती है कोई भी प्रोजेक्ट लागु करने से पहले न सिर्फ अनुसूचित क्षेत्रों में बल्कि सभी जगह ग्रामसभा की राय को सर्वोपरि माना जाए।     गत संसद सत्र में पारित ‘भू अधिग्रहण, पुनर्वास और पुरस्थापन में न्याय और स्वच्छता कानून, 2013’ (संक्षेप में भूमि अधिग्रहण कानून) को केन्द्र सरकार एक प्रगतिशील कानून के रूप में प्रचार कर रही है। केन्द्र पंचायतीराण मंत्री जयराम रमेश दावा कर रहे हैं कि इस कानून से माओवादी समस्या का हल निकलेगा तथा विभिन्न प्रोजेक्टों के द्वारा विस्थापित लोगों का असंतोष घट जाएगा। 70 से 80 प्रतिशत लोगों की सहमति को अनिवार्य मानना एवं स्थानीय दर का 4 गुना मुआवजा देने का प्रावधान को बहुत प्रचार किया जा रहा है। लेकिन गौरतलब बात है कि यह कानून भी सिंचाई, हाइवे जैसे केई प्रोजेक्टों में लागू नहीं होगा। म0प्र0 के मुख्यमंत्री शिवराज चैहान के सुझाव पर तो भा0ज0पा0 ने सिंचाई परियोजना में इस कानून को लागु को नहीं करने का संशोधन को नए कानून में प्रावधान कर दिया है, जबकि सबसे ज्यादा लोग सिंचाई परियोजनाओं में विस्थापित होते हैं। स0प0प0 राष्ट्रीय कार्यकारिणी की स्पष्ट राय है कि इस नए कानून में न्याय और स्वच्छता’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया गया हो जनता के लिए यह एक ढकोसला है और कंपनियों के लिए भूअधिग्रहण को सुगम किया गया है।     समाजवादी जनपरिषद शुरू से ही जन आकांक्षा के अनुरूप तथा बेहतर राजकाज की दृष्टि से छोटे राज्यों का हिमायती रहा है। लेकिन गत दस सालों से जनता को धोखा देते हुए आगामी लोकसभा चुनाव से पूर्व घोर राजनैतिक अवसरवादिता का प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने तेलंगाना राज्य गठन का जो निर्णय लिया है वह देश के व्यापक हित के अनुकूल नहीं है। तेलेंगना राज्य अवश्य बनाना चाहिए। लेकिन जिस गैर जिम्मेदाराना ढंग से इसका निर्णय लिया गया है, उससे आंध्र प्रदेश के शेष हिस्सों में प्रतिक्रिया के रूप में आंदोलन उभर गए है। स0ज0प0की राष्ट्रीय कार्यकारिणी कांग्रेस दल व यू0पी0ए0 सरकार की इस अवसरवादी रवैये की निंदा करती है एवं मांग करती है कि देश में अलग-अलग राज्यों की माँग के मद्देनजर एक राज्य पुनर्गठन आयोग का निर्माण हो और उसके सिफारिश के आधार पर नए राज्यों का गठन हो।     गत 20 अगस्त को महाराष्ट्र के जाने माने तर्कवादी समाज सुधारक डा0 नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या की स0ज0प0 राष्ट्रीय कार्यकारिणी कड़े शब्दों में निंदा करती है एवं रोष प्रकट करते हुए इस हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों को पकड़कर सख्त दण्ड देने की मांग करती है। ‘अन्धश्रद्धा उन्मूलन समिति’ के माध्यम से जनता में चेतना जगाते हुए डा0 दाभोलकर एक कड़ा कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव डालते रहे। यह एक विडंबना की बात है कि उनकी शहादत के बाद ही महाराष्ट्र राज्य सरकार ने विगत 20 सालों से लंबित इस संबंधी बिल को एक अध्यादेश के माध्यम से लागू किया। भारत जैसे एक सामंती व पिछड़ी चेतना वाले समाज में अंध विश्वास के व्यापक प्रभाव को समाप्त करने के लिए डा0 दाभोलकर द्वारा आजीवन चलाए गए मुहिम को जारी रखने के लिए स0ज0प0 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी संकल्प लेती है।     समाजिक व आर्थिक असुरक्षा का मानसिक कमजोरी का फायदा उठाकर आम जनता की धार्मिक भावना को उकसाकर देश के कोने-कोने में बाबाओं/ माताओं का प्रवचन और पाखण्ड का साम्राज्य इस समय तेजी से फलफूल रहा है। आध्यात्मिकता/धार्मिकता के नाम पर भौतिक व्यसन का चकाचैंध देखने को मिल रहा है। ऐसे माहौल मेें अच्छी संख्या में अनुयायी बनाए हुए आसाराम बापू के ऊपर एक किशारी द्वारा दुष्कर्म के आरोप के बाद गिरफ्तारी व जेल भेजा जाना एक स्वागत योग्य कदम है। उसी तरह 17 साल पूर्व चारा घोटाले में अभियुक्त बिहार के 2 पूर्व मुख्यमंत्रियों और कई आई0ए0एस0 अफसरों को सी0बी0आई कोर्ट द्वारा दण्डित होने के बाद जेल भेजा जाना आम जनता को आश्वस्त करता है।

