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Archive for the ‘samajwadi janparishad’ Category

श्री नवीन पटनायक,

मुख्यमंत्री, ओडिशा,

भुवनेश्वर, ओडिशा

 

प्रिय मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक जी,

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बहरहाल, नियमगिरी में अनिल अग्रवाल की इंग्लैण्ड की कम्पनी वेदान्त द्वारा खनन कराने अथवा न कराने के सन्दर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश से तथा न्यायपालिका की देखरेख में जनमत-संग्रह हुआ था जिसमें एक भी वोट वेदान्त द्वारा बॉक्साइट खनन के पक्ष में नहीं पड़ा था। आपकी सरकार से जुड़े माइनिंग कॉर्पोरेशन के अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदलवाने के प्रयास को न्यायपालिका ने अस्वीकार कर दिया है। आपके गृह विभाग को यह भलीभांति पता है कि प्रतिबन्धित भाकपा (माओवादी) ने जनमत संग्रह के बहिष्कार की अपील की थी। जनता ने जैसे वेदान्त द्वारा खनन को पूरी तरह से नकार दिया था, उसी प्रकार माओवादियों द्वारा जनमत-संग्रह बहिष्कार की अपील को भी पूरी तरह नकार दिया था।

इस परिस्थिति में ओडिशा पुलिस द्वारा नियमगिरी सुरक्षा समिति से जुडे कार्यकर्ताओं पर फर्जी मामले लादने और उन्हें ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताने की कार्रवाई नाटकीय, घृणित और जनमत की अनदेखी करते हुए वेदान्त कम्पनी के निहित स्वार्थ में है।

पुलिस द्वारा कुनी सिकाका की गिरफ्तारी, उसके ससुर तथा नियमगिरी सुरक्षा समिति के नेता श्री दधि पुसिका, दधि के पुत्र श्री जागिली तथा उसके कुछ पड़ोसियों को मीडिया के समक्ष ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताना ड्रामेबाजी है तथा इसे रोकने के लिए तत्काल आपके हस्तक्षेप की मैं मांग कर रहा हूं। कुनी, उसके ससुर और पड़ोसियों पर से तत्काल सभी मुकदमे हटा लीजिए जो आपकी पुलिस ने फर्जी तरीके से बेशर्मी से लगाए हैं।

इस पत्र के साथ मैं कुनी सिकाका के दो चित्र संलग्न कर रहा हूं। पहला चित्र सितम्बर 2014 में हमारे दल द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में का है जिसमें सर्वोदय नेता स्व. नारायण देसाई द्वारा कुनी को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया जा रहा है। दूसरे चित्र में कुनी इस संगोष्ठी को माइक पर संबोधित कर रही है और हमारे दल समाजवादी जन परिषद का बिल्ला लगाये हुए है।

तीसरा चित्र गत वर्ष 5 जून पृथ्‍वी दिवस के अवसर पर नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आयोजित खुले अधिवेशन का है। इस कार्यक्रम के मंच पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ पर्यावरण-अधिवक्ता के सामने कुनी बैठी है, मंच पर सुश्री मेधा पाटकर व प्रफुल्ल सामंतराय भी बैठे हैं। मैं भी इस कार्यक्रम में नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आमंत्रित था तथा वह चित्र मैंने खींचा है। कार्यक्रम में पूरा पुलिस बन्दोबस्त था तथा आपके खुफिया विभाग के कर्मी भी मौजूद थे।

संसदीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और संविधान सम्मत अहिंसक प्रतिकार करने वाली नियमगिरी सुरक्षा समिति को माओवादी करार देने की कुचेष्टा से आपकी सरकार को बचना चाहिए। राज्य की जनता,सर्वोच्च न्यायपालिका और पर्यावरण के हित का सम्मान कीजिए तथा एक अहिंसक आन्दोलन को माओवादी करार देने की आपकी पुलिस की कार्रवाई से बाज आइए।

चूंकि हमारी साथी कुनी सिकाका को गैर कानूनी तरीके से घर से ले जाने में अर्धसैनिक बल भी शामिल था इसलिए इस पत्र की प्रतिलिपि केन्द्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह को भी भेज रहा हूं। इस पत्र को सार्वजनिक भी कर रहा हूं।

 

विनीत,

अफलातून

महामंत्री, समाजवादी जन परिषद

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2014 में पहली बार अपने बूते केन्द्र में सरकार बना लेने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ उत्तर प्रदेश जैसे बडे राज्य में बड़ी चुनावी सफलता हासिल की है वहीं दूसरी ओर राजनीति को पूंजीपतियों के हाथों में बांध देने में सत्ता के शीर्ष में बैठे इस दल के लोगों ने अहम भूमिका अदा की है।विडंबना यह है कि शोषक वर्ग के स्वार्थ की पूर्ति के लिए नाना प्रकार की नीतियां बनाने और कदम उठाने के बावजूद केन्द्र में बैठा यह सत्ताधारी दल राष्ट्रवादी होने का दावा करता है। समाजवादी जन परिषद के लिए दो स्वार्थ सर्वोपरि है-शोषित वर्ग का स्वार्थ तथा देश का स्वार्थ। दल की स्पष्ट मान्यता है कि पूंजीपति वर्ग के स्वार्थ को तवज्जो देने  से देश के स्वार्थ का नुकसान ही होता है।

याराना पूंजीवाद और खेती

केन्द्र सरकार की विदेश नीति तक शासक वर्ग से जुड़े पूंजीपतियों के हक में है। प्रधान मंत्री मंगोलिया,बांग्लादेश जैसे हमसे कमजोर देशों में जाते हैं और उन्हें करोड़ों डॉलर का कर्ज देने की घोषणा करते हैं।यह ऋण उन्हीं देशों को दिया जाता है जहां प्रधान मंत्री के करीबी पूंजीपतियों द्वारा बड़ी परियोजना चलाने के लिए समझौता होता है।

देश के बड़े पूंजीपतियों का सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 11 लाख करोड़ रुपये का बकाया है।इसे चुकता करवाने के लिए सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर द्वारा कड़े कदम उठाने की मांग की गयी तो उन्हें सेवा विस्तार नहीं दिया गया।

खाद्यान्न एवं खाद्य तेल के मामले में स्वावलंबन हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जानी चाहिए जिसका श्रेय इस देश के किसानों को जाता है।इस स्वावलंबन को पलटने की दिशा में भी सत्ता के करीबी पूंजीपतियों का प्रत्यक्ष हाथ दिखाई दे रहा है।भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयात करने वाला देश हो गया है।गौतम अडाणी की खाद्य तेल की ‘फॉर्चून’ मार्के वाली कम्पनी द्वारा अन्य तेल कम्पनियों को पाम ऑयल मिला हुआ खाद्य तेल बेचने का तरीका बताना आयात बढ़ने का मुख्य कारण रहा है। देश के तमाम बड़े उद्योगपतियों की कम्पनियों द्वारा अफ्रीकी देशों में हजारों एकड़ के फार्मों में खेती कराई जा रही है तथा भारत सरकार इनके उत्पादों के आयात के लिए उन देशों से समझौते कर रही है। अरहर की दाल की कीमत जिन दिनों आसमान छू रही थी तब गौतम अडाणी के गुजरात स्थित निजी बन्दरगाह में अफ्रीका से आयातित सस्ती दाल(40 से 50 रुपए/किलो) इकट्ठा करके रखा गया था तथा कीमत 100 रुपये प्रति किलो होने के बाद उसे निकाला गया था। विदेशों से गेहूं आयात करने पर लगने वाले 25 प्रतिशत आयात शुल्क को पहले 10 फीसदी किया गया और फिर उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। वित्त मंत्री द्वारा यह घोषित कर दिया गया है कि निजी कम्पनियां यदि ठेके पर खेती करना चाहेंगी तो उन्हें इजाजत दे दी जाएगी।

