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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

हाल ही में केंद्र सरकार ने किसानों की समस्याओं का हल खोजते हुए समर्थन मूल्य बढ़ाने की घोषणा की है। यदि समर्थन मूल्य बढ़ाने भर से किसानों की समस्याओं का हल संभव है तो फिर इतनी हाय-तौबा कृषि क्षेत्र की खराब हालत को लेकर क्यों हो रही है ? इस बढ़े हुए समर्थन मूल्य का कितने किसानों को लाभ प्राप्त होगा ? कृषि की पूरी व्यवस्था किसान को लूटने और उसे गुलाम बनाये रखने के लिये बनाई गई है। उनके लिये किसान एक गुलाम है जिसे वह उतना ही देना चाहते हैं जिससे वह पेट भर सके और मजबूर होकर खेती करता रहे। किसानों के आर्थिक हितों की पैरवी करता प्रस्तुत आलेख। – का.सं.

देश का किसान समाज गरीब क्यों? किसान परिवार में आत्महत्याएं क्यों? इस सरल प्रश्न का सच्चा जवाब हम देना नहीं चाहते। इन प्रश्नों का जवाब दशकों से ढूंढा जा रहा है। बड़े-बड़े रिपोर्ट तैयार किये गये। कई लागू किये गये। लेकिन आज तक किसानों की समस्याओं के समाधान के लिये जो उपाय किये गये उससे समाधान नहीं हुआ बल्कि संकट गहराता जा रहा है। किसानों की आर्थिक हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। क्या हम किसानों की समस्याओं का सही कारण नहीं खोज पाये या खोजना ही नहीं चाहते?
किसान विरोधी लोग तो मानते ही नहीं कि किसानों की कोई समस्या है। वह मानते हैं कि किसान का कर्ज निकालकर बच्चों के शादी ब्याह पर खर्च करना उनकी बदहाली का कारण है। तो कुछ कहते हैं कि किसान शराब पीने के कारण आत्महत्या करते हैं। कुछ यह भी कहते हंै कि किसानों का मानसिक इलाज करना चाहिये। जो लोग किसान की समस्याओं को स्वीकार करते हैं उनमें से कुछ कहते हंै कि खेती की पद्धति में बदलाव करना चाहिये। रासायनिक खेती के बदले जैविक खेती करनी चाहिये। सिंचाई का क्षेत्र बढ़ाना चाहिये। यांत्रिक खेती करनी चाहिये। जीएम बीज का इस्तेमाल करना चाहिये। कुछ कहते हैं कि उत्पादन बढ़ाना चाहिये, निर्यातोन्मुखी फसलों का उत्पादन करना चाहिये। कुछ कहते हंै कि फसल बीमा योजना में सुधार करना चाहिये। कर्ज योजना का विस्तार करना चाहिये। 20171102_170650
यह उपाय किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिये नहीं बल्कि उसकी समस्याओं का लाभ उठाने के लिये किये जाते रहे है। आज तक का अनुभव यही है कि इन योजनाओं का लाभ बैंकांे, बीज, बीमा व यंत्र निर्माता कंपनियों, निर्यात कंपनियों, बांध बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों को मिला है। पहले किसानों के आत्महत्या के कारणों की खोज के नाम पर रिपोर्ट बनाये जाते है और सरकार में लॉबिंग कर उसे लागू करवाया जाता है। यह रिपोर्ट बनाने में सीएसआर फंड प्राप्त एन.जी.ओ. बड़ी भूमिका निभाते हैं और हम भी किसान के बेटे हैं। कहने वाले नौकरशाह और राजनेता अपने ही बाप से बेईमानी करते हैं। उत्पादन वृद्धि के इन उपायों से किसानों का उत्पादन खर्च बढ़ा है। साथ ही उत्पादन बढ़ने और मांग से आपूर्ति ज्यादा होने से फसलों के दाम घटे हैं। इससे किसान का लाभ नहीं नुकसान बढ़ा है। इन उपायों के बावजूद किसानों की लगातार बिगड़ती स्थिति इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
सरकारी आंकडों के अनुसार देश में किसानों की औसत मासिक आय 6426 रुपये है। जिसमें केवल खेती से प्राप्त होने वाली आय केवल 3081 रुपये प्रतिमाह है। यह 17 राज्यों में केवल 1700 रुपये मात्र है। हर किसान पर औसतन 47000 रुपयों का कर्ज है। लगभग 90 प्रतिशत किसान और खेत मजदूर गरीबी का जीवन जी रहे हैं। जो किसान केवल खेती पर निर्भर है उनके लिये दो वक्त की रोटी पाना भी संभव नहीं है।
राजनेता और नौकरशाह अपना वेतन तो आवश्यकता और योग्यता से कई गुना अधिक बढ़ा लेते हैं लेकिन किसान के लिये उसकेे कठोर परिश्रम के बाद भी मेहनत का उचित मूल्य न मिले ऐसी व्यवस्था बनाये रखना चाहते हैं। पूरे देश के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर आकलन करे तो खेती में काम के दिन के लिये केवल औसत 92 रुपये मजदूरी मिलती है। यह मजदूरी 365 दिनों के लिये प्रतिदिन 60 रुपये के लगभग होती है। किसान की कुल मजदूरी से किराये की मजदूरी कम करने पर दिन की मजदूरी 30 रुपये से कम होती है। मालिक की हैसियत से तो किसान को कुछ मिलता ही नहीं, खेती में काम के लिये न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आंकडे भी इसी की पुष्टि करते हंै।
बाजार व्यवस्था खुद एक लूट की व्यवस्था है। जो स्पर्धा के नाम पर बलवान को दुर्बल की लूट करने की स्वीकृति के सिद्धांत पर खड़ी है। बाजार व्यवस्था में बलवान लूटता है और कमजोर लूटा जाता है। बाजार में विकृति पैदा न होने देने का अर्थ किसान को लूटने की व्यवस्था बनाये रखना है। जब तक किसान बाजार नामक लूट की व्यवस्था में खड़ा है उसे कभी न्याय नहीं मिल सकता। बाजार में किसान हमेशा कमजोर ही रहता है। एक साथ कृषि उत्पादन बाजार में आना, मांग से अधिक उत्पादन की उपलब्धता,स्टोरेज का अभाव, कर्ज वापसी का दबाव,जीविका के लिये धन की आवश्यकता आदि सभी कारणों से किसान बाजार में कमजोर के हैसियत में ही खड़ा होता है।
यह शोषणकारी व्यवस्था उद्योगपति,व्यापारी और दलालों को लाभ पहुंचाने के लिये बनाई गई है। कल तक यह लूट विदेशी लोगों के द्वारा होती थी। अब उसमें देशी-विदेशी व बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी शामिल किया गया है। यह बहुराष्ट्रीय कंपनियां खेती पूरक उद्योग और उसके व्यापार पर पहले ही कब्जा कर चुकी है। अब वे पूरी दुनिया के खेती पर कब्जा करना चाहती है। इसलिये विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के दबाव में सरकारें लगातार किसान विरोधी नीतियां बनाते जा रही हैं।
किसान का मुख्य संकट आर्थिक है। उसका समाधान किसान परिवार की सभी बुनियादी आवश्यकताएं प्राप्त करने के लिये एक सम्मानजनक आय की प्राप्ति है। किसानों की समस्याओं का समाधान केवल उपज का थोड़ा मूल्य बढ़ाकर नहीं होगा बल्कि किसान के श्रम का शोषण, लागत वस्तु के खरीद में हो रही लूट,कृषि उत्पाद बेचते समय व्यापारी,दलालों व्दारा खरीद में या सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद में की जा रही लूट, बैंकांे, बीमा कंपनियों व्दारा की जा रही लूट इन सबको बंद करना होगा।
किसान, कृषि और गांव को स्वावलंबी और समृद्ध बनाने की दिशा में कृषि आधारित कुटीर एवं लघु उद्योगों को पुनर्जीवित करना होगा। जब खेती में काम नहीं होता है तब किसान को पूरक रोजगार की आवश्यकता होती है। भारत सरकार ने 1977 में बड़े उद्योगों को उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिये संरक्षित किया था। जिसे नई आर्थिक नीतियां लागू करने के बाद धीरे-धीरे पूरी तरह से हटाया गया। उसे फिर संरक्षित कर असमानों के बीच स्पर्धा से बचने के लिये देशी, विदेशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन पर पाबंदी लगानी होगी। कृषि उत्पादकों के लिये उत्पादन, प्रसंस्करण व विपणन के लिये सरकारी और कारपोरेटी हस्तक्षेप से मुक्त एक सरल गांव केंद्रित रोजगारोन्मुख नई सहकारी व्यवस्था बनानी होगी।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र 1948 में पारिश्रमिक की परिकल्पना की गई है जो ‘कर्मी और उसके परिवार’ को गरिमा के साथ जीवन प्रदान करने के लिये आश्वासन देती है। संस्थापक सदस्य के रुप में भारत ने इस पर हस्ताक्षर किये हंै। भारत में संगठित क्षेत्र के लिये वेतन आयोग द्वारा ‘परिवारिक सिद्धांत’ अपनाया गया है। राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन 1975 में भी सामान्य रुप से न्यूनतम मजदूरी के लिये इस सिद्धान्त को अपनाने की सिफारिश की है। लेकिन कृषि में अधिकारों का निर्धारण करने में परिवारिक सिद्धांत की अनदेखी की गई है।
काम के बदले आजीविका मूल्य प्राप्त करना हर व्यक्ति का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। किसान को भी काम के बदले न्याय संगत श्रममूल्य मिलना चाहिये। आजीविका मूल्य बौद्धिक श्रम के लिये 2400 किलो कैलरी और शारीरिक श्रम के लिये 2700 कैलरी के आधार पर तय किया जाता है। इसके लिये देश में संगठित और असंगठित में भेद किये बिना ‘समान काम के लिये समान श्रममूल्य’ के सिद्धांत के अनुसार परिवार की अन्न, वस्त्र, आवास, स्वास्थ, शिक्षा आदि बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने के लिये आजीविका मूल्य निर्धारित करना होगा। श्रममूल्य निर्धारण में संगठित क्षेत्र की तुलना में अधिकतम और न्यूनतम का अंतर 1ः10 से अधिक नहीं होना चाहिये। इस प्रकार से निर्धारित श्रममूल्य किसान को देने की व्यवस्था करनी होगी।
सरकार को महंगाई का नियंत्रण करने के लिये किसान का शोषण करने का कोई अधिकार नहीं है। यह किसानों पर किया गया अन्याय है। अगर वह सरकारी खरीद या बाजार में फसलों की उचित कीमतें देने की व्यवस्था नहीं कर सकती तो ऐसे स्थिति में सस्ते कृषि उत्पाद का लाभ जिन जिन को मिलता है उनसे वसूलकर किसान को नुकसान की भरपाई करना होगी। एक वर्ग को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिये किसान से जीने का अधिकार नहीं छीना जा सकता। (सप्रेस)

