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Posts Tagged ‘अरुंधती राय’

[ स्कूल के दौरान ही सुनील को गाँधीजी की आत्मकथा मिली थी और वे उससे प्रभावित हुए थे। मध्य प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में मेरिट सूची में स्थान पाने के बाद एक छोटे कस्बे से ही उन्होंने स्नातक की उपाधि ली। देश के अभिजात विश्वविद्यालय माने जाने वाले – जनेवि में दाखिला पाया । विद्यार्थी जीवन में ही लोकतांत्रिक समाजवाद में निष्ठा रखने वाले युवजनों की जमात से जुड़ गये । जलते असम और पंजाब के प्रति देश में चेतना जागृत करने के लिए साइकिल यात्रा और पदयात्रा आयोजित कीं । समता एरा और सामयिक वार्ता के सम्पादन से जुड़े रहे तथा दर्जनों पुस्तकें लिखीं और सम्पादित की। जनेवि में हरित क्रांति के प्रभावों पर पीएच.डी का काम छोड़ मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के केसला प्रखण्ड के किसान-आदिवासियों को संगठित करने में जुट गये ।गत पचीस वर्षों से उस क्षेत्र को वैकल्पिक राजनीति का सघन क्षेत्र बनाया है। दर्जनों बार जेल यात्राएं हुईं -सरकार द्वारा थोपे गये फर्जी मुकदमों के तहत । प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी के हक को लेकर सफल नये प्रयोग किए । देश में नई राजनैतिक ताकत की स्थापना के लिए समाजवादी जनपरिषद नामक दल की स्थापना करने वालों में प्रमुख रहे। माओवादी राजनीति की बाबत गंभीर अंतर्दृष्टि के साथ लिखा गया यह लम्बा लेख एक नई दिशा देगा। आज के ’जनसत्ता’ से साभार ।- अफ़लातून ]

सुनील

दंतेवाड़ा ने देश को दहला दिया है। यह साफ है कि दंतेवाड़ा,लालगढ़, मलकानगिरि जैसे कुछ आदिवासी इलाकों में माओवादियों ने अपने आजाद क्षेत्र बना लिये हैं, आदिवासियों का ठोस समर्थन और आदिवासी युवा उनके साथ हैं तथा वे पूरी तैयारी और सुविचारित रणनीति के साथ अपना युद्ध लड़ रहे हैं।

6 अप्रैल को दंतेवाड़ा में अभी तक की पुलिस व अर्धफौजी बलों की सबसे बड़ी क्षति हुई है। इस घटना की प्रतिक्रिया में रस्मी तौर पर बयान आ रहे हैं और तलाशी अभियान चल रहे हैं। कई बेगुनाहों को इस चक्कर में पकड़ा, मारा या सताया जाएगा। हिंसा और अत्याचारों का दौर दोनों तरफ चलता रहेगा। लेकिन इससे कुछ नहीं निकलेगा। हालात और बिगडे़गी। वक्त आ गया है कि जब देश गंभीरता से विचार करे कि ये हालातें क्यों पैदा हुई, माओवादियों का इतना जनाधार कैसे बढ़ा, सरल और शांतिप्रिय आदिवासी मरने व मारने पर क्यों उतारु हुए ? इस हिंसा की जड़ में क्या है ?

माओवाद या नक्सलवाद के बारे में देश आम तौर पर तभी सोचता है, जब ऐसी कोई बड़ी घटना होती है। मीडिया के जरिये कभी-कभी जो अन्य कहानियां या खबरें मिलती हैं, वे सतही और पूर्वाग्रहग्रस्त रहती हैं। ऐसी हालत में देश की एक बड़ी अंग्रेजी लेखिका अरुंधती राय ने करीब एक सप्ताह दंतेवाड़ा के जंगलों में सशस्त्र माओवादियों के साथ बिता कर उसका वृत्तांत ‘आउटलुक’ (29 मार्च, 2010) पत्रिका में देकर हमारा एक उपकार किया है। ऐसा नहीं है कि वे पूरी तरह निष्पक्ष है। माओवादियों के प्रति उनकी सराहना, सहानुभूति और उनका रोमांच साफ है। किन्तु इससे दूसरी तरफ की, अंदर की, बहुत सारी बातें जानने एवं समझने को मिलती है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछले काफी समय से सरकार ने इन इलाकों को सील कर रखा है और बाहर से किसी को जाने नहीं दे रही है। मेधा पाटेकर, संदीप पांडे या महिला दल की जनसुनवाई या पदयात्रा को भी सरकार और सरकारी गुर्गों ने होने नहीं दिया। उनकी घेरेबंदी को भेदकर, भारी जोखिम लेकर, काफी कष्ट सहकर, अरुंधती ने बड़ा काम किया है। भारत के बुद्धिजीवी जिस तरह से वातानुकूलित घेरों के अंदर बुद्धि-विलास तक सीमित होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए भी यह काबिले तारीफ है।

तीन संकट:

