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Archive for the ‘tribal’ Category

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

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“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

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आदिवासी यानी आदिकाल से रहने वाले इस देश के मूल निवासी! पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले में इस बात को दोहराया है कि आर्यो और द्रविड़ो से भी पहले आदिवासी समूह इस भारत भूमि पर रहते थे। उन्हें छोडकर बाकी सब यहां बाहर से आकर बसें है, चाहे हजारों साल पहले क्यों न बसें हो। विडंबना यह है कि इस भूमि के सबसे पुराने मूल निवासी ही सबसे ज्यादा शक्तिहीन, भूमिहीन, बेघर, वंचित, दलित और गरीब है। आधुनिक विकास के यज्ञ में सबसे ज्यादा बलि उनकी जिंदगियों की ही चढी है और आधुनिक सत्ता-प्रशासन की संवेदन शून्यता, दमन, शोषण व भ्रष्टाचार के शिकार भी वे सबसे ज्यादा हुए है। कोई अचरज की बात नही है कि देश के आदिवासी इलाकों में माओवादी हिंसा की आग धधक उठी है। वैसे कई जगह और कई मौको पर वे लोकतांत्रिक तरीकों से भी आवाज उठाते रहे है तथा कई बार अपने को असहाय पाकर उन्होने नियति को चुपचाप मंजूर भी कर लिया है। आदिवासियों की यह हालत भारतीय लोकतंत्र पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह खडा करती है।
इतिहास इस बात का गवाह है कि जब प्लासी की लड़ाई में सिराजुद्दौला की हार के साथ ही भारत के ऊपर अंग्रेजो की सत्ता कायम होने का रास्ता साफ हो गया था, उन्हें पहली सशक्त चुनौती भारत के जंगलों में आदिवासियों के प्रतिरोध से ही मिली। 1857 के काफी पहले आदिवासियों के विद्रोह शुरू हो गए थे। 1857 में भी और बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी के आंदोलन में भी उनकी जोरदार भागीदारी रही, भले ही इतिहास की किताबों में उसे ठीक से दर्ज न किया गया हो। देश आजाद होने के बाद समता, विविधता और समरसता पर आधारित एक नए भारत के निर्माण का मौका आया था, जिसमें औपनिवेशिक काल के अन्यायों का निराकरण हो सकता था। भारत के संविधान निर्माताओं ने भी संविधान के अंदर आदिवासियों के हितों के संरक्षण और संवर्धन के प्रावधान करने की कोशिश की, किंतु अन्य कई मामलों की तरह इस में भी भारतीय जनता के साथ विश्वासघात हुआ। संविधान की मूल भावना और इसके महान लक्ष्यों की धज्जियां उड़ती रही।
आजादी मिलने के बाद पहली बड़ी घटना बस्तर के राजा प्रवीरचन्द भंजदेव की पुलिस द्वारा हत्या थी, जिसने आगे की घटनाओं का संकेत दे दिया था। भंजदेव आदिवासी नहीं थे, लेकिन वे आदिवासियों के राजा थे और यह आंदोलन पूरी तरह आदिवासियों का ही था। बाद की फर्जी मुठभेड़ो का यह संभवतः पूर्वाभास था। उधर पश्चिम की नकल पर चली विकास योजनाओं में भी सबसे ज्यादा आदिवासियों का ही आशियाना उजड़ा। बड़े बांध हो या बड़े कारखाने – ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ की बुनियाद आदिवासियों और जंगलो के विनाश पर ही रखी गई। भिलाई, बोकारो या राउरकेला – सब आदिवासियों की जमीन पर ही बने। आज भी उनके आसपास रहने वाले आदिवासी कंगाल, कुपोषित, वंचित और फटेहाल है। आधुनिक विकास की इन विसंगतियों के भतीभांति सामने आने के बाद भी उस पर गंभीरता व ईमानदारी से पुनर्विचार की प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं हुई है। बल्कि वैश्वीकरण के ताजे दौर में विकास के नाम पर आदिवासी जीवन पर हमला बढ़ गया है।
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को और प्रांतो में उसके प्रतिनिधि के रूप में राज्यपालों को अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण की विशेष शक्तियां और जिम्मेदारी दी गई थी। वे चाहें तो आदिवासी इलाको में किसी भी कानून या योजना के क्रियान्वयन को रोक सकते है। लेकिन स्वतंत्र भारत में आज तक एक बार भी राष्ट्रपति या किसी राज्यपाल ने आदिवासियों के हित में इन शक्तियों का प्रयोग नही किया। भूरिया समिति की रपट के आधार पर बने ‘पेसा’ कानून का क्रियान्वयन से ज्यादा उल्लंघन होता रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने तो सरगुजा जिले में एक ग्रामसभा द्वारा बिजली कारखानें के लिए जमीन देने से इंकार करने पर उस गांव को नगर में बदलने का कमाल कर दिया, ताकि पेसा कानून आडे नही आए। आदिवासी इलाको की ग्राम सभा या जनसुनवाई को हमारे आईएएस अफसर अपनी जूती की नोक के बराबर भी नहीं समझते है। कमोबेश यही हाल दो वर्ष पहले संसद में पारित वन अधिकार कानून का भी हो रहा है।
डा.ब्रहमेदव शर्मा के रूप में भारत के अनुसूचित जातियों व जनजातियों के आयुक्त की उनचालीसवीं रपट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसने हालातों का विस्तार से जायजा लिया था तथा सुझाव भी दिए थे। किंतु यह रपट अलमारियों में रखी धूल खा रही है। उधर डा.शर्मा सेवानिवृत्त के बाद खुद मैदान में कूद पड़े तो जगदलपुर में सत्ता व कंपनियों के दलालों द्वारा उनके कपड़े फाडने जैसी फजीहत कर दी गई।
आजाद भारत में आदिवासियों के उत्पीड़न का एक बड़ा स्त्रोत वन कानून, वन प्रबंधन और वननीति रही है। अंग्रेजो द्वारा भारतीय जंगलों पर अपना कब्जा करने, व्यवसायिक दोहन तथा आदिवासियों का अधिकार खत्म करने के हिसाब से बने कानूनों व नीति को आजाद भारत में भी जारी रखा गया। विश्व बैंक और अन्य विदेशी सहायता ने भी इसी को पुष्ट किया। इसकी मूल मान्यता है कि जंगलो में आदिवासियों की उपस्थिति ही जंगल व जंगली जानवरों के नाश का कारण है, इसलिए उनको हटाया जाए या उनके द्वारा जंगल उपयोग को रोका जाए। हम भूल गए कि जंगल, जंगली जानवरों और आदिवासियों का सह-अस्तित्व हजारों सालों से रहा है। उनको अलग किया तो न जंगल बचेंगे और न आदिवासी बचेंगे। हमने शेरों और हाथियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य तो बनाए लेकिन यह भूल गए कि आदिवासियों के संरक्षण की भी जरूरत है और जंगल व जंगली जानवरों के नाश के दोषी आदिवासी नहीं, खुद औपनिवेशिक व आजाद सरकारों की नीतियां रही है। करीब 50 हजार शेरों और लाखो वन्य प्राणियों का शिकार तो आजादी के पहले के सौ वर्षो में अंग्रेज अफसरों व नवाबों-राजाओं द्वारा हुआ है। गुनाह किसी का और सजा किसी और को! आदिवासियों के साथ यह अन्याय और साम्राज्यवादी सलूक आज भी जारी है।
आदिवासियों के अपने विशिष्ट धर्म, रीति-रिवाज, भाषा, संस्कृति और पहचान भी लगातार हमले का शिकार हो रहे है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350 ए में स्पष्ट निर्देश था कि – ‘प्रत्येक राज्य और उस राज्य के अंतर्गत प्रत्येक स्थानीय सत्ता भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधा जुटाएगी।’ किंतु आज तक आदिवासी बच्चों को उनकी अपनी भाषाओं से शिक्षा देने की व्यवस्था नहीं की गई। आदिवासी भाषाएं गहरे संकट में है और खत्म हो रही है और एक भाषा के साथ एक समुदाय की संस्कृति, पहचान, इतिहास और आत्मविश्वास जुड़े होते है, जिन पर संकट आता है।
यदि भारतीय लोकतंत्र को सही मायने में सार्थक और भागीदारी वाला बनाना है तो इसके ढांचे, इसकी शैली और इसके अमल को बुनियादी रूप से बदलना जरूरी हो गया है। भारतीय जनता के सबसे नीचे के पायदान पर स्थित आदिवासियों का क्या होता है यह इसकी असली परीक्षा होगी। इसके लिए राजधानियों के वातानुकूलित महलों में अफसरों-नेताओं-कंपनियों द्वारा लिए जाने वाले फैसलों को रोककर, गांवों-जंगलों में रहने वाले लोगों को अपने फैसले लेने का अधिकार देना पडेगा। इसके लिए मौजूदा पंचायती राज नाकाफी है। भारत की केन्द्रीकृत सत्ता और अफसरशाही के ढांचे को तोड़कर, प्रशासनिक ढांचे को बुनियादी रूप से बदलकर, मौजूदा कानूनों व नीतियों की गहरी समीक्षा करके, विकास के मौजूदा माॅडल को भी बदलना पडेगा। भारतीय लोकतंत्र के छः दशक पूरे होने यदि सबसे पुराने धरती-पुत्र असंतुष्ट, बैचेन व संकटग्रस्त है तो इसकी गंभीर समीक्षा व बुनियादी बदलाव का वक्त आ गया है।

