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Posts Tagged ‘अयोध्या’

हमने एक त्रिशिर राक्षस का वध किया है
कि अपनी देव-त्रयी को बींध दिया है
हमें नहीं मालूम

हमें नहीं मालूम
कि हम खुश हैं कि उदास
सुन्न पड़ गया है हमारा हृदय हठात्

दिशाओं से चलता हमारा दशानन संवाद
एक काली चुप्पी में बदल गया है
दसो दिशाओं में एक साथ दौड़ जाना चाहते हम
दिशाहीन ठिठके खड़े हैं
अपने छोट बच्चे के सामने

कौतुक से चमकती आँखों वाला हमारा छोटा बच्चा
जिसे हम छोड़ आये थे
कंधे पर बोरे का बुभुक्षित झोला लटकाये
बचपन-वंचित उन बच्चों से तनिक दूर
जो किसी के बच्चे नहीं हैं
दिनभर बीनते कुछ-न-कुछ कूड़े-कचरे के ढेरों में
ताकते सूनी-सूखी आँखों से तमाशा
जब हम चिल्लाते गुजरे थे बलिदानी-अभिमानी टोलियों में
रामलला हम आयेंगे
रामलला हम आयेंगे
मंदिर वहीं बनायेंगे….
बगैर विचारे कि क्या रामायण के अक्षर-घर से
मानस-मंदिर से
भव्य होगा कोई बासा
दिव्य होगा कोई आलय?
हम राम-भक्त थे किसी के लिए राम-विभक्त ?

आज हमारी झुकी-झुकी आँखों के सामने है
फटी-फटी आँखों वाला हमारा छोटा बच्चा
जितनी भी हमारे भीतर वहशत उससे कई गुना है जिसके भीतर दहशत
बेजुबां दहशत जिसकी खामोश चीख से भरी जा रही है पूरी दुनिया
शोर-शराबे से भरी दुनिया एक पल को स्तब्ध

अखबारों की सुर्खियाँ आज काले मोटे हर्फ भर नहीं हैं
सचमुच लिखी हैं लहू से
जिनके नीचे वे बस पंकिल पंक्तियां नहीं
खौफ़ और गम से फटती शिरायें हैं वतन की

और हम सोच नहीं पा रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ
कि हम जो अपनी करुणा के कपास से
ढँक देना चाहते थे सभ्यता के चौराहे पर भटकती
काली अनंगी हड़ीली देहें
इथियोपिया और सोमालिया की
विवस्त्र-त्रस्त कर बैठे अपने ही हाथों मातृभूमि को
लज्जित और लहूलुहान

एक बड़ के बहुत पुराने पितामह पेड़ को काट देने वाली
कुल्हाड़ियाँ हैं हमारी बाहें
धूप-शीत-सधे जिसके प्रचीन छतनार शीश को अब
कभी नहीं देख सकेंगी आँखें
अब हम जानते हैं हमारी उँगलियाँ मूँगफलियों की तरह
आसानी से तोड़ सकती हैं आदमियों को
और बादाम की तरह बगैर खास दिक्कत के
मकान-दर-मकान
लेकिन हमारी हथेलियाँ अब कब
सहला सकेंगी हमारे बच्चे के काँपते कपोल
सपने की नदी में उसके डूबने को
नींद के नभ में उड़ने में बदलती हुई ?

बेघर हो गया है जो हमारे अन्त:करण के गर्भगृह में
रमने वाला देवता
उसे कितने बरस का बनवास दिया है हमने
वह कब लौटेगा अपनी अयोध्या में ?

– ज्ञानेन्द्रपति
(दिसंबर ’९२ )

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अयोध्या , १९९२

हे राम ,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकव्य !

                    तुम्हारे बस की नहीं

                     उस अविवेक पर विजय

                      जिसके दस बीस नहीं

                      अब लाखों सिर – लाखों हाथ हैं

                       और विवेक भी अब

                        न जाने किसके साथ है ।

 

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाग्य

एक विवादित स्थल में सिमट कर

रह गया तुम्हारा साम्राज्य

 

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है ,

‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

चुनाव का डंका है !

 

हे राम , कहाँ यह समय

       कहाँ तुम्हारा त्रेता युग ,

         कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

                   और कहाँ यह नेता – युग !

 

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुराण – किसी धर्मग्रंथ में

             सकुशल सपत्नीक….

अब के जंगल वो जंगल नहीं

          जिनमें घूमा करते थे बाल्मीक !

– कुँवरनारायण

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