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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

प्रेस विज्ञप्ति
केसला, जनवरी 9।
अघोषित छुपा धन समाप्त करने,नकली नोटों को ख़त्म करने तथा आतंकियों के आर्थिक आधार को तोड़ने के घोषित उद्देश्यों को पूरा करने में नोटबंदी का कदम पूरी तरह विफल रहा है। इसके साथ ही इस कदम से छोटे तथा मझोले व्यवसाय व् उद्योगों को जबरदस्त आघात लगा है।महिलाओं, किसानों और मजदूरों तथा आदिवासियों की माली हालत व रोजगार के अवसरों पर भीषण प्रतिकूल असर पड़ा है।इस संकट से उबरने में लंबा समय लग जाएगा।
उपर्युक्त बाते समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की होशंगाबाद जिले के ग्राम भूमकापुरा में हुई बैठक में देश की वर्तमान परिस्थिति पर पारित प्रस्ताव में कही गयी है।इस प्रस्ताव में कहा गया है कि केंद्र सरकार का ‘नागदीविहीन अर्थव्यवस्था’ का अभियान चंद बड़ी कंपनियों को विशाल बाजार मुहैया कराने के लिए है। प्रस्ताव में कहा गया है कि जमीन, मकान तथा गहनों की खरीद फरोख्त में नागदविहीन लेन देन को अनिवार्य किए जाने से छुपे,अघोषित धन के एक प्रमुख स्रोत पर रोक लगाई जा सकती है परंतु सरकार की ऐसी कोई मंशा दिखाई नहीं दे रही है।
एक अन्य प्रस्ताव में विदेशों से गेहूं के आयात पर आयात शुल्क पूरी तरह हटा लिए जाने की घोर निंदा की गयी तथा समस्त किसान संगठनों से आवाहन किया गया कि इस निर्णय का पुरजोर विरोध करें।
दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भारत के चुनाव आयोग से मांग की है कि पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों के पूर्व आम बजट पेश करने पर रोक लगाए।आयोग को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि आगामी 31 मार्च 2017 के पूर्व बजट पेश करना गैर जरूरी है तथा यह चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित करेगा।
दल का आगामी राष्ट्रीय सम्मलेन 29,30 अप्रैल तथा 1मई को पश्चिम बंग के जलपाईगुड़ी में होगा।सम्मलेन में नौ राज्यों के 250 प्रतिनिधि भाग लेंगे।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुख्यत: निशा शिवूरकर,संतू भाई संत,विक्रमा मौर्य, राजेंद्र गढवाल, रामकेवल चौहान,अनुराग मोदी,फागराम,अखिला,रणजीत राय,अफलातून,स्मिता,डॉ स्वाति आदि ने भाग लिया।अध्यक्षता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जोशी जेकब ने की।
प्रेषक,
अफलातून,
राष्ट्रीय संगठन मंत्री,समाजवादी जनपरिषद।

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जारी है….

Note ban: Not only in Bihar, BJP went land shopping in Odisha as well

2000 के नोट की चिप से आतंकियो को ट्रेस कर मार गिराया :- तिहाड़ी चौधरी( छी न्यूज)

 

Pramod Singh

..दूसरी बात. महाधन का यह महाप्रताप है, या दूरगामी सांगठनिक सोच की विकट लीला, सभी सोशल वेबसाइट्स पर, और उससे बाहर की दुनिया में भी, भाजपाई तत्व भयानक रुप से सक्रिय हैं. इतनी गहराई तक उनका फैलाव हो गया है कि हो सकता है जो चादर ओढ़कर आप बैठे हो, उसके पैताने भाजपाई तत्व लटका हुआ हो. 2014 के ठीक पहले और उसके बाद से यह महापरिवर्तन कैसे घटित हुआ है, समाज वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं के लिए गंभीर विवेचना का विषय है. लेकिन यह महाक्रांतिकारी कृत्य जो घटित हुआ है, एक बड़ी वास्तविकता है और इस तोड़ और फोड़ का फ़ायदा बड़े ढंग से पूरा भाजपा और लगभग वैसे ही स्वार्थों पर फल, पोषित हो रहा बिरादर समाज, आर्थिक क्षेत्र से जुड़ी सभी संस्थाएं काट रहे हैं. यह आन्हर सेना सिर्फ़ आपकी बात का विरोध करने को हाज़िर हुई हो, ऐसा नहीं है. प्रकट गंदा फूहड़ विरोध करने के साथ-साथ, वह किसी भी सार्थक बातचीत को भटकाने, बेमतलब करने और कंफ्यूज़न फैलाने का नंगा नाच नाचने लगती है. यही इस पूरे महाकांड का मुख्य उद्देश्य भी है, कि इनके जघन्य कृत्य होते रहें, और उसकी प्रतिक्रिया में कोई भी बात, विरोध बड़े पैमाने पर फलित हो ना सके. अगर हो तो उसे कहनेऔर सुनने, सभी वालों को, हलकान करो, कंफ्यूज़ करो और पूरी प्रक्रिया को हास्यास्पद बना दो. इससे कैसे लड़ा जाए, बड़ा विकट संकट है. इस पर सोचिए, लगातार सोचिए, इसकी अब हमेशा ज़रूरत पड़ती रहेगी. आप भाजपा के सीधे विरोधी ना भी हों तो भी उनके तरीके और दुनिया वह ऐसी बना रहे हैं कि आपको बात नहीं करने देंगे और जो भी बात होगी भाजपाई फ़ायदों की बात होगी, और माथे पर ढोल बजा-बजा कर बताया जाएगा कि वही समाज और देश का भी फ़ायदा है.

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Himanshu Kumar

मोदी जी आपका तो रोम-रोम कारपोरेट के यहां गिरवी है

आगरा की रैली में पीएम मोदी ने कहा कि वो बिकाऊ नहीं हैं। यह बात उतनी ही असत्य है जितना यह कहना कि सूरज पश्चिम से निकलता है। जो व्यक्ति बाजार की पैदाइश है और जिसकी कारपोरेट ने खुलेआम बोली लगाई हो। उसके मुंह से यह बात अच्छी नहीं लगती है। शायद मोदी जी आप उस वाकये को भूल गए जब कारपोरेट घरानों के नुमाइंदों का लोकसभा चुनाव से पहले अहमदाबाद में जमावड़ा हुआ था। इसमें अंबानी से लेकर टाटा और बजाज से लेकर अडानी तक सारे लोग मौजूद थे। पूंजीपतियों के इस मेले में आप अकेले घोड़े थे। जिसके बारे में इन धनकुबेरों को विचार करना था। फिर वहीं पर आप के ऊपर दांव लगाने का फैसला हुआ था। उसके बाद से कारपोरेट ने अपनी पूरी तिजोरियां खोल दीं। निजी टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया से लेकर अपने निजी तंत्र को आपके हवाले कर दिया। लोकसभा चुनाव के दौरान पांच से लेकर सात चार्टर्ड विमान आपकी सेवा में लगा दिए गए। हेलीकाप्टरों की तो कोई गिनती ही नहीं थी। एक विदेशी एजेंसी के अनुमान के मुताबिक 24 हजार करोड़ रुपये आपने पानी की तरह बहाया। क्या ये पैसा बीजेपी के पास जमा था। या फिर संघ ने उसे मुहैया कराया था। या आपके घर-परिवार वालों ने दिया था। जनता के चंदे से तो पार्टी कार्यकर्ताओं का खाना भी नहीं चल पाता। ऐसे में यह मत कहिएगा कि जनता के बल पर चुनाव लड़े।

दरअसल कारपोरेट घरानों ने आपको गोद ले लिया था। क्योंकि उसे लग गया था कि यही वो शख्स है जो उसके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। अनायास नहीं अपनी पुरानी चहेती पार्टी कांग्रेस की नाव को छोड़कर यह हिस्सा रातों रात आपकी गाड़ी में सवार हो गया। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस उनका कोई अनभल कर रही थी। सच यह है कि इस देश को वैश्वीकरण के रास्ते से जोड़ने वाला शख्स ही उसका प्रधानमंत्री था। लिहाजा उस पर भरोसा न करने का कोई कारण नहीं था। लेकिन कारपोरेट जितनी तेजी से देश के संसाधनों को लूटना चाहता था। या उस पर काबिज होना चाहता था। कांग्रेस उसके लिए तैयार नहीं थी। क्योंकि उसने मानवीय चेहरे के साथ उदारीकरण के रास्ते पर बढ़ने का फैसला लिया था। जिसके चलते उसे तमाम कल्याणकारी योजनाओं को भी चलाना पड़ रहा था। कारपोरेट जिसके धुर खिलाफ था। क्योंकि बाजार में उसके फलने-फूलने की राह में यही सबसे बड़ी बाधा थी। इसलिए कारपोरेट ने सामूहिक तौर पर आपके साथ जाने का फैसला लिया। क्योंकि उसे पता था कि आप देश के संसाधनों से लेकर पूरे बाजार को उसके हवाले कर देंगे। नीतियां कारपोरेट की होंगी, लागू सरकार करेगी। अनायास नहीं सभी सरकारी संस्थाओं को पंगु बना दिया गया है। बारी-बारी से कल्याणकारी योजनाओं को वापस लिया जा रहा है।

इसलिए मोदी जी बिकाऊ की बात तो दूर आपका तो रोम-रोम कारपोरेट के यहां गिरवी है। और अब आप बारी-बारी से उसी कर्जे को उतार रहे हैं। अदानी को पूरे कच्छ जिले की जमीन 1 रुपये प्रति एकड़ की लीज पर देना उसी का हिस्सा है। देश का पूरा सोलर प्रोजेक्ट अडानी के हाथ में है। कोई हफ्ता शायद ही बीतता हो जब बाबा रामदेव के लिए किसी तोहफे की घोषणा न होती हो। अंबानी का तो पहले साउथ ब्लाक तक ही रिश्ता था। वह भी दलालों के जरिये। लेकिन अब उनकी सीधे पीएमओ में दखल हो गई है। नोटबंदी का फैसला इसी कारपोरेट को सीधे लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। आप ने आगरा की रैली में खुश होकर कहा कि 5 लाख करोड़ रुपये आ गए हैं। और अब जनता और जरूरतमंद को लोन दिया जाएगा। लेकिन सच यही है कि उससे जनता नहीं बल्कि कारपोरेट की झोली भरी जाएगी। और जनता के बीच से जो लोग लोन लेंगे वो भविष्य में आत्महत्या करेंगे। लेकिन कारपोरेट का लोन माफ कर दिया जाएगा।