sjpsunil@gmail.com

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आदिवासी इलाकों का मैदानी कार्यकर्ता है।

कृपया आलेख प्रकाशित होने पर कतरन एवं पारिश्रमिक निम्न पते पर भेजे:
सुनील
ग्राम/पोस्ट केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461111
फोन: 09425040452

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पिछला हिस्सा

इन छोटे-छोटे जनांदोलनों की जो कमी या विफलता है, वह यह है कि वे मिलकर व्यवस्था-परिवर्तन की कोई बड़ी धारा नहीं बना पा रहे हैं। एक-एक मुद्दे वाले इन आंदोलनों में कई बार वैचारिक-राजनैतिक दृष्टि का अभाव रहता है। इसीलिए वे कोई बड़ी शक्ल नहीं ले पा रहे हैं और कोई निरंतरता भी उनमें नहीं दिखाई देती है। उनके नेतृत्व की व्यक्तिवादिता तथा एनजीओ की भारी घुसपैठ भी दो बड़ी बाधाएं हैं। वास्तव में यह एक बड़ी चुनौती है। इन छोटे-छोटे जनांदोलनों में भी एक समय के बाद ठहराव आ जाता है। उनकी ऊर्जा को समेटते हुए, एक वैचारिक प्रक्रिया चलाते हुए, राजनैतिक दिशा देते हुए, एक देशव्यापी परिवर्तनवादी आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है।

माओ

पिछले महीने , २७-२८ मार्च को इलाहाबाद में देश के जनांदोलनों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े करीब एक सौ लोगों की बैठक इसी मकसद से हुई थी । इसका कोई ठोस नतीजा निकलेगा या नहीं,इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है । लेकिन इतना तय है कि अब छोटे ,एक-लक्ष्यी आंदोलनों से काम नहीं चलेगा । देश को बचाने के लिए परिवर्तन की धारा बहे , यह वक्त की पुकार है । आज के हालात १९७३ -७४ से ज्यादा अलग नहीं हैं ।

माओवादियों की विकास नीति क्या है ?

माओवादियों के रास्ते के बारे में भी कई सवाल स्वयं अरुंधती राय के वृतांत को पढ़ते हुए खड़े होते हैं। एक तो किस तरह का बर्बरीकरण सरल आदिवासी समाजों का हो रहा है, जब 17 साल की लड़की कमला कहती है कि उसे कोई और फिल्म अच्छी नहीं लगती ? वह सिर्फ एम्बुश (घात लगाकर हमला) वीडियो देखती है, जिनमें मानव शरीरों के परखच्चे उड़ जाते हैं। या फिर वह मां, जिसके बेटे को पुलिस ने मार दिया और लाश भी नहीं दी। वह कहती है कि वह खून का बदला खून से लेगी। या माओवादियों द्वारा विरोधी खेमे के आदिवासियों की सामूहिक हत्या। या किसी पुलिस के सिपाही का सिर धड़ से अलग कर देना। जब हम अदालतों द्वारा दी गई फांसी और मृत्युदंड को भी गलत मानते हैं और उनके विरुद्ध अभियान चलाए जाते हैं तब क्या इस तरह की हत्याएं उचित ठहराई जा सकती हैं ? हरियाणा की खाप पंचायतें और तालिबानी जन अदालतें हमें भयानक लगती हैं तब क्या गारंटी है कि माओवादी जन-अदालतों एवं बंदूकों की ताकत का दुरुपयोग नहीं होगा ?