इस वृतांत से एक बात तो यह पता चलती है कि वहां के आदिवासियों का एक प्रमुख मुद्दा जमीन और जंगल (तेदूंपत्ता या बांस कटाई) की मजदूरी का रहा है। बड़े स्तर पर वनभूमि पर आदिवासियों का कब्जा करवाकर और वन विभाग के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाकर माओवादियों ने अपना ठोस जनाधार बनाया है। वास्तव में, देश के सारे जंगल वाले आदिवासी इलाकों में  तनाव, टकराव और जन-असंतोष का यह एक बड़ा कारण है। अब तो देश को यह अहसास होना चाहिए कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रुप से अन्याय हुआ है, भारत के वन कानून जन-विरोधी और आदिवासी – विरोधी हैं, आजादी के बाद हालातें नहीं बदली हैं, बल्कि राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारण्यों एवं टाईगर रिजर्वों के रुप में उनकी जिंदगियों पर नए हमले हुए हैं। संसद में पारित आधे-अधूरे वन अधिकार कानून से यह समस्या हल नहीं हुई है। जैसे नरेगा से रोजगार की समस्या हल नहीं हो सकती, सूचना के अधिकार से प्रशासनिक सुधार का काम पूरा नहीं हो जाता, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून से देश में भूख एवं कुपोषण खतम नहीं होने वाला हैं, उसी तरह वन-अधिकार कानून भी ज्यादातर एक दिखावा ही साबित हुआ है। भारत के जंगलों पर पहला अधिकार वहां रहने वाले लोगों का है, उनकी बुनियादी जरुरतें सुनिश्चित होनी चाहिए, तथा अंग्रेजों द्वारा कायम वन विभाग की नौकरशाही को तुरंत भंग करके स्थानीय भागीदारी से वनों की देखरेख का एक वैकल्पिक तंत्र बनाना चाहिए। भारत के जंगल क्षेत्रों में खदबदा रहे असंतोष का दूसरा कोई इलाज नहीं हैं। और यही जंगलों एवं वन्य प्राणियों के भी हित में होगा।

वैश्वीकरण के दौर में, निर्यातोन्मुखी विकास और राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर के चक्कर में, देशी विदेशी कंपनियों और सरकार के सहयोग से इन इलाकों के जल-जंगल-जमीन पर हमले का एक नया दौर शुरु हुआ है। खदानों व कारखानों के बेतहाशा करारनामे और समझौते हो रहे हैं। यदि सबका क्रियान्वयन हो गया, तो भारत के बड़े इलाकों से जंगल और आदिवासी दोनों साफ हो जाएंगे। सलवा जुडुम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के पीछे सरकार के जोर लगाने का एक बड़ा कारण यही है कि इन इलाकों में खनिज के भंडार भरे हुए हैं। सलवा जुडुम के लिए टाटा और एस्सार कंपनी ने भी पैसा दिया है, इस तरह के तथ्य सामने लाने का भी काम अरुंधती राय ने किया है। भारत के मौजूदा गृहमंत्री चिदंबरम साहब भी वेदांत एवं अन्य कंपनियों से जुडे़ रहे हैं। यह हमला व यह सांठगांठ देश में लगभग हर जगह चल रहा है। कई जगह लोग गैर-हथियारबंद तरीकों से लड़ रहे हैं। यदि देश को बचाना है, तो इस कंपनी साम्राज्यवाद को तत्काल रोकना होगा। यह दूसरा निष्कर्ष सिर्फ अरुंधती राय के लेख से नहीं, देश के कोने-कोने से आने वाली सैकड़ों रपटों व खबरों से निकलता है।

माओवाद के नाम पर इन तमाम गैर-हथियारबंद आंदोलनों को भी कुचला जा रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि भारतीय राजसत्ता और माओवादी दोनों के लिए यह स्थिति सुविधाजनक है और दोनों इसे बनाए रखना चाहते हैं। माओवाद प्रभावित इलाकों के आसपास के जिलों में भी अब कोई भी भ्रष्टाचार या पुलिस ज्यादतियों का मामला भी नहीं उठा सकता। उसे माओवादी कहकर जेल में सड़ा दिया जाएगा या फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाईश और जगह खतम होने से लोग मजबूर होकर माओवाद की शरण में जाएंगे, इसलिए यह माओवादियों के  हित में भी है। लालगढ़ में ‘‘पुलिस संत्रास बिरोधी जनसाधारणेर कमिटी’’, कलिंग नगर में टाटा कारखाने के विरोध में आंदोलन, नारायणपटना में अपनी जमीन वापसी की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी — ये सब गैर-हथियारबंद लोकतांत्रिक आंदोलन थे। इनके नेताओं को जेल में डालकर, इन पर लाठी – गोली चलाकर सरकार इनको माओवादियों की झोली में डाल रही है।