आपने कालाधन धारियों को गिरफ्तार कर सजा देने की बात कही है। कुछ जगहों पर छापे की खबरें भी आ रही हैं। ये कितनी अफवाह हैं और कितनी नौटंकी। इसका कुछ समय बाद ही पता चलेगा। लेकिन सच यही है कि निशाने पर अभी भी छोटी मछलियां ही हैं। अगर आप इस पूरी कवायद को लेकर गंभीर होते। तो अडानी के तकरीबन 5400 करोड़ रुपये के बाहर भेजे जाने वाले मामले में एसआईटी की जांच में बांधा नहीं डालते। लेकिन सच यही है कि आपको बड़े कारपोरेट घरानों के काले धन से कुछ नहीं लेना देना। और न ही विदेशों में जमा धन आपकी चिंता का विषय है। आप का मुख्य मकसद जनता के पैसे को बैंकों में लेकर उसे कारपोरेट के हवाले करना है।

मोदी जी जुमलों की एक सीमा होती है। यह भ्रम भी बहुत दिनों तक नहीं रहने वाला। क्योंकि इसका असर सीधे जनता पर पड़ेगा। जनता को जुमला और कारपोरेट को थैली का पर्दाफाश होकर रहेगा। वैसे भी झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है।

ध्यान रहे कि 30 दिसंबर तक जितने मूल्य के 500 ,1000 के नोट रिजर्व बैंक में वापस जमा होंगे उस राशि को रिजर्व बैंक द्वारा जारी इन नोटों के कुल मूल्य से घटाने पर एक अन्दाज लगेगा, 500 और हजार के नोटों के रूप में काले धन का।
कुल काले धन का यह बहुत छोटा हिस्सा होगा। अर्थशास्त्री राष्ट्रीय आय का 40 फीसदी काला धन होने का अनुमान बताते हैं।

Aflatoon Afloo

उपचुनावों में जो जहां सत्ता में था जीत गया।भाजपा म प्र में ,तृणमूल बंगाल में,माकपा त्रिपुरा में,अन्नाद्रमुक तमिलनाडु में

Aflatoon Afloo

गुजरात में घूस की रकम 2000 रुपये के नोटों में पकड़ाई,दो आतंकियों के पास 2000 रु के नोट मिले और अब 2000 के नकली नोट भी मिल गये। क्या बचा?
बची है बडे उद्योगपतियों की सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में देनदारी।तो वह आम जनता के खून पसीने की कमाई निचोड कर जमा कर लेने के बाद सलट जाएगी।

Rs. 4 Lakh In Fake 2,000 Rupee Notes Seized In Odisha, 1 Arrested

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Sanjay Jothe

गाँव वाले ‘ऑनलाइन’ का अर्थ समझ रहे हैं – ‘लाइन में लगना ही ऑनलाइन होना है’ … JIO डिजिटल इंडिया

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Aparna Krishnan

Please never go cashless even if it may reduce corruption.

Life and livlihoods come first. Small people survive on cash – flower vendors, small shopkeepers, small farmers. Fighting corruption comes second, only after survival is taken care of.

BUSINESS
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Raj Kishore

नोटबंदी से अमीर लोगों की शामत आई होती, तो अ. बच्चन जैसे अमीर इसका समर्थन क्यों कर रहे होते? क्या मोदी अचानक वामपंथी हो गए हैं? समझदार जवाब को कोई इनाम नहीं।

दिनेशराय द्विवेदी‘s post.

दिनेशराय द्विवेदी

शादी के लिए 2,50,000/- रुपए की नकदी नहीं मिलेगी किसी को

वाह! मोदी सरकार!
वाह! रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया!

यदिआप को किसी को नकदी देनी ही नहीं है तो क्यूँ इस बात की वाह वाही लूटी जा रही है कि शादी वालों को ढाई लाख नकदी दे दी जाएगी?

सीधे सीधे कह क्यों नहीं देते कि कमाओ और बैंक में जमा करो। इस्तेमाल तो तभी करना जब सरकार और आरबीआई करने दे।

ढाई लाख में क्या आता है? एक दिन की शादी के लिए कोई ढंग का मैरिज हॉल भी बुक नहीं होता।

सरकार इतनी दिवालिया हो चुकी है कि वह भी देना नहीं चाहती।

बैंक जब 2000 रुपये का विड्रॉल नहीं दे सकते तो ढाई लाख कहाँ से देंगे?

शादी के लिए बैंक कह रहे हैं कि अभी नोटिफिकेशन नहीं आया।

रिजर्व बैंक ने आज वह नोटिफिकेशन निकाला है। आप खुद पढ़ लीजिए। इस की शर्तें पढ़ कर आप को पता लग जाएगा कि सरकार का इरादा किसी को भी शादी के लिए ढाई लाख तो क्या एक रुपया भी देने का नहीं है।

क्यों थोथी घोषणाएँ कर कर के जनता को उल्लू बना रहे हैं?

Notifications

Withdrawal of Legal Tender Character of existing ₹ 500/- and ₹ 1000/- Specified Bank Notes (SBNs) – Cash withdrawal for purpose of celebration of wedding

RBI/2016-2017/145 DCM (Plg) No.1320/10.27.00/2016-17 November 21, 2016

The Chairman / Managing Director/Chief Executive Officer, Public Sector Banks / Private Sector Banks/ Private Sector Banks/ Foreign Banks Regional Rural Banks / Urban Co-operative Banks / State Co-operative Banks

Dear Sir,
Withdrawal of Legal Tender Character of existing ₹ 500/- and ₹ 1000/- Specified Bank Notes (SBNs) – Cash withdrawal for purpose of celebration of wedding
Please refer to our Circular No. DCM (Plg) No.1226/10.27.00/2016-17 dated November 08, 2016 on the captioned subject.
2. With a view to enable members of the public to perform and celebrate weddings of their wards it has been decided to allow higher limits of cash withdrawals from their bank deposit accounts to meet wedding related expenses. Yet, banks should encourage families to incur wedding expenses through non-cash means viz. cheques /drafts, credit/debit cards, prepaid cards, mobile transfers, internet banking channels, NEFT/RTGS, etc. Therefore, members of the public should be advised, while granting cash withdrawals, to use cash to meet expenses which have to be met only through cash mode. Cash withdrawals shall be subject to the following conditions:
i. A maximum of ₹ 250000/- is allowed to be withdrawn from the bank deposit accounts till December 30, 2016 out of the balances at credit in the account as at close of business on November 08, 2016.
ii. Withdrawals are permitted only from accounts which are fully KYC compliant.
iii. The amounts can be withdrawn only if the date of marriage is on or before December 30, 2016.
iv. Withdrawals can be made by either of the parents or the person getting married. (Only one of them will be permitted to withdraw).
v. Since the amount proposed to be withdrawn is meant to be used for cash disbursements, it has to be established that the persons for whom the payment is proposed to be made do not have a bank account.
vi. The application for withdrawal shall be accompanied by following documents:
(a) An application as per Annex
(b) Evidence of the wedding, including the invitation card, copies of receipts for advance payments already made, such as Marriage hall booking, advance payments to caterers, etc.
(c) A detailed list of persons to whom the cash withdrawn is proposed to be paid, together with a declaration from such persons that they do not have a bank account. The list should indicate the purpose for which the proposed payments are being made
3. Banks shall keep a proper record of the evidence and produce them for verification by the authorities in case of need. The scheme will be reviewed based on authenticity/ bona fide use thereof.
Yours faithfully,
(P Vijaya Kumar)
Chief General Manager

Encl: As above
Annex – Application Form
Name of the person making withdrawal:
Amount to be withdrawn:
PAN Number (photocopy to be retained):
Address:
Name of Bride and Groom:
Identity proof of Bride and Groom:
(Any valid identity proof, copy to be retained)
Address of Bride:
Address of Groom:
Date of marriage:
Declaration
I ——————-(Name) certify that no other person in the Groom’s/Bride’s (strike whatever is not applicable) family is withdrawing cash for the same wedding from your bank or any other bank. I hereby declare that the information provided herein and the enclosures is true and correct and I am aware that any false information makes me liable for action by the authorities.
Signature of the Applicant:
Name:
Date:
Verified by
(Name, signature and seal of the bank official not below the rank of a branch manager.

बहुत प्रिय मित्र Farid फ़रीद Khan ख़ाँ की जरूरी टिप्पणी। वे मुम्बई रहते हैं।
” नए नोट तो अभी तक नहीं मिले. सब्ज़ी भी बड़े मॉल से ख़रीदने पर मजबूर हैं क्योंकि कार्ड से पेमेंट हो सकता है वहाँ. और घूसखोरी तो दो हज़ार के नोट से भी शुरू हो चुकी है. देखा नहीं गुजरात में चार लाख सिर्फ़ दो हज़ार के नोटों में मिले हैं घूस लेते और देते हुए. सरकार घूस खोरों तक नियमित तरीके से नए नोट पहुँचा रही है लेकिन हम तक नहीं पहुँचा रही है. हम उसके किसी काम के नहीं हैं, ऊपर से विरोध भी करते हैं. उधर आतंकवाद भी शुरू हो गया है. जैसे घूस खोरों के पास पैसा आया वैसे आतंकवादियों के पास. सब चल रहा है वैसे ही.”

2016 से ही हजार के नोटों के जरिए धन बाहर जा रहा था।

Were Rs 1000 Notes Moving Towards Safe Haven Assets in Early 2016?

Via Bhaswati Ghosh :
…The effects of demonetization could last for years, driving the country into recession and pushing Indians to keep their wealth in more stable currencies, such as the euro or U.S. dollar.

“When you don’t trust a currency and you don’t trust a government you start using foreign currencies,” said Hanke. “That’s what this is going to do, I think: People will not trust the rupee.”