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राजनैतिक प्रस्ताव
(समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय सम्मेलन, 11-12 जून 2013, वाराणसी)

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने पिछले दिनों अपने नौ साल पूरे होने का जश्न मनाया। यह बात सामने आई कि 1977 के बाद यह सबसे ज्यादा चलने वाली सरकार है। यदि इंदिरा गांधी के कार्यकाल (1966-1977) से आपातकाल के दो बरस निकाल दें तो जल्दी ही मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरु के बाद सबसे लंबे समय तक रहने वाले भारत के प्रधानमंत्री बन जाएंगे। यह एक विडंबना है कि अभी तक देश की सबसे भ्रष्ट और सबसे ज्यादा जन-विरोधी सरकार अपने दो कार्यकाल पूरा करने चली है और उसको कोई गंभीर राजनैतिक चुनौती नहीं मिल पाई है। विडंबना यह भी है कि नेहरु के बाद देश मंे लोकतांत्रिक रुप से सबसे लंबा राज करने वाला प्रधानमंत्री एक ऐसा व्यक्ति है जिसका कोई स्वतंत्र विचार-व्यक्तित्व नहीं है, जो एक भी सीधा चुनाव नहीं जीत सका है और जो किसी आमसभा में एक प्रभावी भाषण भी नहीं दे सकता। वह पूरी तरह से विश्व बैंक-मुद्राकोष-अमरीका के कहने पर उनकी नीतियों को देश पर थोप रहा है। उसे कठपुतली कहना गलत नहीं होगा।

भारतीय राजनीति का पतन
यह गंभीर शोचनीय और दयनीय हालत भारतीय राजनीति के घोर पतन के कारण पैदा हुई है। भारत के सारे प्रमुख राजनैतिक दल एक से हो चले हैं। उनकी नीतियों, कार्यशैली, राजनैतिक संस्कृति, उनके चरित्र और आचरण में कोई खास फरक नहीं रह गया है। वे सब पूंजीवादी वैश्वीकरण की नीतियों को आगे बढ़ा रहे हैं। देश में एक जबरदस्त राजनैतिक विकल्पहीनता व्याप्त है। भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, नीतीश कुमार, मायावती, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी,जयललिता, अखिलेश यादव, उमर अब्दुल्ला जैसे क्षत्रपों और नई उमर के नेताओं ने भी देश को निराश किया है। प्रधानमंत्री के रुप में जिन नए नामों को प्रोजेक्ट किया जा रहा है – राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी, उनके पास भी कोई नई दृष्टि या नई सोच नहीं है। प्रधानमंत्री बनने पर दोनों ही देशी-विदेशी कंपनियों के और अमरीकी साम्राज्यवाद के हितों के आगे बढ़ाएंगे, देश की जनता के हितों को नहीं। उनका विकास माॅडल भी मोटे तौर पर एक ही है जो देश की मौजूदा दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। यह भी जाहिर हो रहा है कि केवल युवा या नया खून राजनीति मंे आने से देश की सूरत नहीं बदलेगी। जरुरत, नई व क्रांतिकारी सोच, जनता से निकले व जनता के साथ खड़े होने वाले नेतृत्व और, बुनियादी बदलाव के पक्ष मंे एक बड़े जनांदोलन की है।

जरुरत एक नई राजनैतिक संस्कृति और कार्यशैली की भी है। मौजूदा पार्टियों की राजनीति शिखर राजनीति है, आम जनता से कटी हुई है और वंशवाद, परिवारवाद, अवसरवाद, दल-बदल, सिद्धांतहीनता व मूल्यहीनता से बुरी तरह ग्रस्त है। चुनाव जीतने के लिए वे धनबल (ज्यादातर दो नंबरी), बाहुबल, जातिवाद, सांप्रदायिकता का सहारा लेती हंै। इसी कारण राजनीति मंे पूंजीपतियों का वर्चस्व बढ़ रहा है। अपराधी तत्वों का प्रवेश और उनसे सांठगांठ बढ़ रही है। यह एक दुष्चक्र बन जाता है। करोड़ों रुपए खर्च करके जो चुनाव लड़ते हैं, वे फिर उससे कई गुना कमाते हैं या उनका एहसान चुकाने मंे लगते हैं जिन्होंने उनके चुनाव मंे धन लगाया। इस दुष्चक्र को तोड़े बगैर राजनीति से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। इसे आम जनता की गोलबंदी और संगठित ताकत तथा बड़े बदलाव के आंदोलन से ही तोड़ा जा सकता है।

भारतीय राजनीति की चरम गिरावट की एक मिसाल पिछले दिनों देखने कोे मिली। परशुराम जयंती के मौके पर उत्तरप्रदेश मंे बसपा, सपा, कांग्रेस, भाजपा सबने बड़े-बड़े ब्राम्हण सम्मेलन किए। ब्राम्हणों की खुशामद करने के लिए उनमें होड़ मची थी। कांशीराम के नेतृत्व मंे बहुजन समाज पार्टी की शुरुआत मनुवाद और ब्राम्हणवाद के खिलाफ बहुजन समाज को संगठित करने के लक्ष्य के साथ हुई थी। समाजवादी नेता डाॅ० राममनोहर लोहिया इस देश में जातिप्रथा पर हमला करने वाले प्रमुख नेता थे। उनका नाम लेने वाले लोग आज वोटों की क्षुद्र राजनीति के लिए कहां पहुंच गए, इसका यह एक उदाहरण है।