अंतहीन हिंसा के इस दुष्चक्र में आखिरकार कौन मारे जा रहे हैं ? क्या गरीब आदिवासी या पुलिस व अर्ध फौजी बलों के सिपाही नहीं ? नारायणपुर में रहने वाले 4000 मुखबिर कौन होंगे ? क्या साधारण छोटे लोग नहीं ? सलवा जुडुम में भी तो शामिल आदिवासी लड़के ही हैं। अरुंधती को एक माओवादी आदिवासी युवक ने बताया कि उसका सगा भाई सलवा जुडुम का ’विशेष पुलिस अधिकारी’ है। वह चाहे भी  तो अब कभी लौट नहीं सकता। ऐसा कैसे हो गया कि आदिवासी एक दूसरे को मार रहे हैं ? हर समाज में कुछ गलत तत्व होते हैं, जो लालच एवं दुष्टता के शिकार हो जाते हैं। लेकिन क्या उनकी सजा मौत ही होगी ? क्या पश्चाताप सुधार या माफी की कोई गुंजाईश नहीं होगी ? यदि इस तरह की हिंसा को उचित माना जाएगा तो क्या तालिबानी आतंकवादियों को गलत कहा जा सकेगा ? अपनी समझ के मुताबिक वे भी तो एक महान और पवित्र उद्देश्य के लिए दूसरों को बम से उड़ा रहे हैं।

अरुंधती राय इन हालातों के लिए भारतीय राजसत्ता को दोषी ठहराती है। वे बहुत हद तक सही हैं। लेकिन क्या किशोरों और किशोरियों के हाथों में बंदूके थमाने वाले माओवादियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? सोच समझकर चुना गया चारु मजूमदार का ‘जन-संहार’ (एनिहिलेशन) का यह रास्ता कहां पहुंचाएगा ? क्या सचमुच इसकी राख से नया इंसानी समाज निकल पाएगा ?

माओवादी नेता किशनजी कहते हैं कि वे 2050 तक दिल्ली में अपना झंडा फहरा देंगें। इसे मान भी लिया जाए तो इसका मतलब है कि 40 साल तक हिंसा का यह भयानक दौर चलता रहेगा। इसका क्या नतीजा होगा ? क्या बाद के समाज पर भी इसकी छाया नहीं रहेगी ? अभी तक जितनी भी हिंसक क्रांतियां हुई हैं, उन्होंने तानाशाही को ही जन्म दिया है। कारण बहुत साफ है। जिनके पास बंदूक की ताकत होती है, उनको उसका नशा भी चढ़ जाता है। फिर लंबे समय तक हथियारबंद युद्ध लड़ने वाले क्रांतिकारी संगठनों का ढांचा लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। युद्ध में बहस या मतभेदों की जगह नहीं होती। वहां तो कमांडर को हुक्म मानना ही है। इसीलिए नक्सलवादियों में जरा भी मतभेद होने पर टूट हो जाती है और कल तक का साथी आज का दुश्मन नं० एक हो जाता है।

गांधी

ऐसे भूमिगत संघर्षों में असुरक्षा की भावना भी बहुत हावी रहती है। क्या मालूम कब कौन पुलिस का एजेन्ट निकल जाए ? इसलिए जिन औजारों और तरीकों से आप लड़ रहे हैं , लड़ाई का नतीजा और वैकल्पिक समाज का चरित्र भी कहीं न कहीं उनसे प्रभावित होगा । गांधी ने साधन और साध्य की सम्गति की बात अकारण या अमूर्त सिद्धान्त के तौर पर नहीं की थी । उसके पीछे मानव समाज के ठोस अनुभव थे ।

तर्क के लिए यह कहा जा सकता है कि पूंजीवादी व्यवस्था और राजसत्ता में भी बहुत हिंसा और तानाशाही छिपी है। और टूट तो गैर-हथियारबंद आंदोलनों में भी होती है। व्यक्तिवादिता, गुटबाजी और तानाशाही उनमें भी बहुत है। किन्तु दूसरों का दोष दिखानें से अपना दोष कम नहीं हो जाता। नया समाज गढ़ने की इच्छा रखने वालों को नये तरीके भी गढ़ने होंगें। खास तौर पर जब पिछली एक-डेढ़ सदी के अनुभव हमारे सामने हैं, जिनसे हम सीख सकते हैं।

हिंसा- अहिंसा की बहस अंतहीन है, क्योंकि अंत में यह मामला तर्क का नहीं, विश्वास का बन जाता है। लेकिन एक ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है विकास के मॉडल का, जो अरुंधती राय के मन में भी उठा है। जो माओवादी पार्टी आज बॉक्साईट या लौह अयस्क के खनन का विरोध कर रही है, कल उसका राज आएगा तो क्या होगा ? आधुनिक जीवन-शैली, भोगवाद, समृद्धि, आधुनिक उद्योगों, आधुनिक तकनालाजी, पर्यावरण आदि के बारे में उसके क्या विचार है ? आधुनिक विकास में तो इस तरह का खनन, विस्थापन और विनाश नीहित है।

कुछ समय पहले समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने खनन परियोजनाओं के संदर्भ में यह बात उठाई थी कि मामला सिर्फ विस्थापन और जंगलों के विनाश का नहीं है। इतना ज्यादा खनिज निकालने की जरुरत क्या है और यह किसके लिए है ? फेलिक्स और समरेन्द्र दास की ताजा किताब से और इसके पहले विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की खनन पर केन्द्रित नागरिक रपट से भी इसी तरह के सवाल निकलते हैं। इनके बारे में माओवादियों के विचार क्या है ? क्या वे आधुनिक विकास का मोह छोड़ने के लिए तैयार हैं ?

ये सवाल पूछना इसीलिए जरुरी है क्योंकि मार्क्सवादी समूहों में इन पर काफी संभ्रांति, उलझन और अस्पष्टता रही है। नेपाल के दोनों प्रमुख माओवादी नेताओं प्रचण्ड और बाबूराम भट्टराई के जो साक्षात्कार 2008 में प्रकाशित हुए, वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने कहा कि वे पनबिजली के लिए बड़े बांध बनाएंगे, पर्यटन को बढ़ावा देंगे, खेती का आधुनिकीकरण करेंगे, सरकारी-निजी भागीदारी को बढ़ावा देंगे और विदेशी पूंजी को भी आमंत्रित करेंगे। विश्व व्यापार संगठन से बाहर आने के बारे में उनका कोई फैसला नहीं है। भारत के माओवादियों के विचार भी क्या इसी तरह के हैं या इनसे अलग है? अलग हैं तो कितना ?

अरुंधती राय ने इस बात पर चुटकी ली कि कभी नक्सलवाद के प्रणेता चारु मजूमदार जो कहते थे, उस मंत्र का जाप आज नक्सलियों का दमन करने वाली भारत सरकार कर रही है – ‘चीन का रास्ता हमारा रास्ता है’। सवाल यह है कि चीन इस मुकाम पर कैसे पहुंचा ? तीसरी दुनिया के अनूठे एवं प्रेरणास्पद साम्यवादी मॉडल से वह घोर पूंजीवादी मुकाम पर कैसे पहुंच गया ? क्या इसके पीछे भी कहीं चीन के साम्यवादी शासकों के मन में आधुनिक विकास एवं समृद्धि की वही अवधारणा नहीं थी, जो पूंजीवादी औद्योगिक देशों की है ? भारतीय माओवादियों की मंजिल क्या है ? आज के चीन और उसके ‘बाजार समाजवाद’ के बारे में वे क्या सोचते हैं ? अच्छा होता यदि अरुंधती  राय इन सवालों को मन में न रखकर माओवादी नेताओं से पूछती, कुरेदती और उनके जबाब बाकी लोगों को बताती। उन पर एक बहस चल सकती थी। आखिर चीन की क्रांति भी बड़ी जबरदस्त थी, लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी थी। क्या फिर भारत में भी उतनी कुर्बानियां देकर उसी मुकाम पर पहुंचना है ?