The Effects of India’s Currency Reform? ‘Chaos’ Say Analysts

एक पेंटर ने किसी धन पशु के यहां ₹ 4000 का काम किया। उसे सेठ ने 1 लाख के पुराने नोट दिए और वापस करने की शर्त भी नहीं रखी।ऐसे किस्से क्यों सुनने में नहीं आ रहे?

मकान की रजिस्ट्री शुल्क में पुराने नोट लिए जा रहे हैं ! काले का सफ़ेद चालू आहे।’अपने’ महाराष्ट्र में।

आज मेरी परचून की दुकान वाले 500 के नोट ले रहे थे। मिठाई वाले ने कहा बिक्री 60% कम हो गयी है। मिठाई वाले कर्मचारी को कहा गया था कि 500 की मिठाई लेने पर 500 का नोट ले लेना।बिना खाता वाले बैंकों मेँ फार्म भर कर 4000 तक के नोट बदलवाने के लिए लम्बी लाइन लगा रहे हैं।उस फार्म की भराई 10 रु. है।
सरकार के किसी जिम्मेदार से किसी ने सुना कि नये छोटे नोट भी छापे गये हैं? RBI के आंकडे के हिसाब से 80 फीसदी बडे वाले नोट चलन में थे।कुल 16 लाख करोड की मुद्रा में चलन थी।यानि 20 फीसदी ही छोटे वाले थे। 2000 ,1000 के नये नोट की बात आई है। 100,50,20,10 के पर्याप्त नये नोट नहीं आये तो छोटे व्यवसाय और खरीद -फरोख्त में हाहाकार छाया रहेगा।
1978 में 1000,5000 और 10,000 के नोटों का चलन बन्द किया गया था। ऐसे 165 करोड रुपये के नोट चलन में थे,रद्द किए जाने के बाद 135 करोड के नोट जमा हुए। काले धन पर कोई बडा प्रभाव नहीं पडा था।उसके बाद भी काले धन की व्यवस्था फलती फूलती रही। उस कदम का आम आदमी पर असर नहीं पडा था।नोट लौटाने के लिए ऐसी कतारें न थीं। लोग 10 और अधिक से अधिक 100 के नोट ले कर चलते थे इसलिए व्यापार पर असर नहीं पडा था।
यह ध्यान रहे कि हमारी अर्थव्यवस्था में चेक और प्लास्टिक मनी अभी खास प्रचलित नहीं है।हांलाकि वित्त मंत्री ने आज उसका प्रचार किया।
भारत में काला धन का शास्त्रीय अध्ययन करने वले अर्थशास्त्री (Author of `The Black Economy in India’, Penguin (India)) का अनुमान है कि 70 लाख करोड काला धन है और इसमें नगद का हिस्सा चन्द लाख करोड से अधिक नहीं है।
आम आदमी के अलावा छोटा व्यवसायी नोटबन्दी से प्रभावित हुआ है।प्रधान मन्त्री जन धन योजना के बन्द पडे खाली खाते में भी कुछ काला धन आ जाए तो अच्छा ही होगा,बशर्ते उन गरीबों को उससे कुछ लाभ हो। छोटे व्यवसाइयों पर जनसंघ के जमाने से संघ की पकड़ थी,उसमें कमी निश्चित आएगी।
– अफलातून.

‘मोदी साहब का कचरा हम लोग साफ़ कर रहे हैं।’ मेरी बैंक शाखा के साथी कैशियर ने कहा।

रिजर्व बैंक फटे,सड़े-गले नोट हर साल नष्ट करती है,नये नोट छापती है।रिजर्व बैंक का कहना है 500 और 1000 के नोट कुल मुद्रा का 86% थे।यह बैंक में जमा हो रहे हैं,सरकार के एक आदेश से।कमा कर की गई बचत नहीं है,यह।इसे धीरे-धीरे ही निकाला जा सकेगा। प्रधान मन्त्री जन धन योजना में थोक में खाते खुल गये थे,अधिकांश में लगातार जमा करने के लिए पैसे नहीं थे। सर्वोच्च न्यायालय जब अम्बानी जैसे बडे बडे बकायेदारों की सूची जारी करने को कहती है तो सरकार लजाती है। बैंकों का धन इन बकायेदारों ने खाली किया अब उनके हमदर्द साधारण जनता बैंक में धन जमा करा रहे हैं।बढ़ी हुई कुल जमा राशि के आधार पर बकायेदारों की वसूली रुक जाएगी।काला धन खुले आम सोने में और विदेशी मुद्रा (डॉलर,पाउन्ड,यूरो) में बदला जा रहा है। सचमुच उन्नति और उत्पादन होता और लोग बचत करने की स्थिति में होते तब आदर्श स्थिति होती। इससे विपरीत सरकार के निर्णय से बाध्य हो कर बैंकों में जमा राशि बचत नहीं है,बकायेदार पूंजीपतियों को इमदाद है।
रेल के उदाहरण को लें।रेल में आरक्षण कराने की मियाद बढ़ा देने की वजह से हमे उसके सूद से वंचित करते हुए रेलवे के पास हमारा पैसा तीन महीने रहता हैऔर मंत्री प्रभु उसमें से निजी बीमा कम्पनियों को दे रहे हैं।

‘सोने को छिपाना,गुपचुप ले जाना या इसका लेन-दे न करना आसान है।करोड़ों रुपये के नोट कहीं रखना आसान नहीं है किन्तु करोड़ों रुपये का सोना आसानी से बैंक के एक छोटे से लॉकर में छिपाकर रखा जा सकता है। सोने की मांग और हवस को घटाना,हतोत्साहित करना और नियंत्रित करना देश के हित में होगा।’ – सुनील

‘ आज समझ में आया की हमारे प्रधान मंत्री महोदय ने सभी के अकॉउंट क्यों खुलवाये थे।
50 दिन का समय है आपके पास नोट बदलाव सकते हो। मतलब जिसके पास बोरी भरी हुई है वो 100 लोगो को पकड़ेगा उनके अकॉउंट में थोड़े-थोड़े रूपये डलवायेगा। फिर निकाल लेगा।
वैसे समय मार्च 2017 तक है। हजारो रास्ते है चोरों के पास निकलने के लिए। क्योकि ये रास्ते छोड़े गए है चोरों के लिए।’ कहना है,मित्र Uday Che का।

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ज्यादातर पेट्रोल पंप केन्द्र सरकार के मन्त्रालय की PSUs द्वारा संचालित हैं।
आज कल इन पंपो पर ‘कर-चोरी के खिलाफ लडाई में मेरा पैसा सुरक्षित है’ अभियान चलाया जा रहा है।इस दोगले प्रचार अभियान से आपको गुस्सा नहीं आया?
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित है कि इसे मैं भी मनमाफिक नहीं निकाल सकता।
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि मुझे स्थायी तौर पर असुरक्षित कर दिया।
-मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि उसकी इज्जत हमारी ही नजरों में गिरा दी गई और उसका मूल्य अन्य मुद्राओं की तुलना में गिरता जा रहा है।
– अब तक कर-चोरी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? CAG ने जहां अम्बानी-अडाणी की अरबों रुपयों का कर न वसूलने पर आपत्ति की है,वह भी नहीं नहीं वसूलेंगे।
– देश का पैसा चुरा कर बाहर जमा करने वालों में से जिनके नाम पनामा वाली सूची में आए उन्हें कोई सजा क्यों नहीं दी गई ? HSBC द्वारा उजागर विदेश में देश का धन जमा करने वालों को क्या सजा दी?इसमें भी इनके यार थे।
– सितंबर में खत्म हुई आय की ‘स्व-घोषणा’ में भी टैक्स चोरों को इज्जत बक्शी गयी है अथवा नहीं?
– सुप्रीम कोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खस्ताहाल की मुख्य वजह अम्बानी,अडाणी और वेदान्त वाले अनिल अग्रवाल जैसों की बकायेदारी को बताया गया। इस पर नोटबंदी के पहले अरुण जेटली कह चुके हैं कि सरकारी बैंकों में पैसा पंप किया जाएगा। अब जनता का पैसा हचाहच पंप हो ही रहा है। Non performing assets बढेंगे तो इन धन पशुओं को रियायत मिल जाएगी। यह आपके यारों द्वारा कर-डकैती नहीं है?
– जिन गांवों में बैंक नहीं हैं वहां पहुंच कर पैसे क्यों नहीं बदले जा रहे? क्या आपको पता है कि समाज के सबसे कमजोर तबकों के साथ उनकी गाढी कमाई की ठगी से 500 के बदले 250 तक दिए गए हैं?