अतएव हमें तीसरा अहसास भारतीय लोकतंत्र पर छाए गंभीर संकट का होना चाहिए। भारतीय राजसत्ता जहां चाहे, जब चाहे, लोकतांत्रिक नियमों और मान-मर्यादाओं को ताक में रख देती है। विशेषकर जो इलाके और समुदाय भारत की मुख्य धारा के हिस्से नहीं है, जैसे पूर्वोत्तर और कश्मीर, दलित, आदिवासी और मुसलमान, उनके साथ वह बर्बरता और क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ जाती है। उसका बरताव वैसा ही होता है, जैसा एक तानाशाह का होता है। सशस्त्र संघर्ष तो अलग बात है, लोकतांत्रिक एवं अहिंसक तरीकों से होने वाले जनप्रतिरोध को भी उपेक्षित करने व कुचलने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आखिर दस वर्षों से चल रहा इरोम शर्मिला का अनशन तो एक गांधीवादी प्रतिरोध ही है, जो इस राजसत्ता की संवेदनशून्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अपने दमन और अत्याचारों से यह राजसत्ता लोगों को उल्टे हिंसा की और धकेलती एवं मजबूर करती है।

भारत में बढ़ता हुआ उग्रवाद, आतंकवाद और माओवाद कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र की गहरी विफलता की ओर इशारा करता है, जिसमें लोगों को अपनी समस्याओं और अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने तथा उनके निराकरण के जरिये नहीं मिल पा रहे हैं। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की इस विफलता को देश के मुख्य इलाकों के आम लोग भी महसूस कर रहे हैं। उनकी हताशा कम मतदान, आम बातचीत में नेताओं को गाली देने, तुरंत कानून अपने हाथ में लेने या हिंसा व आगजनी की घटनाओं में प्रकट होती है। देश की आजादी के बाद लोकतंत्र का जो ढांचा हमारे संविधान निर्माताओं ने अपनाया, वह शायद बहुत ज्यादा उपयुक्त नहीं था। अब पिछले छः दशकों के अनुभव के आधार पर इसकी समीक्षा करने का समय आ गया है। माओवादियों की तो इसमें कोई रुचि नहीं होगी कि इस ‘बुर्जुआ’ लोकतंत्र को बचाया जाए। लेकिन बाकी देशप्रेमी लोगों को इस लोकतंत्र की अच्छी बातों जैसे वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, कमजोर तबकों के लिए आरक्षण, आदि को संजोते हुए इसके ज्यादा विक्रेन्द्रित, जनता के ज्यादा नजदीक, नए वैकल्पिक ढांचे के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

इस लेख में अरुंधती राय ने विरोध के गांधीवादी, अहिंसक एवं लोकतांत्रिक तरीकों का कुछ हद तक मजाक उड़ाया है और बताया है कि वे सब असफल हो गए है। यह भी पूछा है कि आखिर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कौन-कौन सा दरवाजा नहीं खटखटाया ? वे बताना चाहती हैं कि हथियार उठाने, युद्ध लड़ने, सत्ता के मुखबिरों को मारने-काटने का जो रास्ता माओवादियों ने चुना है, उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। किन्तु क्या सचमुच ऐसा है ? पता नहीं, अरुंधती राय को मालूम है या नहीं, देश के कई हिस्सों में इस वक्त सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे आंदोलन चल रहे हैं जो सब लोकतांत्रिक और गैर-हथियारबंद है। वास्तव में माओवादियों के मुकाबले उनका दायरा काफी बड़ा है। सफलता-असफलता की उनकी स्थिति भी मिश्रित है, एकतरफा नहीं। बल्कि सूची बनाएं, तो ऐसे कई छोटे-छोटे जनांदोलन पिछले दो-ढाई दशक में हुए हैं जो विनाशकारी परियोजनाओं को रोकने के अपने सीमिति मकसद में सफल रहे हैं। झारखंड में कोयलकारो, उड़ीसा में गंधमार्दन, चिलिका, गोपालपुर, बलियापाल एवं कलिंगनगर, गोआ में डूपों और सेज विरोधी आंदोलन, महाराष्ट्र में नवी मुंबई और गोराई के सेज -विरोधी आंदोलन  आदि। बंगाल में सिंगुर और नन्दीग्राम में भी हिंसा जरुर हुई, लेकिन वे मूलतः लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर के आंदोलन थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन भले ही नर्मदा के बड़े बांधों को रोक नहीं पाया, लेकिन उसने बड़े बांधों और उससे जुड़े विकास के मॉडल पर एक बहस देश में खड़े करने में जरुर सफलता पाई। विस्थापितों की दुर्दशा के सवाल को भी वह एक बड़ा सवाल बना सका, नहीं तो पहले इसकी कोई चर्चा ही नहीं होती थी। लेकिन यह भी सही है कि नवउदारवादी दौर में राजसत्ता का जो दमनकारी चरित्र बनता जा रहा है, उसमें आंदोलन एवं प्रतिरोध करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। गांधी के देश में गांधी के रास्ते पर चलना कठिनतर होता जा रहा है। (जारी)

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