खेती में बढ़ रही लागत के कारण किसानों की आत्महत्या की दर 26 प्रतिशत बढ़ गयी है। उत्तर प्रदेश की नवनिर्वाचित सरकार ने लघु तथा सीमान्त किसानों के कर्जे माफ कर दिए हैं जो कुछ राहत देने वाला कदम है।इसके साथ ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के शीर्षस्थ अधिकारियों ने किसानों की कर्ज माफी के खिलाफ बयान देने शुरु कर दिए हैं। इन बयानों से स्पष्ट होता है कि सरकार देश भर के किसानों के कर्ज माफ करने की मांग पर सकारात्मक नजरिए से विचार नहीं करना चाहती है।

कृषि उपज के समर्थन मूल्य के सन्दर्भ मे स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग को सरकार नजरअन्दाज कर रही है।इस समिति द्वारा लागत खर्च में 50 फीसदी जोड़ कर समर्थन मूल्य निर्धारित करने की बात कही गयी थी। यह नहीं भूलना चाहिए 2014 के आम चुनाव के अभियान में नरेन्द्र मोदी ने भी इस समिति की सिफारिशों को लागू करने की बात चुनावी सभाओं में कही थी। सजप सहित देश के किसान आन्दोलन कृषि उपज के मूल्य निर्धारण की बाबत इस समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग करते हैं।

बेरोजगारीः

समाजवादी जन परिषद के नेता और अर्थशास्त्री साथी सुनील ने ग्रामीण इलाके के रोजगार के सन्दर्भ कहा था,’आज भारत के गाँव उद्योगविहीन हो गए हैं और वहाँ खेती-पशुपालन के अलावा कोई धंधा नहीं रह गया है । गाँव और खेती एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं । दूसरी ओर गांव और उद्योग परस्पर विरोधी हो गये हैं । जहाँ गाँव है , वहाँ उद्योग नहीं है और जहाँ उद्योग है , वहाँ गाँव नहीं है । यह स्थिति अच्छी नहीं है और यह भी औपनिवेशिक काल की एक विरासत है ।‘ खेती के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और जंगल पर आश्रित रोजगार के अवसरों को समाप्त करने का खुला खेल शुरू हो चुका है। विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल 2015 को पूरी तरह लाचार बना दिया गया। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। यह नीति विश्व व्यापार संगठन की कई शर्तों के आड़े आती थी इसलिए 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। विदेशी मुद्रा के फूलते गुब्बारे और भुगतान संतुलन के ‘सुधार’ के साथ यह शर्त जुड़ी थी कि उत्पादन में मात्रात्मक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकेंगे। विश्व व्यापार संगठन की इस शर्त के कारण 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं।

जिन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म किया गया था उन पर गौर कीजिए- अचार, पावरोटी, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, लकड़ी का फर्नीचर, नोटबुक या अभ्यास पुस्तिका और रजिस्टर, मोमबत्ती, अगरबत्ती, आतिशबाजी, स्टेनलेस स्टील के बरतन, अल्युमिनियम के घरेलू बरतन, कांच की चूड़ियां, लोहे की अलमारी, लोहे की कुर्सियां, लोहे के टेबल, लोहे के सभी तरह के फर्नीचर, रोलिंग शटर, ताले, कपड़े धोने का साबुन और दियासलाई। बड़ी पूंजी, आक्रामक विज्ञापन, मानव-श्रम की जगह मशीन को तरजीह देने वाली तकनीक से लैस देशी-विदेशी खिलाड़ी अधिक रोजगार देने वाले इन छोटे उद्योगों को लील जाएंगे।

इस प्रकार के छोटे और कुटीर उद्योगों के उत्पादों की खपत को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय एवं राज्य-स्तरीय सरकारी क्रय संस्थाओं द्वारा लघु और कुटीर उद्योगों से ही सामान खरीदने की नीति को भी निष्प्रभावी बनाने की दिशा में काम हो रहा है। इससे ठीक विपरीत स्थिति पर गौर करें। बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देने के लिए नियम-कानून बदल देने का भी इतिहास रहा है। सरकार द्वारा नियम कानून बदल कर अपने प्रिय औद्योगिक घराने को बहुत बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाने के प्रमुख उदाहरणों में अंबानियों के उदय को प्रायोजित करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सिर्फ उन्हें ही सिंथेटिक धागे के उत्पादन के लिए कच्चे माल के आयात की इजाजत देने के साथ-साथ हथकरघा द्वारा तैयार की जाने वाली कपड़ों की किस्मों की आरक्षित सूची को निष्प्रभावी बना देना है। गौरतलब है कि कपड़ा और उद्योग नीति के इन नीतिगत फैसलों के द्वारा अंबानी को देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बनाने के पहले तक सूती कपड़े कृत्रिम धागों से बने कपड़ों से सस्ते थे। कृत्रिम धागों से पावरलूम पर बने कपड़ों की इजाजत के साथ-साथ लाखों हथकरघा बुनकरों की आजीविका छिन गई है। पहले पावरलूम पर सिर्फ ‘कोरे कपड़े’ और हथकरघे पर बिनाई की विविध डिजाइनों के कपड़ों को बनाने की इजाजत थी।

यह कानून 1985 में बन गया था। तब बाईस किस्म के कपड़े इस कानून के तहत हथकरघे के लिए संरक्षित किए गए गए थे। पावलूम लॉबी ने कानून को 1993 तक मुकदमेबाजी में फंसाए रखा और 1993 में जब यह प्रभावी हुआ तब संरक्षित किस्मों की संख्या ग्यारह रह गई। एक प्रामाणिक अध्ययन के अनुसार हथकरघे पर बने होने के दावे वाले सत्तर फीसद कपड़े दरअसल मिलों या पावरलूम पर बने होते हैं।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीस लाख लोगों को काम मिला है जबकि हथकरघा से दो करोड़ लोग जुड़े हैं। अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी यात्री फ्रैन्कोए पिरार्ड डी लावाल ने अपने यात्रा विवरण में बताया है कि अफ्रीका के दक्षिणी छोर से चीन तक लोग भारतीय हथकरघे पर बने कपड़ों से अपना शरीर ढंकते थे। उनके अनुसार भारत के पूर्वी तट के सिर्फ एक बंदरगाह से सालाना पचास लाख गज कपड़े का निर्यात होता था।

पारंपरिक हुनर,कला और हस्तशिल्प से जुड़े इन तमाम रोजगारों को समाप्त करने की नीति को लागू करने के साथ-साथ जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए केन्द्र सरकार प्रचारित कर रही है कि वह हुनर प्रशिक्षण के लिए योजना चला रही है।