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भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इंग्लैंड की खनन कंपनी द्वारा नियमगिरी पहाड़ से बॉक्साइट खनन पर उस इलाके की ग्राम सभाओं की रायशुमारी ली गयी।एक भी वोट कंपनी द्वारा खनन के पक्ष में नहीं पड़ा। कंपनियों के हमदर्द नवीन पटनायक और नरेंद्र मोदी के लिए यह बहुत बड़ा झटका था। माओवादियों ने रायशुमारी के बहिष्कार की अपील की थी।आदिवासी ग्रामवासियों ने इसे अनसुना कर पूरे वोट डाले।रायशुमारी जिला सिविल जज की देखरेख में हुई।प्राकृतिक संसाधान पर स्थानीय आबादी का हक़ पुष्ट हुआ।देश के संसाधन कंपनियों को बेचने पर आमादा केंद्र और सूबे की सरकारें चाहती हैं कि इस आंदोलन को माओवादियों के प्रभाव में धकेल दिया जाए ताकि सरकार की बड़ी हिंसा से उसका दमन किया जा सके। 27 फरवरी, 2016 को आंदोलनकारी गाँव के युवा की हत्या के बाद सरकार और सरकार-कंपनी समर्थक मीडिया ने उसे माओवादी घोषित किया।समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय महामन्त्री और नियमगिरी आंदोलन के प्रमुख नेता साथी लिंगराज आजाद ने पुलिस अधीक्षक से मिल कर प्रतिवाद किया तब जाकर उसका शव परिवारजनों को मिला।
राज्यों के मानवाधिकार आयोग फर्जी मुठभेड़ में सुरक्षा बल द्वारा की गयी हत्या के मामलों में आम तौर पर कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं करते।
घटना के प्रतिवाद में यह ज्ञापन ग्रामवासियों ने राज्य मानवाधिकार आयोग को दिया है।ओड़िया से अनुवाद मेरा है।
समाजवादी जनपरिषद की सभी जिला इकाइयों को साथी सुनील के स्मृति दिन 21 अप्रैल, 2016 को अपने जिला मुख्यालय पर प्रतिकार धरना देना है तथा नवीन पटनायक,नरेंद्र मोदी को विरोध पत्र भेजना है।
ग्रामवासियों का ज्ञापन-
अध्यक्ष,
राज्य मानवाधिकार आयोग-ओडीशा,
भुवनेश्वर।
महाशय,
हम नीचे हस्ताक्षर करने वाले जिला रायगडा, कल्याणसिंहपुर थानान्तर्गत डंगामाटी ग्राम के वासिन्दा हैं। गत 27 फरवरी 2016,शनिवार की सुबह गाँव के 20 वर्षीय युवा मंद काड्राका , पिता लाची काड्राका तथा डंबरू सिकका , पिटा बुटुडु सिकका साथ-साथ गाँव के समीप अस्कटान पडर में स्वलप वृक्ष का रस एकत्र करने गए थे।उसी समय पहले से छुपे सुरक्षा बल द्वारा बिना कुछ पूछे समझे गोली चला कर मंद काड्राका को मार डाला गया।। डंबरू किसी प्रकार जान बचा कर भाग आया।ग्रामवासी जब घटनास्थल पर पहुंचे और मृतक का शव देखना चाहा तो पुलिस वालों ने उन्हें डराया धमकाया और लाश को ढक कर ले गए। पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित चित्र तथा प्रत्यक्षदर्शी डंबरू द्वारा दी गयी सूचना से हमें पता चला कि यह डंगामाटी का मंद काड्राका था ।
  एक निरीह,निहत्थे डोंगरिया कोंड युवा की सुरक्षा बल द्वारा गोली मार कर की गयी हत्या की बाबत मृतक के भाई ड्रीका काड्राका द्वारा गत 4 मार्च,2016 को कल्याणसिंहपुर थाने में लिखित शिकायत दी गयी थी,जिसकी फ़ोटो नक़ल संलग्न की जा रही है। इस गंभीर मामले की सूचना पुलिस ने प्राथमिकी के तौर पर भी नहीं ली,मुकदमा कायम नहीं किया गया।पुलिस जानबूझकर घटना को अलग रूप देना चाह रही है तथा जिला पुलिस अधीक्षक तथा कलेक्टर भी घटना की निष्पक्ष जांच नहीं करना चाह रहे हैं। उल्लेखनीय है की वेदांत कंपनी द्वारा नियमगिरी पर्वत से बॉक्साइट खनन की योजना के विरोध में हम उस इलाके डोंगरिया कोंड सक्रिय हैं जिसके कारण वेदांत कंपनी, राज्य सरकार, जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन हम पर विगत कुछ वर्षों से जो आतंकराज चला रहे है उसी का ताजा उदाहरण यह फर्जी मुठभेड़ है ।
डोंगरिया कोंड जैसी आदिम जाति के एक धार्मिक आयोजन ‘घाटी पर्व’ के मौके पर सरकार और प्रशासन द्वारा यह अमानुषिक गोली काण्ड की घटना सिर्फ हमारे जीवन का अधिकार नहीं अपितु धर्मगत स्वाधीनता को संकुचित करने के लिए भय का वातावरण बनाने के उद्देश्य से अभिप्रेत थी यह मानने के यथेष्ट कारण है।
  इस घटना के सन्दर्भ में आयोग जांच कराके मृतक मंद के परिवार को 50 लाख रूपए क्षतिपूर्ति दे तथा दोषी सुरक्षाकर्मियों पर हत्या का मुकदमा कायम कराए।
इति,
आपके विश्वस्त,
सिकका लद, डंबरू सिकका, प्रमोद सिकका, ड्रेका सिकका,ददि सिकका,हुईका पालू
———————————–
नवीन पटनायक सरकार ने इस बीच फिर से रायशुमारी के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका की थी।न्यायालय ने डोंगरिया कोंड समुदाय की और से प्रसिद्ध वकील संजय पारीख को सुनाने के बाद राज्य सरकार की मांग अस्वीकार की तथा सभी प्रभावितों को पकड़ बनाने का आदेश दिया है।
समाजवादी जनपरिषद की प्रत्येक जिला इकाई साथी सुनील के स्मृति दिवस पर अपने जिला मुख्यालय पर धरना दे,सभा करे तथा जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री ओडीशा तथा प्रधासन मंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपे।
अफलातून
संगठन मंत्री, समाजवादी जनपरिषद

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Exclusive

“We don’t recruit Muslims”: Ayush Ministry

Pushp Sharma

Investigative Journalist

A new breed of game-changer RTI activists is taking on the venomous “My Lord” legacy of the establishment bequeathed by the colonial masters. It takes just Rs 10 to freak the high and mighty. Landmark exposés of political corruption and corporate crimes require investigative appetite and consistency in pursuing matters of public interest. Thus RTI, a gift of UPA, is like truth serum to take on the recessive and well-oiled lethal system.

Gone are the days of the well-scripted ‘Abki Baar Modi Sarkar’, now it’s time for frontal attacks on minorities by framing government policies to exclude them from public life, changing the BJP slogan to ‘Abki Baar Muslim Pe Vaar – Shukriya Modi Sarkar’.

It is common knowledge that the ongoing communal agenda of the Modi government is responsible for raising the level of communal hatred in the country to an unprecedented high level even in government corridors though it is difficult to prove. Here we have, for the first time in the life of this government, a written, blunt RTI reply in our hands which unashamedly says that it’s Modi government policy not to recruit Muslims in government jobs. This received this reply through RTI. The reply makes it clear that a total number of 3841 Muslims applied for Yoga trainer/teacher jobs in the Ayush ministry, including 711 Muslims who applied for short-term jobs as Yoga teachers/trainers in foreign countries but none was selected. The reason: it’s government policy not to recruit Muslims!

This reply obviously concerns a certain scheme in a small ministry. You can only think of the wider implications of this policy across the government.

We filed an RTI at the Ayush Ministry asking:

* Please provide the details, how many (total numbers) Muslim candidates had applied for short-term abroad assignment (Trainer/Teacher) during World Yoga Day 2015?

* How many Muslims applied for the post of Yoga Trainer / Teacher so far?

The written answer from the Ayush Ministry dated 8 October, 2015 is blunt and clear:

* As per government policy: no Muslim candidate was invited, selected or sent abroad.

* A total of 711 Muslim candidates applied for short-term abroad assignment (trainer/teacher) during World Yog Day 2015.

* A total 3841 Muslim candidates applied till date (for the post of Yoga Trainer / Teacher)

* Selected candidates: Nil.

(See the RTI reply facsimile)

This not only exposes the Modi government’s communal agenda but may be considered the first such reply by any government in independent India that as per policy, Muslims are excluded from recruitment.

(The Milli Gazette)