जब दंतेवाडा का पुलिस अधीक्षक अरुंधति राय से कहता है कि अगर हर आदिवासी को एक टीवी दे दिया जाए तो उनका प्रतिरोध टूट सकता है,तो वह एक गहरी बात कह रहा है । अगर आदिवासी आज के वैश्विक बाजार , उपभोक्ता संस्कृति और उसकी ललक का हिस्सा बन गए तो उन्हें परास्त करना आसान हो जाएगा । मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम बताया था,पर समाजवादी चिंतक सच्चिदानन्द सिन्हा ने उपभोक्तावादी संस्कृति को गुलाम मानसिकता की अफ़ीम निरूपित किया है। इस तरह दंतेवाड़ा में दो अलग संस्कृतियों,सोच और जीवन मूल्यों की टकराहट भी है। आधुनिक विकास की टक्कर माओवादियों के अस्तित्व से हो रही है ।सवाल है कि माओवादियों की इस बारे में क्या दृष्टि है?

जैसे ही आधुनिक विकास पर सवाल उठते हैं, गांधी प्रासंगिक हो जाते हैं। अरुंधती राय ने माओवादियों को बंदूकधारी गांधीवादी कहा है। किन्तु गांधी के इस पक्ष हिंसा-अहिंसा पर माओवादी क्या सोचते हैं ? कोई अरुंधती को भी बता दे कि गांधी का मतलब सिर्फ भूख हड़ताल या जंगल में मजबूरी में सादगी से रहना नहीं है। न ही गांधीगिरी का मतलब महज किसी को फूल भेंट करना है। गांधी के पास एक वैकल्पिक विकास और वैकल्पिक सभ्यता की सोच है, जो समय के साथ ज्यादा जरुरी और ज्यादा प्रासंगिक होती जा रही है।

बीसवीं सदी में तीसरी दुनिया में दो बड़े क्रांतिकारी हुए है – गांधी और माओ। दोनों में कुछ समानताएं होते हुए भी दोनों की नयी दुनिया की कल्पनाएं अलग-अलग थी। माओ का रास्ता आजमाया जा चुका है। गांधी के सत्याग्रह के तरीके का उपयोग आजादी के आंदोलन में हुआ, किन्तु आजाद भारत के शासकों के विश्वासघात के कारण उनके विचारों का ‘स्वराज’ नहीं आ सका। अब दोनों विचारकों, उनकी विचारधाराओं और उनके प्रयोगों की सफलताओं – असफलताओं से सीखकर ही इक्कीसवीं सदी की क्रांति का पथ प्रशस्त हो सकेगा।

संदर्भ:

1.              अरुंधती राय, ‘वाकिंग विद द कॉमरेड्स’, आउटलुक, 29 मार्च 2010

2.              किशन पटनायक, ‘विजन्स ऑफ डेवलपमेंट: द इनएविटेबल नीड फॉर आल्टरनेटिव्ज’

फ्यूचर्स, नं. 36, 2004

3.              सुनील, ‘नेपाली माओवादियों की सीमाएं‘, जनसत्ता, 23जून, 2008

4.              सुनील, ‘लोकतंत्र और सत्याग्रह’, जनसत्ता, 2 दिसंबर, 2009

5.              फेलिक्स पैडल एवं समरेन्द्र दास, ‘आउट ऑफ दिस अर्थ: ईस्ट इंडिया                       आदिवासीज़ एंड द एल्युमिनियम कार्टेल’, 2010

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

– सुनील

ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)

पिन कोड: 461 111

मोबाईल 09425040452

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[ स्कूल के दौरान ही सुनील को गाँधीजी की आत्मकथा मिली थी और वे उससे प्रभावित हुए थे। मध्य प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में मेरिट सूची में स्थान पाने के बाद एक छोटे कस्बे से ही उन्होंने स्नातक की उपाधि ली। देश के अभिजात विश्वविद्यालय माने जाने वाले – जनेवि में दाखिला पाया । विद्यार्थी जीवन में ही लोकतांत्रिक समाजवाद में निष्ठा रखने वाले युवजनों की जमात से जुड़ गये । जलते असम और पंजाब के प्रति देश में चेतना जागृत करने के लिए साइकिल यात्रा और पदयात्रा आयोजित कीं । समता एरा और सामयिक वार्ता के सम्पादन से जुड़े रहे तथा दर्जनों पुस्तकें लिखीं और सम्पादित की। जनेवि में हरित क्रांति के प्रभावों पर पीएच.डी का काम छोड़ मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के केसला प्रखण्ड के किसान-आदिवासियों को संगठित करने में जुट गये ।गत पचीस वर्षों से उस क्षेत्र को वैकल्पिक राजनीति का सघन क्षेत्र बनाया है। दर्जनों बार जेल यात्राएं हुईं -सरकार द्वारा थोपे गये फर्जी मुकदमों के तहत । प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी के हक को लेकर सफल नये प्रयोग किए । देश में नई राजनैतिक ताकत की स्थापना के लिए समाजवादी जनपरिषद नामक दल की स्थापना करने वालों में प्रमुख रहे। माओवादी राजनीति की बाबत गंभीर अंतर्दृष्टि के साथ लिखा गया यह लम्बा लेख एक नई दिशा देगा। आज के ’जनसत्ता’ से साभार ।- अफ़लातून ]

सुनील

दंतेवाड़ा ने देश को दहला दिया है। यह साफ है कि दंतेवाड़ा,लालगढ़, मलकानगिरि जैसे कुछ आदिवासी इलाकों में माओवादियों ने अपने आजाद क्षेत्र बना लिये हैं, आदिवासियों का ठोस समर्थन और आदिवासी युवा उनके साथ हैं तथा वे पूरी तैयारी और सुविचारित रणनीति के साथ अपना युद्ध लड़ रहे हैं।

6 अप्रैल को दंतेवाड़ा में अभी तक की पुलिस व अर्धफौजी बलों की सबसे बड़ी क्षति हुई है। इस घटना की प्रतिक्रिया में रस्मी तौर पर बयान आ रहे हैं और तलाशी अभियान चल रहे हैं। कई बेगुनाहों को इस चक्कर में पकड़ा, मारा या सताया जाएगा। हिंसा और अत्याचारों का दौर दोनों तरफ चलता रहेगा। लेकिन इससे कुछ नहीं निकलेगा। हालात और बिगडे़गी। वक्त आ गया है कि जब देश गंभीरता से विचार करे कि ये हालातें क्यों पैदा हुई, माओवादियों का इतना जनाधार कैसे बढ़ा, सरल और शांतिप्रिय आदिवासी मरने व मारने पर क्यों उतारु हुए ? इस हिंसा की जड़ में क्या है ?