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भाजपा (राम!) के अश्वमेध के घोड़े की लगाम कर्नाटक में जद (सेक्युलर ) और कांग्रेस (लव और कुश!) ने बांध दी। शपथ ग्रहण के समय पूरा विपक्ष एक साथ खड़ा हो गया। उधर बिलकुल पड़ोस में तूतिकोरिन में खनन कंपनी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे 25,000 से भी ऊपर के जनसमूह पर कंपनी की सुरक्षा में लगी तमिलनाडु की सरकारी पुलिस और निजी सुरक्षा कर्मियों ने अपनी बंदूकों से सीधे लक्ष्य करके एक दिन 11 और दूसरे दिन 1 महिला प्रदर्शनकारी का शिकार किया। तमिलनाडु सरकार, भाजपा और अन्य सरकारों (विपक्ष वालों की भी) के लिए भी ये प्रदर्शनकारी विकास विरोधी और अराजक ही होंगे क्योंकि किसी ने यह सवाल नहीं किया कि वह कंपनी वहाँ क्या कर रही है और उसका विरोध हो क्यों रहा है और प्रदर्शनकारियों पर सीधे बंदूकें क्यों तानी गईं? कंपनियों द्वारा ही संचालित मीडिया भी ऐसे प्रश्नों को भला क्यों उठाएगी! क्या कोई इस सच्चाई से भी वाकिफ होगा कि ‘वेदांता’ जैसे विशुद्ध संस्कृतनिष्ठ राष्ट्रवादी नाम से जानी जाने वाली यह कंपनी इंग्लैंड में पंजीकृत बहुराष्ट्रीय कंपनी है जिसके मालिक अनिल अग्रवाल एक आप्रवासी भारतीय हैं और जो भाजपा और कांग्रेस दोनों को चंदा देने वाले लोगों में शीर्ष पर हैं। हमारी जनप्रिय राष्ट्रवादी सरकारों कि कृपा से हमारे देश में यह जगह जगह खनन के अभियान में लगी है और हमारे जल, जंगल, जमीन और वहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य के लिए संकट बनी रहती है। उड़ीसा में समाजवादी जन परिषद के उपाध्यक्ष साथी लिंगराज आज़ाद के नेतृत्व में इसके बौक्साइट खनन और प्लांट को दी गयी चुनौती के फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उस क्षेत्र की जनता से अनुमति लिए जाने की शर्त के अनुसार सभी ग्राम पंचायतों ने एक स्वर से उसको वहाँ से खदेड़ दिया। इधर तूतिकोरिन में 2010 से ही इस कंपनी के प्लांट के विरुद्ध जनाक्रोश बना हुआ है और इसके द्वारा फैलाये गए प्रदूषण से वहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य के गंभीर संकट को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड ने इसे बंद करने का आदेश भी दे दिया । परंतु कंपनी न्यायालय और सरकार से अपील के बहाने इसे अवैध तरीके से चालू रखे रही। जिसका परिणाम था यह जनप्रदर्शन, जिसमें 12 लोगों की बलि ली गयी। तब जाके प्लांट को बंद होना पड़ा। और अब घटना की सरकारी जांच के नाम पर सरकार द्वारा एक विवादित अवकाशप्राप्त महिला जज को नियुक्त किया गया है। यह भी ध्यान दिलाना उचित होगा कि पहले श्री चिदम्बरम और अब उनकी बेटी ही इस कंपनी की ओर से वकालत करने में लगे हैं। ऐसे में सत्ता या विपक्ष, भाजपा या कांग्रेस या विपक्ष के किसी और से इन घटनाओं की रोकथाम होगी यह सर्वथा स्ंदिग्ध ही रहेगा।

हम अपने से दूर दराज की घटनाओं को तो शायद ही समझ पाएंगे अपने नाक के नीचे होने वाले बनारस के फ्लाईओवर जैसे हादसों पर भी बड़ी आवाज उठाने लायक नहीं रह गए हैं! कुछ छोटे मोटे अधिकारी दिखाने के लिए सस्पेंड होंगे और फिर हमारी जानकारी के बिना ही कुछ समय बीतने पर बहाल हो जाएंगे। ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार मंत्री और सरकारें अपना धंधा चलाती रहेंगी। क्या बनारस के पुल हादसे की ज़िम्मेदारी उस मंत्रालय और मंत्री की नहीं बनती जो इस उत्तर प्रदेश सेतु निगम के बिलों को अपने हस्ताक्षर से ही पारित करता है?