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संसद ने जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट यानी किशोर न्याय कानून पर मुहर लगा दी है। अब नए कानून के मुताबिक संगीन जुर्मों के मामले में 16 साल के ऊपर के लड़कों पर भी आम अदालतों में मुकदमा चलाया जा सकेगा- बशर्ते जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड इसकी इजाज़त दे दे। यानी जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड अपराध की गंभीरता और आरोप के घेरे में आए नाबालिग की मानसिक उम्र देखते हुए तय करेगा कि उसके लिए नाबालिग बोर्ड की ज़रूरत है या फिर आम अदालतों की। दरअसल 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए एक गैंगरेप के बाद देश भर में जो आंदोलन चला, उसकी एक लोकप्रिय मांग यह थी कि नाबालिगों की उम्र 18 से घटा कर 15 या 16 साल की जाए। क्योंकि इस मामले के पांच आरोपियों में जिसे सबसे बड़ा मुजरिम बताया जा रहा था, वह नाबालिग था और इसी दिसंबर में तीन साल की सज़ा काट कर छूट गया। उसकी रिहाई के वक़्त दुबारा चले आंदोलन ने सरकार और राजनीतिक दलों को मजबूर किया कि वे लोगों की आवाज़ सुनें और जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट में संशोधन का यह कानून पास करें। तो अब कानून बन गया है, लेकिन इस बात पर विचार करना ज़रूरी है कि क्या इस कानून के बाद निर्भया जैसी लड़कियां वाकई सुरक्षित रहेंगी।
इसमें शक नहीं कि 16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली की एक चलती बस पर एक युवा लड़की के साथ जिस तरह सामूहिक बलात्कार और वहशी व्यवहार हुआ- उसके ब्योरे सबके रोंगटे खड़े करते रहे हैं। यह स्वाभाविक ही है कि ऐसे वीभत्स अपराध के मुजरिमों के प्रति एक तरह की घृणा पैदा हो। 16 दिसंबर 2012 के तत्काल बाद इस वारदात पर हुई देशव्यापी प्रतिक्रिया से लेकर इसके एक नाबालिग मुजरिम को छोड़ने को लेकर पैदा हुए ताज़ा गुस्से तक को इस सामूहिक भावना का उचित विस्फोट कहा जा सकता है। लेकिन एक मुजरिम को दंड देने की सामूहिक भावना के बीच भी यह ख़याल रखना ज़रूरी है कि हमारा क्रोध न्याय के विवेक की जगह न ले ले, कि अपने गुस्से में हम कहीं ऐसे निष्कर्षों तक न पहुंच जाएं जो आने वाले दिनों में पलट कर नए अन्यायों की वजह बन जाएं।
क्योंकि 16 दिसंबर के बाद स्त्री सुरक्षा को लेकर चली बहसों ने अनजाने और अनायास ही ‘जुवेनाइल’ को जैसे एक गंदा शब्द बना दिया है। सारी बहस जैसे यहां आकर ठिठक गई है कि ‘जुवेनाइल’ की उम्र घटाई जाए- जैसे स्त्री अपराधों के लिए ये किशोर ही सबसे बड़े ज़िम्मेदार हों, जैसे इस देश के बालिगों के इस देश के नाबालिगों से ख़तरा हो।
लेकिन हक़ीक़त क्या वाकई इतनी ख़ौफ़नाक है? क्या जुवेनाइल या किशोर उम्र के बच्चे इतने अपराध करते हैं कि उनकी उम्र राष्ट्रीय बहस का इकलौता सवाल बनती दिखे? ठोस आंकड़े कुछ और कहानी बताते हैं। भारत की आबादी में 35 फ़ीसदी हिस्सा जुवेनाइल यानी 18 साल से नीचे के किशोरों का है। जबकि 2014 के आंकड़े बताते हैं कि अपराध में उनका हिस्सा महज 1.2 प्रतिशत का है। यानी जितने नाबालिग अपराध करते हैं, उससे ज़्यादा वे अपराध झेलते हैं। और इन अपराध करने वाले नाबालिगों की पृष्ठभूमि में जाएं तो पता चलता है कि सामाजिक तौर पर कई गंभीर अपराधों के शिकार ये भी होते हैं। बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे हर्षमंदर ने बहुत उचित ही यह लिखा है कि दरअसल नाबालिगों को बालिगों से बचाने की जरूरत है। सवाल है, महिलाओं के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अपराध कौन करता है। आंकड़े जो जवाब देते हैं, उनके मुताबिक चालीस पार की उम्र के लोग। जाहिर है, जुवेनाइल की बहस में वे असली अपराधी छुप जाते हैं जिनकी वजह से महिलाओं का सड़क पर चलना, दफ़्तर में काम करना और यहां तक कि घर में रहना भी दूभर हो जाता है।
लेकिन हम यह देखने को तैयार नहीं होते क्योंकि एक बहुत मुश्किल लड़ाई के आसान तरीक़े और आसान शिकार खोज कर आंदोलन और इंसाफ़ करने बैठ जाते हैं। इससे यह संदेह होता है कि क्या हम वाकई बलात्कार या महिला अपराध को लेकर इतने संवेदनशील हैं जितना दिखने की कोशिश कर रहे हैं? हमारे लिए 16 दिसंबर का गैंगरेप बस एक प्रतीक भर है जिसके मुजरिमों को जेल से न निकलने देकर हम यह तसल्ली पाल लेंगे कि इंसाफ़ हो गया और लड़कियां अब सुरक्षित हैं। जबकि सच्चाई यह है कि 16 दिसंबर के बाद भी बलात्कार या यौन शोषण से जुड़े अपराधों में कमी नहीं आई है- कहीं छोटी बच्चियां तो कहीं बुज़ुर्ग महिलाएं इस वहशत की जद में हैं। 16 दिसंबर 2012 की तारीख़ बेशक इस लिहाज से अहम है कि इस दिन घटी एक त्रासदी को भारतीय महिलाओं ने अपने साथ हो रहे अपराध की एक बड़ी स्मृति में बदला और वह ज़रूरी बहस खड़ी की जिसके बाद बलात्कार या यौन उत्पीड़न की शिकार लड़कियां खुलकर सामने आ रही हैं, अपनी शिकायत दर्ज करा रही हैं।
लेकिन यह काफी नहीं है। यह समझना भी ज़रूरी है कि बलात्कार इस देश में सामजिक उत्पीड़न और राजनीतिक दमन तक का हथियार है। दबंग और आर्थिक तौर पर ताकतवर जातियां दलित और कमज़ोर पृष्ठभूमि से आई लड़कियों को बार-बार इसका शिकार बनाती रही हैं जिस पर कहीं कोई नाराज़गी नहीं दिखती। झारखंड और छत्तीसगढ़ से लेकर पूर्वोत्तर और कश्मीर तक ऐसे ढेर सारे अभियोग हैं जो बताते हैं कि सुरक्षा के नाम पर, राजनीतिक दमन के लिए, लड़कियां बलात्कार की शिकार बनाई जाती रहीं। छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी ने जो कुछ झेला, वह निर्भया से ज़रा ही कम था- लेकिन सोनी सोरी पर नक्सली होने की मुहर लगाई गई, शायद इसीलिए सबने मान लिया कि उसके साथ जो हुआ, वह जायज़ हुआ। अगर नहीं तो जंतर-मंतर पर वह भीड़ उसके लिए क्यों नहीं उमड़ी जो निर्भया के लिए उमड़ी?
इस पूरी बहस में एक पक्ष उस तथाकथित आधुनिकता का है जो बाजार बना रहा है। बाज़ार ने बड़े निर्मम ढंग से स्त्री को सिर्फ देह में और उसकी देह को बस वस्तु में बदल डाला है। जो फिल्में बन रही हैं, जो विज्ञापन बन रहे हैं, जो बाज़ार का पूरा तामझाम बन रहा है, वह स्त्री देह को आखेट बनाकर हो रहा है। पिछले दिनों पटना में मीडिया में स्त्रियों को लेकर चल रही दो दिन की एक कार्यशाला के दौरान अभिनेत्री सोनल झा ने किसी टीवी चैनल पर चल रहे क्रिकेट मैच के बाद के एक आयोजन का ज़िक्र किया जिसमें एक स्टार खिलाड़ी तो पूरे सूटबूट में बात कर रहे थे लेकिन उनसे जो महिला बात कर रही थी, वह बिल्कुल खुले परिधानों में थी। जाहिर है, क्रिकेट की चर्चा में भी लड़की के क्रिकेट-ज्ञान से ज्यादा अहम उसका ग्लैमरस दिखना है। यह अनायास नहीं है कि इन दिनों बड़ी तेजी से दुनिया भर में फूल-फल रहे पर्यटन उद्योग के नाम पर सबसे ज़्यादा ‘सी, सन और सेक्स’ बेचा जा रहा है। इक्कीसवीं सदी में औरत की तस्करी का कारोबार ऐसे ग्लोबल आयाम ले चुका है, जैसा पहले किसी सदी ने देखा न हो।
तो एक तरफ़ स्त्री को लगातार हेय और उपभोग्य और कमतर बनाती बाज़ार-प्रेरित तथाकथित आधुनिकता है जो उसे सामान में बदलती है और दूसरी तरफ सामाजिक, आर्थिक और मर्दवादी आधार पर उसका लगातार उत्पीड़न कर रही परंपरा है, जो उसकी आज़ादी को उसकी बदचलनी की तरह देखती है- इन दोनों के बीच अगर कोई निर्भया अकेली निकलती है तो वह बस इसलिए असुरक्षित नहीं होती कि कुछ खूंखार किस्म के लड़के उसके पीछे लग जाते हैं, वह इसलिए भी असुरक्षित होती है कि इस आधुनिकता ने उसे सामान बना डाला है और परंपरा ने उसे बदचलन ठहरा दिया है- उस पर हमला आसान होता है, वह एक आसान शिकार होती है। निर्भया के मामले में शिकारियों की हैसियत अगर कुछ बड़ी होती, अगर वे किन्हीं बड़े घरों के बेटे होते तो कहना मुश्किल है कि वे उतनी आसानी से पकड़े जाते जितनी आसानी से ये बस ड्राइवर, क्लीनर या फल विक्रेता पकड़े गए।
बहरहाल, इस बहस के आख़िरी सिरे पर लौटें- उस खूंखार नाबालिग तक जो समाज के लिए सबको ख़तरा लग रहा है। हो सकता है, वह ख़तरा हो, लेकिन फिर यह सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है कि आख़िर बाल सुधार गृह में उसके बिताए तीन सालों के दौरान वाकई उसको सुधारने की कोशिश क्यों नहीं हुई? क्योंकि हमारी जेलों की तरह हमारे बाल सुधार गृह भी अपराध छुड़ाने के नहीं, अपराधी बनाने के कारख़ाने हैं। बाल सुधार गृहों की अपनी एक हकीक़त है जिसे देखकर कोई न्यायप्रिय व्यवस्था शर्मसार हो जाए। अगर ऐसा नहीं होता, बाल सुधार गृह वाकई बाल सुधार गृह होते तो इस नाबालिग मुजरिम को वे कुछ बदलते। लेकिन यह सोच शायद वहां विकसित ही नहीं हो पाई। दरअसल हमारे नाबालिग मुजरिम हमारी अपनी सामाजिक विफलताओं की संतानें हैं। हम इस विफलता को पहचानने और स्वीकार करने की जगह ऐसा दिखावा कर रहे हैं जैसे इस मुजरिम को कुछ और सज़ा देकर हम अपनी निर्भयाओं को बचा लेंगे। जबकि लड़ाई की यह मुद्रा उस वास्तविक लड़ाई से काफी दूर ही नहीं, उसके विरुद्ध भी खड़ी है जो निर्भयाओं को एक गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन देने के लिए ज़रूरी है। क्योंकि अंततः एक स्त्री के सम्मान के लिए अपरिहार्यतः एक व्यापक मानवीय समाज का होना ज़रूरी है जो अपनी लड़कियों की भी फिक्र करे, अपने नाबालिगों और बच्चों की भी।जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट अपनी जगह काम करेगा, लेकिन समाज के विवेक को भी जागना होगा।