सरकारी नौकरियों की स्थिति के बारे में सरकार ने संसद में लिखित सूचना दी है। केंद्रीय कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में लिखित रूप से कहा है कि 2013 की तुलना में 2015 में केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 फीसदी की कमी आई है। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की भर्ती में 90 फीसदी की कमी आई है। 2013 में केंद्र सरकार में 1, 54,841 भर्तियां हुई थीं जो 2014 में कम होकर 1, 26, 261 हो गईं। मगर 2015 में भर्तियों की संख्या में अचानक बहुत कमी हो जाती है। सवा लाख से कम होकर करीब सोलह हज़ार हो गयी। बिना किसी नीतिगत फैसले के इतनी कमी नहीं आ सकती। 2015 में केंद्र सरकार में 15,877 लोग की सीधी नौकरियों पर रखे गए। 74 मंत्रालयों और विभागों ने सरकार को बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की 2013 में 92,928 भर्तियां हुई थीं। 2014 में 72,077 भर्तियां हुईं। मगर 2015 में घटकर 8,436 रह गईं। इस प्रकार नब्बे फीसदी गिरावट आई है।
2015-18 के बीच रेलवे में रोजगार नहीं बढ़ेगा। रेलवे के मैनपावर की संख्या 13, 31, 433  ही रहेगी। जबकि 1 जनवरी 2014 को यह संख्या पंद्रह लाख थी। करीब तीन लाख नौकरियां कम कर दी गई हैं। 2006 से 2014 के बीच 90,629 हज़ार भर्तियां हुईं। अमरीका में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। भारत में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 138 है और यह भी कम होती जा रही है।
आल इंडिया काउंसिल फार टेक्निकल एजुकेशन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार साठ प्रतिशत इंजीनियर नौकरी पर रखे जाने के काबिल नहीं हैं। भारत में हर साल आठ लाख इंजीनियर पैदा होते हैं। इनकी फीस में तो कोई कमी नहीं हुई। ये काबिल नहीं हैं तो इंजीनियरिंग कालेजों का दोष हैं। उन्होंने इतना खराब इंजीनियर लाखों रुपये लेकर कैसे बनाया । उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं है। अब बाज़ार में नौकरियां नहीं हैं तो पहले से ही इंजीनियरों को नाकाबिल कहना शुरू कर दो ताकि दोष बाज़ार पर न आए। अगर साठ प्रतिशत इंजीनियर नालायक पैदा हो रहे हैं तो ये जहां से पैदा हो रहे हैं उन संस्थानों को बंद कर देना चाहिए।

काला धन और भ्रष्टाचार

देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों को नाजायज लाभ पहुंचाने वाली केन्द्र सरकार काले धन को समाप्त करने का दावा करती है तो उससे बढ़ कर हास्यास्पद और क्या हो सकता है? सच्चाई तो यह है कि HSBC बैंक की स्विट्जरलैन्ड स्थित जेनेवा शाखा में कई भारतीयों के गुप्त खाते होने की खबर को आये काफी समय बीत चुका है।दुनिया भर के कई हथियार तस्कर ,नशीली दवाओं के अवैध धन्धे करने वाले तथा भ्रष्ट नेताओं के नाम उजागर हुए हैं।इस सूची में भारत के बडे उद्योगपति,सिनेमा स्टार आदि के नाम थे। इस सूची के सार्वजनिक होने के बाद सरकार को इन खाताधारकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी,इसके बजाए सरकार ने इन खाताधारकों से नजदीकी संबंध होने के कारण ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कि बल्कि उस राशि को कबूल लेने की छूट की घोषणा की है।

पनामा नामक देश में दुनिया भर के कई भ्रष्ट नेताओं,अवैध व्यापार करने वाले तथा तस्करों के बैंक खातों की सूची सार्वजनिक हुई है।इस खबर के उजागर होने के बाद रूस,पाकिस्तान जैसे कई देशों में भारी हलचल मच गई।भारत में देश के सबसे उद्योगपति तथा सीने-सितारों आदि के नाम उजागर होने के बावजूद सरकार ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की है।

काले धन के समाप्ति के दावे के साथ सरकार ने सबसे बड़ा कदम ‘नोटबन्दी’ का उठाया। अर्थव्यवस्था में चलन से बाहर किए गए नोटों का मूल्य 86 फीसदी था। इस कदम से देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति पैदा हो गयी।नोटों को बदलने के लिए बैंकों की लाइन में खड़े 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई। इस सबके बावजूद जिन लोगों के पास इन बड़े नोटों में अघोषित पैसा था वे उसे बदलने या उसे खर्च करने में सफल हो गए।अघोषित धन के इन मालिकों ने अपने कर्मचारियों और मजदूरों को इन नोटों में कई महीनों का एडवान्स में वेतन और बोनस देकर,सोना तथा डॉलर में बदल कर तथा पेट्रोल पंपो के माध्यम से अघोषित पैसे से बिना नुकसान उठाए मुक्ति पा ली। विपक्षी दल इस मुद्दे की गहराई में नहीं गए तथा जनता के बीच इसके खिलाफ कारगर कदम उठाने से बचते रहे।इसके फलस्वरूप साधारण गरीब लोगों में यह भ्रम फैलाने सरकार सफल हो गयी कि इस कदम से आम जनता को खास कष्ट नहीं होगा और पैसे वालों लोगों का नुकसान होगा। वास्तविकता यह है कि सरकार ने आज तक कितने नोट वापस नहीं लौटे इसका अधिकृत आंकड़ा तक घोषित नहीं किया है। सजप यह मांग करती है कि सरकार इससे संबंधित तथ्य सार्वजनिक करे तथा छोटे मूल्य के नोट उपलब्ध कराए।

कांग्रेस सरकार के समय चले लोकपाल की मांग के आन्दोलन का विपक्षी दल के रूप में भाजपा को लाभ मिला था इसके बावजूद लोकपाल के लिए कोई कारगर कानून नहीं लाया गया है। भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों द्वारा बिना स्रोत बताये राजनैतिक दलों को चन्दे के रूप में दिया जाता है।इस वर्ष के वित्त विधेयक के साथ ऐसे चन्दे की कोई सीमा न रखने तथा स्रोत घोषित न करने को वैधानिकता प्रदान कर दी गई है। यह ध्यान देने लायक बात है कि वर्तमान में चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च की सीमा निर्धारित है किन्तु दलों द्वारा किए गए चुनाव खर्च की कोई सीमा नहीं है इसलिए इसका हिसाब भी गंभीरता से नहीं दिया जाता है। चुनाव के दौरान विपक्षी दलों के एक-एक नेता को खरीदने में मौजूदा शासक दल करोड़ों रुपए खर्च करता है इसलिए अघोषित आय के स्रोतों को बाधित करने में उसकी कोई रुचि नहीं है बल्कि इन बाधाओं को दूर करने के उसके द्वारा कानून बना लिए गए हैं।

चुनाव-सुधार

चुनाव में अघोषित पैसे हासिल करने और उसके बल पर चुनाव लड़ने के सन्दर्भ में ऊपर के अनुच्छेद जिक्र किया गया है। निर्वाचन प्रक्रिया के सन्दर्भ में समाजवादी जनपरिषद आनुपातिक प्रतिनिधित्व को अपनाने की पक्षधर है। इस सन्दर्भ में दल का कहना हैः

