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Archive for the ‘vinoba’ Category

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‘खादी का मतलब है देश के सभी लोगों की आर्थिक स्वतंत्रता और समानता का आरंभ। लेकिन कोई चीज कैसी है , यह तो उसको बरतने से जाना जा सकता है – पेड की पहचान उसके फल से होती है। इसलिए मैं जो कुछ कहता हूं उसमें कितनी सचाई है, यह हर एक स्त्री-पुरुष खुद अमल करके जान ले। साथ ही खादी में जो चीजें समाई हुई हैं,उन सबके साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी का एक मतलब यह है कि हम में से हर एक को संपूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी चाहिए और टिकानी चाहिए;यानी हमें इस बात का दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि हम अपने जीवन की सभी जरूरतों को हिन्दुस्तान की बनी चीजों से,और उनमें भी हमारे गांव में रहने वाली आम जनता की मेहनत और अक्ल से बनी चीजों के जरिए पूरा करेंगे।इस बारें में आज कल हमारा जो रवैया है,उसे बिल्कुल बदल डालने की यह बात है।मतलब यह कि आज हिन्दुस्तान के सात लाख गांवों को चूस कर और बरबाद कर के हिंदुस्तान और ग्रेट ब्रिटेन के जो दस-पांच शहर मालामाल हो रहे हैं,उनके बदले हमारे सात लाख गांव स्वावलंबी और स्वयंपूर्ण बने,और अपनी राजी खुशी से हिंदुस्तान के शहरों और बाहर की दुनिया के लिए इस तरह उपयोगी बनें कि दोनों पक्षों को फायदा पहुंचे।‘ महात्मा गांधी ने खादी के अपने बुनियादी दर्शन को इन शब्दों में अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका ‘रचनात्मक कार्यक्रमः उसका रहस्य और स्थान’ में प्रस्तुत किया है। अब हमें गांधीजी के ‘पेड के फल की पहचान’ करनी है। यह रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति के निर्माण हेतु बनाये गये थे।इन कार्यक्रमों का प्रतीक था-चरखा।लोहिया ने कई बरस बाद कहा कि हम रचनात्मक कार्यक्रम का प्रतीक ‘फावडा’ को भी चुन सकते हैं।

दावोस में शुरु हो रहे विश्व आर्थिक सम्मेलन के मौके पर इंग्लैण्ड की एक स्वयंसेवी संस्था ने एक रपट जारी की है जिसके मुताबिक भारत के सबसे दौलतमन्द एक फीसदी लोग देश की कुल दौलत के अट्ठावन फीसदी के मालिक हैं।यह आंकड़ा देश में भीषण आर्थिक विषमता का द्योतक है। यानी गांधीजी ने खादी के जिस कार्यक्रम को 1946 में ‘आर्थिक समानता का आरंभ’ माना था उसकी यात्रा उलटी दिशा में हुई है। इस देश में खेती के बाद सबसे बडा रोजगार हथकरघे से मिलता था ।उन हथकरघों तथा उन पर बैठने वाले बुनकरों की तथा खादी के उत्पादन के लिए आवश्यक ‘हाथ-कते सूत’ और उसे कांतने वाली कत्तिनों की हालत की पड़ताल जरूरी है। इसके साथ जुड़ा है ग्रामोद्योग तथा कुटीर व लघु उद्योग का संकट।

