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Archive for the ‘terrorism’ Category

[ 1982 में समता संगठन द्वारा आयोजित ‘असम-बचाओ साइकिल यात्रा’ के मौके पर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने यह कविता साइकिल यात्रियों को लिख दी थी । ]
यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो ?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो ?
यदि हां
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है ।

देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां , पर्वत,शहर,गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें ।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है ।

इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव

कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।

जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है ।

याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन ।

ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है ।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो –
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।

आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार ,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार ।
– सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

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* ” जो सरकार किसी भी प्रकार के लोकमत से चुनी गई हो ,चाहे वह फर्जी लोकमत ही क्यों न हो तथा कम से कम संवैधानिक- कानूनी दिखने वाली होगी वहाँ गुरिल्ला विद्रोह को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता,चूँकि शान्तिपूर्ण संघर्ष की संभावनाओं को पूरी तरह आजमाया नहीं जा चुका होता है । ” चे ग्वारा, गुरिल्ला वॉरफ़ेयर ,भाग १ ,पृष्ट १४। नेट पर

** संपूर्ण क्रान्ति के दौर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण लाखों की सभा में कहते थे , ’ माओ ने कहा कि राजनैतिक शक्ति का जन्म बन्दूक की नली से होता है । कितने लोगों को बन्दूक दिला सकते हो ? कोई थाना फूँक दोगे , डाकखाना फूँक दोगे,ये छिट-पुट छिट-पुट से काम नहीं चलेगा। हिंसा की बड़ी ताकत सरकार के पास है।बड़ी हिंसा छोटी हिंसा को दबाया दिया करती है। उसका मुकाबला अहिंसा से ही हो सकता है। ’जेल से ही स्वराज्य पैदा हुआ है । जेल से ही तुम्हारे अधिकार प्राप्त होंगे , जनता के अधिकार प्राप्त होंगे और सच्चा स्वराज्य मिलेगा।’ उन्होंने ५ जून ,१९७४ के ऐतिहासिक भाषण में कहा , ’यह संघर्ष अगर जन-संघर्ष है तो यह पुलिस के जवानों का भी है। क्या उनके सामने महँगाई का प्रश्न नहीं है, गरीबी का प्रश्न नहीं है ? उन्हें भी परिवार का पोषण करना है,बेटे की पढ़ाई का खर्च देना है ,बेटी की शादी करनी है ।’

भाकपा (माओवादी) हिंसा का रास्ता छोड़े । हिंसक कार्रवाई के लिए उसे साधन देश के बाहर से ही मिल रहे हैं । वैश्वीकरण और देश की प्राकृतिक सम्पदा की लूट के खिलाफ़ जहाँ जन आन्दोलन चल रहे हैं उन्हें सरकारी हिंसा के बल पर दबाने का अवसर माओवादियों की रणनीति से मिल रहा है ।

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मुम्बई में हुए आतंकी हमले के षड़यंत्र के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के इलिनॉय के उत्तरी जिले के पूर्वी डिविजन की अदालत ने गिरफ़्तार पाकिस्तानी नागरिकों पर आरोप निश्चित किए हैं । इस आरोप-पत्र में लश्करे तैय्यबा तथा पाकिस्तान में रचे गये षड़यंत्र की तफ़सील दी हुई है । लाजमी तौर पर भारतीय नागरिकों को इस आरोप पत्र को पढ़ने में रुचि होगी । अमेरिकी न्याय व्यवस्था में इस प्रकार के दस्तावेज तत्काल ऑनलाईन उपलब्ध हो जाते हैं , यह भी पता चला । इलियास काश्मीरी,सैय्यद अब्दुर्रहमान हाशिम उर्फ़ पाशा ,डेविड कोलमैन हेडली उर्फ़ दाऊद गिलानी तथा तहव्वुर हुसैन राणा पर निम्नलिखित अपराधों में लिप्त होने के आरोप लगाये गये हैं ।