जनता को अपनी लड़ाई बार बार खुद ही लड़नी होगी और अपने अंदर से ईमानदार नेतृत्व पैदा करना या उसे पहचानना होगा। नहीं तो एक एक करके हमारे बड़े और महान देश के एक एक अंचल और उसके निवासी ऐसे ही बर्बाद किए जाते रहेंगे। देश बड़ी छोटी कंपनियों और ठीकेदारों के साथ सत्ताओं की साठ गाँठ का शिकार होता रहेगा। हमारी मांग है कि तूतिकोरिन घटना की निष्पक्ष जांच के लिए उच्च न्यायालय के किसी कार्यरत न्यायाधीश को नियुक्त किया जाये और इस जनविरोधी कंपनी को इस देश में सभी जगह तत्काल निरुद्ध करते हुए इसे यहाँ से अपना बोरिया बिस्तर समेटने का आदेश दिया जाये। इसी प्रकार बनारस के हादसे को गंभीरता से लेते हुए उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य से इस्तीफा लिया जाए और इन सम्पूर्ण परियोजनाओं का निष्पक्ष ऑडिट करने की व्यवस्था की जाए जिससे यह उजागर हो सके कि विकास के नाम पर जनता के धन से चल रही विकास कि इन महान परियोजनाओं से कौन और कैसे कैसे व्यक्ति लाभान्वित हो रहे या किए जा रहे हैं। मंत्रालय की कार्यकुशलता का तगमा लेने वाले हमारे केंद्रीय नगर विकास मंत्री माननीय गडकरी जी से भी पूछा जाए कि विकास कि यह परियोजनाएं कहां कहां और कितनी उनके पुत्र या उनके मित्रों के जिम्मे की गयी हैं !

प्रो महेश विक्रम , राज्य अध्यक्ष विक्रमा मौर्य, राज्य महामंत्री

संतोष कुमार, जिला महामंत्री , नजीर अहमद, जिला अध्यक्ष

समाजवादी जन परिषद, द्वारा प्रकाशित

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समाजवादी जन परिषद के पूर्व महामंत्री आदरणीय भाई वैद्य नहीं रहे।पैंक्रियाज के कैंसर से उनकी मृत्यु हुई।लंबे समय तक उनका प्रेरक राजनैतिक साथ मिला। उनका पिपरिया में ट्रक पर चढ़ कर यात्रा करना अविस्मरणीय रहेगा।महामंत्री के नाते नियमित तौर पर पत्र लिखना सीखने लायक बात है।दल से अलग होने के बाद भी उनका स्नेह मिलता रहा।मेरी किताब ‘कोक पेप्सी की लूट और पानी की जंग’ को उन्होंने बहुत पसंद करते हुए पत्र लिखा।गोआ मुक्ति आंदोलन के वे सत्याग्रही थे।वे पुणे के महापौर रहे तथा शरद पवार की गैर कांग्रेसी सरकार में गृह राज्य मंत्री थे।मेरी हृदय की शल्य क्रिया की जानकारी महाराष्ट्र के उनके साथियों से नहीं मिली इसका उन्होंने मिलने पर अफसोस जताया था।
समाजवादी जन परिषद उनके प्रति सादर श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

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अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रबुद्धजन ने निकला कूच मार्च
द सहारा न्यूज ब्यूरो,वाराणसी।
अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर भारतीय भाषा को बचाने के लिए बीएचयू के सिंह द्वार से संकल्प कूच ‘‘अंग्रेजी हटाओ, भारतीय भाषा लाओ’ रत्नाकर पार्क पहुंची। इसमें सैकड़ों समाजवादी और प्रबुद्धजन शामिल थे। डा. राममनोहर लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए प्रबुद्धजन के साथ युवाओं का हुजूम भी संकल्प कूच में शामिल हुआ। वर्ष 1967 से 2017 के बीच एक लंबी अवधि के बाद अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के बाद इसे दूसरे आंदोलन के रूप में देखा जा सकता है। रविवार को हाथों में नारों की तख्तियां देश मे भारतीय भाषाओं की दुर्गति बयां कर रही थीं। संकल्प कूच रत्नाकर पार्क पहुंच कर सभा में तब्दील हो गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समाजवादी चिंतक विजय नारायन ने कहा कि इस ऐतिहासिक पार्क में 1967 के दौरान अंग्रेजी के खिलाफ बगावत वाराणसी में दिखी थी। समाजवादी नेता देवव्रत मजूमदार के नेतृत्व में हजारों युवा आंदोलनरत थे। आज विदेशी भाषा ने राष्ट्र की उन्नति का रास्ता रोक दिया है। सरकारें भी भारतीय भाषाओं के प्रति बहुत संवेदनशील नही रहीं। भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में भाषा की उपेक्षा ने यहां की प्रगति रोक दी। चौधरी राजेन्द्र ने कहा कि देश में ऐसी व्यवस्था आई है कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने शिक्षा का पूर्णत: बाजारीकरण कर रखा है। अंग्रेजी पढ़ाने के नाम पर मनमाना फीस वसूलना इनका ध्येय है। जिस वजह से शिक्षा की गुणवत्ता गिरती जा रही है। यहां तक कि भारतीय युवाओं को चिकित्सा और इंजीनियरिंग सहित सभी पाठ्यक्रम अंग्रेजी में होने से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। निजी कंपनियां, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएं अंग्रेजी को अधिक महत्व दे रही हैं। इसकी वजह से भारतीय भाषाओं में पढ़े युवा अवसरों से वंचित हो रहे है, जिनकी अपनी भाषा पर मजबूत पकड़ है। इस मौके पर देवव्रत मजमूनदार सहित दिवंगत सभी लोगो को श्रद्धांजलि दी गई तथा आंदोलन को आगे गति देने एवं अंग्रेजी स्कूलों का विरोध करने की दिशा में रणनीति तथा आगामी 23 मार्च को लोहिया के जन्मदिन पर एक बड़ा कार्यक्रम निर्धारित किया गया। सभा में डा. गया सिंह, डा. बहादुर यादव, संजीव सिंह, डा. रामाज्ञा शशिधर, डा. विास श्रीवास्तव, डा. प्रभात महान, शिवेंद्र मौर्य, रविन्द्र प्रकाश भारती, विजेंद्र मीणा ने भी विचार व्यक्त किये। डा. महेश विक्रम, डा. स्वाति, डा. नीता चौबे, डा. मुनीजा खान, पूर्व राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल, कुवंर सुरेश सिंह, श्यामबाबू मौर्य, राजीव मौर्य, आशीष मौर्य, अमन यादव, विनय आदि मौजूद थे। अध्यक्षता विजय नारायन, जबकि संचालन अफलातून ने किया।