नई पार्टियां कैसी उभर कर आ रही है, उसकी एक मिसाल कर्नाटक के चुनाव में देखने को मिली है। दक्षिण भारत में कुछ साल पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक पूर्व अफसर ने लोकसत्ता पार्टी बनाई है। इसके एक उम्मीदवार ने अपने फेसबुक पर दलितों के आरक्षण के खिलाफ लिखा। वह महिलाओं पर अत्याचार रोकने वाले कानून के भी खिलाफ है। दूसरी उम्मीदवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति अपनी भक्ति इंटरनेट पर साझा की और तीसरी ने नरेन्द्र मोदी की तारीफ अपने फेसबुक पर की। ये बातें उजागर होने पर लोकसत्ता पार्टी प्रमुख जयप्रकाश नारायण को पहले उम्मीदवार को हटाना पड़ा और बाकी को अपने फेसबुक से इन चीजों को हटाने को कहना पड़ा। बात साफ है। ‘कही की ईंट, कहीं का रोड़ा’ मिलाकर भानुमती का कुनबा जोड़ने से देश मंे बदलाव की नई राजनीति नहीं हो सकती। एक सुसंगत प्रगतिशील विचारधारा और उसकी स्पष्टता जरुरी है। कोई भी क्रांति बिना विचार के नहीं हो सकती।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उससे निकली पार्टी पर भी यह बात लागू होती है। भ्रष्टाचार की समस्या बहुत गंभीर हो गई है। लेकिन भ्रष्टाचार भारतीय राष्ट्र की बुनियादी व्याधि और विकृतियों का एक ऊपरी लक्षण या परिणाम है। ऊपरी लक्षणों का इलाज करने से बीमारी जड़ से नहीं मिटेगी। आश्चर्य की बात है कि इस आंदोलन के नेताओं ने आज तक देश में भ्रष्टाचार की समस्या की जड़ों और उसके बुनियादी कारणों पर कोई चर्चा-बहस चलाने की जरुरत नहीं समझी। इस पर एक बड़ा सेमिनार तक उन्होंने आयोजित नहीं किया। देश में व्याप्त गहरी गैर-बराबरियों, जाति व्यवस्था, स्त्री-पुरुष गैरबराबरी, वैश्वीकरण की नीतियों और आधुनिक विकास माॅडलों पर कोई सुस्पष्ट विचार बनाने और फैलाने का उनका कोई एजेण्डा भी नहीं दिखाई देता।

मध्यम वर्ग का उभार
मध्यम वर्ग के उदय की इन दिनों बड़ी चर्चा है। कहा जा रहा है कि आने वाले समय मंे भारतीय राजनीति और भारत राष्ट्र में यह निर्णायक भूमिका निभाएगा। दिल्ली में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तथा सामूहिक बलात्कार के बाद हुए आंदोलन मंे इस मध्यम वर्ग की सक्रियता उभर कर आई। समाजवादी जन परिषद इसका स्वागत करती है। इससे जाहिर होता है कि वैश्वीकरण की प्रारंभिक चकाचैंध से अब मोह भंग हो रहा है। संकट इतना घना होता जा रहा है कि मध्यम वर्ग भी उससे अछूता नहीं रहा और सड़क पर आ रहा है।

पहले से भी सजप का मानना रहा है कि किसी भी बड़े क्रांतिकारी बदलाव मंे मध्यम वर्ग की एक भूमिका रहेगी और इस वर्ग से अनेक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता और सहयोगी मिल सकेंगे। लेकिन इस बारे मंे कुछ बातें ध्यान मंे रखने की जरुरत है –

(एक) जिसे आमतौर पर मध्यम वर्ग कहा जाता है, वह देश की आबादी के मध्य मंे नहीं है। देश की 70 फीसदी आबादी इसके नीचे स्थित है। यानी सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो यह मध्यम वर्ग दरअसल उच्च वर्ग का हिस्सा है।
(दो) यह मध्यम वर्ग इंटरनेट, फेसबुक आदि से काफी जुड़ा है। लेकिन देश की 90 फीसदी आबादी अभी भी इंटरनेट के ‘जाल’ से बाहर है। इंटरनेट पर चर्चा-विमर्श के अपने पूर्वाग्रह और अपनी सीमाएं भी हैं। यह 95 फीसदी से ज्यादा अंग्रेजी में होता है। इसमें उच्चवर्गीय – उच्चवर्णीय पूर्वाग्रह काफी होते हैं। इसके बावजूद संचार की इस नई तकनालाजी का अपना महत्व है, खास तौर पर युवा पीढ़ी के बीच। इन सीमाओं को ध्यान मंे रखते हुए इसका उपयोग किया जाना चाहिए।