  1. भारत में सार्वजनिक स्थानों में बम विस्फोट करना
  2. भारत में हत्या और विनाश का षड़यंत्र रचना
  3. भारत में अमेरिकी नागरिकों (६) की हत्या
  4. भारत में आतंकवाद को समर्थन देने के लिए भौतिक सहयोग देना

विस्तृत आरोप पत्र अंग्रेजी में मुम्बई बम काण्ड पर अमेरिकी आरोप पत्र (PDF)

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हिन्दुस्तानी में कहावत है – खोदा पहाड़ निकली चुहिया – लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षतया बहुत कम निकलता है – उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है ।
न्यायमूर्ती एम.एस. लिबर्हान ने १७ साल परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को ४० बार बढ़ाया गया , उन्होंने १०२९ पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण १९९२ में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया । उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं  : यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था – ” यह एक संयुक्त उद्यम था “- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यह षड़यन्त्र रचा गया था , इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने सही ही आर.एस.एस का मोहरा बताया है ।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे फुस्स अथवा कायराना हैं तथा उनका इन निष्कपट निष्कर्षों से कोई मेल नहीं बैठता । देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए ६८ व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद  श्री लिब्रहान अब तक विध्वंस-मामले में आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति नहीं करते हैं न ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं ।
षड़यंत्र की बाबत  ’ संयुक्त उद्यम ’का जुमला बार – बार दोहराने की वजह से यह चौंकाने वाली बात लगती है । १९९९ में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत टैडिक फैसले के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा  विकसित हुई है ।
यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में इस विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता , पुलिस अफ़सर, और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता । परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है । धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के उपरान्त , यह रिपोर्ट विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से खुद को बचा ले गई है ।
शायद  श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितना हमारी पुलिस तथा न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है ।
दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान सदोषता की बाबत एक निश्चयात्मक वक्तव्य देते हैं : ” किसी औचित्यपूर्ण सन्देह से परे यह स्थापित है कि यह ’संयुक्त-सामान्य-उद्यम’ विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार , परमहंस रामचन्द्र दास , अशोक सिंघल , चम्पत राय , श्रीषचन्द दीक्षित , बी. पी. सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे । यह सब मौके पर मौजूद नेता थे जिन्हें आर.एस.एस.एस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था । लालकृष्ण अडवाणी मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य उनके स्थानापन्न दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं हैं वे भी आर.एस.एस. द्वारा निर्देशित भूमिका को स्वेच्छा से कबूले हुए सह-षड़यन्त्रकारी हैं । अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले  अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है ।
मेरा यह निष्कर्ष है कि आर.एस.एस. , भाजपा , विहिप , शिव सेना तथा उनके वे पदाधिकारी जिनका इस रिपोर्ट में नाम दिया गया है  ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक ’संयुक्त-समान-उद्यम’(Joint Common Enterprise) स्थापित कर लिया था । उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया तथा लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई में लिप्त रहे । ”
मस्जिद गिराया जाना , “धार्मिक , राजनैतिक , तथा भीड़-तंत्र के सर्वमन्दिरों को एक साथ समेटने वाले संगठित व सुनियोजित षड़यन्त्र का चरम बिन्दु था ” । न्यायमूर्ति लिबर्हान यह सही ही नोट किया कि, ” कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उन्हें सुरक्षित रखा जा सके एवं आगे के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए उनकी सेक्युलर विश्वसनीयता को बचाये रखा जा सके । “इस प्रकार श्री अडवाणी और श्री जोशी इस दूसरे दर्जे के भाग रहे हों परन्तु वे भी राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते , बावजूद इसके कि वे संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ’मुमकिन इन्कार’ की ढाल से लैस हों ।
आज ,सत्रह साल बीत जाने के बाद , इस संयुक्त उद्यम में लिप्त कई अपराधी मर चुके हैं । परन्तु कई इस बिना पर फले फूले हैं कि वे कानून के ऊपर हैं । इस मुल्क के द्वारा न्यायमूर्ति लिबर्हान की इन सिफ़ारिशों के माध्यम से ’इस चूहे को निकालने के लिए ’ चाहे जितनी भी झूठी निन्दा हो , इस रपट में वह खजाना है जिसकी मदद से कोई ख्यातिनाम जाँच एजेन्सी ठोस षड़यन्त्र का मामला बना सकती है । ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी , नार्को विश्लेषण समेत पुलिस की पारंगत पूछताछ , के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायें । उत्तर प्रदेश सरकार यदि गंभीर हो तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को त्वरित-ट्रैक न्यायालय में ले जा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके ।