स्रोतः सामयिक वार्ता

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यूपीए सरकार के दौरान अमेरिका से परमाणु डील और परमाणु दायित्व क़ानून के प्रावधानों को देसी-विदेशी निवेशकों के हित में मोड़ने का भले ही भाजपा विपक्ष में रहने के दौरान दस सालों तक विरोध करती रही हो, मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी पारी ठीक वहीं से शुरू की जहां मनमोहन सिंह ने छोड़ी थी. सत्तासीन होने के कुछ ही हफ़्तों बाद मोदी सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया और फिर जल्दी ही देश के परमाणु-विरोधी समूहों और कार्यकर्ताओं को देशद्रोही बताने वाली आईबी रिपोर्ट जारी की गयी, जिसमें  अणुमुक्ति समूह से लेकर सीएनडीपी सहित तमाम समूह शामिल थे. इसके साथ ही प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ जिसमें लगभग हर देश के साथ परमाणु संधि किसी तमगे की तरह शामिल रहती है.
फुकुशिमा दुर्घटना के बाद जहां पूरी दुनिया में विभिन्न देशों ने परमाणु ऊर्जा से तौबा कर ली है, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय लॉबियों के दबाव में अँधेरे कुएं में छलांग लगाने की नीति अपनाई है. नए साल में, एक बार फिर 26 जनवरी को जो कि देश की संप्रभुता का उत्सव होता है, फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांदे मुख्य अतिथि होंगे और फ्रांस से परमाणु डील आगे बढ़ाई जाएगी. दिसम्बर में जब नरेंद्र मोदी रूस गए तो वहाँ भी उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन के साथ परमाणु डील की जिसके तहत कूडनकुलम में अणु बिजलीघरों की संख्या बढ़ाई जाएगी. 2015 में इस रास्ते में निर्णायक मोड़ आए. साल की शुरूआत में 26 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा के दौरान मोदी सरकार ने उनको यह आश्वासन दिया कि किसी दुर्घटना की स्थिति में अमेरिकी कंपनियों को जवाबदेह ठहराने और उनसे मुआवजा माँगने के बजाय भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के माध्यम से उनका मुआवजा भारतीय जनता के पैसों से चुकाएगी. और साल के अंत में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की यात्रा के दौरान भारत-जापान परमाणु समझौते के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया गया जिसका भारत भर में किसानों-मछुआरों और नागरिक समूहों ने विरोध किया, उनके समर्थन में जापान में लोग सडकों पर उतरे तथा दुनिया के कई दूसरे देशों में अणुविरोधी कार्यकर्ताओं ने जापानी दूतावास के दौरान प्रदर्शन किया.
भारत और जापान के बीच यह समझौता इसी वजह से काफी महत्वपूर्ण है कि यह दरअसल 2005 में हुए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का बचा हुआ टुकड़ा है. उस समझौते के दस साल बाद भी अमेरिकी कंपनियों – वेस्टिंगहाउस तथा जेनेरल इलेक्ट्रिक(जीई), और फ्रांसीसी कंपनी अरेवा के अणुबिजली प्रोजेक्ट भारत की ज़मीन पर अटके पड़े हैं तो इसका एक बड़ा कारण भारत और जापान के बीच अब तक परमाणु समझौता न होना है. दोनों बड़ी अमेरिकी परमाणु कंपनियों में इस बीच जापानी शेयर बढ़े हैं और वेस्टिंगहाउस का नाम अब वेस्टिंगहाउस-तोशिबा है और जीई अब जीई हिताची है. बाज़ार में हुए इस बड़े बदलाव ने भारत और अमेरिका की राजनीतिक संधि के सामने समस्या खडी कर दी है. फ्रेंच कंपनी अरेवा के डिज़ाइन में एक बिलकुल ही ज़रूरी पुर्जा – रिएक्टर का प्रेशर वेसल – सिर्फ जापानी कम्पनियां बनाती हैं और उसके लिए भी जापान से भारत का कानूनी करार ज़रूरी है.

लेकिन इस डील को लेकर जापान पर अमेरिका और फ्रांस का दबाव बना हुआ है इसलिए इसको परवान चढाने की कोशिश तो जारी रहेगी. साथ ही, अपने व्यापक प्रभावों के कारण इस डील का बड़े पैमाने पर विरोध भी बना रहेगा. शिंजो आबे की भारत यात्रा के ठीक एक दिन पहले हिरोशिमा और नागासाकी के दोनों मेयर एक साथ आए और प्रेस कांफ्रेंस कर के इस डील का विरोध किया. जापानी राजनीतिक सिस्टम के लिए यह एक असाधारण घटना थी. इसके अलावा, परमाणु दुर्घटना की विभीषिका झेल रहे फुकुशिमा के मेयर कात्सुताका इदोगावा ने भी परमाणु समझौते का मुखर विरोध किया. जापान की कम्यूनिस्ट पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस समझौते का विरोध किया.

शिंजो आबे जिस हफ्ते भारत आए उसी सप्ताह में फुकुशिमा से यह खबर आई की दुर्घटना के चार साल 9 महीने बाद बीस किलोमीटर के दायरे में खतरनाक रेडियोधर्मी कचरे के कुल नब्बे लाख बड़े-बड़े थैले पसरे हुए हैं, जिसको निपटाने के लिए न कोई जगह है न तकनीक क्योंकि परमाणु विकिरण हज़ारों सालों तक रहता है. फुकुशिमा प्लांट अभी भी नियंत्रण से बाहर है और अत्यधिक तापमान को ठंडा रखने के लिए पिछले पांच सालों से प्रतिदिन सौ टन से अधिक पानी काफी दूर से डाला जा रहा है, जो अति-विषाक्त होकर वापस आता है और जापानी सरकार और टेप्को कंपनी के लिए सरदर्द बना हुआ है. इन पांच सालों में हज़ारों टन ऐसा पानी विशालकाय टैंकों में जमा हो रहा है क्योंकि इसे समुद्र में सीधा छोड़ना पूरे प्रशांत महासागर को विषैला बना देगा. फिर भी, बरसात के मौसम में चुपके से कंपनी द्वारा काफी विकिरण-युक्त जहरीला पानी समुद्र में छोड़ने का खुलासा हुआ है.

एक तरफ फुकुशिमा के दुर्घटनाग्रस्त संयंत्र पर काबू नहीं पाया जा सका है तो दूसरी तरफ कम से कम दो लाख लोग जापान जैसे सीमित भूभाग वाले इलाके में बेघर हैं, जिनको सहयोग और मुआवजा देने से सरकार और कंपनी दोनों मुंह मोड़ चुके हैं. इस हालत में, जापान का भारत को परमाणु तकनीक बेचना पूरी तरह अनैतिक है और दरअसल अपने उन परमाणु कारपोरेटों को ज़िंदा रखने की कोशिश का नतीजा है जिनके सारे संयंत्र फुकुशिमा के बाद से पूरे जापान में जन-दबाव में बंद हैं और वे अपना घाटा नहीं पूरा कर पा रहे हैं.

दूसरी तरफ, भारत में परमाणु बिजलीघरों के बेतहाशा निर्माण से लाखों किसानों और मछुआरों की ज़िंदगी तबाह हो रही है और यह परमाणु डील उनके लिए बेहद बुरी खबर है. किसानों की प्राथमिक चिंता तो ज़मीन छीने जाने को लेकर है लेकिन जिन गाँवों की ज़मीन नहीं भी जा रही उनको भी परमाणु बिजलीघरों से बिना दुर्घटना के भी सामान्यतः निकालने वाले विकिरण-युक्त गैस और अन्य अपशिष्टों से बीमारियों का खतरा है, जैसा दुनिया के सभी मौजूदा परमाणु कारखानों के मामले में दर्ज किया गया है. जैतापुर के नजदीक घनी आबादी वाले मछुआरों के गाँव हैं और परमाणु बिजली घर से निकालने वाला गरम पानी आस-पास के समुद्र का तापमान 5 से 7 डिग्री बढ़ा देगा जिससे उनको मिलने वाली मछलियाँ उस इलाके से लुप्त हो जाएँगी. इसके साथ ही भारत में परमाणु खतरे की आशंका भी निर्मूल नहीं है. परमाणु सेक्टर के पूरी तरह गोपनीय और गैर-जवाबदेह होने और आम तौर पर दुर्घटनाओं से निपटने में सरकारी तंत्र की नाकामी के कारण पहले से ही खतरनाक परमाणु संयंत्र भारत आने पर और ज़्यादा खतरनाक हो जाते हैं. परमाणु उत्तरदायित्व मामले पर सरकार और आपूर्तिकर्ता कारपोरेटों के रुख से तो यही पता चलता है कि उनको अपने ही बनाए उत्पादों की सुरक्षा का भरोसा नहीं है और पूरी मीडिया का इस्तेमाल कर के वे जिन संयंत्रों की सुरक्षा का दावा कर रहे हैं और साधारण लोगों को अपनी सुरक्षा दांव पर लगाने को कह रहे हैं, खुद अपना पैसा तक मुआवजे की राशि के बतौर दांव पर रखने को तैयार नहीं हैं.

इसी महीने पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन पर ग्लोबल बैठक (COP21) में भी भारत समेत अन्य सरकारों ने परमाणु ऊर्जा को कार्बन-विहीन और हरित बताकर समस्या की बजाय समाधान का हिस्सा बताने की कोशिश की है और दुनिया भर में परमाणु लौबी की कोशिश है कि इस बहाने विस्तार किया जाए. लेकिन यह तर्क कई स्तरों पर विरोधाभास से भरा हुआ है. एक तो जैतापुर में परामाणु प्लांट लगाने के लिए भारत की सबसे ख़ूबसूरत और पर्यावरणीय दृष्टी से नाज़ुक कोंकण इलाके के पूरे पारिस्थितिक और वनस्पति तंत्र को खुद परमाणु कारखाना बरबाद कर रहा है, और इसके लिए सरकार ने बिलकुल फर्जी तरीके से पर्यावरणीय मंजूरी हासिल की है. दूसरे, वैसे भी परमाणु कारखानों के निर्माण से लेकर युरेनियम ईंधन के खनन, परिवहन और सैंकड़ों साल तक परमाणु कचरे के निस्तारण में कार्बन-उत्सर्जी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल होता है जिनको परमाणु लौबी अपने कार्बन छाप (footprint) में नहीं गिनती.

दिसंबर में जापानी परधानमंत्री जैसे नरेंद्र मोदी के लिए सांता क्लॉज़ बन के आए थे. बुलेट ट्रेन, लड़ाकू नौसेनिक विमान, औद्योगिक गलियारे के लिए निवेश और भारत-जापान परमाणु समझौता. भारतीय मीडिया को ज़्यादा तरजीह देने लायक मामले बुलेट ट्रेन और बनारस में शिंजो आबे की गंगा आरती ही लगे, लेकिन इसी बीच परमाणु समझौते को भी मुकम्मल घोषित कर दिया गया. हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञान व अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रभारी पत्रकार परमीत पाल चौधरी ने अपने सरकारी स्रोतों के हवाले से इस परमाणु डील को फाइनल करार दे दिया और यह भी खबर दी कि अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस अब रास्ता साफ़ होने के बाद 1000 मेगावाट क्षमता के 6 परमाणु बिजली कारखाने बेचने का मसौदा लेकर तैयार है.