भारत के राज्य / शासन के हरेक स्तर (यथा केन्द्र, प्रदेश, जिला परिषद, प्रखंड समिति और पंचायत) पर चुनाव की पद्धति FPTP (“सबसे अधिक मत पाने वाला ही विजेता”) है। इसके विरुद्ध 80 देशों में चालू और भविष्य की लोकप्रिय पद्धति “आनुपातिक प्रतिनिधित्व है।

FPTP पद्धति भारत के शासन और लोकतन्त्र में कई कमजोरियों और विकृतियों को चला बढ़ा रही है| वह नीतियों के बनने- बदलने में बहुत खतरनाक हालात पैदा कर रही है. इसकें कुछ तथ्य हैं-

  1. मोदी सरकार केवल 30% जनता की पसन्द से ही लोकसभा में बहुमत लेकर आई है. करीब 60% जनता, जो उसके विरुद्ध है; वह 5 साल के लिए संसद मे बहुत कम प्रतिनिधित्व वाली और अशक्त हो चुकी है. छोटी संख्या वाली विकसित हो रही विचारधाराओं और संगठनों का तो इस पद्धति के रहते संसद, विधानसभा वगैरह में पहुँच पाना और मात्र अपनी पहचान बना कर रख पाना असंभव है।
  2. देश की प्रत्येक राज्य सरकार में भी कोई एक पार्टी इसी तरह बहुमत से बहुत कम वोट लाकर भी शासक बन गई है। वे भी कई बार केन्द्र सरकार जैसे गलत और अलोकतान्त्रिक निर्णय और काम करती है। ये सारी अल्पमत वाली सरकारें दूरगामी आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों और बड़े सामाजिक-धार्मिक प्रभाव वाले कार्यक्रम बनाती चलाती है। वे अतिवादी व्यवहार को बढ़ावा देती है जो बहुधा देश-समाज को गहरा नुकसान पहुँचाने वाली होती है।

इस मुद्दे की बाबत दल द्वारा सेमिनार आयोजित किए जाएंगे तथा सहित्य प्रकाशन किया जाएगा।

भारतीय समाज में जो लोग संकीर्ण भावनाओं को फैलाते हैं,जाति-प्रथा के विचार को फैलाते हैं,मठाधीशों के वर्चस्व को मजबूत करते हैं,साम्प्रदायिकता को फैलाकर निहित वर्ग की राजनीति को मजबूत बनाते हैं,उनकी राजनीति आज ताकतवर है। समाजवादी जन परिषद जिन गरीब और कमजोर तबकों की राजनीति करती है वह मजबूत न होने पर उन तबकों का न घर चलेगा न आजीविका।यह बात हमें जनता में ले जानी होगी। शोषित वर्ग का स्वार्थ और देश का स्वार्थ परस्पर जुड़े हुए हैं। धनी वर्ग की राजनीति का मुकाबला हम इसी राजनीति के बल पर करेंगे। हमें इस उद्देश्य को स्पष्ट तौर पर दिमाग में बैठा लेना होगा। पूंजीवादी,मनुवादी सोच की ताकतें जिस प्रकार ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उद्देश्य अपने दिमाग बैठाये हुए हैं, उससे देश का विघटन अवश्यंभावी है। शोषित तबकों की राजनीति को मजबूत बना कर मौजूदा देश-विरोधी राजनीति को परास्त करने का यह सम्मेलन संकल्प लेता है।

प्रस्तावक- अफलातून. , समर्थक – कमलकृष्ण बनर्जी

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प्रेस विज्ञप्ति
केसला, जनवरी 9।
अघोषित छुपा धन समाप्त करने,नकली नोटों को ख़त्म करने तथा आतंकियों के आर्थिक आधार को तोड़ने के घोषित उद्देश्यों को पूरा करने में नोटबंदी का कदम पूरी तरह विफल रहा है। इसके साथ ही इस कदम से छोटे तथा मझोले व्यवसाय व् उद्योगों को जबरदस्त आघात लगा है।महिलाओं, किसानों और मजदूरों तथा आदिवासियों की माली हालत व रोजगार के अवसरों पर भीषण प्रतिकूल असर पड़ा है।इस संकट से उबरने में लंबा समय लग जाएगा।
उपर्युक्त बाते समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की होशंगाबाद जिले के ग्राम भूमकापुरा में हुई बैठक में देश की वर्तमान परिस्थिति पर पारित प्रस्ताव में कही गयी है।इस प्रस्ताव में कहा गया है कि केंद्र सरकार का ‘नागदीविहीन अर्थव्यवस्था’ का अभियान चंद बड़ी कंपनियों को विशाल बाजार मुहैया कराने के लिए है। प्रस्ताव में कहा गया है कि जमीन, मकान तथा गहनों की खरीद फरोख्त में नागदविहीन लेन देन को अनिवार्य किए जाने से छुपे,अघोषित धन के एक प्रमुख स्रोत पर रोक लगाई जा सकती है परंतु सरकार की ऐसी कोई मंशा दिखाई नहीं दे रही है।
एक अन्य प्रस्ताव में विदेशों से गेहूं के आयात पर आयात शुल्क पूरी तरह हटा लिए जाने की घोर निंदा की गयी तथा समस्त किसान संगठनों से आवाहन किया गया कि इस निर्णय का पुरजोर विरोध करें।
दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भारत के चुनाव आयोग से मांग की है कि पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों के पूर्व आम बजट पेश करने पर रोक लगाए।आयोग को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि आगामी 31 मार्च 2017 के पूर्व बजट पेश करना गैर जरूरी है तथा यह चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित करेगा।
दल का आगामी राष्ट्रीय सम्मलेन 29,30 अप्रैल तथा 1मई को पश्चिम बंग के जलपाईगुड़ी में होगा।सम्मलेन में नौ राज्यों के 250 प्रतिनिधि भाग लेंगे।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुख्यत: निशा शिवूरकर,संतू भाई संत,विक्रमा मौर्य, राजेंद्र गढवाल, रामकेवल चौहान,अनुराग मोदी,फागराम,अखिला,रणजीत राय,अफलातून,स्मिता,डॉ स्वाति आदि ने भाग लिया।अध्यक्षता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जोशी जेकब ने की।
प्रेषक,
अफलातून,
राष्ट्रीय संगठन मंत्री,समाजवादी जनपरिषद।

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बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