हाथ से कते सूत को हथकरघे पर बुनने से गांधी-विनोबा की खादी बनती है। दुनिया के प्रारंभिक बड़े अर्थशास्त्री मार्शल के छात्र और गांधीजी के सहकर्मी अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा के अनुसार ,’दूध का वास्तविक मूल्य उससे मिलने वाला पोषक तत्व है।‘ इस लिहाज से खादी का वास्तविक मूल्य वह है जो कत्तिनों ,बुनकरों और पहनने वालों को मिलता है।खादी के अर्थशास्त्र में गांधीजी के समय नियम था कि उसकी कीमत में से व्यवस्था पर 6.15 फीसदी से अधिक खर्च नहीं किया जाना चाहिए ताकि कत्तिनों और बुनकरों की आमदनी में कटौती न हो।कीमत निर्धारण की तिकड़मों के अलावा अब ‘व्यवस्था खर्च’ पर 25 फीसदी तक की इजाजत है। मुंबई के हुतात्मा चौक के निकट स्थित खादी भण्डार में ‘जया भादुड़ी कलेक्शन’ और दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित खादी भंडार में विख्यात डिजाइनरों के डिजाइन किए गए वस्त्र जिस कीमत पर बिकते हैं उसका कितना हिस्सा कत्तिनों और बुनकरों के पास पहुंचता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा खादी उत्पादन करने वाली संस्थाओं को फैशन-शो जैसे आयोजनों के लिए खादी कमीशन से अधिक आर्थिक मदद मिलती है किन्तु कताई केन्द्रों में अम्बर चरखों के रख-रखाव के लिए आर्थिक मदद नहीं मिलती। सूती-मिलों के बने सूत को हथकरघे पर बुने कपडे तथा पावरलूम पर बने कपड़ों के अलावा मोटर से चलने वाले अम्बर-चरखों पर काते गये सूत के कपडों को खादी भण्डारों से बेचने के लिए अनिवार्य प्रमाणपत्र खादी कमीशन द्वारा दिया जा रहा है। इन्हें ‘लोक वस्त्र’ कह कर खादी भंडार में बेचा जा रहा है।पूर्वोत्तर भारत के हथकरघों पर मिलों के धागे से बुने गये कपडों को भी खादी में सम्मिलित करने की नीति वर्तमान सरकार ने बनाई है। ताने में मिल का सूत और बाने में हाथ-कता सूत भी खादी भंडारों से अधिकृत रूप से बेचा जा रहा है।

केन्द्र सरकार की वर्तमान खादी-नीति की समीक्षा करते वक्त हमें यह तथ्य भी नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए कि आठ घन्टे खादी का कपड़ा बुनने वाले को 100 रुपये तथा आठ घन्टे सूत कांतने वाली कत्तिन को मात्र 25 रुपए मजदूरी मिलती है।यह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है। आजादी के पहले खादी और ग्रामोद्योग की गतिविधियां चलाने वाली संस्था अखिल भारत चरखा संघ की सालाना रपट से कुछ आंकड़ों पर ध्यान दीजिए,इन्हें गांधीजी ने उद्धृत किया है- ‘सन 1940 में 13,451 से भी अधिक गांवों में फैले हुए 2,75,146 देहातियों को कताई ,पिंजाई,बुनाई वगैरा मिला कर कुल 34,85,609 रुपये बतौर मजदूरी के मिले थे। इनमें 19,645 हरिजन और 57,378 मुसलमान थे ,और कातनेवालों में ज्यादा तादाद औरतों की थी।’ जब आंकडे खादी की बाबत हों तब उसके मापदन्ड ऐसे होते हैं। चरखा संघ किस्म के रोजगार और आमदनी वाले आंकडे खादी कमीशन ने देने बन्द कर दिए हैं। खादी का मौलिक विचार त्याग देने के कारण अब ऐसे आंकड़ों की आवश्यकता नहीं रह गयी है।

विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल को पूरी तरह लाचार बना दिया गया है। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं। 10 दस अप्रैल 2015 को उन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। विकेन्द्रीकृत छोटे तथा कुटीर उद्योगों के उत्पादों के बजाए देश के कुछ खादी भण्डारों में एक ऐसी उभरती हुई दानवाकार कम्पनी के उत्पाद बेचे जा रहे हैं।इस कम्पनी के 97 फीसदी पूंजी के मालिक की मिल्कीयत फोर्ब्स पत्रिका ने ढाई अरब डॉलर आंकी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वास्तविक स्वदेशी विकल्प लघु एवं कुटीर उद्योग होने चाहिए कोई दानवाकार कम्पनी नहीं।