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देश का किसान जब अत्यंत कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। गरीबी और कर्ज के बोझ में दबा है। अपनी मेहनत का मोल और उपज के उचित दाम के लिये संघर्ष करने के लिये रास्तेपर उतर रहा है तब किसान को कुछ देने के बजाय केंद्र सरकार ने ऐसी फसल बीमा योजनाएं चला रखी है जिसमें खरीप 2016 और रबी 2016-17 के लिये सरकारी तिजोरी और किसानों की जेब से लूट कर 10 बीमा कंपनियों को 12395 करोड रुपये का लाभ पहुंचाया गया है। जिसके लिये देश में 5.65 करोड किसानों से जबरदस्ती बीमा करवाया गया लेकिन 82.43 प्रतिशत किसानों को किसी प्रकार की मदत नही मिली। जिन 17.57 प्रतिशत किसानों को नुकसान भरपाई मिल पाई है उनमें कई किसान ऐसे है की जिन्हे उनसे वसूले गये बीमा हप्ते से कम राशि मिली है।
केंद्र सरकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार सभी फसल बीमा योजना के खरीप 2016 और रबी 2016-17 में देश भर से किसानों से जबरदस्ती उनके अनुमति के बिना 4231.16 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 9137.02 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 8949.35 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 22318.15 करोड रुपये राशी बीमा कम्पनियों को दी गयी। नुकसान भरपाई के रुप में केवल 9922.78 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है। कंपनियों को प्राप्त हुये कुल बीमा राशी के आधा भी किसानों को नही लौटाया गया। किसानों से 12395.37 करोड रुपये रुपये सरकार और बीमा कम्पनियों के मिली भगत से बीमा कम्पनियों ने लूटे है। प्रति किसान लगभग 2200 रुपये कंपनी ने लूट लिये है।
खरीप 2016 में देश भर के किसानों से 2980.10 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 6932.38 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 6759.72 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 16672.20 करोड रुपये बीमा कम्पनियों को दिये गये। नुकसान भरपाई के रुप में किसानों को केवल 8021.68 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है।
रबी 2016-17 में देश भर के किसानों से 1251.06 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 2204.65 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 2189.63 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 5645.95 करोड रुपये बीमा कंपनियों को दिये गये। नुकसान भरपाई के रुप में किसानों को केवल 3744.85 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है।
महाराष्ट्र में बीमा कंपनियों को सबसे अधिक 4621.05 करोड रुपये बीमा हप्ता प्राप्त हुआ। उसमें से किसानों को केवल 2216.66 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गयी। बाकी सारी रकम 2404.39 करोड रुपये कर्ज के बोझ में दबे किसानों की जेब से सरकार से मिली भगत कर बीमा कम्पनियों ने लूट लिये है।

प्रधानमंत्री फसल बिमा योजना सहीत सभी बीमा योजनाओं में हुयी यह पिछले बीमा योजनाओं से कई गुना अधिक है। नई योजना में निजी बीमा कंपनियों को बीमा क्षेत्र में प्रवेश देना, बैंक से कर्ज लेनेवाले ऋणी किसानों के लिये योजना अनिवार्य कर जबरदस्ती हप्ता वसूलना आदी कई सारे प्रावधान बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये कानून में किये गये है। इस योजना से स्पष्ट है की कंपनियां और सरकार ने मिलकर योजनापूर्वक किसानों को लूटने का काम किया है। यह साजिसपूर्वक किया गया भ्रष्टाचार है। इसे उजागर करने के लिये बीमा कंपनियों ने किन किन पार्टियों को कितना कितना फंड दिया है इसकी जांच होनी आवश्यक है। यह उल्लेखनीय है कि यह योजना किसानों की आमदनी दोगुणी करने के लिये घोषित योजनाओं में से एक है। किसानों की आय दोगुणी करने के नामपर बनी दूसरी योजनाओं का स्वरुप भी इसी प्रकार का है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत करते समय माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा था की उनकी सरकार गरीबों को समर्पित सरकार हैं। किसान के कल्याण के लिये, किसान का जीवन बदलने के लिये, गांव की आर्थिक स्थिति बदलने के लिये प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लायी गयी है। यह सरकार की ओर से किसानों के लिये तौफा है। यह योजना किसानों के जीवन में बहुत बडा परिवर्तन लायेगी।
लेकिन प्रत्यक्ष में केंद्र सरकार ने उल्टा किया है। देश के किसानों को लूट कर बीमा कंपनीयों को बडा लाभ पहुंचाया है। यह योजना किसानों को लूट कर बीमा कंपनीयों को लाभ पहूंचाने के लिये ही बनाई गई है। किसानों की यह लूट क्रियान्वयन के दोष के कारण नही बल्कि यह योजना तत्वत: किसानों के लूट की व्यवस्था है। जिन राज्य सरकारों ने यह योजना अपने राज्य में लागू नही की उन्हे किसानों को लूट से बचाने के लिये धन्यवाद देने चाहीये। दूसरे राज्यों को भी आगे से किसानों के हित में इस किसान विरोधी योजना का बहिष्कार करना चाहीये।
राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति ने की मांग है कि देश के किसानों को लूट कर उनसे वसूला गया बीमा हप्ता किसानों को वापस लौटाया जाए। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बंद की जाए और उसके बदले में प्राकृतिक आपदाओं में किसानों को सरकार की तरफ से सिधे नुकसान भरपाई दी जाने की व्यवस्था की जाए।
विवेकानंद माथने,
विवेकानंद माथने
संयोजक
राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति
vivekanand.amt@gmail.com
9822994821 / 9422194996

2 Kharif 20163 Rabi 2016-17

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समाजवादी जन परिषद

राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक

रांची, १-३ सितम्बर २०१७

आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक प्रस्ताव

१, २ और ३ सितम्बर को रांची में हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में आर्थिक, सामजिक और राजनैतिक परिस्थिति पर गहन चर्चा हुई. उत्तर-प्रदेश, झारखण्ड, केरल, दिल्ली, उत्तर-बंगाल, ओडिशा, बिहार, राजस्थान एवं महाराष्ट्र से आये प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम का व्योरा पेश किया. साथ ही सजप द्वारा किये जा रहे हस्तक्षेपों के बारे में भी जानकारी दी.