( मूल अंग्रेजी लेख )

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    १९६७ -६९ की कुछ राजनैतिक घटनाओं की तस्वीरें मेरी याददाश्त का हिस्सा बन गयी है। मेरी उमर आठ – दस साल की । ‘६७ में गैर कांग्रेसवाद की कई सूबों में सफलता और १९६९ में गाँधी की जन्म शताब्दी । गांधी की जन्म शती के मौके पर दुनिया के कई हिस्सों के ‘गाँधी’ भारत आये थे । सरहदी गाँधी – बादशाह ख़ान , फ्रान्स के गांधी – लान्ज़ो देल्वास्तो , मेक्सिकी खेत मजदूरों के गांधी प्रभावित नेता सीज़र शावेज , इटली के दानिलो दोलची । दिल्ली के हरिजन सेवक संघ में बादशाह ख़ान का कार्यक्रम था तब उनसे मिलने देश की कई हस्तियाँ वहाँ मौजूद थीं – ‘भारत में अंग्रेजी राज’ अंग्रेजों द्वारा प्रतिबन्धित उस अमर किताब के लेखक पण्डित सुन्दरलाल – लम्बी झक दाढ़ी के साथ , अंग्रेजों की जेल में रहने के बाद नेहरू द्वारा बरसों गिरफ़्तार रखे गए शेर-ए- कश्मीर शेख़ अब्दुलाह – मेरी बा जब उनसे मिलाने ले गयी तो मैंने उनसे कहा ,’दहाड़िए’ और वे दहाड़े भी । और हिन्दी ,देवनागरी की सेवा करने वाले काका साहब कालेलकर जिन्होंने पहले पिछड़े वर्ग आयोग की सदारत की थी । इन शक्सियतों के दर्शन का यह एक लाभ तो है ही कि उनके द्वारा किए गए देश के लिए काम का स्मरण होता है ।

   १९६७ में गैर कांग्रसवाद का नारा देते वक्त लोहिया यह भी चाहते थे कि वैचारिक आधार पर एक विकल्प बने। उनकी एक बात गैर कांग्रेसी मोर्चे की बाबत बहुत महत्वपूर्ण थी।“जनसंघ की एक पहाड़ साम्प्रदायिकता से कांग्रेस की एक बूँद साम्प्रदायिकता ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वह सत्ता में है । इसी प्रकार कम्युनिस्टों की एक पहाड़ गद्दारी से कांग्रेस की एक बूँद गद्दारी ज्यादा खतरनाक है”। लगातार २० वर्षों से केन्द्र में एक दल का शासन था। केन्द्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनने में और दस साल लग गए। जनसंघी पृष्टभूमि के राजबली तिवारी १९७७ में जब बनारस में विधान सभा चुनाव लड़े और जीते तब ‘रजब अली’ को जिताने में मुसलमान पीछे नहीं थे। जनसंघी सोचते थे कि ‘रजब अली’ कहने पर वोट मिलेगा । तानाशाही के खिलाफ़ जम्हूरियत को बचाए रखने के लिए केले के खम्भे को भी जनता वोट देने के लिए तैयार थी।