(तीन) मध्यम वर्ग का यह उभार अभी बहुत हद तक देश के महानगरों मंे ही दिखाई दे रहा है। भारत में महानगरों की आबादी तेजी से बढ़ी है, फिर भी यह देश की आबादी के 10 फीसदी से ज्यादा नहीं है। महानगरों, मध्यम नगरों, छोटे शहरों, कस्बों, गांवों और आदिवासी इलाकों के मुद्दों व परिस्थितियों में काफी फरक है।

इसीलिए मध्यम वर्ग की यह बढ़ती चेतना देश के किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों आदि के मुद्दों व चिंताओं और बुनियादी बदलाव चाहने वाली एक प्रगतिशील विचारधारा से जुड़ेगी तो ही इसकी परिवर्तनकारी भूमिका हो सकेगी। आज इसकी काफी गुंजाईश है, लेकिन इसके लिए सचेत कोशिश करनी होगी। यह भी साफ है कि बदलाव की मुख्य ताकत तो नीचे स्थित वंचितों, दलितों, गरीबों के संगठन व आंदोलनों से ही आएगी। नहीं तो बदलाव अधूरा और ऊपरी रह जाएगा।

वैश्वीकरण का मानवीय चेहरा संभव नहीं
पिछले दिनों संप्रग सरकार ने ‘भारत-निर्माण’ के नाम से विज्ञापनों और प्रचार की श्रृंखला शुरु की है। इसे देखकर ‘इंडिया शाइनिंग’ की याद आ जाती है। अटल बिहारी वाजपेयी की पिछली सरकार ने अपने कार्यकाल के अंत मंे चुनाव के पहले इसी तरह के विज्ञापनों की झड़ी लगाई थी। ऐसा लगता है कि इस सरकार का हश्र भी वही होने वाला है। केन्द्र सरकार मनरेगा, आंगनबाड़ी, जननी-सुरक्षा योजना, कस्तूरबा कन्या विद्यालय जैसी योजनाओं और कतिपय कानूनों (शिक्षा अधिकार कानून, वन अधिकार कानून, सूचना अधिकार कानून, घरेलू हिंसा कानून, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून आदि) को अपनी उपलब्धियों के रुप मंे प्रचारित करना चाहती है। इन योजनाओं-कानूनों की कुछ मामूली उपलब्ध्यिां हो सकती हैं। लेकिन खुद इनके सूत्रधारों और समर्थकों का मोहभंग हो रहा है, जैसा कि हाल ही में ‘राष्ट्रीय सलाहकार समिति’ से अरुणा राॅय के इस्तीफे से पता चलता है। दरअसल सरकार की मुख्य नीतियां जबरदस्त रुप से जन-विरोधी हैं। गलत विकास माॅडलों के साथ पूंजीवादी वैश्वीकरण की नीतियों के मेल से गैर-बराबरी, कंगाली, कुपोषण, बेरोजगारी, महंगाई, विस्थापन, पर्यावरण विनाश आदि मंे तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है और कई तरह से आम लोगों की जिंदगियों में मुसीबतें बढ़ी हैं। घोटालों व भ्रष्टाचार मंे भी भारी वृद्धि हुई है। जिसका सीधा संबंध निजीकरण, उदारीकरण और नियमों-नियंत्रणों के शिथिलीकरण से है। इन नीतियों के दो दशक के अनुभव से यह साफ हो चला है। इसके बावजूद इससे कोई सबक न लेते हुए मौजूदा सरकारें इसी आत्मघाती राह पर अंधाधुंध बढ़ती जा रही हैं। इसी में कुछ राहत देने के लिए, असली इरादों को ढकने के लिए और वैश्वीकरण को एक ‘मानवीय चेहरा’ प्रदान करने के लिए इन कानूनों व योजनाओं को लाया गया था। लेकिन हमला इतना बड़ा है कि इनसे कोई ‘मरहम’ नहीं लग सकता। यह साफ हो चला है कि ऐसा कोई मानवीय चेहरा नहीं हो सकता। इन नीतियों और व्यवस्था में आमूल बदलाव के बगैर कोई राहत भी ज्यादा दिन नहीं चल पाती है।

पंूजीवादी वैश्वीकरण और विकास के चलते ही आज जगह-जगह लोग अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने को मजबूर हुए हैं। खेेती का संकट लगातार बना हुआ है और बड़ी संख्या मंे किसान खुदकुशी कर रहे हैं। नियमगिरि, पोस्को, लोअर सुक्तेल, कुदनकुलम, चुटका, नर्मदा, मानेसर हर जगह लोग लड़ रहे हैं। माओवादियों को प्रचार ज्यादा मिलता है लेकिन उनसे कहीं ज्यादा गैर-हथियारबंद संघर्ष चल रहे हैं। इनमें कई जगह समाजवादी जन परिषद की सक्रिय भागीदारी रही है। इन सभी संघर्षों में सरकारें कंपनियों के साथ खड़ी हैं। इन कंपनियों को मजदूरों का शोषण और दमन करने मंे सरकारें सहयोग कर रही हैं, जैसा कि मारुति और अन्य कारखानों में देखने को मिल रहा है। कथित श्रम सुधारों, आउटसोर्सिंंग और ठेेकेदारी का कमाल है कि मजदूरी बढ़ने के बजाय कम हो रही है। संगठित क्षेत्र मंे मजदूरों की हालत कुछ बेहतर होती है, लेकिन असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की हालत खराब है। मनरेगा मंे तो स्वयं सरकार घोषित रुप से न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी दे रही है। पूंजीवाद का एक विकृत चेहरा सामने आता जा रहा है।