सभी क्षेत्रों से मिली जानकारी से यह पुष्ट हुआ कि २०१४ में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद, भाजपा और संघ ने समाज में घृणा और आतंक के माहौल को बहुत तेजी से बढाया है. भाजपा, धर्म के नाम पर समाज का ध्रुवीकरण करने में सफल हुइ है और बंटे हुए वोट के आधार पर चुनाव जीतती रही हैं. इस विभाजन का सामाजिक ताने-बाने पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है. विभिन्न वर्ग के लोग, जो मिल-जुल कर साथ जीवन-यापन करते थे, अब संदेह और डर के माहौल में रहते है. सजप इस स्थिति को भयावह मानती है और अपनी और से वो सारे कदम उठाएगी जिससे सामाजिक सौहार्द्य बहाल हो सके. इसके लिए स्थानीय स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम चलाये जायेंगे. साथ ही सजप सरकार और शासन से मांग करती है की ऐसे तत्वों पर जो समाज को बाँटने का काम करते है, उनपर कड़ी कार्यवाई की जाय.

बिहार में नीतीश कुमार ने जनादेश के साथ गद्दारी कर, सत्ता-सुख भोग के लिए जिस तरह रातों-रात पाला बदला, वह अब तक की सबसे शर्मनाक राजनैतिक कुकृत्य है. सजप यह मांग करती है की बिहार की सरकार को अविलम्ब भंग किया जाय और नया जनादेश लिया जाय.

सजप ऐसा महसूस करती है की भाजपा के आक्रामक रणनीति के सामने विपक्ष निष्क्रिय और निराश है. हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं. पूरे भारत में कई आन्दोलन हो रहे है- जिनमे प्रमुख है हरयाणा का जाट आन्दोलन, गुजरात का पाटीदार आन्दोलन, महाराष्ट्र का मराठा आन्दोलन, मध्य प्रदेश/ महाराष्ट्र का किसान आन्दोलन आदि. इन आन्दोलनों में सैकड़ों बेगुनाहों की जान गयी. भाजपा सरकारें इन आन्दोलनों को नकारने और दमन करने में लगी रही. मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ने किसानों से बातचीत करने की बजाय उपवास का हास्यास्पद नाटक किया. जब दो किसानों के परिवार ने मुआवजा लेने से मना किया तब जाकर पुलिस वालों पर हत्या का मामला दर्ज हो पाया. सजप का मानना है की ये सभी आन्दोलन कृषि के प्रति सरकार की उपेक्षा और उलटी नीतियों के कारण हो रहे हैं. उपज का उचित मूल्य न मिलने के कारण किसान और उनके बच्चे छोटी-मोटी नौकरी में ही अपनी भलाई समझते है, और इसीलिये आरक्षण की मांग करते है. सजप सरकार से मांग करती है की कृषि के लागत मूल्य पर नियंत्रण हो, कृषि-उत्पादों का लाभकारी मूल्य मिले और किसान के हित वाली फसल बीमा लागू हो. अभी लागू ‘प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना’ के बारे में सी ऐ जी ने अपने प्रतिवेदन में कहा है, कि इस योजना से सिर्फ बीमा कंपनियों को ही लाभ पहुँचा है.

सजप का आंकलन है की २०१४ में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से हिंदुत्व-समूहों के द्वारा समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति घोर विद्वेष फैलाया जा रहा है. गाय और गोमांस का अफवाह फैला कर निर्दोष मुसलामानों की दिन दहाडे हत्या की जा रही है. उन्हें अपने पारंपरिक व्यवसाय, जैसे पशु-कारोबार और मांस बेचने के काम से वंचित करने का षड़यंत्र किया जा रहा है. आम जनता को भैंस, सूअर आदि जैसे सस्ते प्रोटीन आहारों से वंचित किया जा रहा है. गौ-रक्षक दल गुंडों की तरह आतंक फैला कर वसूली कर रहे है. इससे पशु पालन करने वाले सभी धर्मों के गरीब किसान की रोजी-रोटी पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है. सजप, केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करती है की गौ-गुंडों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जाय और कानून हाथ में लेने वाले हर व्यक्ति और समूह से समान रूप से निबटा जाय जिससे भय का माहौल समाप्त हो और हर नागरिक कानून-सम्मत रोजगार और जीविका निर्वाह के साधनों का उपयोग कर सके.

आम जनता के लिए स्वास्थ व्यवस्था पूरे देश में चरमरा गयी है. उत्तरोत्तर सरकारों ने स्वास्थ सम्बन्धी साधनों में कटौती की है. स्थिति इतनी भयावह हो गयी है की सरकारी अस्पतालों में सैकड़ों की संख्या में मूलभूत सुविधा और ऑक्सीजन के आभाव में बच्चों की मौत हो रही है. गोरखपुर, जमशेदपुर आदि के अस्पतालों की घटना अपराधिक श्रेणी में आती है लेकिन बीजेपी सरकारें बेशर्मी से इसे झुठला रही है.

भ्रष्टाचार मिटाने के जुमले पर चुनाव जीतने वाली बीजेपी सरकार ने लोकपाल बहाल करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली है. देश में औद्योगिक घरानों से सम्बंधित भ्रष्टाचार बेइंतहा बढ़ रहा है. याराना पूंजीवाद की संस्कृति फल-फूल रही है. अब तो अंतर्राष्ट्रीय एजेंसीज द्वारा किये जा रहे सर्वेक्षणों में भी भारत अव्वल भ्रस्टाचारी देश बन गया है. सजप मांग करती है की लोकपाल की बहाली अविलम्ब की जाय, ‘व्हिसलब्लोअर बिल’ पास किया जाय और राजनीतिक दलों के चंदों को पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाय.

लोहिया जी आजाद भारत के पहले राजनेता थे जिन्होंने ‘निजता के अधिकार’ को प्रखरता से उठाया था. कालांतर में सभी सरकारों ने आम जनता से निजता का अधिकार छीनने का षड़यंत्र करती रही है. बीजेपी की फसीबादी सरकार ने तो सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर इस अधिकार को सिरे से नकारा. किन्तु माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस अधिकार को मौलिक माना है. सजप इस फैसले का स्वागत करती है साथ ही यह मानती है की इस घटना से फासीवादी ताकतों के मानवाधिकारों के हनन के घृणित इरादों पर भविष्य में भी रोक लगेगी.

सजप नर-नारी समता के सिधान्तों पर मुखर रही है. हाल के सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक के निर्णय का स्वागत करती है. लेकिन बीजेपी जिस तरह से इस मुद्दे को मुसलमानों को नीचा दिखने के लिए इस्तेमाल कर रही है, उसकी हम भर्त्सना करते है. सभी वर्गों में, जिनमे हिन्दू भी शामिल है, महिलाओं के साथ काफी भेद भाव किया जा रहा है. सजप उन सभी मुद्दों पर सुधार लाने का काम करती रही है. लेकिन बीजेपी मुसलमान महिलाओं के शिक्षा और रोजगार पर ध्यान नहीं देकर उनके शादी में ५०००० का अनुदान देने की पेशकश कर रही है, जो भेदभाव एवं विद्वेषपूर्ण है. साथ ही केरल में अखिला / हादिया के सन्दर्भ में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में भ्रामक एफिडेविट फाइल कर एन आई ए की जांच करवाई जा रही है. यह घटना नारी स्वतंत्रता, और वयस्क नारी अधिकारों पर सीधा प्रहार है. सजप इसका सभी स्तर पर पुरजोर विरोध करेगी.