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जब देश की राजनीति बहुत नीचे गिरने लगी और उसमें भ्रष्टाचार , स्वार्थ , मौकापरस्ती और सिद्धांतहीनता का बोलबाला होने लगा तब देश को बचाने के लिए १९९५ महाराष्ट्र के ठाणे में समाजवादी जनपरिषद नामक एक नई राजनैतिक पार्टी का गठन किया गया । उसका उद्देश्य अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी,ऊंच-नीच,शोषण और पर्यावरण नाश करनेवाली मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था को जड़ से मिटाना है – एक नया भारत और एक नयी दुनिया बनाना है । इसके लिए नीचे से लोगों की समस्याओं के लिए संघर्ष करते हुए जनशक्ति का निर्माण , जनजागृति और रचनात्मक कार्यों का रास्ता इसने चुना है । देश के नौ राज्यों – बंगाल,बिहार,झारखंड,ओड़िशा,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,म्महाराष्त्र,केरल और दिल्ली में इसकी इकाइयां हैं । महात्मा गाम्धी,राममनोहर लोहिया,बाबा साहब अम्बेडकर ,बिरसा मुंडा और किशन पटनायक इसके प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन यह किसी एक व्यक्ति का अंधानुकरन भी नहीं करती है । देश को बदलना है तो राजनीति को बदलना होगा। बेईमानों, मौकापरस्तों और देश के दुश्मनों के हाथ में राजनीति कैद है। उनके कब्जे से छुड़ाकर राजनीति को किसानों , मजदूरों , छोटे दुकानदारों, नौजवानों,पिछड़ों,दलितों,आदिवासियों और महिलाओं के हक में संघर्ष का औजार बनेगी समाजवादी जनपरिषद। आप भी इस मुहिम में शामिल हों।
सुनील जोशी जेकब
महामंत्री अध्यक्ष
समाजवादी जनपरिषद समाजवादी जनपरिषद

कोक विरोधी प्रदर्शन

मेहदीगंज,कोक विरोधी प्रदर्शन

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                               समाजवादी जनपरिषद
समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की दो दिवसीय बैठक की समाप्ति पर देश की राजनैतिक परिस्थिति यह वक्तव्य जारी किया गया है । वाराणसी के पाण्डे हवेली में सम्पन्न इस बैठक में दल के राष्ट्रीय महासचिव सुनील , उपाध्यक्ष कमल बनर्जी तथा लिंगराज प्रधान , सचिव अफलातून एवं रणजीत रॉय ने भाग लिया ।
बयान
वाराणसी , दिसम्बर 23
देश में वैकल्पिक तीसरी ताकत जरूरी है पिछले दिनों संपन्न हुए पांच विधानसभा चुनावों के नतीजों से एक बात साफ हुई है । कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से जनता त्रस्त हो गई है और इसे हटाना चाहती है । मंहगाई और रोजी-रोटी का संकट इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा था , भ्रष्टाचार दूसरे नम्बर का मुद्दा था । दोनों का गहरा संबंध मौजूदा विकास-नीति और वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की जन-विरोधी नीतियों से हैं जिन पर मनमोहन सरकार आंख मूंदकर चल रही है । इस मायने में यह इन नीतियों के खिलाफ एक वोट था । चूंकि किसी राजनैतिक दल ने चुनाव में इन नीतियों को मुद्दा नहीं बनाया ,खुले रूप में यह बात सामने नहीं आ पाई है । दिल्ली में आम आदमी पार्टी के रूप में एक नई पार्टी का उदय और उसे अच्छी चुनावी सफलता एक महत्वपूर्ण घतना है । समाजवादी जन परिषद ‘आआपा’ को और दिल्ली की जनता को इसके लिए बधाई देती है । इसने जाहिर किया कि जन-विरोधी कामों,भ्रष्टाचार,अवसरवाद और सिद्धान्तहीनता का पर्याय बन चुकी मौजूदा पार्टियों से जनता मुक्ति चाहती है और बदलाव चाहती है । यह भी भी जाहिर हुआ कि ईमानदारी , पारदर्शिता व सिद्धान्त के साथ रअजनीति की जा सकती है । देश में माफिया , भ्रष्टाचार , दो नंबरी पैसे और राजनीति का जो नापाक गठजोड़ बन चुका है जिसमें राजनीति कमाई का एक जरिया और धंधा बन चुकी है , उससे अलग जनता के चंदे से भी चुनाव लड़ा जा सकता है, यह जाहिर हुआ । वैकल्पिक राजनीति की नई संभावनायें पैदा हुई हैं । आगामी चुनाव नरेन्द्र मोदी और भाजपा की आसान जीत में एक रुकावट और तीसरी ताकत की संभावना भी बढ़ी है । लेकिन समाजवादी जन परिषद यह भी मानती है कि वैकल्पिक नीतियों और विचार के साथ जुड़ने से ही सही मायने में राजनैतिक विकल्प बन सकेगा और व्यवस्था में बदलाव आ सकेगा । बिना विचार के कोई क्रांति नहीं हो सकती । समाजवादी जन परिषद मानती है कि भारत की मौजूदा व्यवस्था में बुनियादी बदलाव के लिए तीन मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण है :

1.वैकल्पिक विकास मॉडल और वैकल्पिक अर्थनीति
2.सामाजिक बराबरी (जिसमें स्त्री-पुरुष बराबरी , जाति आधारित भेदभाव से संघर्ष एवं आदिवासियों और अन्य वंचित समोदायों के प्रति न्याय न्याय ,शामिल है है ); और
3.कट्टरता ,संकीर्णता और सांप्रदायिकता की ताकतों से संघर्ष ।

समाजवादी जनपरिषद आह्वान करती है कि इन मुद्दों पर देश में संघर्ष और राजनीति की धारा को आगे बढ़ाया जाए । आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले मोर्चों के खिलाफ एक तीसरी वैकल्पिक राजनैतिक ताकत का उभरना जरूरी है। नरेन्द्र मोदी के रूप में सांप्रदायिक , तानाशाही और कार्पोरेट ताकतों के नए गठजोड़ का जो खतरा सामने है , उसका मुकाबला भी करना जरूरी है । इस संदर्भ में व्यापक एकता बनाने के लिए ‘आआपा’,सोशलिस्ट पार्टी व अन्य दलों , जनांदोलनों आदि संवाद की पहल समाजवादी जन परिषद करेगी।वाराणसी , 23 / 12/ 2013 प्रेषक, अफलातून

— Aflatoon अफ़लातून ,राष्ट्रीय सचिव ,समाजवादी जनपरिषद ,५ , रीडर आवास ,जोधपुर कॉलॉनी,काशी विश्वविद्यालय , वाराणसी – २२१००५National Secretary,Samajwadi Janparishad,5,Readers Flats,Jodhpur Colony,Banaras Hindu University,Varanasi,Uttar Pradesh,INDIA 221005Phone फोन : +918004085923

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समाजवादी जनपरिषद
राष्ट्रीय परिपत्र सं. ०२ / २०१३

                                                                                                           दिनांक अक्टूबर ११ , २०१३

प्रिय साथी ,
खादी परिसर , कन्हौली, मुजफ्फरपुर में ८-९ अक्टूबर २०१३ को सजप की राष्त्रीय कार्यकारिणी की बैठक सम्पन्न हुई । इसी जगह दिनांक ६ से ८ अक्टूबर को विद्यार्थी युवजन सभा का राष्ट्रीय शिबिर तथा सम्मेलन भी सम्पन्न हुआ। कार्यकारिणी की बैठक में साथी जोशी जेकब,कमल बनर्जी,लिंगराज,शिवाजी गायकवाड़,सुनील,निशा शिवूरकर,रणजीत,लिंगराज आजाद,अफलातून,बालेश्वर प्रसाद,राधाकांत बहिदार,डॉ स्वाति,संतू भाई संत, नवल किशोर सिंह,सुधाकरराव देशमुख,सरयू प्रसाद सिंह,बालकृष्ण संढ,रामकेवल चौहान,सच्चिदानन्द सिन्हा,विश्वनाथ बागी,अखिला,नरेन्द्र सिंह,नवीन,जगतनारायण,रणजीत,अरमा