माओवाद या नक्सलवाद के बारे में देश आम तौर पर तभी सोचता है, जब ऐसी कोई बड़ी घटना होती है। मीडिया के जरिये कभी-कभी जो अन्य कहानियां या खबरें मिलती हैं, वे सतही और पूर्वाग्रहग्रस्त रहती हैं। ऐसी हालत में देश की एक बड़ी अंग्रेजी लेखिका अरुंधती राय ने करीब एक सप्ताह दंतेवाड़ा के जंगलों में सशस्त्र माओवादियों के साथ बिता कर उसका वृत्तांत ‘आउटलुक’ (29 मार्च, 2010) पत्रिका में देकर हमारा एक उपकार किया है। ऐसा नहीं है कि वे पूरी तरह निष्पक्ष है। माओवादियों के प्रति उनकी सराहना, सहानुभूति और उनका रोमांच साफ है। किन्तु इससे दूसरी तरफ की, अंदर की, बहुत सारी बातें जानने एवं समझने को मिलती है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछले काफी समय से सरकार ने इन इलाकों को सील कर रखा है और बाहर से किसी को जाने नहीं दे रही है। मेधा पाटेकर, संदीप पांडे या महिला दल की जनसुनवाई या पदयात्रा को भी सरकार और सरकारी गुर्गों ने होने नहीं दिया। उनकी घेरेबंदी को भेदकर, भारी जोखिम लेकर, काफी कष्ट सहकर, अरुंधती ने बड़ा काम किया है। भारत के बुद्धिजीवी जिस तरह से वातानुकूलित घेरों के अंदर बुद्धि-विलास तक सीमित होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए भी यह काबिले तारीफ है।

तीन संकट:

इस वृतांत से एक बात तो यह पता चलती है कि वहां के आदिवासियों का एक प्रमुख मुद्दा जमीन और जंगल (तेदूंपत्ता या बांस कटाई) की मजदूरी का रहा है। बड़े स्तर पर वनभूमि पर आदिवासियों का कब्जा करवाकर और वन विभाग के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाकर माओवादियों ने अपना ठोस जनाधार बनाया है। वास्तव में, देश के सारे जंगल वाले आदिवासी इलाकों में  तनाव, टकराव और जन-असंतोष का यह एक बड़ा कारण है। अब तो देश को यह अहसास होना चाहिए कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रुप से अन्याय हुआ है, भारत के वन कानून जन-विरोधी और आदिवासी – विरोधी हैं, आजादी के बाद हालातें नहीं बदली हैं, बल्कि राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारण्यों एवं टाईगर रिजर्वों के रुप में उनकी जिंदगियों पर नए हमले हुए हैं। संसद में पारित आधे-अधूरे वन अधिकार कानून से यह समस्या हल नहीं हुई है। जैसे नरेगा से रोजगार की समस्या हल नहीं हो सकती, सूचना के अधिकार से प्रशासनिक सुधार का काम पूरा नहीं हो जाता, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून से देश में भूख एवं कुपोषण खतम नहीं होने वाला हैं, उसी तरह वन-अधिकार कानून भी ज्यादातर एक दिखावा ही साबित हुआ है। भारत के जंगलों पर पहला अधिकार वहां रहने वाले लोगों का है, उनकी बुनियादी जरुरतें सुनिश्चित होनी चाहिए, तथा अंग्रेजों द्वारा कायम वन विभाग की नौकरशाही को तुरंत भंग करके स्थानीय भागीदारी से वनों की देखरेख का एक वैकल्पिक तंत्र बनाना चाहिए। भारत के जंगल क्षेत्रों में खदबदा रहे असंतोष का दूसरा कोई इलाज नहीं हैं। और यही जंगलों एवं वन्य प्राणियों के भी हित में होगा।

वैश्वीकरण के दौर में, निर्यातोन्मुखी विकास और राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर के चक्कर में, देशी विदेशी कंपनियों और सरकार के सहयोग से इन इलाकों के जल-जंगल-जमीन पर हमले का एक नया दौर शुरु हुआ है। खदानों व कारखानों के बेतहाशा करारनामे और समझौते हो रहे हैं। यदि सबका क्रियान्वयन हो गया, तो भारत के बड़े इलाकों से जंगल और आदिवासी दोनों साफ हो जाएंगे। सलवा जुडुम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के पीछे सरकार के जोर लगाने का एक बड़ा कारण यही है कि इन इलाकों में खनिज के भंडार भरे हुए हैं। सलवा जुडुम के लिए टाटा और एस्सार कंपनी ने भी पैसा दिया है, इस तरह के तथ्य सामने लाने का भी काम अरुंधती राय ने किया है। भारत के मौजूदा गृहमंत्री चिदंबरम साहब भी वेदांत एवं अन्य कंपनियों से जुडे़ रहे हैं। यह हमला व यह सांठगांठ देश में लगभग हर जगह चल रहा है। कई जगह लोग गैर-हथियारबंद तरीकों से लड़ रहे हैं। यदि देश को बचाना है, तो इस कंपनी साम्राज्यवाद को तत्काल रोकना होगा। यह दूसरा निष्कर्ष सिर्फ अरुंधती राय के लेख से नहीं, देश के कोने-कोने से आने वाली सैकड़ों रपटों व खबरों से निकलता है।

माओवाद के नाम पर इन तमाम गैर-हथियारबंद आंदोलनों को भी कुचला जा रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि भारतीय राजसत्ता और माओवादी दोनों के लिए यह स्थिति सुविधाजनक है और दोनों इसे बनाए रखना चाहते हैं। माओवाद प्रभावित इलाकों के आसपास के जिलों में भी अब कोई भी भ्रष्टाचार या पुलिस ज्यादतियों का मामला भी नहीं उठा सकता। उसे माओवादी कहकर जेल में सड़ा दिया जाएगा या फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाईश और जगह खतम होने से लोग मजबूर होकर माओवाद की शरण में जाएंगे, इसलिए यह माओवादियों के  हित में भी है। लालगढ़ में ‘‘पुलिस संत्रास बिरोधी जनसाधारणेर कमिटी’’, कलिंग नगर में टाटा कारखाने के विरोध में आंदोलन, नारायणपटना में अपनी जमीन वापसी की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी — ये सब गैर-हथियारबंद लोकतांत्रिक आंदोलन थे। इनके नेताओं को जेल में डालकर, इन पर लाठी – गोली चलाकर सरकार इनको माओवादियों की झोली में डाल रही है।