नोटबंदी के कारण देश की अर्थ-व्यवस्था चरमरा गयी. लाखों छोटे उद्योग बंद हो गए और एक करोड से ज्यादा कर्मचारी की नौकरी चली गयी. मोदी और उनकी सरकार इस सम्बन्ध में हर स्तर पर लगातार झूठ बोलती रही है. अब रिज़र्व बैंक ने जो आंकड़े प्रसारित किये है उनसे पता चलता है की ९९% नोट वापिस आ गए. १७००० कड़ोर नोट पकड़ने के लिए २१००० कड़ोर, नए नोट छापने पर खर्च कर दिया गया. जी डी पी में २% से ज्यादा की कमी आई है. सजप यह मांग करती है की अपने वादे के अनुसार मोदी को नोटबंदी के भीषण परिणामों की जिम्मेवारी लेते हुवे अविलम्ब इस्तीफा दें.

पिछले कई दशकों में होने वाले आर्थिक बदलावों की अपेक्षा जी एस टी एक बहुत बड़ी और सर्वव्यापी घटना है. जी एस टी लागू होने से टैक्स-व्यवस्था का सरलीकरण होगा, सामान के लाने ले जाने में आसानी होगी और सही सरकारी नीतियां लाने से कुछ वस्तुओं के दाम कम सकते हैं . जी एस टी के मुख्य नुकसानों में – केंद्रीकृत कंप्यूटर आधारित टैक्स फाइलिंग सिस्टम के लिए कंप्यूटर, इन्टरनेट, और जानकार ऑपरेटर / सी ए की सेवा का खर्च छोटे व्यवसाइयों के लिए मंहगा पड़ेगा. छोटे उद्योग, जो पंजीकरण नहीं करवा पायेंगे उन्हें इनपुट क्रेडिट नहीं मिल पायेगा. फलस्वरूप उनका उत्पाद बड़े उद्योग के अपेक्षा मंहगा हो जायेगा. सैधांतिक तौर पर सजप केंद्रीकृत टैक्स ढांचे और याराना-पूंजीवाद आधारित विकास के अवधारणा के विरूद्ध है. जी एस टी भी उसी दिशा में एक और कदम है. सजप मांग करती है की जी एस टी में आवश्यक सुधार अविलम्ब लाकर छोटे और मध्यम कारबारियों के लिए लाभकारी बनाया जाय ताकि रोजगार बढे और छोटे तबकों में आमदनी का जरिया मुहय्या हो.

साथ ही सजप का विस्वास है की एक स्वस्थ एवं न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था की नीव में जो कर व्यवस्था होगी उसमे प्रत्यक्ष कर का हिस्सा दो तिहाई के आस पास होनी चाहिए जबकि अभी मात्र एक तिहाई है. सजप धनाढ्य वर्ग के कर प्रतिशत को बढ़ने के पक्ष में है और अप्रत्यक्ष कर, जो आम जनता से वसूला जाता है उसे अभी के स्तर से आधे पर लाया जाय. धनी व्यक्तियों से ज्यादा आय-कर लेना अनिवार्य ज़रुरत है.

झारखंड की बीजेपी सरकार निरंकुश शासन का प्रयास कर रही है. आदिवासियों के भूमि अधिग्रहण का इनका कानून, अत्यधिक विरोध के बाद निरस्त करना पड़ा. सजप ने भी इन विरोधों में अहम् भूमिका निभाई. झारखण्ड की सरकार ने, माओवादी होने के आरोप में हज़ारों आदिवासी युवा को वर्षों से जेल में बंद कर रखा हैं. उनपर मुकदमें में भी कोई प्रगति नहीं है. सजप की मांग है की न्याय सम्मत ढंग से इन व्यक्तिओं को तुरत रिहा किया जाय. साथ ही झारखंड में ज़मीन-बैंक बनाने के रास्ते, गाँव के चारागाह और सामूहिक इस्तेमाल की भूखंडों को पूंजीपतियों को हस्तांतरित करने के प्रक्रिया पर रोक लगाईं जाय.

सजप ‘Jharkhand Freedom of Religion Bill 2017’ (झारखण्ड फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन बिल २०१७) को झारखण्ड सरकार द्वारा नागरिकों के धर्म अपनाने के मौलिक अधिकार को छीनने का षड्यंत्र मानती है. इस बिल के लागू होने से हर ऐसे व्यक्ति को जो धर्म परिवर्तन करता है, जिला अधिकारी को सूव्चना नहीं देने पर तीन साल की सजा का प्रवधान है. सजप झारखण्ड के माननीय राज्यपाल से अपील करती है की इस बिल पर अपनी स्वीकृति न दें.


Aflatoon अफ़लातून ,

महामंत्री,
समाजवादी जनपरिषद ,

Phone फोन : 0542-2300405

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सेवा में,

श्री नरेन्द्र मोदी जी,
प्रधान मंत्री, भारत सरकार ।

विषय : उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भारत की कम से कम एक-एक भाषा का प्रयोग अधिकृत करने की माँग को लेकर 3 मई, 2017 को पूर्वाह्न 11 बजे से आपके कार्यालय (प्रधान मंत्री कार्यालय) के समक्ष सत्याग्रह (धरना) प्रारम्भ करने की पूर्व सूचना ।

महाशय,

भारत के उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भारत की कम से कम एक-एक भाषा का प्रयोग अधिकृत करने हेतु केंद्र सरकार संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत करे, इस आग्रह का पत्र आपके कार्यालय में 7 नवम्बर, 2014 और 1 दिसंबर, 2014 को हमने जमा किए ।

विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र में आजादी के सत्तर वर्षों के पश्चात् भी सर्वोच्च न्यायालय और देश के 24 में से 20 उच्च न्यायालयों की किसी भी कार्यवाही में भारत की किसी भी भाषा का प्रयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है और यह प्रतिबंध भारतीय संविधान की व्यवस्था के तहत है । संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (1) के उपखंड (क) के तहत उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होंगी ।

यद्यपि इसी अनुच्छेद के खंड (2) के तहत किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य के उच्च न्यायालय में हिंदी भाषा या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग राष्ट्रपति की पूर्व सहमति के पश्चात् प्राधिकृत कर सकेगा । इस खंड की व्यवस्था ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश पर लागू नहीं होगी । अर्थात् इस खंड के तहत उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषा के सीमित प्रयोग की ही व्यवस्था है; और इसके तहत उच्च न्यायालय में भी भारतीय भाषा का स्थान अंग्रेजी के समतुल्य नहीं हो पाता ।

ऐसी संवैधानिक व्यवस्था होते हुए भी किसी भारतीय भाषा के सीमित प्रयोग की स्वीकृति भी संविधान लागू होने के सड़सठ वर्ष पश्चात् भी केवल चार राज्यों के उच्च न्यायालयों में ही दी गई है । 14 फरवरी,1950 को राजस्थान के उच्च न्यायालय में हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत किया गया । तत्पश्चात् 1970 में उत्तर प्रदेश,1971 में मध्य प्रदेश और 1972 में बिहार के उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत किया गया । इन चार उच्च न्यायालयों को छोड़कर देश के शेष बीस उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियों में अंग्रेजी अनिवार्य है ।