न, तथा शिवली ने भाग लिया।

विभिन्न राज्यों तथा वि.यु.स की रपट प्रस्तुत की गई। मऊ,उ.प्र के दल के वरिष्ट साथी बृजबिहारी मल्ल की मृत्यु तथा महाराष्ट्र के अंधश्रद्धा निर्मूलन नेता डॉ नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या पर शोक प्रस्ताव पारित किए गए। मौजूदा आर्थिक राजनैतिक स्थिति पर तफसील से चर्चा के बाद सर्वसम्मति प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव संलग्न है ।
आगामी दिनों में होने वाले विधान सभा के चुनावों में सजप मध्य प्रदेश के चार जिलों की चार सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।इस बाबत राज्य समिति शीघ्र निर्णय लेगी।
महाराष्ट्र तथा ओड़ीशा में राज्य स्तरीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिबिर संपन्न हुए हैं। साथी निशा शिवूरकर तथा शिवाजी गायकवाड़ ने सूचित किया कि ‘किशन पटनायक ट्रस्ट’ के गठन का काम शुरु किया जा चुका है।इसके मसविदे को पढ़कर विचार देने के लिए उन्होंने निवेदन किया।
वि.यु.स के शिबिर/सम्मेलन के विशेष सत्र में नियमगिरी सुरक्षा आन्दोलन से जुड़े दल के साथी राजकिशोर,राष्ट्रीय सचिव लिंगराज आजाद तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का सार्वजनिक सम्मान किया गया। पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. महेन्द्र कर्ण इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे तथा वरिष्त साथी विश्वनाथ बागी ने अध्यक्षता की ।
फैसला हुआ कि दल के अभिलेख,रजिस्टर इत्यादि अफलातून व चंचल मुखर्जी डॉ सोमनाथ त्रिपाठी से प्राप्त करेंगे। बैंक खाता स्थान्तरण हेतु भी डॉ सोमनाथ त्रिपाठी से यह दोनों साथी बात करेंगे।
कर्नाटक की युवा समाजवादी अधिवक्ता साथी अखिला ने दल की सदस्यता ग्रहण की है । उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का निमन्त्रित सदस्य बनाया गया। दल के वरिष्ट साथी चंचल मुखर्जी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थायी निमन्त्रित होंगे। राष्ट्रीय महामंत्री सुनील ने आवाहन किया कि दल के दस हजार सदस्य बनाये जांए ।
अक्टूबर २,२०१३ से मार्च ८ , २०१४ तक महिला केन्द्रित कार्यक्रम लेने का फैसला राष्ट्रीय सम्मेलन में हुआ था। कार्यकारिणी की इस बैठक में निर्णय लिया गया है कि इस अवधि में हर जिला इकाई नर-नारी समता के मुद्दे पर एक शिविर आयोजित करेगी जिसमें पुरुष साथियों के अलावा महिला साथियों की अच्छी भागीदारी का प्रयास करना होगा। इसी अभियान के तहत जनवरी३ ,२०१४ को सावित्रीबाई फुळे की जयन्ती के मौके पर स्त्री-शिक्षा पर केन्द्रित कार्यक्रम लिए जाएंगे। दलित-स्त्री उत्पीड़न पर निशा शिवूरकर शीघ्र एक नोट प्रसारित करेंगी।
नीचे लिखी जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं –
महाराष्ट्र ;उ.प्र -सुनील,  ओड़ीशा; – कमल बनर्जी,रणजीत,  बिहार-कमल बनर्जी,रणजीत,चंचल मु

खर्जी   झारखण्ड;किसान मोर्चा-लिंगराज ,  दक्षिण भारत – जोशी जेकब,  असंगठित मजदूर- सुभाष लोमटे   पूर्वोत्तर राज्य – कमल बनर्जी,   म.प्र.;केरल; महिला मोर्चा – निशा शिवूरकर,  शिवाजी गायकवाड-गोआ, आन्ध्र प्रदेश;दलित आदिवासी मोर्चा;विस्थापित आन्दोलन – लिंगराज आजाद,    दिल्ली;पश्चिम बंग; वि.यु.स. – अफलातून ।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की अगली बैठक कर्नाटक में १०,११,१२ जनवरी २०१४ को होगी ।
कृपया परिपत्र मिलने की सूचना पोस्ट कार्ड द्वारा अवश्य दीजिए।अपने अपने राज्यों के अध्यक्ष-महामंत्री के पते/फोन मुझे भेजें तथा राज्य समिति के सदस्यों की पतों सहित सूची संगठन मंत्री को भेजें । सभी कार्यक्रमों की रपट राष्ट्रीय कार्यालय (राजनारायण स्मृति भवन,ग्रा/पोस्ट केसला,वाया इटारसी,जि होशंगाबाद,म.प्र – ४६११११) को भेजें।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
आपका,
अफलातून.
राष्ट्रीय सचिव, ५ रीडर आवास,जोधपुर कॉलोनी,काशी विश्वविद्यालाय,वाराणसी-२२१००५. (उ.प्र.)

देश व दुनिया के हालात पर प्रस्ताव ,समाजवादी जनपरिषद राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक 8-9 अक्टूबर 2013, मुजफ्फरपुर (बिहार)