    याद कीजिए इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद का चुनाव ।  स्वर्ण मन्दिर में सैनिक कार्रवाई की आलोचना का माने आप गद्दार हैं । भूल जाइए कि अकालियों  और किसा्नों के आन्दोलन से पंजाब में हाशिए पर जा रही कांग्रेस ने भिंडरावाला को ‘सन्त’ का दरजा दिया था । एक छोटे अल्पसंख्यक समूह को ‘गद्दारी’ के साथ जोड़ कर चुनाव अभियान चलाया तो ‘संघ’ ने भी मान लिया कि हिन्दू हित कांग्रेस देखेगी , दो उसीका साथ । भाजपा आ गयी लोकसभा में दो सीटों पर । जम्मू क्षेत्र की जो सीटें आजादी के बाद से हमेशा जनसंघ जीतती थी वे भी पहली बार गईं कांग्रेस की झोली में । पहली बार रीडिफ़्यूज़न नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी से कांग्रेस ने प्रचार करवाया । अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के प्रभावशाली (भय पैदा करने में) विज्ञापन छपते थे – ‘क्या आप चाहते हैं कि देश की सीमा आपके घर की चौहद्दी तक आ जाए?’ कांग्रेस को उस बार मिली सीटें अब तक की सब से बड़ी सफलता और सबसे बड़ा बहुमत रही हैं ।

     बहरहाल , अब केन्द्र में भाजपा भी सत्ता में रह चुकी है । सत्ता में रहने पर निश्चित तौर पर उसकी फिरकापरस्ती खतरनाक हो जाया करती है। पूर्वोत्तर के राज्यों और कश्मीर की बाबत ‘संघ’ के कैडरों के दिमाग में जितनी सतही नासमझी भरी रहती है उससे जिम्मेदार रूप में सरकार में रहने पर भाजपा को रहना पड़ता है । राजग सरकार भी उन अलगाववादी समूहों से बात की कोशिश करती है । जम्मू कश्मीर विधान सभा में भाजपा के कितने विधायक हैं ? और अहोम के अलावा बाकी पूर्वोत्तर के सूबों की विधान सभाओं में ? सिफ़र !

  कई मित्र यह कह रहे हैं कि आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई राजनैतिक नहीं होनी चाहिए । मुख्यधारा की राजनीति की कमियों और कुछ नेताओं के अललटप्पू बयानों के कारण उनके दिमाग में यह ग़लतफ़हमी है । ‘दिल्ली के जामिया नगर में हुई पुलिस मुठभेड़ फर्जी थी ‘ कई मुस्लिम समूह और मानवाधिकार संगठन यह मान रहे हैं । इस सन्दर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा न्यायमूर्ति रामभूषण मल्होत्रा द्वारा दिया गया एक फैसला महत्वपूर्ण है। रामभूषणजी नहीं चाहते कि उनके नाम के आगे न्यायमूर्ति लगाया जाए । चूँकि यह उनके द्वारा दिए गए फैसले की बात है इसलिए ‘न्यायमूर्ति’ लगाना उचित है। अपने फैसले हिन्दी में देने के लिए भी उन्हें याद किया जाएगा। उक्त फैसले में कहा गया था कि जब भी पुलिस ‘मुठभेड़’ का दावा करती है उन मामलों में (१) मृतकों के परिवार को पुलिस द्वारा सूचना दी जाएगी तथा (२) ऐसे सभी मामलों की मजिस्टरी जाँच होगी । यदि यह घटना जामिया नगर की जगह नोएडा में होती तो इन दोनों बातों को खुद-ब-खुद लागू करना होता।घटना की जाँच की माँग एक अत्यन्त साधारण माँग है तथा पूरी पारदर्शिता के साथ इसे पूरा किया जाना चाहिए ।