सन् 2002 में छत्तीसगढ़ सरकार ने इस व्यवस्था के तहत उस राज्य के उच्च न्यायालय में हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत करने की माँग केन्द्र सरकार से की । सन् 2010 एवं 2012 में तमिलनाडु एवम् गुजरात सरकारों ने अपने उच्च न्यायालयों में तमिल एवम् गुजराती का प्रयोग प्राधिकृत करने के लिए केंद्र सरकार से माँग की । परन्तु इन तीनों मामलों में केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों की माँग ठुकरा दी ।

5 अप्रिल, 2015 को उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एवम् राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मलेन में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम ने तमिलनाडु सरकार की यह माँग दोहराई कि मद्रास हाई कोर्ट में तमिल भाषा के इस्तेमाल की इजाज़त दी जाए । उन्होंने केंद्र से अपील की कि वह इस मामले में अपने रुख पर पुनर्विचार करे और मद्रास हाई कोर्ट में तमिल भाषा के इस्तेमाल की इजाजत देकर तमिलनाडु राज्य की पुरानी आकांक्षा और माँग को पूरा करे । मुख्य मंत्री ने कहा कि यदि हमें न्याय का प्रशासन वाकई लोगों के करीब ले जाना है तो यह बहुत जरूरी है कि हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल किया जाए ।

ध्यातव्य है कि श्री ओ पनीरसेल्वम अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद पर थे और तमिलनाडु राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में लिखा था कि वह मद्रास हाई कोर्ट में तमिल के इस्तेमाल की समर्थक है ।

सन् 2012 में, जब आप गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब गुजरात सरकार ने केंद्र सरकार से यह आग्रह किया था कि गुजरात के उच्च न्यायालय में गुज़राती का प्रयोग अधिकृत हो । तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने तो इस पर ध्यान नहीं ही दिया, परन्तु आश्चर्य और दुःख इस बात का है कि जब आप स्वयम् देश के प्रधान-मंत्री बन गए तो भी आप ने इस पर कभी भी ध्यान नहीं दिया । आपके प्रधान मंत्री बनने के बाद इस मामले में पत्र लिखकर आपके कार्यालय में दो बार ( 7 नवम्बर, 2014 और 1 दिसंबर, 2014 को ) जमा किए गए पत्रों की प्राप्ति हमारे पास है ।

सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी के प्रयोग की अनिवार्यता हटाने और एक या एकाधिक भारतीय भाषा को प्राधिकृत करने का अधिकार राष्ट्रपति या किसी अन्य अधिकारी के पास नहीं है । अतः सर्वोच्च न्यायालय में एक या एकाधिक भारतीय भाषा का प्रयोग प्राधिकृत करने के लिए और प्रत्येक उच्च न्यायालय में कम-से-कम एक-एक भारतीय भाषा का दर्जा अंग्रेज़ी के समकक्ष दिलवाने हेतु संविधान संशोधन ही उचित रास्ता है । अतः संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (1) में संशोधन के द्वारा यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी अथवा कम-से-कम किसी एक भारतीय भाषा में होंगी ।

इसके तहत मद्रास उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम तमिल, कर्नाटक उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम कन्नड़, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड और झारखंड के उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम हिंदी और इसी तरह अन्य प्रांतों के उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम उस प्रान्त की राजभाषा को प्राधिकृत किया जाना चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम हिंदी को प्राधिकृत किया जाना चाहिए ।

ध्यातव्य है कि भारतीय संसद में सांसदों को अंग्रेजी के अलावा संविधान की अष्टम अनुसूची में उल्लिखित सभी बाईस भारतीय भाषाओं में बोलने की अनुमति है । श्रोताओं को यह विकल्प है कि वे मूल भारतीय भाषा में व्याख्यान सुनें अथवा उसका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद सुनें, जो तत्क्षण-अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराया जाता है । अनुवाद की इस व्यवस्था के तहत उत्तम अवस्था तो यह होगी कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में एकाधिक भारतीय भाषाओं के प्रयोग का अधिकार जनता को उपलब्ध हो परन्तु इन न्यायालयों में एक भी भारतीय भाषा के प्रयोग की स्वीकार्यता न होना हमारे शासक वर्ग द्वारा जनता को खुल्लमखुल्ला शोषित करते रहने की नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण है ।

किसी भी नागरिक का यह अधिकार है कि अपने मुकदमे के बारे में वह न्यायालय में स्वयम् बोल सके, चाहे वह वकील रखे या न रखे । परन्तु अनुच्छेद 348 की इस व्यवस्था के तहत देश के चार उच्च न्यायालयों को छोड़कर शेष बीस उच्च न्यायालयों एवम् सर्वोच्च न्यायालय में यह अधिकार देश के उन सतानवे प्रतिशत (97 प्रतिशत) जनता से प्रकारान्तर से छीन लिया गया है जो अंग्रेजी बोलने में सक्षम नहीं हैं । सतानवे प्रतिशत जनता में से कोई भी इन न्यायालयों में मुकदमा करना चाहे या उन पर किसी अन्य द्वारा मुकदमा दायर कर दिया जाए तो मजबूरन उन्हें अंग्रेजी जानने वाला वकील रखना ही पड़ेगा जबकि अपना मुकदमा बिना वकील के ही लड़ने का हर नागरिक का अधिकार है ।

अगर कोई वकील रखता है तो भी वादी या प्रतिवादी यह नहीं समझ पाता है कि उसका वकील मुकदमे के बारे में महत्‍वपूर्ण तथ्यों को सही ढंग से रख रहा है या नहीं ।

निचली अदालतों एवम् जिला अदालतों में भारतीय भाषा का प्रयोग अनुमत है । अतः उच्च न्यायालयों में जब कोई मुकदमा जिला अदालत के बाद अपील के रूप में आता है तो मुकदमे से संबद्ध निर्णय एवम् अन्य दस्तावेजों के अंग्रेजी अनुवाद में समय और धन का अपव्यय होता है; वैसे ही बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान उच्च न्यायालयों के बाद जब कोई मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में आता है तो भी अनुवाद में समय और धन का अपव्यय होता है ।

प्रत्येक उच्च न्यायालय एवम् सर्वोच्च न्यायालय में एक-एक भारतीय भाषा का प्रयोग भी अगर अनुमत हो जाए तो उच्च न्यायालय तक अनुवाद की समस्या पूरे देश में लगभग समाप्त हो जाएगी और सर्वोच्च न्यायालय में भी अहिंदीभाषी राज्यों के भारतीय भाषाओं के माध्यम से संबद्ध मुकदमों में से जो मुकदमे सर्वोच्च न्यायालय में आएँगे, केवल उन्हीं में अनुवाद की आवश्यकता होगी ।

प्रस्तावित कानूनी परिवर्तन इस बात की संभावना भी बढ़ाएगा कि जो वकील किसी मुकदमे में जिला न्यायालय में काम करता है, वही वकील उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में भी काम कर सके । इससे वादी-प्रतिवादी के ऊपर मुकदमे से सम्बंधित खर्च घटेगा ।

यह कहना कि केवल हिंदी भाषी राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान) के उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषा का प्रयोग अनुमत होगा, अहिंदीभाषी प्रांतों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार है । परन्तु अगर यह तर्क भी है तो भी छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड एवं झारखंड के उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग अनुमत क्यों नहीं है ?