देश व दुनिया के हालात पर प्रस्तावसमाजवादी जनपरिषद राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक 8-9 अक्टूबर 2013, मुजफ्फरपुर (बिहार),    डाॅलर की तुलना में रूपये का मूल्य में तेज गिरावट रूपी लक्षण के माध्यम से भारत का गंभीर आर्थिक संकट हाल में प्रकट हुआ। देश फिर एक बार 1991 जैसी हालात के कगार पर है इस तरह की चर्चा भी होने लगी। लेकिन बाद में मामूली सुधार के आधार पर केन्द्र सरकार की ओर से यह अहसास पैदा करने की कोशिश हो रही है कि सब कुछ सामान्य हो जाएगा। वास्तव में देश की गंभीर आर्थिक हालत आज भी बरकरार है। देश के विदेशी व्यापार के भुगतान संतुलन में जो जबरदस्त घाटा पैदा हो चुका है, इस संकट का यह एक मूल कारण है। विगत दो दशकों से उदारीकरण-भूमंडलीकरण के नाम पर जो नीतियां चलायी गयीं, उसके एक तार्किक नतीजे के रूप में इस संकट को देखा जा सकता है। देश के बाजार को विदेशी पूंजी व विदेशी कंपनियों के लिए संपूर्ण मुक्त कर निर्यात बढ़ावे की मृग मरीचिका के पीछे दौड़ने का फलस्वरूप विदेशी व्यापार के चालू खाते में घाटा बढ़ता गया एवं सरकार द्वारा विदेशी कर्ज और विदेशी पूंजी के जरिए उसको ढ़कने का नतीजा आज का मूल संकट है। विश्व बैंक-मुद्रा कोष निर्देशित इन नीतियों के नतीजों से सबक लेकर देश को इस संकट से उबारने की वैकल्पिक नीति के बारे में सोचने के बजाय मुद्राकोष के पूर्व पदाधिकारी वफादार अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह उसी विचार के अपनी अर्थशास्त्री टोली के सहारे उन्हीं नीतियों को और तेज करने पर तुले हुए हैं। मनमोहन सिंह के नक्शे कदम पर मुद्राकोष में पदाधिकारी बनकर अमेरीका का राष्ट्रपति के भी आर्थिक सलाहकार के रूप में काम करने के बाद लौटे हाल में भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाए गए रघुराम राजन को इस संकट का तारणहार के रूप में पेश किया जा रहा है। समाजवादी जनपरिषद का स्पष्ट मत है कि जिन आर्थिक नीतियों के चलते आज का संकट गहराया है उन्हीं नीतियों को और तेज करने से यह संकट और घनीभूत होगा। स0ज0प0 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का मानना है कि इस विदेशी कर्ज और विदेशी पूंजी पर निर्भर आर्थिक नीति को त्याग कर एक वैकल्पिक विकास माॅडल के साथ देश हित में स्वावलम्बी आर्थिक नीति अपनाने से ही देश इस गंभीर संकट से निजात पा सकता है।     देश जब न सिर्फ विदेशी व्यापार के क्षेत्र में इस तरह का आर्थिक संकट से जूझ रहा है, बल्कि देश की आम जनता उसके ही परिणाम स्वरूप गंभीर रोजमर्रा समस्याओं का सामना कर रही हैं, तब देश का प्रमुख विपक्षी दल भा0ज0पा0 नरेंद्र मोदी को अपने प्रधान मंत्री के रूप में पेश करने बाद वही पुरानी हिन्दूत्ववादी कार्ड खेल कर आगामी विधान सभा और लोकसभा चुनाव में जनमानस को गोलबंद करने की रणनीति के साथ उतर चुकी है। शासक कांग्रेस दल भी नरेंद्र मोदी को एक सांप्रदायिक खलनायक के रूप में हमला करते हुए देश में राजनैतिक बहस को सेक्यूलारवाद बनाम सांप्रदायिकता में केन्द्रीत करने की राणनीति को आजमा रही है। देश के दूसरे स्थापित दल भी इसी कृत्रिम वाद बहस के ईदगिर्द मोर्चाबंदी में लग गए हैं। इस तरह का राजनैतिक धु्रवीकरण का माहौल भी 1991 के दौर की स्थिति की याद को ताजा करता है। जब देश ड़ंकल प्रस्ताव को अपना कर एक नयी गुलामी का चक्रव्यूह में फंसने जा रहा था, तब इसी विचारधारा की ताकतें बाबरी मस्जिद- राममंदिर का दंगल को तीव्र कर आम जनता को सांप्रदायिक तनाव की आग में झोंकने का काम कर रही थी। राजनीति के तथाकथित गैर-सांप्रदायिक ताकतों ने इसी को सबसे बड़ा खतरा बताकर देश की अर्थ व्यवस्था को नयी गुलामी की ओर ढ़केलने में मदद की थी। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किए जाने का भाजपा के निर्णय के बाद उसके दाहिने हाथ माने जाने वाले अमित शाह को उ0प्र0 का प्रभारी बनाया गया एवं उनके मागदर्शन में उ0प्र0 में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की सुनियोजित साजिश जारी है। इसी के तहत अयोध्या से 84 कोसी यात्रा निकालने की असफल कोशिश हुई। बाद में पश्चिम उ0प्र0 के मुजफ्फरनगर इलाके में जाठ-मुसलमान सांप्रदायिक सदभाव को समाप्त करने के लिए जो कोशिश चल रही थी, उसके भयंकर परिणाम के रूप में हाल का दंगा हुआ। गाँव-गाँव दंगा फैल गया एवं बड़ी संख्या में मासूम मुसलमान मारे गए। जो भारतीय किसान यूनियन एक जमाने में सांप्रदायिक सदभाव का वाहक माना जाता था वह भी इस आगजनी में शामिल हो गया। यह एक बहुत ही चिंताजनक घटना है। समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी आगामी लोकसभा चुनाव को नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी के रूप में पेश करने की नूरा कुश्ती को भारतीय लोकतंत्र के प्रति एक मजाक मानती है एवं आम जनता से अपील करती है कि इन राजनैतिक दलों की साजिश को समझें तथा देश व जनता जूझ रही बुनियादी समस्याओं को चुनाव का केन्द्रीय मुद्दा बनाने के लिए दबाव बनाएं।     नव-उदारवाद के इस युग में देश के ज्यादातर स्थापित राजनैतिक दलों में न सिर्फ आर्थिक व विकास नीति के स्तर पर बल्कि चरित्र के स्तर पर भी वे समान बन चुके हैं। विगत कुछ दशकों में चुनाव राजनीति पर धन बल और बाहुबल का बोलबाला भयंकर बढ़ गया है। संसद और विधान सभाओं तथा अन्य निर्वाचित निकायों में पूँजीपतियों तथा अपराधी तत्वों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हो चुका है। उसके चलते देश का लोकतंत्र पर खतरा मंडरा रहा है। सभी स्तर पर भ्रष्टाचार का राज कायम हो चुका है। ऐसी परिस्थिति में जब बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिए देश के प्रमुख राजनैतिक दलों तथा संसद या विधान सभाओं से कोई पहल का संकेत नहीं मिल रहा है, तब देश का सर्वोच्च न्यायालय से एक के बाद एक राय के जरिए कानूनी व्याख्या/हस्तक्षेप से आम जनता में कुछ उम्मीद जगाने वाली घटनाएं हो रही है। दागी विधायकों तथा सांसदों को अयोग्य घोषित करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट की राय उसका ताजा और अहम उदाहरण है। इस राय को निरस्त करने के लिए विभिन्न दलों के दबाव से केन्द्र सरकार की ओर से एक अध्यादेश जारी किया गया था। लेकिन एक नाटकीय घटनाक्रम में (राहुल गांधी द्वारा उसे ‘बकवास’ करार देने के बाद) उस अध्यादेश को वापस लिया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट की राय को निरस्त करने के लिए सरकार के अध्यादेश के बाद जो जन भावना उमड़ रही थी उसका दबाव इस वापसी के निर्णय के पीछे अवश्य है। कुछ ही दिन पहले जब केन्द्रीय सूचना आयोग ने सभी बड़े राजनैतिक दलों को सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाने संबंधी राय दी थी, तब सभी दलों ने सर्वसम्मति से कानून में प्रावधान कर उसे निरस्त कर दिया था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट की एक राय के तहत वोट देते वक्त सभी प्रत्याशियों को नकारने का अधिकार ;त्पहीज जव त्मरमबजद्ध को कानूनी दर्जा दे दिया है। इस छोटे से प्रावधान से भले ही कोई विशेष गुणात्मक फर्क होने वाला नहीं है, राजनैतिक दलों पर सही उम्मीदवार खड़े करने के लिए दबाव का एक औजार बना सकता है। समाजवादी जनपरिषद राष्ट्रीय कार्यकारिणी सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा रही सकारात्मक कानूनी हस्तक्षेप को स्वागत करती है और देश के सभी स्थापित राजनैतिक दलों को आव्हान करती है कि देश में लोकतंत्र को मजबूत व बेहेतर करने संबंधी आवश्यक सुधारों के बारे में वे भी पहल करें, वरना न्यायिक सक्रियता का यह सिलसिला संसद की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकता है।     