अतएव हमें तीसरा अहसास भारतीय लोकतंत्र पर छाए गंभीर संकट का होना चाहिए। भारतीय राजसत्ता जहां चाहे, जब चाहे, लोकतांत्रिक नियमों और मान-मर्यादाओं को ताक में रख देती है। विशेषकर जो इलाके और समुदाय भारत की मुख्य धारा के हिस्से नहीं है, जैसे पूर्वोत्तर और कश्मीर, दलित, आदिवासी और मुसलमान, उनके साथ वह बर्बरता और क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ जाती है। उसका बरताव वैसा ही होता है, जैसा एक तानाशाह का होता है। सशस्त्र संघर्ष तो अलग बात है, लोकतांत्रिक एवं अहिंसक तरीकों से होने वाले जनप्रतिरोध को भी उपेक्षित करने व कुचलने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आखिर दस वर्षों से चल रहा इरोम शर्मिला का अनशन तो एक गांधीवादी प्रतिरोध ही है, जो इस राजसत्ता की संवेदनशून्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अपने दमन और अत्याचारों से यह राजसत्ता लोगों को उल्टे हिंसा की और धकेलती एवं मजबूर करती है।

भारत में बढ़ता हुआ उग्रवाद, आतंकवाद और माओवाद कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र की गहरी विफलता की ओर इशारा करता है, जिसमें लोगों को अपनी समस्याओं और अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने तथा उनके निराकरण के जरिये नहीं मिल पा रहे हैं। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की इस विफलता को देश के मुख्य इलाकों के आम लोग भी महसूस कर रहे हैं। उनकी हताशा कम मतदान, आम बातचीत में नेताओं को गाली देने, तुरंत कानून अपने हाथ में लेने या हिंसा व आगजनी की घटनाओं में प्रकट होती है। देश की आजादी के बाद लोकतंत्र का जो ढांचा हमारे संविधान निर्माताओं ने अपनाया, वह शायद बहुत ज्यादा उपयुक्त नहीं था। अब पिछले छः दशकों के अनुभव के आधार पर इसकी समीक्षा करने का समय आ गया है। माओवादियों की तो इसमें कोई रुचि नहीं होगी कि इस ‘बुर्जुआ’ लोकतंत्र को बचाया जाए। लेकिन बाकी देशप्रेमी लोगों को इस लोकतंत्र की अच्छी बातों जैसे वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, कमजोर तबकों के लिए आरक्षण, आदि को संजोते हुए इसके ज्यादा विक्रेन्द्रित, जनता के ज्यादा नजदीक, नए वैकल्पिक ढांचे के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

इस लेख में अरुंधती राय ने विरोध के गांधीवादी, अहिंसक एवं लोकतांत्रिक तरीकों का कुछ हद तक मजाक उड़ाया है और बताया है कि वे सब असफल हो गए है। यह भी पूछा है कि आखिर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कौन-कौन सा दरवाजा नहीं खटखटाया ? वे बताना चाहती हैं कि हथियार उठाने, युद्ध लड़ने, सत्ता के मुखबिरों को मारने-काटने का जो रास्ता माओवादियों ने चुना है, उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। किन्तु क्या सचमुच ऐसा है ? पता नहीं, अरुंधती राय को मालूम है या नहीं, देश के कई हिस्सों में इस वक्त सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे आंदोलन चल रहे हैं जो सब लोकतांत्रिक और गैर-हथियारबंद है। वास्तव में माओवादियों के मुकाबले उनका दायरा काफी बड़ा है। सफलता-असफलता की उनकी स्थिति भी मिश्रित है, एकतरफा नहीं। बल्कि सूची बनाएं, तो ऐसे कई छोटे-छोटे जनांदोलन पिछले दो-ढाई दशक में हुए हैं जो विनाशकारी परियोजनाओं को रोकने के अपने सीमिति मकसद में सफल रहे हैं। झारखंड में कोयलकारो, उड़ीसा में गंधमार्दन, चिलिका, गोपालपुर, बलियापाल एवं कलिंगनगर, गोआ में डूपों और सेज विरोधी आंदोलन, महाराष्ट्र में नवी मुंबई और गोराई के सेज -विरोधी आंदोलन  आदि। बंगाल में सिंगुर और नन्दीग्राम में भी हिंसा जरुर हुई, लेकिन वे मूलतः लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर के आंदोलन थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन भले ही नर्मदा के बड़े बांधों को रोक नहीं पाया, लेकिन उसने बड़े बांधों और उससे जुड़े विकास के मॉडल पर एक बहस देश में खड़े करने में जरुर सफलता पाई। विस्थापितों की दुर्दशा के सवाल को भी वह एक बड़ा सवाल बना सका, नहीं तो पहले इसकी कोई चर्चा ही नहीं होती थी। लेकिन यह भी सही है कि नवउदारवादी दौर में राजसत्ता का जो दमनकारी चरित्र बनता जा रहा है, उसमें आंदोलन एवं प्रतिरोध करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। गांधी के देश में गांधी के रास्ते पर चलना कठिनतर होता जा रहा है। (जारी)

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पिछले साल नौ सितम्बर को ’ब्लैक रोज़’ नामक मंगोलियाई पानी का एक बड़ा जहाज ओड़िशा के पारादीप बन्दरगाह के निकट डूब गया । जहाज में हजार २३८४७ टन लौह अयस्क लदा था । जिनका माल लदा था उन्होंने यह कबूल कर लिया कि एक अन्य जहाज ’टोरोस पर्ल’ के दस्तावेजों को जमाकर उन्होंने पारादीप बन्दरगाह में शरण पाई थी । जहाज का मालिक ब्लैक रोज़ नाम से दो जहाज चलाता था । बन्दरगाह से अन्य जहाज बाहर निकल सकें इसके लिए डूबे जहाज को हटाना जरूरी था । यह काम मजबूरन बन्दरगाह प्रशासन करवाना पपड़ रहा है । देश की अमूल्य खनिज सम्पदा की लूट की अवैध कारगुजारी का एक नमूना इस घटना से प्रकट हुआ । आदिवासी , दलित और पिछड़े गरीब किसानों का यह प्रान्त खनिज सम्पदा से समृद्ध है और उदारीकरण के दौर में देशी-विदेशी कम्पनियों में इसे लूटने की होड़ मची है । अनिल अग्रवाल ,मित्तल और टाटा सरीखों द्वारा लूट-खसोट में राज्य की पुलिस और कम्पनियों की ’निजी वाहिनी’ (भाड़े के गुण्डे) ग्रामीणों पर दमन का दौर चला रहे हैं ।

पारादीप बन्दरगाह के निर्माण के दौरान ट्रकों से कुचल कर २५० बच्चे मारे गये थे तब बीजू पटनायक ने कहा था ,’इन बच्चों की मौत विकास के लिए हुई शहादत है ” । ओडिशा मैंगनीज़ , लौह अयस्क तथा बॉक्साईट से समृद्ध है । ओडिशा के तट पर १२ नये बन्दरगाहों के निर्माण की योजना है । इनके द्वारा खनिज अयस्क तथा कोयले का निर्यात होगा । उदारीकरण के दौर में खनिज तथा वन कानूनों को ठेंगा दिखा कर दो सौ से दो सौ चालीस रुपये प्रति टन की लागत से प्राप्त लौह अयस्क चीन जैसे देशों को वैध/अवैध तरीकों से तीन हजार रुपये प्रति टन बेचा जा रहा है ।