लेकिन भारत में मीडिया और सरकार के दावों के विपरीत, परमाणु समझौता अभी संपन्न नहीं हुआ है. भारत और जापान की साझा घोषणा में परमाणु मसले पर सैद्धांतिक सहमति का उल्लेख है और इसके लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर होने की सूचना है. यह एमओयू भारतीय सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन जापान में इसे साझा किया गया है. यह एमओयू दो लम्बे वाक्यों की घोषणा भर है जिसमें समझौता शब्द तीन बार आता है – हमने द्वीपक्षीय समझते के लिए समझौता कर लिया है ताकि निकट भविष्य में समझौता हो पाए. यह एमओयू परमाणु डील को दोनों तरफ के अधिकारियों के हवाले कर देता है, जिससे भारतीय मीडिया ने अपने हिसाब से यह अर्थ निकाला कि शीर्ष स्तर समझौता हो गया और बाकी ब्योरों पर काम होना भर बचा है. जबकि जापानी मीडिया और राजनीतिक गलियारों में स्थिति बिलकुल उलटी है. भारत के साथ परमाणु डील जापान की पारंपरिक अंतर्राष्ट्रीय नीति से मेल नहीं खाता क्योंकि जापान हिरोशिमा के बाद परमाणु निरस्त्रीकरण का पैरोकार रहा है और परमाणु अप्रसार संधि(एनपीटी) से बाहर के देशों से परमाणु तकनीक का लेन-देन नहीं करता. जापान के विदेश-मंत्रालय और नीति अधिष्ठान में पिछले दस सालों से इस बात को लेकर एक मजबूत अंदरूनी अस्वीकार्यता रही है और कयास यही लगाए जा रहे थे कि अगर डील हो पाती है तो विदेश मंत्रालय और इसके अधिकारियों को किनारे रखकर जापान के दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के व्यक्तिगत दबाव में ही होगी. इस डील की जद्दोजहद को वापस मंत्रालय तक पहुँचने को जापान में एक कदम पीछे जाना समझा जा रहा है. लेकिन मोदी जी के भारत में अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों का ढोल पीटने से कौन रोक सकता है.

परमाणु ऊर्जा का सच

जैतापुर या कूडनकुलम का आंदोलन हो या भारत-जापान परमाणु समझौते के खिलाफ इस हफ्ते होने वाला देशव्यापी आंदोलन, इन सभी मौकों पर देश के शहरी मध्यवर्ग और उसके साथ-साथ मीडिया से लेकर अदालतों तक सबका रुख यही रहता है कि विस्थापन, पर्यावरण और सुरक्षा के सवाल तो अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन भारत को बिजली तो चाहिए।विकास तो चाहिए। देश के लिए विकास, विकास के लिए बेतहाशा बिजली और बिजली के लिए अणु-बिजलीघर, इन तीनों कनेक्शनों को बिना किसी बहस के सिद्ध मान लिया गया है और आप इस तर्क की किसी भी गाँठ को दूसरी सूचनाओं-परिप्रेक्ष्यों से खोलने की कोशिश करते हैं तो राष्ट्रद्रोही करार दे दिए जाते हैं.

2011 के मार्च में फुकुशिमा दुर्घटना हुई और जब बीबीसी ने साल के अंत में एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वे कराया तो यह पाया कि पूरी दुनिया में दुर्घटना के बाद अणुऊर्जा को लेकर आम धारणा बदली है और परमाणु ऊर्जा को लेकर जनसमर्थन न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया है. फुकुशिमा में जो हुआ, और अब भी हो रहा है, वह पूरी दुनिया की आँखें खोलने वाला साबित हुआ है और पिछले पांच सालों में कई देशों ने अपनी ऊर्जा नीति में आमूलचूल बदलाव किए हैं. जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्वीडन और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों ने पूरी तरह परमाणु-मुक्त ऊर्जानीति बनाई है तो फ्रांस ने जिसकी 75% बिजली अणुऊर्जा से आती है, इसको तत्काल 50% तक लाने की घोषणा कर दी है और वहाँ क्रमशः इसे और कम किया जाएगा।लेकिन इसी दौरान भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर कूडनकुलम में स्थानीय लोगों का आंदोलन चल रहा था, और भारत की सरकार ने ग्रामीणों के सवालों को वाजिब मानकर उनसे बात करने की बजाय मनोवैज्ञानिक चिकित्सकों का एक दल देश के सबसे प्रसिद्ध मनोचिक्त्सा संस्थान से भेजा!

जब इन काउंसिलरों से बात नहीं बनी तो हज़ारों पुलिस और अर्द्धहसैनिक बल भेजे गए और जल्दी ही पूरे गाँव को घेर कर उसका खाना-पानी-यातायात सब हफ्ते भर काट दिया गया, लोगों को पुलिस ने घर में घुसकर पीटा और उनकी नावें तोड़ दीं, और मनमोहन सिंह सरकार ने उस उलाके के आठ हज़ार से अधिक लोगों के ऊपर देशद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया। बर्बर सरकारी दमन में चार लोग मारे गए और औरतों समेत सैंकड़ों स्थानीय लोग महीनों तक जेल में ठूंस दिए गए. मछुआरों की शांतिपूर्ण रैली को पुलिस ने खदेड़कर समुद्र में धकेल दिया जहां उनके ऊपर नौसेना के विमान मंडरा रहे थे. किसी सरकार ने अपने ही लोगों के खिलाफ ऐसा खुला युद्ध लड़ा हो, इसकी मिसालें कम ही मिलती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी कूडनकुलम केस में उठाए गए आठ छोटे और ठोस सवालों – जिनका सम्बन्ध इस परियोजना में पर्यावरण और सुरक्षा नियमों की घातक अवहेलना से था – पर कुछ नहीं कहा और जजों ने 250 पन्नों के फैसले में बार-बार सिर्फ यही दुहराया कि देश को विकास और ऊर्जा की ज़रुरत है. और इस आधार पर अणुऊर्जा विभाग को सादा चेक दे दिया, जैसे परमाणु ऊर्जा अगर ज़रूरी हो तब खुद सरकारी सुरक्षा मानकों की खुली अवहेलना भी वाजिब हो जाए. कूडनकुलम केस में तो कोर्ट से याचिका में यह पूछा तक नहीं गया था कि वह बताए कि देश को परमाणु ऊर्जा चाहिए कि नहीं, और यह फैसला करना वैसे भी कोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं है.

आखिर फुकुशिमा के बाद भी भारत में परमाणु ऊर्जा को लेकर इतना तगड़ा सरकारी समर्थन क्यों है? फुकुशिमा के बाद की दुनिया में अणुऊर्जा के इतने बड़े विस्तार की योजना बना रहा देश भारत अकेला क्यों बचा है? अपने निर्णायक संकट के दौर से गुज़र रही अंतर्राष्ट्रीय परमाणु लॉबी की आशा भारत क्यों है जहां सरकार पर्यावरणीय कानूनों, सुरक्षा व उत्तरदायित्व के सवालों और स्थानीय जन-प्रतिरोधों सबको किनारे करते हुए उसका स्वागत करने को तैयार है?

क्यों है भारत में परमाणु ऊर्जा की लिए अंधी दौड़?

क्या सचमुच भारत को परमाणु की ज़रुरत है? यह पूछने से पहले सरकार और उसके कारिंदों से यह पूछना चाहिए कि आप इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे कि भारत को परमाणु ऊर्जा की, और वह भी इतनी बड़ी मात्रा में, सचमुच ज़रुरत है? 2004 तक खुद अणु ऊर्जा विभाग के कागज़ों में कहीं इतने बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा के विस्तार का ज़िक्र नहीं था. लेकिन 2006 में घोषित समेकित ऊर्जा नीति में अचानक हमें बताया गया कि सन 2052 तक 250 गीगावाट यानी कुल बिजली का पचीस प्रतिशत परमाणु से आना चाहिए। मौजूदा उत्पादन ढाई प्रतिशत से भी कम है. 2004 और 2006 के बीच ऐसा क्या हुआ? क्या बिजली को लेकर कोई राष्ट्रीय बहस हुई? इसमें गैर-सरकारी विशेषज्ञ और ऊर्जा तथा विकास को ज़मीनी व वैकल्पिक नजरिए से देखने वाले नागरिक शामिल थे? नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ. बल्कि विदेशों से परमाणु बिजलीघरों के आयात और इतने बड़े पैमाने विस्तार की बात खुद अणुऊर्जा विभाग के लिए औचक खबर की तरह आई.

ऐसा इसलिए हुआ कि 2004 और 2006 बीच 2005का साल आया. इस साल भारत और अमेरिका बीच एक व्यापक परमाणु डील हुई. मनमोहन सिंह अमेरिका के दौरे पर थे और परमाणु डील की पेशकश अमेरिकी तरफ से आई थी.

क्या थी यह डील? यह डील भारत सारतः को अमेरिकी विदेश-नीति की आगोश में लेने की कवायद थी जिसके लिए भारत के परमाणु हथियारों को अंतर्राष्ट्रीय वैधता दिलाना इस डील का मकसद था.