विडंबना यह है कि भारतीय शासक वर्ग (जिसमें सभी प्रमुख पार्टियों के नेता, अफसर और बुद्धिजीवी शामिल हैं) एक ऐसे वक्त में इस पूंजीवादी वैश्वीकरण के पीछे भाग रहा है, जब खुद इसके शीर्ष पर स्थित देश जबरदस्त संकट से गुजर रहे हैं। यह संकट संयुक्त राज्य अमरीका से शुरु हुआ और अब यूरोप इस संकट मंे बुरी तरह फंसा है। वहां लाखों के प्रदर्शन हो रहे हैं तथा ‘वालस्ट्रीट पर कब्जा करो’ जैसे अनूठे आंदोलन हो रहे हैं। जिस लातीनी अमरीका को कभी संयुक्त राज्य अमरीका का पिछवाड़ा माना जाता था, वहां वैश्वीकरण और अमरीकी वर्चस्व के खिलाफ हवा बह रही है। वहां नई सरकारें चुनकर आई हैं जो समाजवाद की दिशा में नए-नए प्रयोग कर रही हैं। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ये परिवर्तन बंदूक के रास्ते से नहीं, वोट के जरिये हो रहे हैं। कई पूर्व गुरिल्ला क्रांतिकारी अब चुनकर सरकार में आए हैं और जनहित में बदलाव कर रहे हैं। लातीनी अमरीका के इन प्रयोगों मंे कमियां हो सकती हैं तथा परिस्थितियों के कुछ फरक के कारण उन्हें सब जगह ज्यों-का-त्यों दुहराना संभव भी नहीं हो सकता है। लेकिन खास बात यह है कि उन्होंने नई उम्मीद जगाई है और उनसे पूंजीवाद के विकल्प की मुहिम को नई ताकत मिली है।

लोकतांत्रिक क्रांतियों का अधूरापन
मिस्त्र, ट्यूनीशिया जैसे अरब देशों मंे तानाशाहों के खिलाफ जोरदार जन क्रांतियां भी पिछले दिनों हुईं। इनसे जाहिर हुआ है कि साधारण जनता को ज्यादा दिनों तक दबा कर नहीं रखा जा सकता। लेकिन अब मिस्त्र के अंदर नई निर्वाचित सरकार का टकराव लोगों से हो रहा है। तुर्की में भी इस तरह के टकराव की खबरें आई हैं। सबसे अफसोसजनक हालत दक्षिण अफ्रीका की है जहां पर खदान मजदूरों के खूनी संहार की घटना कुछ समय पहले हुई। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लंबे संघर्ष के बाद नब्बे के दशक के शुरु मंे आजादी मिली। लेकिन वहां पर ज्यादा कुछ नहीं बदला। गैर-बराबरी, गरीबी और शोषण करीब-करीब ज्यों-के-त्यों हैं। यही हाल बांग्लादेश का है जहां निर्यात के लिए रेडीमेड वस्त्र तैयार करने वाले उद्योगों में एक के बाद एक भीषण हादसे हो रहे हैं। इन उद्योगों मंे काम की दशाएं बहुत खराब हैं और मजदूरों का बेइंतहा शोषण करके यूरोप-अमरीका को सस्ते कपड़े मुहैया कराए जाते हैं। बांग्लादेश में शाहबाग आंदोलन के रुप में कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ युवाओं का एक जोरदार आंदोलन उभर कर आया है जो 1971 के मुक्ति संग्राम के अपराधियों को सजा देने की मांग कर रहा है। लेकिन दूसरी तरफ जमायते इस्लामी के पक्ष में भी देश की गरीब जनता का अच्छा समर्थन दिखाई दे रहा है। सत्तासीन अवामी लीग की हालत कुछ-कुछ भारत की कांग्रेस जैसी है जो धर्मनिरपेक्ष तो दिखाई देती है लेकिन भ्रष्टाचार से घिरी है और उसकी आर्थिक नीतियां आम जनता के कष्ट बढ़ाने वाली हैं।

दक्षिण एशिया के ज्यादातर हिस्सों (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान, नेपाल, म्यांमार) में यही हाल है। दुनिया के ज्यादातर गरीब देशों मंे यह दुविधा और भ्रम बार-बार दिखाई देता है। जनता आजादी के लिए लड़ती है, अत्याचारी शासकों के खिलाफ विद्रोह करती है, जन-विरोधी सरकारों को बदलती भी है, लेकिन उसके कष्टों का अंत नहीं हो पाता। इसीलिए कई बार वह प्रतिक्रियावाद और कट्टर5पंथ के साथ हो जाती है।