    इन मानवाधिकार संगठनों और मुस्लिम समूहों से भी हम रू-ब-रू होना चाहते हैं । इतनी गम्भीर परिस्थिति में बस इतना संकुचित रह कर काम नहीं चलेगा । आतंकी घटनाओ और उसके तार देश के भीतर से जुड़े़ होने की बात पहली बार खुल के हो रही है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत के तमाम अमनपसंद मुसलमानों को भुगतना पड़ रहा है । इन घटनाओं के बाद संकीर्ण सोच वाले साम्प्रदायिक समूह हर मुसलमान को गद्दार बताने का अभियान शुरु कर चुके हैं, आगामी लोकसभा निर्वाचन में वोटों के ध्रुवीकरण की गलतफहमी भी वे पाले हुए हैं । आतंकवाद से मुकाबले की नाम पर क्लोज़ सर्किट टेवि जैसे करोड़ों के उपकरण खरीदें जायेंगे और इज़राइली गुप्त पुलिस ‘मसाद’ से तालीम दिलवाई जाएगी । कैनाडा और अमेरिका मे रहने वाले अनिवासी भारतीयों से पूछिए कि पैसे कि ताकत पर कैसे यहूदी लॉबी नीति निर्धारण में हस्तक्षेप करती है ?   इन सब से गम्भीर और नुकसानदेह  बात यह है कि मेधावी तरुण यदि ‘आतंक’ में ग्लैमर देखने लगें तो उन्हें उस दिशा से रोकने और अन्याय की तमाम घटनाओं के विरुद्ध राजनैतिक संघर्ष से जोड़ने का काम कौन करेगा ?  यह काम मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ा कोई खेमा शायद नहीं करेगा।

     एक मुस्लिम महिला पत्रकार और कवयित्री ने अपने चिट्ठे पर लिखा , ‘कि दिल्ली का बम काण्ड करने वाले जरूर हिन्दू रहे होंगे’। अत्यन्त सिधाई से उन्होंने यह बात कह दी। मैंने यह देखा है कि शुद्ध असुरक्षा की भावना से ऐसी बातें दिमाग में आती हैं ।‘काम गलत है, इसलिए जरूर हमारे समूह का व्यक्ति न रहा होगा’ – यह मन में आता होगा ।  राष्ट्रीय एकता परिषद , सर्वोच्च न्यायालय और संसद के सामने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की कसमे खाने वाली जमात ने जब उस कसम को पैरों तले मसलने में अपना राष्ट्रवाद दिखाया तब किसी हिन्दू के दिमाग में क्या यह बात आई होगी कि जरूर यह काम हमारे समूह से अलग लोगों ने किया होगा ? जिन्हें लगता है कि “वह काम सही था और इसीलिए हमारे समूह ने किया” – उन राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवादियों  से हमे कुछ नहीं कहना , उनके खतरनाक मंसूबों के खिलाफ़ लड़ना जरूर है ।

    मैंने आतिफ़ का ऑर्कुट का पन्ना पढ़ा है जिसमें वह फक्र के साथ एक फेहरिस्त देता है कि किन शक्सियतों के आजमगढ़ से वह ताल्लुक रख़ता है  – ……. राहुल सांकृत्यायन , कैफ़ी आज़मी । चार लोगों को जिन्दा जमीन में गाड़ देने वाले भाजपा नेता (पहले सपा और बसपा में रहा है) रमाकान्त यादव या भारत की सियासत के सबसे घृणित दलाल अमर सिंह का नाम नहीं लिखता ! ऐसा कोई तरुण घृणित , अक्षम्य आतंकी कार्रवाई से जुड़ता है , उन कार्रवाइयों की तस्वीरें उतारता है तो निश्चित तौर पर इसकी जिम्मेदारी मैं खुद पर भी लेता हूँ । अन्याय के खिलाफ़ लड़ने का तरीका आतंकवाद नहीं है । आजमगढ़ के शंकर तिराहे के आगे , मऊ वाली सड़क पर प्रसिद्ध पहलवान स्व. सुखदेव यादव के भान्जे के मकान में समाजवादी जनपरिषद के दफ़्तर के उद्घाटन के मौके पर आजमगढ़ के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और फोटोग्राफर दता ने राहुलजी का लिखा गीत दहाड़ कर गाया था – ‘ भागो मत ,दुनिया को बदलो ! मत भागो , दुनिया को बदलो ‘ । आजमगढ़ के तरुणों से यही गुजारिश है ।

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