रवि दास (खड़े) और पूर्व सांसद बालगोपाल मिश्र

इन तथ्यों के आधार पर ओडिशा के वरिष्ट पत्रकार एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता रवि दास ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है । ओडिशा-दिवस (पहली अप्रैल) पर वाराणसेय उत्कल समाज के आयोजन में वे बतौर मुख्य अतिथि बनारस आये हुए थे । ओड़िया के प्रसिद्ध अखबार ’प्रगतिवादी’ से बरसों से जुड़े रहने के बाद अब वे ’ आमो राजधानी’ नामक एक मध्याह्न दैनिक निकाल रहे हैं तथा वकीलों,पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों और पत्रकारों द्वारा बनाये गये ’ओडिशा जन सम्मेलनी’ नामक संगठन के अध्यक्ष हैं । रवि दास ३० मार्च को जाजपुर जिले के कलिंगनगर इलाके में हुए बर्बर दमन की तफ़तीश करने गई टीम में शामिल थे । टीम का नेतृत्व उच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त जज चौधरी प्रताप मिश्र ने किया । टीम में एक चिकित्सक तथा चित्त महान्ती (लेखक तथा राजनैतिक कार्यकर्ता),सुधीर पटनायक (पत्रकार) तथा महेन्द्र परीडा (ट्रेड यूनियन कर्मी) शामिल थे ।  मुख्यधारा की मीडिया द्वारा पुलिस दमन की घटना की खबर गायब किए जाने के कारण इस समिति की रपट के मुख्य अंश यहां दिए जा रहे हैं :

जाँच दल ने गोली चालन के शिकार ग्रामीणों से बालिगूथा ,चाँदिया तथा बरगड़िया में मुलाकात की तथा उनकी झोपड़ियों , पशु धन , खाद्यान्न ,साइकिल आदि के नुकसान का जायजा लिया।
बालिगूथा के सरपंच ने टीम को बताया कि उसके घर से नगद तथा आभूषण भी लिए गये हैं। आन्दोलनकारी आदिवासियों के नेता रवि जरिका पुलिस की गोली से घायल हुए हैं । उन्होंने घटना का पूरा ब्यौरा दिया। समिति गोली से घायल पचीस लोगों से मिली जिनमें नौ महिलाएं थी । जाँच दल के साथ गये चिकित्सक ने घायलों का उपचार किया ।

मुख्य तथ्य :

  1. करीब ३० से ४० आदिवासी गोली से घायल हैं । गंभीर रूप से घायल ४ लोग अस्पताल में भर्ती किए गये हैं । घायलों के जख़्म देख कर लगता है कि यह रबर की गोलियों के अलावा भी चलाई गई गोलियों से हुए हैं ।
  2. प्रशासन द्वारा घायलों के उपचार के लिए कुछ भी नहीं किया गया हैं । उत्पीड़न और गिरफ़्तारी के भय से घायल ग्रामीण बाहर नहीं निकलना चाहते ।
  3. बालिगूथा के करीब स्थित विवादास्पद ’कॉमन गलियारा’ के निर्माण स्थल पर किया पुलिस का गोली चालन बेजा था , किसी भड़कावे के बिना था तथा इसलिए पूर्वनियोजित था ।
  4. हथिया्रबन्द पुलिस की २९ प्लाटून , एन एस जी के दो प्लाटून , ७० पुलिस अधिकारी तथा ७ मजिस्ट्रेटों की मौजूदगी इलाके में व्याप्त आतंक के माहौल का अन्दाज देने के लिए काफ़ी हैं।
  5. सत्ताधारी दल से जुड़े जाने-पहचाने चेहरे पुलिस की वर्दी में बालीगूथा में घरों पर हमला करने वालों में थे । उनके पास बन्दूकें नहीं थी लेकिन वे तलवारों तथा वैसे ही घातक शस्त्रों से लैस थे।
  6. धारा १४४ लागू होने के बावजूद कम्पनी के गुण्डे भारी तादाद में छुट्टा घूम रहे थे ।
  7. विस्थापन विरोधी मंच के नेताओं के घरों को पहचान कर नुकसान पहुंचाया गया है तथा उन घरों के मूल्यवान सामान और खाद्यान्न नष्ट किए गए।
  8. आंदोलनकार पीडित आदिवासी बिना सोए रात गुजार रहे हैं क्योंकि उन्हें भय है कि स्थानीय प्रशासन के सहयोग से पुलिस , कम्पनी के गुण्डे,तथा सत्ताधारी दल से जुड़े अपराधी फिर से हमला कर सकते हैं ।
  9. इतनी भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती अपने आप में इलाके की शान्ति के लिए खतरा है।
  10. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन आन्दोलनकारी आदिवासियों की समस्या के प्रति असंवेदनशील है तथा उसे सिर्फ़ कलिंगनगर स्थित कम्पनियों की परवाह है ।

संस्तुतियाँ :

  1. मुख्य मन्त्री तत्काल हस्तक्षेप कर विवादित गलियारा प्रोजेक्ट के काम को रोकें ।
  2. प्रशासन ने कलिंगनगर में पहले हुए गोली कांड के बाद लोगों से जो वाएदे किए थे उनके प्रति धोखा किया है इसलिए आदिवासियों की माँगों की बाबत सर्वोच्च स्तर पर वार्ता होनी चाहिए। जमीन के बद्ले जमीन देने की बात को नजरअंदाज किया गया है तथा गलियारे की भूमि के मलिकों से भी राय नहीं ली गई है ।
  3. कम्पनियों के खर्च पर छोटे से इलाके में एक बाद एक थाने खोलते जाने के बजाय मुख्यमन्त्री को सुनिश्चित करना चाहिए कि हर गाँव को शिक्षा ,स्वास्थ्य,पानी,सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिले। विधवा पेंशन जैसी योजनाओं को बेतुके रूप से इलाके में स्थगित कर दिया गया है ।
  4. पुलिस या नागरिक कानून को अपने हाथों में न ले । ३० मार्च को हुए गोली चालन तथा उसके पहले आदिवासियों में भय फैलाने वाली  अपराधिक कारगुजारियों में लिप्त समस्त अधिकारियों को तत्काल निलम्बित किया जाए तथा उन पर मुकदमे चलाये जाँए ।
  5. गोली चालन से घायल पीडित हर व्यक्ति को एक लाख रुपये का जुर्माना दिया जाए ।

ओडिशा में नागरिक अधिकार आन्दोलन तथा किसान आन्दोलन पर रवि दास तथा किसान नेता बालगोपाल मिश्र से बातचीत आगे दी जाएगी ।