दरअसल लोकतांत्रिक क्रांतियां महत्वपूर्ण हैं, आगे ले जाने वाले कदम हैं, लेकिन अपने आप मंे नाकाफी हैं। इन लोकतांत्रिक क्रांतियों के साथ या उनके अगले कदम के रुप में सामाजिक-आर्थिक ढांचे को और विकास के माॅडल को बदलने का काम भी होना चाहिए। तभी जनता की मुक्ति हो सकेगी और लोकतंत्र भी टिकाऊ तथा सार्थक हो सकेगा। इन क्रांतियों को उस वैश्वीकरण और साम्राज्यवाद से टकराना होगा जो पूरी दुनिया की जनता और दुनिया के संसाधनों को मुनाफे की अनियंत्रित भूख के चलते लूट रहा है और बरबाद कर रहा है। दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश या भारत की सरकारें वैश्वीकरण और आधुनिक विकास माॅडल का विरोध करने या उसका विकल्प खोजने के बजाय उनकी दलाल बनती जाती हैं।

सामाजिक धार्मिक आंदोलन
दुनिया के स्तर पर कट्टपंथ के बढ़ते प्रभाव को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। पश्चिमी सभ्यता, पूंजीवादी वैश्वीकरण और साम्राज्यवाद से जब लोगों के कष्ट बढ़ते हैं, समाज टूटता है और सांस्कृतिक हमला होता है, तथा प्रगतिशील विचार व आंदोलन कोई प्रभावी विकल्प नहीं दिखा पाता है, तब लोग धर्म और परंपरा की शरण में जाने लगते हैं। कट्टरपंथी तत्व इसका फायदा उठाते हैं। कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के पीछे निहित स्वार्थ भी होते हैं (कई बार स्वयं अमरीका होता है), लेकिन कहीं न कहीं यह प्रगतिशील धाराओं की असफलता भी है। बहुत समय तक वामपंथ ने धर्म को क्रांति विरोधी मानकर उसकी निंदा ही की है। धर्म इंसानी समाज की जरुरत है और जरुरी नहीं कि इसकी भूमिका हमेशा पीछेदेखू हो। इंसान अपनी परंपरा से पूरी तरह नहीं कट सकता। इसीलिए धर्म, परंपरा और संस्कृति का पूरी तरह विरोध करने के बजाय उसके समतावादी तत्वों को आगे बढ़ाना होगा तथा पाखंड, अंधविश्वास, रुढ़िवाद, भाग्यवाद और गैरबराबरी जैसे तत्वों का प्रतिरोध करना होगा। आज सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की जरुरत है जो व्यापक समतावादी क्रांति का हिस्सा बने।

नारी और जाति के सवाल
दिल्ली में 16 दिसंबर को चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद देश मंे महिलाओं पर अत्याचार तथा महिलाओं के साथ भेदभाव को लेकर एक नई चेतना आई है। समाजवादी जन परिषद इसका स्वागत करती है। शायद पहली बार महिलाओं के सवाल मुख्य धारा के विमर्श का हिस्सा बने हैं। लेकिन नारीवादी आंदोलनों को साधारण गरीब महिलाओं की आवाज बनना होगा तथा गरीबों, वंचितों के दूसरे आंदोलनों के साथ जुड़ना होगा, तभी समाज मंे छाई जकड़न और गैरबराबरी को दूर करने में मदद मिलेगी।

यही बात दलितों-पिछड़ों के आंदोलन के बारे मंे सही है। वक्त के साथ जाति प्रथा कमजोर होने के बजाय मजबूत हो रही है। दलितों पर अत्याचार आज भी जारी है। फरक यह आया है कि अब दबी हुई जातियां अलग- अलग संगठित होकर विभिन्न शासक दलों से चुनावी टिकिट और पदों की सौदेबाजी या हद से हद आरक्षण की मांग करने की राह पर चल रही हंै। इन जातियों के नेता जब ऊपर पहंुचते हैं तो वे भी सवर्ण नेताओं की नकल करते हैं। वे भी धन इकट्ठा करते हैं, तथा शान-शौकत, व्यक्ति पूजा या जय-जयकार करवाने मंे पीछे नहीं रहते। दलितों, पिछड़ों, गरीबों व महिलाओं को मिलाकर मनुवादी- ब्राम्हणवादी व्यवस्था तथा समूची जाति प्रथा का ध्वंस करने और बराबरी पर आधारित नई व्यवस्था बनाने का मूल लक्ष्य कहीं दूर छूट गया है। इस लक्ष्य को फिर से सामने रखकर नए समाज के निर्माण के एक समग्र आंदोलन को बल देने की आज जरुरत है।

भाषा का सवाल
उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं मंे कार्यवाही की मांग को लेकर 6 महीने से चलाए जा रहे श्यामरुद्र पाठक के आंदोलन का समाजवादी जन परिषद समर्थन करती है। देश आजाद होने के 66 साल बाद भी इस देश का कामकाज गुलामी की विदेशी भाषा मंे चले, यह शर्मनाक है। पिछले कुछ समय से अंगरेजी का वर्चस्व कम होने के बजाय बढ़ रहा है, यह चिन्ताजनक है। समाजवादी जन परिषद का मानना है कि अंगरेजी को हटाकर भारतीय भाषाओं को स्थापित करना एक नए भारत का निर्माण करने और लोकतंत्र की सफलता के लिए जरुरी है। लेकिन सजप का यह भी मानना है कि अंगरेजी की जगह केवल हिन्दी या प्रमुख भारतीय भाषाएं ही नहीं लंे, बल्कि वे तमाम बोलियां भी लेें जो कि वास्तव में जनता की भाषाएं हैं। तभी जनता की सही भागीदारी, सशक्तिकरण और प्रभावी शिक्षा हो सकेगी। देश मंे इन स्थानीय व क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियांें को मान्यता दिलाने और स्थापित करने के जो आंदोलन चल रहे हैं, सजप उनको आह्वान करती है कि वे भी इकट्ठे होकर इस संघर्ष को बढ़ाएं तथा भारत के निर्माण का हिस्सा बनाएं।