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खादी ग्रामोद्योग आयोग के इस वर्ष के कैलेण्डर और डायरी पर गांधीजी के स्थान पर प्रधान मंत्री का चरखा जैसी आकृति के यंत्र के साथ चित्र प्रकाशित होने के बाद देश में जो बहस चली है उसे मौजूदा सरकार की खादी,हथकरघा और कुटीर उद्योग संबंधी नीति के आलोक में देखने का प्रयास इस लेख में किया गया है।प्रधान मंत्री ने स्वयं उस नीति की बाबत एक नारा दिया है-‘आजादी से पहले थी खादी ‘नेशन’ के लिए,आजादी के बाद हो खादी ‘फैशन’ के लिए’।खादी संस्थाएं विनोबा के सुझाव के अनुरूप खादी कमीशन की जगह ‘खादी मिशन’ बनाएंगी तब वह ‘अ-सरकारी खादी’ ही असरकारी खादी होगी।

(अफलातून)

राष्ट्रीय संगठन सचिव ,समाजवादी जनपरिषद।

816 रुद्र टावर्स,सुन्दरपुर,वाराणसी-221005.

aflatoon@gmail.com

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पिछले भाग से आगे :

सूर्य हमारा मित्र है तथा हमारा अत्यंत उपकार करता है , इसमें कोई शक नहीं है । जो सूर्य न होता तो माटी न तपती , बरसात न होती , अन्न न उगता , प्राण न रहते , क्योंकि शरीर में ऊष्मा न होती । इस प्रकार सूर्य द्वारा उपकार की कोई सीमा नहीं है । चारों दिशाओं में अनन्त सृष्टि फैली हुई है तथा उस अनन्त के बीच हम एक तुच्छ शरीर धारण कर बैठे हैं । तब सूर्यनारायण सुबह आते हैं तथा अपनी सहस्र किरणों से हमें आलिंगन देते हैं । रोज वही सूर्य उगता है , परन्तु प्रात: काल की उसकी लालिमा और प्रभा रोज नई लगती है । उसका दर्शन कभी अरुचि नहीं पैदा करता । उसका सौन्दर्य रोज नया नया ही लगता है । वह नित्यनूतन है ।वह कितना प्राचीन है , बावजूद इसके आज का सूर्य तो नया ही है ।

   

विनोबा

विनोबा

सूर्य का तेज ईश्वरीय तेज से प्रदीप्त है । सूर्य की छवि में भगवत् -छटा का आभास होता है । सूर्य पर ध्यान – धारण – समाधि करने से खगोलशास्त्र का ज्ञान मिलता है। बाह्य विभू्ति के दर्शन से आनंद होता हो , तो उसका कारण यह है कि आत्मा का कोई गुण उसके द्वारा प्रकट होता है । सूर्य को देख हमे आत्मा की तेजस्विता का अनुभव होता है । जैसे आत्मा शक्तिवान नहीं है , स्वयं शक्ति ही है वैसे सूर्य भी प्रकाशवान नहीं , स्वयं प्रकाश ही है ।

    सूर्य हमे देता ही रहता है , लेता कुछ नहीं । वह प्रत्येक कार्य में भाग लेता है , परंतु कोई फल नहीं मांगता । कर्मफल के त्याग का इससे उत्कृष्ट उदाहरण अन्य कहीं नहीं मिलेगा । वह कुछ लेता नहीं , देता ही रहता है । सृष्टि और सभी जीवों से प्रेम ही प्रेम करता है । उसमें ईश्वर का रूप प्रगट होता है । कठोपनिषद में कहा है , ‘ सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु , नलिप्यते चाक्षुषैर बाह्यदोषै: ‘ – सूर्य सबकी आंख है । सूर्य के कारण ही हमारी आंखों में देखने की शक्ति आती है । सबकी आंख होने के बावजूद वह सभी आंखों के बाह्य दोषों से प्रभावित नहीं होता । कोई सूर्य के प्रकाश में सद्ग्रन्थ अथवा असद्ग्रन्थ पढ़े, सूर्य इससे अलिप्त रहता है । जैसे सर्व भूतों की अंतरात्मा में वास करने वाला परमेश्वर उन सभी लोगों के सुख – दु:ख से लिप्त नहीं है , उससे अलिप्त रहता है । सब की अंतरात्मा में वास करने के बावजूद वह सब से भिन्न है , वह सब के बाहर है ।

[ जारी ]

अगला : ‘प्रकाश व ऊष्णता , ज्ञान व कर्म , बुद्धि व भावना , शक्ति व भक्ति’

 