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आम के पेड़ के नीचे बैठक चल रही है। इसमें दूर-दूर के गांव के लोग आए हैं। बातचीत हो रही है। यह दृश्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के आदिवासी बहुल केसला विकासखंड स्थित किसान आदिवासी संगठन के कार्यालय का है। यहां 5 जनवरी को किसान आदिवासी संगठन की मासिक बैठक थी जिसमें कई गांव के स्त्री-पुरुष एकत्र हुए थे। जिसमें केसला, सोहागपुर और बोरी अभयारण्य के लोग भी शामिल थे। इस बार मुद्दा था- पंचायत के उम्मीदवार का चुनाव प्रचार कैसे किया जाए? यहां 21 जनवरी को वोट पडेंगे।

बैठक में फैसला लिया गया कि कोई भी उम्मीदवार चुनाव में घर से पैसा नहीं लगाएगा। इसके लिए गांव-गांव से चंदा इकट्ठा किया जाएगा। चुनाव में मुर्गा-मटन की पारटी नहीं दी जाएगी बल्कि संगठन के लोग इसका विरोध करेंगे। गांव-गांव में साइकिल यात्रा निकालकर प्रचार किया जाएगा। यहां किसान आदिवासी संगठन के समर्थन से एक जिला पंचायत सदस्य और चार जनपद सदस्य के उम्मीदवार खड़े किए गए हैं।

सतपुड़ा की घाटी में किसान आदिवासी संगठन पिछले 25 बरस से आदिवासियों और किसानों के हक और इज्जत की लड़ाई लड़ रहा है। यह इलाका एक तरह से उजड़े और भगाए गए लोगों का ही है। यहां के आदिवासियों को अलग-अलग परियोजनाओं से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ा है। इस संगठन की शुरूआत करने वालों में इटारसी के समाजवादी युवक राजनारायण थे। बाद मे सुनील आए और यहीं के होकर रह गए। उनकी पत्नी स्मिता भी इस संघर्ष का हिस्सा बनीं। राजनारायण अब नहीं है उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। लेकिन स्थानीय आदिवासी युवाओं की भागीदारी ने संगठन में नए तेवर दिए।

इन विस्थापितों की लड़ाई भी इसी संगठन के नेतृत्व में लड़ी गई जिसमें सफलता भी मिली। तवा जलाशय में आदिवासियों को मछली का अधिकार मिला जो वर्ष 1996 से वर्ष 2006 तक चला। आदिवासियों की मछुआ सहकारिता ने बहुत ही शानदार काम किया जिसकी सराहना भी हुई। लेकिन अब यह अधिकार उनसे छिन गया है। तवा जलाषय में अब मछली पकड़ने पर रोक है। हालांकि अवैध रूप से मछली की चोरी का नेटवर्क बन गया है।

लेकिन अब आदिवासी पंचायतों में अपने प्रतिनिधित्व के लिए खड़े हैं। इसमें पिछली बार उन्हें सफलता भी मिली थी। उनके के ही बीच के आदिवासी नेता फागराम जनपद उपाध्यक्ष भी बने। इस बार फागराम जिला पंचायत सदस्य के लिए उम्मीदवार हैं। फागराम की पहचान इलाके में तेजतर्रार, निडर और ईमानदार नेता के रूप में हैं। फागराम केसला के पास भुमकापुरा के रहने वाले हैं। वे पूर्व में विधानसभा का चुनाव में उम्मीदवार भी रह चुके हैं।

संगठन के पर्चे में जनता को याद दिलाया गया है कि उनके संघर्ष की लड़ाई को जिन प्रतिनिधियों ने लड़ा है, उसे मजबूत करने की जरूरत है। चाहे वन अधिकार की लड़ाई हो या मजदूरों की मजदूरी का भुगतान, चाहे बुजुर्गों को पेंशन का मामला हो या गरीबी रेखा में नाम जुड़वाना हो, सोसायटी में राषन की मांग हो या घूसखोरी का विरोध, यह सब किसने किया है?

जाहिर है किसान आदिवासी संगठन ही इसकी लड़ाई लड़ता है। किसान आदिवासी संगठन राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी जन परिषद से जुड़ा है। समाजवादी जन परिषद एक पंजीकृत राजनैतिक दल है जिसकी स्थापना 1995 में हुई थी। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक इसके संस्थापकों में हैं। किशन जी स्वयं कई बार इस इलाके में आ चुके हैं और उन्होंने आदिवासियों की हक और इज्जत की लड़ाई को अपना समर्थन दिया है।

सतपुड़ा की जंगल पट्टी में मुख्य रूप से गोंड और कोरकू निवास करते हैं जबकि मैदानी क्षेत्र में गैर आदिवासी। नर्मदा भी यहां से गुजरती है जिसका कछार उपजाउ है। सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी भी यहीं है।

होशंगाबाद जिला राजनैतिक रूप से भिन्न रहा है। यह जिला कभी समाजवादी आंदोलन का भी केन्द्र रहा है। हरिविष्णु कामथ को संसद में भेजने का काम इसी जिले ने किया है। कुछ समर्पित युवक-युवतियों ने 1970 के दशक में स्वयंसेवी संस्था किशोर भारती को खड़ा किया था जिसने कृषि के अलावा षिक्षा की नई पद्धति होषंगाबाद विज्ञान की शुरूआत भी यहीं से की , जो अन्तरराष्ट्रीय पटल भी चर्चित रही। अब नई राजनीति की धारा भी यहीं से बह रही है।

इस बैठक में मौजूद रावल सिंह कहता है उम्मीदवार ऐसा हो जो गरीबों के लिए लड़ सके, अड़ सके और बोल सके। रावल सिंह खुद की स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर है। लेकिन उन्होंने संगठन के कार्यकर्ता के रूप में काम करते-करते पढ़ना-लिखना सीख लिया है।

समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सुनील कहते है कि हम पंचायत चुनाव में झूठे वायदे नहीं करेंगे। जो लड़ाई संगठन ने लड़ी है, वह दूसरों ने नहीं लड़ी। प्रतिनिधि ऐसा हो जो गांव की सलाह में चले। पंचायतों में चुप रहने वाले दब्बू और स्वार्थी प्रतिनिधि नहीं चाहिए। वे कहते है कि यह सत्य, न्याय व जनता की लड़ाई है।

फागराम

अगर ये प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं तो राजनीति में यह नई शुरूआत होगी। आज जब राजनीति में सभी दल और पार्टियां भले ही अलग-अलग बैनर और झंडे तले चुनाव लड़ें लेकिन व्यवहार में एक जैसे हो गए हैं। उनमें किसी भी तरह का फर्क जनता नहीं देख पाती हैं। जनता के दुख दर्द कम नहीं कर पाते। पांच साल तक जनता से दूर रहते हैं।

मध्यप्रदेश में जमीनी स्तर पर वंचितों, दलितों, आदिवासियों, किसानों और विस्थापितों के संघर्श करने वाले कई जन संगठन व जन आंदोलन हैं। यह मायने में मध्यप्रदेश जन संगठनों की राजधानी है। यह नई राजनैतिक संस्कृति की शुरूआत भी है। यह राजनीति में स्वागत योग्य कदम है।

– बाबा मायाराम की रपट । साभार जुगनु

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