गत 18 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की जिस ऐतिहासिक राय के तहत ओडि़शा के कालाहांडि-रायगढ जिले स्थित नियमगिरि पर्वत के 12 गाँव में अगस्त-सितम्बर माह में जिला जज की निगरानी में पल्ली सभा/ग्राम सभा का आयोजन हुआ एवं उस क्षेत्र के आदिवासी/परंपरागत वनवासी लोगों को नियमगिरि में वेदांत कंपनी का बाक्साईट प्रोजेक्ट को सर्वसम्मति से नकारने का मौका मिला वह भारत के जन आंदोलनों के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना है। गत दस सालों से नियमगिरि सुरक्षा समिति के नेतृत्व में जारी मौजूदा गलत व जनविरोधी विकास माॅडल को चुनौती देने वाले इस आंदोलन में लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई करने वालों की धारा की एक महत्वपूर्ण जीत लगती है। इस आंदोलन में ओडि़शा के समाजवादी जनपरिषद के कार्यकर्ताओं का एक नेतृत्वकारी भूमिका होने को लेकर स0ज0प0 को फक्र है। कुछ साल पूर्व महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में प्रस्तावित रिलांयस कंपनी का एक एस0ई0जेड0 के खिलाफ जनआंदोलन के दरम्यान वहाँ की राज्य सरकार ने जनमत संग्रह करवाने का निर्णय लिया था और लोगों ने उस प्रोजेक्ट को बहुमत से नकार दिया था। जन आंदोलनों के दबाव से सरकार कभी कभार लोगों की राय को सुन रही है। वरना लगभग सभी जगह विकास और उद्योगीकरण के नाम पर छल बल का प्रयोग कर सरकारों ने आम जनता को कुचलने को ही अपना ‘राजधर्म’ मान लिया है। समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी नियमगिरि सुरक्षा आंदोलन की इस सफलता के लिए वहां की संघर्षशील जनता को सलाम करती है एवं सभी सरकारों से मांग करती है कोई भी प्रोजेक्ट लागु करने से पहले न सिर्फ अनुसूचित क्षेत्रों में बल्कि सभी जगह ग्रामसभा की राय को सर्वोपरि माना जाए।     गत संसद सत्र में पारित ‘भू अधिग्रहण, पुनर्वास और पुरस्थापन में न्याय और स्वच्छता कानून, 2013’ (संक्षेप में भूमि अधिग्रहण कानून) को केन्द्र सरकार एक प्रगतिशील कानून के रूप में प्रचार कर रही है। केन्द्र पंचायतीराण मंत्री जयराम रमेश दावा कर रहे हैं कि इस कानून से माओवादी समस्या का हल निकलेगा तथा विभिन्न प्रोजेक्टों के द्वारा विस्थापित लोगों का असंतोष घट जाएगा। 70 से 80 प्रतिशत लोगों की सहमति को अनिवार्य मानना एवं स्थानीय दर का 4 गुना मुआवजा देने का प्रावधान को बहुत प्रचार किया जा रहा है। लेकिन गौरतलब बात है कि यह कानून भी सिंचाई, हाइवे जैसे केई प्रोजेक्टों में लागू नहीं होगा। म0प्र0 के मुख्यमंत्री शिवराज चैहान के सुझाव पर तो भा0ज0पा0 ने सिंचाई परियोजना में इस कानून को लागु को नहीं करने का संशोधन को नए कानून में प्रावधान कर दिया है, जबकि सबसे ज्यादा लोग सिंचाई परियोजनाओं में विस्थापित होते हैं। स0प0प0 राष्ट्रीय कार्यकारिणी की स्पष्ट राय है कि इस नए कानून में न्याय और स्वच्छता’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया गया हो जनता के लिए यह एक ढकोसला है और कंपनियों के लिए भूअधिग्रहण को सुगम किया गया है।     समाजवादी जनपरिषद शुरू से ही जन आकांक्षा के अनुरूप तथा बेहतर राजकाज की दृष्टि से छोटे राज्यों का हिमायती रहा है। लेकिन गत दस सालों से जनता को धोखा देते हुए आगामी लोकसभा चुनाव से पूर्व घोर राजनैतिक अवसरवादिता का प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने तेलंगाना राज्य गठन का जो निर्णय लिया है वह देश के व्यापक हित के अनुकूल नहीं है। तेलेंगना राज्य अवश्य बनाना चाहिए। लेकिन जिस गैर जिम्मेदाराना ढंग से इसका निर्णय लिया गया है, उससे आंध्र प्रदेश के शेष हिस्सों में प्रतिक्रिया के रूप में आंदोलन उभर गए है। स0ज0प0की राष्ट्रीय कार्यकारिणी कांग्रेस दल व यू0पी0ए0 सरकार की इस अवसरवादी रवैये की निंदा करती है एवं मांग करती है कि देश में अलग-अलग राज्यों की माँग के मद्देनजर एक राज्य पुनर्गठन आयोग का निर्माण हो और उसके सिफारिश के आधार पर नए राज्यों का गठन हो।     गत 20 अगस्त को महाराष्ट्र के जाने माने तर्कवादी समाज सुधारक डा0 नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या की स0ज0प0 राष्ट्रीय कार्यकारिणी कड़े शब्दों में निंदा करती है एवं रोष प्रकट करते हुए इस हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों को पकड़कर सख्त दण्ड देने की मांग करती है। ‘अन्धश्रद्धा उन्मूलन समिति’ के माध्यम से जनता में चेतना जगाते हुए डा0 दाभोलकर एक कड़ा कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव डालते रहे। यह एक विडंबना की बात है कि उनकी शहादत के बाद ही महाराष्ट्र राज्य सरकार ने विगत 20 सालों से लंबित इस संबंधी बिल को एक अध्यादेश के माध्यम से लागू किया। भारत जैसे एक सामंती व पिछड़ी चेतना वाले समाज में अंध विश्वास के व्यापक प्रभाव को समाप्त करने के लिए डा0 दाभोलकर द्वारा आजीवन चलाए गए मुहिम को जारी रखने के लिए स0ज0प0 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी संकल्प लेती है।     समाजिक व आर्थिक असुरक्षा का मानसिक कमजोरी का फायदा उठाकर आम जनता की धार्मिक भावना को उकसाकर देश के कोने-कोने में बाबाओं/ माताओं का प्रवचन और पाखण्ड का साम्राज्य इस समय तेजी से फलफूल रहा है। आध्यात्मिकता/धार्मिकता के नाम पर भौतिक व्यसन का चकाचैंध देखने को मिल रहा है। ऐसे माहौल मेें अच्छी संख्या में अनुयायी बनाए हुए आसाराम बापू के ऊपर एक किशारी द्वारा दुष्कर्म के आरोप के बाद गिरफ्तारी व जेल भेजा जाना एक स्वागत योग्य कदम है। उसी तरह 17 साल पूर्व चारा घोटाले में अभियुक्त बिहार के 2 पूर्व मुख्यमंत्रियों और कई आई0ए0एस0 अफसरों को सी0बी0आई कोर्ट द्वारा दण्डित होने के बाद जेल भेजा जाना आम जनता को आश्वस्त करता है।

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