भारत ने 1950 और 1960 के दशक में ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका आदि देशों से शांतिपूर्ण उपयोग के नाम पर जो परमाणु तकनीक और सामग्री हासिल की थी, उसी का इस्तेमाल कर के 1974 में पहला बम-विस्फोट किया था, जिसके बाद भारत पर पूरी दुनिया ने परमाणु के क्षेत्र में प्रतिबन्ध लगा दिया था. ये प्रतिबन्ध 1998 के परमाणु टेस्ट के बाद और कड़े किए गए थे. लेकिन 1974 और 1998 के बीच अंतर यह था कि भारत 1991 में अपना बाज़ार खोल चुका था और इतने बड़े उपभोक्ता समूह वाले देश पर आर्थिक प्रतिबन्ध से खुद अमेरिका और पश्चिमी देशों को ही नुकसान हो रहा था. साथ ही, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय चौपालों पर भारत को अपने साथ बिठाना था और ईरान से लेकर चीन तक को लेकर बिछी शतरंज में भारत को अपने साथ रखना था. उस स्तर के एक पार्टनर की हैसियत के साथ भारत पर 35 सालों से चले आ रहे ये प्रतिबन्ध मेल नहीं खाते थे. इसलिए परमाणु डील दरअसल भारत के हथियारों को वैधता देकर उसे बदलती दुनिया में अपने साथ बिठाने की कवायद ज़रूरी थी.

लेकिन भारत पर दशकों से प्रतिबन्ध सिर्फ अमेरिका ने नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी(International Atomic Energy Agency- IAEA) और 46 देशों के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(Nuclear Suppliers Group-NSG) ने लगाए थे और इन मंचों से भारत को मान्यता दिलवाने में और भी समय व उपाय लगे. भारत ने NSG देशों को अपनी एंट्री के बदले में भारी मात्रा में परमाणु बिजलीघर व यूरेनियम खरीदने का वादा किया। इस सौदे में भी अमेरिका को बड़ा शेयर मिला क्योंकि उसी के समर्थन से इतना बड़ा बदलाव संभव हुआ. तो भारत का मानचित्र उठाकर अमेरिका को परमाणु ऊर्जा प्रकल्पों के लिए दो साइट और फ्रांस को एक बड़ी साइट, रूस को दो नई जगहें और अन्य देशों को इन नई अणु-भट्ठियों के लिए भारी मात्रा में ईंधन-खरीद का वादा किया गया.

ऐसा करते समय न तो इन जगहों पर रह रहे लोगों से पूछा गया, न इन इलाकों के पर्यावरण की बात सोची गयी, न ऊर्जा मंत्रालय से पूछा गया कि क्या सचमुच परमाणु ऊर्जा की इतनी बड़ी ज़रुरत है और न ही अब तक बम बनाने की संवेदनशीलता के कारण नियंत्रित स्तर पर काम कर रहे परमाणु ऊर्जा विभाग से यह पूछा गया कि उसके पास इन 35 नई परियोजनाओं के लिए इंजीनियर और अनुभव भी है.

भारत में परमाणु ऊर्जा वैसे ज़रूरी है या नहीं या उसके खतरों के मद्देनज़र क्या विकल्प हैं, यह मेरे लिए एक दूसरी बहस का सवाल है जो जनपथ के पाठकों से करने के लिए मैं तैयार हूँ, लेकिन सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि परमाणु ऊर्जा के महा-विस्तार की मौजूदा योजना का उन सवालों से कोई सीधा लेना-देना है ही नहीं। भारत में लग रहे परमाणु संयंत्र असल में वह कीमत है जो हम परमाणु बमों के लिए – असल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु बम-संपन्न देशों के क्लब में शामिल होने के लिए – चुका रहे हैं.

और यही वजह है कि इन नए बिजलीघरों से देश के पर्यावरण को हो रहे घातक नुकसान के सवाल, इनसे जितने लोगों को बिजली, विकास व रोजगार मिलेगा उससे कहीं बड़ी संख्या में लोग बेघर और आजीविका-विहीन होंगे यह सवाल, देश में परमाणु सुरक्षा के लिए स्वतंत्र व विश्वसनीय ढांचा न होने का सवाल, स्थानीय समुदाओं के लोकतांत्रिक हितों का सवाल, ऊर्जा तथा परमाणु मामलों के उन विशेषज्ञों के सवाल जिनमें से कई सरकार का हिस्सा रहे हैं और देश-विदेश में प्रतिष्ठित हैं – इन सारे का सरकार के लिए कोई मतलब नहीं क्योंकि उसके लिए परमाणु संयंत्रों का आयात विदेशनीति के लेन-देन से जुड़ा है. 2005 में अमेरिका और उसके बाद फ्रांस, रूस, कनाडा, ब्रिटेन, कज़ाख़िस्तान, मंगोलिया, आस्ट्रेलिया जैसे सभी देशों से हुई इन परमाणु डीलों से बंधे होने की वजह से दरअसल भारत ने वह संप्रभुता खो दी है, जिसका इस्तेमाल कर के दूसरे देश फुकुशिमा से सबक लेकर स्वतंत्र और वैकल्पिक ऊर्जा नीति बना रहे हैं.

एक आख़िरी बात यहां जोड़ना ज़रूरी है कि आम समझ या अपेक्षा के ठीक विपरीत, भारत के संसदीय वामपंथ ने अमेरिका के साथ हुए परमाणु डील की इसलिए आलोचना नहीं की थी कि इससे भारत की ज़मीन पर खतरनाक परमाणु संयंत्र आएँगे। सीपीएम की आलोचना का मुख्य स्वर यह था कि इस डील के बदले भारत का भविष्य में परमाणु टेस्ट करने का विकल्प चला जाएगा, इस डील में बाकी तकनीकें मिल रही हैं लेकिन परमाणु ईंधन के पुनर्संस्करण(reprocessing) की तकनीक नहीं मिल रही है, आयातित रिएक्टरों(अणु बिजलीघरों) पर अंतर्राष्ट्रीय निगरानी होगी, इत्यादि इत्यादि।

जैतापुर, मीठीविर्दी और कोवाडा जैसे जगहों के किसान और मछुआरे मध्यवर्ग के उस सपने की मार झेल रहे हैं जिसमें भारत को सुपर पावर बनना है. इतना सबकुछ कर के भी वह हैसियत मिलती दिख नहीं रही क्योंकि जार्ज बुश के दौर से दुनिया आगे बढ़ चुकी है. जिन परमाणु बमों से भारत की ताकत बढ़नी थी, उनके एवज में देश ने ये खतरनाक और महंगे बिजलीघर खरीदना मंजूर किया है और अब उनमें दुर्घटना की स्थिति में विदेशी कंपनियों को मुआवजा न देना पड़े इसकी जुगत में लगी है सरकार। हैसियत और ताकत बम बनाने से नहीं आती. एक तीसरी दुनिया का देश जब शार्टकट इस्तेमाल कर के पहली दुनिया में घुसना चाहता है जबकि आधी से अधिक आबादी दो सदी पीछे जी रही हो, तो यही गत होती है जो भारत की अब हो रही है. प्रधानमंत्री मेगा शो करने वाले फूहड़ नौटंकीबाज़ में तब्दील हो गया है.

परमाणु बम बनाने के बाद कोई शांति नसीब नहीं हुई बल्कि असुरक्षा का एक दुष्चक्र शुरू हुआ है और एटम बम बनाने के डेढ़ दशक बाद भारत दुनिया में सबसे अधिक हथियार खरीदने वाला देश बन बैठा है. परमाणु बमों को लेकर झूठे गर्व और भ्रम पर चर्चा किसी और लेख में.

फिलहाल यह कि जापान के साथ समझौता 2005 से बन रही उस तस्वीर का आख़िरी और निर्णायक टुकड़ा है क्योंकि जापानी पुर्ज़ों की आपूर्ति के बगैर भारत में अमेरिकी और फ्रांसीसी परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं. देश के किसानों-मछुआरों जीविका और ज़िंदगी बचाने का यह आख़िरी मौक़ा है और बात सिर्फ उन्हीं की नहीं है क्योंकि परमाणु दुर्घटना में सिर्फ वे ही नहीं मरेंगे।

यह अटकी हुई डील जैतापुर, मीठी विरदी और कोवाडा के किसानों के लिए आख़िरी उम्मीद है क्योंकि उनकी अपनी सरकार उनको दगा दे चुकी है और बिजली और विकास के पीछे पागल देश का मध्यवर्ग उन्हें भूल चुका है. जैतापुर में 2006 से किसानों और मछुवारों का संघर्ष जारी है, जिसमें 2010 में एक शांतिपूर्ण जुलूस के दौरान पुलिस फायरिंग में एक युवक की जान तक जा चुकी है. पूरे इलाके की नाकेबंदी, स्थानीय आंदोलन के लीडरों को पकड़कर हफ़्तों जेल में डालना, धमकाना-फुसलाना, और आस-पास के जिलों से पहुंचने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को जिलाबदर घोषित करना कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में भी हुआ और अब महाराष्ट्र की भाजपा सरकार में भी जारी है. परियोजना का विरोध करने वाले सभी लोग बाहरी और विदेशी-हित से संचालित घोषित कर दिए गए हैं और फ्रांसीसी कंपनी एकमात्र इनसाइडर और देशभक्त बची है. 2010 में देश के दूसरे इलाकों से समर्थन में पहुंचकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने एक यात्रा निकाली जिसमें पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सावंत भी शामिल थे, लेकिन सबको हिरासत में ले लिया गया. जैतापुर में किसान ज़्यादातर हिन्दू हैं और मछुआरे मुस्लिम. जिन किसानों के नाम ज़मीन थी कम-से-कम उनको मुआवजा मिला लेकिन उन मछुआरों को कुछ नहीं मिला क्योंकि उनके पास समंदर का कोई कागज़ नहीं है. परमाणु प्लांट से जो गर्म अपशिष्ट पानी निकलेगा वह आस-पास के समुद्री तापमान को 5 से 7 डिग्री बढ़ा देगा जिससे मछलियों की खेप समाप्त हो जाएगी. इस संवेदनशील प्लांट के आस-पास समुद्र में जो 5 किमी तक जो सेक्यूरिटी तैनात होगी वह भी साखरी नाटे और कई दूसरे मछुआरे गाँवों की जीविका छीन लेगी क्योंकि उस दायरे में मछली पकड़ना बंद हो जाएगा. शिवसेना और भाजपा का उस इलाके में राजनीतिक प्रभुत्व है और इस मामले को हिन्दू-मुस्लिम बना देने की कोशिश भी वे कर ही रहे हैं.

स्रोतः सामयिक वार्ता

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