शिक्षा, सेहत, पानी आदि का निजीकरण तथा बाजारीकरण भारतवासियों की जिंदगी पर एक बड़ा हमला है। जनजीवन के हर हिस्से को बाजार के हवाले कर देना वैश्विक पूंजी द्वारा मुनाफाखोरी के नए मौकों की तलाश का हिस्सा है, जिससे गंभीर विकृतियां और संकट पैदा हो रहे हैं। आईपीएल की सट्टेबाजी का कांड एक ताजा उदाहरण है। खेल, शिक्षा, ज्ञान, सेहत, समाजसेवा, धर्म, राजनीति, प्रकृति सब उन्मुक्त बाजारवाद और मुनाफाखोरी के चंगुल में आते जा रहे हैं। इसके खिलाफ अलग-अलग स्तर पर मुहिम व लड़ाईयां शुरु हुई हैं, जिनका सजप समर्थन करती है और आह्वान करती है कि सारी लड़ाईयां मिलकर पूंजीवादी वैश्वीकरण पर चोट करें तथा इस संघर्ष को एक राजनैतिक दिशा दें।

मौका आया है
समाजवादी जन परिषद मानती है कि देश व दुनिया के लिए यह नाजुक वक्त है। पूंजीवादी सभ्यता के संकट से और इसके साथ मोहभंग से एक नई, बेहतर, समतावादी दुनिया बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का मौका आया है। इस मौके के इस्तेमाल के लिए दो बातें महत्वपूर्ण होगी। एक, वैचारिक स्पष्टता और विकल्प की दिशा के बारे में सफाई। इसके अभाव में बड़े-बड़े आंदोलन भटक सकते हैं या बिखर सकते हैं। दो, सारे जनांदोलनों, अभियानों, परिवर्तनकामी संगठनों, समूहों और व्यक्तियों को मिलकर इसे एक बड़ी लड़ाई की शक्ल देनी होगी। वे सारे लोग जो अलग-अलग मोर्चों पर लड़ रहे हैं या मुहिम चला रहे हैं या रचनात्मक काम कर रहे हैं, यदि वे चाहते हैं कि उनका लक्ष्य पूरी तरह हासिल हो, तो एक नई व्यवस्था बनाने के लिए उन्हें एकजुट होना होगा। भारत के संदर्भ में कह सकते हैं कि आजादी के आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए, उससे आगे जाते हुए, एक नई आजादी की लड़ाई लड़ना होगा ताकि एक नया भारत बन सके। यह नया भारत समता, सादगी, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, विविधता, बहुलता, विकेन्द्रीकरण और नए विकास माॅडल पर आधारित होगा। इसकी लड़ाई भी अनिवार्य रुप से बहुआयामी, विविध तबकों की भागीदारी के साथ और मोटे तौर पर अहिंसक व लोकतांत्रिक होगी। समाजवादी जन परिषद सभी देशभक्त और मानवतावादी तत्वों से इसमें जुट जाने का आह्वान करती है।

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समाजवादी जनपरिषद
राष्ट्रीय परिपत्र सं – 01/2013
दिनांक – 18 जून ,2013