ध्यातव्य है कि छत्तीसगढ़, उत्तराखंड एवम् झारखंड के निवासियों को इन राज्यों के बनने के पूर्व अपने-अपने उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग करने की अनुमति थी ।

अगर चार उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषा में न्याय पाने का हक है तो देश के शेष बीस उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में निवास करने वाली जनता को यह अधिकार क्यों नहीं ? क्या यह उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं है ? क्या यह अनुच्छेद 14 द्वारा प्रदत्त ‘विधि के समक्ष समता’ और अनुच्छेद 15 द्वारा प्रदत्त ‘जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध’ के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है ? और इस आधार पर छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और गुजरात सरकार के आग्रहों को ठुकराकर क्या केन्द्र सरकार ने देशद्रोह एवम् भारतीय संविधान की अवमानना का कार्य नहीं किया था ?

उच्च न्यायालयों एवम् सर्वोच्च न्यायलय में वकालत करने एवम् न्यायाधीश बनने के अवसरों में भी तीन प्रतिशत अंग्रेजीदां आभिजात्य वर्ग का पूर्ण आरक्षण है, जो कि ‘अवसर की समता’ दिलाने के संविधान की प्रस्तावना एवम् संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत ‘लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता’ के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है ।

ऊपर वर्णित संविधान की अवमाननाओं के अलावा उच्च न्यायालयों एवम् सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी की अनिवार्यता अनेक संवैधानिक व्यवस्थाओं का उल्लंघन है, जिन में से कुछ का जिक्र नीचे किया जा रहा है :

(1) संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत को ‘समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाना है और भारत के नागरिकों को ‘न्याय’ और ‘प्रतिष्ठा और अवसर की समता’ प्राप्त कराना है तथा ‘व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता’ को बढ़ाना है ।

(2) अनुच्छेद 38 – राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए काम करेगा ।
अनुच्छेद 39 – राज्य अपनी नीति का विशेष रूप से इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो ।
अनुच्छेद ‘ 39 क’ – राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि कानून का तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और किसी भी असमर्थता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए ।

(3) अनुच्छेद ‘51 क’– भारत के प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य है कि वह स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे और भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे, जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो ।

[ ध्यातव्य है कि ‘स्वराज’ हमारे स्वतंत्रता आंदोलन का पथ-प्रदर्शक सिद्धांत था और हिंदी व अन्य जन-भाषाओं का प्रयोग तथा जनता के लिए अंग्रेजी के अनिवार्य प्रयोग का विरोध गांधीजी की नीति थी और राष्ट्रभाषा का प्रचार-प्रसार उनके रचनात्मक कार्यक्रम का मुख्य बिंदु था । स्पष्ट ही अनुच्छेद 348 को वर्त्तमान स्वरूप में रखकर हमारे शासक वर्ग संविधान द्वारा निर्धारित मूल कर्तव्य का उल्लंघन कर रहे हैं । ]

(4) अनुच्छेद 343 – संघ की राजभाषा हिंदी होगी ।
अनुच्छेद 351 – संघ का यह कर्तव्‍य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे और उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे ।

अनुच्छेद 348 में संशोधन करने की हमारी प्रार्थना एक ऐसा विषय है जिसमें संसाधनों की कमी का कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता है । हम ऊपर यह बता चुके हैं कि प्रस्तावित संशोधन से अनुवाद में लगने वाले समय और धन की बचत होगी तथा वकीलों को रखने के लिए होने वाले खर्च में भी भारी कमी होगी । अनुच्छेद 348 का वर्त्तमान स्वरूप शासक वर्ग द्वारा आम जनता को शोषित करते रहने की दुष्ट भावना का खुला प्रमाण है । यह हमारी आजादी को निष्प्रभावी बना रहा है । यह एक शोषणकारी औपनिवेशिक व्यवस्था की जीवन्तता है । क्या स्वाधीनता का अर्थ केवल ‘यूनियन जैक’ के स्थान पर ‘तिरंगा झंडा’ फहरा लेना है ?

कहने के लिए भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, परन्तु जहाँ जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक नहीं है, वहाँ प्रजातंत्र कैसा ? दुनिया के तमाम उन्नत देश इस बात के प्रमाण हैं कि कोई भी राष्ट्र अपनी जन-भाषा में काम करके ही उल्लेखनीय उन्नति कर सकता है । किसी भी विदेशी भाषा के माध्यम से आम जनता की प्रतिभा की भागीदारी देश की विकास-प्रक्रिया में नहीं हो सकती । प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वही देश अग्रणी हैं, जो अपनी जन-भाषा में काम करते हैं; और प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वे देश सबसे पीछे हैं, जो विदेशी भाषा में काम करते हैं । विदेशी भाषा में उन्हीं अविकसित देशों में काम होता है, जहाँ का बेईमान आभिजात्य वर्ग विदेशी भाषा को शोषण का हथियार बनाता है और इसके द्वारा विकास के अवसरों में अपना पूर्ण आरक्षण बनाए रखना चाहता है ।

इस विषय में केंद्र सरकार संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत करने का निर्णय ले और इसकी सार्वजनिक घोषणा करे, यही हमारा आग्रह है ।

अगर इस तरह का निर्णय सरकार नहीं लेती है, तो 3 मई, 2017 को पूर्वाह्न 11 बजे से आपके कार्यालय के समक्ष हम सत्याग्रह (धरना) प्रारम्भ करेंगे ।
इस सत्याग्रह में किसी भी एक समय में अधिक से अधिक चार लोग भाग लेंगे । यह सत्याग्रह पूर्णतः शान्तिपूर्ण और अहिंसक ढंग से होगा । इसमें किसी प्रकार के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं होगा ।

श्रीमान् से हमारा विनम्र आग्रह है कि जब तक हम किसी असभ्य भाषा का प्रयोग न करें तब तक हमारे साथ पुलिस या किसी अन्य सरकारी अधिकारी द्वारा असभ्य भाषा का इस्तेमाल न किया जाए और जब तक हम हिंसा या मारपीट पर न उतरें तब तक हमारे साथ पुलिस या किसी अन्य सरकारी अधिकारी द्वारा हिंसा या मारपीट का बर्ताव न किया जाए ।

अगर इस सम्बन्ध में हमें आपसे मिलने का मौक़ा दिया जाता है, तो हम आपके आभारी रहेंगे ।

आपका विश्वसनीय
24 अप्रिल, 2017 (मेरा हस्ताक्षर)
1. श्याम रुद्र पाठक
संयोजक, न्याय एवं विकास अभियान
एच डी – 189, सेक्टर 135, नॉएडा – 201304
shyamrudrapathak@gmail.com
फोन : 9818216384

  1. प्रेम चन्द अग्रवाल
    423/10, प्रीत नगर, अम्बाला शहर – 134003
    फोन : 9467909649
  2. ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
    बी – 319, इंदिरा गार्डन, खोड़ा कॉलोनी, गाजियाबाद – 201309
    फोन : 9213161050
  3. बिनोद कुमार पाण्डेय
    ए – 435, जैतपुर एक्सटेंशन, पार्ट – 1, बदरपुर, नई दिल्ली- 110044
    फोन : 8287578876

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