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[ अजित वडनेरकर और विनोबा नामक  पोस्ट में कई सुधी पाठकों ने रुचि ली। इससे प्रेरित होकर गुजराती पाक्षिक भूमिपुत्र से कांति शाह द्वारा संकलित , विनोबा रचित ‘सूर्य-उपासना ‘  के अंश यहां दे रहा हूँ । अनुवाद मेरा है । अफ़लातून ]

सूर्य माने उत्तम प्रेरणा देने वाला । सु = ईर् । ‘ईर्’ अर्थात प्रेरणा देने वाला । सूर्य को ही सूक्ष्म रूप में सविता भी कहते हैं । गायत्री मंत्र में उसके ही वरणीय स्वरूप का ध्यान कर बुद्धि के लिए उससे उत्तम प्रेरणा की अपेक्षा की गई है ।

   सूर्य का  एक नाम ‘स्वराट’ है , जिससे स्वराज शब्द आया । स्वराट यानी स्वयंप्रकाशी । सूर्य स्वावलंबी है । चंद्र को अन्यराज कहा गया है । वह दूसरे के प्रकाश से विराजमान है। इस प्रकार ‘स्वराज’  शब्द बहुत सुन्दर अर्थ बताता है । ‘ भास्कर’ , ‘भानु’ वगैरह शब्द भी प्रकाश सूचक हैं ।

   सूर्य का संस्कृत में एक नाम है , ‘ शंस:’ उससे अंग्रेजी में ‘सन’ (sun) बना और फ्रेन्च में ‘सोलाई’ बना । युरोप की सभी भाषाओं में सूर्यवाचक शब्द संस्कृत से बने हैं ।

   सूर्य का अत्यंत सटीक  नाम है ‘मित्र’

    वेद में विश्वामित्र ऋषि का मंत्र है , जिसमें सूर्य को मित्र कहा गया है । सूर्य हमारा परम मित्र है । मित्र क्या कर रहा है ? ‘ मित्रो जनान् यातयति ब्रुवाण: ‘ –  यह मित्र लोगों को आवाहन दे रहा है , पुकार रहा है और उन्हें काम पर लगा रहा है । सूर्य आता है तब लोग अत्यंत उत्साह से घर के दरवाजे खोल देते हैं और उसकी किरणों

मित्र,देव,नवजीवनदायक

मित्र,देव,नवजीवनदायक

 को अपने घर में लाने के उत्सुक रहते हैं । अरे मित्र आया , मित्र आया ! ऐसा भी कहा गया है कि यह सूर्य क्या प्रजा का प्राण उग रहा है । ‘ प्राण: प्रजानां उदयत्येष: सूर्य: ‘ । सूर्य के लिए लोगों में कितना विश्वास , कितना प्रेम , कितनी भक्ति है ! और सभी उसके प्रति अपनापन महसूस करते हैं । सब को यह आभास होता है कि यह मेरा मित्र है । वेद में इसकी अजब महिमा गायी गई है । माम् प्रति माम् इति सर्वेण् समं – प्रत्येक को लग रहा है कि यह मेरे लिए आया , मेरे लिए आया । वह सबके लिए समान है ।क्या कोई कह सकता है कि सूर्य मेरे बाप की मिल्कियत है ? भगवान रामचन्द्र इतने बड़े थे , वे सूर्यवंशी भी थे । इसके बावजूद सूर्य जितना राम का था , उतना ही रावण का था ।और हम सब का भी है । सूर्य की यह खूबी है कि वह सब पर समान प्रेम करता है ।

    इस प्रकार सब से समान मैत्री रखने वाले सूर्यनारायण को आदर्श मित्र मान कर उसे अपने यहाँ ‘ मित्र’ कहा गया है । यूँ तो हिंदुस्तान ग़रम प्रदेश है , सूर्य का ताप बहुत तेज होता है । इसके बावजूद हम उससे घबड़ाए नहीं , उससे नाराज़ नहीं हुए । उलटे उसे ‘मित्र’ कहा । इसका कारण यह है कि हमने माना कि सूर्य की यह प्रखरता मनुष्य के लिए लाभदायक है , हानिकारक नहीं है ।  जारी

[ आगे : ‘हमारी अग्रणी संस्कृति का सूचक’ ]

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