प्रिय साथी ,
समाजवादी जनपरिषद का दसवां राष्ट्रीय सम्मेलन दि. 11 – 12 जून 2013 को सर्व सेवा संघ परिसर,राजघाट , वाराणसी में उत्साह के साथ संपन्न हुआ । वरिष्ट साथी सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा दल के झंडोत्तोलन से सम्मेलन की शुरुआत हुई । सच्चिदानन्द सिन्हा ने उद्घाटन भाषण दिया । सम्मेलन में विशेष आमंत्रित के रूप में प्रसिद्ध नाट्यशास्त्री कुंवरजी अग्रवाल, समाजवादी साथी रवीन्द्र चौबे , जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के साथी अरविंद अंजुम तथा ‘फॉएल वेदान्त’ की मिरियम रोज व टिली ने भाग लिया । सम्मेलन परिसर का मुख्य द्वार साथी विश्वबन्धु की स्मृति में तथा सभागृह साथी विनोद प्रसाद सिंह की स्मृति में बनाया गया था ।डॉ स्वाति ने स्वागत किया,साथी अफलातून ने अतिथियों का परिचय दिया तथा निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष साथी लिंगराज ने सत्र की अध्यक्षता की।
सम्मेलन में साथी सुनील ने सम्मेलन का मुख्य प्रस्ताव (राजनैतिक,सामाजिक तथा आर्थिक) प्रस्तुत किया जिसका समर्थन साथी कमल बनर्जी ने किया। दल की द्विवार्षिक सांगठनिक रपट साथी निशा शिवूरकर ने प्रस्तुत की । कार्यक्रम संबंधी प्रस्ताव साथी जोशी जेकब ने प्रस्तुत किया। साथी रणजीत राय ने इसका समर्थन किया । सभी प्रस्ताव चर्चा के बाद सर्वसम्मति से पारित किए गए।
सम्मेलन द्वारा राष्ट्रीय अध्यक्ष , राष्ट्रीय महामंत्री एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी के चुनाव हेतु साथी विक्रमा मौर्य तथा साथी अतुल कुमार चुनाव अधिकारी नियुक्त किए गए।
साथी जोशी जेकब राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा साथी सुनील राष्ट्रीय महामंत्री चुने गए ।
निम्नलिखित साथी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए – लिंगराज,राधाकांत बहिदार,लिंगराज आजाद,बालकृष्ण संढ (सभी ओड़िशा), कमल कृष्ण बनर्जी,सत्येन राय,रणजीत राय (सभी पश्चिम बंग), अफलातून , रामकेवल चौहान ,रामजनम (सभी उत्तर प्रदेश) ,संतूभाई संत,सरयू प्रसाद सिंह,नवल किशोर प्रसाद (सभी बिहार),निशा शिवूरकर (महाराष्ट्र),राजेन्द्र कुमार बिन्दल (दिल्ली) ।
सम्मेलन के तुरंत बाद नवनिर्वाचित कार्यकारिणी की निवर्तमान कार्यकारिणी के सदस्यों के साथ बैठक हुई। राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने नीचे लिखे फैसले लिए :
निम्नलिखित साथियों को राष्ट्रेय कार्यकारिणी में सदस्य के रूप में अनुमेलित किया गया –
डॉ. स्वाति, विनोद पय्याडा,सुरेश नारिकुनी,डॉ. चन्द्रभूषण चौधरी,सुभाष सांवगीकर,शिवाजी गायकवाड़,सैय्यद मकसूद अली ।
इन साथियों को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में स्वीकार किया गया – साथी सच्चिदानन्द सिन्हा , साथी विश्वनाथ बागी,साथी अरविन्द मोहन।

नीचे लिखे सदस्यों को निम्नवत पदाधिकारी के रूप में सर्वसम्मति से चुना गया –
लिंगराज – राष्ट्रीय उपाध्यक्ष , कमल बनर्जी – राष्ट्रीय उपाध्यक्ष , निशा शिवूरकर -राष्ट्रीय संगठन मंत्री , अफलातून – राष्ट्रीय सचिव , रणजीत राय-राष्ट्रीय सचिव,लिंगराज आजाद – राष्ट्रीय सचिव , शिवाजी गायकवाड़ – राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष ।

राष्ट्रीय सचिव साथी अफलातून पर परिपत्र भेजने की जिम्मेदारी सौंपी गई ।
फिलहाल राष्ट्रीय कार्यालय का पता राष्ट्रीय महामंत्री का पता होगा – राजनारायण स्मृति भवन,ग्राम/पोस्ट – केसला,वाया- इटारसी ,जि. होशंगाबाद, म.प्र,461111. कृपया अपने-अपने राज्य की कार्यकारिणी सदस्यों तथा सक्रिय सदस्यों की सूची ,पता,फोन और ईमेल राष्ट्रीय महामंत्री तथा राष्ट्रीय संगठन मंत्री को यथाशीघ्र भेजें। संगठन मंत्री का पता – एड. निशा शिवूरकर,’मैत्री’ समता भवन,न्यू अकोला रोड,संगमनेर,जि. अहमदनगर,महाराष्ट्र – 422605.
आगामी 6 व 7 अक्टूबर, 2013 को मुजफ्फरपुर बिहार में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की अगली बैठक होगी।
किशन पटनायक स्मृति ट्रस्ट का पंजीकरण करने की मुख्य जिम्मेदारी साथी शिवाजी गायकवाड़ की होगी। इस काम को प्राथमिकता देकर आगामी तीन महीने में करने का निर्णय लिया गया।
आगामी कार्यक्रम –

  1. आगामी 4,5 और 6 अक्टूबर 2013 को मुजफ्फरपुर ,बिहार में विद्यार्थी युवजन सभा का एक राष्ट्रीय शिविर आयोजित करने का निर्णय हुआ है ।
  2. 27 सितम्बर , 2013 को इकाइयों द्वारा किशन पटनायक की पुण्य तिथि मनाई जाएगी।
  3. अक्टूबर 2, 2013 से सभी इकाइयां महिला-केन्द्रित मुद्दों पर कार्यक्रम चलायेंगी।
  4. दिल्ली में कांग्रेस दफ्तर के सामने उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं में कामकाज की मांग को लेकर गत 6 महीने से धरनारत श्री श्यामरुद्र पाठक की मांग के समर्थन सभी इकाइयां 31 जुलाई के पूर्व जिला मुख्यालय पर धरना,ज्ञापन सौंपना,सभा आदि कार्यक्रम लेंगी।

कृपया परिपत्र मिलने की सूचना दीजिए।
इंकलाबी सलाम के साथ,
आपका,
अफलातून.

राष्ट्रीय सचिव.

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